गायत्री मन्त्र की सत्य चमत्कारी घटनाये – 31 (गायत्री की कृपा से प्रिंसिपल बना)

cropped-gayatribannerपं. लक्ष्मीनथा झा व्याकरण साहित्याचार्य, झॉंसी लिखते हैं कि यह सेवक मिथिल के चौमथ ग्राम वास्तव्य राज ज्योतिषी पंडित प्रकाण्ड श्रीयुक्त कृपालु झा का लक्ष्मीकान्त झा नामक पुत्र है। यह यज्ञोपवीत संस्कार के अनन्तर गृहोपदेश से ही कुछ गायत्री मंत्र जप किया करता था। किन्तु दैवयोग से भारताकाश में देदीप्यमान पंडित प्रवर स्वर्गीय दिवाकरदत्त चतुर्वेदी से शब्द शास्त्र पढऩे खगडिय़ा (मुंगर) गया। वहां श्यामा के प्रसादभूत श्यामादत्त जी का गायत्री मंत्र पर सुन्दर प्रवचन हुआ। उस प्रवचन का पूर्ण प्रभाव इस सेवक पर पड़ा। उसी दिन मैंने प्रतिज्ञा की कि आज से 1००० एक सहस्त्र गायत्री मंत्र दजप करके ही पठन-पाठन करूगा।

उस समय मैंने मध्यमा परीक्षा पास कर ली थी।  गायत्री माता की ऐसी कृपा हुई कि पढऩे में चित्त अधिक लगने लगा उसी वर्ष से आचार्य तक प्रथम श्रेणी  में ही नाम निकला तथा नाम निकलने के पूर्व ही 1938 ई. में श्रीरामचन्द्र सारस्वत संस्कृति पाठशाला पारेश्वर झॉंसी से प्रधानाध्यापक की स्वीकृत मिली। किन्तु यहां आकर गायत्री माता की सेवा में कुछ न्यूनता कर दी। परन्तु गायत्री माता का अनुराग इस पुत्र पर अधिक था। अत: एक मित्र मिल गये। मित्र ने कहा लश्कर में आपकी ओर के ओझा जी आये हैं। वे विपरीत प्रत्यंगिरा सिद्घ किये हुए थे।

एक सेठ का एकमात्र पुत्र रत्न 16 वर्ष का था। उसके भाई ने शत्रुता से ओझा जी से मिलकर उस बच्चे पर विपरीत प्रत्यंगिरा का प्रयोग करवाया। तीसरे दिन वह सेठ का बेटा जमीन पर बेहोश होकर गिर पड़ा। उस समय हाहाकार सुनकर एक ब्रहनिष्टï गायत्री जापी ब्राहण वहां आ पहुंचे। उन्होंने पूछा क्या बात है? सब समाचार ज्ञात होने पर ब्राहण ने गायत्री मंत्र से छींटा दिया। जल के पडऩे से वह बालक उठकर होश में आया। फिर ब्राहण के निकलने पर वही दशा हुई। उस प्रकार तीन बार होने पर सेठ ने ब्राहण के चरणों पर अपना सिर रख दिया।

ब्राहण ने कहा मैं जादू टोना नहीं जानता केवल नित्य गायत्री मंत्र 1००० एक सहस्त्र जप करता हूं। यदि मेरे रहने से तेरा बेटा बच जाय तो लो 9 दिन गायत्री मंत्र का अनुष्ठान करता हूं। फल यह हुआ कि छटे दिन भगवती ने प्रयोगकत्र्ता के सिर को ऐंठकर प्राण ले लिया। वह बालक बच गया। इस सच्ची घटना को सुनकर फिर भी मैंने अपने नियमानुसार जप आरम्भ किया। इसके प्रभाव से 1943 में प्रथम का परीक्षक 1944 से मध्यमा का परीक्षक हुआ।

1947 में साहित्यकार 1948 में हिन्दी साहित्यरत्न तथा वेद शास्त्री आदि किया इसके अलावा और भी अधिक घटना जिससे परिचय नहीं उससे परिचय होना उत्तम से उत्तम सम्मान्य महापुरुषों से आदर हुआ। इस वर्ष गायत्री माता की अपूर्व कृपा हुई कि यह तुच्छ सेवक दुर्लभ पद संस्कृत कॉलेज झॉंसी का प्रिंसिपल हो गया। गायत्री मंत्र के जापक इसका दुरुपयोग करें या सदुपयोग दोनों में इसका पूर्ण प्रभाव है किन्तु चिन्तामणि को पाकर भी जिसने दुरुपयोग चिन्ता में अपना अमूल्य रत्न खो दिया उसने सब कुछ खो दिया।

सौजन्य – शांतिकुंज गायत्री परिवार, हरिद्वार

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