निबंध – देश की उन आत्माओं से (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

· December 16, 2012

download (3)पाप के घेरे में देश का पाँव पड़ चुका है, वह समाज जो अपने आपको नेतृत्‍व के बोझ से दबा हुआ कहता है, इस पाप और पाखंड के घेरे में बैठ चुका है। आज देश की दशा करुणाजनक हो रही है। पंजाब, वह पंजाब जहाँ हिंदू-मुसलमानों का खून एक हुआ, आज एक-दूसरे का गला घोंटने पर उतारू हो गया है। हिंदू मुसलमान को और मुसलमान हिंदू को आज अपना जानी दुश्‍मन समझ रहे हैं। हमारे पंजाब के संवाददाता ने वहाँ की दशा का जो चित्र गत तीन अंकों में खींचा था, वह पाठकों ने देखा होगा। पंजाब ही नहीं, इस वक्‍त तो उसकी-सी परिस्थिति सारे देश की हो रही है। भय, आतुरता, चढ़ा-ऊपरी के भाव हिंदू-मुस्लिम विद्वेष को अधिकाधिक बढ़ा रहे हैं। ‘यह टुकड़ा हमें मिलना चाहिये, वह हड्डी तो मेरी है, उसे मैं निचोड़ूँगा’ आज देश में इस तरह की लड़ाइयाँ हो रही हैं। ब्रिटिश व्‍याघ्र इस श्‍वान-युद्ध को देखकर खुश हैं। देश के नेतागण समझौता करते फिर रहे हैं। सर्वदल सम्‍मेलन, स्‍वराज्‍य का मसविदा, वैमनस्‍यान्‍तक स्‍कीमें, पुनर्मिलन के अन्‍य प्रयत्‍न, आदि बातें देश के सामने रखी जा रही हैं। अपने लक्ष्‍य से, अपनी असली कार्य-प्रणाली से, च्‍युत होकर हम इन्‍हीं भूल-भुलैयों में फँसते और अटकते जा रहे हैं। मिस्‍टर जिन्‍ना और लाला लाजपतराय मुसलमान और हिंदू ‘स्‍वत्‍वों’ – ‘स्‍वत्‍व’ शब्‍द का यह भयानक दुरूपयोग है, परंतु हमारे नता इस समय भी समझते हैं कि वे अपने जातिगत ‘स्‍वत्‍वों’ की रक्षा के लिये लड़ रहे हैं। लखनऊ समझौते की शर्तों को दुहराये जाने की बात कही जा रही है। मुसलमान लोग उन प्रांतीय काउंसिलों में, जहाँ उनका बहुमत है, मताधिक्‍य चाहने लगे हैं। हिंदू लोग उसके खिलाफ हैं। देशभक्‍त, प्रचंड तपस्‍वी, वीर शिरोमणि महामना सावरकर के सदृश लोकोत्‍तर पुरुष पुगंव भी, गड़े पत्‍थरों को उखाड़कर, हिंदुत्‍व की अजरामरता और श्रेष्‍ठता सिद्ध कर रहे हैं। जाति-गत वैमन्‍स्‍य और विद्वेष यहाँ तक बढ़ गया है कि उनके सदृश स्‍वतंत्रता के परम उपासक भी, इसी मैले-गँदले-छिछले पंकस्रोत में बह चले हैं। क्रिया और प्रतिक्रिया का आघात:प्रतिघात प्रारंभ हो गया है। इस पाप पंकपूर्ण घेरे से देश कैसे निकले? नेताओं का समाज उसे इसी पथ पर लिये जा रहा है। वे नेतागण, जो व्‍यवहार्य रीति-नीति के ठेकेदार हैं, समझते हैं कि हिंदू-मुस्लिम प्रतिनिधित्‍व की शर्त तय हो जानी चाहिये, नौकरियों का हिस्‍सा-बाँट हो जाना चाहिये तथा मुसलमानों से यह वादा करा लेना चाहिये कि अगर बाहर से काबुल या अन्‍य मुसमलान राष्‍ट्रों ने हमला किया तो वे उस आक्रामक राष्‍ट्र का साथ न देकर भारतवर्ष का साथ देंगे। अक्लमंदी की हद है। इस प्रकार की बातें जिन मुखों से निकलतीं और जिन हृदयों में उठती हैं, उनकी हीनता पर हम क्‍या कहें? ये शर्त और ये सनदनामे किसलिये लिखे जा रहे हैं? अक्ल के दिवालिये लोग यह देख लें कि इस प्रकार हिंदू-मुस्लिम-ऐक्‍य स्‍थापित नहीं हो सकता। यदि कल की शर्तें आज पुरानी और अग्राह्य हो सकती हैं तो क्‍या अजब की आज की शर्तें आगामी कल को पुरानी पड़ जायें। इस कुविचार के चक्रव्‍यूह से निकलने का क्‍या कोई मार्ग हो सकता है? इससे निकलने का यह मार्ग नहीं कि हम उसी के अंदर सरपट दौड़ लगायें, उसी के अंदर रहकर सभाएँ करें और उसी की भित्ति पर बहस-मुबाहिसे करें। इस लेन-देन की प्रवृत्ति को नष्‍ट करने से ही इस चक्रव्‍यूह से हम बाहर निकल सकेंगे। हमें अपने हृदय और भविष्‍य को साफ कर लेना चाहिये। हमें यह सदा स्‍मरण रखना चाहिये कि इस समय हमारी प्रतिनिधित्‍व संबंधी अथवा नौकरियों के बँटवारे संबंधी नीति के स्‍पष्‍ट अर्थ यह है कि हम सदा-सर्वदा ब्रिटिश छत्रछाया में ही रहना प्रतिनिधित्‍व का प्रश्‍न छेड़े? आप कह सकते हैं कि बिना इस निर्णय के मुसलमान हमारा साथ न देंगे, क्‍योंकि उन्‍हें अंग्रेजों के चले जाने के बाद हिंदू राज्‍य का डर जो बना रहेगा। यह शंका कितनी व्‍यर्थ-सी है। जिन मुसलमानों के बल पर, जिन सात करोड़ देशवासियों की सहायता से हम स्‍वराज्‍य प्राप्‍त करेंगे उन्‍हीं को क्‍या यह संभव है कि हिंदू लोग दबा दें?

अविश्‍वास और वैमन्‍स्‍य की आग सुलग रही है। क्‍या इस समय देश में कोई ऐसी आत्‍मा उठ सकती है जो इस मोहजाल को छिन्‍न-भिन्‍न कर दे? आज हम यह निवेदन देश की उन आत्‍माओं से, अत्‍यंत नम्रता और अत्‍यंत आदरपूर्वक कर रहे हैा, जिनके हृदय में देश की व्‍यथा है, जो देश की दुरवस्‍था से और वर्तमान अधोगति से दुखी होकर अधीर हो बैठे हैं, इससे निकलने के लिये। यह निश्‍चय जानिये कि जातिगत दृष्टिकोण से हर चीज की आकृति विकृत दिखलायी देगी। इसलिये आवश्‍यकता इस बात की आन पड़ी है कि आपके इस संकुचित जातिगत विचार के विरुद्ध और घोरतम नाश के भाव जाग्रत हों। देश को काफी अनुभव हो चुका है उन व्‍यवहार के ठेकेदारों का, जो हिंदू-मुस्लिम प्रश्‍न को व्‍यवहारवाद की सीमा के अंतर्गत कह कर लेन-देन के निपटारे से हल करना चाहते हैं। आज तो हिंदुस्‍तान को न हिंदुओं की जरूरत हैं और मुसलमानों की। आज हिंदुस्‍तान चाहता है कि उसके अंदर केवल हिंदुस्‍तानी लोग, वे लोग जो धर्म को अपने निज के और अपने भगवान के दर्म्‍यान पवित्र बात समझते हों, केवल ऐसे हिंदुस्‍तानी लोग उसकी श्रृंखला काटने के लिए आगे बढ़ें। लेन-देन का लेखा बनाइये, पर याद रखिये, यह चिट्ठा उस शैतान की आँत की तरह बढ़ता और बदलता जायेगा, जिसका अंत कभी न होगा। क्‍या आप इस चक्‍कर में पड़कर अपने देश की स्‍वतंत्रता की लड़ाई को सदा-सर्वदा के लिये रुकी रहने देंगे? आज अगर आपके दिल में आजादी की लगन लगी है तो आप यह कैसे गवारा कर सकते हैं कि उसे छोड़कर आप जातिगत कलह की भट्ठी में ईंधन डालने लग जायें? इस आग को अधिक न सुलगाइये। आप हर जातिगत तबके से अपना संबंध तोड़ डालिये। आपके सामने न तो मुस्लिम लीग ही की कोई हस्‍त है और न हिंदु महासभा की। आप न तो हिंदू ही हैं और न मुसलमान। आप हिंदू हैं, पर इसलिये नहीं कि आप काउंसिलों के प्रतिनिधित्‍व के पीछे अपनी सारी शक्तियों का अपव्‍यय कर डालें। इसी प्रकार आप मुसलमान भी हैं, पर केवल इसलिये कि मुसलमानी ऐतकाद आपके खुदा और आपके दरम्‍यान की बात है, इसलिये नहीं कि आप नौकरियों के पीछे, इन हराम के टुकड़ों के पीछे, अपनी लड़ाई को बंद रखें। देश आज हर तबके के आदमियों में से कुछ ऐसे आदमी चाहता है, जो हिम्‍मत के साथ आगे बढ़ें और यह स्‍पष्‍टरूप से तथा उच्‍च स्‍वर में कह दें कि देश की स्‍वातंत्र्य-भावना को हम इन जातिगत विद्वेषों के विषाक्‍त वायुमंडल में दम घुटकर मर जाने कदापि न देंगे और अपने आपको सौ-सौ बार न्‍यौछावर कर देंगे, उसकी संरक्षता और उद्वार के लिए। हम यह खूब जानते हैं कि इस प्रकार के लोगों की, मन-दुखित किंतु सत्‍पथगामिनी आत्‍माओं की आवाज इस वक्‍त नक्‍कारखाने में तूती की आवाज के सदृश होगी। देश के पढ़े-लिखे लोग इस कलुषित कलह के सम्‍मोहन-पाश में आबद्ध है। वे इस समय और कुछ नहीं सुनना चाहते। पर स्‍मरण रहे कि प्रचारक का काम ऐसा-वैसा नहीं है। काँटों का मुकुट और मुँह पर थूके जाने की संभावनाओं को अपने समाने रखकर वे कर्तव्‍य-पथ पर अग्रसर हों। हिंदू और मुसलमान, सिख और पारसी, ईसाई और यहूदी सब समाजों में कुछ ऐसे नवयुवक और शुद्धमना व्‍यक्ति हैं, जो देश की वर्तमान सौदा करने की प्रवृत्ति से खीझ उठे हैं। वे आगे बढ़ें। महात्‍मा गांधी उन नरश्रेष्‍ठों में से हैं, जो जातिगत भावनाओं से बिल्‍कुल परे रहते हैं। क्‍या वे इस प्रकार के व्‍यक्तियों की संस्‍था बनाने के विषय पर विचार करने की कृपा करेंगे?

जो स्‍वतंत्रता के उपासक हैं, जो तीन गाँठे लगी हुई कोपीन को पहनकर संतुष्‍ट रह सकते हैं, जो हिंदू और मुसलमान होते हुए भी हिंदू स्‍तानी हैं, जो इस नोच-खसोट से व्‍यथित चित्‍त हो उठे हैं, जो लोक निंदा को सहन कर सकते हैं, जो भारतवर्ष की आजादी के लिये अपना सर्वस्‍व न्‍यौछावर कर सकते हैा, हमारा यह निवेदन है, देश की उन्‍हीं आत्‍माओं से।

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