प्रकृति का लय ही, प्रलय है

· August 1, 2015

Eruption_1954_Kilauea_Volcanoहर व्यक्ति के जीवन का अन्त ही प्रलय है । श्री महर्षि ने जाने कितने छात्रों को, जाने कितनी बार पढ़ाया होगा यह सूक्त। कितनी बार दुहराया होगा वह अर्थ जो उन्होंने अपने गुरु से सुना था। पर आज पहला मन्त्र पढ़ना आरम्भ किया, ‘‘न असत् आसीत् न सत् आसीत् तदानीं’’ कि हठात् रुक गये। शिष्यगण विस्मय से उन्हें देख रहे थे। उनके होठ खुले थे पर न तो उनमें कम्पन था न गति। शायद उन्हें यह बोध भी नहीं रह गया था कि उनके सामने उनके शिष्य भी बैठे हुए हैं। वह इस ऋचा पर नहीं रुके थे। पूरा सूक्त एक काली लौ की तरह उनकी चेतना में एक साथ काँप-सा रहा था। काली लौ। किसी को समझाना चाहें तो कितना कठिन होगा। समझेगा धुएँ या कुहासे की बात कर रहे हैं। पर धुएँ और कुहासे को देखने के लिए भी प्रकाश तो चाहिए। यह तो सघन काले अँधेरे के बीच एक काली शिखा के काँपने की अनुभूति थी जो दृष्टिगम्य नहीं थी पर फिर भी अनुभूतिगम्य थी। अनुभूतिगम्य भी नहीं, बोधगम्य।

सत् नहीं, असत् नहीं, वायु नहीं, आकाश नहीं, कोई दिशा नहीं, कोई गति नहीं, कोई आधार नहीं, मृत्यु नहीं, अमरता नहीं, न रात, न दिन, न प्रकाश, न अन्धकार।

 

‘‘नहीं, अन्धकार तो था। उबलता हुआ अन्धकार! तरल! अपने में ही छिपा हुआ! अन्धकार तो था।’’ उनके मुँह से निकला पर इस समय भी न तो उन्हें यह बोध था कि उनके शिष्य उनको विस्मय से देख रहे हैं न ही यह कि वह उन्हें पाठ पढ़ाने बैठे थे। वह अपने से आत्मालाप कर रहे थे। आत्मालाप भी नहीं। बोलते हुए सोच रहे थे।

 

परन्तु इस अन्धकार से पहले। तब, जब अन्धकार भी नहीं रहा होगा। जब कुछ न रहा होगा, तब क्या था? कुछ नहीं के होने को क्या कहेंगे वह? उसे अन्धकार कहना ठीक नहीं लग रहा था और उन्हें उस अवस्था के लिए कोई शब्द मिल नहीं रहा था। सूक्तकार को भी शब्द न मिला होगा। तभी तो अन्धकार कह दिया। भाषा तो उसके रचे हुए संसार को व्यक्त करने का साधन है। उस अरचित, अरूप, अनाकार को कैसे व्यक्त कर पाएगी। और फिर प्रश्न केवल भाषा का था भी नहीं। विकास की उस प्रक्रिया का था जिसका न तो कोई द्रष्टा था, न ज्ञाता। जो केवल अनुमान और ध्यान का विषय था। एक लम्बा समय गुजर गया अपने आप से जूझते। शास्त्रों और श्रुतियों में जो पढ़ा था उसे जोड़ते-मिलाते।

 

पर तभी, उनकी कल्पना के सामने उपस्थित उस अन्धकार से ही जैसे एक शब्द फूटा, कुछ यूँ कि जैसे अन्धकार ही सिमटकर शब्द बन गया हो, ‘मृत्यु’ उन्हें लगा उन्होंने इस शब्द को सोचा नहीं है, सुना है। एक अस्फुट विस्फोट के रूप में।

 

‘‘जब कुछ नहीं था तब मृत्यु थी।’’ जैसे कोई समझा रहा हो उन्हें, परम गुरु की भाँति, मृत्यु का कोई रूप या आकार तो है नहीं। अस्तित्व का अभाव ही तो मृत्यु है। रूप का, आकार का, क्रिया का, गति का, किसी का भी न रह जाना। यदि किसी का अस्तित्व था ही नहीं तो वह अन्धकार भी नहीं रहा होगा। मृत्यु ही रही होगी। अन्धकार का भी रूप उसी ने लिया होगा। यदि कोई अपने जन्म से पूर्व की अवस्था को नहीं समझ पाता तो परमेष्ठी कैसे समझ पाते। वह भी अपने पूर्व रूप को समझ न पाये। उस अन्धकार से पहले वह स्वयं मृत्यु रूप ही थे। जीवन और सृजन क्या जो नहीं था उसका हो जाना, जिसका अस्तित्व नहीं था उसका अस्तित्व में आ जाना ही नहीं है।

 

‘‘सब कुछ मृत्यु से निकला है। मृत्यु ही जीवन का गर्भ है। सृष्टि का मूल।’’ उनके मुँह से निकला। अब वह कुछ आत्मसजग हो गये थे।

 

शिष्यों पर दृष्टि गयी तो हँसी आ गयी, ‘‘सब कुछ उसी से निकला है। मृत्यु से ही। वही थी। मृत्युना एव इदं आवृतं आसीत्। मृत्यु से ही सब कुछ ढका हुआ था। क्षुधा से ही आवृत था सब कुछ। अशनाया से। अशनाया हि मृत्युः। मृत्यु क्षुधा का ही दूसरा नाम तो है। सब कुछ को निगलती चली जाती है यह। परम क्षुधा। अमिट और अनन्त भूख। इसी का कभी अन्त नहीं होता। सृष्टि से पहले भी यही थी और सृष्टि के बाद भी यही क्रियाशील रहती है। कभी अपने गर्भ में छिपी और कभी अपने को ही उद्घाटित करती। अपने से बाहर आकर अपने को ही ग्रसती।’’

 

‘‘अनन्त भूख। यही तो मृत्यु की लालसा है। और इसी से सब कुछ पैदा हुआ। मृत्यु की इस लालसा से ही।’’

 

शिष्य विस्मय में आचार्य को देख रहे थे। श्री वेद ऋषि की आदत है पढ़ाते-पढ़ाते कहीं खो जाने की। पर इस तरह का आत्मालाप और फिर मुखर संवाद वह पहली बार कर रहे थे। शिष्य विस्मय में उन्हें देख रहे थे और जो कुछ उनके शब्दों और भावों से प्रकट हो रहा था उसे ग्रहण करने का प्रयत्न कर रहे थे।

 

अब वह सचमुच उन्हें समझा रहे थे, ‘‘इस मृत्यु से यह जीवन कैसे निकल आया? हुआ यह कि उस परम मृत्यु के जी में आया कि वह आत्मा से युक्त हो जाए।’’ वह फिर रुक गये। रुककर कुछ सोचने लगे। फिर बोले, ‘‘इसके लिए उसने लम्बे अरसे तक अर्चन किया। अब इससे क या जल उत्पन्न हुआ। यह जल सामान्य जल नहीं था। इसमें द्रव भी था और स्थूल भी, वायु भी और तेज भी। आकाश भी उसी में विद्यमान था और दिशाएँ भी उसी में मिली हुई थीं। यह कारण जल पंचविपाक था। सभी घुलकर द्रव में बदल गये थे। यही वह तरल अन्धकार था। अपने आप में सिमटा हुआ। निगूढ़। घनीभूत। अपने उत्ताप में तपता हुआ, पर अपने ही दबाव में इतना कसा हुआ कि उफनने को भी अवकाश नहीं।

 

‘‘और फिर इसके अपने ही ताप से इसी का शर या स्थूल भाग एकत्र हो गया। जम गया। यही जमकर पृथ्वी बन गया। यह पृथिवी शर भाग से बनी अतः यही प्रजापति का प्रथम शरीर हुआ। उसका व्यक्त रूप।’’

 

‘‘फिर?’’ प्रश्न किसी अन्य ने नहीं किया था। उन्होंने अपने आप से किया था। ‘‘क्या हुआ होगा उसके बाद?’’

 

वह जो तप रहा था उसके स्थूल अंश के अलग हो जाने पर उसके उस ताप का क्या हुआ? उससे अग्नि-रस या द्रवित ऊष्मा अलग हुई वही अग्नि बन गयी। यही प्रजापति ही पहला शरीरी हुआ। पर इसमें बहुत लम्बा समय लगा। बहुत लम्बा।

 

‘‘फिर इसके बाद?’’

 

अब श्री वेद ऋषि का चिन्तक कवि में बदल गया। उनके सामने एक विराट रूपक खड़ा हो गया। उस प्रजापति ने अपने को तीन भागों में विभक्त कर दिया। इसका एक तिहाई वायु हो गया। एक तिहाई आदित्य। यह पूर्व दिशा ही उस प्रजापति का सिर है। ईशानी और आग्नेयी दिशाएँ उसकी भुजाएँ हैं। पश्चिम दिशा उसका पुच्छ भाग है और वायव्य व नैऋत्य दिशाएँ उसकी जंघाएँ। दक्षिण और उत्तर दिशाएँ उसके पार्श्व हैं। द्युलोक पृष्ठभाग, अन्तरिक्ष उदर और यह पृथिवी उसका हृदय है। यह अग्नि रूप प्रजापति पहले द्रव रूप में ही था और इसलिए जल में ही उसका निवास था।

 

परन्तु सृष्टि चक्र यहीं समाप्त तो नहीं हो जाता। बहुत कुछ है इस संसार में। कैसे हो गया वह।

 

श्री वेद ऋषि आत्मसम्मोहन की अवस्था में पहुँच गये थे।

 

उसने फिर कामना की कि उसका एक और रूप उत्पन्न हो। उसने वाणी की मिथुन रूप में भावना की और इससे संवत्सर की उत्पत्ति हुई। इससे पहले संवत्सर नहीं था। संवत्सर की जो अवधि है उतने समय तक मृत्यु रूपी प्रजापति ने उसे गर्भ में धारण किये रखा। फिर उसे उत्पन्न किया। उत्पन्न करने के बाद उसने उसका मुँह फाड़ा। उसका मुँह फटते ही उससे भाण् की आवाज निकली। इसी से वाक् की उत्पत्ति हुई। अब उसने उस वाणी और मन के संयोग से ऋक्, साम, यजुर्वेद को, छन्दों को, और ये जो प्रजा और पशु हैं उनको रचा। परन्तु प्रजापति स्वयं ही मृत्यु रूप है अतः उसने जिनको भी रचा उन सभी को खाने का विचार किया। इसीलिए मृत्यु को ही अदिति भी कहते हैं।

 

और इस मृत्यु ने, सत् और असत् दोनों के इस अभाव ने, कुछ होने का इरादा किया। जो है ही नहीं वह सोच सकता है क्या? यहाँ आकर इन कवियों के भी प्रेरक नासदीय सूक्त के कवि ने एक मुसीबत खड़ी कर दी। पर आरम्भ तो कहीं से होना था। एक चरम बिन्दु पर पहुँचकर हमारे तर्क व्यर्थ तो हो ही जाते हैं। हमारी मोटी बुद्धि हमारा साथ नहीं दे पाती। आइंस्टाइन कहते हैं-समय और आकाश दोनों का अन्त है पर वह इतना विराट है कि इसकी हम कल्पना तक नहीं कर सकते। अन्त है पर नहीं है। ठीक यही भाषा है और नहीं है। और यह भाषा या-तो-यह-या-वह वाली अनिश्चयात्मक भाषा भी नहीं है। सीधा निषेध है। यह भी नहीं और वह भी नहीं। नहीं भी नहीं और नहीं का नहीं भी। न इति, न इति। और इसीलिए ज्ञान का दावा अज्ञान का सूचक और अज्ञान की स्वीकृति ज्ञान का प्रमाण, क्योंकि यहाँ ज्ञान का अर्थ ही अज्ञेयता का बोध है। अतः यह कहना कि मृत्यु के मन में, उस विराट क्षुधा या अशनाया के मन में कुछ बनने का विचार नहीं आ सकता, उतना ही जोखिम भरा है जैसे यह बताना कि यह विचार कैसे और क्यों आया होगा।

 

हमारी समझ के लिए इतना ही काफी है कि यह विचार आया।

 

सृष्टि से पहले कुछ नहीं था। अस्तित्व से पहले अस्तित्व का अभाव था। अस्तित्व के अभाव का ही दूसरा नाम है मृत्यु। जब कुछ नहीं था तो मृत्यु ही थी। उस महातिमिर की भाँति जिसे विज्ञानी ब्लैक होल या अन्ध विवर कहते हैं। जो अपने प्रबल गुरुत्व के कारण प्रकाश रश्मियों तक को बाहर निकलने नहीं देता। जो अपने सघन दबाव के कारण परम द्रव को खौलने तक नहीं देता। वह जिसका विस्फोट हो तो वह अपने अदृश्य आकार के हजारों-लाखों गुने दृश्य पिण्डों में बदल जाए। श्री वेद ऋषि और उनके युग के लिए ही नहीं, हमारे आज के साधन सम्पन्न और परमज्ञता का दावा करनेवाले युग के लिए भी वह न इति न इति ही बना रह गया है। सृष्टि का आरम्भ कैसे हुआ? खोज आज भी जारी है जबकि वह आरम्भ समाप्त नहीं हुआ है और वह महासत्ता परम व्योम में आज भी अपना विस्तार करती जा रही है। पिण्ड अज्ञात वेग से फैलते चले जा रहे हैं और साथ ही उस महाकार मुख में समृद्ध वेग हो विनाश के लिए दौड़ते जा रहे हैं। नित्य कितने ब्रह्माण्ड गतायु होकर नष्ट हो रहे हैं, पिण्ड से महाचूर्ण में बदलकर महाव्योम में गुलाल की तरह बिखर जा रहे हैं, इसका कोई हिसाब है। सृष्टि के आदि बिन्दु को लेकर सिद्धान्त बनते हैं पर याज्ञवल्क्य की भाषा में कहें तो उनको आयतन और प्रतिष्ठा नहीं मिल पाती। कुछ समय तक टिके रहते हैं और फिर न इति में बदल जाते हैं। यह भी नहीं। इस व्याख्या का कोई अर्थ है? नहीं, यह भी नहीं। यह तो कहनी भी नहीं है।

 

श्री वेद ऋषि याग्य्वल्क्य को लगा कुछ प्रश्नों का उत्तर केवल मौन से ही दिया जा सकता है।

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