धन्य है हमारा हिन्दू धर्म जिसमे स्त्रियां किसी की पत्नी बनने से पहले, सर्व कल्याणार्थ कसमें खिलवाती है !

· April 19, 2015

images (52)हमारे सनातन धर्म में शादी के समय स्त्रियां अपने होने वाली पति से शादी से पहले सात कसमे खिलवाती है और पति के द्वारा स्वीकारने के बाद ही शादी पूर्ण मानी जाती है।

इन कसमो की सबसे बड़ी खास बात यह है की इन कसमो को पूरा करने में सिर्फ पति – पत्नी का ही नहीं बल्कि समाज के बहुत से लोगो का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भला होता है। वो सातो कसम और उनके हिन्दी में अर्थ निम्नलिखित है।

पहली कसम –

तीर्थव्रतोद्यापनयज्ञ दानं मया सह त्वं यदि कान्तकुर्या:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद वाक्यं प्रथमं कुमारी।

अर्थ – इस श्लोक के अनुसार कन्या कहती है कि स्वामी तीर्थ, व्रत, उद्यापन, यज्ञ, दान आदि सभी शुभ कर्म आप मेरे साथ करेँगे तभी मैं आपके वाम अंग में आ सकती हैं अर्थात् आपकी पत्नी बन सकती हूं। वाम अंग पत्नी का स्थान होता है।

दूसरी कसम –

हव्यप्रदानैरमरान् पितृश्चं कव्यं प्रदानैर्यदि पूजयेथा:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं द्वितीयकम्।

अर्थ – इस श्लोक के अनुसार कन्या वर से कहती है कि यदि आप हव्य देकर देवताओं को और हव्य देकर पितरों की पूजा करेँगे तब ही मैं आपके वाम अंग में आ सकती हूं यानी पत्नी बन सकती हूं।

तीसरा वचन –

कुटुम्बरक्षाभरंणं यदि त्वं कुर्या: पशूनां परिपालनं च।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं तृतीयम्।

अर्थ – इस श्लोक के अनुसार कन्या वर से कहती है कि यदि आप मेरी तथा परिवार की रक्षा करेँगे तथा घर के पालतू पशुओं का पालन करेँगे तो मैं आपके वाम अंग में आ सकती हूं यानी पत्नी बन सकती हूं।

चौथा वचन –

आयं व्ययं धान्यधनादिकानां पृष्टवा निवेशं प्रगृहं निदध्या:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं चतुर्थकम्।

अर्थ – चौथे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि आप धन – धान्य, आय-व्यय आदि को सहमति से करेँगे तो मैं आपके वाम अंग में आ सकती हैं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं।

पांचवां वचन –

देवालयारामतडागकूपं वापी विदध्या:यदि पूजयेथा:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं पंचमम्।

अर्थ – पांचवे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि आप यथा शक्ति देवालय, बाग, कूआं, तालाब, बावड़ी बनवाकर पूजा करेँगे तो मैं आपके वाम अंग में आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं।

छठा वचन –

देशान्तरे वा स्वपुरान्तरे वा यदा विदध्या:क्रयविक्रये त्वम्।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं षष्ठम्।

अर्थ – इस श्लोक के अनुसार कन्या वर से कहती है कि यदि आप अपने नगर में या विदेश में या कहीं भी जाकर व्यापार या नौकरी करेँगे और घर-परिवार का पालन-पोषण करेँगे तो मैं आपके वाम अंग में आ सकती हूं यानी पत्नी बन सकती हूं।

सातवां वचन –
न सेवनीया परिकी यजाया त्वया भवेभाविनि कामनीश्च।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं सप्तम्।

अर्थ – इस श्लोक के अनुसार सातवां और अंतिम वचन यह है कि कन्या वर से कहती है यदि आप जीवन में कभी भी पराई स्त्री को स्पर्श नहीं करेँगे तो मैं आपके वाम अंग में आ सकती हूं यानी पत्नी बन सकती हूं।

शास्त्रों के अनुसार पत्नी का स्थान पति के वाम अंग की ओर यानी बाएं हाथ की ओर रहता है। विवाह से पूर्व कन्या को पति के सीधे हाथ यानी दाएं हाथ की ओर बिठाया जाता है और विवाह के बाद जब कन्या वर की पत्नी बन जाती है जब वह बाएं हाथ की ओर बिठाया जाता है।

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