लेख – जायसी का रहस्यवाद – (लेखक – रामचंद्र शुक्ल )

· June 2, 2014

RamChandraShukla_243172सूफियों के अद्वैतवाद का जो विचार पूर्वप्रकरण में हुआ था उससे यह स्पष्ट हो गया कि किस प्रकार आर्य जाति (भारतीय और यूनानी) के तत्त्वचिंतकों द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत को सामी पैगंबरी मतों में रहस्यभावना के भीतर स्थान मिला। उक्त मतों (यहूदी, ईसाई, इसलाम) के बीच तत्त्वचिंतन की पद्धति या ज्ञानकांड का स्थान न होने के कारण – मनुष्य की स्वाभाविक बुद्धि या अक्ल का दखल न होने के कारण – अद्वैतवाद का ग्रहण रहस्यवाद के रूप में ही हो सकता था। इस रूप में पड़कर वह धार्मिक विश्वास में बाधक नहीं समझा गया। भारतवर्ष में तो यह ज्ञानक्षेत्र से निकला और अधिकतर ज्ञानक्षेत्र में ही रहा; पर अरब, फारस आदि में जा कर यह भावक्षेत्र के बीच मनोहर रहस्यभावना के रूप में फैला।

योरप में भी प्राचीन यूनानी दार्शनिकों द्वारा प्रतिष्ठित अद्वैतवाद ईसाई मजहब के भीतर रहस्यभावना के ही रूप में लिया गया। रहस्योन्मुख सूफियों और पुराने कैथलिक ईसाई भक्तों की साधना समान रूप से माधुर्य भाव की और प्रवृत्त रही। जिस प्रकार सूफी ईश्वर की भावना प्रियतम के रूप में करते थे उसी प्रकार स्पेन, इटली आदि योरोपीय प्रदेशों के भक्त भी। जिस प्रकार सूफी ‘हाल’ की दशा में उस माशूक से भीतर-ही-भीतर मिला करते थे उसी प्रकार पुराने ईसाई भक्त साधक भी दुलहनें बन कर उस दूल्हे से मिलने के लिए अपने अंतर्देश में कई खंडों के रंगमहल तैयार किया करते थे। ईश्वर की पति रूप में उपासना करनेवाली सैफो, सेंट टेरेसा आदि कई भक्तिनें भी योरप में हुई हैं।

 

अद्वैतवाद के दो पक्ष हैं – आत्मा और परमात्मा की एकता तथा ब्रह्म और जगत की एकता। दोनों मिल कर सर्ववाद की प्रतिष्ठा करते हैं – सर्वं खल्विदं ब्रह्म। यद्यपि साधना के क्षेत्र में सूफियों और पुराने ईसाई भक्तों, दोनों की दृष्टि प्रथम पक्ष पर ही दिखाई देती है। पर भावक्षेत्र में जा कर सूफी प्रकृति की नाना विभूतियों से भी उसकी छवि का अनुभव करते आए हैं।

 

ईसाइयत की 19वीं शताब्दी में रहस्यात्मक कविता का जो पुनरुत्थान योरप के कई प्रदेशों में हुआ उसमें सर्ववाद (पैनथेइज्म) का – ब्रह्म और जगत की एकता का भी बहुत कुछ आभास रहा। वहाँ इसकी ओर प्रवृत्ति स्वातंत्र्य और लोकसत्तात्मक भावों के प्रचार के साथ-ही-साथ दिखाई पड़ने लगी। स्वातंत्र्य के बड़े भारी उपासक अँगरेज, कवि शेली में इस प्रकार के सर्ववाद की झलक पाई जाती है। आयर्लैंड में स्वतंत्रता की भीषण पुकार के बीच ईट्स की रहस्यमयी कविवाणी भी सुनाई देती रही है। ठीक समय पर पहुँचकर हमारे यहाँ के कवींद्र – रवींद्र भी वहाँ के सुर में सुर मिला आए थे। पश्चिम के समालोचकों की समझ में वहाँ के इस काव्यगत सर्ववाद का संबंध लोकसत्तात्मक भावों के साथ है। इन भावों के प्रचार के साथ ही स्थूल गोचर पदार्थों के स्थान पर सूक्ष्म अगोचर भावना (ऐब्स्ट्रैक्शंस) की प्रवृत्ति हुई और वही काव्यक्षेत्र में जा कर भड़कीली और अस्फुट भावनाओं तथा चित्रों के विधान के रूप में प्रकट हुई।1

 

अद्वैतवाद मूल में एक दार्शनिक सिद्धांत है, कविकल्पना या भावना नहीं है। वह मनुष्य के बुद्धिप्रयास या तत्त्वचिंतन का फल है। वह ज्ञानक्षेत्र की वस्तु है। जब उसका आधार ले कर कल्पना या भावना उठ खड़ी होती है अर्थात् जब उसका संचार भावक्षेत्र में होता है तब उच्च कोटि के भावात्मक रहस्यवाद की प्रतिष्ठा होती है। रहस्यवाद दो प्रकार का होता है – भावात्मक और साधनात्मक। हमारे यहाँ का योगमार्ग साधनात्मक रहस्यवाद है। यह अनेक अप्राकृतिक और जटिल अभ्यासों द्वारा मन को अव्यक्त तथ्यों का साक्षात्कार कराने तथा साधक को अनेक अलौकिक सिद्धियाँ

 

1. द पैशन फार इनटेलेक्चुअल ऐब्सट्रैक्शंस, ह्नेन ट्रांसफर्ड टु द लिटरेचर आव इमैजिनेशन, विकम्स ए पैशन फार ह्वाट इज ग्रैंडियोज ऐंड वेग इन सेंटिमेंट ऐंड इन इमैजरी। ….द ग्रेट लारिएट आव यूरोपियन डिमाक्रेसी, विक्टर ह्यूगो, एग्जिबिट्स ऐटविंस द डिमाक्रैटिक लव आव ऐब्स्ट्रैक्ट आइडियाज, द डिमाक्रैटिक डिलाइट इन ह्वाट इज ग्रैंडियोज (ऐज वेल ऐज ह्वाट इज ग्रैंड) इन सेंटिमेंट, ऐंड द डिमाक्रैटिक टेंडेंसी टुवर्ड्स ए पोएटिकल पैनथेइज्म।

 

– डाउडेंस ‘न्यू स्टडीज इन लिटरेचर’ (इंट्रोडक्शन)

 

प्राप्त कराने की आशा देता है। तंत्र और रसायन भी साधनात्मक रहस्यवाद हैं, पर निम्न कोटि के। भावात्मक रहस्यवाद की भी कई श्रेणियाँ हैं जैसे, भूत प्रेत की सत्ता मान कर चलनेवाली भावना, परम सत्ता के रूप में एक ईश्वर की सत्ता मान कर चलनेवाली भावना स्थूल रहस्यवाद के अंतर्गत होगी। अद्वैतवाद या ब्रह्मवाद को ले कर चलनेवाली भावना से सूक्ष्म और उच्च कोटि के रहस्यवाद की प्रतिष्ठा होती है। तात्पर्य यह कि रहस्यभावना किसी विश्वास के आधार पर चलती है, विश्वास करने के लिए कोई नया तथ्य या सिद्धांत नहीं उपस्थित कर सकती। किसी नवीन ज्ञान का उदय उसके द्वारा नहीं हो सकता। जिस कोटि का ज्ञान या विश्वास होगा उसी कोटि की उससे उद्भूत रहस्यभावना होगी।

 

अद्वैतवाद का प्रतिपादन सबसे पहले उपनिषदों में मिलता है। उपनिषद् भारतीय ज्ञानकांड के मूल हैं। प्राचीन ऋषि तत्त्वचिंतन द्वारा ही अद्वैतवाद के सिद्धांत पर पहुँचे थे। उनमें इस ज्ञान का उदय बुद्धि की स्वाभाविक क्रिया द्वारा हुआ था, प्रेमोन्माद या बेहोशी की दशा में सहसा एक दिव्य आभास या इलहाम के रूप में नहीं। विविध धर्मों का इतिहास लिखनेवाले कुछ पाश्चात्य लेखकों ने उपनिषदों के ज्ञान को जो रहस्यवाद की कोटि में रखा है, वह उनका भ्रम या दृष्टिसंकोच हैं। बात यह है कि उस प्राचीन काल में दार्शनिक विवेचन को व्यक्त करने की व्यवस्थित शैली नहीं निकली थी। जगत और उसके मूल कारण का चिंतन करते करते जिस तथ्य तक वे पहुँचते थे उसकी व्यंजना अनेक प्रकार से वे करते थे। जैसे आजकल किसी गंभीर विचारात्मक लेख के भीतर कोई मार्मिक स्थल आ जाने पर लेखक की मनोवृत्ति भावोन्मुख हो जाती है और वह काव्य की भावात्मक शैली का अलंबन करता है उसी प्रकार उन प्राचीन ऋषियों को भी विचार करते करते गंभीर मार्मिक तथ्य पर पहुँचने पर कभी कभी भावोन्मेष हो जाता था और वे अपनी उक्ति का प्रकाश रहस्यात्मक और अनूठे ढंग से कर देते थे।

 

गीता के दसवें अध्‍याय में सर्ववाद का भावात्मक प्रणाली पर निरूपण है। वहाँ भगवान ने अपनी विभूतियों का जो वर्णन किया है वह अत्यंत रहस्यपूर्ण है। सर्ववाद को ले कर जब भक्त की मनोवृत्ति रहस्योन्मुख होगी तब वह अपने को जगत के नाना रूपों के सहारे उस परोक्ष सत्ता की ओर ले जाता हुआ जान पड़ेगा। वह खिले हुए फूलों में, शिशु के स्मित आनन में, सुंदर मेघमाला में, निखरे हुए चंद्रबिंब में उसके सौंदर्य का, गंभीर मेघगर्जन में, बिजली की कड़क में, वज्रपात में, भूकंप आदि प्राकृतिक विप्लवों में उसकी रौद्र मूर्ति का, संसार के असामान्य वीरों, परोपकारियों और त्यागियों में उसकी शक्ति, शील आदि का साक्षात्कार करता है। इस प्रकार अवतारवाद का मूल भी रहस्यभावना ही ठहरती है।

 

पर अवतारवाद के सिद्धांत रूप में गृहीत हो जाने पर राम और कृष्ण के व्यक्त ईश्वर विष्णु के अवतार स्थिर हो जाने पर रहस्यदशा की एक प्रकार से समाप्ति हो गई। फिर राम और कृष्ण का ईश्वर के रूप में ग्रहण व्यक्तिगत रहस्यभावना के रूप में नहीं रह गया। वह समस्त जनसमाज के धार्मिक विश्वास का एक अंग हो गया, इस व्यक्त जगत के बीच प्रकाशित राम कृष्ण की नरलीला भक्तों के भावोद्रेक का विषय हुई। अत: रामकृष्णोपासकों की भक्ति रहस्यवाद की कोटि में नहीं आ सकती।

 

यद्यपि समष्टि रूप में वैष्णवों की सगुणोपासना रहस्यवाद के अंतर्गत नहीं कही जा सकती, पर श्रीमद्भागवत के उपरांत कृष्णभक्ति को जो रूप प्राप्त हुआ उसमें रहस्यभावना की गुंजाइश हुई। भक्तों की दृष्टि से जब धीरे-धीरे श्रीकृष्ण का लोकसंग्रही रूप हटने लगा और वे प्रेममूर्तिमात्र रह गए तब उनकी भावना ऐकांतिक हो चली। भक्त लोग भगवान को अधिकतर अपने संबंध से देखने लगे, जगत के संबंध से नहीं। गोपियों का प्रेम जिस प्रकार एकांत और रूपमाधुर्यमात्र पर आश्रित था, उसी प्रकार भक्तों का भी हो चला। यहाँ तक कि कुछ स्‍त्री भक्तों में भगवान के प्रति उसी रूप का प्रेमभाव स्थान पाने लगा जिस रूप का गोपियों का कहा गया था। उन्होंने भगवान की भावना प्रियतम के रूप में की। बड़े बड़े मंदिरों में देवदासियों की जो प्रथा थी उससे इस ‘माधुर्यभाव’ को और भी सहारा मिला। माता-पिता कुमारी लड़कियों को मंदिर में दान कर आते थे, जहाँ उनका विवाह देवता के साथ हो जाता था। अत: उनके लिए उस देवता की भक्ति पतिरूप में ही विधेय थी। इन देवदासियों में से कुछ उच्च कोटि की भक्तिनें भी निकल आती थीं। दक्षिण में अंदाल इसी प्रकार की भक्तिन थी जिसका जन्म विक्रम संवत् 773 के आस पास हुआ था। वह बहुत छोटी अवस्था में किसी साधु को एक पेड़ के नीचे मिली थी। वह साधु भगवान का स्वप्न पा कर, इसे विवाह के वस्त्र पहना कर श्रीरंग जी के मंदिर में छोड़ आया था।

 

अंदाल के पद द्रविड़ भाषा में ‘तिरुप्पावइ’ नामक पुस्तक में अब तक मिलते हैं। अंदाल एक स्थान पर कहती है – ‘अब मैं पूर्ण यौवन को प्राप्त हूँ और स्वामी कृष्ण के अतिरिक्त और किसी को अपना पति नहीं बना सकती।’ पति या प्रियतम के रूप में भगवान की भावना को वैष्णव भक्तिमार्ग में ‘माधुर्य भाव’ कहते हैं। इस भाव की उपासना में रहस्य का समावेश अनिवार्य और स्वाभाविक है। भारतीय भक्ति का सामान्य स्वरूप रहस्यात्मक न होने के कारण इस ‘माधुर्य भाव’ का अधिक प्रचार नहीं हुआ। आगे चल कर मुसलमानी जमाने में सूफियों की देखादेखी इस भाव की ओर कृष्णभक्ति शाखा के कुछ भक्त प्रवृत्त हुए। इनमें मुख्य मीराबाई हुईं जो ‘लोकलाज खो कर’ अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के प्रेम में मतवाली रहा करती थीं। उन्होंने एक बार कहा था कि ‘कृष्ण को छोड़ और पुरुष है कौन? सारे जीव स्‍त्रीरूप हैं।’

 

सूफियों का असर कुछ और कृष्णभक्तों पर भी पूरा-पूरा पाया जाता है। चैतन्य महाप्रभु में सूफियों की प्रवृत्तियाँ साफ झलकती हैं। जैसे सूफी कव्वाल गाते-गाते हाल की दशा में हो जाते हैं वैसे ही महाप्रभु जी की मंडली भी नाचते-नाचते मूर्च्छित हो जाती थी। यह मूर्च्‍छा रहस्यवादी सूफियों की रूढ़ि है। इसी प्रकार मद, प्याला, उन्माद तथा प्रियतम ईश्वर के विरह की दुरारूढ़ व्यंजना भी सूफियों की बँधी हुई परंपरा है। इस परंपरा का अनुसरण भी कुछ पिछले कृष्णभक्तों ने किया। नागरीदास जी इश्क का प्याला पी कर बराबर झूमा करते थे। कृष्ण की मधुर मूर्ति ने कुछ आजाद सूफी फकीरों को भी आकर्षित किया। नजीर अकबरावादी ने खड़ी बोली के अपने बहुत से पद्यों में श्री कृष्ण का स्मरण प्रेमालंबन के रूप में किया है।

 

निर्गुण शाखा के कबीर, दादू आदि संतों की परंपरा में ज्ञान का जो थोड़ा बहुत अवयव है वह भारतीय वेदांत का है – पर प्रेमतत्त्व बिलकुल सूफियों का है। इनमें से दादू, दरियासाहब आदि तो खालिस सूफी ही जान पड़ते हैं। कबीर में ‘माधुर्य भाव’ जगह जगह पाया जाता है। वे कहते हैं –

 

हरि मोर पिय मैं राम की बहुरिया।

 

‘राम की बहुरिया’ कभी तो प्रिय से मिलने की उत्कंठा और मार्ग की कठिनता प्रकट करती है जैसे –

 

मिलना कठिन है, कैसे मिलौंगी पिय जाय?

 

समुझि सोचि पग धारौं जतन से, बार बार डगि जाय।

 

ऊँची गैल, राह रपटीली, पाँव नहीं ठहराय।

 

और कभी विरहदु:ख निवेदन करती है।

 

पहले कहा जा चुका है कि भारतवर्ष में साधनात्मक रहस्यवाद ही हठयोग, तंत्र और रसायन के रूप में प्रचलित था। जिस समय सूफी यहाँ आए उस समय उन्हें रहस्य की प्रवृत्ति हठयोगियों, रसायनियों और तांत्रिकों में ही दिखाई पड़ी। हठयोग की तो अधिकांश बातों का समावेश उन्होंने अपनी साधनापद्धति में कर लिया। पीछे कबीर ने भारतीय ब्रह्मवाद और सूफियों की प्रेमभावना को मिला कर जो ‘निर्गुण संत मत’ खड़ा किया, उसमें भी ‘इला, पिंगला, सुषम्ना नाड़ी’ तथा भीतरी चक्रों की पूरी चर्चा रही। हठयोगियों वा नाथपंथियों को दो मुख्य बातें सूफियों और निर्गुण मत वाले संतों को अपने अनुकूल दिखाई पड़ी। (1) रहस्य की प्रवृत्ति, (2) ईश्वर को केवल मन के भीतर समझना और ढूँढ़ना।

 

कहने की आवश्यकता नहीं कि ये दोनों बातें भारतीय भक्तिमार्ग से पूरा मेल खानेवाली नहीं थीं। अवतारवाद के सिद्धांत रूप से प्रतिष्ठित हो जाने के कारण भारतीय परंपरा का भक्त अपने उपास्य को बाहर लोक के बीच प्रतिष्ठित कर के देखता है, अपने हृदय के एकांत कोने में ही नहीं। पर फारस में भावात्मक अद्वैती रहस्यवाद खूब फैला। वहाँ की शायरी पर इसका रंग बहुत गहरा चढ़ा। खलीफा लोगों के कठोर धर्मशासन के बीच भी सूफियों की प्रेममयी वाणी ने जनता को भावमग्न कर दिया।

 

इसलाम के प्रारंभिक काल में ही भारत का सिंध प्रदेश ऐसे सूफियों का अड्डा रहा जो यहाँ वेदांतियों और साधेकों के सत्संग से अपने मार्ग की पुष्टि करते रहे। अत: मुसलमानों का साम्राज्य स्थापित हो जाने पर हिंदुओं और मुसलमानों के समागम से दोनों के लिए जो एक ‘सामान्य भक्तिमार्ग’ आविर्भूत हुआ वह अद्वैती रहस्यवाद को ले कर, जिसमें वेदांत और सूफी मत दोनों का मेल था। पहले पहल नामदेव ने, फिर रामानंद के शिष्य कबीर ने जनता के बीच इस ‘सामान्य भक्तिमार्ग’ की अटपटी वाणी सुनाई। नानक, दादू आदि कई साधक इस नए मार्ग के अनुयायी हुए, और ‘निर्गुण संत मत’ चल पड़ा। पर इधर यह निर्गुण भक्तिमार्ग निकला उधर भारत के प्राचीन ‘सगुण मार्ग’ ने भी, जो पहले से चला आ रहा था, जोर पकड़ा और राम कृष्ण की भक्ति का स्त्रोत बड़े वेग से हिंदू जनता के बीच बहा। दोनों की प्रवृत्ति में बड़ा अंतर यह दिखाई पड़ा कि एक तो लोकपक्ष से उदासीन हो कर केवल व्यक्तिगत साधना का उपदेश देता रहा पर दूसरा अपने प्राचीन स्वरूप के अनुसार लोकपक्ष को लिए रहा। ‘निर्गुन बानी’ वाले संतों के लोकविरोधी स्वरूप की गोस्वामी तुलसीदास जी ने अच्छी तरह पहचाना था।

 

जैसा कि अभी कहा जा चुका है, रहस्यवाद का स्फुरण सूफियों में पूरा-पूरा हुआ। कबीरदास में जो रहस्यवाद पाया जाता है वह अधिकतर सूफियों के प्रभाव के कारण। पर कबीरदास पर इस्लाम मे कट्टर एकेश्वरवाद और वेदांत के मायावाद का रूखा संस्कार भी पूरा-पूरा था। उनमें वाक्चातुर्य था, प्रतिभा थी, पर प्रकृति के प्रसार में भगवान की कला का दर्शन करनेवाली भावुकता न थी। इससे रहस्यमयी परोक्ष सत्ता की ओर संकेत करने के लिए जिन दृश्यों को वे सामने करते हैं वे अधिकतर वेदांत और हठयोग की बातों के खड़े किए हुए रूपक मात्र होते हैं। अत: कबीर में जो कुछ रहस्यवाद है वह सर्वत्र एक भावुक या कवि का रहस्यवाद नहीं है। हिंदी के कवियों में यदि कहीं रमणीय और सुंदर अद्वितीय रहस्यवाद है तो जायसी में, जिनकी भावुकता बहुत ही ऊँची कोटि की है। वे सूफियों की भक्तिभावना के अनुसार कहीं तो परमात्मा को प्रियतम के रूप में देख कर जगत के नाना रूपों में उस प्रियतम के रूपमाधुर्य की छाया देखते हैं और कहीं सारे प्राकृतिक रूपों और व्यापारों का ‘पुरुष’ के समागम के हेतु प्रकृति के श्रृंगार, उत्कंठा या विरहविकलता के रूप में अनुभव करते हैं। दूसरे प्रकार की भावना पदमावत में अधिक मिलती है।

 

आरंभ में कह आए हैं कि ‘पदमावत’ के ढंग के रहस्यवादपूर्ण प्रबंधों की परंपरा जायसी से पहले की है। मृगावती, मधुमालती आदि की रचना जायसी के पहले हो चुकी थी और उनके पीछे भी ऐसे रचनाओं की परंपरा चली। सबमें रहस्यवाद मौजूद है। अत: हिंदी के पुराने साहित्य में ‘रहस्यवादी कविसंप्रदाय’ यदि कोई कहा जा सकता है तो इन कहानी कहनेवाले मुसलमान कवियों को ही।

 

जायसी कवि थे और भारतवर्ष के कवि थे। भारतीय पद्धति के कवियों की दृष्टि फारसवालों की अपेक्षा प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों पर कहीं अधिक विस्तृत तथा उनके मर्मस्पर्शी स्वरूपों को कहीं अधिक परखनेवाली होती है। इससे उस रहम्यमयी सत्ता का आभास देने के लिए जायसी बहुत ही रमणीय और मर्मस्पर्शी दृश्यसंकेत उपस्थित करने में समर्थ हुए हैं। कबीर के चित्रों (इमैजरी) में न वह अनेकरूपता है, न वह मधुरता। देखिए, उस परोक्ष ज्योति और सौंदर्यसत्ता की ओर कैसी लौकिक दीप्ति और सौंदर्य के द्वारा जायसी संकेत करते है।

 

बहुतै जोति जोति ओहि भई।

 

रवि ससि, नखत दिपहिं ओहि जोती। रतन पदारथ मानिक मोती॥

 

जहँ जहँ बिहँसि सुभावहिं हँसी। तहँ तहँ छिटकि जोति परगसी॥

 

नयन जो देखा कँवल भा, निरमल नीर सरीर।

 

हँसत जो देखा हंस भा, दसनजोति नग हीर॥

 

प्रकृति के बीच दिखाई देनेवाली सारी दीप्ति उसी से है, इस बात का आभास पद्मावती के प्रति रत्नसेन के ये वाक्य दे रहे है।

 

अनु धनि! तू निसिअर निसि माहाँ। हौं दिनिअर जेहि कै तू छाहाँ॥

 

चाँदहिं कहाँ जोति औ करा। सुरुज के जोति चाँद निरमरा॥

 

अँगरेज कवि शेली की पिछली रचनाओं में इस प्रकार के रहस्यवाद की झलक बड़ी सुंदर दृश्यावली के बीच दिखाई देती है। स्‍त्रीत्व का आध्‍यात्मिक आदर्श उपस्थित करनेवाले (ऐपीसाइकीडियन) में प्रिया की मधुर वाणी प्रकृति के क्षेत्र में कहाँ-कहाँ सुनाई पड़ती है –

 

इन सालीटयूड्स,

 

हर वायस केम टु मी थ्रू द ह्निस्परिंग उड्स,

 

ऐंड फ्राम द फाउण्टेंस, ऐंड दि ओडर्स डीप

 

आव फ्लावर्स ह्निच, लाइक लिप्स मरमरिंग इन देयर स्लीप

 

आव द स्वीट किसेज ह्निच हैड लल्ड देम देयर,

 

ब्रीद्ड बट आव हर टु दि इनैमर्ड ऐअर;

 

ऐंड फ्राम द ब्रीजेज, ह्नेदर लो आर लाउड,

 

ऐंड फ्राम द रेन आव एव्री पासिंग क्लाउड,

 

ऐंड फ्राम द सिंगिंग आव द समर बड्र्स,

 

ऐंड फ्राम आल साउंड्स आल साइलेंस।

 

भावार्थ – निर्जन स्थानों के बीच मर्मर करते हुए काननों में, झरनों में, उन पुष्पों की परागगन्ध में जो उस दिव्य चुंबन के सुखस्पर्श से सोए हुए कुछ बर्राते से मुग्‍ध पवन को उसका परिचय दे रहे हैं; इसी प्रकार मंद या तीव्र समीर में, प्रत्येक दौड़ते हुए मेघखंड की झंडी में, वसंत के विहंगमों के कलकूजन में तथा प्रत्येक ध्‍वनि में और नि:स्तब्धता में भी वाणी सुनता हूँ।

 

कबीरदास में यह बात नहीं है। उन्हें बाहर जगत में भगवान की रूपकला नहीं दिखाई देती। वे सिद्धों और योगियों के अनुकरण पर ईश्वर को केवल अंतस् में बताते हैं –

 

मो को कहाँ ढूँढ़ै बंदे मैं तो तेरे पास में।

 

ना मैं देवल ना मैं मसजिद ; ना काबे कैलास में॥

 

जायसी भी उसे भीतर बताते हैं –

 

पिउ हिरदय महँ भेंट न होई। को रे मिलाव, कहौं केहि रोइ!

 

पर, जैसा कि पहले दिखा चुके हैं, वे उसके रूप की छटा प्रकृति के नाना रूपों में भी देखते हैं।

 

मानस के भीतर उस प्रियतम के सामीप्य से उत्पन्न कैसे अपरिमित आनंद की, कैसे विश्वव्यापी आनंद की, व्यंजना जायसी की इन पंक्तियों में है –

 

देखि मानसर रूप सोहावा। हिय हुलास पुरइनि होइ छावा॥

 

गा अँधियार रैनि मसिछूटी। भा भिनसार किरिन रवि फूटी॥

 

कँवल बिगस तत बिहँसी देही। भँवर दसन होइ कै रस लेहीं॥

 

देखि अर्थात् उस अखंड ज्योति का आभास पा कर वह मानसर (मानसरोवर और हृदय) जगमगा उठा। देखिए न, खिले कमल के रूप में उल्लास मानसर में चारों ओर फैला है। उस ज्योति के साक्षात्कार से अज्ञान छूट गया – प्रभात हुआ, पृथ्वी पर से अंधकार हट गया। आनंद से चेहरा (देही, बदन, मुँह) खिल उठा, बत्तीसी निकल आई1 – कमल खिल उठे और उन पर भौंरे दिखाई दे रहे हैं। अंतर्जगत् और बाह्यजगत का कैसा अपूर्व सामंजस्य है, कैसी बिंबप्रतिबिंब स्थिति है!

 

उस प्रियतम पुरुष के प्रेम से प्रकृति कैसी बिद्ध दिखाई देती है –

 

उन्ह बानन्ह अस को जो न मार? बेधि रहा सगरौ संसारा॥

 

गगन नखत जो जाहि न गने। वै सब बान ओहि के हने॥

 

धरती बान बेधि सब राखी। साखी ठाढ़ देहिं सब साखी॥

 

रोवँ रोवँ मानुष तन ठाढ़े। सूतहि सूत बेध अस गाढ़े॥

 

बरुनि चाप अस ओपहँ, बेधो रन बन ढाँख।

 

सौजहि तन सब रोवाँ, पंखिहि तन सब पाँख॥

 

पृथ्वी और स्वर्ग, जीव और ईश्वर, दोनों एक थे, बीच में न जाने किसने इतना भेद डाल दिया है –

 

धरती सरग मिले हुत दोऊ। केइ निनार कै दीन्ह बिछोऊ।

 

जो इस पृथ्वी और स्वर्ग के वियोगत्व को समझेगा और उस वियोग में पूर्णरूप

 

1. एक स्थान पर जायसी ने कहा है – ‘मसि बिनु दसन सोह नहिं देहीं।’ लखनऊ में मर्द लोग भी मिस्सी से दाँत काले करते हैं। पान के रंग से भी दाँतों पर स्याही चढ़ जाती है।

 

से सम्मिलित होगा उसी को वियोग सारी सृष्टि में इस प्रकार फैला दिखाई देगा –

 

सूरुज बूड़ि उठा होइ ताता। औ मजीठ टेसू बन राता॥

 

भा बसंत, रातीं बनसपती। औ राते सब जोगी जती॥

 

पुहुमि जो भीजि भएउ सब गेरू। औ राते सब पंखि पखेरू॥

 

राती सती, अगिनि सब काया। गगन मेघ राते तेहि छाया॥

 

सायं प्रभात न जाने कितने लोग मेघखंडों को रक्तवर्ण होते देखते हैं पर किस अनुराग से वे लाल हैं इसे जायसी जैसे रहस्यदर्शी भावुक ही समझते हैं।

 

प्रकृति के सारे महाभूत उस ‘अमरधाम’ तक पहुँचने का बराबर प्रयत्न करते रहते हैं पर साधना पूरी हुए बिना पहुँचना असंभव है –

 

धाइ जो बाजा कै मन साधा। मारा चक्र, भएउ दुइ आधा ॥

 

चाँद सुरुज औ नखत तराईं। तेहि डर अँतरिख फिरहिं सबाईं॥

 

पवन जाइ तहँ पहुँचै चहा। मारा तैस लोटि भुइँ रहा॥

 

अगिनि उठी, जरि बुझी निआना। धुँआ उठा, उठि बीच बिलाना॥

 

पानि उठा, उठि जाइ न छूआ1। बहुरा रोइ, आइ भुइ चूआ॥

 

इस अद्वैती रहस्यवाद के अतिरिक्त जायसी कहीं – कहीं उस रहस्यवाद में आ फँसे हैं जो पाश्चात्यों की दृष्टि में ‘झूठा रहस्यवाद’ है। उन्होंने स्थान-स्थान पर हठयोग, रसायन आदि का भी आश्रय लिया है।

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