मुझे जान से मार क्यों नहीं देते

Krishnaये भीषण चीत्कार है उस भयंकर दर्द की जो दिल में उठता है उस भक्त के, जिसे सिर्फ एक सेकंड के लिए, त्रैलोक्य मोहन लड्डू गोपाल की झलक दिख जाती है, और फिर वो बाल गोपाल ऐसा गायब होते हैं की दुबारा कभी दिखेंगे भी की नहीं, कुछ नहीं पता होता है !

उस सुन्दरता के चरम, मासूमियत की पराकाष्ठा, छोटू – मोटू, गोल – मटोल, सिर पर मोर पंख लगाये हुए, कमर में करधनी और पैर में छन छन करती पायल पहने हुए, बिजली के समान चमचमाते हुए छोटे छोटे दांतों वाले, अति नटखट बच्चों की तरह बिना वजह हर समय उत्साह से इधर उधर दौड़ने वाले और हर मामूली बात पर खिल खिला कर हसने वाले, बाल गोपाल को देखकर कितना भी कठोर जल्लाद कसाई आदमी हो, ठगा सा, पत्थर सा, गूंगा सा या यूँ कहे मूर्ति सा स्तब्ध खड़ा रह जाता है ! !

इतिहास गवाह है कि, बड़े से बड़े ऋषि – महर्षि जिनके कठोर नियम और गंभीर व्यक्तित्व की पूरे जगत में प्रशंसा होती थी, वैसे सुख दुःख से विरक्त हो चुके ऋषि मुनियों के सामने भी जब बाल गोपाल अचानक से आकर खड़े हो गए तो उनकी भी बुद्धि, जीभ, आँखों की पलकें, ह्रदय की धड़कन सब जड़वत हो गयीं और उन्हें होश तब आया जब बाल गोपाल दर्शन देकर वापस अपने धाम गोलोक लौट गए !

दर्शन प्राप्त भक्त की वही दशा होती है जैसे किसी आदमी को पहले स्वर्ग के समान सुन्दर जगह पर खूब सुख दिया जाय और फिर उसके तुरन्त बाद उस आदमी को कूड़े कचरे से भरी जगह पर छोड़ दिया जाय !

जब तक लड्डू गोपाल का दर्शन होता रहता है आदमी को सुख नहीं, परम सुख मिलता रहता है और जैसे ही लड्डू गोपाल दर्शन देकर वापस अपने धाम को लौट जाते है, वैसे ही आदमी की चेतना वापस उसके शरीर में लौट आती है और आदमी अपने आप को वापस उसी मल मूत्र वाले शरीर में और क्रोध वासना लालच माया से भरे संसार में पाकर अथाह दुखी होता है ! और वो फिर से बाल गोपाल का दर्शन पाने के लिए उसी तरह तड़पने लगता है जैसे बिना पानी के मछली तड़पती है !

जैसे जैसे बाल गोपाल के दुबारा दर्शन होने में देर होने लगती है भक्त की तड़प, दुःख कई बार गुस्से में बदल जाता है जिसमे वो यह भी कहता है की प्रभु क्या तुमको मेरी दुर्दशा देखकर बिलकुल भी दया नहीं आ रही है ? अगर तुम मुझे दर्शन नहीं दे सकते तो, तुम्हारे विछोह के भयंकर तकलीफ से मुक्ति देने के लिए मौत ही क्यों नहीं दे देते ! !

हाँलाकि शास्त्रों में लिखी हुई ज्ञान की बातें, ईश्वर विरह में पागल हुए भक्त नहीं समझना चाहते है पर ये सत्य है की ईश्वर विछोह की यह भयंकर तकलीफ बेहद कीमती और बेहद दुर्लभ है क्योकि यह तकलीफ, कोई दंड नहीं है बल्कि शुद्धिकरण की वो महान प्रक्रिया है जो भक्त के अनन्त जन्मों के बचे खुचे संस्कारों को काटकर, भक्त को ईश्वर में ही सदा की लिए एकीकृत कर देती है और वो हर तरह के काल बंधन से मुक्त होकर स्वयं महाकाल स्वरूप हो जाता है !

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