संस्मरण – जेल-जीवन की झलक (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

· April 21, 2013

download (3)जेल जाने के पहले जेल के संबंध में हृदय में नाना प्रकार के विचार काम करते थे। जेल में क्‍या बीतती है, यह जानने के लिए बड़ी उत्‍सुकता थी। कई मित्रों से, जो इस यात्रा को कर चुके थे, बातें हुई। किसी ने कुछ कहा और किसी ने कुछ। इस विषय में कुछ साहित्‍य भी पढ़ा। महात्‍मा गाँधी के ‘जेल के अनुभव’ को बहुत पहले पढ़ चुका था। भाई परमानंद के ‘जेलजीवन’ को भी पढ़ा। जो कुछ सुना और जो कुछ पढ़ा, उस सबसे इसी नतीजे पर पहुँचा था कि जेल-जीवन है कठिन जीवन और वहाँ जो कुछ बीतती है उसे भूलना कठिन हो जाता है।

22 मई, 1922 का दिन था। दिन ढल चला था। कोई चार बजे का समय था। लखनऊ की धूप और लू मशहूर है। गरमी के कारण चोटी से एड़ी तक पसीना आ रहा था, परंतु तो भी मन को आनंद मालूम होता था। कदम जल्‍दी-जल्‍दी उठते थे। खुली धूप और खुली हवा के थपेड़े किसी चमनस्‍तान के झोंके के सदृश मालूम होते थे। यह दिन था जेल से बाहर निकलने का। यह समय था लखनऊ स्‍टेशन पर पहुँचकर कानपुर के लिए चलने का। कानपुर जाने वाली गाड़ी की ओर बढ़ रहे थे कि इतने में ‘वंदे मातरम्’, ‘महात्‍मा गाँधी की जय’ की ध्‍वनि कानों में पड़ी। नजर घुमाकर देखने पर, स्‍टेशन को पार करने वाले पुल के जीने पर पुलिस के गार्ड के बीच में अनेक युवक चलते हुए दिखलाई पड़े, जिनके पैरों में बेड़ियाँ थीं। एक प्रकार से उनके हाथ-पैर बँधे हुए थे। परंतु तो भी जबान और जबानों से बढ़कर हृदय खुले हुए थे। उन्‍होंने ‘जय’ बोली। माता की वंदना की। समय था दो ही तीन मास पहले, कि इस प्रकार की गई, एक भी ध्‍वनि, उपस्थित लोगों के कंठों से उसी प्रकार की ध्‍वनि को गुँजा देती। परंतु इस समय ऐसा नहीं हुआ। युवकों के कंठ से निकली हुई आवाज स्‍टेशन की दीवारों से टकराकर रह गई। लोग उनकी ओर देखते थे, परंतु उस देखने में न कोई विशेषता थी और न कोई चाह। ऐसे अवसरों पर निकली हुई ऐसी आवाजें मानों हजार जिह्वाओं से यह बातें कहा करती हैं कि अन्‍याय हो रहा है, परंतु हम उसके प्रहारों के नीचे भी अटल हैं। और जब ऐसे अवसरों या इन आवाजों का उत्‍तर आसपास के आदमी उसी प्रकार से देते हैं, तब मानों वे कहते हैं कि इस अन्‍याय को हम भी घृणा की दृष्टि से देखते हैं। हमारा हाथ और हमारा हृदय तुम्‍हारी ओर है। वीरो! दृढ़ रहना। परंतु इस अवसर पर इन युवकों की आवाज का कोई उत्‍तर नहीं दिया गया। लोग चुपचाप उन्‍हें देखते रहे। मानों वे एक तमाशा देखते थे, मानों वे एक जुलूस देखते थे। अच्‍छे काम के लिए किसी की वाह-वाह की आवश्‍यकता नहीं, परंतु साधारण हृदय अच्‍छे काम में भी उत्‍साहित किए जाने और सहानुभूति पाने के सदा भूखे रहते हैं। यदि निर्बलता है, तो यह क्रूरता है कि लोग अपने कामों के करने वाले और उनके लिए मरने वालों का दिल वक्‍त पड़े पर न केवल बढ़ा ही सकें, किंतु अपनी सर्दमोहरी का इस तरह परिचय दें। स्‍टेशन आते समय सड़क पर, एक कुएँ के पास ए युवक पेड़ के नीचे बैठे पानी पीते हुए दिखाई पड़े थे। पुलिस उन्‍हें घेरे हुए थी। उस समय खयाल हुआ था कि साधारण अपराधों में पकड़े हुए लोग होंगे। परंतु आगे बढ़ने पर जब वे फिर दिखाई दिए, जब उनकी घोषणा सुनाई दी और जब इधर-उधर लपककर दरियाफ्त करने पर यह मालूम हुआ कि वे लोग मलीहाबाद के हैं, गाँधीजी के काम में पकड़े गए हैं, उसी में उन्‍हें सजा हुई, अब पुल पार कराकर सेंट्रल जेल लखनऊ लिवाए लिए जा रहे हैं, तब पहले का विचार हृदय से दूर हो गया और जेल-जीवन पर मन में अनेक भावनाएँ उठने लगीं।

लोग समझते हैं कि जेलों में अधिक कष्‍ट नहीं है, राजनैतिक कैदी मजे में हैं और उन्‍हें कोई विशेष असुविधा नहीं है। लेखक के भी इस विषय में समय-समय पर अनेक प्रकार के विचार रहे हैं। कभी कुछ और कभी कुछ। जब तक जेल की चहारदीवारी के भीतर कदम नहीं रखा था, तब तक जेल हौआ-सा मालूम पड़ता था। उसका बड़ा भयानक चित्र आँखों के सामने घूमता था। जेल में पहुँचने के बाद भी कुछ दिनों तक उसकी भयंकरता की दशा आँखों के सामने नाचा करती थी। उठते-बैठते यही खयाल रहता था कि यहाँ किस बात की आजादी है और किस बात की नहीं। यह प्रश्‍न सदा उपस्थित रहता था कि जेलर की आज्ञा बिना कितने कदम चलना वाजिब है और कितने कदम वाजिब नहीं। परंतु रहते-रहते, देखते-सुनते और नियमों के उल्‍लंघन की घटनाएँ लगातार सामने आती रहने के कारण यह खयाल धीरे-धीरे नष्‍ट होने लगा कि जेल वालों ने हवा में भी जाल बिछा रखा है और उनकी आज्ञा के बिना कुछ काम नहीं किया जा सकता। इस विचार के नाश के साथ-साथ जेल की भयंकरता का खयाल भी धीरे-धीरे कम होने लगा। कुछ दिनों के जेल-जीवन के अभ्‍यास ने भी मन पर ऐसा ही प्रभाव छोड़ा। साधारण कैदियों के संसर्ग में आने से, जेल के संबंध में विचारों में कुछ परिवर्तन और भी हुआ। दिखाई तो यह देता था कि इन लोगों को बड़ा कष्‍ट है और बड़ी यातना के साथ अपने दिन काट रहे हैं, परंतु उनसे मिलने पर मालूम पड़ता था कि कष्‍ट तो उन्‍हें हैं ही, परंतु उतना और असह्म नहीं जैसा कि बहुधा समझ लिया जाता है। सारे कष्‍ट बाहर से, दूर से असह्म या मुश्किल से सहन करने के योग्‍य मालूम पड़ते है, परंतु जब वे सिर पर पड़ जाते हैं, तब कोमल से कोमल स्‍वभाव वाले भी इन्‍हें किसी-न-किसी प्रकार झेल ले जाते हैं। उस घबराहट का पता भी नहीं होता जो पहले होती है और कष्‍ट सहन करने की हिम्‍मत आप से आप आ जाती है। जब विशेष व्‍यवहार पाने वाले कैदी लखनऊ जिला जेल में जमा किए गए और सैकड़ों युवक राजनीतिक मामलों में ही पकड़े जाकर साधारण कैदियों के बीच में रखे गए, उन्‍हें कष्‍ट मिला और कठिन से कठिन परिश्रम करना पड़ा, तब लेखक का खयाल है कि शायद उन्‍हें उन कष्‍टों की इतनी पीड़ा न हुई होगी जितनी पीड़ा, जितनी चिंता उनके कुछ भाइयों को हुई, जो विशेष व्‍यवहार पा रहे थे और जिन्‍हें कैदियों की कठिनाइयाँ अधिक विषम रूप से नहीं सहनी पड़ती थीं। इन लोगों ने अपने विशेष व्‍यवहार को क्‍यों नहीं छोड़ दिया था, इस पर फिर आगे चलकर कहूँगा। इस समय तो यही बात सामने है कि जेल-जीवन का रूप किस अवसर पर आँखों के और मन के सामने कैसा था।

जेल से निकलने के कुछ घंटे पश्‍चात्, कुछ घंटों के लिए जेल-जीवन की विषमता का विचार हृदय से बिलकुल निकल गया था। नया वायुमंडल था। बिछुड़े हुए मित्र मिले थे। दुनिया के दर्शन फिर से हुए थे। चिड़ियाँ चारों ओर से चहचहा रही थीं। हवा के झोंके धीरे-धीरे इधर-उधर डोल रहे थे। सड़कें, मंदिर, मस्जिद, बाजार, दुकानें, भीड़, इक्‍के, गाड़ी आदि बहुत दिनों से नहीं दिखाई दिए थे। एकदम दृष्टि के सामने दुनिया के भंडार की अनेकानेक चीजें आ गईं। चहारदीवारियों के भीतर बंद शरीर और केवल कल्‍पना-भूमि में विचरने वाले मन के सामने नाना प्रकार की वस्‍तुएँ और शक्‍लों के एकदम सामने आ जाने के कारण कैद की बातों की बिलकुल याद न रही। हर बात अच्‍छी लगी। हर वस्‍तु में कुछ नवीनता-सी थी। तेज धूप तक में आकर्षण था। चलती हुई लू तक में ठंडक थी। ध्‍यान कुछ ऐसा बँटा कि जब मलीहाबाद के युवक सामने आए, ‘महात्‍मा गाँधी की जय’ कानों में पड़ी तब मानो होश आ गया और जेल-जीवन की बातें याद आ गईं। जेल के सुख और दु:ख सब एक के बाद एक दृष्टि के सामने आईं जो उन लोगों को प्राप्‍त हैं जो जेल के विशेष व्‍यवहार पा रहे हैं और वे कठोर कठिनाइयाँ भी, जिनके पास में हमारे सैकड़ों वीर जकड़े हुए हैं और जिनकी जकड़न में जकड़े जाने के लिए मलीहाबाद के ए वीर युवक ‘माता और महात्‍मा गाँधी की जय’ पुकारते हैं। हाथों और पैरों में आभूषण पहने और चारों ओर कड़े पहरे से घिरे हुए जा रहे थे। इन सब विचारों के बीच में मैं भी निश्‍चात्‍मक रूप से यह न कह सका-कम से कम थोड़े शब्‍दों में एक या दो शब्‍दों में, कि जेल का जीवन अच्‍छा है या बुरा।

कानपुर की जेल में जब तक रहा, तब तक यही कहना चाहिए कि बुरी नहीं कटी। अक्टूबर मास था। जाड़े के दिन थे। चिंता थी कि जेल में पहुँचते ही कपड़े काफी मिलेंगे या नहीं। परंतु जब जेल के फाटक ने ‘दुनिया’ और अपने बीच में एक गहरी गाँठ लगा दी, उधर के लोग उधर और इधर के इधर की सीमा बाँध दी, तब जेल के दफ्तर में पहुँचते ही जेलर ने कहा कि आप अपने कपड़े इस्‍तेमाल कर सकते हैं। आपके साथ विशेष व्‍यवहार रखने की आज्ञा हमें मिली है। ‘सिविल वार्ड’ में रखा गया। कोई दस-बारह गज लंबी और चौड़ी जग‍ह थी। बीच में एक बैरक बनी हुई थी। उसके भीतर 9-10 चबूतरे बने हुए थे। इस बैरक में वे लोग रखे जाते थे जो दीवानी के मामलों में सजा पाते थे। जितने चबूतरे थे, उतने ही कैदियों के रखने की जगह समझी जाती थी। बैरक के बीच में चारपाई बिछाने लायक जगह खाली पड़ी थी। वहीं एक अस्‍पताली चारपाई बिछी मिली। मित्रों के कपड़े भिजवा दिए। चारपाई पर बिस्‍तर भी बिछ गया। शाम हो गई थी। 6 बजे के पहले जेल वाले आए, उन्‍होंने बैरक में लालटेन रख दी। मैं बैरक के भीतर बंद कर दिया गया। जेल वालों ने पूछा था, आप क्‍या खायेंगे? उत्‍तर दिया गया, खाने की इच्‍छा नहीं। साथ ही एक कैदी और भी बंद किया गया। वह ‘नंबरदार’ था। जेल में ‘नंबरदार’ कैदियों से काम लिया करता है। परंतु वह आदमी इसलिए रखा गया था कि वह मेरा काम करे। अँधेरा हो चला था। मैं चारपाई पर लेट गया था। खूब थका था। कुछ मिनटों तक किसी तरह की कोई सुध नहीं रही।

किसी खटके से नींद खुली। देखता क्‍या हूँ कि दरवाजे की सीखचें पर कुछ मित्र खड़े हैं। डॉ. जवाहरलालजी उनमें आगे थे। वे कुछ भोजन लाए थे। दरवाजा बंद था, वह खुल न सकता था। भोजन की इच्‍छा न थी, तो भी अनुरोध था। अंत में, कुछ चीजें लेनी ही पड़ीं। सीखचीं के भीतर से चीजें दे दी गईं। जेलर इन लोगों के साथ थे। साथ आए और शीघ्र ही साथ ही लिवा ले गए।

कानपुर जेल में लगभग कोई दस दिन तक रहा। काम करने को था ही नहीं। दिन-भर बैठे-बैठे कटता। किबातें मिल गई थीं। गीता-रहस्‍य, तुलसीकृत रामायण और शेक्‍सपीयर पढा़ करता। एक से जी ऊब उठता तब दूसरी किताब उठा लेता। जब और भी जी उकताता, तो उस थोड़ी-सी जगह में चक्‍कर लगाता। बाहर बहुत घूमा करता था। मीलों पैदल चलने की आदत पड़ी हुई थी। कुछ तो कामों के कारण पैदल चला करता और कुछ टहलने के लिए। परंतु इस प्रकार का टहलना जिस प्रकार के टहलने के लिए यहाँ विवश था, अर्थात् घड़ी में पेंडुलम की भाँति इधर से उधर हिलना-डुलना मुझे बहुत बुरा लगता था। कैद के अंत तक इस प्रकार का टहलना कभी अच्‍छा न लगा। बहुत कोशिश की कि व्‍यायाम का एक सहारा बना रहे, परंतु इसका निर्वाह न हुआ।

जेलर ने दूसरे ही दिन सवेरे आकर कहा कि आप किसी दूसरे कैदी से बातें न करें, क्‍योंकि आपको ऐसा न करने देने की हमें आज्ञा है और आपको टहलने के लिए बस इतना ही स्‍थान मिलेगा।

तीन-चार दिन बाद सुपरिंटेडेंट मेजर बकले जेल के भीतर आए। सप्‍ताह में केवल एक बार ही सुपरिटेडेंट अपना यह दौरा करते हैं। वे इधर भी आए। उन्‍होंने जेल से कहा कि टहलने की हद और बढ़ा दो। हद बहुत बढ़ा दी गई थी, परंतु उसका लाभ उठाने की आवश्‍यकता नहीं पड़ी। मैंने सुपरिंटेंडेंट से कलाम-दवात रखने के लिए पूछा। उन्‍होंने कहा, क्‍या करोगे? मैंने कहा, समय नहीं कटता, कुछ लिखूँगा। वे बोले, लिखकर क्‍या करोगे? लिखा हुआ बाहर उसी समय जा सकेगा जब गवर्नमेंट उसे पास कर देगी। मैंने कहा कि कोई हर्ज नहीं, मैं राजनीतिक समस्‍याओं पर कुछ नहीं लिखूँगा। अंत में सुपरिंटेंडेंट ने कापी-इंक-पैंसिल रखने की आज्ञा दे दी, परंतु कानपुर में जब तक रहा, तब तक वह मुझे मिली ही नहीं। मेजर बकले से सबसे पहले दूसरे ही दिन साक्षात्‍कार हुआ था। कायदा है कि प्रत्‍येक नया कैदी सुपरिं‍टेंडेंट के सामने पेश किया जाए। दूसरे दिन सवेरे ही जेलर ने दफ्तर में बुला भेजा। मेजर बकले कुर्सी पर बैठे थे और जेलर खड़े हुए थे। कुछ रजिस्‍टर पेश कर रहे थे, एक कागज के बाद दूसरा कागज पेश किया जा रहा था और धड़ाधड़ उस पर दस्‍तखत होते जाते थे और वे हटाए जा रहे थे। मैंने उन्‍हें जब काम में व्‍यस्‍त देखा तब पुरानी आदत के अनुसार एक बड़ी कुर्सी पर जा बैठा। जेलर ने मेरी ओर देखा। वे बेचारे कुछ घबरा-सा उठे। साहब के सामने कैदी कुर्सी पर बैठा था और उस पर भी दिल्‍लगी यह थी कि न तो उसे कुर्सी पर बैठे रहने दे सकते थे और न उससे यही कह सकते थे कि उस पर से उठ जाओ। परंतु बुद्धि ने उनका साथ दिया। उन्‍होंने नंबरदास से कुछ कहा। वह मेरे पास आया और बोला, आप अपनी बैरक में चलिए, जब जरूरत होगी तब आपको बुला लेंगे। मैं चला गया। थोड़ी देर बाद फिर आदमी पहुँचा कि चलिए। इस बार मेजर बकले सिर उठाए बैठे थे। पहुँचते ही राम-राम हुई। उन्‍होंने नाम पूछा, बतला देने पर वजन लिया गया और रजिस्‍टर में कुछ बातें लिखी गईं। इसके बाद मैं अपने स्‍थान में भेज दिया गया।

भोजन मित्रों के यहाँ से आ जाता था। कुछ फल भी पहुँच जाते और डॉ. जवाहरलाल का पुत्र राजेंद्र नियमित रूप से पिकनिक कुकर में भोजन पहुँचा दिया करता। दूध जेल वाले दिया करते थे। दस दिन तक, जब तक कानपुर में रहा, ऐसा ही होता रहा। जेल वाले बहुत भलमनसाहत से पेश आते और जेलर दिन में एक-दो बार आकर हाल पूछ जाते। दूसरे कैदियों को पास आने की आज्ञा नहीं थी, परंतु वे लोग बैरक की सफाई के लिए रोज आते। जो भोजन बच जाता, उन्‍हें दे देता। वे बड़ी खुशी से उसे ले लेते और जेल-भर का हाल बतलाते रहते। महात्‍मा गाँधी का नाम और काम उन्‍होंने भी खूब सुना रखा था। न मालूम कहाँ-कहाँ की बातें उन तक पहुँच जातीं, परंतु उन बातों को आपस में बढ़ा-चढ़ाकर एक-एक की सौ-सौ कर देते और उन पर बड़ी-बड़़ी आशाएँ बाँधते चले जाते। एक आदमी पर डाके का मुकदमा चल रहा था। यह मेरे स्‍थान के पास ही बंद था। वह भी सफाई के लिए आया करता। गाँधीजी पर अपनी असीम भक्ति प्रकट करता। कहता, महात्‍माजी के लिए सिर हाजि़र है, उनकी दया होगी तो साफ छूट जाऊँगा। मैंने कहा, महात्‍माजी डाकू के साथ नहीं है, डाके को बुरा समझते हैं, वे उसे अच्‍छा नहीं समझेंगे कि तुम डाका मारो और सजा से बच जाओ। इस बात से वह विचार में पड़ गया। पीछे वह अपने कामों पर पश्‍चाताप करने लगा था। मालूम नहीं, अंत में उसका क्‍या हुआ। एक दिन जेल में एक धोबी कैदी भी किसी तरह आया। गाँधीजी की जय-जयकार वह भी मनाता था। उसके साथ एक युवक कैदी था। वह कानपुर का था। किसी मिल में काम करता था। उस पर पुलिस ने दफा 110 लगा दी। जब उसके साथी जमानत को तैयार हुए तब उन्‍हें जमानत देने से पुलिस ने रोक दिया। अंत में इस युवक को जेल जाना पड़ा। लखनऊ की दोनों जेलों में भी दफा 110 में आए हुए अनेक आदमी मिले। पुलिस ने कह दिया कि अमूक आदमी की कमाई का कोई जरिया नहीं है, उसकी नेकचलनी की जमानत होनी चाहिए। बस, पुलिस के इस इशारे पर मजिस्‍ट्रेट उन आदमियों से जमानत माँगता। गाँवों में जमानत देने वाले पहले तो मिलते ही नहीं और मिलते भी हैं, तो उन्‍हें पुलिस धमका देती है। इसलिए वे फौरन पीछे हट जाते हैं। दफा 109 भी ऐसी ही है।

मुझसे जेल के लोगों ने कहा, जेल की लगभग आधी आबादी उन्‍हीं दो दफाओं में आए हुए कैदियों की होती है। गाँवों में जो आदमी तनिक भी मनचला और बढ़े हुए हौसले का हुआ, बस उस पर पुलिस की वक्र दृष्टि पड़ी और वह दफा 109 या दफा 110 में जेल भेजा गया। जब वह जेल से बाहर निकला, तब फिर उस पर पुलिस की निगाह रहने लगी। मुझे बहुत-से ऐसे कैदी मिले, जो अपने मन में यह समझते हैं कि अब हमारे लिए जेल के सिवा दुनिया में कोई और दूसरा ठिकाना नहीं। यहाँ से छूटे तो फिर शीघ्र ही पुलिस की कृपा से यहाँ आएँगे। जो नंबरदार मेरे साथ रखा गया था, वह नौजवान था। वह सदा यही रोना रोया करता था। केवल इन्‍ही दफाओं में एक से अधिक बार आए हुए कई आदमी मुझे जेलों में मिले। बाज-बाज आदमियों को तो इन दफाओं में सजा भी बहुत दी जाती है। लखनऊ जिला जेल में भोजन बनाने के लिए हमें एक ब्राह्मण मिला था। वह अब भी वहाँ है। उसकी सजा तीन वर्ष की है। वह शीघ्र ही छूटने वाला है। परंतु पता नहीं, उसे फिर कब जेल में आना पड़े। यह मानना पड़ेगा कि अधिकांश आदमी बेकसूर हैं। उनका कसूर केवल इतना है कि उनमें जोश है, आगे बढ़कर काम करने की उमंग है। पुलिस इन बातों को अपने कामों में बाधा समझती है। बेचारी पुलिस की ही क्‍या, देश की गवर्नमेंट तक देश के निवासियों में उत्‍साह और उमंगों का उदय बहुत अच्‍छा नहीं समझती। अभी कल तक गवर्नमेंट के आदमी इन भावनाओं को खुल्‍लमखुल्‍ला पैरों तले रौंदते थे। अब खुल्‍लमखुल्‍ला तो वैसा नहीं करते, परंतु मखमली पंजे द्वारा गर्दन घोंटने के लिए सदा तैयार रहते हैं। पुलिस भी अपने मालिकों के पदचिन्‍हों पर चलती है। उसका अपना कोई कसूर नहीं।

कानपुर जेल में कोई खास घटना नहीं घटी। फल आते थे, उन्‍हें काटा कैसे जाए? चाकू नहीं मिल सकता था, क्‍योंकि जेल वालों को डर था कि कैदी अपना गला न काट लें। मेरा गला मुफ्त का न था, परंतु जेल वालों को इस बात का विश्‍वास न था। अंत में उन्‍होंने कहा कि आप चाँदी के चाकू से काम ले सकते हैं। एक मित्र उसे जेल वालों को दे गए और तब से फलों को स्‍वाभाविक ढंग से खाने के स्‍थान पर चाकू द्वारा अस्‍वाभाविक ढंग से खाने लगा। छह बजे शाम को बंद कर दिया जाता। रोशनी के लिए लालटेन रहती। रात को पाखाने-पेशाब के लिए मिट्टी के पात्र रख दिए थे। सवेरे छह बजे खोला जाता। दिन को पढ़ना, दोपहर को पढ़ना, शाम को पढ़ना और रात को भी पढ़ना। अग्निमांद्य की शिकायत बढ़ चली थी। परंतु व्‍यायाम के नाम पर पेंडुलम की भाँति दस-बारह गज के भीतर हिलना-डुलना पसंद नहीं था। बहुत तबीयत उकताती, तो दरवाजे पर ताला लगाए खड़े हुए जमादार से बातें करता या फिर अपने साथी नंबरदार से। इन दोनों से बातें करने में कठिनाई होती। विचारों में कोई सामंजस्‍य नहीं था। जो बात उनके लिए रोचक थी, उसे वे नहीं समझते थे। इसलिए खेती-पाती, घर-द्वार, इसी प्रकार के बहुत ही सामान्‍य विषयों पर साधारण से साधारण बात कर समय काटने की बहुत कोशिश करता। रामायण को जोर-जोर से पढ़ने में मुझे आनंद आता। रात को पढ़ता। नंबरदार कलुआ बड़ी भक्ति से बैठ जाता। खूब ध्‍यान से सुनता। समझता बहुत कम, परंतु उसकी श्रद्धा में कोई कसर नहीं थी।

एक दिन, शायद 26 अक्टूबर के सवेरे, असिस्‍टेंट जेलर मेरे पास आए और बोले, आप अपना सामान सँभाल लीजिए, आप लखनऊ जेल भेजे जा रहे हैं। मुझे अपने नंबरदार के बिछुड़ने का अफसोस था, परंतु कानपुर जेल छोड़ने का अफसोस न था। इस जेल में तकलीफ न थी, परंतु अकेले होने के कारण समय नहीं कटता था। यहाँ तक कि दिन में घंटे-मिनट तक गिन डाले गए थे। बैठा-बैठा बहुधा दीवार के पास से सन-सन और फड़-फड़ करके जाने वाली ट्रामगाड़ी के आने-जाने की संख्‍या गिना करता था। कुछ मिनटों की आमदरफ्त के आधार पर हिसाब लगाया करता था कि सवेरे से लेकर 11 बजे रात तक ट्राम इस पटरी पर से कितनी बार आई और गई होगी। एक दिन उकताकर बैरक-भर में कितनी ईटें लगी हैं, कितनी ईटें काम में आईं, उन सबकी गिनती गिनता रहा। पढ़ते-पढ़ते सिर भारी हो जाता, तब यह काम करता। जब समय इतनी कठिनता से कटता था, तब इस जेल का छोड़ना बुरा कैसे लगता।

चारों ओर से लोहे की घनी जालियों से आच्‍छादित, कैदियों को ढोने वाली मोटर तेजी के साथ शहर के बाहर ही बाहर चली। किसी जानी-पहचानी सूरत को देखने के लिए जाली के भीतर से नजर दौड़ाता रहा, परंतु स्‍टेशन तक कोई ऐसा आदमी नजर न आया। इमारतों, वृक्षों, सड़कों और फूलबाग को पीछे छोड़ते हुए और उन्‍हें इस विचार के साथ कभी-कभी देखते हुए कि पता नहीं वे कब फिर आँखों के सामने आयें, ओ.आर.आर. स्‍टेशन के निकट पहुँचे। स्‍टेशन के दरवाजे के लगभग 100 गज आगे ही मोटर खड़ी हो गई। उसका दरवाजा खुला। सड़क पर पुलिस कांस्‍टेबल और दो सब-इंस्‍पेक्‍टर खड़े थे। वहीं एक पगडंडी द्वारा वे स्‍टेशन के भीतर ले गए। शहर के लोगों को पता लग गया था। इसलिए कुछ आदमी स्‍टेशन पर पहुँच गए थे। पगडंडी द्वारा स्‍टेशन की पुलिस चौकी पर ले जाया जा रहा था, उस समय कुछ लोग आगे बढ़े। पुलिस वालों ने उन्‍हें रोक दिया। नमस्‍कार हुए और यह बात भी कह दी कि लखनऊ जेल के लिए यह कूच है। इससे अधिक उस समय कुछ नहीं हुआ। मालूम पड़ता था, पुलिस वाले कुछ घबरा गए थे या बहुत ज्‍यादा एहतियात से काम लेना जरूरी समझते थे। पुलिस चौकी के भीतर पहुँचते ही हुक्‍म हुआ कि कठहरे के भीतर चलकर बैठिए। एक कुर्सी डलवा दी गई। यह कृपा थी। उस कुर्सी के ऊपर कठहरे के भीतर जा बैठा। इस कठहरे में चोर-बदमाश बंद किए जाते होंगे। चौकी के एक ऐसे कोने में यह कठहरा बना था कि वहाँ से न तो बाहर वाले दिखाई पड़ते थे और न भीतर बंद व्‍यक्ति ही को कोई बाहर से देख सकता था। गाड़ी प्‍लेटफार्म पर खड़ी थी, परंतु पुलिस ने कठहरे का इस्‍तेमाल इसीलिए जरूरी समझा कि कहीं उनके कैदी को लोग घेर न लें और उससे कुछ बातें न कर लें। जब गाड़ी चलने को दो या तीन मिनट रह गए, तब कठहरे से निकाला गया। चौकी से बाहर निकलते ही शहर के लोग, जो चौकी के बाहर जमा थे और जिन्‍हें चले जाने या हट जाने के लिए बारम्‍बार कहा जा चुका था, फिर निकट आ गए। गाड़ी प्‍लेटफार्म के दूसरी ओर थी। उस ओर पुल पारकर जाना पड़ता था। पुलिस ने पुल पार करना आवश्‍यक न समझा। रेल की लाइनों को पार कर दूसरी ओर पहुँच गए और ठीक इंजन के पास एक तीसरे दर्जे की बोगी पर पीछे से बैठा दिया गया। खिड़कियों पर सब-इंसपेक्‍टर साहबान खड़े हो गए। शायद उन्‍हें डर था कि कहीं किसी सुराख से कैदी बाहर न निकल जाए। इधर-उधर खिड़की के सिरे पर पुलिस वाले बैठ गए। बाहर लोग विदाई के अंतिम शब्‍द कहने और सुनने के लिए फड़फड़ा रहे थे। परंतु पुलिस वालों को इन बातों से क्‍या मतलब? स‍ब-इंस्‍पेक्‍टर साहबान में से एक तो ऐसे थे जिन्‍हें लगभग 12 वर्ष पहले उनके कैदी ने, उस समय जबकि वह एक स्‍कूल में अध्‍यापक था और उसने स्‍कूल के छात्र को पढ़ाया तक था। परंतु इस समय उन बातों का कहीं दूर-दूर तक पता नहीं था। इस अवस्‍था ने मन में कुछ अधीरता उत्‍पन्‍न कर दी। खिड़की के पास थोड़ी-सी जगह खाली पड़ी थी। मैं उसकी ओर बढ़ा, पुलिस वालों ने रोका, परंतु यह कहते हुए कि इतनी आजादी तो मत छीनो, मैं उस पर जा बैठा। बाहर के लोग पास आ गए। इधर गाड़ी ने सीटी दी। बस, इतना ही हो सका कि सबने हाथ बढ़ाए। हाथ छूते और नमस्‍कार करते-करते गाड़ी चल दी। शिवनारायणजी गाड़ी के दूसरे हिस्‍से में जा बैठे थे। वे लखनऊ तक साथ गए। पास नहीं आने पाए, परंतु उनसे बातें हुईं। वे लखनऊ की जेल के फाटक तक गए। वहाँ से उन्‍हें लौट आना पड़ा।

गाड़ी के चलने के कुछ मिनट पश्‍चात् पेशाब करने की जरूरत मालूम पड़ी। उठा और पेशाबखाने की तरफ बढ़ा। साथ के तीन पुलिस वालों में से दो उठे और वे भी आगे बढ़े। मैं पेशाबखाने में घुसा। उन्‍होंने गाड़ी की खिड़की से इधर-उधर सिर कालकर, न केवल सिर, किंतु आधा धड़ गाड़ी के बाहर निकालकर, मेरी खबरदारी रखने का काम पूरा किया। मैंने बाहर आकर उनसे कहा, मैं खिड़की से कूदकर भाग नहीं जाता, क्‍योंकि मुझे अपनी जान प्‍यारी है। वे बोले, क्‍या करें, कायदा ही ऐसा है। बस, यहीं से उनसे बातें छिड़ गईं। बहुत-सी बातें हुईं और अंत में बेचारे इतना कायल हुए कि पेट दिखलाने और उसे कोसने लगे। तीन बजे लखनऊ स्‍टेशन पहुँचे। खयाल था वहाँ भी उसी प्रकार की मोटर पर सवार होने का अवसर प्राप्‍त होगा। परंतु ऐसा न हुआ। पुलिस वाले किराए पर एक गाड़ी पकड़ लाए। ‘पकड़ लाए’ इसलिए कहता हूँ कि उसने बहुत नाहीं-नूहीं की। बोला, बड़े साहब के यहाँ जाना है और छोटे साहब के यहाँ का भी वादा है, परंतु पुलिस के दूतों ने एक न मानी। मैंने भी उसे समझाया कि पूरा किराया मिलेगा। चार बजे के पहले ही लखनऊ सेंट्रल जेल के फाटक पर जा पहुँचे। फाटक खुला और उसी प्रकार जिस प्रकार वह चोर, डाकू और हत्‍यारों के स्‍वागतार्थ सहस्‍त्रों बार खुल चुका था और हम लोग भीतर दफ्तर में पहुँचे। लावारिस माल की भाँति कई मिनट तक इधर-उधर भटकने के पश्‍चात् एक बूढ़े मुंशीजी के पास गए। धीरे-धीरे मुंशीजी ने कागज-पत्र खोले और धीरे-धीरे पूरे आराम के साथ उन्‍होंने रजिस्‍टरों में लिखना प्रारंभ किया। पुलिस वालों ने कुछ जल्‍दी करनी चाही क्‍योंकि उन्हें तुरंत कानपुर लौट जाना था, परंतु मुंशीजी ने उन्‍हें ऐसी फटकार बतलाई कि बेचारे सिकुड़कर रह गए। मेरी जन्‍मपत्री अभी बन ही रही थी और उसे मुंशीजी बना ही रहे थे कि इतने में कमरे के एक कोने से ‘वंदे मातरम्’ की ध्‍वनि सुनाई पड़ी। देखता क्‍या हूँ कि एक महाशय कैदी की पोशाक में मुझसे ‘वंदे मातरम्’ कर रहे हैं। मैंने पूछा, और उन्‍होंने बतलाया कि मेरा नाम श्री गोपाल है और लखनऊ में भाषण देने के अपराध में दो वर्ष की सजा हुई है। इस समय लखनऊ की डिस्ट्रिक्‍ट जेल में भेजे जा रहे थे। अभी तक उनके साथ साधारण कैदियों का-सा व्‍यवहार होता था, परंतु अब उनके साथ विशेष व्‍यवहार किए जाने की आज्ञा आ गई थी। विशेष व्‍यवहार वाले राजनीतिक कैदी जिला की श्रेणी में था, परंतु मुझे भेजा गया था सेंट्रल जेल में। श्री गोपालजी बोले, आप भी जिला शीघ्र ही भेजे जाएँगे। मैंने उत्‍तर दिया, देखा जाएगा। श्रीगोपाल जी के पैर में कड़ा पड़ा हुआ था। वे मुंशीजी से बिगड़कर बोले, शीघ्र ही इस कड़े को कटवाइए। कड़ा काटा जाने लगा।

श्री गोपालजी के पास अधिक सामान नहीं था। एक धोती थी, उसी के भीतर कुछ और कपड़ा भी लिपटा हुआ था। श्री गोपालजी ने कड़ककर मुंशीजी से कहा कि इस सामान को जिला जेल तक ले जाने के लिए आदमी दीजिए। मुंशीजी ने कहा कि इसे उठाकर ले जाने में तुमको कोई तकलीफ न होगी। इस ‘तुम’ शब्‍द के व्‍यवहार पर श्री गोपालजी की तेजी के सामने हवा हो गई। अंत में लाचार होकर मुंशीजी को श्री गोपालजी की धोती जिला जेल तक लादकर ले जाने के लिए आदमी भी देना पड़ा। श्री गोपालजी की यह निर्भीकता थोड़े ही समय में बहुत बढ़ गई थी। पहले तो बेचारे ने बहुत कष्‍ट सहे थे। यहाँ तक कि जेल में आते ही उन्‍हें कुएँ से पानी खींचने का काम दे दिया गया था। आदमी मजबूत थे, शायद इसीलिए उन पर यह भारी बोझ रखा गया। चक्‍की भी पीसनी पड़ी थी। अब दिन बहुरे थे। राजनीतिक कैदियों से काम लेना बंद कर दिया गया था। श्री गोपालजी की तकलीफों का खात्‍मा हो चुका था और अब एक प्रकार से कुछ आराम के दिन आ गए थे। विशेष व्‍यवहार में अनेक सुविधाएँ थीं। सबसे बड़ी सुविधा यह थी कि उस समय जिन राजनीतिक कैदियों के साथ विशेष व्‍यवहार किया गया था उनसे जेल वाले डरते थे। जेल वाले कैदियों को पशु के समान मानते रहे हैं। जो चाहते सो उनके साथ करते रहे हैं। जब इन्‍होंने विशेष व्‍यवहार पाने वाले नए प्रकार के कैदियों को देखा, तो उनकी समझ में ही नहीं आया कि कि ए लोग भी कैदी हैं। इसलिए पहले-पहल वे इस श्रेणी के कैदियों से बहुत डरते थे। उनका बहुत‍ आदर करते थे और उनके आराम का पूरा खयाल रखते थे। बातें यहाँ तक हुई थीं कि डिस्ट्रिक्‍ट जेल, लखनऊ के जेलर और उसके मातहत लोग विशेष व्‍यवहार पाने वाले राजनीतिक कैदी को झुक-झककर सलाम करते थे और बहुधा उसे ‘हजूर’ शब्‍द तक से संबोधित करते थे। परंत अब वे दिन गए। अब जेल वाले समझा दिए गए हैं कि विशेष व्‍यवहार की हद कहाँ तक है। इसे समझ लेने या समझा देने का नतीजा अब यह निकल रहा है कि जेल वो अपने पहले के व्‍यवहार का बदला सूद-ब्‍याज सहित आजकल वसूल कर रहे हैं और राजनीतिक कैदियों को पग-पग पर जलील कर रहे हैं। ‘छोटे’ हृदय वाले सदा ऐसा ही करते हैं। जब उनके सामने भय होता है तो वे चरणों के नीचे की धूल चाटते हैं और जब उन्‍हें किसी बात का डर नहीं रहता, तो घमंड में चूर हो जाते हैं और आकाश तक सिर पर उठाकर चलने का प्रयत्‍न करते हैं।

हाँ, तो बात श्री गोपालजी की हो रही थी। विशेष व्‍यवहार की प्राप्ति ने श्री गोपालजी की मनोवृत्तियों पर भी जोरदार काम किया था। उन्‍हें अपनी हैसियत का पता लग गया और इसीलिए उन्‍होंने जेलवालों से दबना या भय खाना छोड़ दिया और जहाँ उन्‍होंने देखा कि जेल वाले और अनुचित व्‍यवहार करते हैं तो उन्‍हें नि:संकोच फटकार देते।

जब मैं जेल के भीतर पहुँचा और वहाँ उन राजनीतिक कैदियों के साथ रखा गया जो उस समय सेंट्रल जेल में थे, तो पता लगा कि एक दिन जब साधारण रीति के अनुसार जेल में लाला श्री गोपालजी को एक मूली दी जाने लगी तब उन्‍होंने उसको लेने से इंकार कर दिया और उन्‍होंने साफ-साफ तथा बेझिझक होकर कह दिया कि अब हमारे साथ विशेष व्‍यवहार हो गया है, हम दो मूली लेंगे।

इस घटना से यह समझ लेने की आवश्‍यकता नहीं कि श्री गोपालजी ने विशेष व्‍यवहार का मूल्‍य केवल दो मूली रखा था, इसका अर्थ केवल इतना ही है कि वे विशेष व्‍यवहार के तत्‍व को समझ गए थे और इस बात को नहीं सहन कर सकते थे कि कोई भी उनके अधिकार से उन्‍हें एक क्षण भी वंचित रख सकने की हिम्‍मत कर सके। उस दिन तो श्री गोपालजी से कुछ बातें भी न हो सकीं। वे डिस्ट्रिक्‍ट जेल चले गए थे। परंतु बाद में कोई दो मास के बाद उनसे डिस्ट्रिक्‍ट जेल में भेंट हुई। उनका साथ अंत तक रहा। बेचारे सीधे आदमी हैं। हिंदी भर जानते हैं। रामायण के बड़े भक्‍त हैं। वे सबकी सह भी लिया करते थे। इस समय भी वे डिस्ट्रिक्‍ट जेल में हैं। अभी उनकी रिहाई में लगभग सात-आठ मास होंगे।

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