प्रचण्ड तेजस्वी सन्त – भाग 6

200px-Gopinath-kavirajश्री गोपीनाथ कविराज –

ये संस्कृत के विद्वान और महान दार्शनिक थे। योग और तंत्र के प्रकांड विद्वान डॉ. गोपीनाथ कविराज का जन्म 7 सितम्बर 1887 ई. में ढाका (अब बंगलादेश में) ज़िले के एक गाँव में हुआ था।

बचपन में ही माता-पिता का देहांत हो जाने के कारण उनका पालन-पोषण मामा ने किया। उनकी शिक्षा ढाका, कोलकाता, जयपुर और वाराणसी में हुई।

वाराणसी के क्वींस कॉलेज में संस्कृत में एम.ए. का अध्ययन करते समय उनका आचार्य नरेंद्र देव से परिचय हुआ था। उनकी योग्यता से प्रभावित क्वींस कॉलेज के प्राचार्य डॉ. वेनिस ने उन्हें वाराणसी में रोक कर कॉलेज के ‘सरस्वती भवन’ पुस्तकालय का अध्यक्ष नियुक्त कर लिया। इस पुस्तकालय को वर्तमान समृद्ध रूप प्रदान करने का मुख्य श्रेय कविराज जी को है। 1924 में वे क्वींस कॉलेज के प्रधानाचार्य बनाए गए और 1937 तक इस पद पर रहे।

गोपीनाथ कविराज सेवानिवृत्ति के पश्चात् अपना समय प्राचीन ज्ञान-विज्ञान, अध्यात्म आदि पर चर्चा और तांत्रिक साधना में ही बिताते रहे। 1934 में सरकार ने उन्हें ‘महामहोपाध्याय’ की उपाधि प्रदान की। भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म विभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया था।

1390473958_valmikiश्री नागार्जुन –

नागार्जुन को बौध्द धर्म की महायान शाखा का संस्थापक माना जाता है। उन्हें सम्राट कनिष्क और सातवाहन राजवंश के समकालीन माना जाता है।

हुएनसांग ने ‘भारत भ्रमण वृत्तांत’ में नागार्जुन को कोसल निवासी बताया है।

उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ को प्राचीन काल में दक्षिण कोसल कहा जाता था। राहुल सांकृत्यायन ने भी ‘राहुल यात्रावली’ में नागार्जुन को दक्षिण कोसल का निवासी माना है।

नागार्जुन एक महान दार्शनिक और प्रखर संत ही नहीं बल्कि रस सिध्दि योगी और आयुर्वेदाचार्य थे। ध्यान के माध्यम से उन्होंने अनेक आध्यात्मिक सिध्दियां प्राप्त की थी। छत्तीसगढ़ में जन्में नागार्जुन को ज्ञान विज्ञान, योग ने अमर बना दिया।

dnyanaसंत ज्ञानेश्वर –

इनकी गणना भारत के महान संतों एवं मराठी कवियों में होती है। इनका जन्म 1275 ई. में महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले में पैठण के पास आपेगाँव में भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था।

इनके पिता का नाम विट्ठल पंत तथा माता का नाम रुक्मिणी बाई था। विवाह के कई वर्षों बाद भी कोई सन्तान न होने पर विट्ठल पंत ने संन्यास ग्रहण कर लिया और स्वामी रामानंद को अपना गुरु बना लिया। बाद में गुरु के आदेश पर ही इन्होंने फिर से गृहस्थ जीवन को अपनाया।

इनके इस कार्य को समाज ने मान्यता प्रदान नहीं की और समाज से इनका बहिष्कार कर दिया और इनका बड़ा अपमान किया। ज्ञानेश्वर के माता-पिता इस अपमान के बोझ को सह न सके और उन्होंने त्रिवेणी में डूबकर प्राण त्याग कर दिए। संत ज्ञानेश्वर ने भी 21 वर्ष की आयु में ही संसार का त्यागकर समाधि ग्रहण कर ली। संत ज्ञानेश्वर की कई चमत्कारिक कथाएँ प्रचलित हैं।

कहते हैं, उन्होंने भैंस के सिर पर हाथ रखकर उसके मुँह से वेद मंत्रों का उच्चारण कराया।

भैंस को जो डंडे मारे गए, उसके निशान ज्ञानेश्वर के शरीर पर उभर आए। पंद्रह वर्ष की उम्र में ही ज्ञानेश्वर कृष्णभक्त और योगी बन चुके थे। बड़े भाई निवृत्तिनाथ के कहने पर उन्होंने एक वर्ष के अंदर ही भगवद्गीता पर टीका लिख डाली। ‘ज्ञानेश्वरी’ नाम का यह ग्रंथ मराठी भाषा का अद्वितीय ग्रंथ माना जाता है।

download (9)आचार्य जैमिनी –

महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यासदेव के शिष्य थे। उनसे इन्होने सामवेद और महाभारत की शिक्षा पायी थीं। ये ही प्रसिद्ध पूर्व मीमांसा दर्शन के रचयिता हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने ‘भारतसंहिता’ की भी रचना की थी, जो ‘जैमिनि भारत’ के नाम से प्रसिद्ध है।

इन्होने द्रोणपुत्रों से मार्कण्डेय पुराण सुना था। इनके पुत्र का नाम सुमन्तु और पौत्र का नाम सत्वान था। इन तीनों ने वेद की एक-एक संहिता बनायी है। हिरण्यनाभ, पैष्पंजि और अवन्त्य नाम के इन के तीन शिष्यों ने उन संहिताओं का अध्ययन किया था।

1Picture-004महर्षि कणाद –

ये वैशेषिक सूत्र के निर्माता, परम्परा से प्रचलित वैशेषिक सिद्धान्तों के क्रमबद्ध संग्रहकर्ता एवं वैशेषिक दर्शन के समुद्भावक माने जाते हैं।

वायुपुराण में यह बताया गया है कि कणाद प्रभास तीर्थ में रहते थे और शिव के अवतार थे।

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