सिर्फ एक ही दिन में लड्डू को खुश करना हो तो गोपाष्टमी ही है वो दिन

11813331_496731767157117_7254410777489120805_n24 घन्टे माँ के आगे पीछे घूमना, माँ के साथ ही खाना, माँ के साथ ही बांसुरी बजाना, माँ के पीठ पर बैठ कर यमुना में तैरना, बार बार माँ को पप्पी (चूमना) देना, माँ को और माँ के बच्चों को अपने हाथों से खिलाना और सपने में भी माँ के साथ खेल कूद मस्ती करना, ही है माँ के प्रति लड्डू का चरम प्रेम, भक्ति और दीवानगी !

वैसे तो लड्डू गोपाल हैं अनन्त ब्रह्मांडों के निर्माता और गाय माता हैं केवल एक जीव पर दोनों के बीच इतना परम प्रेम क्यों हैं बहुतों को समझ में नहीं आता है !

श्रीमत भागवत महा पुराण समेत अन्य सभी पुराणों में जहाँ जहाँ श्री कृष्ण लीला का सुन्दर वर्णन है वहां वहां श्री कृष्ण और गाय माता के बीच के दिव्य ममतामयी वात्सल्य सम्बन्ध का बहुत विस्तृत उल्लेख है !

हम लोगों को अपने ऊपर जरुर शर्म करनी चाहिए कि जिस गाय माता का भगवान् श्री राम, भगवान श्री कृष्ण, धर्म राज युधिष्ठर जैसे लोग सुबह सो के उठने के बाद सबसे पहले पैर छूते थे, उन्ही गाय माता को आज हम लोगों ने सड़कों पर कूड़ा खाने के लिए लावारिश छोड़ दिया और हमें इतनी भी फुर्सत नहीं देखने की गाय माता भूख प्यास से अन्दर ही अन्दर तड़प रही हैं या कोई नीच आदमी उन्हें काटने के लिए कसाई खाना ले जा रहा है !

लड्डू गोपाल का अपनी गाय माँ के लिए आखिरी हद तक का प्रेम जग जाहिर है और गोपाष्टमी वही पर्व है जब गाय माता की सेवा करने का मौका पाने के लिए बहुत छोटे से लड्डू गोपाल ने बहुत हाथ पैर मारे थे ! मतलब लड्डू गोपाल की बहुत छोटी उम्र देखकर नन्द बाबा संकोच कर रहे थे की कैसे गोपाल इतनी बड़ी बड़ी गाय माताओं को चारा खिलाने रोज जंगल (वृन्दावन) जा सकेंगे पर लड्डू गोपाल तो जो पीछे पड़े की वे नन्द बाबा को अन्त में मनवा कर ही माने, भले ही उन्हें अपनी तोतली जबान में थोड़ा सा झूठ बोलना और दूसरे से बुलवाना पड़ा हो !

कथा ऐसी है की जब नन्द बाबा नहीं मान रहे थे और कह रहे थे की अरे कान्हा तू परेशान मत हो मै किसी पंडित से पूछ कर तुझे शुभ मुहूर्त में गाय माता की सेवा करने का अवसर जरूर दूंगा पर कान्हा कहाँ मानने वाले थे, वो भी तुरन्त ठुमुक ठुमुक कर दौड़ते हुए घर के बगल के पंडित से जाकर बोले बाबा, कृपया मेरे घर चलकर मेरे पिताजी से कह दीजिये की आज ही शुभ मुहूर्त है ! अब पण्डित बेचारे लड्डू गोपाल का कल्पना से भी परे प्यारा सुन्दर रूप, बड़ी बड़ी विशाल आँखे और ऊपर से मक्खन लगी सम्मोहनी तोतली जबान सुनकर तो ख़ुशी ख़ुशी मरने को तैयार हो जाय तो एक झूठ बोलना कौन सी बड़ी बात थी !

पण्डित जी के मुंह से भी लड्डू गोपाल के मन की बात सुनकर नन्द बाबा हसने लगे और समझ गए की पंडित जी भी उनके नटखट गोपाल की शरारत का शिकार हो गएँ !

नन्द बाबा का मन नहीं माना की गोपाल को इतनी छोटी उम्र में इतनी बड़ी बड़ी गाय माता के साथ कैसे भेजा जाय ! पर जब नन्द बाबा को पता चला की आज उनके गौशाला की लाखों गाय माता चारा खाने वृन्दा वन जा ही नहीं रही है तब वो समझ गएँ की श्री कृष्ण और गाय माता के बीच का सम्बन्ध केवल इस जन्म का नहीं बल्कि कई जन्मो का है और उन्होंने ख़ुशी ख़ुशी गोपाल को गो माता के साथ जाने की आज्ञा दे दी !

लेकिन फिर एक नयी समस्या आ गयी की अब गोपाल नंगे पैर जंगल जा रहे है गाय माता को चराने और कारण ये की उनकी गाय माता भी तो नंगे पैर जा रही हैं ! तब नन्द बाबा को आनन फानन में कारीगर बुलाकर अपनी सभी लाखों गाय माता को सोने के जूते पहनाने पड़े !

तो कल जो श्री कृष्ण की परम प्रिय माता अर्थात गाय माता की जितनी अधिक से अधिक सेवा करेगा उतना ही अधिक श्री कृष्ण की प्रसन्नता का कृपा पात्र बनेगा !

और श्री कृष्ण की प्रसन्नता से क्या हो सकता है यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि श्री कृष्ण स्वतंत्र ईश्वर हैं और किसी भी नियम कानून में बंधे नहीं है इसलिए अगर रीझ गए तो सेकेंडों में वो, वह दे सकते हैं जो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता !

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