लेख – ईश्वरोन्मुख प्रेम – (लेखक – रामचंद्र शुक्ल )

· April 18, 2015

RamChandraShukla_243172पहले कहा जा चुका है कि जायसी का झुकाव सूफी मत की ओर था जिसमें जीवात्मा और परमात्मा में पारमार्थिक भेद न माना जाने पर भी साधकों के व्यवहार में ईश्वर की भावना प्रियतम के रूप में की जाती है। इन्होंने ग्रंथ के अंत में सारी कहानी को अन्योक्ति कह दिया है और बीच-बीच में भी उनका प्रेमवर्णन लौकिक पक्ष से अलौकिक पक्ष की ओर संकेत करता जान पड़ता है। इसी विशेषता के कारण कहीं-कहीं इनके प्रेम की गंभीरता और व्यापकता अनंतता की ओर अग्रसर दिखाई पड़ती हे। ‘रति भाव’ का वर्णन हिंदी के बहुत से कवियों ने किया है – कुछ लोगों का तो कहना है कि इसके अतिरिक्त और हमने किया ही क्या है – पर एक प्रबंध के भीतर शुद्ध भाव के स्वरूप का ऐसा उत्कर्ष जो पार्थिव प्रतिबंधों से परे हो कर आध्‍यात्मिक क्षेत्र में जाता दिखाई पड़े, जायसी का मुख्य लक्ष्य है। क्या संयोग, क्या वियोग, दोनों में कवि प्रेम के उस आध्यात्मिक स्वरूप का आभास देने लगता है, जगत के समस्त व्यापार जिसकी छाया से प्रतीत होते हैं। वियोगपक्ष में जब कवि लीन होता है तब सूर्य, चंद्र और नक्षत्र सब उसी परम विरह में जलते और चक्कर लगाते दिखाई देते हैं, प्राणियों का लौकिक वियोग जिसका आभास मात्र है –

बिरह के आगि सूर जरि काँपा । रातिउ दिवस जरै ओहि तापा॥

 

यद्यपि इस प्रकार के विरहवर्णन की ओर सगुणधा के भक्तों की प्रवृत्ति नहीं रही है, पर तुलसी की ‘विनयपत्रिका’ में एक जगह ऐसे विश्वव्यापी विरह की भावना पाई जाती है –

 

बिछुरे रवि ससि, मन ! नैनन तें पावत दुख बहुतेरो।

 

भ्रमत स्रमित निसि दिवस गगन महँ, तहँ रिपु राहु बड़ेरो॥

 

जद्यपि अति पुनीत सुरसरिता, तिहुँ पुर सुजस घनेरो॥

 

तजे चरन अजहूँ न मिटत नित बहिबो ताहू केरो॥

 

इसी शुद्ध भावक्षेत्र में अग्नि, पवन इत्यादि सब उस प्रिय (ईश्वर) के पास तक पहुँचने में व्यस्त दिखाई पड़ते हैं। सारी सृष्टि उसी ‘परम भाव’ में लीन होने को बढ़ती जान पड़ती है। परम साधना पूरी हुए बिना कोई यों ही इच्छा मात्र कर के नहीं पहुँच सकता है –

 

धाइ जो बाजा कै मन साधा। मारा चक्र, भएउ दुइ आधा॥

 

पवन धाइ तहँ पहुँचै चहा। मारा तैस, लोटि भुइँ रहा॥

 

अगिनि उठी, जरि उठा निआना। धुऑं उठा , उठि बीच बिलाना॥

 

पानि उठा ,उठि जाइ न छूआ। बहुरा रोइ आइ भुइँ चूआ॥

 

लौकिक सौंदर्य का वर्णन करते-करते कवि की दृष्टि किस प्रकार उस चरम सौंदर्य की ओर जा पड़ती है, यह रूप-सौंदर्य-वर्णन के अंतर्गत देखिए। उस चरम सौंदर्य की कुछ झलक मानो सृष्टि के वृक्ष, वल्ली, पशु, पक्षी, पृथ्वी, आकाश सबको मिली हुई है, सबके हृदय में मानो उसकी दृष्टि कोर गड़ी हुई है, सब उसके विरह में लीन है –

 

उन बानन्ह अस को जो न मारा। बेधि रहा सगरो संसारा॥

 

गगन नखत जो जाहिं न गने। वै सब बान ओहि के हने॥

 

धरती बान बेधि सब राखी । साखी ठाढ़ देहिं सब साखी॥

 

रोवँ रोवँ मानुष तन ठाढ़े। सूतहि सूत वेधा अस गाढ़े॥

 

बरुनि बान अस ओपहँ , बेधो रन, बन ढाँख।

 

सौजहि तन सब रोवाँ, पंखिहि तन सब पाँख॥

 

सृष्टि के नाना पदार्थ रूप, रस, गंध आदि का जो विकास करते दिखाई पड़ते हैं। – सौंदर्य और माधुर्यधारण करते दिखाई पड़ते हैं। वह मानो उस अनंत सौंदर्य के समागम के अभिलाष से उसके पास तक पहुँचने की आशा से –

 

पुहुप सुगंध करहिं एहि आसा । मकु हिरकाइ लेइ हम्ह पासा॥

 

रत्नसेन को पद्मावती तक पहुँचानेवाला प्रेमपंथ जीवात्मा को परमात्मा में ले जा कर मिलानेवाले प्रेमपंथ का स्थूल आभास है। प्रेमपथिक रत्नसेन में सच्चे साधक भक्त का स्वरूप दिखाया गया है। पद्मिनी ही ईश्वर से मिलानेवाला ज्ञान या बुद्धि है अथवा चैतन्यस्वरूप परमात्मा है, जिसकी प्राप्ति का मार्ग बतलानेवाला सूआ सद्गुरु है। उस मार्ग में अग्रसर होने से रोकने वाली नागमती संसार का जंजाल है। तनरूपी चित्तौरगढ़ का राजा मन है। राघवचेतन शैतान है जो प्रेम का ठीक मार्ग न बता कर इधर उधर भटकाता है। माया में पड़े हुए सुलतान अलाउद्दीन को मायारूप ही समझना चाहिए। इसी प्रकार जायसी ने ‘पद्मावत’ के अंत में अपने सारे प्रबंध को व्यंग्यगर्भित कह दिया है –

 

तन चितउर, मन राजा कीन्हा। हिय सिंहल, बुधि पदमिनि चीन्ह॥

 

गुरु सुआ जेहि पंथ देखावा। बिन गुरु जगत को निरगुन पावा॥

 

नागमती यह दुनिया धंधा। बाँचा सोइ न एहि चित बंधा॥

 

राघव दूत , सोइ सैतानू। माया अलादीन सुलतानू॥

 

अब यदि कवि के स्पष्टीकरण के अनुसार व्यंग्य अर्थ को ही प्रधान या प्रस्तुत मानें तो जहाँ-जहाँ दूसरे अर्थ भी निकलते हैं, वहाँ वहाँ अन्योक्ति माननी पड़ेगी। पर ऐसे स्थल अधिकतर कथा के अंग हैं और पढ़ते समय कथा के अप्रस्तुत होने की धारणा किसी पाठक को नहीं हो सकती। अत: इन स्थलों के वाच्यार्थ को अप्रस्तुत नहीं कह सकते। इस प्रकार वाच्यार्थ के प्रस्तुत और व्यंग्यार्थ के अप्रस्तुत होने से ऐसी जगह सर्वत्र ‘समासोक्ति’ ही माननी चाहिए। ‘पद्मावत’ के सारे वाक्यों के दोहरे अर्थ नहीं हैं, सर्वत्र अन्य पक्ष के व्यवहार का आरोप नहीं है। केवल बीच बीच में कहीं-कहीं दूसरे अर्थ की व्यंजना होती है। ये बीच-बीच में आए हुए स्थल, जैसा कि कहा जा चुका है, अधिकतर तो कथाप्रसंग के अंग हैं, जैसे – सिंहलगढ़ की दुर्गमता और सिंहलद्वीप के मार्ग का वर्णन, रत्नसेन का लोभ के कारण तूफान में पड़ना और लंका के राक्षस द्वारा बहकाया जाना। अत: इन स्थलों में वाच्यार्थ से अन्य अर्थ जो साधनापक्ष में व्यंग्य रखा गया है वह प्रबंध काव्य की दृष्टि से अप्रस्तुत ही कहा जा सकता है और ‘समासोक्ति’ ही माननी पड़ती है।

 

एक छोटा सा उदाहरण लीजिए। राजा रत्नसेन जब दिल्ली में कैद हो गए तब रानी पद्मावती इस प्रकार विलाप करती है –

 

सो दिल्ली अस निबहुर देसू। केहिं पूछहूँ , को कहै सँदेसू॥

 

जो कोइ जाइ तहाँ कर होई। जो आवै किछु जान न सोई॥

 

अगम पंथ पिय तहाँ सिधावा। जो रे गयउ सो बहुरि न आवा॥

 

प्रबंध के भीतर ये सारे वाक्य प्रस्तुत प्रसंग का वर्णन करते हैं पर इनमें परलोकयात्रा का अर्थ भी व्यंग्य है। यहाँ वाच्यार्थ को प्रस्तुत और व्यंग्यार्थ को अप्रस्तुत मान कर तथा ‘कोई किछु जान न’ और ‘बहुरि न आवा’ को दिल्ली गमन और परलोकगमन दोनों के सामान्य कार्य ठहराते हुए, दिल्ली गमन में परलोकगमन के व्यवहार का आरोप कर के हम समासोक्ति ही कह सकते हैं।

 

जहाँ कथाप्रसंग से भिन्न वस्तुओं के द्वारा प्रस्तुत प्रसंग की व्यंजना होती है वहाँ ‘अन्योक्ति’ होगी, जैसे –

 

(क) सूर उदयगिरि चढ़त भुलाना। गहनै गहा, कँवल कुँभिलाना॥

 

यहाँ इस ‘अप्रस्तुत’ के कथन द्वारा राजा रत्नसेन के सिंलहगढ़ पर चढ़ने और पकड़े जाने की व्यंजना की गई है। दूसरा उदाहरण लीजिए –

 

(ख) कँवल जो बिगसा मानसर, बिनु जल गयउ सुखाइ॥

 

अबहुँ बेलि फिर पलुहै, जो पिय सींचै आइ॥

 

यहाँ जल कमल का प्रसंग प्रस्तुत नहीं है, प्रस्तुत है विरहिणी की दशा। अत: यहाँ अप्रस्तुत से प्रस्तुत की व्यंजना होने के कारण ‘अन्योक्ति’ है।

 

सारांश यह है कि जहाँ जहाँ प्रबंध-प्रस्तुत वर्णन में अध्‍यात्म पक्ष का कुछ अर्थ भी व्यंग्य हो वहाँ समासोक्ति ही माननी चाहिए। जहाँ प्रथम पक्ष में अर्थात् अभिधेयार्थ में किसी भाव की व्यंजना नहीं है (जैसे मार्ग की कठिनता और सिंहलगढ़ की दुर्गमता के वर्णन में) वहाँ तो वस्तुव्यंजना स्पष्ट ही है, क्योंकि वहाँ एक प्रस्तुत अर्थ से दूसरे वस्तुरूप अर्थ की ही व्यंजना है। पर जहाँ किसी भाव की भी व्यंजना है वहाँ यह जिज्ञासा हो सकती है कि एक पक्ष की वस्तु दूसरे पक्ष की दूसरी वस्तु को व्यंजित करती है अथवा एक पक्ष का भाव दूसरे पक्ष के दूसरे भाव को व्यंजित करता है। विचार के लिए यह पद्य लीजिए –

 

पिउ हिरदय महुँ भेंट न होई । को रे मिलाव, कहौं केहि रोई॥

 

ये पद्मावती के वचन हैं जिसमें रतिभावव्यंजक ‘विषाद’ और ‘औत्सुक्य’ की व्यंजना है। ये वचन जब भगवत्पक्ष में घटते हैं तब भी इन भावों की व्यंजना बनी रहती है। इस अवस्था में क्या हम कह सकते हैं कि प्रथम पक्ष में व्यंजित भाव दूसरे पक्ष में उसी भाव की व्यंजना करता है? नहीं; क्योंकि व्यंजना अन्य अर्थ की हुआ करती है, उसी अर्थ की नहीं। उक्त पद्य में भाव दोनों पक्षों में वे ही हैं। आलंबन भिन्न होने से भाव अपर (अर्थात् अन्य और समान; समानता अपरता में ही होती है) नहीं हो सकता। प्रेम चाहे मनुष्य के प्रति हो चाहे ईश्वर के प्रति, दोनों पक्षों में प्रेम ही रहेगा। अत: यहाँ वस्तु से वस्तु ही व्यंग्य है और भावव्यंजना का विधान दोनों पक्षों में अलग-अलग माना जायगा।

 

पहले तो पद्मावती और रत्नसेन के पक्ष में वाच्यार्थ की प्रतीति के साथ ही लक्ष्यक्रम व्यंग्य द्वारा उन दो भावों (विषाद और औत्सुक्य) की प्रतीति होती है। इसके उपरांत हम फिर प्रथम पक्ष के वाच्यार्थ से चल कर लक्ष्यक्रम व्यंग्य द्वारा दूसरे पक्ष की इस वस्तु पर पहुँचते है। ‘ईश्वर तो अंत:करण में ही है, पर साक्षात्कार नहीं होता। किस गुरु से कहें जो उपदेश दे कर मिलावे।’ इसमें अन्य आश्रय और अन्य आलंबन का ग्रहण है अत: यह वस्तुव्यंजना हुई। इस प्रकार दूसरे पक्ष की व्यंग्य वस्तु पर पहुँच कर हम चट उसके व्यंग्य भाव (ईश्वरप्रेम) पर पहुँच जाते हैं। मतलब यह है कि एक पक्ष से दूसरे पक्ष पर हम वस्तुव्यंजना द्वारा ही आते हैं। यह वस्तुव्यंजना अधिकतर अर्थशक्त्युभव ही है, शब्दशक्त्युभव नहीं। अर्थात् अर्थ के सादृश्य से ही लक्ष्यक्रम व्यंग्य जायसी में मिलता है, श्लेष के सहारे पर नहीं। कहीं एकाध जगह ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिसमें शब्द के दोहरे अर्थ से कुछ काम लिया गया है, जैसे –

 

जो यहि खीर समुद महँ परे। जीव गँवाइ हंस होइ तरे॥

 

यहाँ ‘हंस’ शब्द का पक्षी भी अर्थ है और उपाधिमुक्त शुद्ध आत्मा भी।

 

जैसा कि कह आए हैं, भगवत्पक्ष में घटनेवाले व्यंग्यार्थगर्भ वाक्य बीच-बीच में बहुत से हैं। हीरामन तोते के मुँह से पद्मिनी का रूपवर्णन सुन राजा उसके ध्यान में बेसुध हो गया। पर राजा केवल संसार के देखने में बेसुध था। अपने ध्यान की गंभीरता में, समाधि की अवस्था में, उसे उस समय परम ज्योति के सामीप्य की आनंदमयी अनुभूति हो रही थी जिसके भंग होने का दु:ख वह सचेत होने पर प्रगट करता है –

 

आवत जग बालक जस रोवा। उठा रोइ ‘हा ज्ञान सो खोवा’॥

 

हौं तो अहा अमरपुर जहाँ। इहाँ मरनपुर आएउ कहाँ॥

 

केइ उपकार मरन कर कीन्हा। सकति हँकारि जीउ हरि लीन्हा॥

 

यहाँ राजा का पद्मिनी के ध्यान में बेसुध होना कह कर साधक भक्त की समाधि द्वारा ईश्वर-सान्निध्‍य-प्राप्ति की व्यंजना की गई है। वह सान्निध्‍य कैसा आनंदमय है! उस अमरधाम से जीव जब इस संसार में आता है तब उसकी सुध कर के एकबारगी रो पड़ता है। जायसी ने तो जन्म के समय में बच्चे के रोने पर हेतूत्प्रेक्षा कर के भाव को यहीं छोड़ दिया है, पर अँगरेज कवि वर्ड्सवर्थ इस भाव को और आगे ले गए हैं। वे कहते हैं कि अपने उस अमरधाम की सुध संसार में आते ही यद्यपि भूल जाती है, पर उसका संस्कार कुछ काल तक रहता है। अपने बचपन के दिनों का स्मरण कीजिए। ये ही हरे भरे मैदान, अमराइयाँ और नाले आदि जो अब साधारण दृश्य जान पड़ते हैं, कैसी आनंदमयी दिव्य प्रभा से मंडित दिखाई पड़ते थे। फूल अब भी सुंदर लगते हैं, चंद्रमा अब भी शरत्काल में सुहावना लगता है, पर इन सब की वह दिव्य आभा अब पृथ्वी पर कहाँ, जो बचपन में हृदय को आनंदोल्लास से भर देती थी। बचपन में हमारे चारों ओर स्वर्ग का आभास कुछ बना रहता है। पर ज्यों ज्यों हम बड़े होते जाते हैं त्यों – त्यों इस भवसागर की छाया में बद्ध होते जाते हैं। वह आनंदसंस्कार मिटता जाता है, हम उसे भूलते जाते हैं। अत: इस संसार में जन्म लेना क्या है, एक प्रकार का भूलना है, एक प्रकार की निद्रा है –

 

अवर बर्थ इज बट ए स्लीप ऐंड ए फारगेटिंग ;

 

द सोल दैट राइजेज बिथ अस, अवर लाइव्ज स्टार ;

 

हैथ हैड एल्सह्नेयर इट्स सेटिंग

 

ऐंड कमेथ फ्राम ए फार ;

 

नाट इन एंटायर फारगेट फुलनेस

 

ऐंड नाट इन अवर नेकेडनेस

 

बट ट्रेलिंग क्लाउड्ज आव ग्लोरी डू वी कम

 

फ्राम गाड, हू इज अवर होम,

 

हेवेन लाइज एबाउट अस इन अवर इनफैंसी!

 

शेड्स आव द प्रिजन हाउस बिगिन टु क्लोज

 

अपान द ग्रोइंग ब्वाय।

 

– ओड आन इंटिमेशन आव इम्मारटैलिटी फ्राम रिकलेशंस आव अर्ली चाइल्डहुड।

 

शास्‍त्रभिमानी लोग तर्कबुद्धि से जिन तत्त्वों का साक्षात्कार करते हैं मनुष्य की रागात्मिकता वृत्ति भी पूर्ण शुद्धता प्राप्त कर के उन तथ्यों में रमती है। पहुँचे हुए कवियों की वाणी में जो सत्य की मार्मिक अनुभूति (ज्ञान मात्र नहीं) मिलती है, वह भी अमूल्य है। देखिए, जोगी होते हुए राजा के मुँह से कवि ने उसी अमरधाम की ओर स्वाभाविक दृश्य द्वारा संकेत कराया है –

 

हौं रे पथिक पखेरू , जेहि बन मोरि निबाहु।

 

खेलि चला तेहि बन कहँ, तुम अपने घर जाहु॥

 

राजा रत्नसेन जब सिंहल के पास सातवें समुद्र में पहुँचता है तब दु:ख की सारी छाया हट जाती है, आनंद की अमंद आभा फूटती दिखाई पड़ती है और हृदय की कली खिल जाती है। यह है साधक का अपनी साधना के फल के निकट पहुँचना, जबकि सारे भ्रम और संताप दूर होते दिखाई पड़ने लगते हैं और ब्रह्म की आनंदमयी ज्योति के साक्षात्कार से आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप की ओर अग्रसर होती जान पड़ने लगती है –

 

देखि मानसर रूप सोहावा। हिय हुलास पुरइनि होइ छावा॥

 

गा अँधियार, रैन मसि छूटी। भा भिनुसार किरिन रवि फूटी॥

 

‘अस्ति अस्ति’ सब साथी बोले। अंधा जो अहे, नैन बिधि खोले॥

 

आनंद की कैसी लोकव्यापिनी व्यंजना है। एक एक शब्द से ऐसा उल्लास उमड़ पड़ता है जिसमें वृत्ति मग्न हो जाती है।

 

मंदिर में पद्मावती के आने पर राजा रत्नसेन जो बेसुध हो कर सो गया है उससे इस बात की व्यंजना की गई है कि ईश्वर बराबर सामने रहता है, पर जो इस संसार की माया में लिप्त हो कर सोए रहते हैं उन्हें साक्षात्कार नहीं होता, जो योगी जागते हैं उन्हीं को होता है –

 

तबहूँ न जागा, गा तू सोई । जागे भेंट, न सोए होई ॥

 

और जागनेवाले योगी कौन हैं, गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं –

 

एहि जग जामिनि जागहिं जोगी । परमारथी प्रपंच वियोगी ॥

 

हीरामन के मुँह से सिंहलद्वीप और पद्मिनी का वर्णन सुन बेसुध हो कर राजा जब फिर जागता है तब अपने चित्तौर के राजपाट और घरबार से उसकी दृष्टि फिर कर उस सिंहलद्वीप की ओर लग जाती है। यह दशा उस सच्चे भावुक जिज्ञासु की है जो गुरु से ब्रह्मज्योति का आभास पा कर उसी की ओर प्रवृत्त हो जाता है और इस संसार में सब व्यवहार उसे अज्ञानंधकार के समान लगने लगते है। –

 

हिय के जोति दीप वह सूझा। यह जो दीप अँधियारा बूझा॥

 

उलटि दीठि माया सौं रूठी। पलटि न फिरी जानि कै झूठी॥

 

प्रेमपथिक रत्नसेन के इस मार्ग में साधक के मार्ग की झलक देखिए –

 

ओहि मिलान जो पहुँचै कोई। तब हम कहब पुरुष भल सोई॥

 

है आगे परबत कै बाटा। विषम पहार अगम सुठि घाटा॥

 

बिच बिच नदी , खोह औ नारा। ठाँवहिं ठाँव बैठ बटपारा॥

 

वह ‘मिलान’ जहाँ पहुँचना है ईश्वर है। अनेक प्रकार के विघ्न पहाड़ और नदी खोह हैं। काम, क्रोध, मोह आदि बटमार या डाकू हैं। साधक के विघ्नों का स्वरूप दिखाने के लिए ही कवि ने राजा रत्नसेन के लौटते समय तूफान की घटना का आयोजन किया है। लोभ के कारण राजा विपत्ति में फँसता है और लंका का राक्षस उसे मिल कर भटकाता है। यह लंका का राक्षस शैतान है जो साधकों को भटकाया करता है।

 

इसी प्रकार सिंहलगढ़ का निम्नलिखित वर्णन भी हठयोग के विभागों के अनुसार शरीर का वर्णन है –

 

गढ़ तस बाँक जैसि तोरी काया। पुरुष देखु ओही कै छाया॥

 

पाइय नाहिं जूझ हठि कीन्हें। जेइ पावा तेइ आपुहि चीन्हें॥

 

नौ पौरी तेहि गढ़मझियारा। औ तहँ फिरहिं पाँच कोटबारा॥

 

दसहुँ दुआर गुपुत एक ताका। अगम चढ़ाव बाट सुठि बाँका॥

 

भेदै जाइ कोइ वह घाटी। जो लह भेद चढ़ै होइ चाँटी॥

 

गढ़तर कुंड सुरँग तेहिमाहाँ। तहँ वह पंथ, कहौं तोहि पाहाँ॥

 

दसवँ दुआरि ताल कै लेखा। उलटि दिस्ट जो लाव सो देखा॥

 

हठयोगी अपनी साधना के लिए शरीर के भीतर तीन नाड़ियाँ मानते हैं। मेरुदंड या रीढ़ की बाईं ओर इला, दाहिनी ओर पिंगला नाड़ी है। इन दोनों के बीच में सुषुम्ना नाम की नाड़ी है। स्वरोदय के अनुसार बाएँ नथ में से जो साँस आती जाती है वह इला नाड़ी से हो कर और दाहिने नथने से जो आती जाती है वह पिंगला से हो कर। यदि श्वास कुछ क्षण दाहिने और कुछ क्षण बाएँ नथने से निकले तो समझना चाहिए कि वह सुषुम्ना नाड़ी से आ रही है। मध्‍यस्था सुषुम्ना नाड़ी ब्रह्मस्वरूप है और उसी में जगत अवस्थित है। बिना इन नाड़ियों के ज्ञान के योगाभ्यास में सिद्धि नहीं होती। जो योगाभ्यास करना चाहते हैं वे पहले इला, फिर पिंगला और उसके अनंतर सुषुम्ना को साधते हैं। सुषुम्ना के सबसे नीचे के भाग में नाभि के नीचे, योगी कुंडलिनी मानते हैं इसी को जगाने का प्रयत्न वे करते हैं। जाग्रत होने पर कुंडलिनी चंचल हो कर सुषुम्ना नाड़ी के भीतर – भीतर सिर की ओर चढ़ने लगती है और हृत्कमल और बारह चक्रों को पार करती हुई ब्रह्मरंध्र या मूर्द्धज्योति तक चली जाती है। जैसे जैसे वह ऊपर चढ़ती जाती है, योगी के सांसारिक बंधन ढीले पड़ते जाते हैं। यहाँ तक कि ब्रह्मरंध्र में पहुँचने पर मन और शरीर से उसका संबंध छूट जाता है और साधक पूर्ण समाधि या तुरीयावस्था को प्राप्त हो कर ब्रह्म के स्वरूप में मग्न हो जाता है।

 

ऊपर जो पंक्तियाँ उद्धृत हैं उनमें ‘नौ पौरी’ नाक, कान, मुँह आदि नव द्वार हैं। दशम द्वार ब्रह्मरंध्र है जिसके पास तक पहुँचने में बहुत से विघ्न या अंतराय पड़ते हैं। पाँच कोतवाल, काम, क्रोध आदि विकार हैं। गढ़ के नीचे का कुंड नाभिकुंड है जहाँ कुंडलिनी है। इस नाभिकुंड से गई हुई सुरंग सुषुम्ना नाड़ी है जो ब्रह्मरंध्र तक चली गई है। वह ब्रह्मरंध्र बहुत ऊँचे है, वहाँ तक पहुँचना अत्यंत कठिन है। संसार से अपनी दृष्टि हटा कर जो उसकी ओर निरंतर ध्यान लगाए रहता है वही साधक वहाँ तक पहुँच पाता है। जैसे रत्नसेन को शिव ने सिंहलगढ़ के भीतर पहुँचने का मार्ग बताया है वैसे ही साधक को किसी सिद्ध पुरुष से उपदेश ग्रहण किए बिना ब्रह्म की प्राप्ति नहीं हो सकती। आरंभ में कवि ने जो सिंहलगढ़ का वर्णन किया है उसमें कहा है कि ‘चारि बसेरे सौं चढ़ै, सत सौं उतरै पार’। ये चार बसेरे सूफी साधकों की चार अवस्थाएँ हैं – शरीअत, तरीकत, हकीकत और मारफत। यही मारफत पूर्ण समाधि की अवस्था है जिसमें ब्रह्म के स्वरूप की अनुभूति होती है।

 

रत्नसेन का सिंहलद्वीप में जाना भी हठयोगियों के प्रवाद के अनुकरण पर है। गोरखपंथी जोगी सिंहलद्वीप को सिद्धपीठ मानते हैं जहाँ शिव से पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने के लिए साधक को जाना पड़ता है।

 

लड़की का मायके से पति के पास जाना और जीव का ईश्वर के पास जाना दोनों में एक प्रकार के साम्य की कल्पना निर्गुणोपासक भावुक भक्तों में बहुत दिनों से चली आती है। कबीरदास के तो बहुत से भजनों में यह कल्पना भरी हुई है, जैसे –

 

खेलि लेइ नैहर दिन चारी।

 

पहिली पठौनी तीनि जन आए, नाऊ ब्राह्मण, बारी।

 

दुसरी पठौनी पिय आपुहि आए, डोली, बाँस कहारी।

 

धरि बहियाँ डोलिया बैठावैं, कोउ न लगत गोहारी।

 

अब कर जाना, बहुरि नहीं अवना , इहै भेंट अँकबारी॥

 

सुनि कै गवन मोरा जिया घबराई।

 

आजु मँदिरवा में अगिया लगिहै , कोउ न बुझावन जाई॥

 

इस प्रकार की अन्योक्तियाँ हिंदू गृहस्थों, विशेषत: स्त्रियों के मर्म को अधिक स्पर्श करनेवाली होती हैं, इससे इनके द्वारा माँगनेवाले साधु लोगों के हृदय पर प्रभाव डाल कर भिक्षा का अच्छा योग कर लेते हैं। जायसी ने भी प्रथम समागम के अवसर पर पद्मावती के मुँह से इस प्रकार के व्यंग्यगर्भित वाक्य कहलाए है। –

 

अनचिन्ह पिउ काँपौं मन माहाँ । का मैं कहब ,गहब जो बाहाँ॥

 

बारि बैस गहै प्रीति न जानी। तरुनि भई मैमंत भुलानी॥

 

जीवन गरब न मैं किछु चेता। नेह न जानौं सावँ कि सेता॥

 

अब सो कंत जो पूछिहि बाता। कस मुख होइहि पीत की राता॥

 

इसी प्रकार की उक्तियाँ पद्मिनी की विदाई के समय भी हैं, जैसे –

 

रोवहिं मात पिता औ भाई। कोउ न टेक जौ कंत चलाई॥

 

भरीं सखी सब, भेंटत फेरा। अंत कंत सौ भएउ गुरेरा॥

 

कोउ काहु कर नाहिं निआना। मया मोह बाँधा अरुझाना॥

 

जब पहुँचाइ फिरा सब कोऊ। चला साथ गुन अवगुन दोऊ॥

 

इसी मायके और ससुराल की प्रचलित अन्योक्ति को ध्यान में रख कर जायसी ने ग्रंथ के आरंभ में ही पद्मावती और सखियों के खेलकूद का ऐसा माधुर्यपूर्ण वर्णन किया है। सिंहल की हाट आदि के वर्णन में भी बीच – बीच में जायसी ने पारमार्थिक झलक दिखाई है, जैसे –

 

जिन्ह एहि हाट न लीन्ह बेसाहा । ता कहँ आन हाट कित लाहा॥

 

कोई करें बेसाहनी, काहू केर बिकाइ।

 

कोई चलै लाभ सौं, कोई मूर गँवाइ॥

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