भक्त दुःख से छटपटायेगा, तो मैहर वाली माँ बेचैन हो उठेगी

· September 27, 2015

maa-sharda1_07_04_2014ममता की सागर माँ दुर्गा जहाँ प्रत्यक्ष रूप से वास करती हैं उस पवित्र धाम का नाम है मैहर धाम !


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पूरे विश्व से देवी के भक्त यहाँ पर अपनी बिगड़ी बनाने के लिए हजारों की संख्या में रोज पहुचते हैं और नवरात्रि में तो पूरा मैहर शहर का कोना कोना देवी के लाखों भक्तों की जयकारों से भरी गर्जना से उद्घोषित हो उठता है !

उत्तर में जैसे लोग मां दुर्गा के दर्शन के लिए पहाड़ों को पार करते हुए वैष्णो देवी तक पहुंचते हैं, ठीक उसी तरह मध्य प्रदेश में भी 1063 सीढि़यां लांघ कर माता शारदा (जो मैहर देवी के नाम से प्रसिद्द हैं) के दर्शन करने जाते हैं।

मध्यप्रदेश के चित्रकूट से लगे सतना जिले में मैहर शहर की लगभग 600 फुट की ऊंचाई वाली त्रिकुटा पहाड़ी पर मां शारदा का मंदिर स्थित है।

महा वीर आला-उदल को वरदान देने वाली मां शारदा देवी का यह मंदिर बहुत जागृत और चमत्कारिक माना जाता है। कहते हैं कि रात को आला-उदल आकर माता की आरती करते हैं, जिसकी आवाज नीचे तक सुनाई देती है।

मैहर का मतलब है मां का हार। मैहर नगरी से 5 किलोमीटर दूर त्रिकूट पर्वत पर माता शारदा देवी का वास है। पर्वत की चोटी के मध्य में ही शारदा माता का मंदिर है |

इसी पर्वत की चोटी पर माता के साथ ही श्री काल भैरव, भगवान हनुमान जी, देवी काली, दुर्गा, श्री गौरी शंकर, शेष नाग, ब्रह्म देव और जलपा देवी की भी पूजा की जाती है।

क्षेत्रीय लोगों के अनुसार आल्हा और उदल जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था, वे भी शारदा माता के बड़े भक्त हुआ करते थे। इन दोनों ने ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी।

इसके बाद आल्हा ने इस मंदिर में 12 सालों तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था। माता ने उन्हें अमरत्व का आशीर्वाद दिया था। आल्हा माता को शारदा माई कह कर पुकारा करते था। तभी से यह मंदिर भी माता शारदा माई के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

आज भी यह कहा जाता है कि माता शारदा के दर्शन हर दिन सबसे पहले आल्हा और उदल ही करते हैं।

मान्यता है कि जब शंकर जी सती के पार्थिव शरीर को लेकर विलाप करते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान विचरण कर रहे थे, तब इस स्थान पर मां के गले का हार गिरा था। इसी कारण इस स्थान का नाम ‘माईहार’ पड़ा जो बाद में बिगड़ते-बिगड़ते ‘मैहर’ हो गया।

शक्ति के बिना देवता भी कुछ नहीं कर सकते। मां शारदा उस आदि शक्ति के ही रूप हैं जिनकी शक्ति और साथ प्राप्त करके ब्रह्मा जी सृष्टि का निर्माण कार्य, विष्णु जी पालन कार्य और शिवजी संहार का कार्य करते हैं।

भगवती मां शारदा को विद्यादात्री माना जाता है। ब्रह्म परमेश्वरी मां शारदा के शरीर का रंग कुंद पुष्प तथा चंद्रमा के समान धवल है और उनका वाहन हंस है। वे चार भुजाओं वाली हैं, जिनके एक हाथ में वीणा, दूसरे में पुस्तक, तीसरे में माला है।

उनका चौथा हाथ वरदान देने की मुद्रा में है। वे सदा श्वेत वस्त्र धारण करती हैं व श्वेत कमल पर निवास करती हैं। उनकी कृपा से ही व्यक्ति परम विद्वान बनता है।

इस तीर्थ स्थल के सन्दर्भ में एक दन्तकथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि आज से 200 साल पहले मैहर में महाराज दुर्जन सिंह जूदेव राज्य करते थे। उन्हीं कें राज्य का एक ग्वाला गाय चराने के लिए जंगल में आया करता था। इस घनघोर भयावह जंगल में दिन में भी रात जैसा अंधेरा छाया रहता था।

तरह-तरह की डरावनी आवाजें आया करती थीं। एक दिन उसने देखा कि उन्हीं गायों के साथ एक सुनहरी गाय कहाँ से आ गई और शाम होते ही वह गाय अचानक कहीं चली गई। दूसरे दिन जब वह इस पहाड़ी पर गाय लेकर आया तो देखा कि फिर वही गाय इन गायों के साथ मिलकर घास चर रही है।

तब उसने निश्चय किया कि शाम को जब यह गाय वापस जाएगी, तब उसके पीछे-पीछे जाएगा। गाय का पीछा करते हुए उसने देखा कि वह ऊपर पहाड़ी की चोटी में स्थित एक गुफ़ा में चली गई और उसके अंदर जाते ही गुफ़ा का द्वार बंद हो गया। वह वहीं गुफ़ा के द्वार पर बैठ गया। उसे पता नहीं कि कितनी देर के बाद गुफ़ा का द्वार खुला।

लेकिन उसे वहाँ एक बूढ़ी माँ के दर्शन हुए। तब ग्वाले ने उस बूढ़ी महिला से कहा- “माई मैं आपकी गाय को चराता हूँ, इसलिए मुझे पेट के वास्ते कुछ मिल जाए। मैं इसी इच्छा से आपके द्वार आया हूँ।” बूढ़ी माता अंदर गई और लकड़ी के सूप में जौ के दाने उस ग्वाले को दिए और कहा- “अब तू इस भयानक जंगल में अकेले न आया कर।”

वह बोला- “माता मेरा तो जंगल-जंगल गाय चराना ही काम है। लेकिन माँ आप इस भयानक जंगल में अकेली रहती हैं? आपको डर नहीं लगता।” तो बूढ़ी माता ने उस ग्वाले से हंसकर कहा- “बेटा यह जंगल, ऊंचे पर्वत-पहाड़ ही मेरा घर हैं, में यहीं निवास करती हूँ।” इतना कह कर वह गायब हो गई। ग्वाले ने घर वापस आकर जब उस जौ के दाने वाली गठरी को खोली, तो वह हैरान हो गया।

जौ की जगह हीरे-मोती चमक रहे थे। उसने सोचा मैं इसका क्या करूँगा। सुबह होते ही महाराजा के दरबार में पेश करूँगा और उन्हें आप बीती कहानी सुनाऊँगा।

दूसरे दिन भरे दरबार में वह ग्वाला अपनी फरियाद लेकर पहुँचा और महाराजा के सामने पूरी आपबीती सुनाई। उस ग्वाले की कहानी सुनकर राजा ने दूसरे दिन वहाँ जाने का ऐलान किया और अपने महल में सोने चला गया।

रात में राजा को स्वप्न में ग्वाले द्वारा बताई बूढ़ी माता के दर्शन हुए और आभास हुआ कि आदि शक्ति माँ शारदा हैं। स्वप्न में माता ने राजा को वहाँ मूर्ति स्थापित करने की आज्ञा दी और कहा कि मेरे दर्शन मात्र से सभी की मनोकामनाएँ पूरी होंगी। सुबह होते ही राजा ने माता के आदेशानुसार सारे कर्म पूरे करवा दिए।

शीघ्र ही इस स्थान की महिमा चारों ओर फैल गई। माता के दर्शनों के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से यहाँ पर आने लगे और उनकी मनोवांछित मनोकामना पूरी होती गई।

इसके पश्चात माता के भक्तों ने माँ शारदा का सुंदर भव्य तथा विशाल मंदिर बनवा दिया।

धन्य है ऐसी अनन्त ममतामयी माँ दुर्गा स्वरूपा माँ मैहर देवी !

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