लेख – संग्राम – भाग -1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

Premchand_4_aपहला दृश्य

प्रभात का समय। सूर्य की सुनहरी किरणें खेतों और वृक्षों पर पड़ रही हैं। वृक्षपुंजों में पक्षियों का कलरव हो रहा है। बसंत ऋतु है। नई-नई कोपलें निकल रही हैं। खेतों में हरियाली छाई हुई है। कहीं-कहीं सरसों भी फूल रही है। शीत-बिंदु पौधों पर चमक रहे हैं।

 

हलधर : अब और कोई बाधा न पड़े तो अबकी उपज अच्छी होगी। कैसी मोटी-मोटी बालें निकल रही हैं।

 

राजेश्वरी : यह तुम्हारी कठिन तपस्या का फल है।

 

हलधर : मेरी तपस्या कभी इतनी सफल न हुई थी। यह सब तुम्हारे पौरे की बरकत है।

 

राजेश्वरी : अबकी से तुम एक मजूर रख लेना। अकेले हैरान हो जाते

 

हो।

 

हलधर : खेत ही नहीं है। मिलें तो अकेले इसके दुगुने जोत सकता हूँ।

 

राजेश्वरी : मैं तो गाय जरूर लूंगी। गऊ के बिना घर सूना मालूम होता

 

है।

 

हलधर : मैं पहले तुम्हारे लिए कंगन बनवाकर तब दूसरी बात करूंगा। महाजन से रूपये ले लूंगा। अनाज तौल दूंगा।

 

राजेश्वरी : कंगन की इतनी क्या जल्दी है कि महाजन से उधर लो।अभी पहले का भी तो कुछ देना है।

 

हलधर : जल्दी क्यों नहीं है। तुम्हारे मैके से बुलावा आएगा ही। किसी नए गहने बिना जाओगी तो तुम्हारे गांव-घर के लोग मुझे हंसेंगे कि नहीं ?

 

राजेश्वरी : तो तुम बुलावा फेर देना। मैं करज लेकर कंगन न बनवाऊँगी। हां, गाय पालना जरूरी है। किसान के घर गोरस न हो तो किसान कैसा तुम्हारे लिए दूध-रोटी का कलेवा लाया करूंगी। बड़ी गाय लेना, चाहे दाम कुछ बेशी देना पड़ जाए।

 

हलधर : तुम्हें और हलकान न होना पड़ेगा। अभी कुछ दिन आराम कर लो, फिर तो यह चक्की पीसनी ही है।

 

राजेश्वरी : खेलना-खाना भाग्य में लिखा होता तो सास-ससुर क्यों सिधार जाते ? मैं अभागिन हूँ। आते-ही-आते उन्हें चट कर गई। नारायण दें तो उनकी बरसी धूम से करना।

 

हलधर : हां, यह तो मैं पहले ही सोच चुका हूँ, पर तुम्हारा कंगन बनना भी जरूरी है। चार आदमी ताने देने लगेंगे तो क्या करोगी ?

 

राजेश्वरी : इसकी चिंता मत करो, मैं उनका जवाब दे लूंगी लेकिन मेरी

 

तो जाने की इच्छा ही नहीं है। जाने और बहुएं कैसे मैके जाने को व्याकुल होती हैं, मेरा तो अब वहां एक दिन भी जी न लगेगी। अपना घर सबसे अच्छा लगता है। अबकी तुलसी का चौतरा जरूर बनवा देना, उसके आस-पास बेला, चमेली, गेंदा और गुलाब के फूल लगा दूंगी तो आंगन की शोभा कैसी बढ़ जाएगी!

 

हलधर : वह देखो, तोतों का झुंड मटर पर टूट पड़ा।

 

राजेश्वरी : मेरा भी जी एक तोता पालने को चाहता है। उसे पढ़ाया करूंगी।

 

हलधर गुलेल उठाकर तोतों की ओर चलाता है।

 

राजेश्वरी : छोड़ना मत, बस दिखाकर उड़ा दो।

 

हलधर : वह मारा ! एक फिर गया।

 

राजेश्वरी : राम-राम, यह तुमने क्या किया? चार दानों के पीछे उसकी जान ही ले ली। यह कौन-सी भलमनसी है ?

 

हलधर : (लज्जित होकर) मैंने जानकर नहीं मारा।

 

राजेश्वरी : अच्छा तो इसी दम गुलेल तोड़कर फेंक दो। मुझसे यह पाप नहीं देखा जाता। किसी पशु-पक्षी को तड़पते देखकर मेरे रोयें खड़े हो जाते हैं। मैंने तो दादा को एक बार बैल की पूंछ मरोड़ते देखा था, रोने लगी। तब दादा ने वचन दिया कि अब कभी बैलों को न मारूंगा। तब जाके चुप हुई मेरे गांव में सब लोग औंगी से बैलों को हांकते हैं। मेरे घर कोई मजूर भी औंगी नहीं चला सकता।

 

हलधर : आज से परन करता हूँ कि कभी किसी जानवर को न मारूंगा।

 

फत्तू मियां का प्रवेश।

 

फत्तू : हलधर, नजर नहीं लगाता, पर अबकी तुम्हारी खेती गांव भर से उसपर है। तुमने जो आम लगाए हैं वे भी खूब बौरे हैं।

 

हलधर : दादा, यह सब तुम्हारा आशीर्वाद है। खेती न लगती तो काका की बरसी कैसे होती ?

 

फत्तू : हां बेटा, भैया का काम दिल खोलकर करना।

 

हलधर : तुम्हें मालूम है दादा, चांदी का क्या भाव है। एक कंगन बनवाना था।

 

फत्तू : सुनता हूँ अब रूपये की रूपये-भर हो गई है। कितने की चांदी लोगे ?

 

हलधर : यही कोई चालीस-पैंतालीस रूपये की।

 

फत्तू : जब कहना चलकर ले दूंगा। हां, मेरा इरादा कटरे जाने का है। तुम भी चलो तो अच्छा। एक अच्छी भैंस लाना । गुड़ के रूपये तो अभी रखे होंगे न ?

 

हलधर : कहां दादा, वह सब तो कंचनसिंह को दे दिए । बीघे-भर भी तो न थी, कमाई भी अच्छी न हुई थी, नहीं तो क्या इतनी जल्दी पेल-पालकर छुट्टी पा जाता ?

 

फत्तू : महाजन से तो कभी गला ही नहीं छूटता।

 

हलधर : दो साल भी तो लगातार खेती नहीं जमती, गला कैसे छूटे!

 

फत्तू : यह घोड़े पर कौन आ रहा है ? कोई अफसर है क्या ?

 

हलधर : नहीं, ठाकुर साहब तो हैं। घोड़ा नहीं पहचानते ? ऐसे सच्चे पानी का घोड़ा दस-पांच कोस तक नहीं है।

 

फत्तू : सुना, एक हजार दाम लगते थे पर नहीं दिया ।

 

हलधर : अच्छा जानवर बड़े भागों से मिलता है। कोई कहता था। अबकी घुड़दौड़ में बाजी जीत गया। बड़ी-बड़ी दूर से घोड़े आए थे, पर कोई इसके सामने न ठहरा । कैसा शेर की तरह गर्दन उठा के चलता है।

 

फत्तू : ऐसे सरदार को ऐसा ही घोड़ा चाहिए । आदमी हो तो ऐसा हो, अल्लाह ने इतना कुछ दिया है, पर घमंड छू तक नहीं गया। एक बच्चा भी जाए तो उससे प्यार से बातें करते हैं। अबकी ताऊन के दिनों में इन्होंने दौड़-धूप न की होती तो सैकड़ों जानें जातीं ।

 

हलधर : अपनी जान को तो डरते ही नहीं इधर ही आ रहे हैं। सबेरे-सबेरे भले आदमी के दर्शन हुए।

 

फत्तू : उस जन्म के कोई महात्मा हैं, नहीं तो देखता हूँ जिसके पास चार पैसे हो गए वह यही सोचने लगता है कि किसे पीस के पी जाऊँ। एक बेगार भी नहीं लगती, नहीं तो पहले बेगार देते-देते धुर्रे उड़ जाते थे। इसी गरीबपरवर की बरकत है कि गांवों में न कोई कारिंदा है, न चपरासी, पर लगान नहीं रूकता। लोग मीयाद के पहले ही दे आते हैं। बहुत गांव देखे पर ऐसा ठाकुर नहीं देखा ।

 

सबलसिंह घोड़े पर आकर खड़ा हो जाता है। दोनों आदमी झुक-झुककर सलाम करते हैं। राजेश्वरी घूंघट निकाल लेती है।

 

सबल : कहो बड़े मियां, गांव में सब खैरियत है न ?

 

फत्तू : हुजूर के अकबाल से सब खैरियत है।

 

सबल : फिर वही बात । मेरे अकबाल को क्यों सराहते हो, यह क्यों नहीं कहते कि ईश्वर की दया से या अल्लाह के फजल से खैरियत है। अबकी खेती तो अच्छी दिखाई देती है ?

 

फत्तू : हां सरकार, अभी तक तो खुदा का फजल है।

 

सबल : बस, इसी तरह बातें किया करो। किसी आदमी की खुशामद मत करो, चाहे वह जिले का हाकिम ही क्यों न हो, हां, अभी किसी अफसर का दौरा तो नहीं हुआ ?

 

फत्तू : नहीं सरकार, अभी तक तो कोई नहीं आया।

 

सबल : और न शायद आएगी। लेकिन कोई आ भी जाए तो याद रखना, गांव से किसी तरह की बेगार न मिले। साफ कह देना, बिना जमींदार के हुक्म के हम लोग कुछ नहीं दे सकते। मुझसे जब कोई पूछेगा तो देख लूंगा। (मुस्कराकर) हलधर ! नया गौना लाए हो, हमारे घर बैना नहीं भेजा ?

 

हलधर : हुजूर, मैं किस लायक हूँ।

 

सबल : यह तो तुम तब कहते जब मैं तुमसे मोतीचूर के लड्डू या घी के खाजे मांगता। प्रेम से शीरे और सत्तू के लड्डू भेज देते तो मैं उसी को धन्य-भाग्य कहता। यह न समझो कि हम लोग सदा घी और मैदे खाया करते हैं। मुझे बाजरे की रोटियां और तिल के लड्डू और मटर के चबेना कभी-कभी हलवा और मुरब्बे से भी अच्छे लगते हैं। एक दिन मेरी दावत करो, मैं तुम्हारी नयी दुलहिन के हाथ का बनाया हुआ भोजन करना चाहता हूँ। देखें यह मैके से क्या गुन सीख कर आई है। मगर खाना बिल्कुल किसानों का-सा हो, अमीरों का खाना बनवाने की फिक्रमत करना।

 

हलधर : हम लोगों के लिट्टे सरकार को पसंद आएंगे ?

 

सबल : हां, बहुत पसंद आएंगे।

 

हलधर : जब हुक्म हो,

 

सबल : मेहमान के हुक्म से दावत नहीं होती। खिलाने वाला अपनी मर्जी से तारीख और वक्त ठीक करता है। जिस दिन कहो, आऊँ। फत्तू, तुम बतलाओ, इसकी बहू काम-काज में चतुर है न ? जबान की तेज तो नहीं है ?

 

फत्तू : हुजूर, मुंह पर क्या बखान करूं, ऐसी मेहनतिन औरत गांव में और नहीं है। खेती का तार-तौर जितना यह समझती है उतना हलधर भी नहीं समझता। सुशील ऐसी है कि यहां आए आठवां महीना होता है, किसी पड़ोसी ने आवाज नहीं सुनी।

 

सबल : अच्छा तो मैं अब चलूंगा, जरा मुझे सीधे रास्ते पर लगा दो, नहीं तो यह जानवर खेतों को रौंद डालेगा। तुम्हारे गांव से मुझे साल में पंद्रह सौ रूपये मिलते हैं। इसने एक महीने में पांच हजार रूपये की बाजी मारी। हलधर, दावत की बात भूल न जाना।

 

फत्तू और सबलसिंह जाते हैं।

 

राजेश्वरी : आदमी काहे को है, देवता हैं। मेरा तो जी चाहता था। उनकी बातें सुना करूं। जी ही नहीं भरता था।एक हमारे गांव का जमींदार है कि प्रजा को चैन नहीं लेने देता। नित्य एक-न -एक बेगार, कभी बेदखली, कभी जागा, कभी कुड़की, उसके सिपाहियों के मारे छप्पर पर कुम्हड़े-कद्दू तक नहीं बचने पाते। औरतों को राह चलते छेड़ते हैं। लोग रात-दिन मनाया करते हैं कि इसकी मिट्टी उठे। अपनी सवारी के लिए हाथी लाता है, उसका दाम असामियों से वसूल करता है। हाकिमों की दावत करता है, सामान गांव वालों से लेता है।

 

हलधर : दावत सचमुच करूं कि दिल्लगी करते थे ?

 

राजेश्वरी : दिल्लगी नहीं करते थे, दावत करनी होगी। देखा नहीं, चलते-चलते कह गए। खाएंगे तो क्या, बड़े आदमी छोटों का मान रखने के लिए ऐसी बातें किया करते हैं, पर आएंगे जरूर।

 

हलधर : उनके खाने लायक भला हमारे यहां क्या बनेगा ?

 

राजेश्वरी : तुम्हारे घर वह अमीरी खाना खाने थोड़े ही आएंगी। पूरी-मिठाई तो नित्य ही खाते हैं। मैं तो कुटे हुए जौ की रोटी, सावां की महेर, बथुवे का साफ, मटर की मसालेदार दाल और दो-तीन तरह की तरकारी बनाऊँगी। लेकिन मेरा बनाया खाएंगे ? ठाकुर हैं न ?

 

हलधर : खाने-पीने का इनको कोई विचार नहीं है। जो चाहे बना दे। यही बात इनमें बुरी है। सुना है अंग्रेजों के साथ कलपघर में बैठकर खाते हैं।

 

राजेश्वरी : ईसाई मत में आ गए ?

 

हलधर : नहीं, असनान, ध्यान सब करते हैं। गऊ को कौरा दिए बिना कौर नहीं उठाते। कथा-पुराण सुनते हैं। लेकिन खाने-पीने में भ्रष्ट हो गए हैं।

 

राजेश्वरी : उह, होगा, हमें कौन उनके साथ बैठकर खाना है। किसी दिन बुलावा भेज देना । उनके मन की बात रह जाएगी।

 

हलधर : खूब मन लगा के बनाना।

 

राजेश्वरी : जितना सहूर है उतना करूंगी। जब वह इतने प्रेम से भोजन करने आएंगे तो कोई बात उठा थोड़े ही रखूंगी। बस, इसी एकादशी को बुला भेजो, अभी पांच दिन हैं।

 

हलधर : चलो, पहले घर की सगाई तो कर डालें।

 

 

 

दूसरा दृश्य

 

 

 

सबलसिंह अपने सजे हुए दीवानखाने में उदास बैठे हैं। हाथ में एक समाचार-पत्र है, पर उनकी आंखें दरवाजे के सामने बाग की तरफ लगी हुई हैं।

 

सबलसिंह : (आप-ही-आप) देहात में पंचायतों का होना जरूरी है। सरकारी अदालतों का खर्च इतना बढ़ गया है कि कोई गरीब आदमी वहां न्याय के लिए जा ही नहीं सकता। जार-सी भी कोई बात कहनी हो तो स्टाम्प के बगैर काम नहीं चल सकता। उसका कितना सुडौल शरीर है, ऐसा जान पड़ता है कि एक-एक अंग सांचे में ढला है। रंग कितना प्यारा है, न इतना गोरा कि आंखों को बुरा लगे, न इतना सांवला होगा, मुझे इससे क्या मतलबब वह परायी स्त्री है, मुझे उसके रूप-लावण्य से क्या वास्ता। संसार में एक-से-एक सुंदर स्त्रियां हैं, कुछ यही एक थोड़ी है? ज्ञानी उससे किसी बात में कम नहीं, कितनी सरल ह्रदया, कितनी मधुर-भाषिणी रमणी है। अगर मेरा जरा-सा इशारा हो तो आग में कूद पड़े। मुझ पर उसकी कितनी भक्ति, कितना प्रेम है। कभी सिर में दर्द भी होता है तो बावली हो जाती है। अब उधर मन को जाने ही न दूंगा।

 

कुर्सी से उठकर आल्मारी से एक ग्रंथ निकालते हैं, उसके दो-चार पन्ने इधर-उधर से उलटकर पुस्तक को मेज पर रख देते हैं और फिर कुर्सी पर जा बैठते हैं। अचलसिंह हाथ में एक हवाई बंदूक लिए दौड़ा आता है।

 

अचल : दादाजी, शाम हो गई। आज घूमने न चलिएगा ?

 

सबल : नहीं बेटा ! आज तो जाने का जी नहीं चाहता। तुम गाड़ी जुतवा लो।यह बंदूक कहां पाई ?

 

अचल : इनाम में. मैं दौड़ने में सबसे अव्वल निकला। मेरे साथ कोई पच्चीस लड़के दौड़े थे।कोई कहता था।, मैं बाजी मारूंगा, कोई अपनी डींग मार रहा था।जब दौड़ हुई तो मैं सबसे आगे निकला, कोई मेरे गर्द को भी न पहुंचा, अपना-सा मुंह लेकर रह गए। इस बंदूक से चाहूँ तो चिड़िया मार लूं।

 

सबल : मगर चिड़ियों का शिकार न खेलना।

 

अचल : जी नहीं, यों ही बात कहता था। बेचारी चिड़ियों ने मेरा क्या बिगाड़ा है कि उनकी जान लेता गिरूं। मगर जो चिड़ियां

 

दूसरी चिड़ियों का शिकार करती हैं उनके मारने में तो कोई पाप नहीं है।

 

सबल : (असमंजस में पड़कर) मेरी समझ में तो तुम्हें शिकारी चिड़ियों को भी न मारना चाहिए । चिड़ियों में कर्म-अकर्म का ज्ञान नहीं होता। वह जो कुछ करती हैं केवल स्वभाव-वश करती हैं, इसलिए वह दण्ड की भागी नहीं हो सकती।

 

अचल : कुत्ता कोई चीज चुरा ले जाता है तो क्या जानता नहीं कि मैं बुरा कर रहा हूँ। चुपके-चुपके, पैर दबाकर इधर-उधर चौकन्नी आंखों से ताकता हुआ जाता है, और किसी आदमी की आहट पाते ही भाग खड़ा होता है। कौवे का भी यही हाल है। इससे तो मालूम होता है कि पशु-पक्षियों को भी भले-बुरे का ज्ञान होता है¼ तो फिर उनको दंड क्यों न दिया जाए ?

 

सबल : अगर ऐसा ही हो तो हमें उनको दंड देने का क्या अधिकार

 

है? हालांकि इस विषय में हम कुछ नहीं कह सकते कि शिकारी चिड़ियों में वह ज्ञान होता है, जो कुत्ते या कौवे में है या नहीं

 

अचल : अगर हमें पशु-पक्षी, चोरों को दंड देने का अधिकार नहीं है तो मनुष्य में चोरों को क्यों ताड़ना दी जाती है ? वह जैसा करेंगे उसके फल आप पाएंगे, हम क्यों उन्हें दंड दें ?

 

सबल : (मन में) लड़का है तो नन्हा-सा बालक मगर तर्क खूब करता है। (प्रकट) बेटा ! इस विषय में हमारे प्राचीन ऋषियों ने बड़ी मार्मिक व्यवस्थाएं की हैं, अभी तुम न समझ सकोगी। जाओ सैर कर आओ, ओरवरकोट पहन लेना, नहीं तो सर्दी लग जाएगी।

 

अचल : मुझे वहां कब ले चलिएगा जहां आप कल भोजन करने गए थे? मैं भी राजेश्वरी के हाथ का बनाया हुआ खाना खाना चाहता हूँ। आप चुपके से चले गए, मुझे बुलाया तक नहीं, मेरा तो जी चाहता है कि नित्य गांव ही में रहता, खेतों में घूमा करता।

 

सबल : अच्छा, अब जब वहां जाऊँगा तो तुम्हें भी साथ ले लूंगा।

 

अचलसिंह चला जाता है।

 

सबल : (आप-ही-आप) लेख का दूसरा पाइंट (मुद्रा) क्या होगा? अदालतें सबलों के अन्याय की पोषक हैं। जहां रूपयों के द्वारा फरियाद की जाती हो, जहां वकीलों?बैरिस्टरों के मुंह से बात की जाती हो, वहां गरीबों की कहां पैठ ? यह अदालत नहीं, न्याय की बलिवेदी है। जिस किसी राज्य की अदालतों का यह हाल हो। जब वह थाली परस कर मेरे सामने लाई तो मुझे ऐसा मालूम होता था। जैसे कोई मेरे ह्रदय को खींच रहा हो, अगर उससे मेरा स्पर्श हो जाता तो शायद मैं मूर्च्र्छित हो जाता। किसी उर्दू कवि के शब्दों में यौवन फटा पड़ता था। कितना कोमल गात है, न जाने खेतों में कैसे इतनी मेहनत करती है। नहीं, यह बात नहीं खेतों में काम करने ही से उसका चम्पई रंग निखर कर कुंदन हो गया है। वायु और प्रकाश ने उसके सौंदर्य को चमका दिया है। सच कहा है हुस्न के लिए गहनों की आवश्यकता नहीं उसके शरीर पर कोई आभूषण न था।, किंतु सादगी आभूषणों से कहीं ज्यादा मनोहारिणी थी। गहने सौंदर्य की शोभा क्या बढ़ाएंगे, स्वयं अपनी शोभा बढ़ाते हैं। उस सादे व्यंजन में कितना स्वाद था ? रूप-लावण्य ने भोजन को भी स्वादिष्ट बना दिया था। मन फिर उधर गया, यह मुझे क्या हो गया है। यह मेरी युवावस्था नहीं है कि किसी सुंदरी को देखकर लट्टू हो जाऊँ, अपना प्रेम हथेली पर लिए प्रत्येक सुंदरी स्त्री की भेंट करता गिरूं। मेरी प्रौढ़ावस्था है, पैंतीसवें वर्ष में हूँ। एक लड़के का बाप हूँ जो छ: -सात वर्षों में जवान होगी। ईश्वर ने दिए होते तो चार-पांच संतानों का पिता हो सकता था।यह लोलुपता है, छिछोरापन है। इस अवस्था में, इतना विचारशील होकर भी मैं इतना मलिन-ह्रदय हो रहा हूँ। किशोरावस्था में तो मैं आत्मशुद्वि पर जान देता था।, फूंक-फूंककर कदम रखता था।, आदर्श जीवन व्यतीत करता था। और इस अवस्था में जब मुझे आत्मचिंतन में मग्न होना चाहिए, मेरे सिर पर यह भूत सवार हुआ है। क्या यह मुझसे उस समय के संयम का बदला लिया जा रहा है। अब मेरी परीक्षा की जा रही है ?

 

ज्ञानी का प्रवेश।

 

ज्ञानी : तुम्हारी ये सब किताबें कहीं छुपा दूं ? जब देखो तब एक-न -एक पोथा। खोले बैठे रहते हो, दर्शन तक नहीं होते।

 

सबल : तुम्हारा अपराधी मैं हूँ, जो दंड चाहे दो। यह बेचारी पुस्तकें बेकसूर हैं।

 

ज्ञानी : गुलबिया आज बगीचे की तरफ गई थी। कहती थी, आज वहां कोई महात्मा आए हैं। सैकड़ों आदमी उनके दर्शनों को जा रहे हैं। मेरी भी इच्छा हो रही है कि जाकर दर्शन कर आऊँ।

 

सबल : पहले मैं आकर जरा उनके रंग-ढ़ंग देख लूं तो फिर तुम जाना। गेरूए कपड़े पहनकर महात्मा कहलाने वाले बहुत हैं।

 

ज्ञानी : तुम तो आकर यही कह दोगे कि वह बना हुआ है, पाखण्डी है, धूर्त है, उसके पास न जाना। तुम्हें जाने क्यों महात्माओं से चिढ़ है।

 

सबल : इसीलिए चिढ़ है कि मुझे कोई सच्चा साधु नहीं दिखाई देता।

 

ज्ञानी : इनकी मैंने बड़ी प्रशंसा सुनी है। गुलाबी कहती थी कि उनका मुंह दीपक की तरह दमक रहा था।सैकड़ों आदमी घेरे हुए थे पर वह किसी से बात तक न करते थे।

 

सबल : इससे यह तो साबित नहीं होता कि वह कोई सिद्व पुरूष हैं। अशिष्टता महात्माओं का लक्षण नहीं है।

 

ज्ञानी : खोज में रहने वाले को कभी-कभी सिद्व पुरूष भी मिल जाते हैं। जिसमें श्रद्वा नहीं है उसे कभी किसी महात्मा से साक्षात् नहीं हो सकता। तुम्हें संतान की लालसा न हो पर मुझे तो है। दूध-पूत से किसी का मन भरते आज तक नहीं सुना।

 

सबल : अगर साधुओं के आशीर्वाद से संतान मिल सकती तो आज संसार में कोई निस्संतान प्राणी खोजने से भी न मिलता। तुम्हें भगवान् ने एक पुत्र दिया है। उनसे यही याचना करो कि उसे कुशल से रखें। हमें अपना जीवन अब सेवा और परोपकार की भेंट करना चाहिए ।

 

ज्ञानी : (चिढ़कर) तुम ऐसी निर्दयता से बातें करने लगते हो इसी

 

से कभी इच्छा नहीं होती कि तुमसे अपने मन की बात कहूँ। लो, अपनी किताबें पढ़ो इनमें में तुम्हारी जान बसती है, जाती हूँ

 

सबल : बस रूठ गई।चित्रकारों ने क्रोध की बड़ी भयंकर कल्पना की है, पर मेरे अनुभव से यह सिद्व होता है कि सौंदर्य क्रोध ही का रूपांतर है। कितना अनर्थ है कि ऐसी मोहिनी मूर्ति को इतना विकराल स्वरूप दे दिया जाए ?

 

ज्ञानी : (मुस्कराकर) नमक-मिर्च लगाना कोई तुमसे सीख ले

 

मुझे भोली पाकर बातों में उड़ा देते हो,लेकिन आज मैं न मानूंगी

 

सबल : ऐसी जल्दी क्या है ? मैं स्वामीजी को यहीं बुला लाऊँगा, खूब जी भरकर दर्शन कर लेना। वहां बहुत से आदमी जमा होंगे, उनसे बातें करने का भी अवसर न मिलेगी। देखने वाले हंसी उड़ाएंगे कि पति तो साहब बना गिरता है और स्त्री साधुओं के पीछे दौड़ा करती है।

 

ज्ञानी : अच्छा, तो कब बुला दोगे ?

 

सबल : कल पर रखो

 

ज्ञानी चली जाती है।

 

सबलसिंह : (आज-ही-आप) संतान की क्यों इतनी लालसा होती है ? जिसके संतान नहीं है वह अपने को अभागा समझता है, अहर्निश इसी क्षोभ और चिंता में डूबा रहता है। यदि यह लालसा इतनी व्यापक न होती तो आज हमारा धार्मिक जीवन कितना शिथिल, कितना नीरव होता। न तीर्थयात्राओं की इतनी धूम होती, न मंदिरों की इतनी रौनक, न देवताओं में इतनी भक्ति, न साधु-महात्माओं पर इतनी श्रद्वा, न दान और व्रत की इतनी धूम। यह सब कुछ संतान-लालसा का ही चमत्कार है ! खैर कल चलूंगा, देखूं इन स्वामीजी के क्या रंग-ढ़ंग हैं। अदालतों की बात सोच रहा था।यह आक्षेप किया जाता है कि पंचायतें यथार्थ न्याय न कर सकेंगी¼ पंच लोग मुंह?देखी करेंगे और वहां भी सबलों की ही जीत होगी। इसका निवारण यों हो सकता है कि स्थायी पंच न रखे जाएं। जब जरूरत हो, दोनों पक्षों के लोग अपने?अपने पंचों को नियत कर देंबकिसानों में भी ऐसी कामिनियां होती हैं, यह मुझे न मालूम था।यह निस्संदेह किसी उच्च कुल की लड़की है। किसी कारणवश इस दुरवस्था में आ फंसी है। विधाता ने इस अवस्था में रखकर उसके साथ अत्याचार किया है। उसके कोमल हाथ खेतों में कुदाल चलाने के लिए नहीं बनाए गए हैं, उसकी मधुर वाणी खेतों में कौवे हांकने के लिए उपयुक्त नहीं है, जिनके केशों से झूमर का भार भी न सहा जाए उन पर उपले और अनाज के टोकरे रखना महान् अनर्थ है, माया की विषम लीला है। भाग्य का द्रूर रहस्य है। वह अबला है, विवश है, किसी से अपने ह्रदय की व्यथा। कह नहीं सकती। अगर मुझे मालूम हो जाये कि वह इस हालत में सुखी है, तो मुझे संतोष हो जाएगी। पर वह कैसे मालूम हो, कुलवती स्त्रियां अपनी विपत्ति?कथा। नहीं कहतीं, भीतर-ही-भीतर जलती हैं पर ाबान से हाय नहीं करती।मैं फिर उसी उधेड़-बुन में पड़ गया। समझ में नहीं आता मेरे चित्त की यह दशा क्यों हो रही है। अब तक मेरा मन कभी इतना चंचल नहीं हुआ था।मेरे युवाकाल के सहवासी तक मेरी अरसिकता पर आश्चर्य करते थे।अगर मेरी इस लोलुपता की जरा भी भनक उनके कान में पड़ जाए तो मैं कहीं मुंह दिखाने लायक न रहूँ। यह आग मेरे ह्रदय में ही जले, और चाहे ह्रदय जलकर राख हो जाए पर उसकी कराह किसी के कान में न पड़ेगी। ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ नहीं होता। यह प्रेम-ज्योति उद्दीप्त करने में भी उसकी कोई-न-कोई मसलहत जरूर होगी।

 

घंटी बजाता है।

 

एक नौकर : हुजूर हुकुम ?

 

सबल : घोड़ा खींचो।

 

नौकर : बहुत अच्छा।

 

 

 

तीसरा दृश्य

 

 

 

समय : आठ बजे दिन।

 

स्थान : सबलसिंह का मकान। कंचनसिंह अपनी सजी हुई बैठक में दुशाला ओढ़े, आंखों पर सुनहरी ऐनक चढ़ाए मसनद लगाए बैठे हैं, मुनीमजी बही में कुछ लिख रहे हैं।

 

कंचन : समस्या यह है कि सूद की दर कैसे घटाई जाए। भाई साहब मुझसे नित्य ताकीद किया करते हैं कि सूद कम लिया करो। किसानों की ही सहायता के लिए उन्होंने मुझे इस कारोबार में लगाया। उनका मुख्य उद्देश्य यही है। पर तुम जानते हो धन के बिना धर्म नहीं होता। इलाके की आमदनी घर के जरूरी खर्च के लिए भी काफी नहीं होती। भाई साहब ने किफायत का पाठ नहीं पढ़ा। उनके हजारों रूपये साल तो केवल अधिकारियों के सत्कार की भेंट हो जाते हैं। घुड़दौड़ और पोलो और क्लब के लिए धन चाहिए । अगर उनके आसरे रहूँ तो सैकड़ों रूपये जो मैं स्वयं साधुजनों की अतिथि-सेवा में खर्च करता हूँ, कहां से आएं ?

 

मुनीम : वह बुद्विमान पुरूष हैं, पर न जाने यह फजूलखर्ची क्यों

 

करते हैं?

 

कंचन : मुझे बड़ी लालसा है कि एक विशाल धर्मशाला बनवाऊँ। उसके लिए धन कहां से आएगा ? भाई साहब के आज्ञानुसार नाम-मात्र के लिए ब्याज लूं तो मेरी सब कामनाएं धरी ही रह जाएं। मैं अपने भोग-विलास के लिए धन नहीं बटोरना चाहता, केवल परोपकार के लिए चाहता हूँ। कितने दिनों से इरादा कर रहा हूँ कि एक सुंदर वाचनालय खोल दूं। पर पर्याप्त धन नहीं यूरोप में केवल एक दानवीर ने हजारों वाचनालय खोल दिए हैं। मेरा हौसला इतना तो नहीं पर कम-से-कम एक उत्तम वाचनालय खोलने की अवश्य इच्छा है। सूद न लूं तो मनोरथ पूरे होने के और क्या साधन हैं ? इसके अतिरिक्त यह भी तो देखना चाहिए कि मेरे कितने रूपये मारे जाते हैं? जब असामी के पास कुछ जायदाद ही न हो तो रूपये कहां से वसूल हों। यदि यह नियम कर लूं कि बिना अच्छी जमानत के किसी को रूपये ही न दूंगा तो गरीबों का काम कैसे चलेगा ? अगर गरीबों से व्यवहार न करूं तो अपना काम नहीं चलता। वह बेचारे रूपये चुका तो देते हैं। मोटे आदमियों से लेन-देन कीजिए तो अदालत गए बिना कौड़ी नहीं वसूल होती।

 

हलधर का प्रवेश।

 

कंचन : कहो हलधर, कैसे चले ?

 

हलधर : कुछ नहीं सरकार, सलाम करने चला आया।

 

कंचन : किसान लोग बिना किसी प्रयोजन के सलाम करने नहीं चलते। फारसी कहावत है: सलामे दोस्ताई बगैर नेस्तब

 

हलधर : आप तो जानते ही हैं फिर पूछते क्यों हैं ? कुछ रूपयों का काम था।

 

कंचन : तुम्हें किसी पंडित से साइत पूछकर चलना चाहिए था।यहां आजकल रूपयों का डौल नहीं क्या करोगे रूपये लेकर?

 

हलधर : काका की बरसी होने वाली है। और भी कई काम हैं।

 

कंचन : स्त्री के लिए गहने भी बनवाने होंगे ?

 

हलधर : (हंसकर) सरकार, आप तो मन की बात ताड़ लेते हैं।

 

कंचन : तुम लोगों के मन की बात जान लेना ऐसा कोई कठिन काम नहीं, केवल खेती अच्छी होनी चाहिए । यह फसल अच्छी है, तुम लोगों को रूपये की जरूरत होना स्वाभाविक है। किसान ने खेत में पौधे लहराते हुए देखे और उनके पेट में चूहे कूदने लगे नहीं तो ऋण लेकर बरसी करने या गहने बनवाने का क्या काम, इतना सब्र नहीं होता कि अनाज घर में आ जाए तो यह सब मनसूबे बांधें। मुझे रूपयों का सूद दोगे, लिखाई दोगे, नजराना दोगे, मुनीमजी की दस्तूरी दोगे, दस के आठ लेकर घर जाओगे, लेकिन यह नहीं होता कि महीने-दो-महीने रूक जाएं। तुम्हें तो इस घड़ी रूपये की धुन है, कितना ही समझाऊँ, ऊँच-नीच सुझाऊँ मगर कभी न मानोगे। रूपये न दूं तो मन में गालियां दोगे और किसी दूसरे महाजन की चिरौरी करोगी।

 

हलधर : नहीं सरकार, यह बात नहीं है, मुझे सचमुच ही बड़ी जरूरत

 

है।

 

कंचन : हां-हां, तुम्हारी जरूरत में किसे संदेह है, जरूरत न होती तो यहां आते ही क्यों, लेकिन यह ऐसी जरूरत है जो टल सकती है, मैं इसे जरूरत नहीं कहता, इसका नाम ताव है, जो खेती का रंग देखकर सिर पर सवार हो गया है।

 

हलधर : आप मालिक हैं जो चाहे कहैं। रूपयों के बिना मेरा काम न चलेगा। बरसी में भोज-भात देना ही पड़ेगा, गहना-पाती बनवाए बिना बिरादरी में बदनामी होती है, नहीं तो क्या इतना मैं नहीं जानता कि करज लेने से भरम उठ जाता है। करज करेजे की चीर है। आप तो मेरी भलाई के लिए इतना समझा रहे हैं, पर मैं बड़ा संकट में हूँ।

 

कंचन : मेरी रोकड़ उससे भी ज्यादा संकट में है। तुम्हारे लिए बंकधर से रूपये निकालने पड़ेंगी। कोई और कहता तो मैं उसे सूखा जवाब देता, लेकिन तुम मेरे पुराने असामी हो, तुम्हारे बाप से भी मेरा व्यवहार था।, इसलिए तुम्हें निराश नहीं करना चाहता। मगर अभी से जताए देता हूँ कि जेठी में सब रूपया सूद समेत चुकाना पड़ेगा। कितने रूपये चाहते हो ?

 

हलधर : सरकार, दो सौ रूपये दिला दें।

 

कंचन : अच्छी बात है, मुनीमजी लिखा-पढ़ी करके रूपये दे दीजिए। मैं पूजा करने जाता हूँ। (जाता है)

 

मुनीम : तो तुम्हें दो सौ रूपये चाहिए न। पहिले पांच रूपये सैकड़े नजराना लगता था।अब दस रूपये सैकड़े हो गया है।

 

हलधर : जैसी मर्जी।

 

मुनीम : पहले दो रूपये सैकड़े लिखाई पड़ती थी, अब चार रूपये सैकड़े हो गई है।

 

हलधर : जैसा सरकार का हुकुम।

 

मुनीम : स्टाम्प के पांच रूपये लगेंगी।

 

हलधर : सही है।

 

मुनीम : चपरासियों का हक दो रूपये होगी।

 

हलधर : जो हुकुम।

 

मुनीम : मेरी दस्तूरी भी पांच रूपये होती है, लेकिन तुम गरी। आदमी हो, तुमसे चार रूपये ले लूंगा। जानते ही हो मुझे यहां से कोई तलब तो मिलती नहीं, बस इसी दस्तूरी पर भरोसा है।

 

हलधर : बड़ी दया है।

 

मुनीम : एक रूपया ठाकुर जी को चढ़ाना होगी।

 

हलधर : चढ़ा दीजिए। ठाकुर तो सभी के हैं।

 

मुनीम : और एक रूपया ठकुराइन के पान का खर्च।

 

हलधर : ले लीजिए। सुना है गरीबों पर बड़ी दया करती हैं।

 

मुनीम : कुछ पढ़े हो ?

 

हलधर : नहीं महाराज, करिया अच्छर भैंस बराबर है।

 

मुनीम : तो इस स्टाम्प पर बाएं अंगूठे का निशान करो।

 

सादे स्टाम्प पर निशान बनवाता है।

 

मुनीम : (संदूक से रूपये निकालकर) गिन लो।

 

हलधर : ठीक ही होगी।

 

मुनीम : चौखट पर जाकर तीन बार सलाम करो और घर की राह लो।

 

हलधर रूपये अंगोछे में बांधता हुआ जाता है। कंचनसिंह का प्रवेश।

 

मुनीम : जरा भी कान?पूंछ नहीं हिलाई।

 

कंचन : इन मूखोऊ पर ताव सवार होता है तो इन्हें कुछ नहीं सूझता, आंखों पर पर्दा पड़ जाता है। इन पर दया आती है, पर करूं क्या? धन के बिना धर्म भी तो नहीं होता।

 

 

 

चौथा दृश्य

 

 

 

स्थान : मधुबन। सबलसिंह का चौपाल।

 

समय : आठ बजे रात। फाल्गुन का आरंभ।

 

चपरासी : हुजूर, गांव में सबसे कह आया है। लोग जादू के तमाशे की खबर सुनकर उत्सुक हो रहे हैं।

 

सबल : स्त्रियों को भी बुलावा दे दिया है न ?

 

चपरासी : जी हां, अभी सब-की-सब घरवालों को खाना खिलाकर आई जाती हैं।

 

सबल : तो इस बरामदे में एक पर्दा डाल दो। स्त्रियों को पर्दे के अंदर बिठाना। घास-चारे, दूध-लकड़ी आदि का प्रबंध हो गया न ?

 

चपरासी : हुजूर, सभी चीजों का ढेर लगा हुआ है। जब यह चीजें बेगार में ली जाती थीं तब एक-एक मुट्ठी घास के लिए गाली और मार से काम लेना पड़ता था।हुजूर ने बेगार बंद करके सारे गांव को बिन दामों गुलाम बना लिया है। किसी ने भी दाम लेना मंजूर नहीं किया। सब यही कहते हैं कि सरकार हमारे मेहमान हैं। धन्य-भाग ! जब तक चाहें सिर और आंखों पर रहैं। हम खिदमत के लिए दिलोजान से हाजिर हैं। दूध तो इतना आ गया है कि शहर में चार रूपये को भी न मिलता।

 

सबल : यह सब एहसान की बरकत है। जब मैंने बेगार बंद करने का प्रस्ताव किया तो तुम लोग, यहां तक कि कंचनसिंह भी, सभी मुझे डराते थे।सबको भय था। कि असामी शोख हो जाएंगे, सिर पर चढ़ जाएंगी। लेकिन मैं जानता था। कि एहसान का नतीजा कभी बुरा नहीं होता। अच्छा, महराज से कहो कि मेरा भोजन भी जल्द बना देंब

 

चपरासी चला जाता है।

 

सबल : (मन में) बेगार बंद करके मैंने गांव वालों को अपना भक्त बना लिया। बेगार खुली रहती तो कभी-न-कभी राजेश्वरी को भी बेगार करनी ही पड़ती, मेरे आदमी जाकर उसे दिक करते। अब यह नौबत कभी न आएगी। शोक यही है कि यह काम मैंने नेक इरादों से नहीं किया, इसमें मेरा स्वार्थ छिपा हुआ है। लेकिन अभी तक मैं निश्चय नहीं कर सका कि इसका

 

अंत क्या होगा? राजेश्वरी के उद्वार करने का विचार तो केवल भ्रांत है। मैं उसकी अनुपम रूप-छटा, उसके सरल व्यवहार और उसके निर्दोष अंग-विन्यास पर आसक्त हूँ। इसमें रत्ती-भर भी संदेह नहीं है। मैं कामवासना की चपेट में आ गया हूँ और किसी तरह मुक्त नहीं हो सकता। खूब जानता हूँ कि यह महाघोर पाप है ! आश्चर्य होता है कि इतना संयमशील होकर भी मैं इसके दांव में कैसे आ पड़ा। ज्ञानी को अगर जरा भी संदेह हो जाय तो वह तो तुरंत विष खा ले। लेकिन अब परिस्थिति पर हाथ मलना व्यर्थ है। यह विचार करना चाहिए कि इसका अंत क्या होगा? मान लिया कि

 

मेरी चालें सीधी पड़ती गई और वह मेरा कलमा पढ़ने लगी तो? कलुषित प्रेम ! पापाभिनय ! भगवन् ! उस घोर नारकीय अग्निकुंड में मुझे मत डालना। मैं अपने मुख को और उस सरलह्रदय बालिका की आत्मा को इस कालिमा से वेष्ठित नहीं करना चाहता। मैं उससे केवल पवित्र प्रेम करना चाहता हूँ, उसकी मीठी-मीठी बातें सुनना चाहता हूँ, उसकी मधुर मुस्कान की छटा देखना चाहता हूँ, और कलुषित प्रेम क्या हैजो हो, अब तो नाव नदी में डाल दी है, कहीं-न-कहीं पार लगेगी ही। कहां ठिकाने लगेगी ? सर्वनाश के घाट पर ? हां, मेरा सर्वनाश इसी बहाने होगी। यह पाप?पिशाच मेरे कुल का भक्षण कर जाएगी। ओह ! यह निर्मूल शंकाएं हैं। संसार में एक-से-एक कुकर्मी व्यभिचारी पड़े हुए हैं, उनका सर्वनाश नहीं होता। कितनों ही को मैं जानता हूँ जो विषय-भोग में लिप्त हो रहे हैं। ज्यादा-से-ज्यादा उन्हें यह दंड मिलता है कि जनता कहती है, बिगड़ गया, कुल में दाफजलगा दिया । लेकिन उनकी मान-प्रतिष्ठा में जरा भी अंतर नहीं पड़ता। यह पाप मुझे करना पड़ेगा। कदाचित मेरे भाग्य में यह बदा हुआ है। हरि इच्छा। हां, इसका प्रायश्चित करने में कोई कसर न रखूंगी। दान, व्रत, धर्म, सेवा इनके पर्दे में मेरा अभिनय होगी। दान, व्रत, परोपकार, सेवा ये सब मिलकर कपट-प्रेम की कालिमा को नहीं धो सकते। अरे, लोग अभी से तमाशा देखने आने लगे। खैर, आने दूं। भोजन में देर हो जाएगी। कोई चिंता नहीं बारह बजे सब गिल्म खत्म हो जाएंगी। चलूं सबको बैठाऊँ। (प्रकट) तुम लोग यहां आकर फर्श पर बैठो, स्त्रियां पर्दे में चली जाएं। (मन में) है, वह भी है ! कैसा सुंदर अंग-विन्यास है ! आज गुलाबी साड़ी पहने हुए है। अच्छा, अब की तो कई आभूषण भी हैं। गहनों से उसके शरीर की शोभा ऐसी बढ़ गई है मानो वृक्ष में फूल लगे हों।

 

दर्शक यथास्थान बैठ जाते हैं, सबलसिंह चित्रों को दिखाना शुरू करते हैं।

 

पहला चित्र : कई किसानों का रेलगाड़ी में सवार होने के लिए धक्कम-धक्का करना, बैठने का स्थान न मिलना, गाड़ी में खड़े रहना, एक कुली को जगह के लिए घूस देना, उसका इनको एक मालगाड़ी में बैठा देना। एक स्त्री का छूट जाना और रोना। गार्ड का गाड़ी को न रोकना।

 

हलधर : बेचारी की कैसी दुर्गति हो रही है। लो, लात-घूंसे चलने लगे। सब मार खा रहे हैं।

 

फत्तू : यहां भी घूस दिए बिना नहीं चलता। किराया दिया, घूस उसपर सेब लात-घूंसे खाए उसकी कोई गिनती नहीं बड़ा अंधेर है। रूपये बड़े जतन से रखे हुए हैं। कैसा जल्दी निकाल रहा है कि कहीं गाड़ी न खुल जाए।

 

राजेश्वरी : (सलोनी से) हाय-हाय, बेचारी छूट गई ! गोद में लड़का भी है। गाड़ी नहीं रूकी। सब बड़े निर्दयी हैं। हाय भगवन्, उसका क्या हाल होगा?

 

सलोनी : एक बेर इसी तरह मैं भी छूट गई थी। हरदुआर जाती थी।

 

राजेश्वरी : ऐसी गाड़ी पर कभी न सवार हो, पुण्य तो आगे-पीछे मिलेगा, यह विपत्ति अभी से सिर पर आ पड़ीब

 

दूसरा चित्र : गांव का पटवारी खाट पर बस्ता खोले बैठा है। कई किसान आस-पास खड़े हैं। पटवारी सभी से सालाना नजर वसूल कर रहा है।

 

हलधर : लाला का पेट तो फूलके कुप्पा हो गया है। चुटिया इतनी बड़ी है जैसे बैल की पगहिया।

 

फत्तू : इतने आदमी खड़े गिड़गिड़ा रहे हैं, पर सिर नहीं उठाते, मानो कहीं के राजा हैं ! अच्छा, पेट पर हाथ धरकर लोट गया। पेट अगर रहा है, बैठा नहीं जाता। चुटकी बजाकर दिखाता है कि भेंट लाओ। देखो, एक किसान कमर से रूपया निकालता है। मालूम होता है, बीमार रहा है, बदन पर मिरजई भी नहीं है। चाहे तो छाती के हाड़ गिन लो।वाह, मुंशीजी ! रूपया फेंक दिया, मुंह फेर लिया, अब बात न करेंगी। जैसे बंदरिया रूठ जाती है और बंदर की ओर पीठ फेरकर बैठ जाती है।

 

बेचारा किसान कैसे हाथ जोड़कर मना रहा है, पेट दिखाकर कहता है, भोजन का ठिकाना नहीं, लेकिन लाला साहब कब सुनते हैं।

 

हलधर : बड़ी गलाकाटू जात है।

 

फत्तू : जानता है कि चाहे बना दूं, चाहे बिगाड़ दूं। यह सब हमारी ही दशा तो दिखाई जा रही है।

 

तीसरा चित्र : थानेदार साहब गांव में एक खाट पर बैठे हैं।

 

चोरी के माल की तगतीश कर रहे हैं। कई कांस्टेबल वर्दी पहने हुए खड़े हैं। घरों में खानातलाशी हो रही है। घर की

 

सब चीजें देखी जा रही हैं। जो चीज जिसको पसंद आती है, उठा लेता है। औरतों के बदन पर के गहने भी उतरवा लिए

 

जाते हैं।

 

फत्तू : इन जालिमों से खुदा बचाए।

 

एक किसान : आए हैं अपने पेट भरनेब बहाना कर दिया कि चोरी के माल का पता लगाने आए हैं।

 

फत्तू : अल्लाह मियां का कहर भी इन पर नहीं गिरता। देखो बेचारों की खानातलाशी हो रही है।

 

हलधर : खानातलाशी काहे की है, लूट है। उस पर लोग कहते हैं कि पुलिस तुम्हारे जान?माल की रक्षा करती है।

 

फत्तू : इसके घर में कुछ नहीं निकला।

 

हलधर : यह दूसरा घर किसी मालदार किसान का है। देखो हांडी

 

में सोने का कंठा रखा हुआ है। गोप भी है। महतो इसे पहनकर नेवता खाने जाते होंगे।चौकीदार ने उड़ा लिया। देखो, औरतें आंगन में खड़ी की गई हैं। उनके गहने उतारने को कह रहा है।

 

फत्तू : बेचारा महतो थानेदार के पैरों पर फिर रहा है और अंजुली भर रूपये लिए खड़ा है।

 

राजेश्वरी : (सलोनी से) पुलिसवाले जिसकी इज्जत चाहें ले लें।

 

सलोनी : हां, देखते तो साठ बरस हो गए। इनके उसपर तो जैसे कोई है ही नहीं

 

राजेश्वरी : रूपये ले लिए, बेचारियों की जान बचीब मैं तो इन सभी के सामने कभी न खड़ी हो सयं चाहे कोई मार ही डाले।

 

सलोनी : तस्वीरें न जाने कैसे चलती हैं।

 

राजेश्वरी : कोई कल होगी और क्या !

 

हलधर : अब तमाशा बंद हो रहा है।

 

एक किसान : आधी रात भी हो गई। सबेरे ऊख काटनी है।

 

सबल : आज तमाशा बंद होता है। कल तुम लोगों को और भी अच्छे?अच्छे चित्र दिखाए जाएंगे, जिससे तुम्हें मालूम होगा कि बीमारी से अपनी रक्षा कैसे की जा सकती है। घरों की और गांवों की सगाई कैसे होनी चाहिए, कोई बीमार पड़ जाए तो उसकी देख?रेख कैसे करनी चाहिए । किसी के घर में आगजलग जाए तो उसे कैसे बुझाना चाहिए । मुझे आशा है कि आज की तरह तुम लोग कल भी आओगी।

 

सब लोग चले जाते हैं।

 

 

 

पांचवां दृश्य

 

 

 

प्रात: काल का समय। राजेश्वरी अपनी गाय को रेवड़ में ले जा रही है। सबलसिंह से मुठभेड़।

 

सबल : आज तीन दिन से मेरे चंद्रमा बहुत बलवान हैं। रोज एक बार तुम्हारे दर्शन हो जाते हैं। मगर आज मैं केवल देवी के दर्शनों ही से संतुष्ट न हूँगी। कुछ वरदान भी लूंगा।

 

राजेश्वरी असमंजस में पड़कर इधर-उधर ताकती है और सिर झुकाकर खड़ी हो जाती है।

 

सबल : देवी, अपने उपासकों से यों नहीं लजाया करती। उन्हें धीरज देती हैं, उनकी दु: ख-कथा। सुनती हैं, उन पर दया की दृष्टि फेरती हैं। राजेश्वरी, मैं भगवान को साक्षी देकर कहता हूँ कि मुझे तुमसे जितनी श्रद्वा और प्रेम है उतनी किसी उपासक को अपनी इष्ट देवी से भी न होगी। मैंने जिस दिन से तुम्हें देखा है, उसी दिन से अपने ह्दय-मंदिर में तुम्हारी पूजा करने लगा हूँ। क्या मुझ पर जरा भी दया न करोगी ?

 

राजेश्वरी : दया आपकी चाहिए, आप हमारे ठाकुर हैं। मैं तो आपकी चेरी हूँ। अब मैं जाती हूँ। गाय किसी के खेत में पैठ जाएगी। कोई देख लेगा तो अपने मन में न जाने क्या कहेगी।

 

सबल : तीनों तरफ अरहर और ईख के खेत हैं, कोई नहीं देख सकता। मैं इतनी जल्द तुम्हें न जाने दूंगा। आज महीनों के बाद मुझे यह सुअवसर मिला है, बिना वरदान लिए न छोडूंगा। पहले यह बतलाओ कि इस काक-मंडली में तुम जैसी हंसनी क्यों कर आ पड़ी ? तुम्हारे माता-पिता क्या करते हैं ?

 

राजेश्वरी : यह कहानी कहने लगूंगी तो बड़ी देर हो जाएगी। मुझे यहां कोई देख लेगा तो अनर्थ हो जाएगी।

 

सबल : तुम्हारे पिता भी खेती करते हैं ?

 

राजेश्वरी : पहले बहुत दिनों तक टापू में रहै। वहीं मेरा जन्म हुआ। जब वहां की सरकार ने उनकी जमीन छीन ली तो यहां चले आए। तब से खेती-बारी करते हैं। माता का देहांत हो गया। मुझे याद आता है, कुंदन का-सा रंग था। बहुत सुंदर थीं।

 

सबल : समझ गया। (तृष्णापूर्ण नेत्रों से देखकर) तुम्हारा तो इन गंवारों में रहने से जी घबराता होगी। खेती-बारी की मेहनत भी तुम जैसी कोमलांगी सुंदरी को बहुत अखरती होगी।

 

राजेश्वरी : (मन में) ऐसे तो बड़े दयालु और सज्जन आदमी हैं, लेकिन निगाह अच्छी नहीं जान पड़ती। इनके साथ कुछ कपट-व्यवहार करना चाहिए । देखूं किस रंग पर चलते हैं। (प्रकट) क्या करूं भाग्य में जो लिखा था। वह हुआ।

 

सबल : भाग्य तो अपने हाथ का खेल है। जैसे चाहो वैसा बन सकता है। जब मैं तुम्हारा भक्त हूँ तो तुम्हें किसी बात की चिंता न करनी चाहिए । तुम चाहो तो कोई नौकर रख लो।उसकी तलब मैं दे दूंगा, गांव में रहने की इच्छा न हो तो शहर चलो, हलधर को अपने यहां रख लूंगा, तुम आराम से रहना। तुम्हारे लिए मैं सब कुछ करने को तैयार हूँ, केवल तुम्हारी दया-दृष्टि चाहता हूँ। राजेश्वरी, मेरी इतनी उम्र गुजर गई लेकिन परमात्मा जानते हैं कि आज तक मुझे न मालूम हुआ कि प्रेम क्या वस्तु है। मैं इस रस के स्वाद को जानता ही न था।, लेकिन जिस दिन से तुमको देखा है, प्रेमानंद का अनुपम सुख भोग रहा हूँ। तुम्हारी सूरत एक क्षण के लिए भी आंखों से नहीं उतरती। किसी काम में जी नहीं लगता, तुम्हीं चित्त में बसी रहती हो, बगीचे में जाता हूँ तो मालूम होता है कि फूललों में तुम्हारी ही सुगंधि है, श्यामा की चहक सुनता हूँ तो मालूम होता है कि तुम्हारी ही मधुर ध्वनि है। चंद्रमा को देखता हूँ तो जान पड़ता है कि वह तुम्हारी ही मूर्ति है। प्रबल उत्कंठा होती है कि चलकर तुम्हारे चरणों पर सिर झुका दूं। ईश्वर के लिए यह मत समझो कि मैं तुम्हें कलंकित कराना चाहता हूँ। कदापि नहीं ! जिस दिन यह कुभाव, यह कुचेष्टा, मन में उत्पन्न होगी उस दिन ह्रदय को चीरकर बाहर फेंक दूंगा। मैं केवल तुम्हारे दर्शन से अपनी आंखों को तृप्त करना, तुम्हारी सुललित वाणी से अपने श्रवण को मुग्ध करना चाहता हूँ। मेरी यही परमाकांक्षा है कि तुम्हारे निकट रहूँ, तुम मुझे अपना प्रेमी और भक्त समझो और मुझसे किसी प्रकार का पर्दा या संकोच न करो। जैसे किसी साफर के निकट के वृक्ष उससे रस खींचकर हरे-भरे रहते हैं उसी प्रकार तुम्हारे समीप रहने से मेरा जीवन आनंदमय हो जाएगी।

 

चेतनदास भजन गाते हुए दोनों प्राणियों को देखते चले जाते हैं।

 

राजेश्वरी : (मन में) मैं इनसे कौशल करना चाहती थी पर न जाने इनकी बातें सुनकर क्यों ह्रदय पुलकित हो रहा है। एक-एक शब्द मेरे ह्रदय में चुभ जाता है। (प्रकट) ठाकुर साहब, एक दीन मजूरी करने वाली स्त्री से ऐसी बातें करके उसका सिर आसमान पर न चढ़ाइए। मेरा जीवन नष्ट हो जाएगी। आप धर्मात्मा हैं, जसी हैं, दयावान हैं। आज घर-घर आपके जस का बखान हो रहा है, आपने अपनी प्रजा पर जो दया की है उसकी महिमा मैं नहीं गा सकती। लेकिन ये बातें अगर किसी के कान में पड़ गई तो यही परजा, जो आपके पैरों की धूल माथे पर चढ़ाने को तरसती है, आपकी बैरी हो जाएगी, आपके पीछे पड़ जाएगी। अभी कुछ नहीं बिगड़ा है। मुझे भूल जाइए। संसार में एक-से-एक सुंदर औरतें हैं। मैं गंवारिन हूँ। मजूरी करना मेरा काम है। इन प्रेम की बातों को सुनकर मेरा चित्त ठिकाने न रहेगी। मैं उसे अपने बस में न रख सयंगी। वह चंचल हो जाएगा और न जाने उस अचेत दशा में क्या कर बैठे। उसे फिर नाम की, कुल की, निंदा की लाज न रहेगी। प्रेम बढ़ती हुई नदी है। उसे आप यह नहीं कह सकते कि यहां तक चढ़ना, इसके आगे नहीं चढ़ाव होगा तो वह किसी के रोके न रूकेगी। इसलिए मैं आपसे विनती करती हूँ कि यहीं तक रहने दीजिए। मैं अभी तक अपनी दशा में संतुष्ट हूँ। मुझे इसी दशा में रहने दीजिए। अब मुझे देर हो रही है, जाने दीजिए।

 

सबल : राजेश्वरी, प्रेम के मद से मतवाला आदमी उपदेश नहीं सुन सकता। क्या तुम समझती हो कि मैंने बिना सोचे-समझे इस पथ पर पग रखा है। मैं दो महीनों से इसी हैस?बैस में हूँ। मैंने नीति का, सदाचरण का, धर्म का, लोकनिंदा का आश्रय लेकर देख लिया, कहीं संतोष न हुआ तब मैंने यह पथ पकड़ा। मेरे जीवन को बनाना-बिगाड़ना अब तुम्हारे ही हाथ है। अगर तुमने मुझ पर तरस न खाया तो अंत यही होगा कि मुझे आत्महत्या जैसा भीषण पाप करना पडे।गा, क्योंकि मेरी दशा असह्य हो गई है। मैं इसी गांव में घर बना लूंगा, यहीं रहूँगा, तुम्हारे लिए भी मकान, धन-संपत्ति, जगह-जमीन किसी पदार्थ की कमी न रहेगी। केवल तुम्हारी स्नेह-दृष्टि चाहता हूँ।

 

राजेश्वरी : (मन में) इनकी बातें सुनकर मेरा चित्त चंचल हुआ जाता है। आप-ही-आप मेरा ह्रदय इनकी ओर खिंचा जाता है। पर यह तो सर्वनाश का मार्ग है। इससे मैं इन्हें कटु वचन सुनाकर यहीं रोक देती हूँ। (प्रकट) आप विद्वान हैं, सज्जन हैं, धर्मात्मा हैं, परोपकारी हैं, और मेरे मन में आपका जितना मान है वह मैं कह नहीं सकती। मैं अब से थोड़ी देर पहले आपको देवता समझती थी। पर आपके मुंह से ऐसी बातें सुनकर दु: ख होता है। आपसे मैंने अपना हाल साफ-साफ कह दिया । उस पर भी आप वही बातें करते जाते हैं। क्या आप समझते हैं कि मैं अहीर जात और किसान हूँ तो मुझे अपने धरम-करम का कुछ विचार नहीं है और मैं धन और संपत्ति पर अपने धरम को बेच दूंगी ? आपका यह भरम है। आपको मैं इतनी सिरिद्वा से न देखती होती तो इस समय आप यहां इस तरह बेधड़क मेरे धरम का सत्यानाश करने की बातचीत न करते। एक पुकार पर सारा गांव यहां आ जाता और आपको मालूम हो जाता कि देहात के गंवार अपनी औरतों की लाज कैसे रखते हैं। मैं जिस दशा में भी हूँ संतुष्ट हूँ, मुझे किसी वस्तु की तृषना नहीं है। आपका धन आपको मुबारक रहै। आपकी कुशल इसी में है कि अभी आप यहां से चले जाइए। अगर गांव वालों के कानों में इन बातों की जरा भी भनक पड़ी तो वह मुझे तो किसी तरह जीता न छोड़ेंगे, पर आपके भी जान के दुश्मन हो जाएंगी। आपकी दया, उपकार, सेवा एक भी आपको उनके कोप से न बचा सकेगी।

 

चली जाती है।

 

सबल : (आप-ही-आप) इसकी सम्मत्ति मेरे चित्त को हटाने की जगह और भी बल के साथ अपनी ओर खींचती है। ग्रामीण स्त्रियां भी इतनी दृढ़ और आत्माभिमानी होती हैं, इसका मुझे ज्ञान न था।अबोध बालक को जिस काम के लिए मना करो, वही अदबदाकर करता है। मेरे चित्त की दशा उसी बालक के समान है। वह अवहेलना से हतोत्साह नहीं, वरन् और भी उत्तेजित होता है।

 

प्रस्थान।

 

 

 

छठा दृश्य

 

 

 

स्थान : मधुबन गांव।

 

समय : गागुन का अंत, तीसरा पहर, गांव के लोग बैठे बातें कर रहे हैं।

 

एक किसान : बेगार तो सब बंद हो गई थी। अब यह दहलाई की बेगार क्यों मांगी जाती है ?

 

फत्तू : जमींदार की मर्जी। उसी ने अपने हुक्म से बेगार बंद की थी। वही अपने हुक्म से जारी करता है।

 

हलधर : यह किस बात पर चिढ़ गए ? अभी तो चार-ही-पांच दिन होते हैं, तमाशा दिखाकर कर गए हैं। हम लोगों ने उनके सेवा-सत्कार में तो कोई बात उठा नहीं रखी।

 

फत्तू : भाई, राजा ठाकुर हैं, उनका मिजाज बदलता रहता है। आज किसी पर खुश हो गए तो उसे निहाल कर दिया, कल नाखुश हो गए तो हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया । मन की बात है।

 

हलधर : अकारन ही थोड़े किसी का मिजाज बदलता है। वह तो कहते थे, अब तुम लोग हाकिम-हुक्काम किसी को भी बेगार मत देना। जो कुछ होगा मैं देख लूंगा। कहां आज यह हुकुम निकाल दिया । जरूर कोई बात मर्जी के खिलाफ हुई है।

 

फत्तू : हुई होगी। कौन जाने घर ही में किसी ने कहा हो, असामी अब सेर हो गए, तुम्हें बात भी न पूछेंगे।इन्होंने कहा हो कि सेर कैसे हो जाएंगे, देखो अभी बेगार लेकर दिखा देते हैं। या कौन जाने कोई काम-काज आ पड़ा हो, अरहर भरी रखी हो, दलवा कर बेच देना चाहते हों।

 

कई आदमी : हां, ऐसी ही कोई बात होगी। जो हुकुम देंगे वह बजाना ही पड़ेगा, नहीं तो रहेंगे कहां!

 

एक किसान : और जो बेगार न दें तो क्या करें ?

 

फत्तू : करने की एक ही कही। नाक में दम कर दें, रहना मुसकिल हो जाए। अरे और कुछ न करें लगान की रसीद ही न दें तो उनका क्या बना लोगे ? कहां फरियाद ले जाओगे और कौन सुनेगा ? कचहरी कहां तक दौड़ोगे ? फिर वहां भी उनके सामने तुम्हारी कौन सुनेगा !

 

कई आदमी : आजकल मरने की छुट्टी ही नहीं है, कचहरी कौन दौड़ेगा ? खेती तैयार खड़ी है, इधर ऊख बोना है, फिर अनाज मांड़ना पड़ेगा। कचहरी के धक्के खाने से तो यही अच्छा है कि जमींदार जो कहे, वही बजाएं।

 

फत्तू : घर पीछे एक औरत जानी चाहिए । बुढ़ियों को छांटकर भेजा जाए।

 

हलधर : सबके घर बुढ़िया कहां ?

 

फत्तू : तो बहू-बेटियों को भेजने की सलाह मैं न दूंगा।

 

हलधर : वहां इसका कौन खटका है ?

 

फत्तू : तुम क्या जानो, सिपाही हैं, चपरासी हैं, क्या वहां सब-के-सब देवता ही बैठे हैं। पहले की बात दूसरी थी।

 

एक किसान : हां, यह बात ठीक है। मैं तो अम्मां को भेज दूंगा।

 

हलधर : मैं कहां से अम्मां लाऊँ ?

 

फत्तू : गांव में जितने घर हैं क्या उतनी बुढ़िया न होंगी। गिनो एक-दो-तीन, राजा की मां चार, उस टोले में पांच, पच्छिम ओर सात, मेरी तरफ नौ: कुल पच्चीस बुढ़ियां हैं।

 

हलधर : घर कितने होंगे ?

 

फत्तू : घर तो अबकी मरदुमसुमारी में तीस थे।कह दिया जाएगा, पांच घरों में कोई औरत ही नहीं है, हुकुम हो तो मर्द ही हाजिर हों।

 

हलधर : मेरी ओर से कौन बुढ़िया जाएगी ?

 

फत्तू : सलोनी काकी को भेज दो। लो वह आप ही आ गई।

 

सलोनी आती है।

 

फत्तू : अरे सलोनी काकी, तुझे जमींदार की दलहाई में जाना पड़ेगा।

 

सलोनी : जाय नौज, जमींदार के मुंह में लूका लगे, मैं उसका क्या चाहती हूँ कि बेगार लेगी। एक धुर जमीन भी तो नहीं है। और बेगार तो उसने बंद कर दी थी ?

 

फत्तू : जाना पड़ेगा, उसके गांव में रहती हो कि नहीं ?

 

सलोनी : गांव उसके पुरखों का नहीं है, हां नहीं तो। फतुआ, मुझे चिढ़ा मत, नहीं कुछ कह बैठूंगी।

 

फत्तू : जैसे गा-गाकर चक्की पीसती हो उसी तरह गा-गाकर दाल दलना। बता कौन गीत गाओगी ?

 

सलोनी : डाढ़ीजार, मुझे चिढ़ा मत, नहीं तो गाली दे दूंगी। मेरी गोद का खेला लौंडा मुझे चिढ़ाता है।

 

फत्तू : कुछ तू ही थोड़े जाएगी। गांव की सभी बुढ़ियां जाएंगी।

 

सलोनी : गंगा-असनान है क्या ? पहले तो बुढ़ियां छांटकर न जाती थीं।मैं उमिर-भर कभी नहीं गई। अब क्या बहुओं को पर्दा लगा है। गहने गढ़ा-गढ़ा कर तो वह पहनें, बेगार करने बुढ़ियां जाएं।

 

फत्तू : अबकी कुछ ऐसी ही बात आ पड़ी है। हलधर के घर कोई बुढ़िया नहीं है। उसकी घरवाली कल की बहुरिया है, जा नहीं सकती। उसकी ओर से चली जा।

 

सलोनी : हां, उसकी जगह पर चली जाऊँगी। बेचारी मेरी बड़ी सेवा करती है। जब जाती हूँ तो बिना सिर में तेल डाले और हाथ-पैर दबाए नहीं आने देती। लेकिन बहली जुता देगा न ?

 

फत्तू : बेगार करने रथ पर बैठकर जाएगी।

 

हलधर : नहीं काकी, मैं बहली जुता दूंगा। सबसे अच्छी बहली में तुम बैठना।

 

सलोनी : बेटा, तेरी बड़ी उम्मिर हो, जुग-जुग जी। बहली में ढोल-मजीरा रख देना। गाती बजाती जाऊँगी।

 

 

 

सातवां दृश्य

 

 

 

समय : संध्या।

 

स्थान : मधुबन। ओले पड़ गए हैं। गांव के स्त्री-पुरूष खेतों में जमा हैं।

 

फत्तू : अल्लाह ने परसी?-परसायी थाली छीन ली।

 

हलधर : बना-बनाया खेल बिगड़ गया।

 

फत्तू : छावत लागत छह बरस और छिन में होत उजाड़ब कई साल के बाद तो अबकी खेती जरा रंग पर आई थी। कल इन खेतों को देखकर कैसी गज-भर की छाती हो जाती थी। ऐसा जान पड़ता था।, सोना बिछा दिया गया है। बित्ते-बित्ते भर की बालें लहराती थीं, पर अल्लाह ने मारा सब सत्यानाश कर दिया । बाग में निकल जाते थे तो बौर की महक से चित्त खिल उठता था।पर आज बौर की कौन कहे पत्ते तक झड़ गए।

 

एक वृद्व किसान : मेरी याद में इतने बड़े-बड़े ओले कभी न पड़े थे।

 

हलधर : मैंने इतने बड़े ओले देखे ही न थे, जैसे चट्टान काट-काटकर लुढ़का दिया गया हो,

 

फत्तू : तुम अभी हो कै दिन के ? मैंने भी इतने बड़े ओले नहीं

 

देखे।

 

एक वृद्व किसान : एक बेर मेरी जवानी में इतने बड़े ओले गिरे थे कि सैकड़ों ढोर मर गए। जिधर देखो मरी हुई चिड़ियां गिरी मिलती थीं।कितने ही पेड़ फिर पड़े। पक्की छतें तक गट गई थीं।बखारों में अनाज सड़ गए, रसोई में बर्तन चकनाचूर हो गए। मुदा अनाज की मड़ाई हो चुकी थी। इतना नुकसान नहीं हुआ था।

 

सलोनी : मुझे तो मालूम होता है कि जमींदार की नीयत बिगड़ गई है, तभी ऐसी तबाही हुई है।

 

राजेश्वरी : काकी, भगवान न जाने क्या करने वाले हैं। बार-बार मने करती थी कि अभी महाजन से रूपये न लो।लेकिन मेरी कौन सुनता है। दौड़े-दौड़े गए दो सौ रूपये उठा लाए, जैसे धरोहर हो, देखें अब कहां से देते हैं। लगान उसपर से देना है। पेट तो मजूरी करके मर जाएगा, लेकिन महाजन से कैसे गला छूटेगा ?

 

हलधर : भला पूछा तो काकी, कौन जानता था। कि क्या सुदनी हैं। आगम देख के तब रूपये लिए थे।यह आगत न आ जाती तो एक सौ रूपये का तो अकेले तेलहन निकल जाता। छाती-भर गेहूँ खड़ा था।

 

फत्तू : अब तो जो होना था। वह हो गया। पछताने से क्या हाथ आएगा ?

 

राजेश्वरी : आदमी ऐसा काम ही क्यों करे कि पीछे से पछताना पड़े।

 

सलोनी : मेरी सलाह मानो, सब जने जाकर ठाकुर से फरियाद करो कि लगान की माफीहो जाए। दयावान आदमी हैं। मुझे तो बिस्सास है कि मांग कर देंगे। दलहाई की बेगार में हम लोगों से बड़े प्रेम से बातें करते रहै। किसी को छटांक-भर भी दाल न दलने दीब पछताते रहे कि नाहक तुम लोगों को दिक किया। मुझसे बड़ी भूल हुई मैं तो फिर कहूँगी कि आदमी नहीं देवता हैं।

 

फत्तू : जमींदार के माफकरने से थोड़े माफीहोती है¼ जब सरकार माफकरे तब न ? नहीं तो जमींदार को मालगुजारी घर से चुकानी पड़ेगी। तो सरकार से इसकी कोई आशा नहीं अमले लोग तहकीकात करने को भेजे जाएंगी। वह असामियों से खूब रिसवत पाएंगे तो नुकसान दिखाएंगे, नहीं तो लिख देंगे ज्यादा नकसान नहीं हुआ। सरकार बहुत करेगी चार आने की छूट कर देगी। जब बारह आने देने ही पड़ेंगे तो चार आने और सही। रिसवत और कचहरी की दौड़ से तो बच जाएंगी। सरकार को अपना खजाना भरने से मतलब है कि परजा को पालने सेब सोचती होगी, यह सब न रहेंगे तो इनके और भाई तो रहेंगे ही। जमीन परती थोड़े पड़ी रहेगी।

 

एक वृद्व किसान : सरकार एक पैसा भी न छोड़ेगी। इस साल कुछ छोड़ भी देगी तो अगले साल सूद समेत वसूल कर लेगी।

 

फत्तू : बहुत निगाह करेगी तो तकाबी मंजूर कर देगी। उसका भी सूद लेगी। हर बहाने से रूपया खींचती है। कचहरी में झूठी कोई दरखास देने जाओ तो बिना टके खर्च किए सुनाई नहीं होती। अफीम सरकार बेचे, दाई, गांजा, भांग, मदक, चरस सरकार बेचे। और तो और नोन तक बेचती है। इस तरह रूपया न खींचे तो अफसरों की बड़ी-बड़ी तलब कहां से दे ! कोई एक लाख पाता है, कोई दो लाख, कोई तीन लाख। हमारे यहां जिसके पास लाख रूपये होते हैं वह लखपती कहलाता है, मारे घमंड के सीधे ताकता नहीं सरकार के नौकरों की एक-एक साल की तलब दो-दो लाख होती है। भला वह लगान की एक पाई भी न छोड़ेगी।

 

हलधर : बिना सुराज मिले हमारी दसा न सुधरेगी। अपना राज होता तो इस कठिन समय में अपनी मदद करता।

 

फत्तू : मदद करेंगे ! देखते हो जब से दाई, अफीम की बिक्री बंद हो गई है अमले लोग नसे का कैसा बखान करते गिरते हैं। कुरान शरीफ में नसा हराम लिखा है, और सरकार चाहती है कि देस नसेबाज हो जाए। सुना है, साहब ने आजकल हुकुम दे दिया है कि जो लोग खुद अफीम-सराब पीते हों और दूसरों को पीने की सलाह देते हों, उनका नाम खैरखाहों में लिख लिया जाए। जो लोग पहले पीते थे, अब छोड़ बैठे हैं, या दूसरों को पीना मना करते हैं, उनका नाम बागियों में लिखा जाता है।

 

हलधर : इतने सारे रूपये क्या तलबों में ही उठ जाते हैं ?

 

राजेश्वरी : गहने बनवाते हैं।

 

फत्तू : ठीक तो कहती हैं। क्या सरकार के जोई-बच्चे नहीं हैं ? इतनी बड़ी फौज बिना रूपये के ही रखी है ! एक-एक तोप लाखों में आती है। हवाई जहाज कई-कई लाख के होते हैं। सिपाहियों को सर्च के लिए हवा-गाड़ी चाहिए । जो खाना यहां रईसों को मयस्सर नहीं होता वह सिपाहियों को खिलाया जाता है। साल में छ: महीने सब बड़े-बड़े हाकिम पहाड़ों की सैर करते हैं। देखते तो हो छोटे-छोटे हाकिम भी बादशाहों की तरह ठाट से रहते हैं, अकेली जान पर दस-पंद्रह नौकर रखते हैं, एक पूरा बंगला रहने को चाहिए । जितना बड़ा हमारा गांव है उससे ज्यादा जमीन एक बंगले के हाते में होती है। सुनते हैं, दस रूपये-बीस रूपये बोतल की शराब पीते हैं। हमको-तुमको भरपेट रोटियां नहीं नसीब होतीं, वहां रात-दिन रंग चढ़ा रहता है। हम-तुम रेलगाड़ी में धक्के खाते हैं। एक-एक डब्बे में जहां दस की जगह है वहां बीस, पच्चीस, तीस, चालीस ठूंस दिए जाते हैं। हाकिमों के वास्ते सभी सजी-सजाई गाड़ियां रहती हैं, आराम से गद्दी पर लेटे हुए चले जाते हैं। रेलगाड़ी को जितना हम किसानों से मिलता है उसका एक हिस्सा भी उन लोगों से न मिलता होगी। मगर तिस पर भी हमारी कहीं पूछ नहीं जमाने की खूबी है !

 

हलधर : सुना है, मेमें अपने बच्चों को दूध नहीं पिलाती।

 

फत्तू : सो ठीक है, दूध पिलाने से औरत का शरीर ढीला हो जाता है, वह फुरती नहीं रहती। दाइयां रख लेते हैं। वही बच्चों को पालती-पोसती हैं। मां खाली देखभाल करती रहती हैं। लूट है लूट!

 

सलोनी : दरखास दो¼ मेरा मन कहता है, छूट हो जाएगी।)

 

फत्तू : कह तो दिया, दो-चार आने की छूट हुई भी तो बरसों लग जाएंगी। पहले पटवारी कागद बनाएगा, उसको पूजो¼ तब कानूगो जांच करेगा, उसको पूजो¼ तब तहसीलदार नजर सानी करेगा, उसको पूजो¼ तब डिप्टी के सामने कागद पेस होगा, उसको पूजो¼ वहां से तब बड़े साहब के इजलास में जाएगा, वहां अहलमद और अरदली और नाजिर सभी को पूजना पड़ेगा। बड़े साहब कमसनर को रपोट देंगे, वहां भी कुछ-न-कुछ पूजा करनी पड़ेगी। इस तरह मंजूरी होते?होते एक जुग बीत जाएगी। इन सब झंझटों से तो यही अच्छा है कि:

 

रहिमन चुप तै बैठिए देखि दिनन को फेर।

 

जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहै बेर।।

 

हलधर : मुझे तो साठ रूपये लगान देने हैं। बैल-बधिया बिक जाएंगे तब भी पूरा न पड़ेगा।

 

किसान : बचेंगे किसके ! अभी साल-भर खाने को चाहिए । देखो, गेहूँ के दाने कैसे बिखरे पड़े हैं जैसे किसी ने मसल दिए हों।

 

हलधर : क्या करना होगा?

 

राजेश्वरी : होगा क्या, जैसी करनी वैसी भरनी होगी। तुम तो खेत में बाल लगते ही बावले हो गए। लगान तो था। ही, उसपर से महाजन का बोझ भी सिर पर लाद लिया।

 

फत्तू : तुम मैके चली जाना। हम दोनों जाकर कहीं मजूरी करेंगी। अच्छा काम मिल गया तो साल-भर में डोंगा पार है।

 

राजेश्वरी : हां, और क्या, गहने तो मैंने पहने हैं, गाय का दूध मैंने खाया है, बरसी मेरे ससुर की हुई है, अब जो भरौती के दिन आए तो मैं मैके भाग जाऊँ। यह मेरा किया न होगी। तुम लोग जहां जाना, वहीं मुझे भी लेते चलना। और कुछ न होगा तो पकी-पकाई रोटियां तो मिल जाएंगी।

 

सलोनी : बेटी, तूने यह बात मेरे मन की कही। कुलवंती नारी के यही लच्छन हैं। मुझे भी अपने साथ लेती चलना।

 

गाती है।

 

चलो पटने की देखो बहार, सहर गुलजार रे।

 

फत्तू : हां, दाई, खूब गा, गाने का यही अवसर है। सुख में तो सभी गाते हैं।

 

सलोनी : और क्या बेटा, अब तो जो होना था।, हो गया। रोने से लौट थोड़े ही आएगी।

 

गाती है।

 

उसी पटने में तमोलिया बसत है।

 

बीड़ों की अजब बहार रे।

 

पटना शहर गुलजार रे।।

 

फत्तू : काकी का गाना तानसेन सुनता तो कानों पर हाथ रखता। हां, दाई !

 

सलोनी : (गाती है)

 

उसी पटने में बजजवा बसत है।।

 

कैसी सुंदर लगी है बजार रे।

 

पटना सहर गुलजार रे।।

 

फत्तू : बस एक कड़ी और गा दे काकी ! तेरे हाथ जोड़ता हूँ। जी बहल गया।

 

सलोनी : जिसे देखो गाने को ही कहता है, कोई यह नहीं पूछता कि बुढ़िया कुछ खाती-पीती भी है या आसिरवादों से ही जीती है।

 

राजेश्वरी : चलो, मेरे घर काकी, क्या खाओगी ?

 

सलोनी : हलधर, तू इस हीरे को डिबिया में बंद कर ले, ऐसा न हो किसी की नजर लग जाए। हां बेटी, क्या खिलाएगी ?

 

राजेश्वरी : जो तुम्हारी इच्छा हो,

 

सलोनी : भरपेट ?

 

राजेश्वरी : हां, और क्या ?

 

सलोनी : बेटी, तुम्हारे खिलाने से अब मेरा पेट न भरेगी। मेरा पेट भरता था। जब रूपये का पसेरी-भर घी मिलता था।अब तो पेट ही नहीं भरता। चार पसेरी अनाज पीसकर जांत पर से उठाती थी। चार पसेरी की रोटियां पकाकर चौके से निकलती थी। अब बहुएं आती हैं तो चूल्हे के सामने जाते उनको ताप चढ़ आती है, चक्की पर बैठते ही सिर में पीड़ा होने लगती है। खाने को तो मिलता नहीं, बल-बूता कहां से आए। न जाने उपज ही नहीं होती कि कोई ढो ले जाता है। बीस मन का बीघा उतरता था।बीस रूपये भी हाथ में आ जाते थे, तो पछाई बैलों की जोड़ी द्वार पर बंध जाती थी। अब देखने को रूपये तो बहुत मिलते हैं पर ओले की तरह देखते-देखते फल जाते हैं। अब तो भिखारी को भीख देना भी लोगों को अखरता है।

 

फत्तू : सच कहना काकी, तुम काका को मुट्ठी में दबा लेती थी कि नहीं ?

 

सलोनी : चल, उनका जोड़ दस-बीस गांव में न था।तुझे तो होस आता होगा, कैसा डील-डौल था।चुटकी से सुपारी गोड़ देते थे।

 

गाती है।

 

चलो-चलो सखी अब जाना,

 

पिया भेज दिया परवाना। (टेक)

 

एक दूत जबर चल आया, सब लस्कर संग सजाया री।

 

किया बीच नगर के थाना,

 

गढ़ कोट-किले गिरवाए, सब द्वार बंद करवाए री।

 

अब किस विधि होय रहाना।

 

जब दूत महल में आवे, तुझे तुरत पकड़ ले जावे री।

 

तेरा चले न एक बहाना।

 

पिया भेज दिया परवाना।

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