गायत्री मन्त्र की सत्य चमत्कारी घटनाये – 24 (गायत्री पर अटूट विश्वास)

cropped-gayatribannerश्री मेघायती जी नगीना अपनी अनुभूति प्रकट करती हुई लिखती हैं कि गायत्री मन्त्र ईश्वर की उपासना के लिये मुख्य मन्त्र है। मेरा तो इस पर अति अटूट विश्वास और श्रद्घा रही है। मुझे बचपन से इस मन्त्र से अति प्रेम है मुझे बचपन की अपनी एक बात का स्मरण है। अपने पास माला न होने के कारण मोटे से डोरे में सौ गाँठें लगाकर मैं उससे गायत्री का जप करती थी। एक दिन मेरे पिताजी ने मेरी माला देखली और गायत्री में मेरा प्रेम समझ कर मुझे सच्चे मूँगों की माला दी थी।

गायत्री जप से मुझे ऐसा भासने लगता है मानों मैं अपने प्यारे पिता से बातें कर रहीं हूँ अथवा अपना कण्ठस्थ पाठ सुना रही हूँ। जब-जब मुझे आपत्तियों का सामना करना पड़ा तब-तब मैं गायत्री मन्त्र द्वारा अपने प्रभु के समीप चली जाती हूँ और मुझे विश्वास होने लगता है कि अवश्य पिता मेरे दु:ख सुन रहे हैं और अवश्य निवारण करेंगे। एक बार नहीं अनेक बार मैं अपने पुत्र के इधर-उधर फिरने और कुछ कार्य न करने से अति दुखित थी तब कभी मैंने प्यारे पिता को स्मरण करके गायत्री माता की शरण ली और विधि पूर्वक उनका अनुष्ठान किया।

(जिसकी विधि अखण्ड ज्योति में लिखी है) उसका चम्त्कार आश्चर्यजनक हुआ। जिस दिन प्रात:काल मैं यज्ञ करने वाली थी रात्रि भर यही विचार रहा कि यज्ञ में सम्मिलित होना उसका अति आवश्यक था और आत्मा से आवाज आ रही थी कि प्रात: वह कहीं से आ जावेगा। प्रात: यज्ञ की तैयारी मे लग रही थी और उसके आने की ऐसी प्रतीक्षा लग रही थी जैसे सूचना आने पर लगी रहती थी यज्ञ आरम्भ होने वाला था क्या देखती हूँ कि मेरा पुत्र शतीशचन्द्र आंगन में मेरे सन्मुख खड़ा है। इस प्रकार के चमत्कारिक अनुभव मुझे अनेकों बार हुए हैं।

प्राचीनकाल में सन्तान न होने पर पुत्रेष्टि यज्ञ किया करते थे। महाराज अश्वपति ने सन्तानोत्पति के लिये गायत्री मन्त्रों से यज्ञ किया था, जिसकें फल से एक कन्या उत्पन्न हुई। जिसका नाम भी गायत्री के सदृश्य सावित्री रखा था। राजा जनक के जमाने में जब जनकपुरी में अकाल पड़ा और प्रजा भूखी मरने लगी तब जनकजी ने वर्षा होने के लिये गायत्री यज्ञ किया जिसके फलस्वरूप वर्षा भी हुई और सीता जी की उत्पत्ति भी हुई।

ऐसे अनेक उदाहरण हैं। गायत्री मन्त्र का यज्ञ करने से सांसारिक सफलता के साथ-साथ हमारा ईश्वर भक्ति में भी प्रेम बढ़ता है मन के एकत्रित होने में अति सहायता मिलती है और आत्मा को एक विशेष प्रकार की शान्ति प्राप्त होती है यह आत्म शान्ति ही मनुष्य जीवन की सच्ची सफलता है।

सौजन्य – शांतिकुंज गायत्री परिवार, हरिद्वार

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