कविता – स्तुतिखंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

· April 3, 2014

RamChandraShukla_243172सुमिरौं आदि एक करतारू । जेहि जिउ दीन्ह कीन्ह संसारू॥

कीन्हेसि प्रथम जोति परकासू । कीन्हेसि तेहि पिरीत कैलासू॥

 

कीन्हेसि अगिनि, पवन, जल खेहा । कीन्हेसि बहुतै रंग उरेहा॥

 

कीन्हेसि धारती, सरग, पतारू । कीन्हेसि बरन बरन औतारू॥

 

कीन्हेसि दिन, दिनअर, ससि, राती । कीन्हेसि नखत, तराइन पाँती॥

 

कीन्हेसि धाूप, सीउ औ छाँहा । कीन्हेसि मेघ, बीजु तेहि माँहा॥

 

कीन्हेसि सप्त मही बरम्हंडा । कीन्हेसि भुवन चौदहो खंडा॥

 

कीन्ह सबै अस जाकर दूसर छाज न काहि।

 

पहिले ताकर नावँ लै कथा करौं औगाहि॥1॥

 

कीन्हेसि सात समुंद अपारा । कीन्हेसि मेरु, खिखिंद पहारा॥

 

कीन्हेसि नदी, नार औ झरना । कीन्हेसि मगर मच्छ बहु बरना॥

 

कीन्हेसि सीप, मोति जेहि भरे । कीन्हेसि बहुतै नग निरमरे॥

 

कीन्हेसि वनख्रड औ जरि मूरी । कीन्हेसि तरिवर तार खजूरी॥

 

कीन्हेसि साउज आरन रहईं । कीन्हेसि पंखि उड़हिं जहँ चहईं॥

 

कीन्हेसि बरन सेत औ स्यामा । कीन्हेसि भूख नींद बिसरामा॥

 

कीन्हेसि पान फूल बहु भोगू। कीन्हेसि बहु ओषद, बहु रोगू॥

 

निमिख न लाग करत ओहि, सबै कीन्ह पल एक।

 

गगन अंतरिख राखा बाज खंभ बिनु टेक॥2॥

 

कीन्हेसि अगर कसतुरी बेना । कीन्हेसि भीमसेन औ चीना॥

 

कीन्हेसि नाग, जो मुख बिष बसा । कीन्हेसि मंत्रा, हरे जेहि डसा॥

 

कीन्हेसि अमृत, जियै जो पाए । कीन्हेसि बिक्ख, मीचु जेहि खाए॥

 

कीन्हेसि ऊख मीठ-रस-भरी । कीन्हेसि करू बेल बहु फरी॥

 

कीन्हेसि मधाु लावै लै माखी । कीन्हेसि भौंर पंखि औ पाँखी॥

 

कीन्हेसि लोवा इंदुर चाँटी । कीन्हेसि बहुत रहहिं खनिमाटी॥

 

कीन्हेसि राकस भूत परेता । कीन्हेसि भोकस देव दएता॥

 

कीन्हेसि सहस अठारह बरन बरन उपराजि॥

 

भुगुति दिहेसि पुनि सबन कहँ सकल साजना साजि॥3॥

 

कीन्हेसि मानुष, दिहेसि बड़ाई । कीन्हेसि अन्न, भुगुति तेहि पाई॥

 

कीन्हेसि राजा भूजहिं राजू । कीन्हेसि हस्ति घोर तेहि साजू॥

 

कीन्हेसि दरब गरब जेहि होई । कीन्हेसि लोभ, अघाइ न कोई॥

 

कीन्हेसि जियन, सदा सब चहा । कीन्हेसि मीचु, न कोई रहा॥

 

कीन्हेसि सुख औ कोटि अनंदू । कीन्हेसि दुख चिंता औ धांदू॥

 

कीन्हेसि कोइ भिखारि, कोई धानी । कीन्हेसिसंपति विपति पुनीघनी॥

 

कीन्हेसि कोइ निभरोसी, कीन्हेसि कोइ बरियार।

 

छारहिं तें सब कीन्हेसि, पुनि कीन्हेसि सब छार॥4॥

 

धानपति उहै जेहिक संसारू । सबैं देइ नित, घट न भँडारू॥

 

जावत जगत हस्ति औ चाँटा । सब कहँ भुगुति रात दिन बाँटा॥

 

ताकर दीठि जो सब उपराहीं । मित्रा सत्राु कोइ बिसरै नाहीं॥

 

पंखि पतन न बिसरे कोई । परगट गुपुत जहाँ लगि होई॥

 

भोग भुगुति बहु भाँति उपाई । सबै खवाइ, आप नहिं खाई॥

 

ताकर उहै जो खाना पियना । सब कहँ देइ भुगुति औ जियना॥

 

सबै आसहर ताकर आसा । वह न काहु के आस निरासा॥

 

जुग जुग देत घटा नहिं, उभै हाथ अस कीन्ह।

 

और जो दीन्ह जगत महँ, सो सब ताकर दीन्ह॥5॥

 

आदि एक बरनौं सोइ राजा । आदि न अंत राज जेहि छाजा॥

 

सदा सरबदा राज करेई । औ जेहि चहै राज तेहि देई॥

 

छत्राहिं अछत, निछत्राहिं छावा । दूसर नाहिं जो सरवरि पावा॥

 

परबत ढाह देख सब लोगू । चाँटहि करै हस्ति सरि-जोगू॥

 

बज्रहिं तिनकहिं मारि उड़ाई । तिनहि बज्र करि देइ बड़ाई॥

 

ताकर कीन्ह न जानै कोई । करै सोइ जो चित्ता न होई॥

 

काहू भोग भुगुति सुख सारा । काहू बहुत भूख दुख मारा॥

 

एक साज औ भाँजै, चहै सँवारै फेर॥6॥

 

अलख अरूप अबरन सो कर्ता । वह सब सों, सब ओहि सों बर्ता॥

 

परगट गुपुत सो सरबबिआपी । धारमी चीन्ह न चीन्है पापी॥

 

ना ओहि पूत न पिता न माता । ना ओहि कुटुंब न कोई सँगनाता॥

 

जना न काहु न कोइ ओहि जना । जहँ लगि सब ताकर सिरजना॥

 

वै सब कीन्ह जहाँ लगि कोई । वह नहिं कीन्ह काहु कर होई॥

 

हुत पहिले अरु अब है सोई । पुनि सो रहै रहै नहिं कोई॥

 

और जो होइ सो बाउर अंधाा । दिन दुइ चारि मरै करि धांधाा।

 

जो चाहा सो कीन्हेसि, करै जो चाहे कीन्ह।

 

बरजनहार न कोई, सवै चाहि जिउ दीन्ह॥7॥

 

एहि विधिा चीन्हहु करहु गियानू । जस पुरान महँ लिखा बखानू॥

 

जीउ नाहिं पै जियै गुसाईं । कर नाहीं पर करै सबाईं॥

 

जीभ नाहिं पै सब किछु बोला । तन नाहीं सब ठाहर डोला॥

 

स्रवन नाहिं पै सब किछु सुना । हिया नाहिं पै सब किछु गुना॥

 

नयन नाहि पै सब किछु देखा । कौन भाँति अस जाइ बिसेखा॥

 

है नाहीं कोइ ताकर रूपा । ना ओहि सन कोइ आहि अनूपा॥

 

ना ओहि ठाउँ न ओहि बिनु ठाऊँ । रूप रेख बिनु निरमल नाऊँ॥

 

ना वह मिला न बेहरा, ऐस रहा भरिपूर।

 

दीठिवंत कहँ नीयरे, अंधा मूरखहिं दूरि॥8॥

 

और जो दीन्हेसि रतन अमोला । ताकर मरम न जानै भोला॥

 

दीन्हेसि रसना औ रस भोगू । दीन्हेसि दसन जो बिहँसै जोगू॥

 

दीन्हेसि जग देखन कहँ नैना । दीन्हेसि स्रवन सुनै कहँ बैना॥

 

दीन्हेसि कंठ बोल जेहि माहाँ । दीन्हेसि कर पल्लौ बर बाँहा॥

 

दीन्हेसि चरन अनूप चलाहीं । सो जानइ जेहि दीन्हेसि नाहीं॥

 

जोबन मरम जान पै बूढ़ा । मिला न तरुनापा जग ढूँढ़ा॥

 

दुख कर मरम न जानै राजा । दुखी जान जापर दुख बाजा॥

 

काया मरम जान पै रोगी, भोगी रहै निचिंत।

 

सब कर मरम गोसाईं (जान) जो घट घट रहै निंत॥9॥

 

अति अपार करता कर करना । बरनि न कोई पावै बरना॥

 

सात सरग जो कागद करई । धारती समुद दुहूँ मसि भरई॥

 

जावत जग साखा बनढाखा । जावत केस रोंव पँखि पाँखा॥

 

जावत खेह रेह दुनियाई । मेघबूँद औ गगन तराई॥

 

सब लिखनी कै लिखु संसारा । लिखि न जाइ गति समुद अपारा॥

 

ऐस कीन्ह सब गुन परगटा । अबहुँ समुद महँ बूँद न घटा॥

 

ऐस जानि मन गरब न होई । गरब करै मन बाउर सोई॥

 

बड़ गुनवंत गोसाईं, कहै सँवारै वेग।

 

औ अस गुनी सँवारै, जो गुन करै अनेग॥10॥

 

कीन्हेसि पुरुष एक निरमरा । नाम मुहम्मद पूनौ करा॥

 

प्रथम जोति विधिा ताकर साजी । औ नहिं प्रीति सिहिटि उपराजी॥

 

दीपक लेसि जगत कहँ दीन्हा । भा निरमल जग, मारग चीन्हा॥

 

जौ न होत अस पुरुष उजारा । सूझि न परत पंथ ऍंधिायारा॥

 

दुसरे ठाँव दैव वै लिखे । भए धारमी जे पाढ़त सिखे॥

 

जेहि नहिं लीन्ह जनम भरि नाऊँ । ता कहँ कीन्ह नरक महँ ठाऊँ॥

 

जगत बसीठ दई ओहि कीन्हा । दुइ जग तरा नावँ जेहि लीन्हा॥

 

गुन अवगुन विधिा पूछब, होइहि लेख औ जोख।

 

वह बिनउब आगे होइ, करब जगत कर मोख॥11॥

 

चारि मीत जो मुहम्मद ठाऊँ । जिन्हहिं दीन्ह जग निरमल नाऊँ॥

 

अबाबकर सिद्दीक सयाने । पहिले सिदिक दीन वइ आने॥

 

पुनि सो उमर खिताब सुनाए । भा जग अदल दीन जो आए॥

 

पुनि उसमान पँडित बड़ गुनी । लिखा पुरान जो आयत सुनी॥

 

चौथे अली सिंह बरियारू । सौहँ न कोऊ रहा जुझारू॥

 

चारिउ एक मतै, एक बाना । एक पंथ औ एक संधााना॥

 

बचन एक जो सुनावइ साँचा । भा परवान दुहूँ जग बाँचा॥

 

जो पुरान विधिा पठवा, सोई पढ़त गरंथ।

 

और जो भूले आवत, सो सुनि लागे पंथ॥12॥

 

सेरसाहि देहली सुलतानू । चारिउ खंड तपै जस भानू॥

 

ओही छाज छात औ पाटा । सब राजै भुइँ धारा लिलाटा॥

 

जाति सूर औ खाँडे सूरा । औ बुधिावंत सबै गुन पूरा॥

 

सूर नवाए नवख्रड नवई । सातउ दीप दुनी सब नई॥

 

तहँ लगि राज खड़ग करि लीन्हा । इसकंदर जुलकरन जो कीन्हा॥

 

हाथ सुलेमाँ केरि ऍंगूठी । जग कहँ दान दीन्ह भरि मूठी॥

 

औ अति गरू भूमिपति भारी । टेकि भूमि सब सिहिटि सँभारी॥

 

दीन्ह असीस मुहम्मद, करहु जुगहि जुग राज।

 

बादसाह तुम जगत के जग तुम्हार मुहताज॥13॥

 

बरनौं सूर भूमिपति राजा । भूमि न भार सहै जेहि साजा॥

 

हय गय सेन चलै जग पूरी । परबत टूटि उड़हिं होइ धाूरी॥

 

रेनु रैनि होइ रबिहिं गरासा । मानुख पंखि लेहिं फिरि बासा॥

 

भुइँ उड़ि अंतरिक्ख मृतमंडा । खंड-खंड धारती बरह्मंडा॥

 

डोलै गगन, इंद्र डरि काँपा । बासुकि जाइ पतारहिं चाँपा॥

 

मेरु धासमसै, समुद सुखाई। बन ख्रड टूटि खेह मिलि जाई॥

 

अगिलहिं कहँ पानी लेइ बाँटा । पछिलहिं कहँ नहिं काँदौ आटा॥

 

जो गढ़ नएउ न काहुहिं चलत होइ सो चूर।

 

जब वह चढ़ै भूमिपति सेरसाहि जग सूर॥ 14॥

 

अदल कहौं पुहुमी जस होई । चाँटा चलत न दुखवै कोई॥

 

नौसेरवाँ जो आदिल कहा । साहि अदल सरि सोउ न अहा॥

 

अदल जो कीन्ह उमर कै नाईं । भई अहा सगरो दुनियाई॥

 

परी नाथ कोइ छुवै न पारा । मारग मानुष सोन उछारा॥

 

गऊ सिंह रेंगहि एक बाटा । दूनौ पानि पियहिं एक घाटा॥

 

नीर खीर छानै दरबारा । दूधा पानि सब करै निनारा॥

 

धारम नियाव चलै, सत भाखा । दूबर बली एक सम राखा॥

 

सब पृथवी सीसहिं नई जोरि जोरि कै हाथ।

 

गंग जमुन जौ लगि जल तौ लगि अम्मर नाथ॥15॥

 

पुनि रूपवंत बखानौ काहा । जावत जगत सबै मुख चाहा॥

 

ससि चौदसि जो दई सँवारा । ताहू चाहि रूप उँजियारा॥

 

पाप जाइ जो दरसन दीसा । जग जुहार कै देत असीसा॥

 

जैस भानु जग ऊपर तपा । सबै रूप ओहि आगे छपा॥

 

अस भा सूर पुरुष निरमरा । सूर चाहि दस आगर करा॥

 

सौंह दीठि कै हेरि न जाई । जेहि देखा सो रहा सिर नाई॥

 

रूप सवाई दिन दिन चढ़ा । विधिा सुरूप जग ऊपर गढ़ा॥

 

रूपवंत मनि माथे, चंद्र घाटि वह बाढ़ि।

 

मेदिनि दरस लोभानी, असतुति विनवै ठाढ़ि॥16॥

 

पुनि दातार दई जग कीन्हा । अस जग दान न काहू दीन्हा॥

 

बलि विक्रम दानी बड़ कहे । हातिम करन तियागी अहे॥

 

सेरसाहि सरि पूज न कोऊ । समुद सुमेर भँडारी दोऊ॥

 

दान डाँक बाजै दरबारा । कीरति गई समुंदर पारा॥

 

कंचन परसि सूर गज भयऊ । दारिद भागि दिसंतर गयऊ॥

 

जो कोइ जाइ एक बेर माँगा । जनम न भा पुनि भूखा नागा॥

 

दस असमेधा जगत जेइ कीन्हा । दान-पुन्य सरि सौंह न दीन्हा॥

 

ऐस दानि जग उपजा सेरसाहि सुलतान।

 

ना अस भयउ न होइहि, ना कोइ देइ अस दान॥17॥

 

सैयद असरफ पीर पियारा । जेहि मोहि पंथ दीन्ह उँजियारा॥

 

लेसा हियें प्रेम कर दीया । उठी जोत भा निरमल हीया॥

 

मारग हुत ऍंधिायार जो सूझा । भा ऍंजोर, सब जाना बूझा॥

 

खार समुद्र पाप मोर मेला । बोहित-धारम लीन्ह कै चेला॥

 

उन्ह मोर कर बूड़त कै गहा । पायों तीर घाट जो अहा॥

 

जाकहँ ऐस होइ कंधाारा । तुरत बेगि सो पावै पारा॥

 

दस्तगीर गाढ़े कै साथी । वह अवगाह दीन्ह तेहि हाथी॥

 

जहाँगीर वै चिस्ती निहकलंक जस चाँद।

 

वे मखदूम जगत के, हौं ओहि घर कै बाँद॥18॥

 

ओहि घर रतन एक निरमरा । हाजी सेख सबै गुन भरा॥

 

तेहि घर दुइ दीपक उजियारे । पंथ देई कहँ दैव सँवारे॥

 

सेख मुहम्मद पून्यो करा । सेख कमाल जगत निरमरा॥

 

दुऔ अचल धा्रुव डोलहिं नाहीं । मेरु खिखिंद तिन्हहुँ उपराहीं॥

 

दीन्ह रूप औ जोति गोसाईं । कीन्ह खंभ दुइ जग के ताईं॥

 

दुहूँ खंभ टेके सब मही । दुहुँ के भार सिहिटि थिर रही॥

 

जेहि दरसे औ परसे पाया । पाप हरा, निरमल भइ काया॥

 

मुहमद तेइ निचिंत पथ जेहि सँग मुरसिद पीर।

 

जैहिके नाव औ खेवक बेगि लागि सौ तीर॥19॥

 

गुरु मोहदी खेवक मैं सेवा । जलै उताइल जेहि कर खेवा॥

 

अगुवा भएउ सेख बुरहानू । पंथ लाइ मोहि दीन्ह गियानू॥

 

अलहदाद भल तेहि कर गुरू । दीन दुनी रोसन सुरखुरू॥

 

सैयद मुहमद कै वै चेला । सिध्द-पुरुष-संगम जेहि खेला॥

 

दानियाल गुरु पंथ लखाए । हजरत ख्वाज खिजिर तेहि पाए॥

 

भए प्रसन्न ओहि हजरत ख्वाजे । लिए मेरइ जहँ सैयद राजे॥

 

औहि सेवत मैं पाई करनी । उघरी जीभ, प्रेम कवि वरनी॥

 

वै सुगुरू, हो चेला, नित बिनबौं भा चेर।

 

उन्ह हुत देखै पायउँ दरस गोसाईं केर॥20॥

 

एक नयन कवि मुहमद गुनी। सोइ विमोहा जेहि कवि सुनी॥

 

चाँद जँस जग विधिा औतारा। दीन्ह कलंक, कीन्ह उजियारा॥

 

जग सूझा एकै नयनाहाँ। उआ सूक जस नखतन्ह माहाँ॥

 

जौ लहि अंवहि डाभ न होई। तौ लहि सुगंधा बसाइ न सोई॥

 

कीन्ह समुद्र पानि जो खारा। तौ अति भयउ असूझ अपारा॥

 

जौ सुमेरु तिरसूल बिनासा। भा कंचन गिरि लाग अकासा॥

 

एक नयन जस दरपन, औ निरमल तेहि भाउ।

 

सब रुपवंतइ पाउँ गहि मुख जोहहिं के चाउ॥21॥

 

चारि मीत कवि मुहमद पाए । जोरि मिताई सिर पहुँचाए॥

 

यूसुफ मलिक पँडित बहु ज्ञानी । पहिलै भेद बात वै जानी॥

 

पुनि सलार कादिम मतिमाहाँ । खाँडे दान उभै निति बाहाँ॥

 

मियाँ सलोने सिंघ बरियारू । बीर खेतरन खड़ग जुझारू॥

 

सेख बड़े, बड़ सिध्द बखाना । किए आदेस सिध्द बड़ माना॥

 

चारिउ चतुरदसा गुन पढ़े । औ संजोग गोसाईं गढ़े॥

 

बिरिछ होइ जौ चंदन पासा । चंदन होइ बेधिा तेहि बासा॥

 

मुहमद चारिउ मीत मिलि भए जो एकै चित्ता।

 

एहि जग साथ जो निबहा, ओहि जग बिछुरन कित्ता॥22॥

 

जायस नगर धारम अस्थानू। तहाँ आइ कवि कीन्ह बखानू॥

 

औ बिनती पँडितन सन भजा। टूट सँवारहु, नेरवहु सजा॥

 

हौं पंडितन केर पछलगा । किछु कहि चला तबल देइ डगा॥

 

हिय भँडार नग अहै जो पूँजी । खोली जीभ तारु कै कूँजी॥

 

रतन पदारथ बोल जो बोला । सुरस प्रेम मधाु भरा अमोला॥

 

जेहि के बोल बिरह कै घाया । कहँ तेहि भूख कहाँ तेहि माया॥

 

फेरे भेख रहै भा तपाँ । धाूरि लपेटा मानिक छपा॥

 

मुहमद कवि जौ बिरह भा ना तन रकत न माँसु।

 

जेइ मुख देखा तेइ हँसा, सुनि तेहि आयउ ऑंसु॥23॥

 

सन नव सै सत्तााइस अहा । कथा अरंभ बैन कवि कहा॥

 

सिंघलदीप पदमिनी रानी । रतनसेन चितउर गढ़ आनी॥

 

अलउदीन देहली सुलतानू । राघौ चेतन कीन्ह बखानू॥

 

सुना साहि गढ़ छेंका आई । हिंदू तुरकन्ह भई लराई॥

 

आदि अंत जस गाथा अहै । लिखि भाखा चौपाई कहै॥

 

कवि बियास कँवला रस पूरी । दूरि सो नियर, नियर सो दूरी॥

 

नियरे दूर फूल जस काँटा । दूरि जो नियरे, जस गुड़ चाँटा।

 

भँवर आइ बनख्रड सन लेइ कँवल कै बास।

 

दादुर बास न पावई भलहि जो आछै पास॥24॥

 

(1)उरेहा=चित्राकारी। सीउ=शीत। कीन्हेसि…कैलासू=उसी ज्योति अर्थात् पैगबर मुहम्मद की प्रीति के कारण स्वर्ग की सृष्टि की (कुरान की आयत)। कैलासू=स्वर्ग, बिहिश्त। इस शब्द का प्रयोग जायसी ने बराबर इसी अर्थ में किया है।

 

(2) खिखिंद=किष्ंकिधाा। निरमरे=निर्मल। साउज=वे जानवर जिनका शिकार किया जाता है। आरन=अरण्य। (2) बाज=बिना (सं. वर्ज्य)। जैसे, दीन दुख दारिद दलै को कृपा बारिधिा बाज?-तुलसी।

 

(3) बेना=खस। भीमसेन, चीना=कपूर के भेद। लोवा=लोमड़ी। इंदुर=चूहा। चाँटी=चींटी। भोकस=दानव। सहस अठारह=अठारह हजार प्रकार के जीव (इसलासी किताबों के अनुसार)।

 

(4) भूजहिं=भागते हैं। बरियार=बलवान।

 

(5)उपाई=उत्पन्न की। आसहर=निराशा। सबै नास्ति वह अहथिर, ऐस साजजेहि केर।

 

(6)भाँजै=भंजन करता है, नष्ट करता है।

 

(7)सिरजना=रचना।

 

(8) बेहरा=अलग (बिहरना=फटना)।

 

(9) बाजा=पड़ा है।

 

(10) खेह=धाूल, मिट्टी। रेह=राख, क्षार। दुनियाई=दुनिया में। बाउर=बावला। अनेग=अनेक।

 

(11) पूनौ करा=पूर्णिमा की कला। प्रथम उपराजी=कुरान में लिखा है कि यह संसार मुहम्मद के लिए रचा गया, मुहम्मद न होते तो यह दुनिया न होती। जगत्बसीठ=संसार में ईश्वर का संदेसा लानेवाला, पैगंबर। लेख जोख=कर्मों का हिसाब। दूसरे ठाँव…वै लिखे=ईश्वर ने मुहम्मद को दूसरे स्थान पर लिखा अर्थात् अपने से दूसरा दरजा दिया। पाढ़त=पढ़ंत, मंत्रा, आयत।

 

(12) सिदिक=सच्चा। दीन=धार्म, मत। बाना=रीति, ढंग। संधाान=खोज, उद्देश्य, लक्ष्य।

 

(13) छात=छत्रा। पाट=सिंहासन। सूर=शेरशाह सूर जाति का पठान था। जुलकरन=जुलकरनैन, सिकंदर की एक अरबी उपाधिा जिसका अर्थ लोग भिन्न-भिन्न प्रकार से करते हैं। कोई दो सींगवाला अर्थ करते हैं और कहते हैं कि सिकंदर यूनानी (यवन) प्रथा के अनुसार दो सीेंगवाली टोपी पहनता था, कोई पूर्व और पश्चिमी दोनों कोनों को जीतने वाला, कोई बीस वर्ष राज्य करने वाला और कोई दो उच्च ग्रहों से युक्त अर्थात् भाग्यवान् अर्थ करते हैं।

 

(14) काँदौ=कर्दम, कीचड़।

 

(15) अहा=था। भई अहा=वाह वाह हुई। नाथ=नाक में पहनने की नथ। पारा=सकता है। निनारा=अलग-अलग(निर्णय)।

 

(16) मुख चाहा=मुँह देखता है। आगर=अय, बढ़कर। चाहि=अपेक्षाकृत (बढ़कर)। करा=कला। ससि चौदसि=पूर्णिमा (मुसलमान प्रथम चंद्रदर्शन अर्थात् द्वितीया से तिथि गिनते हैं, इससे पूर्णिमा को उनकीचौदहवीं तिथि पड़ती है।)

 

(17) डाँक=डंका॥ सौंह न दीन्हा=सामना न किया।

 

(18) लेसा=जलाया।कंधाार=कर्णधाार, केवट। हाथी दीन्ह=हाथ दिया, बाँह का सहारा दिया। ऍंजोर=उजाला। खिखिंद=किष्किंधपर्वत।

 

(19) खेवक=खेनेवाला, मल्लाह।

 

(20) खेवा=नाव का बोझ। सुरखुरू=सुर्खरू, मुख पर तेज धाारण करने वाले। उताइल=जल्दी। मेरइ लिए=मिला लिया। सैयद राजे=सैयद राजा हामिद शाह। उन्ह हुत=उनके द्वारा (प्रा. हितो)।

 

(21) नयनाहाँ=नयन से, ऑंख से। डाभ=आम के फल के मुँह पर का तीखा चेप। चोपी।

 

(22) मतिमाहाँ=मतिमान्। उभै=उठती है। जुझारू=योध्दा। चतुरदसा गुन=चौदह विद्याएँ।

 

(23)विनती भजा=विनती की (करता हूँ)। टूट=त्राटि, भूल। डगा=डुग्गी बजाने की लकड़ी। तारु=(क) तालू। (ख) ताला। कूँजी=कुँजी। फेरे भेष=वेष बदलते हुए। तपा=तपस्वी। (24) आछै=हैं। जैसे-कह कबीर कछु अछिलो न जहिया।

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