गायत्री मन्त्र की सत्य चमत्कारी घटनाये – 22 (भयंकर मुकदमे से मुक्ति )

· April 16, 2015

cropped-gayatribannerठा. जंगजीतसिंह राठोर, रानीपुरा, लिखते हैं कि हमारे ताऊजी एक अजनबी आदमी से कुछ जेवर सस्तेपन के लोभ में आकर खरीद लिया था। यह षडय़ंत्र हमारे एक शत्रु का था वह बड़ा बदमाश, डाकुओं का पक्का ऐजेन्ट और पुलिस का दलाल था। वह धनवान ही इन तरीकों से हुआ था।


Complete cure of deadly disease like HIV/AIDS by Yoga, Asana, Pranayama and Ayurveda.

एच.आई.वी/एड्स जैसी घातक बीमारियों का सम्पूर्ण इलाज योग, आसन, प्राणायाम व आयुर्वेद से

दो वर्ष से हम लोगों के साथ उसकी रंजिश हजो गई थी। इतनी हिम्मत तो उसकी थी नहीं कि सामने आकर अपना जोर अजमाता इसलिए उसने अपनी कूटनीति द्वारा रंजिश का बदला लेने का निश्चय किया। एक डकैती में गये जेवर अपने परिचित डाकू से उसने मँगवाये और एक अजनबी आदमी के हाथों हमारे ताऊ को सस्ते दाम पर बिकवा दिये।

दूसरी ओर  पुलिस को खबर देकर तलाशी ले आया। तीसरी और एक डकैती के मुखबिर से मिलकर मेरा और मुझसे छोटे भाई का नाम डाकुओं में लिखवा दिया। पुलिस आई तलाशी में जेवर बरामद हुए और हम दोनों भाई गिरफ्तार करके जेल पहुँचा दिये गये। इस प्रकार की आपत्ति हमारे परिवार के लिए अनौखी थी।

जहाँ तक हमारे वंश का पुराना इतिहास ज्ञात है वहाँ तक इस कुल का कोई आदमी कभी किसी मामले में जेल न गया था। यह घटना सन 1936 की है उस जमाने में जेल और पुलिसए का भारी आतंक था।

इस संकट से सब लोगों के होश उड़ गये। घर भर में कुहराम मच गया। तीन-तीन दिन तक चूल्हा नहीं जला। जेल में घुसने तक हम दोनों भाईयों को भी ऐसा लगता रहा मानों मृत्यु के मुख में जाने के लिए घसिटते हुए जा रहे हैं। जेल में बन्द हो गये। रात भर नींद न आई। भय से हृदय धड़क रहा था। डकैती साबित हो गई तो फाँसी, काला पानी या जन्मकैद तक हो सकती है। इस कल्पना मात्र से चित्त बेचैन हो जाता था।

एक दो दिन इस प्रकार विताने के बाद चिन्ता भय, व्याकुलता और घबराहट कम हुई और यह सोचने लगे कि क्या किया जाना चाहिए। घर वाले तो यथा शक्ति यथामति दौड़ धूप कर सकते थे, पर हमारे लिए उस पिंजड़े में बन्द रहते हुए कुछ कर सकना कठिन था। सोचते-सोचते एक विचार आया कि जब मेरा  जनेऊ हुआ था। तब गुरुजी ने दीक्षा देते हुए गायत्री मंत्र बताया था और अनेक बातें बताते हुए यह भी कहा था कि अगर कभी कोई आपत्ति आये तो इस मंत्र को जपना, विपत्ति दूर हो जायेगी।

उस बात की अजमाइश करने का इससे अच्छा अवसर और क्या हो सकता था। मैंने उसी दिन से जप आरम्भ कर दिया। विधि विधान तो कुछ मालूम न था। आसन माला आदि कोई साधन भी न था। स्थान करके शान्त चित्त होकर बैठ जाता उँगलियो पर गणना करके दो हजार मंत्र नित्य जप लेता। यह क्रम बराबर नित्य नियमित रुप से चलने लगा। दस दिन बीते होंगे कि मुझे स्वप्न में एक वृद्घ स्त्री के दर्शन हुए। उसके बाल सफेद हो रहे थे, सफेद वस्त्र पहने थी। वर्ण गौर औरचेहरा तेजवान था।

उस वृद्घा ने कहा, ‘मैं तुम्हें सान्त्वना देने आई हूँ, चिन्ता न करो तुम दोनों आज से एक मास बाद छूट जाओंगे।’ यह कह कर वह वृद्घा चली गई। सबेरे उठने पर भाई से मैंने स्वप्न का हाल कहा। उसने निराशा के साथ सिर हिलाते हुए कहा- ‘डकैती के मुकदमे में दो वर्ष मे फैसला होते हैं, जमानत इसमें होती नहीं माल बरामद हुआ है फिर इतनी जल्दी छूट जाने की आशा किस प्रकार की जा सकती है?’ बात उसकी ठीक थी। मैं भी चुप हो गया। वुद्घि कहती थी कि छूटना कठिन है।

अन्तरात्मा कहती थी कि स्वप्न वाली वृद्घा को ईश्वरीय शक्ति थी, उसका कथन असत्य नहीं हो सकता। आशा-निराशा के झूले में झूलते हुए गायत्री का जप और भी उत्साह से होने लगा। भाई ने भी मेरा अनुकरण किया। वह भी नित्य एक हजार मन्त्र जपने लगा। ग्राह के मुख में से गज को छुटा देने वालें के लिए कोई बात कठिन नहीं है। स्वपन से ठीक तीसवें दिन जेल के बार्डर ने हमें रिहाई का संदेश सुनाया।

उसी दिन जेल से मुक्त कर दिया गया। बाहर आने पर मालूम हुआ कि किन्हीं कारणों से पुलिस ने हमारे ऊपर से मुकदमा उठा लिया है।  उस घटना को 15 वर्ष बीत गये, हम दोनों भाई नित्य नियमित रूप से गायत्री का जप करते हैं और प्रति वर्ष एक बार गायत्री यज्ञ तथा ब्रह्मïभोज कराते हैं। हमारे घर की सुख सम्पदा तब से अब तक बराबर बढ़ती आई है।

सौजन्य – शांतिकुंज गायत्री परिवार, हरिद्वार

facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedinmail


ये भी पढ़ें :-