भोले नाथ के भोले पन का बहुत फायदा उठाया भक्तों ने

 

1ShivRatri08कई अच्छे बुरे लोगों ने भोले भंडारी के भोलेपन का खूब फायदा उठाया है !

सबको पता है की वैसे तो श्री महादेव को दुनियादारी से कोई मतलब रहता है नहीं और वो अकेले कैलाश पर बैठकर कठोर तपस्या में सदा लीन रहते हैं लेकिन अगर कोई भक्त बार बार इमोशनल होकर उनको बुलाता है तो ये अपने आप को रोक नहीं पाते और भक्त के पास पहुचने पर भक्त को देखकर इतने गदगद व मगन हो जाते हैं कि ये भी नहीं सोचते की भक्त मांग क्या रहा है !

भक्त जो भी मांगता है उससे कहीं ज्यादा बढ़कर उसे देकर, भोलेनाथ खुद बहुत ख़ुशी महसूस करते हैं !

भोलेनाथ का भोलापन उनके लिए तब समस्या बन गया जब भस्मासुर उन्ही से शक्ति प्राप्त कर उन्ही को भस्म करने के लिए दौड़ा !

भोले नाथ के सबसे बड़े भक्तों में एक नाम आता है रावण का जो भोले नाथ को खुश करने के लिए आखिरी हद तक गया !

baidyanath dham1Baidyanath2पहले उसने बहुत कठिन तपस्या की और जब इससे भी शिव प्रकट नहीं हुए तो वो बार बार अपनी गर्दन काटने लगा जिससे श्री शिव से रहा नहीं गया और वो रावण के समक्ष प्रकट होकर उन्होंने अपने वरदानों का अथाह भंडार खोल दिया !

विस्तृत कथा इस प्रकार है कि जब श्री शिव प्रकट हुए तो रावण ने शिव से कहा आप उस शिवलिंग में साक्षात प्रकट हो जाइए जिसे मैं अपने साथ लेकर जाना चाहता हूं।

भगवान शिव ने कहा ठीक है तुम उस शिवलिंग में मुझे लेकर चलो। लेकिन मेरी भी एक शर्त है कि कुछ भी हो जाए तुम मुझे रास्ते में नीचे नहीं उतारोगे। इसके बाद रावण उस महाशिवलिंग को लेकर चल पड़ा।

कुछ दूर चलने के बाद रावण शिव की बात भूलने लगा। कुछ और आगे बढ़ा तो उसे बहुत तेज लघु शंका का अहसास हुआ। उसने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। जब लघु शंका से वापस आकर शिवलिंग को उठाने लगा तो शिवलिंग नहीं उठा। फिर रावण को अपनी गलती का एहसास हुआ। जिस जगह पर रावण ने शिवलिंग को उतारा था उस जगह को बैजनाथ कहते हैं।

बैजनाथ से जब शिवलिंग को रावण ले जा नहीं पाया तो चिंता में पड़ गया। रावण समझ नहीं पा रहा था कि क्या करें। इसके बाद रावण भगवान शिव की तपस्या में फिर लीन हो गया।

साल दर साल निकल गए। लेकिन भगवान शिव प्रकट नहीं हुए। लेकिन रावण भी कहां हार मानने वाला था, वह तपस्या करता रहा। जब काफी साल गुजर गए और भगवान शिव प्रकट होने का नाम नहीं ले रहे थे तो रावण ने एक नया तरीका सोचा।

रावण ने शिव भगवान को प्रकट करने के लिए अपना सिर काटने का फैसला कर लिया। रावण को लगा कि एक सिर काटते ही भगवान शिव प्रकट हो जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रावण फिर चिंता में पड़ गया। इसके बाद उसने अपने दूसरे सिर की बलि दे दी। लेकिन शिव नहीं आए। फिर एक एक कर रावण ने अपने नौ सिरों की बलि दे दी।

रावण अपना दसवां सिर काटने ही जा रहा था कि भगवान शिव प्रकट हो गए। रावण ने शिव भगवान से कहा कि बहुत बड़ी गलती हो गई। मुझे माफ कर दीजिए और मेरे साथ चलिए। लेकिन भगवान ने रावण की बात नहीं मानी। बदले में शिव ने एक एक कर रावण के नौ सिरों को जिंदा कर दिया और कहा कि जाओ तुम फिर पहले की तरह बलशाली हो जाओगे।

तुम पर हमारी कृपा बनी रहेगी। लेकिन जो वचन मैंने तुमको दिया था वो व्यर्थ नहीं जाएगा। इसलिए अपने मन को नियंत्रित करो और जाओ। तुम हरदम मेरे सबसे प्रिय भक्त रहोगे। आज भी बैजनाथ में वह पुराना मंदिर है जहां रावण ने शिवलिंग को नीचे उतारा था।

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