लेख – संबंधनिर्वाह – (लेखक – रामचंद्र शुक्ल )

· June 4, 2014

RamChandraShukla_243172प्रबंधकाव्य में बड़ी भारी बात है संबंधनिर्वाह। माघ ने कहा है –

बह्वपि स्वेच्छया कामं प्रकीर्णमभिधीयते।

 

अनुज्झितार्थसंबंधा: प्रबन्धो दुरुदाहर:॥

 

जायसी का संबंधनिर्वाह अच्छा है। एक प्रसंग से दूसरे प्रसंग की श्रृखला बराबर लगी हुई है। कथाप्रवाह खंडित नहीं है जैसा केशव की ‘रामचंद्रिका’ का है, जो अभिनय के लिए चुने हुए पद्यों का संग्रह-सी जान पड़ती है। जायसी में विराम अवश्य है, जो कहीं-कहीं अनावश्यक है पर विवरण का लोप नहीं है जिससे प्रवाह खंडित होता है।

 

हमारे आचार्यों ने कथावस्तु दो प्रकार की कही है – आधिकारिक और प्रासंगिक। अत: संबंधनिर्वाह पर विचार करते समय सबसे पहले तो यह देखना चाहिए कि प्रासंगिक कथाओं का जोड़ आधिकारिक वस्तु के साथ अच्छी तरह मिला हुआ है या नहीं अर्थात् उनका आधिकारिक वस्तु के साथ ऐसा संबंध है या नहीं जिससे उसकी गति में कुछ सहायता पहुँचती हो। जो वृत्तांत इस प्रकार संबद्ध न होंगे वे ऊपर से व्यर्थ ठूँसे हुए मालूम होंगे चाहे उनमें कितनी ही अधिक रसात्मकता हो। ‘हितोपदेश’ में एक कथा के भीतर कोई जो दूसरी कथा कहने लगता है या ‘अलिफलैला’ में एक कहानी के भीतर का कोई पात्र जो दूसरी कहानी छेड़ बैठता है वह मुख्य कथाप्रवाह से संबद्ध नहीं कही जा सकती। पद्मावत में कई प्रासंगिक वृतांत है – जैसे, हीरामन तोता खरीदने वाले ब्राह्मण का वृत्तांत, राघवचेतन का हाल, बादल का प्रसंग – जिनका आधिकारिक वस्तु के प्रवाह पर पूरा प्रभाव है। उनके कारण आधिकारिक वस्तुओं का मार्ग बहुत कुछ निर्धारित हुआ है। प्रासंगिक वस्तु ऐसी ही होनी चाहिए जो आधिाकारिक वस्तु की गति आगे बढ़ाती या किसी ओर मोड़ती हो, जैसे देवपाल के वृत्ता ने अलाउद्दीन के फिर चित्तौर पहुँचने के पहले ही रत्नसेन के जीवन का अंत कर दिया।

 

यह तो हुई प्रासंगिक कथा की बात जिसमें प्रधान नायक के अतिरिक्त किसी अन्य का वृत्ता रहता है। अब आधिाकारिक वस्तु की योजना पर आइए। सबसे पहले तो यह प्रश्न उठता है कि प्रबंध काव्य में क्या जीवनचरित के समान उन सब बातों का विवरण होना चाहिए जो नायक के जीवन में हुई हों। संस्कृत के प्रबंधकाव्यों को देखने से पता चलता है कि कुछ में तो इस प्रकार का विवरण होता है और कुछ में नहीं, कुछ की दृष्टि तो व्यक्ति पर होती है और कुछ की किसी प्रधान घटना पर। जिनकी दृष्टि व्यक्ति पर होती है उसमें नायक के जीवन की सारी मुख्य घटनाओं का वर्णन – गौरववृद्धि या गौरवरक्षा के ध्यान से अवश्य कहीं – कहीं कुछ उलटफेर के साथ होता है। जिनकी दृष्टि किसी मुख्य घटना पर होती है उनका सारा वस्तुविन्यास उस घटना के उपक्रम के रूप में होता है। प्रथम प्रकार के प्रबंधों को हम व्यक्तिप्रधान कह सकते हैं जिसके अंतर्गत रघुवंश, बुद्धचरित, विक्रमांकदेवचरित आदि हैं। दूसरे प्रकार के घटनाप्रधान प्रबंधों के अंतर्गत कुमारसंभव, किरातार्जुनीय, शिशुपालवध आदि हैं। ‘पद्मावत’ को इसी दूसरे प्रकार के प्रबंध के अंतर्गत समझना चाहिए।

 

कहने की आवश्यकता नहीं कि दृश्य काव्य का स्वरूप भी घटनाप्रधान ही होता है। अत: इस प्रकार के प्रबंध के वस्तुविन्यास की समीक्षा बहुत कुछ दृश्य काव्य के वस्तुविन्यास के समान ही होनी चाहिए। जैसे दृश्य काव्य का वैसे ही प्रत्येक घटनाप्रधान प्रबंध काव्य का एक ‘कार्य’ होता है जिसके लिए घटनाओं का सारा आयोजन होता है; जैसे, रामचरित में रावण का वधा। अत: घटनाप्रधान प्रबंध काव्य में उन्हीं वृत्तांतों का सन्निवेश अपेक्षित होता है जो उस साधय ‘कार्य’ के साधान मार्ग में पड़ते हैं अर्थात् जिनका उस कार्य से संबंध होता है। प्राचीन यवन आचार्य अरस्तू ने इसका विचार अपने ‘काव्य सिद्धांत’ के आठवें प्रकरण में किया है और यह अब भी पाश्चात्य समालोचकों में ‘कार्यान्वय’ (यूनिटी ऑफ ऐक्शन) के नाम से प्रसिद्ध है।

 

‘पदमावत’ में कार्य है पद्मावती का सती होना। उसकी दृष्टि से राघवचेतन का उतना ही वृत्त आया है जितने का घटनाओं के ‘कार्य’ की ओर अग्रसर करने में योग है। इसी सिद्धांत पर न तो चित्तौर की चढ़ाई के उपरांत राघव की कोई चर्चा आती है और न विवाह के उपरांत तोते की। यहाँ पर दो प्रसंगों पर विचार कीजिए – सिंहल से लौटते समय समुद्र के तूफान के प्रसंग पर और देवपाल के दूती भेजने के प्रसंग पर। तूफानवाली घटना यद्यपि प्रधान नायक के जीवन की घटना है पर यों देखने में ‘कार्य’ के साथ उसका स्पष्ट संबंध नहीं जान पड़ता। वह केवल भाग्य की अस्थिरता, संयोग की आकस्मिकता और विरह की विह्वलता दिखाने तथा लोभ के विरुद्ध शिक्षा देने के निमित्ता लाई जान पड़ती है। पर उक्त उद्देश्य प्रधान होने पर भी वह घटना ‘कार्य’ से बिलकुल असंबद्ध नहीं है। कवि ने बड़े कौशल से सूक्ष्म संबंधसूत्र रखा है। उसी घटना के अंतर्गत रत्नसेन को समुद्र से पाँच रत्न प्राप्त हुए थे। जब अलाउद्दीन से चित्तौरगढ़ न टूट सका तब उसने संधि के लिए वे ही पाँच रत्न रत्नसेन से माँगे। अत: वे ही पाँच रत्न उस संधि के हेतु हुए जिनके द्वारा बादशाह का गढ़ में प्रवेश और रत्नसेन का बंधन हुआ। प्रबंधनिपुणता यही है कि जिस घटना का सन्निवेश हो वह ऐसी हो कि ‘कार्य’ से दूर या निकट का संबंध भी रखती हो और नए-नए विशद भावों की व्यंजना का अवसर भी देती हो। देवपाल की दूती का आना भी इसी प्रकार की घटना है जो सतीत्वगौरव की अपूर्व व्यंजना के लिए अवकाश भी निकालती है और रत्नसेन की उस मृत्यु का हेतु भी होती है जो ‘कार्य’ का (पद्मावती के सती होने का) कारण है।

 

‘कार्यान्वयन’ के अंतर्गत ही यवनाचार्य ने कहा है कि कथावस्तु के आदि, मध्य और अंत तीनों स्फुट हों। आदि से आरंभ हो कर कथाप्रवाह मध्‍य में जा कर कुछ ठहरा-सा जान पड़ता है, फिर चट ‘कार्य’ की ओर मुड़ पड़ता है। ‘पदमावत’ की कथा में हम तीनों अवस्थाओं को अलग अलग बता सकते हैं। पद्मावती के जन्म से ले कर रत्नसेन के सिंहलगढ़ घेरने तक कथाप्रवाह का आदि समझिए, विवाह से ले कर सिंहलद्वीप से प्रस्थान तक मध्‍य और राघवचेतन के देशनिर्वासन से ले कर पद्मिनी के सती होने तक अंत। आदि अंश की सब घटनाएँ मध्‍य अर्थात् विवाह की ओर उन्मुख हैं। विवाह के उपरांत जो उत्सव, समागम और सुखभोग आदि का वर्णन है उसे मध्‍य का विराम समझिए। उसके उपरांत राघवचेतन के निर्वासन से घटनाओं का प्रवाह ‘कार्य’ की ओर मुड़ता है।

 

प्राचीनों के अनुसार ‘कार्य’ महत्त्वपूर्ण होना चाहिए; नैतिक सामाजिक या मार्मिक प्रभाव की दृष्टि से ‘कार्य’ बड़ा होना चाहिए, जैसा ‘रामचरित’ में रावण का वध है और ‘पदमावत’ में पद्मिनी का सती होना। आधुनिक पाश्चात्य काव्यमर्मज्ञ यह आवश्यक नहीं मानते। काउपर, बंर्स और वर्डस्वर्थ के प्रभाव से अँगरेजी काव्यक्षेत्र में जो विचार विप्लव घटित हुआ उसके अनुसार जिस प्रकार साधारण दीन जीवन के दृश्य काव्य के उपयुक्त विषय हो सकते हैं उसी प्रकार साधारण ‘कार्य’ भी। इस संबंध में आज से पचहत्तर वर्ष पहले प्रसिद्ध साहित्यमर्मज्ञ मैथ्यू आर्नल्ड ने कहा है –

 

”मैं यह नहीं कहता कि कवित्वशक्ति का विकास साधारण से साधारण ‘कार्य’ के वर्णन में नहीं हो सकता या नहीं होता है। पर यह खेद की बात है कि कवि विषय से भी और शक्ति तथा रोचकता प्राप्त करते हुए अपनी प्रभविष्णुता को दूनी न कर के विषय को ही अपनी कवित्वशक्ति से जबरदस्ती शक्ति और रोचकता प्रदान कराए।’1

 

इस प्रकार आर्नल्ड ने प्राचीन आदर्श का समर्थन किया है। जो हो; जायसी का भी यही आदर्श है। उन्होंने भी अपने काव्य के लिए ‘महत्कार्य’ चुना है जिसका आयोजन करनेवाली घटनाएँ भी बड़े डील-डौल की है। जैसे, बड़े-बड़े कुँवरों और सरदारों की तैयारी, राजाओं और बादशाहों की लड़ाई इत्यादि। इसी प्रकार दृश्यवर्णन भी ऐसे-ऐसे आते हैं, जैसे, गढ़ वाटिका, राज सभा, राजसी भोज और उत्सव आदि के वर्णन।

 

संबंधनिर्वाह के अंतर्गत ही गति के विराम का विचार कर लेना चाहिए। यह कहना पड़ता है कि ‘पद्मावत’ में कथा की गति के बीच-बीच में अनावश्यक विराम बहुत से हैं। मार्मिक परिस्थिति के विवरण और चित्रण के लिए घटनावाली का जो विराम पहले कह आए हैं वह तो काव्य के लिए अत्यंत आवश्यक विराम है क्योंकि उसी से सारे प्रबंध में रसात्मकता आती है, पर उसके अतिरिक्त केवल पांडित्यप्रदर्शन के लिए, केवल जानकारी प्रकट करने के लिए, केवल अपनी अभिरुचि के अनुसार असंबद्ध प्रसंग छेड़ने के लिए या इसी प्रकार की और बातों के लिए जो विराम होता है वह अनावश्यक होता है। जायसी के कथाप्रवाह में इस प्रकार के अनावश्यक विराम बहुत से हैं बहुत स्थलों पर तो ऐसा विराम कुछ दिनों से चली हुई उस भद्दी वर्णन परंपरा का अनुसरण हैं जिसमें वस्तुओं के बहुत से नाम और भेद गिनाए जाते हैं – जैसे सिंहलद्वीप वर्णन खंड में फलों, फूलों और घोड़ों के नाम, रत्नसेन के विवाह और बादशाह की दावत में पकवानों और व्यंजनों की बड़ी लंबी सूची। कुछ स्थलों पर तो केवल विषयों की जानकारी के लिए ही अनावश्यक विवरण जोड़े गए हैं – जैसे, पद्मावती के प्रथम समागम के अवसर पर सोलह श्रृंगारों और बारह आभरणों के नाम, सिंहलद्वीप से रत्नसेन और पद्मावती की यात्रा के समय

 

1. नार डू आइ डिनाइ दैट द पोएटिक फैकल्टी कैन ऐंड डज मैनिफेस्ट इटसेल्फ इन ट्रीटिंग द मोस्ट ट्राइफ्लिग एक्शन, द मोस्ट होपलेस सब्जेक्ट, बट इट इज ए पिटी दैट पावर शुड बी कम्पेल्ड टु इंपार्ट इंटरेस्ट ऐंड फोर्स, इंस्टीड आव रिसीविंग देम फ्राम इट, ऐंड देयर बाइ डब्लिंगइट्स इंप्रेसिवनेस।

 

– प्रीफेस टु पोएम्स।

 

फलित ज्योतिष के यात्राविचार की पूरी उद्धरणी, राघव का बादशाह के सामने पद्मिनी, चित्रण आदि स्त्री-भेद-कथन।

 

कई स्थलों पर तो ‘गूढ़ बानी’ का दम भरनेवाले मूर्खपंथियों के अनुकरण पर कुछ पारिभाषिक शब्दों से ढँकी हुई थिगलियाँ व्यर्थ जोड़ी जान पड़ती हैं, जैसे, विवाह के समय भोजन के अवसर पर बाजा न बजने पर यह कथोपकथन –

 

तुम पंडित जानहु सब भेदू। पहिले नाद भएउ तब वेदू॥

 

आदि पिता जो विधि अवतारा। नाद संग जिउ ज्ञान सँचारा॥

 

नाद , वेद , मद , पैड़ जो चारी। काया महँ ते लेहू बिचारी॥

 

नाद हिए , मद उपनै काया। जहँ मद तहाँ पैड़ नहीं छाया॥

 

अथवा प्रथम समागम के समय सखियों द्वारा पद्मावती के छिपाए जाने पर राजा रत्नसेन का यह रसायनी प्रलाप –

 

का पूछहु तुम धातु , निछोही। जो गुरु कीन्ह अँतरपट ओही॥

 

सिधि गुटिका अब मो सँग कहा। भएउँ राँग , सत हिए न रहा॥

 

सो न रूप जासौं दुख खोलौं। गएउ भरोस तहाँ का बोलौं ?॥

 

जहँ लोना बिरवा कै जाती। कहि कै सँदेस आन को पाती?॥

 

कै जो पार हरतार करीजै। गंधक देखि अबहि जिउ दीजै॥

 

तुम्ह जोराकै सूर मयंकू। पुनि बिछोहि सो लीन कलंकू॥

 

इन उक्तियों में ‘सोन’, ‘रूप’, ‘लोना’, ‘जोरा कै’ आदि में श्लेष और मुद्रा का कुछ चमत्कार अवश्य है पर यह सारा कथन रस में सहायता पहुँचाता नहीं जान पड़ता। कुछ समाधान यह कह कर किया जा सकता है कि राजा रत्नसेन भी जोगी हो कर अनेक प्रकार के साधुओं का सत्संग कर चुका था, इससे विप्रलब्ध दशा में उसका यह पारिभाषिक प्रलाप बहुत अनुचित नहीं। पर कवि ने इस दृष्टि से उसकी योजना नहीं की है। पारिभाषिक शब्दों से भरे कुछ प्रसंग घुसेड़ने का जायसी को शौक ही रहता है, जैसे पद्मावती के मुँह से ‘तौ लगि रंग न राँचै जो लगि होइ न चून’ सुनते ही राजा रत्नसेन पानों की जातियाँ गिनाने लगता है –

 

हौं तुम नेह पियर भा पानू। पेड़ी हुँत सोनरास बखानू॥

 

सुनि तुम्हार संसार बड़ौना। जोग लीन्ह , तन कीन्ह गड़ौना॥

 

फेरि फेरि तन कीन्ह भुँजौना। औटि रकत रँग हिरदय औना॥

 

एकदेश प्रसिद्ध ऐसे शब्दों के प्रयोग से जो ‘अप्रतीतत्त्व’ दोष आता है वह इस अनावश्यक विराम के बीच और भी खटकता है। कहीं – कहीं तो जायसी कोई शब्द पकड़ लेते हैं और उस पर यों ही बिना प्रसंग के उक्तियाँ बाँध चलते हैं – जैसे, बादशाह की दावत के प्रकरण में पानी का जिक्र आया कि ‘पानी’ को ही ले कर वे यह ज्ञानचर्चा छेड़ चले –

 

पानी मूल परख जौ कोई। पानी बिना सवाद न होई॥

 

अमृतपान यह अमृत आना। पानी सौं घट रहै पराना॥

 

पानी दूध औ पानी घीऊ। पानि घटे घट रहै न जीऊ॥

 

पानी माँझ समानी जोती। पानिहि उपजै मानिक मोती॥

 

सो पानी मन गरब न करई। सीस नाइ खाले पग धरई॥

 

जायसी के प्रबंधविस्तार पर और कुछ विचार करने के पहले हमने उसके दो विभाग किए थे – इतिवृत्तात्मक और रसात्मक। इतिवृत्त की दृष्टि से तो विचार हो चुका। अब रसात्मक विधान की भी थोड़ी बहुत समीक्षा आवश्यक है। इतिवृत्त के विषय में यह कहा जा चुका है कि ‘पदमावत’ के घटनाचक्र के भीतर ऐसे स्थलों का पूरा सन्निवेश है जो मनुष्य की रागात्मिका प्रकृति का उद्बोधान कर सकते हैं, उसके हृदय को भावमग्न कर सकते हैं। अब देखना यह है कि कवि ने घटनाक्रम के बीच उन स्थलों को पहचान कर उनका कुछ विस्तृत वर्णन किया है या नहीं। किसी कथा के सब स्थल ऐसे नहीं होते जिनमें मनुष्य की रागात्मिका वृत्ति लीन होती है। एक उदाहरण लीजिए। किसी वणिक को व्यापार में घाटा आया जिसके कारण उसके परिवार की दशा बहुत बुरी हो गई। कवि यदि इस घटना को लेगा तो वह घाटा किस प्रकार आया, पूरे ब्योरे के साथ इसका सूक्ष्म वर्णन न कर के दीन दशा का ही विस्तृत वर्णन करेगा। पर यदि व्यापारशिक्षा की किसी पुस्तक में यह घटना ली जायगी तो उसमें घाटे के कारण आदि का पूरा सूक्ष्म ब्योरा होगा। ‘पद्मावत’ की कथा पर विचार कर के हम कह सकते हैं कि उसमें जिन-जिन स्थलों का वर्णन अधिक ब्योरे के साथ है – ऐसे ब्योरे के साथ है जो इतिवृत्त मात्र के लिए आवश्यक नहीं, जैसे, किसी का वचन, संवाद या वस्तु व्यापारचित्रण – वे सब रागात्मिका वृत्ति से संबंध रखने वाले हैं; केवल उन प्रसंगों को छोड़ जिनका उल्लेख ‘अनावश्यक विराम’ के अंतर्गत हो चुका है। काव्यों में विस्तृत विवरण दो रूपों से मिलते हैं –

 

(1) कवि द्वारा वस्तु – वर्णन के रूप में।

 

(2) पात्र द्वारा भाव – व्यंजना के रूप में।

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