लेख – काव्य और सृष्टि प्रसार – (लेखक – रामचंद्र शुक्ल )

· May 1, 2014

RamChandraShukla_243172हृदय पर नित्य प्रभाव रखनेवाले रूपों और व्यापारों को भावना के सामने लाकर कविता बाह्य प्रकृति के साथ मनुष्य की अंत:प्रकृति का सामंजस्य घटित करती हुई उसकी भावात्मक सत्ता के प्रसार का प्रयास करती है। यदि अपने भावों को समेटकर मनुष्य अपने हृदय को शेष सृष्टि से किनारे कर ले या स्वार्थ की पशुवृत्ति में ही लिप्त रखे तो उसकी मनुष्यता कहाँ रहेगी? यदि वह लहलहाते हुए खेतों और जंगलों, हरी घास के बीच घूम-घूमकर बहते हुए नालों, काली चट्टानों पर चाँदी की तरह ढलते हुए झरनों, मंजरियों से लदी हुई अमराइयों और पटपर के बीच खड़ी झाड़ियों को देख क्षण भर लीन न हुआ, यदि कलरव करते हुए पक्षियों के आनंदोत्सव में उसने योग न दिया, यदि खिले हुए फूलों को देख वह न खिला, यदि सुंदर रूप सामने पाकर अपनी भीतरी कुरूपता का उसने विसर्जन न किया, यदि दीन दु:खी का आर्त्तरनाद सुन वह न पसीजा, यदि अनाथों और अबलाओं पर अत्याचार होते देख क्रोध से न तिलमिलाया, यदि किसी बेढब और विनोदपूर्ण दृश्य या उक्ति पर न हँसा तो उसके जीवन में रह क्या गया? इस विश्वऔकाव्य की रसधारा में जो थोड़ी देर के लिए निमग्न न हुआ उसके जीवन को मरुस्थल की यात्रा ही समझना चाहिए।

काव्यदृष्टि कहीं तो

(1) नरक्षेत्र के भीतर रहती है,

(2) कहीं मनुष्येतर बाह्य सृष्टि के और

(3) कहीं समस्त चराचर के।

 

(1) पहले नरक्षेत्र को लेते हैं। संसार में अधिकतर कविता इसी क्षेत्र के भीतर हुई है। नरत्व की बाह्य प्रकृति और अंत:प्रकृति के नाना संबंधों और पारस्परिक विधानों का संकलन या उद्भावना ही काव्यों में-मुक्तक हों या प्रबंध-अधिकतर पाई जाती है।

 

प्राचीन महाकाव्यों और खंडकाव्यों के मार्ग में यद्यपि शेष दो क्षेत्र भी बीच-बीच में पड़ जाते हैं पर मुख्य यात्रा नरक्षेत्र के भीतर ही होती है। वाल्मीकि रामायण में यद्यपि बीच-बीच में ऐसे विशद वर्णन बहुत कुछ मिलते हैं जिनमें कवि की मुग्ध दृष्टि प्रधानत: मनुष्येतर बाह्य प्रकृति के रूपजाल में फँसी पाई जाती है, पर उसका प्रधान विषय लोकचरित्र ही है और प्रबन्धकाव्यों के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है। रहे मुक्तक या फुटकर पद्य, वे भी अधिकतर मनुष्य ही की भीतरी बाहरी वृत्तियों से संबंध रखते हैं। साहित्य शास्त्र की रसनिरूपण पद्धति मंष आलम्बनों के बीच बाह्य प्रकृति को स्थान ही नहीं मिला है। वह उद्दीपन मात्र मानी गई है। श्रंगार के उद्दीपन रूप में जो प्राकृतिक दृश्य लाए जाते हैं उनके प्रति रतिभाव नहीं होता; नायक या नायिका के प्रति होता है। वे दूसरे के प्रति उत्पन्न प्रीति को उद्दीप्त करने वाले होते हैं; स्वयं प्रीति के पात्र या आलम्बन नहीं होते। संयोग में वे सुख बढ़ाते हैं और वियोग में काटने दौड़ते हैं। जिस भावोद्रेक और जिस ब्योरे के साथ नायक या नायिका के रूप का वर्णन किया जाता है उस भावोद्रेक और उस ब्योरे के साथ उनका नहीं। कहीं-कहीं तो उनके नाम गिनाकर ही काम चला लिया जाता है।

 

मनुष्यों के रूप, व्यापार या मनोवृत्तियों के सादृश्य, साधर्म्य की दृष्टि से जो प्राकृतिक वस्तु व्यापार आदि लाए जाते हैं उनका स्थान भी गौण ही समझना चाहिए। वे नर संबंधी भावना को ही तीव्र करने के लिए रखे जाते हैं।

 

(2) मनुष्येतर बाह्य प्रकृति का आलम्बन के रूप में ग्रहण हमारे यहाँ संस्कृत के प्राचीन प्रबन्धकाव्यों के बीच-बीच में ही पाया जाता है। कहाँ प्रकृति का ग्रहण आलम्बन के रूप में हुआ है, इसका पता वर्णन की प्रणाली से लग जाता है। पहले कह आए हैं कि किसी वर्णन में आई हुई वस्तुओं का मन में ग्रहण दो प्रकार का हो सकता है-बिंबग्रहण और अर्थग्रहण।1 किसी ने कहा ‘कमल’। अब इस ‘कमल’ पद का ग्रहण कोई इस प्रकार भी कर सकता है कि ललाई लिए हुए सफेद पंखुड़ियों

 

1. देखिए, काव्य में प्राकृतिक दृश्य, निबंध।

 

और झुके हुए नाल आदि के सहित एक फूल की मूर्ति मन में थोड़ी देर के लिए आ जाय या कुछ देर बनी रहे; और इस प्रकार भी कर सकता है कि कोई चित्र उपस्थित न हो; केवल पद का अर्थ मात्र समझकर काम चला लिया जाय। काव्य के दृश्य चित्रण में पहले प्रकार का संकेतग्रहण अपेक्षित होता है और व्यवहार तथा शास्त्रचर्चा में दूसरे प्रकार का। बिंबग्रहण वहीं होता है जहाँ कवि अपने सूक्ष्म निरीक्षण द्वारा वस्तुओं के अंग-प्रत्यंग, वर्ण, आकृति तथा उनके आसपास की परिस्थिति का परस्पर संश्लिष्टव विवरण देता है। बिना अनुराग के ऐसे सूक्ष्म ब्योरों पर न दृष्टि जा ही सकती है, न रम ही सकती है। अत: जहाँ ऐसा पूर्ण संश्लिष्टस चित्रण मिले वहाँ समझना चाहिए कि कवि ने बाह्य प्रकृति को आलम्बन के रूप में ग्रहण किया। उदाहरण के लिए वाल्मीकि का यह हेमंत वर्णन लीजिए-

 

अवश्याय निपातेन किद्बिचत्प्रक्लिन्नशाद्वला।

वनानां शोभते भूमिर्निविष्टतरुणातपा

स्पृशंस्तु विपुलं शीतमुदकं द्विरद:: सुखम्।

अत्यन्ततृषितो वन्य: प्रतिसंहरते करम्॥

अवश्याय तमोनद्धा नीहार तमसावृता :।

प्रसुप्ता इव लक्ष्यन्ते विपुष्पा वनराजय ॥

वाष्पसंछन्नसलिला रुतविज्ञेयसारसा : ।

हिमार्द्रबालुकैस्तीरै सरितो भान्ति साम्प्रतम्॥

जरा जर्जरितै पद्मै: शीर्णकेसरकर्णिका : ।

नालशेषैर्हिम ध्व स्तैर्न भान्ति कमलाकरा:॥

(रामायण अरण्यकांड, सर्ग 16)

 

मनुष्येतर बाह्य प्रकृति का इसी रूप में ग्रहण ‘कुमारसंभव’ के आरंभ तथा ‘रघुवंश’ के बीच बीच में मिलता है। नाटक यद्यपि मनुष्य ही की भीतरी बाहरी वृत्तियों के प्रदर्शन के लिए लिखे जाते हैं और भवभूति अपने मार्मिक और तीव्र अन्तवृत्तिविधान के लिए ही प्रसिद्ध हैं, पर उनके ‘उत्तररामचरित’ में कहीं कहीं बाह्य प्रकृति के बहुत ही सांग और संश्लिष्टल खंड चित्र पाए जाते हैं। पर मनुष्येतर बाह्य प्रकृति को जो प्रधानता ‘मेघदूत’ में मिली है वह संस्कृत के और किसी काव्य में नहीं। ‘पूर्वमेघ’ तो यहाँ से वहाँ तक प्रकृति की ही एक मनोहर झाँकी या भारतभूमि के

 

1. वन की भूमि, जिसकी हरी-हरी घास ओस गिरने से कुछ गीली हो गई है, तरुण धूप के पड़ने से कैसी शोभा दे रही है। अत्यंत प्यासा जंगली हाथी बहुत शीतल जल के स्पर्श से अपनी सूँड़ सिकोड़ लेता है। बिना फूल के वनसमूह कुहरे के अंधकार में सोए से जान पड़ते हैं। नदियाँ, जिनका जल कुहरे से ढका हुआ है और जिनमें सारस पक्षियों का पता केवल उनके शब्द से लगता है, हिम से आर्द्र बालू के तटों से ही पहचानी जाती हैं। कमल जिनके पत्तेश जीर्ण होकर झड़ गए हैं जिनकी केसरकर्णिकाएँ टूटफूटकर छितरा गई हैं, पाले से धवस्त होकर नाल मात्र खड़े हैं।

 

स्वरूप का ही मधुर ध्याड़न है। जो इस स्वरूप के ध्याएन में अपने को भूलकर कभी कभी मग्न हुआ करता है वह घूम-घूमकर वक्तृता दे या न दे, चंदा इकट्ठा करे या न करे, देशवासियों की आमदनी का औसत निकाले या न निकाले, सच्चा देशप्रेमी है। मेघदूत न कल्पना की क्रीड़ा है न कला की विचित्रता। वह है प्राचीन भारत के सबसे भावुक हृदय की अपनी प्यारी भूमि की रूपमाधुरी पर सीधी सादी प्रेमदृष्टि।

अनंत रूपों में प्रकृति हमारे सामने आती है-कहीं मधुर, सुसज्जित या सुंदर रूप में; कहीं रूखे, बेडौल या कर्कश रूप में; कहीं भव्य, विशाल या विचित्र रूप में; कहीं उग्र, कराल या भयंकर रूप में। सच्चे कवि का हृदय उसके इन सब रूपों में लीन होता है क्योंकि उसके अनुराग का कारण अपना खास सुखभोग नहीं, बल्कि चिरसाहचर्य द्वारा प्रतिष्ठित वासना है। जो केवल प्रफुल्लप्रसूनप्रसार के सौरभ-संचार, मकरंद लोलुपमधुपगुंजार, कोकिलकूजित निकुंज और शीतल सुखस्पर्श समीर इत्यादि की ही चर्चा किया करते हैं वे विषयी भोगलिप्सु हैं। इसी प्रकार जो केवल मुक्ताभासहिमबिंदुमंडित मरकताभशाद्वलजाल, अत्यंत विशाल गिरिशिखर से गिरते हुए जलप्रपात के गंभीर गर्त से उठी हुई सीकर नीहारिका के बीच विविधवर्णस्फुरण की विशालता, भव्यता और विचित्रता में ही अपने हृदय के लिए कुछ पाते हैं वे तमाशबीन हैं-सच्चे भावुक या सहृदय नहीं। प्रकृति के साधारण असाधारण सब प्रकार के रूपों में रमानेवाले वर्णन हमें वाल्मीकि, कालिदास, भवभूति आदि संस्कृत के प्राचीन कवियों में मिलते हैं। पिछले खेवे के कवियों ने मुक्तक रचना में तो अधिकतर प्राकृतिक वस्तुओं का अलग अलग उल्लेख मात्र उद्दीपन की दृष्टि से किया है। प्रबंध रचना में जो थोड़ा बहुत संश्लिष्टल चित्रण किया है वह प्रकृति की विशेष रूप विभूति को लेकर ही। अँगरेजी के पिछले कवियों में वर्ड्सवर्थ की दृष्टि सामान्य, चिर परिचित, सीधे साधे प्रशांत और मधुर दृश्यों की ओर रहती थी, पर शेली की असाधारण, भव्य और विशाल की ओर।

 

साहचर्य संभूत रस के प्रभाव से सामान्य सीधे सादे चिर परिचित दृश्यों में कितने माधुर्य की अनुभूति होती है! पुराने कवि कालिदास ने वर्षा के प्रथम जल से सिक्त तुरंत की जोती हुई धरती तथा उसके पास बिखरी हुई भोली चितवनवाली ग्रामवनिताओं में, साफ सुथरे ग्रामचैत्यों और कथाकोविद ग्रामवृद्धों में इसी प्रकार के माधुर्य का अनुभव किया था। आज भी इसका अनुभव लोग करते हैं। बाल्य या कौमार अवस्था में जिस पेड़ के नीचे हम अपनी मंडली के साथ बैठा करते थे, चिड़चिड़ी बुढ़िया की जिस झोपड़ी के पास से होकर हम आते जाते थे उनकी मधुर स्मृति हमारी भावना को बराबर लीन किया करती है। बुढि़या की झोपड़ी में न कोई चमक दमक थी, न कला कौशल का वैचित्रय। मिट्टी की दीवारों पर फूस का छप्पर

 

1. मेघदूत, पूर्वमेघ, 16, 32।

पड़ा था, नींव के किनारे चढ़ी हुई मिट्टी पर सत्यानासी के नीलाभहरित कटीले कटावदार पौधे खड़े थे जिनके पीले फूलों के गोल संपुटों के बीच लाल लाल बिंदियाँ झलकती थीं।

 

जो केवल अपने विलास या शरीर सुख की सामग्री ही प्रकृति में ढूँढ़ा करते हैं उनमें रस रागात्मक ‘सत्वा’ की कमी है जो व्यक्त सत्ता मात्र के साथ एकता की अनुभूति में लीन करके हृदय के व्यापकत्व का आभास देता है। संपूर्ण सत्ताएँ एक ही परम सत्ता और संपूर्ण भाव एक ही परम भाव के अंतर्भूत हैं। अत: बुद्धि की क्रिया से हमारा ज्ञान जिस अद्वैत भूमि पर पहुँचता है उसी भूमि तक हमारा भावात्मक हृदय भी इस सत्वरस के प्रभाव से पहुँचता है। इस प्रकार अंत में जाकर दोनों पक्षों की वृत्तियों का समन्वय हो जाता है। इस समन्वय के बिना मनुष्यत्व की साधना पूरी नहीं हो सकती।

 

मनुष्येतर प्रकृति के बीच के रूप व्यापार कुछ भीतरी भावों या तथ्यों की भी व्यंजना करते हैं। पशु पक्षियों के सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, राग-द्वेष, तोष-क्षोभ, कृपा-क्रोध इत्यादि भावों की व्यंजना जो उनकी आकृति, चेष्टा, शब्द आदि से होती है, वह तो प्राय: बहुत प्रत्यक्ष होती है। कवियों को उन पर अपने भावों का आरोप करने की आवश्यकता प्राय: नहीं होती। तथ्यों का आरोप या संभावना अलबत वे कभी कभी किया करते हैं। पर इस प्रकार का आरोप कभी कभी कथन को ‘काव्य’ के क्षेत्र से घसीटकर ‘सूक्ति’ या ‘सुभाषित’ के क्षेत्र में डाल देता है। जैसे, ‘कौवे सबेरा होते ही क्यों चिल्लाने लगते हैं? वे समझते हैं कि सूर्य अंधकार का नाश करता बढ़ा आ रहा है, कहीं धोखे में हमारा भी नाश न कर दे।’1 यह सूक्ति मात्र है, काव्य नहीं। जहाँ तथ्य केवल आरोपित या संभावित रहते हैं वहाँ वे अलंकार रूप में ही रहते हैं। पर जिन तथ्यों का आभास हमें पशु पक्षियों के रूप, व्यापार या परिस्थिति में ही मिलता है वे हमारे भावों के विषय वास्तव में हो सकते हैं। मनुष्य सारी पृथ्वी छेकता चला जा रहा है। जंगल कट कटकर खेत, गाँव और नगर बनते चले जा रहे हैं। पशुपक्षियों का भाग छिनता चला जा रहा है। उनके सब ठिकानों पर हमारा निष्ठुर अधिकार होता चला जा रहा है। वे कहाँ जायँ? कुछ तो हमारी गुलामी करते हैं। कुछ हमारी बस्ती के भीतर या आसपास रहते हैं और छीन झपटकर अपना हक ले जाते हैं। हम उनके साथ बराबर ऐसा ही व्यवहार करते हैं मानो उन्हें जीने का कोई अधिकार ही नहीं है। इन तथ्यों का सच्चा आभास हमें उनकी परिस्थिति से मिलता है। अत: उनमें से किसी की चेष्टा विशेष में इन तथ्यों की मार्मिक व्यंजना की प्रतीति काव्यानुभूति के अंतर्गत होगी। यदि कोई बंदर हमारे सामने से कोई

खाने पीने की चीज उठा ले जाय और किसी पेड़ के ऊपर बैठा बैठा हमें घुड़की दे,

 

1. वयं काका वयं काका जल्पन्तीति प्रगेद्विका:।

तिमिरारिस्तमो हन्यादिति शङ्कितमानसा:॥

 

तो काव्यदृष्टि से हमें ऐसा मालूम हो सकता है कि-

देते हैं घुड़की यह अर्थ ओज भरी हरि

 

‘जीने का हमारा अधिकार क्या न गया रह?

पर-प्रतिषेधके प्रसार बीच तेरे, नर!

 

क्रीड़ामय जीवन उपाय है हमारा यह।

दानी जो हमारे रहे, वे भी दास तेरे हुए,

 

उनकी उदारता भी सकता नहीं तू सह।

फूली फली उनकी उमंग उपकार की तू

छेकता है जाता, हम जायँ कहाँ, तू ही कह!’1

 

पेड़-पौधो, लता, गुल्म आदि भी इसी प्रकार कुछ भावों या तथ्यों की व्यंजना करते हैं जो कभी कभी कुछ गूढ़ होती है। सामान्य दृष्टि भी वर्षा की झड़ी के पीछे उनके हर्ष और उल्लास को; ग्रीष्म के प्रचंड आतप में उनकी शिथिलता और म्लानता को; शिशिर के कठोर शासन में उनकी दीनता को; मधुकाल में उनके रसोन्माद, उमंग और हास को, प्रबल वात के झकोरों में उनकी विकलता को, प्रकाश के प्रति उनकी ललक को देख सकती है। इसी प्रकार भावुकों के समक्ष वे अपनी रूपचेष्टा आदि द्वारा कुछ मार्मिक तथ्यों की भी व्यंजना करते हैं। हमारे यहाँ के पुराने अन्योक्तिकारों ने कहीं कहीं इस व्यंजना की ओर ध्या न दिया है। ‘कहीं कहीं’ का मतलब यह है कि बहुत जगह उन्होंने अपनी भावना का आरोप किया है, उनकी रूपचेष्टा या परिस्थिति से तथ्यचयन नहीं। पर उनकी विशेष परिस्थितियों की ओर भावुकता से ध्यानन देने पर बहुत से मार्मिक तथ्य सामने आते हैं। कोसों तक फैली कड़ी धूप में तपते मैदान के बीच एक अकेला वट वृक्ष दूर तक छाया फैलाए खड़ा है। हवा के झोंकों से उसकी टहनियाँ और पत्ते हिलहिलकर मानो बुला रहे हैं। हम धूप से व्याकुल होकर उसकी ओर बढ़ते हैं। देखते हैं उनकी जड़ के पास एक गाय बैठी ऑंख मूँदे जुगाली कर रही है। हम लोग भी उसी के पास आराम से जा बैठते हैं। इतने में एक कुत्ता जीभ बाहर निकाले हाँफता हुआ उस छाया के नीचे आता है और हममें से कोई उठकर उसे छड़ी लेकर भगाने लगता है। इस परिस्थिति को देख हममें से कोई भावुक पुरुष उस पेड़ को इस प्रकार संबोधन करे तो कर सकता है-

 

काया की न छाया यह केवल तुम्हारी, द्रुम !

अंतस् के मर्म का प्रकाश यह छाया है।

भरी है इसी में वह स्वर्ग स्वप्न धार, अभी

जिसमें न पूरा पूरा नर बह पाया है।

शांतिसार शीतल प्रसार यह छाया धान्य !

प्रीति सा पसारे इसे कैसी हरी काया है।

1. देखिए, ‘हृदय का मधुर भार’।

हे नर ! तू प्यारा इस तरु का स्वरूप देख,

देख फिर घोर रूप तूने जो कमाया है॥ 1

 

ऊपर नरक्षेत्र और मनुष्येतर सजीव सृष्टि के क्षेत्र का उल्लेख हुआ है। काव्य दृष्टि कभी तो इन पर अलग अलग रहती है और कभी समष्टि रूप में समस्त जीवन क्षेत्र पर। कहने की आवश्यकता नहीं कि विच्छिन्न दृष्टि की अपेक्षा समष्टि दृष्टि में अधिक व्यापकता और गंभीरता रहती है। काव्य का अनुशीलन करनेवाले मात्र जानते हैं कि काव्यदृष्टि सजीव सृष्टि तक ही बद्ध नहीं रहती। वह प्रकृति के उस भाग की ओर भी जाती है जो निर्जीव या जड़ कहलाता है। भूमि, पर्वत, चट्टान, नदी, नाले, टीले, मैदान, समुद्र, आकाश, मेघ, नक्षत्र इत्यादि की रूपगति आदि से भी हम सौंदर्य, माधुर्य, भीषणता, भव्यता, विचित्रता, उदासी, उदारता, संपन्नता इत्यादि की भावना प्राप्त करते हैं। कड़कड़ाती धूप के पीछे उमड़ी हुई घटा की श्यामल स्निग्धता और शीतलता का अनुभव मनुष्य क्या पशु पक्षी, पेड़ पौधे तक करते हैं। अपने इधर उधर हरी भरी लहलहाती प्रफुल्लता का विधान करती हुई नदी की अविराम जीवनधारा में हम द्रवीभूत औदार्य का दर्शन करते हैं। पर्वत की ऊँची चोटियों में विशालता और भव्यता का; वात विलोड़ित जल प्रसार में क्षोभ और आकुलता का, विकीर्ण घनखण्ड मंडित, रश्मि रंजित सांध्यस दिगंचल में चमत्कारपूर्ण सौंदर्य का, ताप से तिलमिलाती धारा पर धूल झोंकते हुए अंधड़ के प्रचंड झोंकों में उग्रता और उच्छृंखलता का; बिजली की कँपानेवाली कड़क और ज्वालामुखी के ज्वलंत स्फोट में भीषणता का आभास मिलता है। ये सब विश्वकरूपी महाकाव्य की भावनाएँ या कल्पनाएँ हैं। स्वार्थभूमि से परे पहुँचे हुए सच्चे अनुभूति-योगी या कवि इनके द्रष्टा मात्र होते हैं।

जड़ जगत् के भीतर पाए जानेवाले रूप, व्यापार या परिस्थितियाँ अनेक मार्मिक तथ्यों की भी व्यंजना करती हैं। जीवन के तथ्यों के साथ उनके साम्य का बहुत अच्छा मार्मिक उद्धाटन कहीं कहीं हमारे यहाँ के अन्योक्तिकारों ने किया है। जैसे, इधर नरक्षेत्र के बीच देखते हैं तो सुख समृद्धि और संपन्नता की दशा में दिन रात घेरे रहनेवाले, स्तुति का खासा कोलाहल खड़ा करनेवाले, विपत्ति और दुर्दिन में पास नहीं फटकते; उधार जड़जगत् के भीतर देखते हैं तो भरे हुए सरोवर के किनारे जो पक्षी बराबर कलरव करते रहते हैं वे उसके सूखने पर अपना अपना रास्ता लेते हैं-

 

कोलाहल सुनि खगन के, सरवर! जनि अनुरागि।

ये सब स्वारथ के सखा, दुर्दिन दैहैं त्यागि।

दुर्दिन दैहैं त्यागि, तोय तेरो जब जैहै।

दूरहि ते तजि आस, पास कोऊ नहि ऐहै॥ 2

 

1. देखिए, ‘हृदय कामधुर भार’।

2. अन्योक्ति कल्पद्रुम, प्रथम शाखा, 41।

 

इसी प्रकार सूक्ष्म और मार्मिक दृष्टिवालों को और गूढ़ व्यंजना भी मिल सकती है। अपने इधर उधार हरियाली और प्रफुल्लता का विधान करने के लिए यह आवश्यक है कि नदी कुछ काल तक एक बँधी हुई मर्यादा के भीतर बहती रहे। वर्षा की उमड़ी हुई उच्छृंखलता में पोषित हरियाली और प्रफुल्लता का ध्वं स सामने आता है। पर यह उच्छृंखलता और ध्वंपस अल्पकालिक होता है और इसके द्वारा आगे के लिए पोषण की नई शक्ति का संचय होता है। उच्छृंखलता नदी की स्थायी वृत्ति नहीं है। नदी के इस स्वरूप के भीतर सूक्ष्म मार्मिक दृष्टि लोकगति के रूप का साक्षात्कार करती है। लोकजीवन की धारा जब एक बधे मार्ग पर कुछ काल तक अबाध गति से चलने पाती है तभी सभ्यता के किसी रूप का पूर्ण विकास और उसके सुख शांति की प्रतिष्ठा होती है। जब जीवन प्रवाह क्षीण और अशक्त पड़ने लगता है और गहरी विषमता आने लगती है तब नई शक्ति का प्रवाह फूट पड़ता है जिसके वेग की उच्छृंखलता के सामने बहुत कुछ ध्वं स भी होता है। पर यह उच्छृंखलता का वेग जीवन का या जगत् का नित्य स्वरूप नहीं है।

 

(3) पहले कहा जा चुका है कि नरक्षेत्र के भीतर बद्ध रहने वाली काव्य-दृष्टि की अपेक्षा संपूर्ण जीवन क्षेत्र और समस्त चराचर के क्षेत्र से मार्मिक तथ्यों का चयन करने वाली दृष्टि उत्तरोत्तर अधिक व्यापक और गंभीर कही जाएगी। जब कभी हमारी भावना का प्रसार इतना विस्तीर्ण और व्यापक होता है कि हम अनंत व्यक्त सत्ता के भीतर नरसत्ता के स्थान का अनुभव करते हैं तब हमारी पार्थक्य बुद्धि का परिहार हो जाता है। उस समय हमारा हृदय ऐसी उच्च भूमि पर पहुँचा रहता है जहाँ उसकी वृत्ति प्रशांत और गंभीर हो जाती है, उसकी अनुभूति का विषय ही कुछ बदल जाता है।

 

तथ्य चाहे नरक्षेत्र के ही हों, चाहे अधिक व्यापक क्षेत्र के हों, कुछ प्रत्यक्ष होते हैं और कुछ गूढ़। जो तथ्य हमारे किसी भाव को उत्पन्न करें उसे उस भाव का आलम्बन कहना चाहिए। ऐसे रसात्मक तथ्य आरंभ में ज्ञानेंद्रियाँ उपस्थित करती हैं। फिर ज्ञानेंद्रियों द्वारा प्राप्त सामग्री से भावना या कल्पना उनकी योजना करती है। अत: यह कहा जा सकता है कि ज्ञान ही भावों के संचार के लिए मार्ग खोलता है। ज्ञान प्रसार के भीतर ही भावप्रसार होता है। आरंभ में मनुष्य की चेतन सत्ता अधिकतर इंद्रियज ज्ञान की समष्टि के रूप में ही रही। फिर ज्यों ज्यों अंत:करण का विकास होता गया और सभ्यता बढ़ती गई त्यों त्यों मनुष्य का ज्ञान बुद्धिव्यवसायात्मक होता गया। अब मनुष्य का ज्ञानक्षेत्र बुद्धिव्यवसायात्मक या विचारात्मक होकर बहुत ही विस्तृत हो गया है। अत: उसके विस्तार के साथ हमें अपने हृदय का विस्तार बढ़ाना पड़ेगा। विचारों की क्रिया से, वैज्ञानिक विवेचन और अनुसंधान द्वारा उद्धाटित परिस्थितियों और तथ्यों के मर्मस्पर्शी पक्ष का मूर्त और सजीव चित्रण भी-उसका इस रूप में प्रत्यक्षीकरण भी कि वह हमारे किसी भाव का आलम्बन हो सके-कवियों का काम और उच्च काव्य का एक लक्षण होगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन तथ्यों और परिस्थितियों के मार्मिक रूप न जाने कितनी वार्ता की तह में छिपे होंगे।

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