लेख – अलंकार – (लेखक – रामचंद्र शुक्ल )

· April 21, 2014

RamChandraShukla_243172कविता में भाषा की सब शक्तियों से काम लेना पड़ता है। वस्तु या व्यापार की भावना चटकीली करने और भाव को अधिक उत्कर्ष पर पहुँचाने के लिए कभी किसी वस्तु का आकार या गुण बहुत बढ़ाकर दिखाना पड़ता है; कभी उसके रूपरंग या गुण की भावना को उसी प्रकार के और रूपरंग मिलाकर तीव्र करने के लिए समान रूप और धर्मवाली और वस्तुओं को सामने लाकर रखना पड़ता है। कभी-कभी बात को भी घुमा-फिराकर कहना पड़ता है। इस तरह के भिन्न-भिन्न विधान और कथन के ढंग अलंकार कहलाते हैं। इनके सहारे से कविता अपना प्रभाव बहुत कुछ बढ़ाती है। कहीं-कहीं तो इनके बिना काम ही नहीं चल सकता। पर साथ ही यह भी स्पष्ट है कि ये साधन हैं, साध्यन नहीं। साध्य को भुलाकर इन्हीं को साध्य मान लेने से कविता का रूप कभी-कभी इतना विकृत हो जाता है कि वह कविता ही नहीं रह जाती। पुरानी कविता में कहीं-कहीं इस बात के उदाहरण मिल जाते हैं।

अलंकार चाहे अप्रस्तुत वस्तुयोजना के रूप में हों (जैसे उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा इत्यादि में), चाहे वाक्य वक्रता के रूप में (जैसे अप्रस्तुतप्रशंसा, परिसंख्या, ब्याजस्तुति, विरोध इत्यादि में), चाहे वर्णविन्यास के रूप में (जैसे अनुप्रास में), लाए जाते हैं वे प्रस्तुत भाव या भावना के उत्कर्षसाधन के लिए ही। मुख के वर्णन में जो कमल, चन्द्र आदि सामने रखे जाते हैं वह इसीलिए जिनमें इनकी वर्णरुचिरता, दीप्ति इत्यादि के योग से सौंदर्य की भावना और बढ़े। सादृश्य या साधर्म्य दिखाना उपमा, उत्प्रेक्षा इत्यादि का प्राकृत लक्ष्य नहीं है। इस बात को भूलकर कविपरंपरा में बहुत से ऐसे उपमान चला दिए गए हैं जो प्रस्तुत भावना में सहायता पहुँचाने के स्थान पर बाधा डालते हैं। जैसे, नायिका का अंगवर्णन सौंदर्य की भावना प्रतिष्ठित करने के लिए ही किया जाता है। ऐसे वर्णन में यदि कटि का प्रसंग आने पर भेड़ या सिंह की कमर सामने कर दी जाएगी तो सौंदर्य की भावना में क्या वृद्धि होगी? प्रभात के सूर्यबिम्ब के संबंध में इस कथन से कि ‘है शोणित कलित कपाल यह किस कापालिक काल को’ अथवा शिखर की तरह उठे हुए मेघखंड के ऊपर उदित होते हुए चन्द्रबिंब के संबंध में इस उक्ति से कि ”मनहुँ क्रमेलक पीठ पै धरयो गोल घंटा लसत”, दूर की सूझ चाहे प्रकट हो, पर प्रस्तुत सौंदर्य की भावना की कुछ भी पुष्टि नहीं होती।

 

पर जो लोग चमत्कार ही को काव्य का स्वरूप मानते हैं वे अलंकार को काव्य का सर्वस्व कहना ही चाहेंगे। चंद्रालोककार तो कहते हैं कि-

अंगीकरोति य: काव्यं शब्दार्थावनलंकृती।

 

असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनलं कृती॥

 

भरतमुनि ने रस की प्रधानता की ओर ही संकेत किया था; पर भामह, उद्भट, आदि कुछ प्राचीन आचार्यों ने वैचित्रय का पल्ला पकड़ अलंकारों को प्रधानता दी। इनमें बहुतेरे आचार्यों ने अलंकार शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में-रस, रीति, गुण आदि काव्य में प्रयुक्त होनेवाली सारी सामग्री के अर्थ में किया है। पर ज्यों ज्यों शास्त्री य विचार गंभीर और सूक्ष्म होता गया त्यों त्यों साध्ये और साधनों को विविक्त करके काव्य के नित्य स्वरूप या मर्मशरीर को अलग निकालने का प्रयास बढ़ता गया। रुद्रट और मम्मट के समय से ही काव्य का प्रकृत स्वरूप उभरते उभरते विश्व नाथ महापात्रा के साहित्य दर्पण में साफ ऊपर आ गया।

 

प्राचीन गड़बड़झाला मिटे बहुत दिन हो गए। वर्ण्य वस्तु और वर्णनप्रणाली बहुत दिनों से एक दूसरे से अलग कर दी गई है। प्रस्तुत अप्रस्तुत के भेद ने बहुत सी बातों के विचार और निर्णय के सीधे रास्ते खोज दिए हैं। अब यह स्पष्ट हो गया है कि अलंकार प्रस्तुत या वर्ण्य वस्तु नहीं, बल्कि वर्णन की भिन्न भिन्न प्रणालियाँ हैं, कहने के खास खास ढंग हैं। पर प्राचीन अव्यवस्था के स्मारक स्वरूप कुछ अलंकार ऐसे चले आ रहे हैं जो वर्ण्य वस्तु का निर्देश करते हैं और अलंकार नहीं कहे जा सकते-जैसे, स्वभावोक्ति, उदात्त, अत्युक्ति। स्वभावोक्ति को लेकर कुछ अलंकारप्रेमी कह बैठते हैं कि प्रकृति का वर्णन भी तो स्वभावोक्ति अलंकार ही है। पर स्वाभावोक्ति अलंकार कोटि में आ ही नहीं सकती। अलंकार वर्णन करने की प्रणाली है। चाहे जिस वस्तु या तथ्य के कथन को हम किसी अलंकारप्रणाली के अंतर्गत नहीं ला सकते हैं। किसी वस्तु विशेष से किसी अलंकारप्रणाली का संबंध नहीं हो सकता।किसी तथ्य तक वह परिमित नहीं रह सकती। वस्तुनिर्देश अलंकार का काम नहीं, रस-व्यवस्था का विषय है। किन किन वस्तुओं, चेष्टाओं या व्यापारों का वर्णन किन किन रसों के विभावों और अनुभावों के अंतर्गत आएगा, इसकी सूचना रसनिरूपण के अंतर्गत ही हो सकती है।

 

अलंकारों के भीतर स्वभावोक्ति का ठीक-ठीक लक्षणनिरूपण हो भी नहीं सका है। काव्यप्रकाश की कारका में यह लक्षण दिया गया है-

स्वभावोक्तिस्तु डिम्भादे: स्वक्रियारूपवर्णनम्।

 

अर्थात् ‘जिसमें बालकादिकों की निज की क्रिया या रूप का वर्णन हो वह स्वभावोक्ति है।’ प्रथम तो बालकादिक पद की व्याप्ति कहाँ तक है, यही स्पष्ट नहीं। अत: यही समझा जा सकता है कि सृष्टि की वस्तुओं के रूप और व्यापार का वर्णन स्वभावोक्ति है। खैर, बालक की रूपचेष्टा को लेकर ही स्वभावोक्ति की अलंकारता पर विचार कीजिए। वात्सल्य में बालक के रूप आदि का वर्णन आलंबन विभाव के अंतर्गत और उसकी चेष्टाओं का वर्णन, उद्दीपन विभाव के अंतर्गत होगा। प्रस्तुत वस्तु की रूप, क्रिया आदि के वर्णन को रस क्षेत्र से घसीटकर अलंकार क्षेत्र में हम कभी नहीं ले जा सकते। मम्मट ही के ढंग के और आचार्यों के लक्षण भी हैं। अलंकार सर्वस्वकार राजानक रुय्यक कहते हैं-

सूक्ष्म वस्तु स्वभाव यथावद्वर्णनं स्वभावोक्ति: ।

 

आचार्य दंडी ने अवस्था की योजना करके यह लक्षण लिखा है-

 

नानावस्थं पदार्थानां साक्षाद्विवृण्वती।

स्वभावोक्तिश्च जातिश्चेत्याद्या सालंकृतिर्यथा ।

 

बात यह है कि स्वभावोक्ति अलंकारों के भीतर आ ही नहीं सकती। वक्रोक्तिवादी कुंतक ने भी इसे अलंकार नहीं माना है।

 

जिस प्रकार एक कुरूपा स्त्रीत अलंकार लादकर सुंदर नहीं हो सकती, उसी प्रकार प्रस्तुत वस्तु या तथ्य की रमणीयता के अभाव में अलंकारों का ढेर काव्य का सजीव स्वरूप नहीं खड़ा कर सकता। केशवदास के पचीसों पद्य ऐसे रखे जा सकते हैं जिनमें यहाँ से वहाँ तक उपमाएँ और उत्प्रेक्षाएँ भरी हैं, शब्दसाम्य के बड़े-बड़े खेल तमाशे जुटाए गए हैं पर उनके द्वारा कोई मार्मिक अनुभूति नहीं उत्पन्न होती। उन्हें कोई सहृदय या भावुक काव्य न कहेगा। आचार्यों ने भी अलंकारों को ‘काव्य शोभाकर’, ‘शोभातिशायी’ आदि ही कहा है। महाराज भोज भी अलंकार को ‘अलमर्थमलंकर्तु:’ ही कहते हैं। पहले से सुंदर अर्थ को ही अलंकार शोभित कर सकता है। सुंदर अर्थ की शोभा बढ़ाने में जो अलंकार प्रयुक्त नहीं वे काव्यालंकार नहीं। वे ऐसे ही हैं जैसे शरीर पर से उतारकर किसी अलग कोने में रखा हुआ गहनों का ढेर। किसी भाव या मार्मिक भावना से असंपृक्त अलंकार चमत्कार या तमाशे हैं। चमत्कार का विवेचन पहले हो चुका है।

 

अलंकार हैं क्या? सूक्ष्म दृष्टिवालों ने काव्यों के सुंदर-सुंदर स्थल चुने और उनकी रमणीयता के कारणों की खोज करने लगे। वर्णन शैली या कथन की पद्धति में ऐसे लोगों को जो जो विशेषताएँ मालूम होती गईं, उनका उनका वे नामकरण करते गए। जैसे ‘विकल्प’ अलंकार का निरूपण पहले-पहल राजानक रुय्यक ने किया। कौन कह सकता है कि काव्यों में जितने रमणीय स्थल हैं, सब ढूँढ़ डाले गए, वर्णन की जितनी सुंदर प्रणालियाँ हो सकती हैं, सब निरूपित हो गईं अथवा जो-जो स्थल रमणीय लगे उनकी रमणीयता का कारण वर्णन प्रणाली ही थी? आदिकाव्य रामायण से लेकर इधर तक के काव्यों में न जाने कितनी विचित्र वर्णन प्रणालियाँ भरी पड़ी हैं जो न निर्दिष्ट की गई हैं और न जिनके कुछ नाम रखे गए हैं।

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