मिसाइल मैन की मिसाइल गाथा

· July 3, 2014

मिसाइल निर्माण में भारत के कई वैज्ञानिकों ने अथक मेहनत की जिसमे से एक है डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और उनके इस सराहनीय प्रयास के वजह से मीडिया ने उन्हें मिसाइल मैन के नाम से नवाजा। श्री कलाम वैज्ञानिक होने के साथ साथ एक बड़े देश भक्त भी है जो भारत माँ के विभिन्न आयामो के निर्माण में बराबर सहयोग देते रहे है। प्रस्तुत है श्री कलाम की आत्मकथा ‘छुआ आसमान’ से उनके बाल्यकाल के कुछ रोचक प्रसंग।


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मेरा जन्म एक मध्यवर्गीय तमिल परिवार में, द्वीप-नगर रामेश्वरम में हुआ। यह 1931 का वर्ष था और रामेश्वरम ब्रिटिश भारत में मद्रास (चेन्नई) राज्य का एक भाग था। मैं कई बच्चों में से एक था, ऊंचे-पूरे एवं सुंदर माता-पिता का छोटे कद और अपेक्षतया साधारण चेहरे-मोहरे वाला लड़का। मेरे पिता जैनुलआबदीन न तो बहुत उच्च-शिक्षित थे और न ही धनी, लेकिन ये कोई बड़ी कमियां नहीं थीं, क्योंकि वे बुद्धिमान और वास्तव में एक उदार मन वाले व्यक्ति थे। मेरी मां आशियम्मा, एक विशिष्ट परिवार से थीं, उनके पूर्वजों में से एक को अंग्रेजों ने ‘बहादुर’ की उपाधि प्रदान की थी। वे भी पिता की ही तरह उदारमना थीं, मुझे याद नहीं कि वे रोज कितने लोगों को खाना खिलाती थीं, लेकिन यह मैं पक्के तौर पर कह सकता हूं कि हमारे भरे-पूरे परिवार में कुल मिलाकर जितने सदस्य थे, उनसे कहीं अधिक बाहरी लोग हमारे साथ भोजन करते थे! मेरे माता-पिता को समाज में एक आदर्श दंपत्ति के रूप में सम्मान दिया जाता था। मेरा बचपन भौतिक और भावनात्मक रूप से भी, अत्यंत सुरक्षित था। मेरे पिता अपने सादगीपूर्ण सिद्धांतों के अनुरूप, सीधा-सादा जीवन जीते थे। उनका दिन सुबह की नमाज से शुरू होता था, जो वे सूर्योदय से पहले ही अता करते थे। वे ऐशो-आराम की उन चीजों से दूर रहते थे, जो उनकी नजर मैं गैर-जरूरी थीं। भोजन, दवाएं और कपड़े जैसी जीवन की जरूरी चीजों की कमी नहीं थी। मैं आम तौर पर मां के साथ रसोईघर के फर्श पर बैठकर खाना खाता था। वे मेरे सामने एक केले का पत्ता बिछा देती थीं, जिस पर चावल और मुंह में पानी ला देने वाला गर्मागर्म सांभर, घर में बने हुए अचार और चम्मच-भर ताजा नारियल की चटनी परोस देती थीं।

हम अपने पुश्तैनी घर में रहते थे, जो उन्नीसवीं सदी के मध्य में, चूना-पत्थर और र्इंटों से बना था। यह मकान काफी बड़ा था और रामेश्वरम में मस्जिद वाली गली में स्थित था। प्रसिद्ध शिव मंदिर, जिसके कारण रामेश्वरम एक पवित्र तीर्थ-स्थल बना, हमारे घर से लगभग दस मिनट की पैदल-दूरी पर था। हमारा मुहल्ला मुस्लिम-बहुल था और इसका मस्जिद वाली गली नाम, यहां की एक बहुत पुरानी मस्जिद पर रखा गया था। मुहल्ले में दोनों धर्मों के पूजा-स्थल अगल-बगल होने की वजह से हिंदू-मुस्लिम बड़े प्यार से, पड़ोसियों की तरह मिल-जुलकर रहते थे। मंदिर के बड़े पुजारी पं. लक्ष्मण शास्त्री मेरे पिताजी के घनिष्ठ मित्र थे। अपने शुरुआती बचपन की सबसे ताजा याद मुझे इन दोनों की है। दोनों अपने पारंपरिक पहनावे में आध्यात्मिक चर्चाएं करते रहते थे। दोनों की सोच में समानता उनके भजन-पूजन के रीति-रिवाज की भिन्नता से कहीं ऊपर थी।

बचपन में, मेरे पिता मुझे अपने साथ शाम की नमाज के लिए मस्जिद ले जाते थे। जरा भी भाव और अर्थ जाने बगैर मैं अरबी में अता की जाने वाली नमाज सुनता रहता था, लेकिन मैं इतना समझता था कि ये नमाजें ईश्वर तक पहुंचती हैं। जब मैं सवाल करने लायक हुआ, तो मैंने पिताजी से नमाज के बारे में और खुदा से संवाद बनाने में इसकी प्रासंगिकता के बारे में पूछा। उन्होंने मुझे समझाया कि नमाज में रहस्य और पेचीदगी जैसा कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा कि जब तुम नमाज पढ़ते हो तो तुम शरीर और उसके सांसारिक जुड़ाव से परे पहुंच जाते हो। तुम उस ब्रह्माण्ड का एक हिस्सा बन जाते हो, जहां धन-दौलत, उम्र, जाति और नस्ल लोगों में फर्क करने के पैमाने नहीं होते।

अक्सर, नमाज के बाद जब मेरे पिता मस्जिद से निकलते, तो विभिन्न धर्मों के लोग उनके इंतजार में बाहर बैठे मिलते थे। उनमें से कई लोग पानी के कटोरे उनके आगे कर देते कि वे अपनी अंगुलियां उनमें डालकर दुआ पढ़ दें। इसके बाद यह पानी घर ले जाकर मरीजों को दिया जाता। मुझे यह भी याद है कि फिर लोग मरीज के स्वस्थ होने के बाद शुक्रिया अदा करने के लिए हमारे घर आते थे, लेकिन वे अपने सहज अंदाज में अल्लाह का शुक्रिया करने को कहते, जो सबका भला करने वाला और दयालु है। वे जटिल आध्यात्मिक बातों को भी इतनी सरल भाषा में समझाते थे कि मेरे जैसा छोटा बच्चा भी उन्हें समझ सकता था। एक बार उन्होंने मुझे बताया कि हर एक इंसान अपने खुद के वक्त, जगह और हालत में, वह अच्छी हो या बुरी, दैवी शक्ति का हिस्सा बन जाता है, जिसे हम खुदा कहते हैं। दुख-तकलीफें हमें सबक देने और अति-आनंद तथा अहंकार की स्थिति से बाहर निकालने के लिए झटका देने आती हैं।

मैंने पिताजी से पूछा, आप ये सब बातें उन लोगों को क्यों नहीं बताते, जो आपके पास मदद और सलाह मांगने आते हैं? कुछ क्षण वे चुप रहे, जैसे यह जांच रहे हों कि मैं किस हद तक उनकी बात समझने में सक्षम हूं। जब उन्होंने उत्तर दिया, तो वह बड़े धीमे और शांत स्वर में था और उनके शब्दों में मैंने खुद को गजब की शक्ति से भरा महसूस किया। उन्होंने कहा कि इंसान जब कभी भी अपने-आप को एकदम अकेला या हताश पाता है, तो उसे किसी तरह की मदद और दिलासे के लिए एक साथी की जरूरत होती है। हर एक दुख या इच्छा, दर्द या उम्मीद एक खास मददगार पा ही लेते हैं। मेरे पिता खुद को केवल एक ऐसा मददगार, एक ऐसा मध्यस्थ मानते थे, जो नमाज, इबादत या मन्नतों की ताकत का इस्तेमाल शैतान, आत्मनाशी ताकतों को हराने के लिए करता है। पर वे मानते थे कि दिक्कतें सुलझाने का यह तरीका गलत है, क्योंकि इस तरह की प्रार्थना डर से पैदा होती है। उनका मानना था कि व्यक्ति का प्रारब्ध खुद के वास्तविक ज्ञान से उपजी दृष्टि होना चाहिए। डर अक्सर व्यक्ति की उम्मीदों को पूरा होने से रोक देता है। उन्हें सुनने के बाद मैंने महसूस किया कि वाकई मैं किस्मत वाला इंसान हूं, जिसे उन्होंने यह सब समझाया।

मैं अपने पिता के दर्शन से बेहद प्रभावित था। आज मैं यकीन करता हूं और जब बच्चा था, तब भी करता था कि जब कोई व्यक्ति उन भावनात्मक रिश्तों से मुक्त हो जाता है, जो उसकी राह रोकते हैं, तो उसकी स्वतंत्रता की राहें सिर्फ एक छोटे से कदम की दूरी पर रह जाती हैं। दिमागी शांति और खुशी हमें खुद के भीतर ही मिलती है, न कि किसी बाहरी तरीके से। जब एक इंसान इस सच को समझ जाता है, तो उसके लिए असफलताएं और बाधाएं अस्थायी बन जाती हैं। मैं बहुत छोटा था, सिर्फ छह साल का, जब मैंने पिताजी को अपना फलसफा जिंदगी में उतारते देखा। उन्होंने तीर्थ-यात्रियों को रामेश्वरम से धनुषकोडि ले जाने और वापस लाने के लिए एक नाव बनाने का फैसला किया। मैंने लकड़ी की इस नाव को समुद्र तट पर आकार लेते देखा। लकड़ी को आग पर तपाकर नाव का पेंदा और बाहरी दीवारें बनाने के लिए तैयार किया गया था। नाव को आकार लेते देखना वाकई बड़ा सम्मोहक था।

जब नाव बनकर तैयार हुई, तो पिताजी ने बड़ी खुशी-खुशी व्यापार शुरू किया। कुछ समय बाद रामेश्वरम तट पर एक भयंकर चक्रवात आया। तूफानी हवाओं में हमारी नाव टूट गई। पिताजी ने अपना नुकसान चुपचाप बर्दाश्त कर लिया, हकीकत में वे तूफान के कारण घटित एक बड़ी त्रासदी को लेकर ज्यादा परेशान थे। क्योंकि चक्रवाती तूफान में पामबान पुल उस वक्त ढह गया था, जब यात्रियों से भरी एक रेलगाड़ी उसके ऊपर से गुजर रही थी। मैंने अपने पिताजी के नजरिए और असली तबाही, दोनों से काफी कुछ सीखा। तब तक मैंने समुद्र की सिर्फ सुंदरता ही देखी थी। अब इसकी ताकत और अनियंत्रित ऊर्जा भी प्रकट हो गई।

हमारे एक रिश्तेदार अहमद जलालुद्दीन ने नाव बनाते वक्त पिताजी की काफी मदद की थी। बाद में, उन्होंने मेरी बहन जोहरा से निकाह कर लिया। नाव बनाने और उसके समुद्र में चलने के दौरान ज्यादातर समय साथ-साथ रहने से मैं और जलालुद्दीन उम्र के बड़े फासले के बावजूद अच्छे दोस्त बन गए थे। वे मुझसे पंद्रह साल बड़े थे और मुझे आजाद कहते थे। हर शाम हम दोनों साथ-साथ दूर घूमने निकल जाते थे। आमतौर पर हम आध्यात्मिक मुद्दों पर बात करते थे। इस विषय में संभवत: रामेश्वरम के महौल ने हमारी रुचि बढ़ाई थी, जहां रोजाना असंख्य तीर्थ-यात्री इबादत करने आते हैं। हमारी पहली नजर अक्सर विशाल, भव्य शिव मंदिर पर पड़ती थी। हम उतनी श्रद्धा से ही मंदिर की परिक्रमा करते थे, जितनी कि दूर-दराज जगहों से आने वाले यात्री करते थे।

मुझे लगता था कि जलालुद्दीन खुदा से सीधे संवाद करने में समर्थ थे, तकरीबन इस तरह, जैसे वे दोनों साथ-साथ काम करने वाले जोड़ीदार हों। वे खुदा से अपनी तमाम शंकाओं के बारे में ऐसे बात करते थे, जैसे कि वे ठीक उनके बाजू में खड़े हों और सुन रहे हों। मैंने संवाद का यह तरीका अद्भुत पाया। मैं समुद्र में डुबकी लगाकर अपनी प्राचीन प्रार्थनाएं उच्चारित करते और पारंपरिक संस्कार पूरे करते तीर्थ-यात्रियों को भी गौर से देखा करता था। एक अज्ञात और अदृश्य शक्ति के प्रति सम्मान का भाव, उनमें और जलालुद्दीन में साफ दिखाई देता था।

जलालुद्दीन स्कूली शिक्षा से आगे नहीं पढ़ पाए थे, क्योंकि उनका परिवार शिक्षा का खर्च उठाने में असमर्थ था। शायद यही कारण था कि वे हमेशा मुझे पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे और मेरी सफलताओं से बेहद खुशी महसूस करते थे। प्रसंगवश, उस जमाने में पूरे टापू में जलालुद्दीन अकेले आदमी थे, जो अंग्रेजी में लिख सकते थे। वे हर उस व्यक्ति के लिए पत्र लिखते थे, जिसे जरूरत होती थी, अर्जी, कामकाजी या निजी खत। आसपास के इलाके में बहुत कम लोग ही थे, जो हमारे छोटे से कस्बे से बाहर की दुनिया की जानकारी या ज्ञान में उनकी बराबरी पर आते हों।

जिंदगी के उस पड़ाव पर जलालुद्दीन ने मुझ पर गहरा असर डाला। वे मुझसे तमाम विषयों पर बात करते थे। वैज्ञानिक खोजें, समकालीन लेखन और साहित्य यहां तक कि चिकित्सा विज्ञान और उसकी नई उपलब्धियों के बारे में भी। वे ही थे, जिन्होंने अपने सीमित संसार से बाहर की दुनिया की ओर देख पाने में मेरी सबसे ज्यादा मदद की। उस वक्त मेरे जीवन का एक दूसरा पहलू था अध्ययन से बढ़ता लगाव, यानी वह आदत जो ताउम्र मेरे साथ बनी रही है। हमारे जैसी घरेलू जीवन शैली में किताबें दुर्लभ थीं और मुश्किल से ही मिल पाती थीं, सिवाय एस.टी.आर. मानिकम के विशाल निजी पुस्तकालय के।

मानिकम एक उग्र राष्ट्रवादी थे, जो अहिंसा के गांधीवादी तरीके से इतर साधनों से आजादी की लड़ाई लड़ना चाहते थे। मैं अक्सर किताबें उधार लेने के लिए उनके घर जाया करता था। वे मुझे अधिक पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे। एक और शख्स भी थे, जिन्होंने मेरे बचपन को गढ़ने में सहायता की, मेरे चचेरे भाई, शम्सुद्दीन। उस वक्त रामेश्वरम में वे अकेले अखबार वितरक थे। पामबान से सुबह आने वाली ट्रेन रामेश्वरम के पाठकों के लिए तमिल अखबार लेकर आती थी। उन दिनों अखबार आजादी की लड़ाई के ताजा-तरीन हालात की जानकारी से पटे पड़े रहते थे, जिनमें ज्यादातर पाठक गहरी रुचि लेते थे.……

तो ये थी श्री कलाम के बचपन की कुछ रोचक झलक और इससे हम ये भी अंदाजा लगा सकते की कैसे, अपने जीवन में कुछ बड़ा करने वालों का बचपन ऐशो आराम के बजाय विचारो से प्रभावित होता है।

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