लोककथा – समझौता (लेखक – हरिशंकर परसाई)

· January 9, 2013

1hqdefaultअगर दो साइकिल सचार सड़क पर एक-दूसरे से टकराकर गिर पड़े तो उनके लिए यह लाजिमी हो जाता है कि वे उठकर सबसे पहले लड़ें, फिर धूल झाड़ें। यह पद्धति इतनी मान्‍यता प्राप्‍त कर चुकी हैं कि गिरकर न लड़ने वाला साइकिल सवार बुजदिल माना जाता है, क्षमाशील संत नहीं।


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एक दिन दो साइकिलें बीच सड़क पर भिड़ गईं। उनके सवार जब उठे तो एक-दूसरे को ललकारा, ‘अंधा है क्‍या? दिखता भी नहीं।’

दूसरे ने जवाब दिया, ‘साले, गलत ‘साइड’ से चलेंगे और आँखें दिखाएँगे।’

पहले ने गाली का बदला उससे बड़ी गाली से चुकाकर ललकारा, ‘जबान सँभालकर बोलना, अभी खोपड़ी फोड़ दूँगा।’

दूसरे ने सिर को और ऊँचा करके जवाब दिया, ‘अरे, तू क्‍या खोपड़ा फोड़ेगा मैं एक हाथ दूँगा तो कनपटा फूट जायगा।’

और वे दोनों एक-दूसरे का सिर फोड़ने के लिए उलझने ही वाले थे कि अचानक एक आदमी उन दोनों के बीच में आ गया और बोला, ‘अरे देखो भाई, मेरी एक बात सुन लो, फिर लड़ लेना। देखो, तुम इसका सिर फोड़ना चाहते हो, और तुम इसका! मतलब कुल मिलाकर इतना ही हुआ कि दोनों के सिर फूट जाएँ तो दोनों को संतोष हो जाए। तो ऐसा करो भैया, दोनों जाकर उस बिजली के खंभे से सिर फोड़ लो और लड़ाई बंद कर दो।’

बात कुछ ऐसा असर कर गई कि भीड़ हँस दी और वे दोनों ही हँसी रोक नहीं पाए। उनका समझौता संपन्‍न हो गया।

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