बिना मेहनत के बैठ कर खाने वाला पागल हो सकता है

· January 30, 2016

mजिन्दा आदमी का मन कभी भी काम करना नहीं छोड़ता चाहे आदमी सोये या जागे ! मन को सही से नहीं सम्भाला जाय तो मन आत्मघाती भी हो सकता है ! इसलिए हमारे शास्त्रों में बार बार मन को सही काम में लगाए या उलझाये रहने को कहा गया है !


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ये सत्य है कि आदमी रोज रोज बिना किसी विशेष फिजिकल वर्क (शारीरिक मेहनत) के खाना खायेगा तो शरीर में तो सैकड़ों किस्म के रोग पनपेंगे साथ ही कई मानसिक रोग भी पैदा हो जायेंगे !

अगर जीवन में कोई अचानक से बड़ी दुर्घटना ना हो तो, डिप्रेशन या सदमे में वो लोग जल्दी नहीं जा पाते है जो रोज कड़ी शारीरिक मेहनत करते हैं !

जो कहावत है की खाली दिमाग शैतान का घर, 100 प्रतिशत सही है !

अक्सर अमीर घराने की हाउस वाइफ महिलायें या किशोर उम्र के लड़के लड़कियों को ज्यादा डिप्रेशन का शिकार होते देखा जाता हैं क्योंकि उनके घर के काम करने के लिए नौकर होते हैं और बाहर का काम पति या पिता सँभाल लेते हैं ! ऐसे लोग जब संसार के हर काम (जैसे पार्टी, शॉपिंग, घूमना, मौज मस्ती आदि) कर के थक जाते हैं तो उन्हें फिर शुरू होती है जबरदस्त उदासीनता, नीरसता !

ऐसे लोगों का किसी भी चीज में मन नहीं लगता तथा स्वभाव भी एब्नार्मल हो जाता है मतलब चिड़चिड़ापन, डर लगना, हर समय रोने का मन करना और स्थिति ज्यादा बिगड़ जाय तो आत्महत्या करने का मन भी कर सकता है !

भिखारी भी बैठ कर खाते हैं, गरीबों में भी कुछ स्वभावतः कामचोर टाइप लोग होते हैं वे भी बैठ कर ही खाते हैं, ज्यादातर बैठ कर साधना करने वाले आदरणीय साधू गण भी बिना विशेष शारीरिक मेहनत के खाते हैं तो उन्हें क्यों नहीं डिप्रेशन होता ?

इनमे से उन्ही लोगों को डिप्रेशन नहीं होता है जो मिताहारी हैं मतलब शरीर को जिन्दा या स्वस्थ रहने के लिए जितने खाने से काम चल जाय सिर्फ उतने ही खाने से काम चलाते हैं !

अगर मन की व्यस्तता किसी उचित उददेश्य (जैसे रोटी, कपड़ा, मकान, नौकरी, व्यापार, घरेलू काम, सम्मान, सेवा धर्म, ईश्वर भजन आदि) तक सीमित हो तो सामन्यतया मन किसी हानिकारक स्थिति में फसने से बच जाता है पर जैसे ही मन आवश्यक आवश्यकताओं की सीमा को पार कर, भोग विलास अय्याशी के बारे में सोचने लगता है वैसे ही मन, शरीर को शरीर की सीमाओं का अतिक्रमण करने के लिए उकसाता है जो की खतरनाक है और सर्वथा ऐसी स्थितियों से बचने को कहा गया है !

शरीर में बार बार छोटे रोगों का होना, सिग्नल होता है की तुरन्त संभलने जाने का, नहीं तो कब अचानक से कोई खून के आंसू रुलाने वाली बड़ी बीमारी शरीर में लग जाय कोई नहीं जानता !

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