गायत्री मन्त्र की सत्य चमत्कारी घटनाये – 7 (डॉक्टरी बिलों से छुटकारा)

cropped-gayatribannerपं. राधेश्याम शर्मा पोस्ट मास्टर दीक्षितपुरा लिखते हैं कि जब से मैंने गायत्री माता की शरण ली, तब से मेरा जीवन उत्तरोत्तर उन्नतशील दृष्टिïगोचर होता है। पहले की अपेक्षा मुझे अपने स्वभाव में पर्याप्त परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। क्रोध व मिथ्या भाषण से घृणा हो गई है। मेरा स्वत: का मन बुरे विचारों की ओर तनिक नहीं जाता। आशाजनक परिवर्तन हो गया है। मेरा अटल विश्वास है कि वेदमाता की शरण लेने वाला दु:खी नहीं रहा सकता।

मन: शान्ति व ईश्वर प्राप्ति का सुगम मार्ग वेदमाता की शरण है जो वेदमाता का आसरा रखे उसको ईश्वर प्राप्ति होती है, यह निश्चित है। जीवन का महान उददेश्य ईश्वर-प्राप्ति माता की शरण से भली-भांति पूर्ण हो सकता है। प्रधान उददेश्य के अतिरिक्त अन्य संकट भी माता की कृपा से दूर होते हैं। मेरी अवस्था 27 वर्ष की है। इतनी छोटी अवस्था में इतना प्रत्यक्ष मेरा अनुभव है कि जब से मैंने गायत्री साधना की, लाभ के अतिरिक्त हानि नहीं हुयी है।

जब से मैंने गायत्री माता की शरण ली, तब से डाक्टर वैद्य के लिये मुझे एक पाई औषधोपचार के लिये नहीं खर्चना पड़ी। मामूली स्वास्थ्य जब बिगड़ा तो अपने आप ठीक हुआ। इसके पूर्व डॉक्टरों के बिल इतने देने पड़ते थे कि कभी तो वेतन का चतुर्थांश उनको अर्पण करना पड़ता था व कभी-कभी तो अद्र्घ वेतन तक की बाजी लग जाती थी। यही हाल मेरी पत्नी का था। एक अनुष्ठान सवा लक्ष का उन्होंने भी ज्योंही किया त्योंही आरम्भ करते ही बीमारियां रफू होने लगीं और अनुष्ठान पूर्ण होते सब रोगों से मुक्ति मिल गई और तब से वे भी पूर्ण रीति से आरोग्य हैं।

कभी-कभी अस्वस्थता हो भी तो अपने आप ठीक होती है। डॉक्टरों की आवश्यकता नहीं पड़ी। मेरा काल तक एक समय टी गया। मैं फाल्गुन शुक्ल पूर्णमा के रोज रात्रि को 2 बजे के करीब जब होलिका दहन हुआ तब अकेला नंगे पैर आ रहा था। उस समय मानसिक जप महामंत्र का कर रहा था। एक काला सर्प ढाई हाथ लम्बा मेरे दोनों पैरों के बीच से निकल गया। मैं खड़ा रहा व जप मानसिक चालू रखा व सर्प जब पूरा निकल गया, तब वहां से भगवती को प्रणाम करके आगे घर की ओर बढ़ा।

मुझे मृत्यु के मुख से भगवती ने बचाया। माता मेरी क्षण-क्षण में रक्षा करती हैं। उपर्युक्त उदाहरण तो उदाहरण मात्र है। कितनी बार सहायता मिली। इसका वर्णन करने में असमर्थ हूं। अनेको कठिनाइयों के समय दयामयी माता ने मेरी सहायता की है। कई महात्मा गायत्री का जप करके परम सिद्घ हुये हैं। परमात्मा की शक्ति ही गायत्री है। जो गायत्री के निकट जाता है। वह शुद्घ होकर रहता है। आत्मकल्याण के लिये मन की शुद्घि आवश्यक है। मन की शुद्घि के लिये गायत्री मंत्र अदभुत है। ईश्वर प्राप्ति के लिये गायत्री जप को प्रथम सीढ़ी समझना चाहिए।

सौजन्य – शांतिकुंज गायत्री परिवार हरिद्वार

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