गायत्री मन्त्र की सत्य चमत्कारी घटनाये – 30 (परीक्षा में उत्तीर्ण)

cropped-gayatribannerश्री बसन्त कुमार गौड़, देहरादून, लिखते हैं कि पिछले वर्ष मेरी अच्छी पढ़ाई नहीं हो पाई थी। तीन बार मास्टर बदले। हर एक ने अपने-अपने ढंग से पढ़ाया। मन भी अच्छी तरह न लगा। इसलिए पारसाल मैट्रिक में फेल हुआ। मैं अकेला ही क्यों, हमारे स्कूल में से 6० फीसदी लड़के फेल हुए। फेल होने का मुझे भी रंज था और घर वालों को भी। इस वर्ष फिर पढ़ाई शुरू हुई। परन्तु संयोगवश ऐसे कुयोग पड़ते गये कि इस वर्ष भी पढ़ाई नहीं के बराबर हो पाई। तीन महीने दस्त और ज्वर में पड़ा रहा। एक महीना बहिन की शादी में बरबाद हो गया।

साम्प्रदायिक दंगों के कारण एक महीना स्कूल की छुट्टी सी रही। हाजिरी भी इतनी कम थी कि मास्टर परीक्षा में शामिल नहीं होने दे रहे थे, बड़ी खुशामदों और सिफारिशों से फार्म भेजा गया।  परीक्षा का फार्म भर दिया गया और फीस भेज दी गई, पर यह सब भाग्य अजमाने के लिए ही किया गया। क्योंकि इस वर्ष तो पारसाल जितनी भी पढ़ाई न हुई थी। फिर बीमारी के कारण मेरा दिमाग साथ न देता था, थोड़ा  पढ़ते ही सर चक्कर खाने लगता और आंखों तले अंधेरा छा जाता, आंसू से आ जाते। स्मरण शक्ति बड़ी कमजोर हो गई थी याद की हुई बातें थोड़ी ही देर में भूल जातीं।

ऐसी दशा में पास होने की क्या आशा थी। दो वर्ष फेल होने की बदनामी, समय और धन का बरबाद जाना, साथियों से पीछे रहने की लज्जा, यह सब बातें मेरे मन में रह-रहकर निराशा और दु:ख उत्पन्न करती थीं। जैसे-जैसे परीक्षा के दिन निकट आते जाते थे, दिल घबराता था, परीक्षा की तारीख मौत की तारीख जैसी भयंकर दिखाई देती थी। ईश्वर से प्रार्थना करता था उन दिनों बीमार पड़ जाऊं तो कम से कम अपनी विवशता तो साबित कर सकूं। एक बार तो मन में ऐसा आया कि दस्त की दवा खा लूं जिससे परीक्षा में शामिल न हो सकूं और बदनामी से बच जाऊं।

इन संकल्प विकल्पों में डूबते उतराते हुए मैंने एक पत्र अखण्ड ज्योति कार्यालय को लिखा। छटे ही दिन आचार्य जी का उत्तर आ गया उसमें उन्होंने धैर्य बंधाया, प्रोत्साहन दिया और आशा दिलाई कि इस प्रकार डरने की कोई बात नहीं। हिम्मत और उत्साह के साथ परीक्षा दो, ईश्वर तुम्हारी सहायता करेगा। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि इन दिनों एक घन्टे प्रतिदिन गायत्री का जप किया करो। मुझे स्वभावत: अखंड ज्योति के प्रति बड़ी श्रद्घा है। आचार्य जी के आदेशानुसार मैंने हिम्मत बांधी, पढ़ी हुई किताबों को दुहराया और प्रात:काल एक घण्टे गायत्री का जप करना आरम्भ कर दिया। अब डर के स्थान पर एक उत्साह पैदा हो गया।

मुझे विश्वास हो चला कि कोई दैवी शक्ति मेरी सहायता करेगी। परीक्षा की तारीखें आईं। मैंने निर्भयतापूर्वक प्रश्नों को हल किया। सभी पर्चे अच्छे हुए और सैकंड डिवीजन पास हो गया। उस वर्ष अपेक्षाकृत अधिक कड़े पर्चे हुए थे, जिससे अनेकों परिश्रमी और जहीन लड़के फेल हो गये। पर मैं कितनी कठिनाइयों और कमजोरियों के होते हुए भी अच्छे नम्बरों से पास हो गया। इसमें ईश्वर की सद्बुद्घि प्रेरणा का गायत्री को ही कारण मानता हूं।

जब से गायत्री का जप मैंने आरम्भ किया है तब से शरीर में स्फूर्ति की और मन में आशा की तरंग उठती रहती हैं। मुझे कुछ ऐसी कुटेब थीं जिनको मैं लेख में नहीं लिखना चाहता उनकी ओर से मुझे स्वत: ही घृणा हो गई है और अच्छे विचार मेरे मन में भरे रहते हैं। विचारों के पवित्रता, उत्तम स्वास्थ्य, तीव्र बुद्घि तथा अच्छा स्वभाव यह सम्पदाएं माता ने मुझे दी हैं सम्भव है वे कुछ और भी दें।

सौजन्य – शांतिकुंज गायत्री परिवार, हरिद्वार

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