कहानी – प्रेमगाथा की परंपरा -(लेखक – रामचंद्र शुक्ल)

· February 19, 2014

RamChandraShukla_243172इस नवीन शैली की प्रेमगाथा का आविर्भाव इस बात के प्रमाणों में से है कि इतिहास में किसी राजा के कार्य सदा लोकप्रवृत्ति के प्रतिबिंब नहीं हुआ करते। इसी को ध्यान में रख कर कुछ नवीन पद्धति के इतिहासकार प्रकरणों का विभाग राजाओं के राजत्वकाल के अनुसार न कर लोक की प्रवृत्ति के अनुसार करना चाहते हैं। एक ओर तो कट्टर और अन्यायी सिकंदर लोदी मथुरा के मंदिरों को गिरा कर मसजिदें खड़ी कर रहा था और हिंदुओं पर अनेक प्रकार के अत्याचार कर रहा था, दूसरी ओर पूरब में बंगाल के शासक हुसैनशाह के अनुरोध से, जिसने ‘सत्य पीर’ की कथा चलाई थी, कुतबन मियाँ एक ऐसी कहानी ले कर जनता के सामने आए जिसके द्वारा उन्होंने मुसलमान होते हुए भी अपने मनुष्य होने का परिचय दिया। इसी मनुष्यत्व को ऊपर करने से हिंदूपन, मुसलमानपन, ईसाईपन आदि के उस स्वरूप का प्रतिरोध होता है जो विरोध की ओर ले जाता है। हिंदुओं और मुसलमानों को एक साथ रहते अब इतने दिन हो गए थे कि दोनों का ध्यान मनुष्यता के सामान्य स्वरूप की ओर स्वभावत: जाय।

कुतबन चिश्ती वंश के शेख बुरहान के शिष्य थे। उन्होंने ‘मृगावती’ नाम का एक काव्य सन् 909 हिजरी में लिखा। इसमें चंद्रनगर के राजा गणपतिदेव के राजकुमार और कंचननगर के राजा रूपमुरार की कन्या मृगावती के प्रेम की कथा है।

 

जायसी ने प्रेमियों के दृष्टांत देते हुए अपने पूर्व की लिखी कुछ प्रेमकहानियों का उल्लेख किया है –

 

विक्रम धँसा प्रेम के बारह । सपनावति कहँ गएउ पतारा॥

मधूपाछ मुगुधावति लागी । गगनपूर होइगा बैरागी॥

राजकुँवर कंचनपुर गयऊ । मिरगावति कहँ जोगी भयऊ॥

साधु कुँवर खंडावत जोगू । मधूमालति कर कीन्ह वियोगू॥

प्रेमावति कहँ सुरसरि साधा । ऊषा लगि अनिरुधा बर बाध॥

 

विक्रमादित्य और ऊषा अनिरुद्ध की प्रसिद्ध कथाओं को छोड़ देने से चार प्रेमकहानियाँ जायसी के पूर्व लिखी हुई पाई जाती हैं। इनमें से ‘मृगावती’ की एक खंडित प्रति का पता तो नागरीप्रचारिणी सभा को लग चुका है। ‘मधुमालती’ की भी फारसी अक्षरों में लिखी हुई एक प्रति मैंने किसी सज्जन के पास देखी थी पर किसके पास, यह स्मरण नहीं। चतुर्भुजदास कृत ‘मधुमालती कथा’ नागरीप्रचारिणी सभा को मिली है जिसका निर्माणकाल ज्ञात नहीं और जो अत्यंत भ्रष्ट गद्य में है। ‘मुग्धावती’ और ‘प्रेमावती’ का पता अभी तक नहीं लगा है। जायसी के पीछे भी ‘प्रेमगाथा’ की यह परंपरा कुछ दिनों तक चलती रही। गाजीपुर निवासी शेख हुसेन के पुत्र उसमान (मान) ने संवत् 1670 के लगभग चित्रवली लिखी जिसमें नेपाल के राजा धरनीधर के पुत्र सुजान और रूपनगर के राजा चित्रसेन की कन्या चित्रवली की प्रेमकहानी है। भाषा इसकी अवधी होने पर भी कुछ भोजपुरी लिए है। यह नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हो चुकी है। दूसरी पुस्तक नूरमुहम्मद की ‘इंद्रावत’ है जो संवत् 1796 में लिखी गई थी। इसे भी उक्त सभा प्रकाशित कर चुकी है।

 

इन प्रेमगाथा काव्यों में पहली बात ध्यान देने की यह है कि इनकी रचना बिलकुल भारतीय चरितकाव्यों की सर्गबद्ध शैली पर न हो कर फारसी की मसनवियों के ढंग पर हुई है, जिसमें कथा सर्गों या अध्यायों में विस्तार के हिसाब से विभक्त नहीं होती, बराबर चली चलती है, केवल स्थान स्थान पर घटनाओं या प्रसंगों का उल्लेख शीर्षक के रूप में रहता है। मसनवी के लिए साहित्यिक नियम तो केवल इतना ही समझा जाता है कि सारा काव्य एक ही मसनवी छंद में हो पर परंपरा के अनुसार उसमें कथारंभ के पहले ईश्वरस्तुति, पैगंबर की वंदना और उस समय के राजा (शाहे वक्त) की प्रशंसा होनी चाहिए। ये बातें पद्मावत, इन्द्रावत, मृगावती इत्यादि सबमें पाई जाती हैं।

 

दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि ये सब प्रेमकहानियाँ पूरबी हिंदी अर्थात् अवधी भाषा में एक नियमक्रम के साथ केवल चौपाई, दोहे में लिखी गई हैं। जायसी ने सात चौपाइयों (अधार्लियों) के बाद एक एक दोहे का क्रम रखा है। जायसी के पीछे गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने ‘रामचरितमानस’ के लिए यही दोहे चौपाई का क्रम ग्रहण किया। चौपाई और बरवै मानो अवधी भाषा के अपने छंद हैं, इनमें अवधी भाषा जिस सौष्ठव के साथ ढली है उस सौष्ठव के साथ व्रजभाषा नहीं। उदाहरण के लिए लाल कवि के ‘छत्रप्रकाश’, पद्माकर के ‘रामरसायन’ और व्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ को लीजिए। ‘बरवै’, तो व्रजभाषा में कहा ही नहीं जा सकता। किसी पुराने कवि ने व्रजभाषा में बरवै लिखने का प्रयास भी नहीं किया।

 

तीसरी बात ध्यांन देने की यह है कि इस शैली की प्रेम कहानियाँ मुसलमानों के ही द्वारा लिखी गईं। इन भावुक और उदार मुसलमानों ने इनके द्वारा मानो हिंदू जीवन के साथ अपनी सहानुभूति प्रकट की। यदि मुसलमान हिंदी और हिंदू साहित्य से दूर न भागते, इनके अध्ययन का क्रम जारी रखते, तो उनमें हिंदुओं के प्रति सद्भाव की वह कमी न रह जाती जो कभी-कभी दिखाई पड़ती है। हिंदुओं ने फारसी और उर्दू के अभ्यास द्वारा मुसलमानों की जीवनकथाओं के प्रति अपने हृदय का सामंजस्य पूर्ण रूप से स्थापित किया, पर खेद है कि मुसलमानों ने इसका सिलसिला बंद कर दिया। किसी जाति की जीवनकथाओं को बार – बार सामने लाना उस जाति के प्रति और सहानुभूति प्राप्त करने का स्वाभाविक साधन है। ‘पद्मावत’ की हस्तलिखित प्रतियाँ अधिकतर मुसलमानों के ही घर में पाई गई हैं। इतना मैं अनुभव से कहता हूँ कि जिन मुसलमानों के यहाँ यह पोथी देखी गई, उन सबको मैंने विरोध से दूर और अत्यंत उदार पाया।

facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedinmail


ये भी पढ़ें :-