सिर्फ अपनी ख़ुशी की तलाश बर्बाद कर रही है अपने अंश की ख़ुशी

· January 11, 2016

माँ की दूसरी शादी के दंश को झेलते हुए एक पुत्र की आत्म व्यथा –

098909000000.…..माँ मै तुम्हारे दाम्पत्य के टूटे हुए रिश्ते का वो कुम्हलाया हुआ पुष्प हूँ जिसकी हर पंखुड़ी अपने ही माता पिता के अनचाहे उपेक्षित दंश से हर पल टूट कर बिखरती है !

माँ तुमने तो पुनर्विवाह करके एक नए पति और उनकी भरीपुरी गृहस्थी को आत्मसात कर लिया लेकिन मै तो आज भी अकेला हूँ !

मै इस नए घर में अपने को एक फालतू अनचाही वस्तु की तरह ही महसूस करता हूँ !

मुझे हर पल अपने उस घर की याद सताती है जहा मै तुम्हारे स्नेहिल आँखों से बरसते हुए स्नेह से भीगता रहता था ! तुम्हारे ममता के आँचल की छाँव में मै अपने को हर क्षण सुरक्षित महसूस करता था ! मुझे अपने उस घर का हर कोना याद आता है जहा तुम मेरी हर चाही अनचाही हठ को पूरा करती थी !

लेकिन आज तुम इस नए परिवेश की कुछ विवशताओ से इस तरह जकड़ी हो की चाह कर भी मुझे वो प्यार, वो सुरक्षा जिसका हक़ तुम्हारे इस बेटे को है, नहीं दे पाती यद्दपि मै तुम्हारी आँखों में अपने ही बेटे को बिन माँझी डगमगाती हुई नाँव की तरह देख, एक मूक करुण क्रन्दन देखता हूँ !

लेकिन तुम विवश हो और मै, बिल्कुल कमजोर असहाय मुरझाया हुआ वो पुष्प हूँ जिसकी हर पंखुड़ी अपनों के ही दंश से बिंधी हुई है, जिसकी हर पर्त सुरक्षा, स्नेह के अभाव में नगण्य हो गयी है !

एक कुहास और अनिश्चय की दुनिया में भटकता हुआ मै स्वयं के प्रति कर्तव्यों से अनजान हूँ तो फिर इस समाज और देश के प्रति किन कर्तव्यों को निभाऊंगा !

इसका दोषी मै या मेरे जैसे मासूम नहीं है बल्कि वो माता पिता है जो अपनी ख़ुशी की तलाश में अपने ही अंश को इस दोराहे पर लाकर खड़ा कर देते है कि वो प्रतिपल अपनी ही पहचान को खोता जाता है !

लेखिका –
श्री देवयानी

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