कहानी – वियोग पक्ष – (लेखक – रामचंद्र शुक्ल )

· June 16, 2014

RamChandraShukla_243172जायसी का विरहवर्णन कहीं-कहीं अत्यंत अत्युक्तिपूर्ण होने पर भी मजाक की हद तक नहीं पहुँचने पाया है, उसमें गांभीर्य बना हुआ है। इनकी अत्युक्तियाँ बात की करामात नहीं जान पड़तीं, हृदय की अत्यंत तीव्र वेदना के शब्दसंकेत प्रतीत होती हैं। उनके अंतर्गत जिन पदार्थों का उल्लेख होता है वे हृदयस्थ ताप की अनुभूति का आभास देने वाले होते हैं; बाहर-बाहर से ताप की मात्रा नापने वाले मानदंड मात्र नहीं। जाड़े के दिनों में भी पड़ोसियों तक पहुँच उन्हें बेचैन करने वाले, शरीर पर रखे हुए कमल के पत्तों को भून कर पापड़ बना डालने वाले, बोतल का गुलाब जल सुखा डालने वाले ताप से कम ताप जायसी का नहीं है पर उन्होंने उसके वेदनात्मक और दृश्य अंश पर जितनी दृष्टि रखी है उतनी उसकी बाहरी नापजोख पर नहीं जो प्राय: ऊहात्मक हुआ करती है। नाप जोखवाली ऊहात्मक पद्धति का जायसी ने कुछ ही स्थानों पर वियोग किया है। जैसे, राजा की प्रेमपत्रिका के इस वर्णन में –

आखर जरहिं, न काहू छूआ। तब दुख देखि चला लेइ सूआ॥

 

अथवा नागमती के विरहताप की इस व्यंजना में –

 

जेहि पंखी के नियर होइ, कहै विरह कै बात।

 

सोई पंखी जाइ जरि, तरिवर होहि निपात॥

 

इस ऊहात्मक पद्धति का दो चार जगह व्यवहार चाहे जायसी ने किया हो पर अधिकतर विरहताप के वेदनात्मक स्वरूप की अत्यंत विशद व्यंजना ही जायसी की विशेषता है। इन्होंने अत्युक्ति की है और खूब की है पर वह अधिकांश संवेदना के स्वरूप में है, परिमाणनिर्देश के रूप में नहीं है। संवेदना का यह स्वरूप उत्प्रेक्षा अलंकार द्वारा व्यक्त किया गया है। अत्युक्ति या अतिशयोक्ति और उत्प्रेक्षा में सिद्ध और साध्‍य का भेद होता है। उत्प्रेक्षा में अध्‍यवसाय साध्‍य (संभावना या संवेदना के रूप में) होता है और अत्युक्ति या अतिशयोक्ति में सिद्ध ‘धूप ऐसी है कि रखते-रखते पानी खौल जाता है’ यह वाक्य मात्रा का आधिक्य मात्र सूचित करता है। मात्र के आधिक्य का निरूपण ऊहा द्वारा कुछ चक्कर के साथ भी हो सकता है, जैसा कि बिहारी ने प्राय: किया है। पर यह पद्धति काव्य के लिए सर्वत्र उपयुक्त नहीं। लाक्षणिक प्रयोगों को ले कर कुछ कवियों ने ऊहा का जो विस्तार किया है वह अस्वाभाविक, नीरस और भद्दा हो गया है। वह ‘कुल का दीपक है’ इस बात को ले कर कोई कहे कि ‘उसके घर तेल के खर्च की बिलकुल बचत होती है’ तो इस उक्ति में कवित्व की कुछ भी सरसता न पाई जायगी। बिहारी का ‘पत्र ही तिथि पाइए’ वाला दोहा इसी प्रकार का है। अस्तु, ‘धूप ऐसी है कि रखते-रखते पानी खौल जाता है’ यह कथन ऊहा द्वारा मात्र निरूपण के रूप में हुआ। यही बात यदि इस प्रकार कही जाय कि ‘धूप क्या है, मानो चारों ओर आग बरस रही है’ तो यह संवेदना के रूप में कहा जाना होगा। पहले कथन में ताप की मात्रा का आधिक्य व्यंग्य है, दूसरे में उस ताप से उत्पन्न हृदय की वेदना। एक में वस्तु व्यंग्य है, दूसरे में संवेदना। पहला वाक्य बाह्य वृत्तांत का व्यंजक है और दूसरा आभ्यंतर अनुभूति का। मतलब यह कि जायसी ने यह कम कहा है कि विरहताप इतनी मात्रा का है, यह अधिक कहा है कि ताप हृदय में ऐसा जान पड़ता है; जैसे –

 

(क) जानहुँ अगिनि के उठहिं पहारा । औ सब लागहि अंग ऍंगारा॥

 

(ख) जरत बजागिनी करु, पिउ छाहाँ । आइ बुझाउ ऍंगारंह माँहा॥

 

लागिउँ जरै, जरै जस भारू । फिरि फिरि भूँजेसि तजिउँ न बारू॥

 

‘फिर फिरि भूँजेसि तजिउँ न बारू।’ भाड़ की तपती बालू के बीच पड़ा हुआ अनाज का दाना जैसे बार बार भूने जाने पर उछल-उछल पड़ता है पर उस बालू से बाहर नहीं जाता उसी प्रकार इस प्रेमजन्य संताप के अतिरेक से मेरा जी हट हट कर भी उस संताप के सहने की बुरी लत के कारण उसी की ओर प्रवृत्त रहता है। मतलब यह कि वियुक्त प्रिय का ध्यान आते ही चित्त ताप से विह्वल हो जाता है फिर भी वह बार – बार उसी का ध्यान करता रहता है। प्रेमदशा चाहे घोर यंत्रणामय हो जाय पर हृदय उस दशा से अलग होना नहीं चाहता। यहाँ इसी विलक्षण स्थिति का चित्रण है। यहाँ हम कवि को वेदना के स्वरूप विश्लेषण में प्रवृत्त पाते हैं, ताप की मात्रा नापने में नहीं। मात्रा की नाप तो बाहर – बाहर से भी हो सकती है, पर प्रेमवेदना के आभ्यंतर स्वरूप की पहचान प्रेमवेदनापूर्ण हृदय में ही हो सकती है। जायसी का ऐसा ही हृदय था। विरहताप का वर्णन कवि ने अधिकतर सादृश्य संबंध- मूलक गौणी लक्षणा द्वारा किया है।

 

आधिक्य या न्यूनता सूचित करने के लिए ऊहात्मक या वस्तुव्यंजनात्मक शैली का विधान कवियों में तीन प्रकार का देखा जाता है –

 

(1) ऊहा की आधारभूत वस्तु असत्य अर्थात् कवि – प्रौढ़ोक्ति – सिद्ध है।

 

(2) ऊहा की आधारभूत वस्तु का स्वरूप तो सत्य या स्वत:सम्भवी है और किसी प्रकार की कल्पना नहीं की गई है।

 

(3) ऊहा की आधारभूत वस्तु का स्वरूप तो सत्य है पर उसके हेतु की कल्पना की गई है।

 

इनमें से प्रथम प्रकार के उदाहरण वे हैं जिन्हें बिहारी ने विरहताप के वर्णन में दिए हैं – जैसे पड़ोसियों को जाड़े की रात में भी बेचैन करने वाला, या बोतल में भरे गुलाबजल को सुखा डालनेवाला ताप। दूसरे प्रकार का उदाहरण एक स्थल पर जायसी ने बहुत अच्छा दिया है, पर वह विरहताप के वर्णन में नहीं है, काल की दीर्घता के वर्णन में है। आठ वर्ष तक अलाउद्दीन चित्तौरगढ़ घेरे रहा। इस बात को एक बार तो कवि ने साधारण इतिवृत्त के रूप में कहा, पर उससे वह गोचर प्रत्यक्षीकरण न हो सका जिसका प्रयत्न काव्य करता है। आठ वर्ष की दीर्घता के अनुमान के लिए फिर उसने यह दृश्य आधार सामने रखा –

 

आइ साह अमराव जो लाए । फरे, झरे पर गढ़ नहीं पाए ॥

 

सच पूछिए तो वस्तु व्यंजनात्मक या ऊहात्मक पद्धति का इसी रूप में अवलंबन सबसे अधिक उपयुक्त जान पड़ता है। इसमें अनुमान का आधार सत्य या स्वत: संभवी है। जायसी अनुमान या ऊहा के आधार के लिए ऐसी वस्तु सामने लाए हैं जिसका स्वरूप प्राकृतिक है और जिससे सामान्यत: सब लोग परिचित होते हैं। इसी प्रकार एक गीत में एक वियोगिन नायिका कहती है कि ‘मेरा प्रिय दरवाजे पर जो नीम का पेड़ लगा गया था वह बढ़ कर अब फूल रहा है, पर प्रिय न लौटा।’ आधार के सत्य और प्राकृतिक स्वरूप के कारण इस उक्ति से कितना भोलापन बरस रहा है।

 

विरहताप की मात्रा का आधिक्य सूचित करने के लिए जहाँ कहीं जायसी ने ऊहात्मक या वस्तुव्यंजनात्मक शैली का अवलंबन किया है वहाँ अधिकतर तीसरे प्रकार का विधान ही देखने में आता है जिसमें ऊहा की आधारभूत वस्तु का स्वरूप तो सत्य और स्वत:संभवी होता है पर उसके हेतु की कुछ और ही कल्पना की जाती है। इस प्रकार का विधान भी प्रथम प्रकार के विधान से अधिक उपयुक्त होता है। इसमें हेतूत्प्रेक्षा का सहारा लिया जाता है जिसमें ‘अप्रस्तुत’ वस्तुओं का गृहीत दृश्य वास्तविक होता है, केवल उसका हेतु कल्पित होता है। हेतु परोक्ष हुआ करता है इससे उसकी अतथ्यता सामने आ कर प्रतीति में बाधा डालती नहीं जान पड़ती। इस युक्ति के कवि विरहताप के प्रभाव की व्यापकता को बढ़ाता – बढ़ाता सृष्टि भर में दिखा देता है। एक उदाहरण काफी होगा –

 

अस परजरा विरह कर गठा। मेघ साम भए धूम जो उठा॥

 

दाढ़ा राहु केतु गा दाधा। सुरुज जरा, चाँद जरि आधा॥

 

औ सब नखत तराईं जरहीं। टूटहिं लूक, धारति महँ परहीं॥

 

जरै सो धारती ठावहिं ठाऊँ। दहकि पलास जरै तेहि दाऊँ॥

 

इन चौपाइयों में मेघों का श्याम होना, राहु, केतु का काला (झुलसा-सा) होना, सूर्य का तपना, चंद्रमा की कला का खंडित होना, पलाश के फूलों का लाल (दहकते अंगारे-सा) होना आदि सत्य हैं। वे विरहताप के कारण ऐसे हैं, केवल यह बात कल्पित है।

 

ताप के अतिरिक्त विरह के और और अंगों का भी विन्यास जायसी ने इसी हृदयहारिणी और व्यापकत्वविधायिनी पद्धति पर बाह्य प्रकृति को मूल आभ्यंतर जगत का प्रतिबिंब-सा दिखाते हुए किया है। काम हेतूत्प्रेक्षा से लिया गया है। प्रेमयोगी रत्नसेन के विरहव्यथित हृदय का भाव हम सूर्य, चंद्र, वन के पेड़, पक्षी, पत्थर, चट्टान सबमें देखते चलते है। –

 

रोवँ रोवँ वै बान जो फूटे। सूतहि सूत रुहिर मुख छूटे॥

 

नैनहिं चली रकत कैधा। कंथा भीजि भएउ रतनारा॥

 

सूरूज बूड़ि उठा होइ ताता। औ मजीठ टेसू बन राता॥

 

भा बसंत , रातीं बनसपती। औ राते सब जोगी जती॥

 

भूमि जो भीजि भएउ सब गेरू। औ राते तहँ पंखि पखेरू॥

 

राती सती, अगिनि सब काया। गगन मेघ राते तेहि छाया॥

 

ईंगुर भा पहार जौ भीजा। पै तुम्हार नहिं रोवँ पसीजा॥

 

इस प्रकार नागमती के ऑंसुओं से सारी सृष्टि भीगी हुई जान पड़ती है –

 

कुहुकि कुहुकि जस कोइल रोई। रकत ऑंसु घुँघची बन बोई॥

 

जहँ जहँ ठाढ़ि होइ बनवासी। तहँ तहँ होइ घुँघची कै रासी॥

 

बूँद बूँद महँ जानहुँ जीऊ। गूँजा गुंजि करै, ‘पिउ पीऊ’॥

 

तेहि दुख भए परास निपाते। लोहू बूड़ि उठे होइ राते॥

 

राते बिंब भीजि तेहि लोहू। परवर पाक, फाट हिय गोहूँ॥

 

विरहवर्णन में भक्तवर सूरदास जी ने भी गोपियों के हृदय के रंग में बाह्य प्रकृति को रँगा है। एक स्थान पर तो गोपियों ने उन उन पदार्थों को कोसा है जो उस रंग से कोरे दिखाई पड़े हैं –

 

मधुबन ! तुम कत रहत हरे?

 

विरह वियोग स्यामसुंदर के, ठाढ़े क्यों न जरे।

 

कौन काज ठाढ़े रहे बन में, काहे न उकठि परे।

 

नागमती का विरहवर्णन हिंदी साहित्य में एक अद्वितीय वस्तु है। नागमती उपवनों के पेड़ों के नीचे रात भर रोती फिरती है। इस दशा में पशु, पक्षी, पेड़, पल्लव जो कुछ सामने आता है उसे वह अपना दुखड़ा सुनाती है। वह पुण्यदशा धन्य है जिसमें ये सब अपने सगे लगते हैं और यह जान पड़ने लगता है कि इन्हें दु:ख सुनाने से भी जी हल्का होगा। सब जीवों का शिरोमणि मनुष्य और मनुष्यों का अधीश्वर राजा! उसकी पटरानी, जो कभी बड़े-बड़े राजाओं और सरदारों की बातों की ओर भी ध्यान न देती थी, वह पक्षियों से अपने हृदय की वेदना कह रही है, उनके सामने अपना हृदय खोल रही है। हृदय की इस उदार और व्यापक दशा का कवियों ने केवल प्रेमदशा के भीतर ही वर्णन किया है, यह बात ध्यान देने योग्य है। मारने के लिए शत्रु का पीछा करता हुआ क्रोधातुर मनुष्य पेड़ों और पक्षियों से यह पूछता हुआ कहीं नहीं कहा गया है कि ‘भाई! किधर गया?’ वाल्मीकि, कालिदास आदि से ले कर जायसी, सूर, तुलसी आदि भाषाकवियों तक सबने इस दशा का सन्निवेश विप्रलंभ (या कहीं-कहीं करुण) में ही किया है। वाल्मीकि के राम सीताहरण होने पर वन-वन पूछते फिरते हैं –

 

‘हे कदंब! तुम्हारे फूलों से अधिक प्रीति रखने वाली मेरी प्रिया को यदि जानते हो तो बताओ। हे बिल्ववृक्ष! यदि तुमने उस पीतवस्त्रधारिणी को देखा हो तो बताओ। हे मृग! उस मृगनयनी को तुम जानते हो?’

 

इसी प्रकार तुलसी के राम भी वन के पशुपक्षियों से पूछते हैं –

 

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम देखी सीता मृगनैनी॥

 

कालिदास का यक्ष भी चेतनाचेतन भेद इसी प्रेमदशा के ही भीतर भूला है। इससे यह सिद्ध है कि कवि परंपरा के बीच यह एक मान्य परिपाटी है कि इस प्रकार की दशा का वर्णन प्रेमदशा के भीतर ही हो।

 

इस संबंध में मामूली तौर पर तो इतना ही कहना काफी समझा जाता है कि ‘उन्माद’ की व्यंजना के लिए इस प्रकार का आचरण दिखाया जाता है। ‘उन्माद’ ही सही पर एक खास ढर्रे का है। इसका आविर्भाव प्रेमताप से पिघल कर फैले हुए हृदय में ही होता है। संबंध का मूल प्रेम है, अत: प्रेमदशा के भीतर ही मनुष्य का हृदय उस संबंध का आभास पाता है जो पशु, पक्षी, द्रुम, लता आदि के साथ अनादि काल से चला आ रहा है।

 

नागमती उपवनों में रोती फिरती है। उसके विलाप से घोंसलों में बैठे हुए पक्षियों की नींद हराम हो गई है –

 

फिरि फिरि रोव, कोइ नहीं डोला। आधी रात विहंगम बोला॥

 

तू फिरि फिरि दाहै सब पाँखी। केहि दुख रैनि न लावसि आँखी॥

 

और कवियों ने पशुपक्षियों को संबोधन भर करने का उल्लेख कर के बात और आगे नहीं बढ़ाई है जिससे ऊपर से देखनेवालों का ध्यान ‘उन्माद’ की दशा ही तक रह जाता है। पर जायसी ने जिस प्रकार मनुष्य के हृदय में पशु पक्षियों से सहानुभूति प्राप्त करने की संभावना की है, उसी प्रकार पक्षियों के हृदय में सहानुभूति के संचार की भी। उन्होंने सामान्य हृदयतत्त्व की सृष्टिव्यापिनी भावना द्वारा मनुष्य और पशु-पक्षी सबको एक जीवन सूत्र में बद्ध देखा है। राम के प्रश्न का खग, मृग और मधुकर कुछ जवाब नहीं देते। राजा पुरुरवा कोकिल, हंस इत्यादि को पुकारता ही फिरता है, पर कोई सहानुभूति प्रकट करता नहीं दिखाई पड़ता (विक्रमोर्वशीय, अंक 4) पर नागमती की दशा पर एक पक्षी को दया आती है – वह उसके दु:ख का कारण पूछता है। नागमती उस पक्षी से कहती है –

 

चारिउ चक्र उजार भए, कोई न सँदेसा टेक।

 

कहौं विरह दुख आपन, बैठि सुनहू दंड एक॥

 

इस पर वह पक्षी संदेशा ले जाने को तैयार हो जाता है।

 

पद्मावती से कहने के लिए नागमती ने जो संदेशा कहा है, वह अत्यंत मर्मस्पर्शी है। उसमें मान, गर्व आदि से रहित, सुखभोग की लालसा से अलग, अत्यंत नम्र, शीतल और विशुद्ध प्रेम की झलक पाई जाती है –

 

पद्मावती सौ कहेहु, बिहंगम। कंत लोभाइ रही करि संगम॥

 

तोहि चैन सुख मिलै सरीरा। मो कहँ दिए दुन्द दुख पूरा॥

 

हमहुँ बिआही सँग ओहि पीऊ। आपुहिं पाइ, जानु पर जीऊ॥

 

मोहि भोग सौं काज न बारी। सौंह दिस्टि कै चाहनहारी॥

 

मनुष्य के आश्रित, मनुष्य के पाले हुए, पेड़ पौधे किस प्रकार मनुष्य के सुख से सुखी और दु:ख से दु:खी दिखाई देते हैं, यह दृश्य बड़े कौशल और बड़ी सहृदयता से जायसी ने दिखाया है। नागमती की विरहदशा में उसके बाग बगीचों में उदासी बरस रही थी। पेड़ पौधे सब मुरझाए पड़े थे। उनकी सुध कौन लेता है? पर राजा रत्नसेन के चित्तौर लौटते ही –

 

पलुही नागमती कै बारी। सोने फूल फूलि फुलवारी॥

 

जावत पंखि रहे सब दहे। सबै पंखि बोले गहगहे॥

 

जब पेड़ पौधे सूख रहे थे तब पक्षी भी आश्रय न पा कर ताप से झुलस रहे थे। इस प्रकार नागमती की वियोगदशा का विस्तार केवल मनुष्य जाति तक ही नहीं, पशु पक्षियों और पेड़ पौधों तक दिखाई पड़ता था। कालिदास ने पाले हुए मृग और पौधों के प्रति शकुन्तला का स्नेह दिखा कर इसी व्यापक और विशद भाव की व्यंजना की है।

 

विप्रलंभ श्रृंगार ही ‘पद्मावत’ में प्रधान है। विरहदशा के वर्णन में जहाँ कवि ने भारतीय पद्धति का अनुसरण किया है, वहाँ कोई अरुचिकारक बीभत्स दृश्य नहीं आया है। कृशता, ताप, वेदना आदि के वर्णन में भी उन्होंने श्रृंगार के उपयुक्त वस्तु सामने रखी है, केवल उसके स्वरूप में कुछ अंतर दिखा दिया है। जो पद्मिनी स्वभावत: पद्मिनी के समान विकसित रहा करती थी वह सूख कर मुरझाई हुई लगती है –

 

कँवल सूख, पखुरी बेहरानी। गलि गलि कै मिलि छार हेरानी॥

 

इस रूप में प्रदर्शित व्यक्ति के प्रति सहानुभूति और दया का पूरा अवसर रहता है। पाठक उसकी दशा व्यंजित करने वाली वस्तु की ओर कुछ देर दृष्टि गड़ा कर देख सकते हैं। मुरझाया फूल भी फूल ही है। अतीत सौंदर्य के स्मरण से भाव और उद्दीप्त होता है। पर उसके स्थान पर यदि चीरकर हृदय का खून, नसें और हड्डियाँ आदि दिखाई जाएँ तो दया होते हुए भी इन वस्तुओं की ओर दृष्टि जमाते न बनेगा।

 

विरहदशा के भीतर ”निरवलंम्बता” की अनुभूति रह-रहकर विरही को होती है। देखिए, कैसा परिचित और साधारण प्राकृतिक व्यापार सामने रखकर कवि ने इस ‘निरवलंबता’ का गोचर प्रत्यक्षीकरण किया है –

 

आवा पवन बिछोह कर पात परा बेकरार।

 

तरिवर तजा जो चूरि कै लागै केहि के डार॥

 

‘लागै केहि के डार’ मुहावरा भी बहुत अच्छा आया है।

 

‘पद्मावत’ में यद्यपि हिंदू जीवन के परिचायक भावों की ही प्रधानता है, पर बीच-बीच में फारसी साहित्य द्वारा घोषित भावों के भी छींटे कहीं-कहीं मिलते हैं। विदेशीय प्रभाव के कारण वियोगदशा के वर्णन में कही कहीं बीभत्स चित्र सामने आ जाते हैं; जैसे ‘कबाबे सींक’ वाला यह भाव –

 

विरह सरागन्हि भूँजै माँसू। गिरि गिरि परै रकत कै ऑंसू॥

 

कटि कटि माँसु सराग पिरोवा। रकत के ऑंसु माँसु सब रोवा॥

 

खिन एक बार माँसु अस भूँजा। खिनहिं चबाइ सिंघ अस गूँजा॥

 

वियोग में इस प्रकार के बीभत्स दृश्य का समावेश जायसी ने जो किया है वह तो किया ही है, संयोग के प्रसंग में भी वे एक स्थान पर ऐसा ही बीभत्स चित्र सामने लाए हैं। बादल जब अपनी नवागत वधू की ओर से दृष्टि फेर लेता है, तब वह सोचती है कि क्या मेरे कटाक्ष तो उसके हृदय को बेध कर पीठ की ओर नहीं जा निकले हैं। यदि ऐसा है तो तूँबी लगा कर मैं उसे खींच लूँ और जब वह पीड़ा से चौंक कर मुझे पकड़े तो गहरे रस से उसे धो डालूँ –

 

मकु पिउ दिस्टि समानेउ सालू। हुलसी पीठि कढ़ावौं फालू॥

 

कुच तूँबी अब पीठि गड़ोवौं। गहै जो हूकि, गाढ़ रस धोवौं॥

 

कटाक्ष या नेत्रों को ‘अनियारे’, ‘नुकीले’ तक कह देना तो ठीक है, पर ऊहात्मक या वस्तुव्यंजनात्मक पद्धति पर इस कल्पना को और आगे बढ़ा कर शरीर पर सचमुच घाव आदि दिखाने लगना काव्य की सीमा के बाहर जाना है, जैसा कि एक कवि जी ने किया है –

 

काजर दे नहिं , एरी सुहागिनि! ऑंगुरी तेरी कटैगी कटाछन।

 

यदि कटाक्ष से उँगली कटने का डर है तब तो तरकारी चीरने या फल काटने के लिए छुरी, हँसिया आदि की कोई जरूरत न होनी चाहिए। कटाक्ष मन में चुभते हैं न कि प्रत्यक्ष शरीर पर घाव करते हैं।

 

विरहजन्य कृशता के वर्णन में जायसी ने कविप्रथानुसार पूरी अत्युक्ति की है, पर उस अत्युक्ति में भी गंभीरता बनी हुई है, वह खेलवाड़ या मजाक नहीं होने पाई है। बिहारी की नायिका इतनी क्षीण हो गई है कि जब साँस खींचती है तब उसके झोंके से चार कदम पीछे हट जाती है और जब साँस निकालती है तब उसके साथ चार कदम आगे बढ़ जाती है। घड़ी के पेंडुलम की सी दशा उसकी रहती है। इसी प्रकार उर्दू के एक शायर साहब ने आशिक को जूँ या खटमल का बच्चा बना डाला –

 

इन्तहाए लागरी से जब नजर आया न मैं।

 

हँस के वो कहने लगे, बिस्तर को झाड़ा चाहिए॥

 

पर जायसी का यह वर्णन सुन हृदय द्रवीभूत होता है, हँसी नहीं आती –

 

दहि कोइला भइ कन्त सनेहा। तोला माँसु रहा नहिं देहा॥

 

रकत न रहा बिरह तन जरा। रती रती होइ नैनन्ह ढरा॥

 

हाड़ भए सब किंगरी, नसै भई सब ताँति।

 

रोवँ रोवँ ते धुनि उठै, कहौं बिथा केहि भाँति॥

 

इसी नागमती के विरहवर्णन के अंतर्गत वह प्रसिद्ध बारहमासा है जिसमें वेदना का अत्यंत निर्मल और कोमल स्वरूप, हिंदू दांपत्य जीवन का अत्यंत मर्मस्पर्शी माधुर्य, अपने चारों ओर की प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों के साथ विशुद्ध भारतीय हृदय की साहचर्य भावना तथा विषय के अनुसार भाषा का अत्यंत स्निग्ध, सरल मृदुल और अकृत्रिम प्रवाह देखने योग्य है। पर इन कुछ विशेषताओं की ओर ध्यान जाने पर भी इसके सौंदर्य का बहुत कुछ हेतु अनिर्वचनीय रह जाता है। इस बारहमासे में वर्ष के बारह महीनों का वर्णन विप्रलंभ श्रृंगार के उद्दीपन की दृष्टि से है जिसमें आनंदप्रद वस्तुओं का दु:खप्रद होना दिखाया जाता है, जैसा कि मंडन कवि ने कहा है –

 

जेइ जेइ सुखद , दुखद अब तेइ तेइ, कवि मंडन बिछुरत जदुपत्ती।

 

प्रेम में सुख और दु:ख दोनों की अनुभूति की मात्रा जिस प्रकार बढ़ जाती है उसी प्रकार अनुभूति के विषयों का विस्तार भी। संयोग की अवस्था में जो प्रेम सृष्टि की सब वस्तुओं से आनंद का संग्रह करता है वही वियोग की दशा में सब वस्तुओं में दु:ख का संग्रह करने लगता है। इसी दु:खद रूप में प्रत्येक मास की उन सामान्य प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों का वर्णन जायसी ने किया है जिनके साहचर्य का अनुभव मनुष्यमात्र – राजा से ले कर रंक तक करते हैं। अत: इस बारहमासे में मुख्यत: दो बातें देखने की है। –

 

(1) प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों का दिग्दर्शन।

 

(2) दु:ख के नाना रूपों और कारणों की उभावना।

 

प्रथम के संबंध में यह जान लेना चाहिए कि प्राचीन संस्कृत कवियों का सा संश्लिष्ट विशद चित्रण उद्दीपन की दृष्टि से किए हुए ऋतुवर्णन में नहीं हुआ करता, केवल वस्तुओं और व्यापारों की अलग-अलग झलक भर दिखा कर प्रेमी के हृदय की अवस्था की व्यंजना हुआ करती है। परिचित प्राकृतिक दृश्यों को साहचर्य द्वारा और कवियों की वाणी द्वारा जो मर्मस्पर्शी प्रभाव प्राप्त है, उसका अनुभव उनकी ओर संकेत करने मात्र से भी सहृदयों को हो जाता है। इस प्रकार बहुत ही सुंदर संकेत – बहुत ही मनोहर झलक इस बारहमासे में हम पाते हैं। कुछ उदाहरण लीजिए –

 

चढ़ा असाढ़, गगन घन गाजा। साजा बिरह ,दुंद दल बाजा॥

 

धूम, साम धौरे घन धाए। सेत धजा बगपाँति देखाए॥

 

खड़ग बीजु चमकै चहुँ ओरा। बुन्दबान बरिसहिं चहुँ ओरा॥

 

बाट असूझ अथाह गँभीरी। जिउ बाउर भा फिरै भँभीरी॥

 

जग जल बूड़ जहाँ लगि ताकी। मोरि नाव खेवक बिनु थाकी॥

 

जेठ जरै जग चलै लुवारा। उठिहिं बवंडर परहिं ऍंगारा॥

 

उठै आगि औ आवै ऑंधी। नैन न सूझ मरौं दुख बाँधी॥

 

अपनी भावुकता का बड़ा भारी परिचय जायसी ने इस बात में दिया है कि रानी नागमती विरहदशा में अपना रानीपन बिलकुल भूल जाती है और अपने को केवल साधारण स्‍त्री के रूप में देखती है। इसी सामान्य स्वाभाविक वृत्ति के बल पर उसके विरहवाक्य छोटे बड़े सबके हृदय को समान रूप में स्पर्श करते हैं। यदि कनक पर्यंक, मखमली सेज, रत्नजटित अलंकार, संगमरमर के महल, खसखाने इत्यादि की बातें होतीं तो वे जनता के एक बड़े भाग के अनुभव से कुछ दूर की होतीं। जायसी ने स्‍त्री जाति की या कम से कम हिंदू गृहिणी मात्र की सामान्य स्थिति के भीतर विप्रलंभ श्रृंगार के अत्यंत समुज्ज्वल रूप का विकास दिखाया है। देखिए चौमासे में स्वामी के न रहने से घर की जो दशा होती है वह किस प्रकार गृहिणी के विरह का उद्दीपन करती है –

 

पुष्य नखत सिर ऊपर आवा । हौं बिनु नाह, मँदिर को छावा॥

 

इसी प्रकार शरीर का रूपक दे कर बरसात आने पर साधारण गृहस्थों की चिंता और आयोजना की झलक दिखाई गई है –

 

तपै लागि अब जेठ असाढ़ी। मोहि पिउ बिन छाजनि भइ गाढ़ी॥

 

तन तिनउर भा, झूरौं खरी। भइ बरखा, दुख आगरि जरी॥

 

बंधा नाहिं औ कंधा न कोई। बात न आव, कहौं का रोई॥

 

साँठि नाँठि,जग बात को पूछा। बिनु जिउ फिरै मूँज तनु छूछा॥

 

भई दुहेली टेक बिहूनी। थाँभ नाहिं, उठि सकै न थूनी॥

 

बरसै मेह, चुवहिं नैनाहा। छपर छपर होइ रहि बिनु नाहा॥

 

कोरौ कहाँ , ठाट नव साजा। तुम बिनु कंत न छाजनि छाजा॥

 

यह आशिक माशूकों का निर्लज्ज प्रलाप नहीं है; यह हिंदू गृहिणी की विरहवाणी है। इसका सात्त्विक मर्यादापूर्ण माधुर्य परम मनोहर है।

 

यद्यपि इस बारहमासे में प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों की रूढ़ि के अनुसार अलग अलग झलक भर दिखाई गई है, उनका संश्लिष्ट चित्रण नहीं है, पर एक आध जगह कवि का अपना निरीक्षण भी बहुत सूक्ष्म और सुंदर है जिसका उल्लेख वस्तुवर्णन के अंतर्गत किया जायगा।

 

अब दु:ख के नाना रूपों और कारणों की उद्भावना लीजिए। जायसी के विरहोद्गार अत्यंत मर्मस्पर्शी हैं। जायसी को हम विप्रलंभ श्रृंगार का प्रधान कवि कह सकते हैं। जो वेदना, जो कोमलता, जो सरलता और जो गंभीरता इनके वचनों में है, वह अंयत्र दुर्लभ है। नागमती सब जीव जंतुओं, पशुपक्षियों में सहानुभूति की भावना करती हुई कहती है –

 

पिउ सों कहेउ सँदेसड़ा, हे भौंरा! हे काग!

 

सो धनि बिरहै जरि मुई, तेहि क धुवाँ हम्ह लाग॥

 

इस सहानुभूति की संभावना रानी के हृदय में होती कैसे है? यह समझ कर होती है कि भौंरा और कौवा दोनों उसी विरहाग्नि के धुएँ से काले हो गए हैं जिसमें मैं जल रही हूँ। सम दु:खभोगियों में परस्पर सहानुभूति का उदय अत्यंत स्वाभाविक है। ‘सँदेसड़ा’ शब्द में स्वार्थे ‘ड़ा’ का प्रयोग भी बहुत उपयुक्त है। ऐसा शब्द उस दशा में मुँह से निकलता है जब हृदय प्रेम, माधुर्य, अल्पता, तुच्छता, आदि में से कोई भाव लिए हुए होता है। ‘हे भौंरा! हे काग!’ से एक एक को अलग अलग संबोधन करना सूचित होता है। आवेग की दशा में यही उचित है। ‘हे भौंरा औ काग’ कहने में यह बात न होती।

 

दु:ख और आधद की दशा में एक बड़ा भारी भेद है। जब हृदय दु:ख में मग्न रहता है तब सुखद और दु:खद दोनों प्रकार की वस्तुओं से दु:ख का संग्रह करता है। पर आनंद की दशा का पोषण केवल सामान्य या आनंददायक वस्तुओं से ही होता है, दु:खप्रद वस्तुओं से नहीं। विरहदशा दु:खदशा है। इसमें कष्टदायक वस्तुएँ तो और भी कष्टदायक हो ही जाती हैं, जैसे –

 

(क) काँपै हिया जनावै सीऊ। तो पै जाइ होइ सँग पीऊ॥

 

पहल पहल तन रूई झाँपै। हहरि हहरि अधिकौ हिय काँपै॥

 

(ख) चारिहु पवन झकोरै आगी। लंका दाहि पलंका लागी॥

 

उठै आगि औ आवै ऑंधी । नैन न सूझ, मरौं दु:ख बाँधी॥

 

सुखदायक वस्तुएँ भी दु:ख को बढ़ाती हैं, जैसे –

 

कातिक सरद चंद उजियारी। जग सीतल हौं बिरहै जारी॥

 

चौदह करा चाँद परगासा। जनहुँ जरै सब धरति अकासा॥

 

तन, मन, सेज जरै अगिदाहू। सब कहँ चंद भयहू मोहिं राहू॥

 

कहीं संयोगसुख या आनंदोत्सव देखकर अपने पक्ष में उसके अभाव की भावना से विरह की आग और भी भड़कती है –

 

(क) अबहूँ निठुर आउ एहिंबारा। परब देवारी होइ सँसारा॥

 

सखि झूमुक गावैं अंग मोरी। हौं झुरावँ , बिछुरी मोरी जोरी ॥

 

(ख) करहिं बनसपति हिए हुलासू। मोकहँ भा जग दून उदासू॥

 

फागु करहिं सब चाँचरि जोरी। मोहिं तन लाइ दीन्हि जस होरी॥

 

नागमती देखती है कि बहुतों के बिछुड़े हुए प्रिय मित्र आ रहे हैं पर मेरे प्रिय नहीं आ रहे हैं। इस वैषम्य की भावना उसे और भी व्याकुल करती है। किसी वस्तु के अभाव से दु:खी मनुष्य के हृदय की यह एक अत्यंत स्वाभाविक वृत्ति है। पपीहे का प्रिय पयोधर आ गया, सीप के मुँह में स्वाति की बूँद पड़ गई, पर नागमती का प्रिय न आया –

 

चित्रा मित्र मीन कर आवा। पपिहा पीउ पुकारत पावा॥

 

स्वाति बूँद चातक मुख परे। समुद्र सीप मोती सब भरे॥

 

सरवर सँवरि हंस चलि आए। सारस कुरलहिं खँजन देखाए॥

 

विरह का दु:ख ऐसा नहीं कि चारों ओर जो वस्तुएँ दिखाई पड़ती हैं उनसे कुछ जी बहले। उनसे तो और भी अपनी दशा की ओर विरही का ध्यान जाता है, और उस दशा का दु:सह स्वरूप स्पष्ट होता है – चाहे वे उसकी दु:खदशा से भिन्न दशा में दिखाई पड़ें, चाहे कुछ सादृश्य लिए हुए। भिन्न भाव में दिखाई पड़ने वाली वस्तुओं के नमूने तो ऊपर के उदाहरणों में आ गए हैं। अब भिन्न भिन्न ऋतुओं की नाना वस्तुओं और व्यापारों को विरही लोग किस प्रकार सादृश्यभावना द्वारा अपनी दशा की व्यंजना का सुलभ साधन बनाया करते हैं, यह भी देखिए –

 

बरसै मघा झकोरि झकोरी। मोर दुइ नैन चुवैं जस ओरी॥

 

पुरवा लाग, भूमि जल पूरी। आक जवास भई तस झूरी॥

 

सखिन्ह रचा पिउ संग हिंडोला। हरियर भूमि, कुसुंभी चोला॥

 

हिय हिंडोल अस डोलै मोरा। विरह झुलाई देइ झकझोरा॥

 

तन जस पियर पात भा मोरा । तेहि पर विरह देह झकझोरा॥

 

विरहिणी की इस सादृश्य भावना का वर्णन कविपरंपरासिद्ध है। सूरदास का ‘निसि दिन बरसत नैन हमारे’ यह पद प्रसिद्ध है। और कवियों ने भी ऋतुसुलभ वस्तुओं और व्यापारों के साथ विरहिणी के तन और मन की दशा का सादृश्यवर्णन किया है। यह सादृश्यकथन अत्यंत स्वाभाविक होता है, क्योंकि इसमें उपमान ऊहा द्वारा सोच कर निकाला हुआ नहीं होता बल्कि सामने प्रस्तुत रहता है, और प्रस्तुत रह कर उपमेय की ओर ध्यान ले जाता है। बैशाख में विरहिणी एक ओर सूखते तालों की दरारों को देखती है, दूसरी ओर विदीर्ण होते हुए अपने हृदय को। बरसात में वह एक ओर तो टपकती हुई ओलती देखती है, दूसरी ओर अपने आँसुओं की धारा। एक ओर सूखे हुए ‘आक जवास’ को देखती है, दूसरी ओर अपने शरीर को। शिशिर में एक ओर सूख कर झड़े हुए पीले पत्तों को देखती है, दूसरी ओर अपनी पीली पड़ी देह को। अत: उक्त उपमाएँ ‘दूर की सूझ’ नहीं हैं। उनमें सादृश्य बहुत सोचा विचारा हुआ नहीं है, उनका उदय विरहविह्वल अंत:करण में बिना प्रयास हुआ है। दो उपस्थित वस्तुओं में सादृश्य की ऐसी स्वाभाविक भावना संस्कृत कवियों ने बहुत अच्छी की है। कालिदास का यह श्लोक ही लीजिए –

 

स पाटलायां गवि तस्थिवांसं धनुर्धर : केसरिणं ददर्श।

 

अधित्यकायामिव धातुमय्यां लोध्रदुमं सानुमत : प्रफुल्लम्॥

 

(रघु. 2 – 29)

 

इस बारहमासे में हृदय के वेग की व्यंजना अत्यंत स्वाभाविक रीति से होने पर भी भाव अत्यंत उत्कर्ष दशा को पहुँचे हुए दिखाए गए हैं। देखिए, अभिलाष का यहाँ कैसा उत्कर्ष है –

 

रात दिवस बस यह जिउ मोरे । लगौं निहोर कन्त अब तोरे॥

 

यह तन जारौं छार कै कहौं कि पवन उड़ाव।

 

मकु तेहि मारग उड़ि परै, कँत धारै जहँ पाव॥

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