गलत कमाई रखे या दान करें नरक तो जाना ही पड़ेगा

janakशिवपुराण में यह वर्णन पाया जाता है कि महाराज शतानीक को दानी होने पर भी नरक-यातना भोगनी पड़ी थी।

इसमें सन्देह नहीं कि महाराज शतानीक महादानी थे, किन्तु उनके बाद जब उनका पुत्र सिंहासन पर बैठा तो उसने अपने पिता की परिपाटी के अनुसार उनकी दान-प्रथा को प्रचलित नहीं रखा।

उसकी कृपणता की राज्य-भर में आलोचना होने लगी। उसके कुलगुरु तथा दूसरे पण्डित-पुरोहितों ने जब उसका ध्यान इस ओर खींचा तो उसने जो उत्तर दिया वह बड़ा ही मार्मिक था। उसने कहा, ”मेरे पिता, जो इतने पुण्यात्मा और दानशील थे, मरणोपरान्त उनकी क्या दशा हुई ? यदि इस विषय में आप लोग कुछ जानते हों और मुझे बता सकते हों तो मैं उस परिपाटी के प्रचलन पर विचार कर सकता हूँ।”

विद्वत्समाज की गोष्ठियाँ आयोजित की गयीं। शतानीक की मरणोपरान्त गति के विषय में विचार-विमर्श हुआ। सबका यही विचार था कि निश्चय ही उन्हें स्वर्गलोग की प्राप्ति हुई होगी। तदपि, निश्चयपूर्वक कुछ कहा नहीं जा सकता था। अतः निर्णय किया गया कि दिवंगत महाराज शतानीक की मरणोपरान्त स्थिति का ज्ञान प्राप्त किया जाए।

इस कार्य के लिए एक वृद्ध और बुद्धिमान ब्राह्मण की नियुक्ति की गयी। ब्राह्मण देवता अपनी तपस्या की दिव्य शक्तियों से सीधे स्वर्गलोक में पहुँचे और वहाँ जाकर महाराज शतानीक के विषय में जानना चाहा। यह सुनकर उनको बड़ा विस्मय हुआ कि महाराज शतानीक तो इस समय नरक में वास कर रहे हैं।

ब्राह्मण देवता इसका कारण जानने के लिए महाराज शतानीक के पास नरक में गये और उनसे नरकवास का कारण पूछा, ”महाराज! आप तो बड़े दानी और धर्मात्मा थे, फिर आपको यह नरकवास क्यों भोगना पड़ रहा है?”

दुःख एवं विषादभरे स्वर में राजा ने कहा, ”पण्डितप्रवर! अपनी प्रजा की कठिन परिश्रम से अर्जित की गयी पूँजी को राजदण्ड के रूप में प्राप्त करके मैं उसे दान रूप में दिया करता था। वही दान आज मेरी इस नरक-यातना का कारण बना हुआ है। प्रजा के साथ अन्याय करने के बाद मेरी जो दशा हुई है, उसे तो आप देख ही रहे हैं। वापस जाकर मेरे पुत्र सहस्रानीक को समझाइए कि प्रजा-पीड़क राजा चाहे कितना ही दानी, धर्मात्मा और पुण्यात्मा हो, मरणोपरान्त तो उसको नरक-यातना ही भोगनी पड़ेगी। उसे स्वर्ग की आशा कभी करनी ही नहीं चाहिए।”

ब्राह्मण देवता स्वर्ग और नरक लोक की यात्रा के उपरान्त अपनी धरती और अपने नगर में पधारे। उनके आने की सूचना पाकर पुनः विद्वत्सभा का आयोजन किया गया। स्वर्गीय महाराज शतानीक की नरक यातना पर सभा में विचार-विमर्श होने के उपरान्त, एक शिष्टमण्डल कुलगुरु के नेतृत्व में सहस्रानीक के पास गया। उसको बताया गया कि उसके पिता इस समय नरक में वास कर रहे हैं।

उनकी बात सुनकर सहस्रानीक ने पूछा, ”अब आप लोग मुझे क्या आज्ञा देते हैं?”

कुलगुरु ने कहा, ”महाराज! आप जिस प्रकार से वर्तमान में प्रजा का पालन कर रहे हैं, वह सराहनीय है। आप प्रजा से उतना ही कर ग्रहण करते हैं, जितना कि आवश्यक है। उससे प्राप्त कोष से आप राज्य-संचालन तो करते रहिए। किन्तु उसका कुछ अंश योग्य एवं अधिकारी व्यक्तियों को दान आदि में देकर उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति भी करते रहिए। इससे आपके इहलोक और परलोक दोनों सुधरेंगे। प्रजा का भली प्रकार पालन होगा। इतना ही नहीं, इसी से आपके पिता का भी नरक से उद्धार हो जाएगा।”

”वह कैसे?”

”पुत्र के पुण्य-कर्मों का उसके पूर्वजों को फल प्राप्त होता है। उसके प्रशंसनीय कार्यों से उसके पूर्वजों की भी प्रशंसा होती है।”

पण्डितों ने वहाँ से प्रस्थान करने से पूर्व फिर कहा, ”महाराज! राजा के लिए प्रजा अपनी सन्तान के समान होती है। प्रजापीड़क राजा नरक-भोगी होता है और प्रजा-पालक राजा अपने पितरों की भी नरकलोक से मुक्ति में सहायक होता है।”

प्रजावत्सल राजा का सर्वत्र मान होता है।

 

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