क्यों अपना ही खून पीती हैं छिन्नमस्ता देवी

p6आपने छिन्नमस्ता देवी (chinnamasta devi) का चित्र देखा होगा जिसमे उनके गर्दन पर सिर की बजाय खून की धार फूटती है और यही खून उनके ही हाथ में रखा हुआ उनका सिर पीता है ! मूर्ख टाइप लोगों के इस तरह के देवी देवताओं का अस्तित्व केवल मनगढ़न्त कल्पना मात्र लगता है और इसी सोच में ही उनकी पूरी जिंदगी पार हो जाती है और वो सच्चाई कभी जान ही नहीं पाते !

वास्तव में देवी छिन्न मस्ता के गूढ़ रहस्य को जानने के लिए जब हम दुर्लभ हिन्दू धर्म के थोड़े बहुत बचे ग्रंथों को खंगालते हैं तब हम देवी की अथाह शक्ति की थोड़ी सी जानकारी मिलती है की देवी छिन्न मस्ता ही हर जीव के मूलाधार चक्र में विराजमान कुण्डलिनी शक्ति की मूर्त रूप हैं !

कुण्डलिनी महा शक्ति को जागृत करने के कई तरीकों में से एक है देवी छिन्न मस्ता को प्रसन्न करना !

और जैसे माँ छिन्न मस्ता अपने ही शरीर का खून पी कर सबल रहती हैं उसी तरह कुण्डलिनी महा शक्ति जिस जीव के अन्दर रहती हैं उसी जीव के रक्त से ही पोषित होती हैं !

देवी छिन्न मस्ता निर्वस्त्र रहतीं है जो इस बात का पर्याय है की कुण्डलिनी महा शक्ति पर किसी भी माया का पर्दा नहीं हो सकता है ! इसी माया का पर्दा उठाने के लिए ही तो दुनिया के सारे भक्त, तपस्वी, योगी दिन रात तपस्या रत रहते हैं !

कुण्डलिनी जागरण कईं जन्मो की साधना से सिद्ध होने वाली साधना है और जीव एक योनि से मरकर दूसरे योनि में जन्म लेता है तब भी कुण्डलिनी शक्ति हमेशा उसके साथ बनी रहती है !

कुण्डलिनी जागरण का प्रयास करने वाला साधक यदि जानबूझकर आनन्द के लिए मांस मछली अंडा खा ले तो कुण्डलिनी महा शक्ति की दिशा ऊपर उठने के बजाय निम्न हो जाती है और वो साधक का ही नाश कर देती है !

कुण्डलिनी जागरण के बाद शुरू होता है असली दुनिया को जानना क्योंकि तब साधक अपने सूक्ष्म शरीर से पहुच जाता है (kundalini shakti awakening symptoms) महा स्थान में (कुछ ग्रंथों में महा स्थान को कृष्ण का शरीर कहा जाता है) और इस महा स्थान में समय का कोई अस्तित्व नहीं है तथा ये महा स्थान एक ऐसा गेट वे (रास्ता) है जिससे श्री कृष्ण के बनाये अनन्त ब्रह्मांडो में जाया जा सकता है !

यहाँ पहुँच कर सभी साधकों की बुद्धि हैरान हो जाती है क्योंकि तब उनको समझ में आता है की भगवान कौन सी चीज है और उनकी ताकत कितनी अनन्त है ! इसी महा स्थान में सारे महर्षियों से मुलाकात होती है जो अमर है जैसे वशिष्ठ, विश्वामित्र, भृगु, लोमष ऋषि आदि ! ये सभी ऋषि एक ब्रह्माण्ड से निकल कर परोपकार करने के लिए दूसरे ब्रह्माण्ड में जाते हुए दिखाई देते है ! एक तरह से कहा जाय ये ऋषि भी पिछले कितने करोड़ साल से ईश्वर के पूरे रहस्य को देखना समझना चाहते हैं पर उनकी यात्रा अब भी अन्त हीन है क्योंकि ईश्वर आदि और अन्त रहित हैं !

इसलिए आपने सुना होगा की ऋषि महर्षि हजारों साल से तपस्या में लीन रहते हैं इसका मतलब ये होता है की ये ऋषि अपनी चमड़े की आँखों को बंद कर, सूक्ष्म शरीर की सूक्ष्म आँखों से ईश्वर के अति सुखद साम्राज्य को पूरी तरह से देखने की कोशिश कर रहे है पर अभी तक उन्हें अपनी यात्रा का अन्त दिखा ही नहीं !

इसी को कहते हैं आनन्द से सच्चिदानन्द की खोज करना !

आनन्द मिलता है ईश्वर दर्शन प्राप्त साधक को, पर सत्य, चित्त, आनन्द मिलता है जब साधक अपना अस्तित्व खोकर ईश्वरमय हो जाता है तब उस स्थिति में जीव खुद अपनी बनायीं हुई सारी सृष्टि को ईश्वर की तरह देखता, पालन और नाश करता है (kundalini shakti awakening benefits) !

इसलिए मानव शरीर मिलने पर कुण्डलिनी जागरण का प्रयास जरूर करना चाहिए ! और कुण्डलिनी जागरण के लिए सबसे आसान तरीकों में से है नियम से रोज कम से कम आधा घंटा कपाल भांति प्राणायाम (Kapabhaiti Pranayama) करना ! शुरुवाती भूमिका प्राणायाम (Pranayam) से बनती है और सही समय आने पर ईश्वर ऐसे अनुभवी गुरु से मुलाकात जरूर करवा देते है जिससे आगे की प्रक्रिया सफलता पूर्वक पूर्ण होती है !

धन्य है माँ से भी बढ़कर ममता वाले, पिता से भी बढ़कर जिम्मेदार, ईश्वर की जय हो !

facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedinmail


ये भी पढ़ें :-