नाटक – तृतीय अंक – अजातशत्रु (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

· July 7, 2014

1jpdप्रथम दृश्य

स्थान – मगध में राजकीय भवन

 

छलना और देवदत्त।

 

 

 

छलना : धूर्त्त! तेरी प्रवंचना से मैं इस दशा को प्राप्त हुई। पुत्र बन्दी होकर विदेश चला गया और पति को मैंने स्वयं बन्दी बनाया। पाखण्डी, तूने ही यह चक्र रचा है।

 

देवदत्त : नारी! क्या तुझे राजशक्ति का घमण्ड हो गया है, जो परिव्राजकों से इस तरह बातें करती है! तेरी राजलिप्सा और महत्त्वाकांक्षा ने ही तुझसे सब कुछ कराया, तू दूसरे पर क्यों दोषारोपण करती है, क्या मुझे ही राज्य भोगना है?

 

छलना : पाखण्डी! जब तूने धर्म के नाम पर उत्तेजित करके मुझे कुशिक्षा दी, तब मैं भूल में थी। गौतम को कलंकित करने के लिए कौन श्रावस्ती गया था और किसने मतवाला हाथी दौड़ा कर उनके प्राण लेने की चेष्टा की थी? ओह! मैं किस भ्रान्ति में थी! जी चाहता है कि इस नर-पिशाच मूर्ति को अभी मिट्टी में मिला दूँ! प्रतिहारी!

 

प्रतिहारी : ( प्रवेश करके ) महादेवी की जय हो! क्या आज्ञा है?

 

छलना : अभी इस मुड़िये को बन्दी बनाओ और वासवी को पकड़ लाओ!

 

प्रतिहारी इंगित करता है। देवदत्त बन्दी होता है।

 

देवदत्त : इसका फल तुझे मिलेगा!

 

छलना : घायल बाघिनी को भय दिखाता है! वर्षा की पहाड़ी नदी को हाथों में रोक लेना चाहता है! देवदत्त! ध्यान रखना, इस अवस्था में नारी क्या नहीं कर सकती है! अब तेरा अभिशाप मुझे नहीं डरा सकता। तू अपने कर्म भोगने के लिए प्रस्तुत हो जा।

 

वासवी का प्रवेश।

 

छलना : अब तो तुम्हारा हृदय सन्तुष्ट हुआ?

 

वासवी : क्या कहती हो, छलना अजात बन्दी हो गया तो मुझे सुख मिला, यह बात कैसे तुम्हारे मुख से निकली! क्या वह मेरा पुत्र नहीं है?

 

छलना : मीठे मुँह की डायन! अब तेरी बातों से मैं ठण्डी नहीं होने की! ओह! इतना साहस, इतनी कूट-चातुरी! आज मैं उसी हृदय को निकाल लूँगी, जिसमें यह सब भरा था। वासवी, सावधान! मैं भूखी सिंहनी हो रही हूँ।

 

वासवी : छलना, उसका मुझे डर नहीं है। यदि तुम्हें इससे कोई सुख मिले, तो तुम करो। किन्तु एक बात और विचार लो-क्या कोसल के लोग जब मेरी यह अवस्था सुनेंगे, तो अजात को और शीघ्र मुक्त कर देने के बदले कोई दूसरा काण्ड न उपस्थित करेंगे?

 

छलना : तब क्या होगा?

 

वासवी : जो होगा वह तो भविष्य के गर्भ में है, किन्तु मुझे एक बार कोसल अनिच्छापूर्वक भी जाना ही होगा और अजात को ले आने की चेष्टा करनी होगी।

 

छलना : यह और भी अच्छी रही-जो हाथ का है उसे भी जाने दूँ! क्यों वासवी! पद्मावती को पढ़ा रही हो!

 

वासवी : बहन छलना! मुझे तुम्हारी बुद्धि पर खेद होता है। क्या मैं अपने प्राणों के लिए डरती हूँ; या सुख-भोग के लिए जा रही हूँ? ऐसी अवस्था में आर्यपुत्र को मैं छोड़ कर चली जाऊँगी, ऐसा भी तुम्हें अब तक विश्वास है? मेरा उद्देश्य केवल विवाद मिटाने का है।

 

छलना : इसका प्रमाण?

 

वासवी : प्रमाण आर्यपुत्र हैं। छलना, चौंको मत। तुम भी उन्हीं की परिणीता पत्नी हो, तब भी तुम्हारे विश्वास के लिए मैं उन्हें तुम्हारी देख-रेख में छोड़ जाऊँगी। हाँ, इतनी प्रार्थना है कि उन्हें कोई कष्ट न होने पावे, और क्या कहूँ, वे ही तुम्हारे भी पति हैं। हाँ, देवदत्त को मुक्त कर दो चाहे इसने कितना भी हम लोगों का अनिष्ट-चिन्तन किया हो, फिर भी परिव्राजक मार्जनीय है।

 

छलना : ( प्रहरियों से ) छोड़ दो इसको, फिर काला मुख मगध में न दिखावे।

 

प्रहरी छोड़ते हैं। देवदत्त जाता है।

 

वासवी : देखो, राज्य में आतंक न फैलने पावे। दृढ़ होकर मगध का शासन करना! किसी को भी कष्ट न हो। और प्यारी छलना! यदि हो सके तो आर्यपुत्र की सेवा करके नारी-जन्म सार्थक कर लेना।

 

छलना : वासवी बहन! (रोने लगती है) मेरा कुणीक मुझे दे दो, मैं भीख माँगती हूँ। मैं नहीं जानती थी कि निसर्ग से इतनी करुणा और इतना स्नेह, सन्तान के लिए, इस हृदय में संचित था। यदि जानती होती, तो इस निष्ठुरता का स्वाँग न करती।

 

वासवी : रानी! यही जो जानती कि नारी का हृदय कोमलता का पालना है, दया का उद्गम है, शीतलता की छाया है और अनन्य भक्ति का आदर्श है, तो पुरुषार्थ का ढोंग क्यों करती। रो मत बहन! मैं जाती हूँ, तू यही समझ कि कुणीक ननिहाल गया है।

 

छलना : तुम जानो।

 

( पट – परिवर्तन )

 

 

 

द्वितीय दृश्य

 

स्थान : कोसल के राजमहल से लगा हुआ बन्दीगृह

 

बाजिरा का प्रवेश।

 

बाजिरा : ( आप – ही – आप ) क्या विप्लव हो रहा है। प्रकृति से विद्रोह करके नये साधनों के लिए कितना प्रयास होता है! अन्धी जनता अँधेरे में दौड़ रही है। इतनी छीना-झपटी, इतना स्वार्थ-साधन कि सहज-प्राप्य अन्तरात्मा की सुख-शान्ति को भी लोग खो बैठते हैं! भाई भाई से लड़ रहा है, पुत्र पिता से विद्रोह कर रहा है, स्त्रियाँ पतियों पर शासन करना चाहती हैं! उनसे प्रेम नहीं। मनुष्य मनुष्य के प्राण लेने के लिए शस्त्रकला को प्रधान गुण समझने लगा है और उन गाथाओं को लेकर कवि कविता करते हैं। बर्बर रक्त में और भी उष्णता उत्पन्न करते हैं। राज-मन्दिर बन्दीगृह में बदल गए हैं! कभी सौहार्द से जिसका आतिथ्य कर सकते थे, उसे बन्दी बनाकर रखा है। सुन्दर राजकुमार! कितनी सरलता और निर्भीकता इस विशाल भाल पर अंकित है! अहा! जीवन धन्य हो गया है। अन्तःकरण में एक नवीन स्फूर्ति आ गई है। एक नवीन संसार इसमें बन गया है। यही यदि प्रेम है तो अवश्य स्पृहणीय है, जीवन की सार्थकता है। कितनी सहानुभूति, कितनी कोमलता का आनन्द मिलने लगा है। (ठहरकर सोचती हुई) एक दिन पिताजी का पैर पकड़ कर प्रार्थना करूँगी कि इस बन्दी को छोड़ दो। किसी राष्ट्र का शासक होने के बदले इसे प्रेम के शासन में रहने से मैं प्रसन्न रहूँगी। मनोरम सुकुमार वृत्तियों का छायापूर्ण हृदय में आविर्भाव-तिरोभाव होते देखूँगी और आँख बन्द कर लूँगी।

 

( गाना )

 

हमारे जीवन का उल्लास हमारे जीवन का धन रोष।

 

हमारी करुणा के दो बूँद मिले एकत्र, हुआ संतोष।।

 

दृष्टि को कुछ भी रुकने दो, न यों चमक दो अपनी कान्ति।

 

देखने दो क्षण भर भी तो, मिले सौन्दर्य देखकर शान्ति।।

 

नहीं तो निष्ठुरता का अन्त, चला दो चपल नयन के बाण।

 

हृदय छिद जाए विकल बेहाल, वेदना से हो उसका त्राण।।

 

खिड़की खुलती है , बन्दी अजातशत्रु दिखाई देता है।

 

अजातशत्रु : इस श्यामा रजनी में चन्द्रमा की सुकुमार किरण-सी तुम कौन हो? सुन्दरी कई दिन मैंने देखा, मुझे भ्रम हुआ कि यह स्वप्न है। किन्तु नहीं, अब मुझे विश्वास हुआ है कि भगवान ने करुणा की मूर्ति मेरे लिए भेजी है और इस बन्दीगृह में भी कोई उसकी अप्रकट इच्छा कौशल कर रही है।

 

बाजिरा : राजकुमार! मेरा परिचय पाने पर तुम घृणा करोगे और फिर मेरे आने पर मुँह फेर लोगे-तब मैं बड़ी व्यथित हूँगी। हम लोग इस तरह अपरिचित रहें। अभिलाषाएँ नए रूप बदलें, किन्तु वे नीरव रहें। उन्हें बोलने का अधिकार न हो! बस, तुम हमें एक करुण दृष्टि से देखो और मैं कृतज्ञता के फूल तुम्हारे चरणों पर चढ़ा कर चली जाया करूँ।

 

अजातशत्रु : सुन्दरी! यह अभिनय कई दिन हो चुका, अब धैर्य नहीं रुकता है। तुम्हें अपना परिचय देना ही होगा।

 

बाजिरा : राजकुमार! मेरा परिचय पाकर तुम सन्तुष्ट न होगे, नहीं तो मैं छिपाती क्यों?

 

अजातशत्रु : तुम चाहे प्रसेनजित् की ही कन्या क्यों न हो; किन्तु मैं तुमसे असन्तुष्ट न हूँगा; मेरी समस्त श्रद्धा अकारण तुम्हारे चरणों पर लोटने लगी है, सुन्दरी!

 

बाजिरा : मैं वही हूँ राजकुमार! कोसल की राजकुमारी। मेरा ही नाम बाजिरा है।

 

अजातशत्रु : सुनता था प्रेम द्रोह को पराजित करता है। आज विश्वास भी हो गया। तुम्हारे उदार प्रेम ने मेरे विद्रोही हृदय को विजित कर लिया। अब यदि कोसल-नरेश मुझे बन्दीगृह से छोड़ दें तब भी…

 

बाजिरा : तब भी क्या?

 

अजातशत्रु : मैं कैसे जा सकूँगा?

 

बाजिरा : ( ताली बजाकर जंगला खोलती है ; अजात बाहर निकल आता है ) अब तुम जा सकते हो। पिता की सारी झिड़कियाँ मैं सुन लूँगी। उनका समस्त क्रोध मैं अपने वक्ष पर वहन करूँगी। राजकुमार, अब तुम मुक्त हो जाओ!

 

अजातशत्रु : यह तो नहीं हो सकता। इस प्रकार के प्रतिफल में तुम्हें अपने पिता से तिरस्कार और भर्त्सना ही मिलेगी। शुभे! अब यह तुम्हारा चिर-बन्दी मुक्त होने की चेष्टा भी न करेगा।

 

बाजिरा : प्रिय राजकुमार! तुम्हारी इच्छा; किन्तु फिर मैं अपने को रोक न सकूँगी और हृदय की दुर्बलता या प्रेम की सबलता मुझे व्यथित करेगी।

 

अजातशत्रु : राजकुमारी! तो हम लोग एक-दूसरे को प्यार करने के अयोग्य हैं, ऐसा कोई मूर्ख भी न कहेगा।

 

बाजिरा : तब प्राणनाथ! मैं अपना सर्वस्व तुम्हें समर्पण करती हूँ। (अपनी माला पहनाती है।)

 

अजातशत्रु : मैं अपने समेत उसे तुम्हें लौटा देता हूँ, प्रिये! हम तुम अभिन्न हैं। यह जंगली हिरन इस स्वर्गीय संगीत पर चौकड़ी भरना भूल गया है। अब यह तुम्हारे प्रेम-पाश में पूर्णरूप से बद्ध है। (अँगूठी पहनाता है। )

 

कारायण का सहसा प्रवेश।

 

कारायण : यह क्या! बन्दीगृह में प्रेमलीला। राजकुमारी! तुम कैसे यहाँ आई हो? क्या राजनियम की कठोरता भूल गई हो?

 

बाजिरा : इसका उत्तर देने के लिए मैं बाध्य नहीं हूँ।

 

कारायण : किन्तु यह काण्ड एक उत्तर की आशा करता है। वह मुझे नहीं तो महाराज के समक्ष देना ही होगा। बन्दी, तुमने ऐसा क्यों किया?

 

अजातशत्रु : मैं तुमको उत्तर नहीं देना चाहता। तुम्हारे महराज से मेरी प्रतिद्वन्द्विता है-उनके सेवकों से नहीं।

 

कारायण : राजकुमारी! मैं कठोर कर्त्तव्य के लिए बाध्य हूँ। इस बन्दी राजकुमार को ढिठाई की शिक्षा देनी ही होगी।

 

बाजिरा : क्यों बन्दी भाग तो गया नहीं, भागने का प्रयास भी उसने नहीं किया; फिर!

 

कारायण : फिर! आह! मेरी समस्त आशाओं पर तुमने पानी फेर दिया! भयानक प्रतिहिंसा मेरे हृदय में जल रही है; उस युद्ध में मैंने तुम्हारे लिए ही…

 

बाजिरा : सावधान! कारायण, अपनी जीभ सम्भालो!

 

अजातशत्रु : कारायण! यदि तुम्हें अपने बाहुबल पर भरोसा हो तो मैं तुमको द्वन्द्व-युद्ध के लिए आह्वान करता हूँ।

 

कारायण : मुझे स्वीकार है, यदि राजकुमारी की प्रतिष्ठा पर आँच न पहुँचे। क्योंकि मेरे हृदय में अभी भी स्थान है। क्यों राजकुमारी, क्या कहती हो?

 

अजातशत्रु : तब और किसी समय! मैं अपने स्थान पर जाता हूँ। जाओ राजनन्दिनी!

 

बाजिरा : किन्तु कारायण! मैं आत्म-समर्पण कर चुकी हॅूँ।

 

कारायण : यहाँ तक! कोई चिन्ता नहीं। इस समय तो चलिए; क्योंकि महाराज आना ही चाहते हैं।

 

अजात अपने जंगले में जाता है , एक ओर कारायण और राजकुमारी बाजिरा जाती है , दूसरी ओर से वासवी और प्रसेनजित् का प्रवेश।

 

प्रसेनजित् : क्यों कुणीक, अब क्या इच्छा है?

 

वासवी : न-न, भाई! खोल दो। इसे मैं इस तरह देखकर बात नहीं कर सकती। मेरा बच्चा कुणीक…

 

प्रसेनजित् : बहन! जैसा कहो। (खोल देता है, वासवी अंक में ले लेती है।)

 

अजातशत्रु : कौन! विमाता नहीं, तुम मेरी माँ हो! माँ! इतनी ठण्डी गोद तो मेरी माँ की भी नहीं है। आज मैंने जननी की शीतलता का अनुभव किया है। मैंने तुम्हारा बड़ा अपमान किया है, माँ! क्या तुम क्षमा करोगी?

 

वासवी : वत्स कुणीक! वह अपमान भी अब क्या मुझे स्मरण है। तुम्हारी माता, तुम्हारी माँ नहीं है, मैं तुम्हारी माँ हूँ। वह तो डायन है, उसने मेरे सुकुमार बच्चे को बन्दीगृह भेज दिया! भाई, मैं इसे शीघ्र मगध के सिंहासन पर भेजना चाहती हूँ; तुम इसके जाने का प्रबन्ध कर दो।

 

अजातशत्रु : नहीं माँ, अब कुछ दिन उस विषैली वायु से अलग रहने दो। तुम्हारी शीतल छाया का विश्राम मुझसे अभी नहीं छोड़ा जाएगा।

 

घुटने टेक देता है , वासवी अभय का हाथ रखती है।

 

( पट – परिवर्तन )

 

 

 

तृतीय दृश्य

 

स्थान – कानन का प्रान्त

 

 

 

विरुद्धक : आर्द्र हृदय में करुण-कल्पना के समान आकाश में कादम्बिनी घिरी आ रही है। पवन के उन्मत्त आलिंगन में तरुराजि सिहर उठती है। झुलसी हुर्ह कामनाएँ मन में अंकुरित हो रही हैं। क्यों जलदागमन से आह!

 

अलका की किस विकल विरहिणी की पलकों का ले अवलम्ब

 

सुखी सो रहे थे इतने दिन, कैसे हे नीरद निकुरम्ब!

 

बरस पड़े क्यों आज अचानक सरसिज कानन का संकोच,

 

अरे जलद में भी यह ज्वाला! झुके हुए क्यों किसका सोच?

 

किस निष्ठुर ठण्डे हृत्तल में जमे रहे तुम बर्फ समान?

 

पिघल रहे हो किस गर्मी से! हे करुणा के जीवन-प्राण

 

चपला की व्याकुलता लेकर चातक का ले करुण विलाप,

 

तारा आँसू पोंछ गगन के, रोते हो किस दुख से आप?

 

किस मानस-निधि में न बुझा था बड़वानल जिससे बन भाप,

 

प्रणय-प्रभाकर कर से चढ़ कर इस अनन्त का करते माप,

 

क्यों जुगनू का दीप जला, है पथ में पुष्प और आलोक?

 

किस समाधि पर बरसे आँसू, किसका है यह शीतल शोक।

 

थके प्रवासी बनजारों-से लौटे हो मन्थर गति से;

 

किस अतीत की प्रणय-पिपासा, जगती चपला-सी स्मृति से?

 

मल्लिका का प्रवेश।

 

मल्लिका : तुम्हें सुखी देखकर मैं सन्तुष्ट हुई, कुमार!

 

विरुद्धक : मल्लिका! मैं तो आज टहलता-टहलता कुटी से इतनी दूर चला आया हूँ। अब तो मैं सबल हो गया, तुम्हारी इस सेवा से मैं जीवन भर उऋण नहीं हूँगा।

 

मल्लिका : अच्छा किया। तुम्हें स्वस्थ देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुई। अब तुम अपनी राजधानी लौट जा सकते हो।

 

विरुद्धक : मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है। मेरे हृदय में बड़ी खलबली है। यह तो तुम्हें विदित था कि सेनापति बन्धुल को मैंने ही मारा है; और उसी की तुमने इतनी सेवा की! इससे क्या मैं समझूँ क्या मेरी शंका निर्मूल नहीं है कह दो, मल्लिका!

 

मल्लिका : विरुद्धक! तुम उसका मनमाना अर्थ लगाने का भ्रम मत करो। तुमने समझा होगा कि मल्लिका का हृदय कुछ विचलित है; छिः! तुम राजकुमार हो न, इसीलिए। अच्छी बात क्या तुम्हारे मस्तिष्क में कभी आई ही नहीं; मल्लिका उस मिट्टी की नहीं है, जिसकी तुम समझते हो।

 

 

 

विरुद्धक : किन्तु मल्लिका! अतीत में तुम्हारे ही लिए मेरा वर्तमान बिगड़ा। पिता ने जब तुमसे मेरा ब्याह करना अस्वीकार किया, उसी समय से मैं पिता के विरुद्व हुआ और उस विरोध का यह परिणाम हुआ।

 

मल्लिका : इसके लिए मैं कृतज्ञ नहीं हो सकती। राजकुमार! तुम्हारा कलंकी जीवन भी बचाना मैंने अपना धर्म समझा। और यह मेरी विश्व-मैत्री की परीक्षा थी। जब इसमें मैं उत्तीर्ण हो गई तब मुझे अपने पर विश्वास हुआ। विरुद्धक, तुम्हारा रक्त-कलुषित हाथ मैं छू भी नहीं सकती। तुमने कपिलवस्तु के निरीह प्राणियों का, किसी की भूल पर, निर्दयता से वध किया, तुमने पिता से विद्रोह किया, विश्वासघात किया; एक वीर को छल से मार डाला और अपने देश के, जन्मभूमि के विरुद्ध अस्त्र ग्रहण किया! तुम्हारे जैसा नीच और कौन होगा! किन्तु यह सब जान कर भी मैं तुम्हें रणक्षेत्र से सेवा के लिए उठा लाई।

 

विरुद्धक : तब क्यों नहीं मर जाने दिया? क्यों इस कलंकी जीवन को बचाया और अब…

 

मल्लिका : तुम इसलिए नहीं बचाए गए कि फिर भी एक विरक्त नारी पर बलात्कार और लम्पटता का अभिनय करो। जीवन इसलिए मिला है कि पिछले कुकर्मों का प्रायश्चित करो, अपने को सुधारो।

 

श्यामा का प्रवेश।

 

श्यामा : और भी एक भयानक अभियोग है-इस नरराक्षस पर! इसने एक विश्वास करने वाली स्त्री पर अत्याचार किया है, उसकी हत्या की है! शैलेन्द्र?

 

विरुद्धक : अरे श्यामा!

 

श्यामा : हाँ शैलेन्द्र, तुम्हारी नीचता का प्रत्यक्ष उदाहरण मैं अभी जीवित हूँ। निर्दय! चाण्डाल के समान क्रूर कर्म तुमने किया! ओह, जिसके लिए मैंने अपना सब छोड़ दिया, अपने वैभव पर ठोकर लगा दी, उसका ऐसा आचरण प्रतिहिंसा और पश्चात्ताप से सारा शरीर भस्म हो रहा है।

 

मल्लिका : विरुद्धक यह क्या, जो रमणी तुम्हें प्यार करती है, जिसने सर्वस्व तुम्हें अर्पण किया था, उसे भी तुम न चाह सके। तुम कितने क्षुद्र हो? तुम तो स्त्रियों की छाया भी छू सकने के योग्य नहीं हो।

 

विरुद्धक : मैं इसे वेश्या समझता था।

 

श्यामा : मैं तुम्हें डाकू समझने पर चाहने लगी थी। इतना तुम्हारे ऊपर मेरा विश्वास था। तब मैं नहीं जानती थी कि तुम कोसल के राजकुमार हो।

 

मल्लिका : यदि तुम प्रेम का प्रतिपादन नहीं जानते हो तो व्यर्थ एक सुकुमार नारी-हृदय को लेकर उसे पैरों से क्यों रौंदते हो विरुद्धक! क्षमा माँगो; यदि हो सके तो इसे अपनाओ!

 

श्यामा : नहीं देवि! अब मैं आपकी सेवा करूँगी, राजसुख मैं बहुत भोग चुकी हूँ। अब मुझे राजकुमार विरुद्धक का सिंहासन भी अभीष्ट नहीं है, मैं तो शैलेन्द्र डाकू को चाहती थी।

 

विरुद्धक : श्यामा, अब मैं सब तरह से प्रस्तुत हूँ, और क्षमा भी माँगता हूँ।

 

श्यामा : अब तुम्हें तुम्हारा हृदय अभिशाप देगा, यदि मैं क्षमा भी कर दूँ। किन्तु नहीं, विरुद्धक! अभी मुझमें उतनी सहनशीलता नहीं है।

 

मल्लिका : राजकुमार! जाओ, कोसल लौट जाओ; और यदि तुम्हें अपने पिता के पास जाने में डर लगता हो, तो मैं तुम्हारी ओर से क्षमा माँगूँगी। मुझे विश्वास है कि महाराज मेरी बात मानेंगे।

 

विरुद्धक : उदारता की मूर्ति! मैं किस तरह तुमसे, तुम्हारी कृपा से अपने प्राण बचाऊँ! देवि! ऐसे भी जीव इसी संसार में हैं, तभी तो यह भ्रमपूर्ण संसार ठहरा है।(पैरों पर गिरता है ) देवि! अधम का अपराध क्षमा करो।

 

मल्लिका : उठो राजकुमार! चलो, मैं भी श्रावस्ती चलती हूँ। महाराज प्रसेनजित् से तुम्हारे अपराधों को क्षमा करा दूँगी, फिर इस कोसल को छोड़ कर चली जाऊँगी। श्यामा, तब तक तुम इस कुटीर पर रहो, मैं आती हूँ। (दोनों जाते हैं। )

 

श्यामा : जैसी आज्ञा! (स्वगत) जिसे काल्पनिक देवत्व कहते हैं वही तो सम्पूर्ण मनुष्यता है। मागन्धी, धिक्कार है तुझे!

 

( गाती है )

 

स्वर्ग है नहीं दूसरा और।

 

सज्जन हृदय परम करुणामय यही एक है ठौर।।

 

सुधा-सलिल से मानस, जिसका पूरित प्रेम-विभोर।

 

नित्य कुसुममय कल्पद्रुम की छाया है इस ओर।।

 

( पट – परिवर्तन )

 

 

 

चतुर्थ दृश्य

 

 

 

स्थान – प्रकोष्ठ

 

दीर्घकारायण और रानी शक्तिमती।

 

 

 

शक्तिमती : बाजिरा सपत्नी की कन्या है; मेरा तो कुछ वश नहीं, और तुम जानते हो कि मैं इस समय कोसल की कंकड़ी से भी गई-बीती हूँ। किन्तु कोसल के सेनापति कारायण का अपमान करे ऐसा तो…

 

कारायण : रानी! हम इधर से भी गए और उधर से भी गए! विरुद्धक को भी मुँह दिखाने लायक न रहे और बाजिरा भी न मिली।

 

शक्तिमती : तुम्हारी मूर्खता! जब मगध के युद्ध में मैंने तुम्हें सचेत किया था, तब तुम धर्मध्वज बन गए थे; और हमारे बच्चे को धोखा दिया! अब सुनती हूँ कि वह उदयन के हाथ से घायल हुआ है। उसका पता भी नहीं है।

 

कारायण : मैं विश्वास दिलाता हूँ कि कुमार विरुद्धक अभी जीवित हैं। वह शीघ्र कोसल आवेंगे।

 

शक्तिमती : किन्तु तुम इतने डरपोक और सहनशील दास हो, मैं ऐसा नहीं समझती थी। जिसने तुम्हारे मातुल का वध किया, उसी की सेवा करके अपने को धन्य समझ रहे हो! तुम इतने कायर हो, यदि मैं पहले जानती…

 

कारायण : तब क्या करतीं? अपने स्वामी की हत्या करके अपना गौरव, अपनी विजय-घोषणा स्वयं सुनातीं?

 

शक्तिमती : यदि पुरुष इन कामों को कर सकता है तो स्त्रियाँ क्यों न करें? क्या उनके अन्तःकरण नहीं है? क्या स्त्रियाँ अपना कुछ अस्तित्व नहीं रखतीं? क्या उनका जन्मसिद्ध कोई अधिकार नहीं है? क्या स्त्रियों का सब कुछ पुरुषों की कृपा से मिली हुई भिक्षा मात्र है? मुझे इस तरह पदच्युत करने का किसी को क्या अधिकार था?

 

कारायण : स्त्रियों के संगठन में, उनके शारीरिक और प्राकृतिक विकास में ही एक परिवर्तन है-जो स्पष्ट बतलाता है कि वे शासन कर सकती हैं; किन्तु अपने हृदय पर। वे अधिकार जमा सकती हैं उन मनुष्यों पर-जिन्होंने समस्त विश्व पर अधिकार किया। वे मनुष्य पर राजरानी के समान एकाधिपत्य रख सकती हैं, तब उन्हें इस दुरभिसन्धि की क्या आवश्यकता है-जो केवल सदाचार और शान्ति को ही नहीं शिथिल करती, किन्तु उच्छृंखलता को भी आश्रय देती है?

 

शक्तिमती : फिर बार-बार यह अवहेलना कैसी? यह बहाना कैसा? हमारी असमर्थता सूचित करा कर हमें और भी निर्मूल आशंकाओं में छोड़ देने की कुटिलता क्यों है? क्या हम पुरुष के समान नहीं हो सकतीं? क्या चेष्टा करके हमारी स्वतन्त्रता नहीं पददलित की गई है? देखो, जब गौतम ने स्त्रियों को भी प्रव्रज्या लेने की आज्ञा दी, तब क्या वे ही सुकुमार स्त्रियाँ परिव्राजिका के कठोर व्रत को अपनी सुकुमार देह पर नहीं उठाने का प्रयास करतीं?

 

कारायण : किन्तु यह साम्य और परिव्राजिका होने की विधि भी तो उन्हीं पुरुषों में से किसी ने फैलाई है। स्वार्थ-त्याग के कारण वे उसकी घोषणा करने में समर्थ हुए, किन्तु समाज भर में न तो स्वार्थी स्त्रियों की कमी है, न पुरुषों की; और सब एक हृदय के हैं भी नहीं, फिर पुरुषों पर ही आक्षेप क्यों? जितनी अन्तःकरण की वृत्तियों का विकास सदाचार का ध्यान करके होता है-उन्हीं को जनता कर्त्तव्य का रूप देती है। मेरी प्रार्थना है कि तुम भी उन स्वार्थी मनुष्यों की कोटि में मिल कर बवण्डर न बनो।

 

शक्तिमती : तब क्या करूँ?

 

कारायण : विश्व भर में सब कर्म सबके लिए नहीं हैं, इसमें कुछ विभाग हैं अवश्य। सूर्य अपना काम जलता-बलता हुआ करता है और चन्द्रमा उसी आलोक को शीतलता से फैलाता है। क्या उन दोनों से परिवर्तन हो सकता है? मनुष्य कठोर परिश्रम करके जीवन-संग्राम में प्रकृति पर यथाशक्ति अधिकार करके भी एक शासन चाहता है, जो उसके जीवन का परम ध्येय है, उसका एक शीतल विश्राम है। और वह स्नेह-सेवा-करुणा की मूर्ति तथा सान्त्वना के अभय हस्त का आश्रय, मानव-समाज की सारी वृत्तियों की कुंजी, विश्व-शासन की एकमात्र अधिकारिणी प्रकृति-स्वरूप स्त्रियों के सदाचारपूर्ण स्नेह का शासन है। उसे छोड़ कर असमर्थता, दुर्बलता प्रकट करके इस दौड़-धूप में क्यों पड़ती हो, देवि! तुम्हारे राज्य की सीमा विस्तृत है, और पुरुष की संकीर्ण। कठोरता का उदाहरण है-पुरुष और कोमलता का विशेषण है-स्त्री जाति। पुरुष क्रूरता है तो स्त्री करुणा है-जो अन्तर्जगत् का उच्चतम विकास है, जिनके बल पर समस्त सदाचार ठहरे हुए हैं। इसीलिए प्रकृति ने उसे इतना सुन्दर और मनमोहक आवरण दिया है-रमणी का रूप। संगठन और आधार भी वैसे ही हैं। उन्हें दुरुपयोग में न ले जाओ। क्रूरता अनुकरणीय नहीं है, उसे नारी-जाति जिस दिन स्वीकृत कर लेगी, उस दिन समस्त सदाचारों में विप्लव होगा। फिर कैसी स्थिति होगी, यह कौन कह सकता है।

 

शक्तिमती : फिर क्या पदच्युत करके मैं अपमानित और पददलित नहीं की गई? क्या यह ठीक था?

 

कारायण : पदच्युत होने का अनुभव करना भी एक दम्भ मात्र है, देवि! एक स्वार्थी के लिए समाज दोषी नहीं हो सकता। क्या मल्लिका देवी का उदाहरण कहीं दूर है! वही लोलुप नर-पिशाच मेरा और आपका स्वामी, कोसल का सम्राट्, क्या-क्या उनके साथ कर चुका है, यह क्या आप नहीं जानतीं? फिर भी उनकी सती-सुलभ वास्तविकता देखिए और अपनी कृत्रिमता से तुलना कीजिए।

 

शक्तिमती : ( सोचती हुई ) कारायण, यहाँ तो मुझे सिर झुकाना ही पड़ेगा।

 

कारायण : देवि! मैं एक दिन में इस कोसल को उलट-पलट देता, छत्र-चमर लेकर हठात् विरुद्धक को सिंहासन पर बैठा देता; किन्तु मन के बिगाड़ने पर भी मल्लिका देवी का शासन मुझे सुमार्ग से नहीं हटा सका, और आप देखेंगी कि शीघ्र ही कोसल के सिंहासन पर राजकुमार विरुद्धक बैठेंगे; परन्तु आपकी मन्त्रणा के प्रतिकूल।

 

विरुद्धक और मल्लिका।

 

शक्तिमती : आर्या मल्लिका को मैं अभिवादन करती हूँ।

 

कारायण : मैं नमस्कार करता हूँ।

 

विरुद्धक माता का चरण छूता है।

 

मल्लिका : शान्ति मिले, विश्व शीतल हो। बहिन, क्या तुम अब भी राजकुमार को उत्तेजित करके उसे मनुष्यता से गिराने की चेष्टा करोगी? तुम जानती हो, तुम्हारा प्रसन्न मातृ-भाव क्या तुम्हें इसीलिए उत्साहित करता है? क्या क्रूर विरुद्धक को देख कर तुम्हारी अन्तरात्मा लज्जित नहीं होती?

 

शक्तिमती : वह मेरी भूल थी, देवि! क्षमा करना। वह बर्बरता का उद्रेक था-पाशव-वृत्ति की उत्तेजना थी।

 

मल्लिका : चन्द्र-सूर्य, शीतल-उष्ण, क्रोध-करुणा, द्वेष-स्नेह का द्वन्द्व संसार का मनोहर दृश्य है। रानी! स्त्री और पुरुष भी उसी विलक्षण नाटक के अभिनेता हैं। स्त्रियों का कर्त्तव्य है कि पाशव-वृत्ति वाले क्रूरकर्मा पुरुषों को कोमल और करुणाप्लुत करें, कठोर पौरुष के अनन्तर उन्हें जिस शिक्षा की आवश्यकता है-उस स्नेह, शीतलता, सहनशीलता और सदाचार का पाठ उन्हें स्त्रियों से सीखना होगा। हमारा यह कर्त्तव्य है। व्यर्थ स्वतन्त्रता और समानता का अहंकार करके उस अपने अधिकार से हमको वंचित न होना चाहिए। चलो, आज अपने स्वामी से क्षमा माँगो। सुना जाता है कि अजात और बाजिरा का ब्याह होने वाला है, तुम भी उस उत्सव में अपने घर को सूना मत रखो।

 

शक्तिमती : आपकी आज्ञा शिरोधार्य है, देवि!

 

कारायण : तो मैं भी आज्ञा चाहता हूँ, क्योंकि मुझे शीघ्र ही पहुँचना चाहिए। देखिए, वैतालिकों की वीणा बजने लगी। सम्भवतः महाराज शीघ्र सिंहासन पर आना चाहते हैं। (राजकुमार विरुद्धक से) राजकुमार, मैं आपसे भी क्षमा चाहता हूँ, क्योंकि आप जिस विद्रोह के लिए मुझे आज्ञा दे गए थे, मैं उसे करने में असमर्थ था-अपने राष्ट्र के विरुद्ध यदि आप अस्त्र ग्रहण न करते, तो सम्भवतः मैं आपका अनुगामी हो जाता क्योंकि मेरे हृदय में भी प्रतिहिंसा थी। किन्तु वैसा न हो सका, उसमें मेरा अपराध नहीं।

 

विरुद्धक : उदार सेनापति, मैं हृदय से तुम्हारी प्रशंसा करता हूँ और स्वयं तुमसे क्षमा माँगता हूँ।

 

कारायण : मैं सेवक हूँ, युवराज! (जाता है।)

 

( पट – परिवर्तन )

 

 

 

पंचम दृश्य

 

स्थान – कोसल की राजसभा

 

वर – वधू के वेश में अजातशत्रु और बाजिरा तथा प्रसेनजित् , शक्तिमती , मल्लिका , विरुद्धक , वासवी और कारायण का प्रवेश।

 

 

 

मल्लिका : बधाई है, महाराज! यह शुभ सम्बन्ध आनन्दमय हो!

 

प्रसेनजित् : देवि! आपकी असीम अनुकम्पा है, जो मुझ जैसे अधम व्यक्ति पर इतना स्नेह! पतितपावनी, तुम धन्य हो!

 

मल्लिका : किन्तु महाराज! मेरी एक प्रार्थना है।

 

प्रसेनजित् : आपकी आज्ञा शिरोधार्य है, भगवती!

 

मल्लिका : आपकी इस पत्नी, परित्यक्ता शक्तिमती का क्या दोष है? इस शुभ अवसर पर यह विवाद उठाना यद्यपि ठीक नहीं है तो भी…

 

प्रसेनजित् : इसका प्रमाण तो वह स्वयं है। उसने क्या-क्या नहीं किया-यह क्या किसी से छिपा है?

 

मल्लिका : किन्तु इसके मूल कारण तो महाराज ही हैं। यह तो अनुकरण करती रही-यथा राजा तथा प्रजा-जन्म लेना तो इसके अधिकार में नहीं था, फिर आप इस अबला पर क्यों ऐसा दण्ड विधान करते हैं?

 

प्रसेनजित् : मैं इसका क्या उत्तर दूँ, देवि!

 

शक्तिमती : वह मेरा ही अपराध था, आर्यपुत्र! क्या उसके लिए क्षमा नहीं मिलेगी-मैं अपने कृत्यों पर पश्चात्ताप करती हूँ। अब मेरी सेवा मुझे मिले, उससे मैं वंचित न होऊँ, यह मेरी प्रार्थना है।

 

प्रसेनजित् मल्लिका का मुँह देखता है।

 

मल्लिका : क्षमा करना ही होगा, महाराज! और उसका बोझ मेरे सिर पर होगा। मुझे विश्वास है कि यह प्रार्थना निष्फल न होगी।

 

प्रसेनजित् : मैं उसे कैसे अस्वीकार कर सकता हूँ!

 

शक्तिमती का हाथ पकड़कर उठाता है।

 

मल्लिका : मैं कृतज्ञ हुई, सम्राट्! क्षमा से बढ़ कर दण्ड नहीं है, और आपकी राष्ट्रनीति इसी का अवलम्बन करे, मैं यही आशीर्वाद देती हूँ। किन्तु एक बात और भी है।

 

प्रसेनजित् : वह क्या?

 

मल्लिका : मैं आज अपना सब बदला चुकाना चाहती हूँ, मेरा भी कुछ अभियोग है।

 

प्रसेनजित् : वह बड़ा भयानक है! देवि, उसे तो आप क्षमा कर चुकी हैं; अब?

 

मल्लिका : तब आप यह स्वीकार करते हैं कि भयानक अपराध भी क्षमा कराने का साहस मनुष्य को होता है?

 

प्रसेनजित् : विपन्न की यही आशा है। तब भी…

 

मल्लिका : तब भी ऐसा अपराध क्षमा किया जाता है, क्यों सम्राट्?

 

प्रसेनजित् : मैं क्या कहूँ? इसका उदाहरण तो मैं स्वयं हूँ।

 

मल्लिका : तब यह राजकुमार विरुद्धक भी क्षमा का अधिकारी है।

 

प्रसेनजित् : किन्तु वह राष्ट्र का द्रोही है, क्यों धर्माधिकारी, उसका क्या दण्ड है?

 

धर्माधिकारी : ( सिर नीचा कर ) महाराज!

 

मल्लिका : राजन्, विद्रोही बनाने के कारण भी आप ही हैं। बनाने पर विरुद्धक राष्ट्र का एक सच्चा शुभचिंतक हो सकता था। और इससे क्या, मैं तो स्वीकार करा चुकी हूँ कि भयानक अपराध भी मार्जनीय होते हैं।

 

प्रसेनजित् : तब विरुद्धक को क्षमा किया जाए।

 

विरुद्धक : पिता, मेरा अपराध कौन क्षमा करेगा? पितृद्रोही को कौन ठिकाना देगा? मेरी आँखें लज्जा से ऊपर नहीं उठतीं। मुझे राज्य नहीं चाहिए; चाहिए केवल आपकी क्षमा। पृथ्वी के साक्षात् देवता! मेरे पिता! मुझ अपराधी पुत्र को क्षमा कीजिए।

 

चरण पकड़ता है।

 

प्रसेनजित् : धर्माधिकारी! पिता का हृदय इतना सदय होता है कि कोई नियम उसे क्रूर नहीं बना सकता। मेरा पुत्र मुझसे क्षमा-भिक्षा चाहता है, धर्मशास्त्र के उस पत्र को उलट दो, मैं एक बार अवश्य क्षमा कर दूँगा। उसे न करने से मैं पिता नहीं रह सकता, मैं जीवित नहीं रह सकता।

 

धर्माधिकारी : किन्तु महाराज! व्यवस्था का भी कुछ मान रखना चाहिए।

 

प्रसेनजित् : यह मेरा त्याज्य पुत्र है। किन्तु अपराध का मृत्युदण्ड, नहीं-नहीं, वह किसी राक्षस पिता का काम है। वत्स विरुद्धक! उठो, मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ।

 

विरुद्धक को उठाता है।

 

बुद्ध का प्रवेश।

 

सब : भगवान के चरणों में प्रणाम।

 

गौतम : विनय और शील की रक्षा करने में सब दत्तचित्त रहें, जिससे प्रजा का कल्याण हो-करुणा की विजय हो। आज मुझे सन्तोष हुआ, कोसल-नरेश! तुमने अपराधी को क्षमा करना सीख लिया, यह राष्ट्र के लिए कल्याण की बात हुई। फिर भी तुम इसे त्याज्य पुत्र क्यों कह रहे हो?

 

प्रसेनजित् : महाराज, यह दासीपुत्र है, सिंहासन का अधिकारी नहीं हो सकता।

 

गौतम : यह दम्भ तुम्हारा प्राचीन संस्कार है। क्यों राजन्! क्या दास-दासी मनुष्य नहीं हैं? क्या कई पीढ़ी ऊपर तक तुम प्रमाण दे सकते हो कि सभी राजकुमारियों की ही सन्तान इस सिंहासन पर बैठी हैं या प्रतिज्ञा करोगे कि कई पीढ़ी आने वाली तक दासी-पुत्र इस पर न बैठने पावेंगे? यह छोटे-बड़े का भेद क्या अभी इस संकीर्ण हृदय में इस तरह घुसा है कि निकल नहीं सकता? क्या जीवन की वर्तमान स्थिति देख कर प्राचीन अन्धविश्वासों का, जो न जाने किस कारण होते आए हैं, तुम बदलने के लिए प्रस्तुत नहीं हो? क्या इस क्षणिक भव में तुम अपनी स्वतन्त्र सत्ता अनन्त काल तक बनाए रखोगे? और भी, क्या उस आर्य-पद्धति को तुम भूल गए कि पिता से पुत्र की गणना होती है? राजन्, सावधान हो, इस अपनी सुयोग्य शक्ति को स्वयं कुंठित न बनाओ। यद्यपि इसने कपिवस्तु में निरीह प्राणियों का वध करके बड़ा अत्याचार किया है और कारणवश क्रूरता भी यह करने लगा था, किन्तु अब इसका हृदय, देवि मल्लिका की कृपा से शुद्ध हो गया है। इसे तुम युवराज बनाओ।

 

सब : धन्य है! धन्य है!!

 

प्रसेनजित् : तब जैसी आज्ञा-इस व्यवस्था का कौन अतिक्रमण कर सकता है, और यह मेरी प्रसन्नता का कारण भी होगा। प्रभु, आपकी कृपा से मैं आज सर्वसम्पन्न हुआ। और क्या आज्ञा है?

 

गौतम : कुछ नहीं। तुम लोग कर्त्तव्य के लिए सत्ता के अधिकारी बनाए गए हो, उसका दुरुपयोग न करो। भूमण्डल पर स्नेह का, करुणा का, क्षमा का शासन फैलाओ। प्राणिमात्र में सहानुभूति को विस्तृत करो। इन क्षुद्र विप्लवों से चौंक कर अपने कर्म-पद से च्युत न हो जाओ।

 

प्रसेनजित् : जो आज्ञा, वही होगा।

 

अजातशत्रु उठ कर विरुद्धक को गले लगाता है।

 

अजातशत्रु : भाई विरुद्धक, मैं तुमसे ईर्ष्या कर रहा हूँ।

 

विरुद्धक : और मैं वह दिन शीघ्र देखूँगा कि तुम भी इसी प्रकार अपने पिता से क्षमा किए गए।

 

अजातशत्रु : तुम्हारी वाणी सत्य हो।

 

बाजिरा : भाई विरुद्धक! मुझे क्या तुम भूल गए? क्या मेरा कोई अपराध है, जो मुझसे नहीं बोलते थे?

 

विरुद्धक : नहीं-नहीं, मैं तुमसे लज्जित हूँ। मैं तुम्हे सदैव द्वेष की दृष्टि से देखा करता था, उसके लिए तुम मुझे क्षमा करो।

 

बाजिरा : नहीं भाई! यही तुम्हारा अत्याचार है।

 

सब जाते हैं।

 

वासवी : (स्वगत) अहा! जो हृदय विकसित होने के लिए है, जो मुख हँसकर स्नेह-सहित बातें करने के लिए है, उसे लोग कैसा बिगाड़ लेते हैं! भाई प्रसेन, तुम अपने जीवन-भर में इतने प्रसन्न कभी न हुए होगे, जितने आज। कुटुम्ब के प्राणियों में स्नेह का प्रचार करके मानव इतना सुखी होता है, यह आज ही मालूम हुआ होगा। भगवान्! क्या कभी वह भी दिन आएगा जब विश्व-भर में एक कुटुम्ब स्थापित हो जाएगा और मानव-मात्र स्नेह से अपनी गृहस्थी सँभालेंगे? (जाती है)

 

( पट – परिवर्तन )

 

 

 

षष्ठ दृश्य

 

वार्तालाप करते हुए दो नागरिक।

 

 

 

पहला : किसने शक्ति का ऐसा परिचय दिया है! सहनशीलता का ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण-ओह!

 

दूसरा : देवदत्त का शोचनीय परिणाम देख कर मुझे तो आश्चर्य हो गया। जो एक स्वतन्त्र संघ स्थापित करना चाहता था, उसकी यह दशा….

 

पहला : जब भगवान् से भिक्षुओं ने कहा कि देवदत्त आपका प्राण लेने आ रहा है, उसे रोकना चाहिए…

 

दूसरा : तब, तब?

 

पहला : तब उन्होंने केवल यही कहा कि घबराओ नहीं, देवदत्त मेरा कुछ अनिष्ट नहीं कर सकता। वह स्वयं मेरे पास नहीं आ सकता; उसमें इतनी शक्ति नहीं क्योंकि उसमें द्वेष है।

 

दूसरा : फिर क्या हुआ?

 

पहला : यही कि देवदत्त समीप आने पर प्यास के कारण उस सरोवर में जल पीने उतरा। कहा नहीं जा सकता कि उसे क्या हुआ-कोई ग्राह पकड़ ले गया या उसने लज्जा से डूब कर आत्महत्या कर ली। वह फिर न दिखाई पड़ा।

 

दूसरा : आश्चर्य! गौतम की अमोघ शक्ति हैः भाई, इतना त्याग तो आज तक देखा नहीं गया। केवल पर-दुःख-कातरता ने किस प्राणी से राज्य छुड़वाया है! अहा, वह शान्त मुखमण्डल, स्निग्ध गम्भीर दृष्टि, किसको नहीं आकर्षित करती। कैसा विलक्षण प्रभाव है!

 

पहला : तभी तो बड़े-बड़े सम्राट् लोग विनत होकर उनकी आज्ञा का पालन करते हैं। देखो, यह भी कभी हो सकता था कि राजकुमार विरुद्धक पुनः युवराज बनाए जाते भगवान् ने समझा कर महाराज को ठीक कर ही दिया-और वे आनन्द से युवराज बना दिए गए।

 

दूसरा : हाँ जी, चलो, आज तो श्रावस्ती भर में महोत्सव है, हम लोग भी घूम-घूम कर आनन्द लें।

 

पहला : श्रावस्ती पर से आतंक-मेघ टल गया, अब तो आनन्द-ही-आनन्द है। इधर राजकुमारी का ब्याह भी मगधराज से हो गया है। अब युद्ध-विग्रह तो कुछ दिनों के लिए शान्त हुए। चलो, हम लोग भी महोत्सव में सम्मिलित हों।

 

एक ओर से दोनों जाते हैं , दूसरी ओर से वसन्तक का प्रवेश।

 

वसन्तक : फटी हुई बाँसुरी भी कहीं बजती है! एक कहावत है कि रहे मोची-के-मोची। यह सब ग्रहों की गड़बड़ी है, ये एक बार ही इतना बड़ा काण्ड उपस्थित कर देते हैं! कहाँ साधारण ग्रामबाला-हो गई थी राजरानी! मैं देख आया-वही मागन्धी ही तो है। अब आम की बारी लेकर बेचा करती है और लड़कों के ढेले खाया करती है। ब्रह्मा भी कभी भोजन करने के पहले मेरी ही तरह भाँग पी लेते होंगे, तभी तो ऐसा उलटफेर…ऐं, किन्तु परन्तु तथापि, वही कहावत ‘पुनर्मूषको भव!’ एक चूहे को किसी ऋषि ने दया करके व्याघ्र बना दिया, वह उन्हीं पर गुर्राने लगा। जब झपटने लगा तो चट से बाबा जी बोले- ‘पुनर्मूषको भव’-जा बच्चा, फिर चूहा बन जा। महादेवी वासवदत्ता को यह समाचार चल कर सुनाऊँगा। अरे, उसी के फेर में मुझे देर हो गई। महाराज ने वैवाहिक उपहार तो भेजे थे, सो अब तो मैं पिछ़ड गया। लड्डू तो मिलेंगे। अजी बासी होंगे तो क्या-मिलेंगे तो। ओह, नगर में तो आलोकमाला दिखाई देती है! सम्भवतः वैवाहिक महोत्सव का अभी अन्त नहीं हुआ। तो चलूँ। (जाता है।)

 

( पट – परिवर्तन )

 

 

 

सप्तम दृश्य

 

 

 

स्थान – आम्र कानन

 

आम्रपाली मागन्धी।

 

 

 

मागन्धी : (आप-ही-आप) वाह री नियति! कैसे-कैसे दृश्य देखने में आए-कभी बैलों को चारा देते-देते हाथ नहीं थकते थे, कभी अपने हाथ से जल का पात्र तक उठा कर पीने से संकोच होता था, कभी शील का बोझ एक पैर भी महल के बाहर चलने में रोकता था और कभी निर्लज्ज गणिका का आमोद मनोनीत हुआ! इस बुद्धिमत्ता का क्या ठिकाना है! वास्तविक रूप के परिवर्तन की इच्छा मुझे इतनी विषमता में ले आई। अपनी परिस्थिति को संयत न रख कर व्यर्थ महत्त्व का ढोंग मेरे हृदय ने किया, काल्पनिक सुख-लिप्सा ही में पड़ी-उसी का यह परिणाम है। स्त्री-सुलभ एक स्निग्धता, सरलता की मात्रा कम हो जाने से जीवन में कैसे बनावटी भाव आ गए! जो अब केवल एक संकोचदायिनी स्मृति के रूप में अवशिष्ट रह गए।

 

गाती है।

 

स्वजन दीखता न विश्व में अब, न बात मन में समाय कोई।

 

पड़ी अकेली विकल रो रही, न दुःख में है सहाय कोई।।

 

पलट गए दिन स्नेह वाले, नहीं नशा, अब रही न गर्मी ।

 

न नींद सुख की, न रंगरलियाँ, न सेज उजला बिछाए सोई ।।

 

बनी न कुछ इस चपल चित्त की, बिखर गया झूठ गर्व जो।

 

था असीम चिन्ता चिता बनी है, विटप कँटीले लगाए रोई ।।

 

क्षणिक वेदना अनन्त सुख बस, समझ लिया शून्य में बसेरा ।

 

पवन पकड़कर पता बताने न लौट आया न जाए कोई।।

 

बुद्ध का प्रवेश – घुटने टेककर हाथ जोड़ती है , सिर पर हाथ रखते हैं।

 

गौतम : करुणे, तेरी जय हो!

 

मागन्धी : (आँखे खोल कर और पैर पकड़ कर) प्रभु, आ गए! इस प्यासे हृदय की तृष्णा को अमृत-स्रोत ने अपनी गति परिवर्तित की-इस मरु-देश में पदार्पण किया!

 

गौतम : मागन्धी! तुम्हें शान्ति मिलेगी। जब तक तुम्हारा हृदय उस विशृंखलता में था, तभी तक यह विडम्बना थी।

 

मागन्धी : प्रभु! मैं अभागिनी नारी, केवल उस अवज्ञा की चोट से बहुत दिन भटकती रही। मुझे रूप का गर्व बहुत ऊँचे चढ़ा ले गया था, और अब उसने ही नीचे पटका।

 

गौतम : क्षणिक विश्व का यह कौतुक है, देवि! अब तुम अग्नि से तपे हुए हेम की तरह शुद्ध हो गई हो। विश्व के कल्याण में अग्रसर हो। असंख्य दुखी जीवों को हमारी सेवा की आवश्यकता है। इस दुःख समुद्र में कूद पड़ो। यदि एक भी रोते हुए हृदय को तुमने हँसा दिया तो सहस्रों स्वर्ग तुम्हारे अन्तर में विकसित होंगे। फिर तुमको पर-दुःख कातरता में ही आनन्द मिलेगा। विश्वमैत्री हो जाएगी-विश्व-भर अपना कुटुम्ब दिखाई पड़ेगा। उठो, असंख्य आहें तुम्हारे उद्योग से अट्टहास में परिणत हो सकती हैं।

 

मागन्धी : अन्त में मेरी विजय हुई, नाथ! मैंने अपने जीवन के प्रथम वेग में ही आपको पाने का प्रयास किया था। किन्तु वह समय ठीक भी नहीं था। आज मैं अपने स्वामी को, अपने नाथ को, अपना कर धन्य हो रही हूँ।

 

गौतम : मागन्धी! अब उन अतीत के विकारों को क्यों स्मरण करती है, निर्मल हो जा!

 

मागन्धी : प्रभु! मैं नारी हूँ, जीवन-भर असफल होती आई हूँ। मुझे उस विचार के सुख से न वंचित कीजिए। नाथ! जन्म-भर की पराजय में भी आज मेरी ही विजय हुई। पतितपावन! यह उद्धार आपके लिए भी महत्त्व देने वाला है और मुझे तो सब कुछ।

 

गौतम : अच्छा, आम्रपाली! कुछ खिलाओगी

 

मागन्धी : (आम की टोकरी लाकर रखती हुई) प्रभु! अब इस आम्रकानन की मुझे आवश्यकता नहीं, यह संघ को समर्पित है।

 

संघ का प्रवेश।

 

संघ : जय हो, अमिताभ की जय हो! बुद्धं शरणं…

 

मागन्धी : गच्छामि।

 

गौतम : संघं शरणं गच्छामि।

 

 

 

( पट – परिवर्तन )

 

 

 

अष्टम दृश्य

 

पद्मावती और छलना।

 

 

 

छलना : बेटी! तुम बड़ी हो, मैं बुद्धि में तुमसे छोटी हूँ। मैंने तुम्हारा अनादर करके तुम्हें भी दुःख दिया और भ्रान्त पथ पर चल कर स्वयं भी दुःखी हुई।

 

पद्मावती : माँ! मुझे लज्जित न करो! तुम क्या मेरी माँ नहीं हो! माँ, भाभी के बच्चा हुआ है-आहा कैसा सुन्दर नन्हा-सा बच्चा है!

 

छलना : पद्मा! तुम और अजात सहोदर भाई-बहिन हो, मैं तो सचमुच एक बवण्डर हूँ। बहन वासवी क्या मेरा अपराध क्षमा कर देगी?

 

वासवी का प्रवेश।

 

छलना : ( पैर पर गिर कर ) कुणीक की तुम्हीं वास्तव में जननी हो, मुझे तो बोझ ढोना था।

 

पद्मावती : माँ छोटी माँ पूछती है, क्या मेरा अपराध क्षम्य है?

 

वासवी : ( मुस्कराकर ) कभी नहीं, इसने कुणीक को उत्पन्न करके मुझे बड़ा सुख दिया, जिसका इस छोटे से हृदय से मैं उपभोग नहीं कर सकती। इसलिए मैं इसे क्षमा नहीं करूँगी।

 

छलना : ( हँसकर ) तब तो बहिन, मैं भी तुमसे लड़ाई करूँगी, क्योंकि मेरा दुःख हरण करके तुमने मुझे खोखली कर दिया है, हृदय हल्का होकर बेकाम हो गया है। अरे, सपत्नी का काम तो तुम्हीं ने कर दिखाया। पति को तो बस में किया ही था, मेरे पुत्र को भी गोद में लिया। मैं…

 

वासवी : छलना! तू नहीं जानती, मुझे एक बच्चे की आवश्यकता थी, इसलिए तुझे नौकर रख लिया था-अब तो तेरा काम नहीं है।

 

छलना : बहिन, इतना कठोर न हो जाओ।

 

वासवी : ( हँसती हुई ) अच्छा जा, मैंने तुझे अपने बच्चे की धात्री बना दिया। देख, अब अपना काम ठीक से करना, नहीं तो फिर…

 

छलना : ( हाथ जोड़ कर ) अच्छा, स्वामिनी।

 

पद्मावती : क्यों माँ, अजात तो यहाँ अभी नहीं आया! वह क्या छोटी माँ के पास नहीं आवेगा?

 

वासवी : पद्मा! जब उसे पुत्र हुआ, तब उससे कैसे रहा जाता। वह सीधे श्रावस्ती से महाराज के मन्दिर में गया है। सन्तान उत्पन्न होने पर अब उसे पिता के स्नेह का मोल समझ पड़ा है।

 

छलना : बेटी पद्मा! चल। इसी से कहते हैं कि काठ की सौत भी बुरी होती है-देखी निर्दयता-अजात को यहाँ न आने दिया।

 

वासवी : चल-चल, तुझे तेरा पति भी दिला दूँ और बच्चा भी। यहाँ बैठ कर मुझसे लड़ मत, कंगालिन!

 

सब हँसती हुई जाती हैं।

 

( पट – परिवर्तन )

 

 

 

नवम दृश्य

 

 

 

स्थान – महाराज विम्बिसार का कुटीर

 

विम्बिसार लेटे हुए हैं।

 

 

 

( नेपथ्य से गान )

 

चल बसन्त बाला अंचल से किस घातक सौरभ से मस्त,

 

आती मलयानिल की लहरें जब दिनकर होता है अस्त।

 

मधुकर से कर सन्धि, विचर कर उषा नदी के तट उस पार;

 

चूसा रस पत्तों-पत्तों से फूलों का दे लोभ अपार।

 

लगे रहे जो अभी डाल से बने आवरण फूलों के,

 

अवयव थे शृंगार रहे तो वनबाला के झूलों के।

 

आशा देकर गले लगाया रुके न वे फिर रोके से,

 

उन्हें हिलाया बहकाया भी किधर उठाया झोंके से।

 

कुम्हलाए, सूखे, ऐंठे फिर गिरे अलग हो वृन्तों से,

 

वे निरीह मर्माहत होकर कुसुमाकर के कुन्तों से।

 

नवपल्लव का सृजन! तुच्छ है किया बात से वध जब क्रूर,

 

कौन फूल-सा हँसता देखे! वे अतीत से भी जब दूर।

 

लिखा हुआ उनकी नस-नस में इस निर्दयता का इतिहास,

 

तू अब ‘आह’ बनी घूमेगी उनके अवशेषों के पास।

 

विम्बिसार : ( उठ कर आप – ही – आप ) सन्ध्या का समीर ऐसा चल रहा है- जैसे दिन भर का तपा हुआ उद्विग्न संसार एक शीतल निःश्वास छोड़ कर अपना प्राण धारण कर रहा हो। प्रकृति की शान्तिमयी मूर्ति निश्चल होकर भी मधुर झोंके से हिल जाती है। मनुष्य-हृदय भी रहस्य है, एक पहेली है। जिस पर क्रोध से भैरव हुंकार करता है, उसी पर स्नेह का अभिषेक करने के लिए प्रस्तुत रहता है। उन्माद! और क्या मनुष्य क्या इस पागल विश्व के शासन से अलग होकर कभी निश्चेष्टता नहीं ग्रहण कर सकता हाय रे मानव! क्यों इतनी दुरभिलाषाएँ बिजली की तरह तू अपने हृदय में आलोकित करता है? क्या निर्मल-ज्योति तारागण की मधुर किरणों के सदृश सद्वृत्तियों का विकास तुझे नहीं रुचता! भयानक भावुकता और उद्वेगजनक अन्तःकरण लेकर क्यों तू व्यग्र हो रहा है? जीवन की शान्तिमय सच्ची परिस्थिति को छोड़ कर व्यर्थ के अभिमान में तू कब तक पड़ा रहेगा? यदि मैं सम्राट् न होकर किसी विनम्र लता के कोमल किसलयों के झुरमुट में एक अधखिला फूल होता और संसार की दृष्टि मुझ पर न पड़ती-पवन की किसी लहर को सुरभित करके धीरे से उस थाले में चू पड़ता-तो इतना भीषण चीत्कार इस विश्व में न मचता। उस अस्तित्व को अनस्तित्व के साथ मिलाकर कितना सुखी होता! भगवन् असंख्य ठोकरें खाकर लुढ़कते हुए जड़ ग्रहपिण्डों से भी तो इस चेतन मानव की बुरी गति है। धक्के-पर-धक्के खाकर भी यह निर्लज्ज सभा से नहीं निकलना चाहता। कैसी विचित्रता है। अहा! वासवी भी नहीं हैं। कब तक आवेंगी?

 

जीवक : ( प्रवेश करके ) सम्राट्!

 

बिम्बिसार : चुप! यदि मेरा नाम न जानते हो, तो मनुष्य कहकर पुकारो। वह भयानक सम्बोधन मुझे न चाहिए!

 

जीवक : कई रथ द्वार पर आए हैं, और राजकुमार कुणीक भी आ रहे हैं।

 

बिम्बिसार : कुणीक कौन! मेरा पुत्र या मगध का सम्राट् अजातशत्रु?

 

अजातशत्रु : ( प्रवेश करके ) पिता, आपका पुत्र यह कुणीक सेवा में प्रस्तुत है। (पैर पकड़ता है।)

 

बिम्बिसार : नहीं-नहीं, मगधराज अजातशत्रु को सिंहासन की मर्यादा नहीं भंग करनी चाहिए। मेरे दुर्बल-चरण-आह, छोड़ दो।

 

अजातशत्रु : नहीं पिता, पुत्र का यही सिंहासन है। आपने सोने का झूठा सिंहासन देकर मुझे इस सत्य अधिकार से वंचित किया। अबाध्य पुत्र को भी कौन क्षमा कर सकता है?

 

बिम्बिसार : पिता। किन्तु, वह पुत्र को क्षमा करता है; सम्राट् को क्षमा करने का अधिकार पिता को कहाँ

 

अजातशत्रु : नहीं पिता, मुझे भ्रम हो गया था। मुझे अच्छी शिक्षा नहीं मिली थी। मिला था केवल जंगलीपन की स्वतन्त्रता का अभिमान-अपने को विश्व-भर से स्वतन्त्र जीव समझने का झूठा आत्मसम्मान।

 

बिम्बिसार : वह भी तो तुम्हारे गुरुजन की ही दी हुई शिक्षा थी। तुम्हारी माँ थी-राजमाता।

 

अजातशत्रु : वह केवल मेरी माँ थी-एक सम्पूर्ण अंग का आधा भाग; उसमें पिता की छाया न थी-पिता! इसलिए आधी शिक्षा अपूर्ण ही होगी।

 

छलना : ( प्रवेश करके चरण पकड़ती है ) नाथ! मुझे निश्चय हुआ कि वह मेरी उद्दण्डता थी। वह मेरी कूट-चातुरी थी, दम्भ का प्रकोप था। नारी-जीवन के स्वर्ण से मैं वंचित कर दी गई। ईंट-पत्थर के महल रूपी बन्दीगृह में मैं अपने को धन्य समझने लगी थी। दण्डनायक; मेरे शासक! क्यों न उसी समय शील और विनय के नियम-भंग करने के अपराध में मुझे आपने दण्ड दिया! क्षमा करके, सहन करके, जो आपने इस परिणाम की यन्त्रणा के गर्त में मुझे डाल दिया है, वह मैं भोग चुकी। अब उबारिए!

 

बिम्बिसार : छलना! दण्ड देना मेरी सामर्थ्य के बाहर था! अब देखूँ कि क्षमा करना भी मेरी सामर्थ्य में है कि नहीं!

 

वासवी : ( प्रवेश करके ) आर्यपुत्र! अब मैंने इसको दण्ड दे दिया है, यह मातृत्व-पद से च्युत की गई है, अब इसको आपके पौत्र की धात्री का पद मिला है। एक राजमाता को इतना बड़ा दण्ड कम नहीं है; अब आपको क्षमा करना ही होगा।

 

बिम्बिसार : वासवी! तुम मानवी हो कि देवी?

 

वासवी : बता दूँ! मैं मगध के सम्राट् की राजमहिषी हूँ। और, यह छलना मगध के राजपौत्र की धाई है, और यह कुणीक मेरा बच्चा इस मगध का युवराज है और आपको भी..

 

बिम्बिसार : मैं अच्छी तरह अपने को जानता हूँ, वासवी!

 

वासवी : क्या?

 

बिम्बिसार : कि मैं मनुष्य हूँ और इन मायाविनी स्त्रियों के हाथ का खिलौना हूँ।

 

वासवी : तब तो महाराज! मैं जैसा कहती हूँ वैसा ही कीजिए; नहीं तो आपको लेकर मैं नहीं खेलूँगी।

 

बिम्बिसार : तो तुम्हारी विजय हुई, वासवी! क्यों अजात पुत्र होने पर पिता के स्नेह का गौरव तुम्हें विदित हुआ-कैसी उल्टी बात हुई।

 

कुणीक लज्जित होकर सिर झुका लेता है।

 

पद्मावती : ( प्रवेश करके ) पिताजी, मुझे बहुत दिनों से आपने कुछ नहीं दिया है, पौत्र होने के उपलक्ष्य में तो मुझे कुछ अभी दीजिए, नहीं तो मैं उपद्रव मचा कर इस कुटी को खोद डालूँगी।

 

बिम्बिसार : बेटी पद्मा! अहा तू भी आ गई

 

पद्मावती : हाँ पिताजी! बहू भी आ गई है। क्या मैं यहीं ले आऊँ?

 

वासवी : चल पगली! मेरी सोने-सी बहू इस तरह क्या जहाँ-तहाँ जाएगी-जिसे देखना हो, वहीं चले!

 

बिम्बिसार : तुम सबने तो आकर मुझे आश्चर्य में डाल दिया। प्रसन्नता से मेरा जी घबरा उठा है।

 

पद्मावती : तो फिर मुझे पुरस्कार दीजिए।

 

बिम्बिसार : क्या लोगी?

 

पद्मावती : पहले छोटी माँ को, भया को, क्षमा कर दीजिए; क्योंकि इनकी याचना पहले की है; फिर…

 

बिम्बिसार : अच्छा री, पद्मा! देखूँगा तेरी दुष्टता। उठो वत्स अजात! जो पिता है वह क्या कभी भी पुत्र को क्षमा-केवल क्षमा-माँगने पर भी नहीं देगा। तुम्हारे लिए यह कोष सदैव खुला है। उठो छलना, तुम भी। (अजातशत्रु को गले लगाता है।)

 

पद्मावती : तब मेरी बारी!

 

बिम्बिसार : हाँ, कह भी…

 

पद्मावती : बस, चल कर मगध के नवीन राजकुमार को एक स्नेह-चुम्बन आशीर्वाद के साथ दीजिए।

 

बिम्बिसार : तो फिर शीघ्र चलो! (उठ कर गिर पड़ता है) ओह! इतना सुख एक साथ मैं सहन न कर सकूँगा! तुम सब बहुत विलम्ब करके आए! (काँपता है।)

 

गौतम का प्रवेश, अभय का हाथ उठाते हैं।

 

( आलोक के साथ यवनिका – पतन )

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