नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 11 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

· August 31, 2012

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श्रीरुक्मिणीपरिणयनाटक

का एक अतिरिक्त अंक

(स्थान-शय्याभवन)

(भगवान श्रीकृष्ण एक सुकोमल तल्प पर बिराजमान, व्यजनहस्ता रुक्मिणी समीप दण्डायमान)

(सुलोचना व सुनैना दो परिचारिकाओं का प्रवेश)

सुलो.- सखी सुनयने! आज कैसा आनन्द का दिन है, समस्त द्वारिकानिवासियों का हृदय आज कैसा सुप्रसन्न है। महनीयकीर्ति महात्मा श्रीकृष्ण के सदर्प कुण्डलपुर जाने और वहाँ प्रबल शिशुपालादि के आने का विवरण सुनकर जो मन दिन रात उद्विग्न रहा करता था, वह अब उक्त महात्मा के अति पर समूह का अभिमान निवारण करके सकुशल द्वारिका आने, और लोकललामभूता महारानी रुक्मिणी के साथ समारोहपूर्वक उद्वाह करके जगज्जन को आनन्दित बनाने से कैसा दृष्ट और आनन्दविनिमग्न है। मानो दुर्ध्दर्षसिसिरसन्ताडित पुष्पविहीन पादप सरस ऋतुराज समागम से नयनोत्सव अभिनव किसलयसमूह और मनोरंजनकुसुमकदम्ब भार से अवनत बन गया।

सुन.- सखी! केवल इतना ही आनन्द का विषय नहीं है। यह कितना हर्षप्रद सुसमाचार है, कि जिस काल पूज्य महर्षिगण, राजनन्दिनी रुक्मिणी का शुभपाणिपीडन महात्मा श्रीकृष्ण के साथ करा रहे थे, उसी समय कुण्डलपुर से आगत एक दूत ने प्रभूत यौतुक महाराज उग्रसेन के सन्मुख रखा, और उसको महाराज भीष्मक का प्रेरित बतलाकर समग्र विवाहप्रांगण स्थित सुजनों को आनन्दित कर दिया।

सुलो.- यह कैसे? जिस दुष्ट रुक्म ने पिता को शुभदर्शना रुक्मिणी का विवाह लोकरंजन श्रीकृष्ण के साथ करने से रोका, सदर्प पराक्रान्त श्रीकृष्ण के साथ समरांगण में घोर आहवकार्य में परिणत हुआ, उसने फिर पिता के यौतुकप्रेरणा का अनुमोदन करके हरिऔध श्री रज्जु को क्यों पुष्ट करने दिया ?

सुन.- सखी! क्या भवितव्य के निगूढ़ दाम का बन्धन कोई उन्मोचन कर सकता है? क्या विधाता द्वारा दृढ़ीकृत हरिऔध को कोई विदूरित करने में समर्थ हो सकता है? पर इस कार्य का कारण और है।

सुलो.- सो क्या सखी! शीघ्र कह! क्यांकि इस विषय को श्रवण करने के लिए मेरा मन ऐसा समुत्सुक है जैसा किसी काल में भगवान पार्वतीनाथ का मन जगविलास भगवान विष्णु का मोहनीस्वरूप देखने के लिए समुत्कण्ठित हुआ था।

सुन.- सखी! जिस काल क्रूरकर्मा रुक्म महात्मा श्रीकृष्ण से युद्ध करने के लिए कुण्डलपुर से प्रस्थान का उपक्रम कर रहा था; उस काल उसने प्रण किया, कि यदि मैं कृष्ण को समरांगण में विजित करके सहोदरा रुक्मिणी को छीन न लाऊँगा, तो फिर कुण्डलपुर में पदार्पण न करूँगा। किन्तु यह कब हुआ है कि एक छुद्र पक्षी पराक्रमशाली पक्षिराज गरुड को परास्त करे, अथवा लघु पिपीलिका दुर्दान्त महायशा शेषनाग पर विजय पावे। अतएव वह जब पराजित होकर लौटा तो अपने प्रण अनुसार कुण्डलपुर न जाकर उसी के समीप एक भोजकट नामक नगर बसाया, और अपने पूज्य पिता से द्वेष करके अब सपरिवार वहीं रहता है। सखी! यही कारण उसके इस शुभकार्य में बाधक न होने का है अथवा यों समझो कि नागगण सुलोचना का शुभविवाह दशकणठतनय से हुए पीछे आप ही उसके मित्र हो गये।

सुलो.- हाय! रुक्म ने भी कैसी कुमति विचार की थी। जो रुक्मिणी ऐसी जगन्मोहिनी को शिशुपाल ऐसे क्रूर से प्रणयपाश में आबद्ध करना चाहाथा।

सुन.- पर यह कब हुआ है, कि मालतीलता तमालतरु छोड़ बबूर से लिपटे, और चन्द्रिका निशाकर को त्याग सैंहिकेय से स्नेह करे।

सुलो.- (शय्याभवन की ओर देखकर) सखी! यह शय्याभवन कैसा लोकललाम और मनोरंजक है। इसकी कनकनिर्मित भीत जिनमें अनेक प्रकार के समुज्वल मणि जटित हैं। कैसी सुन्दर और रमणीय हैं। स्वर्णीय स्तम्भों की विशालता और विचित्रता और उसमें के कौशल सहित रचित चित्रों की अनुपमता कैसी अपूर्व है। पन्नों द्वारा विरचित आम्रपत्र और स्वर्णविनिर्मित रजु का समन्वय करते तोरण का निर्माण कैसा कौशलमिश्रित कार्य है। मोतियों की झालरें और युक्ति पूर्वक चाँदी से रची बन्दनवारें कैसी स्पृहणीय हैं। बहुमूल्य विद्रुमविरचितयुगलद्वारकपाट कैसे ललित और प्रशंसनीय हैं। उनका मणिमय कील काँटा कैसा अद्भुत है। कलितकल्पलता के कल कुसुमों, एवं अनुपम अगर अथच मलयोद्भूत चन्दनों की सुगन्धि से सारा प्रासाद कैसा गन्धबद्ध और सौरभवितरक है। (सुनना नाटय करतीहै)

सुन.- सखी! वह (तर्जनी द्वारा लक्ष्य करती है) देखो। चन्द्रानना राजनन्दिनी रुक्मिणी खड़ी हुई लोकरंजन भगवान श्रीकृष्ण से बातें कर रही हैं! जिनके कोकिल से कोमलालाप को तुम चकित सी होकर श्रवण कर रही हो। अहा! सजलजलदगात महात्मा श्रीकृष्ण के समीप खड़ी चंचला राजतनया की कैसी शोभा है।

पद

सखी! लखु दामिनि भूमि खरी।

सजलजलदतन जदुनायक ढिग चौगुन चाव भरी।

कि धौं मालती तरु तमाल तजि रमबम आहि अरी।

कै नीलम की छरी पास है कनकबेलि बगरी।

मरकतमनि समीप कै सोहत दीपक जोति धरी।

हरिऔध कै पन्ना के ढिग राजत मोति लरी। 1 ।

सुलो.- सखी! सत्य है! ऐसी ही शोभा है। किन्तु महारानी इस काल अपने प्राणनाथ से कुछ बातें करती जान पड़ती हैं, अतएव हम दोनों का वहाँ चलना युक्तिसंगत नहीं हो सकता, आओ। शृंगारभवन की ओर चलैं।

सुन.- सत्य है। इस समय वहाँ जाने से वही गति होगी जो गति वायु की घनपटल और विद्युल्लता के बीच जाने से होती है। तथापि यहाँ से चले चलने का भी जी नहीं चाहता, क्योंकि वह दम्पती के सप्रेमसंभाषण श्रवण को परमोत्सुक है। अतएव आओ। इस पर्दे की ओट में बैठकर राजनन्दिनी और महात्मा श्रीकृष्ण के सब द्रष्टव्य चरित्रों का अवलोकन करें।

( दोनों एक पर्दे की ओट में बैठ जाती हैं)

श्रीकृ.- प्राणाधिके! यह कैसा अन्याय है जो कमलिनी अपने परमस्नेही रसिक चंचरीक से स्नेह न करके सुदूरगगनबिहारी दिवाकर से प्रीति रखती है और रात्रिकाल में उसको आपत्ति में पड़ा हुआ देखकर उसके समादर के लिए अपना मुख थोड़ा भी नहीं खोलती।

श्रीरु.- प्राणनाथ। क्या वह झूठे प्रेमी स्वार्थपरायण, अमितकुसुमसुगन्धरत, भ्रमर के लिए अपने वास्तविक हितैषी, आजन्मप्रिय, भगवान दिवानाथ के वियोग की अवस्था में सुविकसित होकर अपने धर्म को नष्ट कर सकती है। कदापि नहीं। वियोग क्या संयोगावस्था में भी वह उस चपल का विश्वास नहीं करती और स्वोदरस्थरजों से उसको अन्धा बनाती रहती है क्योंकि ऐसे अविश्वासियों से स्नेह न करना ही न्याय है।

श्रीकृ.- प्यारी! सरोजिनी को प्रखर दिवाकर से स्नेह रखने में कोई सुख नहीं है। क्योंकि वह उसके क्रीड़ा स्थल सरोवरादि के जल को सदैव शुष्क करता रहता है और स्थानच्युत होने पर वही उसको जला देता है।

श्रीरु.- भगवती पार्वती की भाँति पति से अपमानित होकर जल जाने में उसको वह दु:ख नहीं है जो उसको भ्रमर ऐसे चपल जन्तु से स्नेह करने में है।

श्रीकृ.- प्रिये! जो हो। किन्तु जहाँ तक मैं सोचता हूँ तुमको यह कदापि योग्य एवं समुचित नहीं था कि तुम पराक्रान्त शिशुपाल समान, स्वरूपमान, प्रेमिक, कुलीन, शूर और ऐश्वर्यशाली को त्याग मेरे ऐसे कुरूप, कायर, अकुलीन दासवृत्तिपरायण और कठोरान्त:करण से स्नेह करो। देखो, मैं प्रबल जरासन्ध के वास से पलायित होकर सकुटुम्ब एक छुद्र द्वीप में जीवनयात्र निर्वाह कर रहा हूँ, तथापि शंकित रहता हूँ। फिर मुझ ऐसे छुद्र एवं कापुरुष से स्नेहबद्ध होकर जीवन व्यतीत करने में तुमको कौन यश मिलेगा? प्रिये! तुम्हें कौन महारानी कहेगा? किन्तु अभी भी बहुत कुछ नहीं बिगड़ा है, इच्छा करने ही से तुम नृपवर्य शिशुपाल के यहाँ चली जा सकती हो क्योंकि मैं तुमको बहुत प्रसन्नता से आज्ञा दे दूँगा। यदि यह कहो कि ऐसा ही करना था तो आप कुण्डलपुर जाकर मुझको क्यों लाए? तो प्राणाधारे! मैं सच कहता हूँ कि इसमें मेरा अणुमात्र भी अपराध नहीं है, वास्तव बात यह है कि तुमारे पत्र के जीवन्त आशय और उत्तोजक पदों ने मुझको धोखा दिया, नहीं तो मैं कदापि ऐसे गर्हित कर्म करने में लिप्त न होता।

श्रीरु.- प्रियतम! मैंने यह नहीं समझा था कि कमलिनी के दृष्टान्त का उत्थान आपने मेरे ही लिए किया था (मूर्छासंचार)

श्रीकृ.- अहा! शरदर्तु के निर्मल नीले आकाश की भाँति प्राणप्यारी का हृदय भी निर्मल है। क्योंकि यदि ऐसा न होता तो मेरी हँसी की बातों से तत्काल प्राणोपमा की यह दशा न हो जाती (अंक में ग्रहण)

सुलो.- सखी! देख! अपने प्यारे की हँसी की बातों पर महारानी रुक्मिणी की कैसी दशा हो गयी। पंखा कर-कमलों से छूट पड़ा। मुख पीतवर्ण हो गया, नेत्रों से अविरल अश्रुप्रवाह होने लगा, और मूर्छित होकर वह गिरा ही चाहती थी, किन्तु भगवान श्रीकृष्ण ने उनको अपने गोद में लेकर सम्हाल लिया।

सुन.- सखी! आनन्द की बात है कि महात्मा श्रीकृष्ण के व्यजनद्वारा वायु करने से सुशीतल गुलाब का छींटा देने से महारानी रुक्मिणी की मूर्छाभंग हो गयी। देखो, उक्त महानुभाव के अंग से सलज्जभाव पृथक होकर वह फिर उसी प्रकार पृथ्वी पर खड़ी हो गयीं।

श्रीरु.- (हाथ जोड़कर)

छन्द

हे नाथ भवभयहरन जनसुखकरन श्रीकरुणा निधे ।

मनहरन तारनतरन जगकौतुककरन अगनित बिधे ।

प्रभु मुखकमलदल ते सुकोमल ते सु क्यों अस बच कह्यो।

जेहि ते सकल सुख निसिप को दुख सिंहिकासुत ने गह्यो।

जाके सरूप सु ओप सम नहिं अमित रतिपतिहँ अहै।

अस कौन जग मतिमन्द जो तेहि रूप को बिकृत कहै।

मुख जाहि ते द्विज छ त्रि भुज ते वैश्य उरु ते जग भनै।

पग जाहि ते जग सूद्र उपजे तासु कुल को का गनै।

अमरेस सौ विभवेस सम जग विभववारो कौन है।

ए प्रगट अनुचर जासु जग तेहि विभव को कह जौन है।

नवनीतहूँ ते सरस जाको हिय पुरान बखानहीं।

तेहि को कठोरुपमान सों कोउ बुध न कहुँ उपमानहीं।

जिन हिरनकस्यप कंस मधु कैटभ रु रावन को हने।

तेहि सूरकुलकलमुकुटमनि को कौन जग कायर गने।

जेहि नाम बल ते प्रबल पातक छोरि ततछन भाज हीं।

सो भज्यो लघु मग धे स भय ते हम न हिय अनुमानहीं।

प्रभु चरित अद्भुत अकथ को नहिं पार कोउ जग पावई।

फिर अति अलपमति नारि यह केहि भाँति ताहि बखानई।

पै कहत साँची त्यागि अस प्रभुपद हिये केहि पद धरै।

हरिऔध पारस त्यागि कै जग काँच को संग्रह करै।

श्रीकृ.- प्रिये! क्यों न हो। यदि तुम ऐसा न कहोगी तो और कौन कहेगा। भागीरथी ही का यह गुण है कि अपनी स्वाभाविक शीतलता से उदधि का हृदय तर रखती है। प्राणाधारे! ए कठोर वचन हमने केवल रहस्यवर्धन एवं तुमारी इन मधुर वचनों के श्रवण के लिए कहे थे, नहीं तो ऐसा कौन है जो सुविकसित मल्लिका पर तप्त जल निक्षेप करेगा (उठकर सानन्द परिरम्भन)।

(दोनों सखियाँ पर्दे के बाहर आकर)

(प्रगट)

पद

आज हिय परम प्रमोद भयो।

लखि मिलाप नीको पिय तिय को छन में सब दुख दूर गयो।

नित नित होत प्रीति पय जल सम हम सब लखि विनोद उपजावैं।

सोकताप संताप जगत को लखि लखि कै छबि दूर बहावैं।

नेक विभेद होय नहिं कबहूं नव अनुराग नेह सरसाई।

मती संभु , हरि रमा , गिरापद , मम दिगन्त कलकीरति छाई।

जुग जुग चिरंजीव यह जोरी रहै करै जन मन बर नेहा।

हरीऔध कर जोरि रैन दिन बिनवत रहत सदा प्रभु एहा।

(दोनों सखियों का प्रस्थान)

(जवनिका पतन)

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