कविता -राजा-बादशाह-मेल खंड, बादशाह भोज खंड, चित्तौरगढ़-वर्णन खंड, पद्मावती-नागमती-विलाप खंड, रत्नसेन-बंधन खंड- (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

RamChandraShukla_243172सुना साह अरदासैं पढ़ीं । चिंता आन आनि चित चढ़ी॥

तौ अगमन मन चीतै कोई । जौ आपन चीता किछु होई॥

 

मन झूठा, जिउ हाथ पराए । चिंता एक हिए दुइ ठाएँ॥

 

गढ़ सौं अरुझि जाइ तब छूटै । होइ मेराव, कि सो गढ़ टूटै॥

 

पाहन कर रिपु पाहन हीरा । बेधाौं रतन पान देइ बीरा॥

 

सुरजा सेंति कहा यह भेऊ । पलटि जाहु अब मानहु सेऊ॥

 

कहु तोहि सौं पदमावति नहिं लेऊँ । चूरा कीन्ह छाँड़ि गढ़ देऊँ॥

 

आपन देस खाहु सब, और चंदेरी लेहु।

 

समुद जो समदन कीन्ह तोहि ते पाँचौ नग देहु॥1॥

 

सुरजा पलटि सिंह चढ़ि गाजा । आज्ञा जाइ कही जहँ राजा॥

 

अबहूँ हिये समुझ रे राजा । बादसाह सौ जूझ न छाजा॥

 

जेहि कै देहरी पृथिवी सेई । चहै तौ मारै औ जिउ लेई॥

 

पिंजर माहँ ओहि कीन्ह परेवा । गढ़पति सोइ बाँच कै सेवा॥

 

जौ लगि जीभ अहै मुख तोरे । सँवरि उघेलु विनय कर जोरे॥

 

पुनि जो जीभ पकरि जिउ लेई । को खोलै, को बोलै देई?॥

 

आगे जस हमीर मैमंता । जौ तस करसि तोरे भा अंता॥

 

देखु! काल्हि गढ़ टूटे, राज ओहि कर होइ।

 

कर सेवा सिर नाइ कै, घर न घालु बुधिा खोइ॥2॥

 

सरजा! जौ हमीर अस ताका । ओर निबाहि बाँधिा गा साका॥

 

हौं सकबंधाी ओहि अस नाहीं । हौं सौ भोज विक्रम उपराहीं॥

 

बरिस साठ लगि साँठि न खाँगा । पानि पहार चुवै बिनु माँगा॥

 

तेहि ऊपर जौ पै गढ़ टूटा । सत सकबंधाी केर न छूटा॥

 

सोरह लाख कुँवर हैं मोरे । परहिं पतँग जस दीप ऍंजोरे॥

 

जहिं दिन चाँचरि चाहौं जोरी । समदौं फागु लाइ कै होरी॥

 

जौ निसि बीच, डरै नहिं कोई । देखु तौकाल्हि काह दहुँ होई1॥

 

अबहीं जौहर साजि कै, कीन्ह चहौं उजियार।

 

होरी खेलौं रन कठिन, कोइ समेटै छार॥3॥

 

अनु राजा सो जरै निआना । बादशाह कै सेब न माना॥

 

बहुतन्ह अस गढ़ कीन्ह सजवना । अंत भई लंका जस रवना॥

 

जेहि दिन वह छेंकै गढ़ घाटी । होइ अन्न ओही दिन माटी॥

 

तू जानसि जल चुवै पहारू । सो रोवै मन सँवरि सँघारू॥

 

सूतहि सूत सँवरि गढ़ रोवा । कस होइहि जौ होइहि ढोवा॥

 

सँवरि पहार सो ढारै ऑंसू । पै तोहि सूझ न आपन नासू॥

 

आजु काल्हि चाहै गढ़ टूटा । अबहुँ मानु जौ चाहसि छूटा॥

 

हैं जो पाँच नग पहँ, लेइ पाँचों कहँ भेंट।

 

मकु सो एक गुन मानै, सब ऐगुन धारि मेट॥4॥

 

अनु सरजा को मेटै पारा । बादसाह बड़ अहै तुम्हारा॥

 

ऐगुन मेटि सकै पुनि सोई । औ जो कीन्ह चहै सो होई॥

 

नग पाँचों देइ देउँ भँडारा । इसकंदर सौं बाँचै दारा॥

 

जो यह वचन त माथे मोरे । सेवा करौं ठाढ़ कर जोरे॥

 

पै बिनु सपथ न अस मन माना । सपथ बोल बाचा परवाना॥

 

खंभ जो गरुअ लीन्ह जग भारू । तेहि क बोल नहिं टरै पहारू॥

 

नाव जो माँझभार हुँत गीवा । सरजै कहा मंद वह जीवा॥

 

सरजै सपथ कीन्ह छल, बैनहि मीठै मीठ।

 

राजा कर मन माना, माना तुरत बसीठ॥5॥

 

हंस कनक पींजर हुँत आना । औ अमृत नग परस पखाना॥

 

औ सोनहार सोन केडाँड़ी । सारदूल रूप के काँड़ी॥

 

सो बसीठ सरजालेइ आवा । बादसाह कहँ आनि मेरावा॥

 

ए जगसूर भूमि उजियारे । बिनती करहिं काग मसि कारे॥

 

बड़ परताप तोर जग तपा । नवौ खंड तोहि को नहिं छपा॥

 

कोह छोह दूनौ तोहि पाहाँ । मारसि धाूप, जियावसि छाहाँ॥

 

जो मन सूर चाँद सौं रूसा । गहन गरासा, परा मँजूसा॥

 

भोर होइ जौ लागै, उठहिं रोर कै काग।

 

मसि छूटै सब रैनि कै, कागहि केर अभाग॥6॥

 

करि बिनती अज्ञा अस पाई । ‘कागहु कै मसि आपुहि लाई॥

 

पहिलेहि धानुष नवै जब लागै । काग न टिकै, देखि सर भागै॥

 

अबहूँ ते सर सौहैं होहीं । देखैं धानुक चलहिं फिर त्योंहीं॥

 

तिन्ह कागन कै कौन बसीठी । जो मुख फरि चलहिं देइ पीठी॥

 

जो सर सौंह होहिं संग्रामा । कित बग होहिं सेत वै सामा?॥

 

करै न आपन ऊजर केसा । फिरि फिरि कहै परार सँदेसा॥

 

काग नाग ए दूनौ बाँके । अपने चलत साम वै ऑंके॥

 

कैसेहु जाइ न मेटा, भयउ साम तिन्ह अंग।

 

सहस बार जौ धाोवा, तबहुँ न गा वह रंग॥7॥

 

अब सेवा जो आइ जोहारे । अबहूँ देखु सेत की कारे॥

 

कहौ जाइ जौ साँच, न डरना । जहवाँ सरन नाहि तहँ मरना॥

 

काल्हि आव गढ़ऊपर भानू । जो रे धानुक, सौंह होइ बानूँ॥

 

पान बसीठ मया करि पावा । लीन्ह पान, राजा पहँ आवा॥

 

जस हम भेंट कीन्ह गा कोहू । सेवा माँझ प्रीति औ छोहू॥

 

काल्हि साह गढ़ देखैआवा । सेवा करहु जैस मन भावा॥

 

गुन सौं चलै जो बोहित बोझा । जहँवाँ धानुक बान तह सोझा॥

 

भा आयसु अस राजघर, बेगि दै करहु रसोइ।

 

ऐस सुरस रस मेरवहु, जेहि सौं प्रीति रस होइ॥8॥

 

(1) चीतै=सोचे, विचारे। चिंता एक…ठाएँ=एक हृदय में दो ओर की चिंता लगी। गढ़ सौं…टूटै=बादशाह सोचता है कि गढ़ लेने में जब उलझ गए हैं तब उससे तभी छूट सकते हैं जब या तो मेल हो जाय या गढ़ टूटे। पाहन कर रिपु…हीरा=हीरे पत्थर का शत्राु हीरा पत्थर ही होता है अर्थात् हीरा हीरे से ही कटता है। पान देइ बीरा=ऊपर से मेल करके। मानहु सेऊ=आज्ञा मानो। चूरा कीन्ह=एक प्रकार से तोड़ा हुआ गढ़। खाहु=भोग करो। समदन कीन्ह=विदा के समय भेंट में दिए थे।

 

(2) उघेलु=निकाल। हमीर=रनथंभौर का राजा, हम्मीरदेव जो अलाउद्दीन से लड़कर मारा गया था। तस=वैसा। घर न घालु=अपना घर न बिगाड़।

 

(3) ताका=ऐसा विचारा। साँठि=सामान। खाँगा=कम होगा। समदौं=विदा के समय का मिलना मिलूँ। जो निसि बीच…दहुँ होई=(सरजा ने जो कहा था कि ‘देखु काल्हि गढ़ टूटै’ इसके उत्तार में राजा कहता है कि) यदि रात बीच में पड़ती है (अभी रात भर का समय है) तो कोई डर की बात नहीं; देख तो कल क्या होता है?

 

(4) अनु=फिर। सजवना=तैयारी। रवना=रावण। अन्न माटी होइ=खाना- पीना हराम हो जायेगा। सँघारू=संहार, नाश। ढोवा=लूट। मकु सो एक गुन…मेट=शायद वह तुम्हारे इस एक ही गुण से सब अवगुणों का भूल जाय।

 

1. पाठांतर-‘देइकै घरनि जो राखै जीऊ। सो कस आपुहि कहि सक पीऊ’॥

 

(5) को मेटै पारा=इस बात को कौन मिटा सकता है कि। भँडारा=भंडार से। जौ यह वचन=जो बादशाह का इतना ही कहना है तो मेरे सिर माथे पर है। वाचा परवाना=बचन का प्रमाणहै।नावजो माँझ…गीवा=जो किसी बात का बोझ अपने ऊपर लेकर बीच में गरदन हटाता है। छल=छल से। बसीठ माना=सुलह का संदेश मान लिया।

 

(6) सोनहार=समुद्र का पक्षी। डाँड़ी=अव। काँड़ी=पिंजरा (?)। बिनती करहिं काग मसि कारे=हे सूर्य! कौए विनती करते हैं कि उनकी कालिमा (दोष,अवगुण)दूर कर दे अर्थात् राजा के दोष क्षमा कर। कोह=क्रोधा। छोह=दया, अनुग्रह। धाूप=धाूप से। छाहाँ=छाँह में, अपनी छाया में। परा मँजूसा=झाबे में पड़ गया अर्थात् घिर गया। कागहि केर अभाग=कौए का ही अभाग्य है कि उसकी कालिमा न छूटी।

 

(7) कागहु कै मसि…लाई=कौए की स्याही तुम्हीं ने लगा ली है (छल करके), वे कौए नहीं हैं क्योंकि…। पहिलेहि…भागै=जो कौआ होता है वह ज्योंही धानुष खींचा जाता है, भाग जाता है। अबहूँ…होहीं=वे तो अब भी यदि उनके सामने बाण किया जाय तो तुरत लड़ने के लिए फिर पड़ेंगे, धानुक=(क) युध्द के लिए चढ़ी कमान, (ख) टेढ़ापन, कुटिलता। सर=(क) शर, तीर; (ख) ताल, सरोवर। जोर सर…सामा=जो लड़ाई में तीर के सामने आते हैं वे श्वेत बगुले काले (कौए) कैसे हो सकते हैं? करै न आपन…सँदेसा=तू अपने को शुध्द और उज्ज्वल नहीं करता; केवल कौओं की तरह इधार का उधार सँदेसा कहता है (कवि लोग नायिकाओं का कौए से सँदेसा कहना वर्णन करते हैं)। अपने चलत…ऑंके=वे एक बात पर दृढ़ करते हैं और सदा वही कालिमा ही प्रकट करते हैं, पर तू अपने को और का और प्रकट करके छल करता है।

 

(8) अब सेवा…जोहारे=उन्होंने मेल कर लिया है, तू अब भी देख सकता है कि श्वेत हैं या काले अर्थात् वे छल नहीं करेंगे। जोरे धानुक…बानू=जो अब वह किले में मेरे जाने पर किसी प्रकार की कुटिलता करेगा तो उसके सामने फिर बाण होगा (धानुष टेढ़ा होता है और बाण सीधाा)। गुन=गून, रस्सी। जहँवा धानुक…सोझा=जहाँ कुटिलता हुई कि सामने सीधाा बाण तैयार है।

 

 

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छागर मेढ़ा बड़ औ छोटे । धारि धारि आने जहँ लगि मोटे॥

 

हरिन, रोझ, लगना बन बसे । चीतर गोइन, झाँख औ ससे॥

 

तीतर, बटई, लवा न बाँचे । सारस, कूज, पुछार जो नाचे॥

 

धारे परेवा पंडुक हेरी । खेहा, गुड़रू और बगेरी॥

 

हारिल, चरग, चाह बँदि परे । बन कुक्कुट, जल कुक्कुट धारे॥

 

चकई चकवा और पिदारे । नकटा, लेदी, सोन सलारे॥

 

मोट बड़े सो टोइ टोइ धारे । ऊबर दूबर खुरुक न चरे॥

 

कंठ परी जब छूरी, रकत ढुरा होइ ऑंसु।

 

कित आपन तन पोखा, भखा परावा माँसु?॥1॥

 

धारे माछ पढ़िना औ रोहू । धाीमर मारत करै न छोहू॥

 

सिधारी, सौरि, धारी जल गाढ़े । टेंगर टोइ टोइ सब काढ़े॥

 

सींगी भाकुर बिनि सब धारी । पथरी बहुत बाँब बनगरी॥

 

मारे चरख औ चाल्ह पियासी । जल तजि कहाँ जाहि जलबासी?॥

 

मन होइ मीन चरा सुख चारा । परा जाल को दुख निरुवारा?॥

 

माँटी खाय मच्छ नहिं बाँचे । बाँचहिं काह भोग सुख राँचे?॥

 

मारै कहँ सब आस कै पाले । को उबार तेहि सरवर घाले?॥

 

एहि दुख काँटहिं सारि कै, रकत न राखा देह।

 

पंथ भुलाइ आइ जल बाझे, झूठे जगत सनेह॥2॥

 

देखत गोहूँ कर हिय फाटा । आने तहाँ होब जहँ आटा॥

 

तब पीसे जब पहिले धाोए । कपरछानि माँड़े, भल पोए॥

 

चढ़ी कराही, पाकहिं पूरी । मुख महँ परत होहि सो चूरी॥

 

जानहुँ तपत सेत औ उजरी । नैनू चाहि अधिाक वै कोंवरी॥

 

मुख मेलत खनजाहिं बिलाई । सहस सवाद सो पाव जो खाई॥

 

लुचुई पोइ पोइ घिउ मेई । पाछे छाति खाँड़ रस मेई॥

 

पूरि सोहारी कर घिर चूआ । छुवत बिलाइ, डरन्ह को छूआ?॥

 

कही न जाहिं मिठाई, कहत मीठ सुठि बात।

 

खात अघात न कोई, हियरा जात सेरात॥3॥

 

चढ़े जो चाउर बरनि न जाहीं । बरन बरन सब सुगँधा बसाहीं॥

 

रायभोग औ काजर रानी । झिनवा, रुदवा, दाउदखानी॥

 

बासमती, कजरी, रतनारी । मधाुकर, ढेला, झीनासारी॥

 

घिउकाँदौ औ कुँवरबिलासू । रामबास आवै अति बासू॥

 

लौंगचूर लाची अति बाँके । सोनखरीका कपुरा पाके॥

 

कोरहन, बड़हन, जड़हन मिला । औ संसारतिलक ख्रड़बिला॥

 

धानिया देवल और अजाना । कहँ लगि बरनौं जावत धााना॥

 

सोंधो सहस बरन अस, सुगँधा बासना छूटि।

 

मधाुकर पुहुप जो बन रहे, आइ परे सब टूटि॥4॥

 

निरमल माँसु अनूप बघारा । तेहि के अब बरनौं परकारा॥

 

कटुवा, बटुवा मिला सुबासू । सीझा अनबन भाँति गरासू॥

 

बहुतै सोंधो घिउ महँ तरे । कस्तूरी केसर सौं भरे॥

 

सेंधाा लोन परा सब हाँड़ी । काटी कंदमूर कै आड़ी॥

 

सोआ सौफ उतारे घना । तिन्ह तें अधिाक आव बासना॥

 

पानि उतारहिं तावहिं ताका । घीउ परेह माहिं सब पाका॥

 

औ लीन्हें माँसुन्ह के खंडा । लागे चुरै सो बड़ बड़ हंडा॥

 

छागर बहुत समूची, धारी सरागन्ह भूँजि।

 

जो अस जेंवन जेंवै, उठै सिंघ अस गूँजि॥5॥

 

भूँजि समोसा घिउ महँ काढ़े । लौंग मरिच जिन्ह भीतर ठाढ़े॥

 

और माँसु जो अनबन बाँटा । भए फर फूल, आम औ भाँटा॥

 

नारँग, दारिउँ, तुरँज,जँभीरा । औ हिंदवाना, बालमखीरा॥

 

कटहर बड़हर तेउ सँवारे । नरियर, दाख, खजूर छोहारे॥

 

औ जावतजो खजहजा होहीं । जो जेहि बरन सवाद सो ओहीं॥

 

सिरका भेइ काढ़ि जनु आने । कँवल जो कीन्ह रहे बिगसाने॥

 

कीन्ह मसेवरा, सीझि रसोई । जो किछु सबै माँसु सौं होई॥

 

बारी आइ पुकारेसि, लीन्ह सबै करि छूँछ।

 

सब रस लीन्ह रसोई, को अब मोकहँ पूछ॥6॥

 

काटे माछ मेलि दधिा धाोए । औ पखारि बहु बार निचोए॥

 

करुए तेल कीन्ह बसवारू । मेथी कर तब दीन्ह बघारू॥

 

जुगुति जुगुति सब माँछ बघारे । आम चोरि तिन्ह माँझ उतारे॥

 

औ परेह तिन्ह चुटपुट राखा । सो रस सुरस पाव जो चाखा॥

 

भाँति भाँति सब खाँड़र तरे । अंडा तरि तरि बेहर धारे॥

 

घीउ टाँक महँ सोंधा सेरावा । लौंग मरिच तेहि ऊपर नावा॥

 

कुहुँकुहुँ परा कपूर बसावा । नख तें बघारि कीन्ह अरदावा॥

 

घिरित परेह रहा तस, हाथ पहुँच लगि बूड़।

 

बिरिधा खाइ नवजोबन, सौ तिरिया सौं ऊड़॥7॥

 

भाँति भाँति सीझीं तरकारी । कइउ भाँति कोहँड़न कै फारी॥

 

बने आनि लौआ परबती । रयता कीन्ह काटि रति रती॥

 

चूक लाइ कै रींधोभाँटा । अरुई कहँ भल अरहन बाँटा॥

 

तोरई, चिचिड़ा, डेंड़सी तरी । जीर धाुँगार झार सब भरी॥

 

परवर कुँदरू भूँजे ठाढ़े । बहुतै घिउ महँ चुरमुर काढ़े॥

 

करुई काढ़ि करैला काटे । आदी मेलि तरे कै खाटे॥

 

रींधो ठढ़ सेब के फारा । छौंकि साग पुनि सोंधा उतारा॥

 

सीझीं सब तरकारी, भा जेंवन सब ऊँच।

 

दहुँ का रुचै साह कहँ, केहि पर दिस्टि पहूँच॥8॥

 

घिउ कराह भरि, बेगर धारा । भाँति भाँति के पाकहिं बरा॥

 

एक त आदी मरिच सौं पीठा । दूसर दूधा खाँड़ सौं मीठा॥

 

भई मुँगौछी मरिचैं परी । कीन्ह मुँगौरा औ बहु बरी॥

 

भई मेथौरी, सिरका परा । सोंठि नाइ कै खरसा धारा॥

 

माठा महि महियाउर नावा । भीज बरा नैनू जनु खावा॥

 

खंडै कीन्ह आमचुर परा । लौंग लायची सौं ख्रड़बरा॥

 

कढ़ी सँवारी और फुलौरी । औ ख्रड़वानी लाइ बरौरी॥

 

रिकवँच कीन्हि नाइ कै, हींग मरिच औ आद।

 

एक खंड जौ खाइ तौ, पावै सहस सवाद॥9॥

 

तहरी पाकि, लौंग औ गरी । परी चिरौंजी औ खरहरी॥

 

घिउ महँ भूँजि पकाए पेठा । औ अमृत गुरंब भरे मेटा॥

 

चुंबक लोहँड़ा, औटा खोवा । भा हलुवा घिउ गरत निचोवा॥

 

सिखरन सोंधा छनाई गाढ़ी । जामी दूधा दही कै साढ़ी॥

 

दूधा दही के मुरंडा बाँधो । और सँधााने अनबन साधो॥

 

भइ जो मिठाई कही न जाई । मुख मेलत खन जाइ बिलाई॥

 

मोतीचूर, छाल औ ठोरी । माठ, पिराकैं और बुँदौरी॥

 

फेरी पापर भूँजे, भा अनेक परकार।

 

भइ जाउरि पछियाउरि, सीझी सब जेवनार॥10॥

 

जत परकार रसोइ बखानी । तत सब भई पानि सौं सानी॥

 

पानी मूल परिख जौ कोई । पानी बिना सवाद न होई॥

 

अमृत पान सह अमृत आना । पानी सौं घट रहै पराना॥

 

पानी दूधा औ पानी घीऊ । पानि घटै, घट रहै न जीऊ॥

 

पानी माँझ समानी जोती । पानिहि उपजै मानिक मोती॥

 

पानिहि सौं सब निरमल कला । पानी छुए होइ निरमला॥

 

सो पानी मन गरब न करई । सीस नाइ खाले पग धारई॥

 

मुहमद नीर गँभीर जो, भरे सो मिले समुंद।

 

भरै ते भारी हाइ रहे, छूँछे बाजहिं दुंद॥11॥

 

(1) रोझ=नीलगाय। लगना=एक वनमृग। चीतर=चित्रामृग। गोइन=कोई मृग। (?)। झाँख=एक

प्रकार का बड़ा जंगली हिरन; जैसे-ठाढ़े ढिग बाघ, बिग, चिते चितवत झाँख मृग शाखामृग

सब रीझि-रीझि रहे हैं।-देव! पसे=खरहे। पुछार=पोर। खेहा=केहा, बटेर की तरह की एक

चिड़िया। गुड़रू=कोई पक्षी। बगेरी=भरद्वाज, भरुही। चरग=बाज की जाति की एक

चिड़िया। चाह=चाहा नामक जलपक्षी। पिदारे=पिद्दे। नकटा=एक छोटी चिड़िया। सोन,

सलारे=कोई पक्षी। खुरुक=खटका।

 

(2) पढ़िना=पाठीन मछली, पहिना। रोहू, सिधारी, सौरी, टेंगरा, सींगी, भाकुर, मथरी, बनगरी, चरख, पियासी=मछलियों के नाम। बाँब=बाम मछली जो देखने में साँप की तरह लगती है। चाल्ह=चेल्हवा मछली। निरुवारा=छुड़ाए। राँचे=अनुरक्त, लिप्त। तेहि सरवर घाले=उस सरोवर में पड़े हुए को कौन बचा सकता है (जीवपक्ष में संसार सागर में पड़े हुए का कौन उध्दार कर सकता है)। एहि दुख…देह=इसी दु:ख से तो मछली ने शरीर में काँटे लगाकर रक्त नहीं रखा।

 

(3) तपत=जलती हुई, गरम गरम। नैनू=नवनीत, मक्खन। कोंवरी=कोमल। घिउ मेई=घी का मोयन दी हुई। कहत मीठ…बात=उनके नाम लेने से मुँह मीठा हो जाता है।

 

(4) काजर रानी=रानी काजल नाम का चावल। रायभोग, झिनवा, रुदवा, दाउदखानी, बासमती, कजरी, मधाुकर, ढेला, झीनासारी, घिउकाँदो, कुँवर बिलास, रामबास, लवँगचूर, लाची, सोनखरिका, कपूरी, संसारतिलक, ख्रड़बिला, धानिया, देवल=चावलों के नाम। पुहुप=फूलों पर।

 

(5) कटुवा=खंड खंड कटा हुआ। बटुवा=सिल पर बटा या पिसा हुआ। अनबन=विविधा, अनेक। गरासू=ग्रास, कौर। तरे=तले हुए। आड़ी=अंटी, गाँठ। तावहिं ताका=ताव देखते हैं। परेह=रसा,शोरबा। सरागन्ह=सीखचों पर, शलाकाओं पर। गूँजि उठै=गरज उठे।

 

(6) ठाढ़े=खड़ी, समूची। भए फर…भाँटा=मांस ही अनेक प्रकार के फलफूल के रूप में बना है। हिंदबाना=तरबूज, कलींदा। बालमखीरा=खीरे की एक जाति। खजहजा=खाने के फल। सिरका भेइ…आने=मानो सिरके में भिगोए हुए फल समूचे लाकर रखे गए हैं (सिरके में पड़े हुए फल ज्यों के त्यों रहते हैं)।मसेवरा=मांस की बनी चीजें। सीझि=पकी, सिध्द हुई। बारी=काछी या माली। बारी आइ…छूँछ=माली ने पुकार मचाई कि मेरे यहाँ जो फलफूल थे सब तो मुझे खाली करके ले लिये गए अर्थात् वे सब मांस ही के बना लिये गए।

 

(7) पखारि=धाोकर। बसवारू=छौंक। परेह=रसा। चुटपुट=चुटपुटा। खाँड़र=कतले। तरि=तलकर। बेहर=अलग। टाँक=बरतन, कटोरा। सेरावा=ठंडा किया। नख=एक गंधाद्रव्य। अरदावा=कुचला या भुरता। पहुँच लगि=पहुँचा या कलाई तक। ऊड़=विवाह करे या रखे (ऊढ़)।

 

(8) फारी=फाल, टुकड़े। लौआ=घीया, कद्दू। रयता=रायता। रति-रती=महीन-महीन। चूक=खटाई। रींधो=पकाए। अरहन=चने की पिसी दाल जो तरकारी में पकाते समय डाली जाती है; रेहन। बाटा=पीसा। डेंड़सी=कुम्हड़े की तरह की एक तरकारी, टिंड (टिंडिस)। तरी=तली। धाुँगार=छौंक। चुरमुर=कुरकुरे। करुई काढ़ि=कड़घवापन निकालकर (नमक-हल्दी के साथ मलकर)। कै खाटे=खट्टे करके। फारा=फाल, टुकड़े।

 

(9) बेगर=उर्द या मूँग का रवादार आटा, धाुवाँस। बरा=बड़ा। पीठा=पीसा गया। मुँगौछी=मूँग का एक पकवान। मुँगौरा=मूँग की पकौड़ी। मेथौरी=एक प्रकार की बड़ी। खरसा=एक पकवान। महियाउर=मट्ठे में पका चावल। नैनू=नवनीत, मक्खन। बरौरी=बड़ी। रिकवँच=अरुई या कच्चू के पत्तो पीठी में लपेटकर बनाए हुए बड़े। आद=अदरक।

 

(10) तहरी=बड़ी और हरी मटर के दानों की खिचड़ी। खरहरी=खरिक, छुहारा। गुरंब=शीशे में रखे हुए आम। मेटा=मिट्टी के बरतन, मटके। लोहँड़ा=लोहे का तसला। मुरंडा=पानी निथारकर पिंडाकार बँधाा दही या छैना। सँधााने=अचार। छाल=एक मिठाई। ठोरी=ठोर। पिराकैं=गोझिया। बुँदौरी=बुँदिया। पछियाउर=मट्ठे में भिगोई बुँदिया। सीझी=सिध्द हुई, पकी।

 

(11) जत=जितनी। तत=उतनी। पानी मूल…कोई=जो कोई विचार कर देखे तो पानी ही सबका मूल है। अमृत पान=अमृतपान के लिए। दुंद=ठक-ठक।

 

 

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जेवाँ साह जो भयउ बिहाना । गढ़ देखै गवना सुलताना॥

 

कवँल सहाय सूर सँग लीन्हा । राघवचेतन आगे कीन्हा॥

 

ततखन आइ बिवाँन पहूँचा । मन तें अधिाक, गगन तें ऊँचा॥

 

उघरी पवँरि, चला सुलतानू । जानहु चला गगन कहँ भानू॥

 

पवँरी सात, सात ख्रड बाँके । सातौ खंड गाढ़ दुइ नाके॥

 

आजु पँवरि मुख भा निरमरा । जौ सुलतान आइ पग धारा॥

 

जनहु उरेह काटिसबकाढ़ी । चित्रा क मूरति बिनवहिं ठाढ़ी॥

 

लाखन बैठ पवँरिया, जिन्ह तें नवहिं करोरि।

 

तिन्ह सब पवँरि उघारे, ठाढ़ भए कर जोरि॥1॥

 

सातौ पवँरी कनक केवारा । सातौ पर बाजहिं घरियारा॥

 

सात रंग तिन्ह सातौ पँवरी । तब तिन्ह चढ़ै फिरै नव भँवरी॥

 

ख्रड ख्रड साज पलँग औ पीढ़ी । जानहुँ इंद्रलोक कै सीढ़ी॥

 

चंदन बिरिछ सोह तहँ छाहाँ । अमृत कुंड भरे तेहि माहाँ॥

 

फरे खजहजा दारिउँ दाखा । जो ओहि पंथ जाइ सो चाखा॥

 

कनक छत्रा सिंघासन साजा । पैठत पँवरि भिला लेइ राजा॥

 

बादशाह चढ़ि चितउर देखा । सब संसार पाँव तर लेखा॥

 

देखा साह गनन गढ़, इंद्रलोक कर साज।

 

कहिय राज फुर ताकर, सरग करै अस राज॥2॥

 

चढ़ि गढ़ ऊपर संगति देखी । इंद्रसभा सो जानि बिसेखी॥

 

ताल तलावा सरवर भरे । औ ऍंबराव चहूँ दिसि फरे॥

 

कुऑं बावरी भाँतिहि भाँती । मठ मंडप साजै चहुँ पाँती॥

 

राय रंक घरघर सुख चाऊ । कनक मँदिर नग दीन्ह जड़ाऊ॥

 

निसि दिन बाजहिं मादर तूरा । रहस कूद सब भरे सेंदूरा॥

 

रतन पदारथ नग जो बखाने । घूरन्ह माँह देख छहराने॥

 

मँदिर मँदिर फुलवारी बारी । बार बार बहु चित्रा सँवारी॥

 

पाँसासारि कुँवर सब खेलहिं, गीतन्ह òवन ओनाहिं।

 

चैन चाव तस देखा, जनु गढ़ छेंका नाहिं॥3॥

 

देखत साह कीन्ह तहँ फेरा । जहँ मंदिर पदमावति केरा॥

 

आस पास सरवर चहुँ पासा । माँझ मँदिर जनु लाग अकासा॥

 

कनक सँवारि नगन्ह सब जरा । गगन चंद जनु नखतन्ह भरा॥

 

सरवर चहुँ दिसि पुरइन फूली । देखत बारि रहा मन भूली॥

 

कुँवरि सहसदस बार अगोरे । दुहुँ दिसि पवँरि ठाढ़ि कर जोरे॥

 

सारदूल दुहँ दिसि गढ़ि काढ़े । गलगाजहिं जानहुँ ते ठाढ़े॥

 

जावत कहिए चित्रा कटाऊ । तावत पवँरिन्ह बने जड़ाऊ॥

 

साह मँदिर अस देखा, जनु कैलास अनूप।

 

जाकर अस धाौराहर, सो रानी केहि रूप॥4॥

 

नाँघत पँवरि गए ख्रड साता । सतएँ भूमि बिछावन राता॥

 

ऑंगन साह ठाढ़ भा आई । मँदिर छाँह अति सीतल पाई॥

 

चहूँ पास फुलवारी बारी । माँझ सिंहासन धारा सँवारी॥

 

जनु बसंत फूला सब सोने । फल औ फूल बिगसि अति लोने॥

 

जहाँ जो ठाँव दिस्टि महँ आवा । दरपन भाव दरस देखरावा॥

 

तहाँ पाट राखा सुलतानी । बैठ साह, मन जहाँ सो रानी॥

 

कवँल सुभाय सूर सौं हँसा । सूर क मन चाँदहिं पर बसा॥

 

सो पै जानै नयन रस, दिरदय प्रेम ऍंकूर।

 

चंद जो बसै चकोर चित, नयनहि आव न सूर॥5॥

 

रानी धाौराहर उपराहीं । करै दिस्टि नहिं तहाँ तराहीं॥

 

सखी सरेखी साथ बईठी । तपै सूर, ससि आव न दीठी॥

 

राजा सेव करै कर जोरे । आजु साह घर आवा मोरे॥

 

नट, नाटक, पातुरि औ बाजा । आइ अखाड़ माँह सब साजा॥

 

पेम क लुबुधा बहिर औ अंधाा । नाच कूद जानहुँ सब धांधाा॥

 

जानहुँ काठ नचावै कोई । जो नाचत सो प्रगट न होई॥

 

परगट कहँ राजा सौं बाता । गुपुत प्रेम पदमावति राता॥

 

गीत नाद अस धांधाा, दहक बिरह कै ऑंच।

 

मन कै डोरी लाग तहँ, जहँ सो गहि गुन खाँच॥6॥

 

गोरा बादल राजा पाहाँ । रावत दुवौ दुवौ जनु बाहाँ॥

 

आइ òवन राजा के लागे । मूसि न जाहिं पुरुष जो जागे।

 

बाचा परखि तुरुकहम बूझा । परगट मेर गुपुत छल सूझा॥

 

तुम नहिं करौ तुरुक सौं मेरू । छल पै करहिं अंत कै फेरू॥

 

बैरी कठिन कुटिलजस काँटा । सो मकोय रह राखै ऑंटा॥

 

सत्राु कोट को आइ अगोटी । मीठी खाँड़ जेंवाएहु रोटी॥

 

हम तेहि ओंछ क पावा घातू । मूल गए सँग रहै न पातू॥

 

यह सो कृस्न बलिराज जस, कीन्ह चहै छर बाँधा।

 

हम्ह बिचार अस आवै, मेर न दीजिय काँधा॥7॥

 

सुनि राजहि यह बात न भाई । जहाँ मेर तहँ नहिं अधामाई॥

 

मंदहि भल जो करै भल सोई । अंतहि भला भले कर होई॥

 

सत्राु जो बिष देइ चाहै मारा । दीजिय लोन जानि बिषहारा॥

 

बिष दीन्हें बिषहर होइ खाई । लोन दिए होइ लोन बिलाई॥

 

मारे खड़ग खड़ग कर लेई । मारे लोन नाइ सिर देई॥

 

कौरव बिष जो पँडवन्ह दीन्हा । अंतहि दाँव पंडवन्ह लीन्हा॥

 

जो छल करै ओहि छल बाजा । जैसे सिंघ मँजूसा साजा1॥

 

राजै लोन सुनावा, लाग दुहुन जस लोन।

 

आए कोहाइ मँदिर कहँ, सिंघ छान अब गोन॥8॥

 

राजा कै सोरह सै दासी । तिन्ह महँ चुनि काढ़ीं चौरासी॥

 

बरन बरन सारी पहिराई । निकसि मँदिर तें सेवा आईं॥

 

जनु निसरीं सब बीरबहूटी । रायमुनी पींजर हुँत छूटी॥

 

सबै परथमै जोबन सोहैं । नयन बान औ सारँग भौंहैं॥

 

मारहिं धानुक फेरि सर ओही । पनिघट घाट धानुक जिति मोही॥

 

काम कटाछ हनहिं चित हरनी । एक एक तें आगरि बरनी॥

 

जानहुँ इंद्रलोक तें काढ़ी । पाँतिहि पाँति भई सब ठाढ़ी॥

 

साह पूछ राघव पहँ, ए सब अछरी आहिं।

 

तुइ जो पदमावति बरनी, कहु सो कौन इन माहिं॥9॥

 

दीरघ आउ, भूमिपति भारी । इन महँ नाहिं पदमावति नारी॥

 

यह फुलवारि सो ओहि कै दासी । कहँ केतकी भँवर जहँ बासी॥

 

वह तौ पदारथ, यह सब मोती । कहँ ओहि दीप पतँग जेंहिजोती॥

 

ए सब तरई सेब कराहीं । कहँ वह ससि देखत छपि जाहीं॥

 

जौ लगि सूर क दिस्टि अकासू । तौ लगि ससि न करै परगासू॥

 

सुनि कै साहदिस्टि तर नावा । हम पाहुन, यह मँदिर परावा॥

 

पाहुन ऊपर हेरै नाहीं । हना राहु अर्जुन परछाहीं॥

 

तपै बीज जस धारती, सूख बिरह के घाम।

 

कब सुदिस्टि सो बरिसै, तन तरिवर होइ जाम॥10॥

 

सेव करैं दासी चहुँ पासा । अछरी मनहुँ इंद्र कबिलासा॥

 

कोउ परात कोउ लोटा लाईं । साह सभा सब हाथ धाोवाईं॥

 

कोइ आगे पनवार बिछावहिं । कोई जेंवन लेइ लेइ आवहिं॥

 

माँड़े कोइ जाहिं धारि जूरी । कोई भात परोसहिं पूरी॥

 

कोई लेइ लेइ आवहिंथारा । कोइ परसहिं छप्पन परकारा॥

 

पहिरि जोचीर परोसै आवहिं । दूसरि और बरन देखरावहिं॥

 

बरन बरन पहिरे हर फेरा । आव झुंड जस अछरिन्ह केरा॥

 

पुनि सँधाान बहु आनहिं, परसहिं बूकहि बूक।

 

करहिं सँवार गोसाईं, जहाँ परै किछु चूक॥11॥

 

जानहु नखत करहिं सब सेवा । बिनु ससि सूरहि भाव न जेंवा॥

 

बहु परकार फिरहिं हर फेरे । हेरा बहुत न पावा हेरे॥

 

परीं असूझ सबै तरकारी । लोनी बिना लोन सब खारी॥

 

मच्छ छुवै आवहिं गड़ि काँटा । जहाँ कवँल तहँ हाथ न ऑंटा॥

 

मन लागेउ तेहि कँवल के डंडी । भावै नाही एक कनउँड़ी॥

 

सो जेंवन नहिं जाकर भूखा । तेहि बिन लाग जनहु सब सूखा॥

 

अनभावत चाखै बैरागा । पंचामृत जानहुँ बिष लागा॥

 

बैठि सिंघासन गूँजै, सिंघ चरै नहिं घास।

 

जौ लगि मिरिग न पावै, भोजन करै उपास॥12॥

 

पानि लिये दासी चहुँ ओरा । अमृत मानहुँ भरे कचोरा॥

 

पानी देहिं कपूर क बासा । सो नहिं पियै दरस कर प्यासा॥

 

दरसन पानि देइ तौजीऔं । बिनु रसना नयनहि सौं पीऔं॥

 

पपिहा बूँद सेवातिहि अघा । कौन काज जौ बरिसै मघा?॥

 

पुनि लोटा कोपर लेइ आईं । कै निरास अब हाथ धाोवाईं॥

 

हाथ जो धाोवै बिरह करोरा । सँवरि सँवरि मन हाथ मरोरा॥

 

बिधिा मिलाव जासौं मन लागा । जोरहि तूरि प्रेम कर तागा॥

 

हाथ धाोइ जब बैठा, लीन्ह ऊब कै साँस।

 

सँवरा सोइ गोसाईं, देइ निरासहि आस॥13॥

 

भइ जेवनार फिरा ख्रड़वानी । फिरा अरगजा कुहँकुहँ पानी॥

 

नग अमोल जो थारहि भरे । राजै सेव आनि कै धारै॥

 

बिनती कीन्ह घालि गिउ पागा । ए जगसूर! सीउ मोहिं लागा॥

 

ऐगुन भरा काँप यह जीऊ । जहाँ भानु तहँ रहै न सीऊ॥

 

चारिउ खंड भानु अस तपा । जोहि के दिस्टि रैनि मसि छपा॥

 

औ भानुहि अस निरमलकला । दरस जो पावै सो निरमला॥

 

कवँल भानु देखै पै हँसा । औ भा तेहु चाहि परगसा॥

 

रतन साम हौं रैनि मसि, ए रबि! तिमिर सँघार।

 

करु सो कृपा दिस्टि अब, दिवस देहि उजियार॥14॥

 

सुनि बिनती बिहँसा सुलतानू । सहसौ करा दिपा जस भानू॥

 

ए राजा! तुइ साँच जुड़ावा । भइ सुदिस्टि अब सीउ छुड़ावा॥

 

भानु क सेवा जो कर जीऊ । तेहि मसि कहाँ, कहाँ तेहि सीऊ॥

 

खाहु देस आपन करि सेवा । और देउँ माँडौ तोहि देवा!॥

 

लीक पखान पुरुष कर बोला । धाुव सुमेरु ऊपर नहिं डोला॥

 

फेरि पसाउ दीन्ह नग सूरू । लाभ देखाइ लीन्ह चह मूरू॥

 

हँसि हँसि बोलै, टेकै काँधाा । प्रीति भुलाइ चहै छल बाँधाा॥

 

माया बोल बहुत कै, साह पान हँसि दीन्ह।

 

पहिले रतन हाथ कै, चहै पदारथ लीन्ह॥15॥

 

माया मोह बिबस भा राजा । साह खेल सतरँज कर साजा॥

 

राजा! है जौ लगि सिर घामू । हम तुम घरिक करहिं बिसरामू॥

 

दरपन साह भीति तहँ लावा । देखौं जबहि झरोखे आवा॥

 

खेलहिं दुऔ साह औ राजा । साह क रुख दरपन रह साजा॥

 

प्रेम क लुबुधा पियादे पाऊँ । ताके सौंह चलै कर ठाँऊ॥

 

घोड़ा देइ फरजीबँधा लावा । जेहि मोहरा रुख चहै सो पावा॥

 

राजा पील देइ शह माँगा । शह देइ चाह मरै रथ खाँगा॥

 

पीलहि पील देखावा, भए दुऔ चौदाँत।

 

राजा चहै बुर्द भा, शाह चहै शह मात॥16॥

 

सूर देख जौ तरई दासी । जहँ ससि तहाँ जाइ परगासी॥

 

सुना जो हमदिल्ली सुलतानू । देखा आजु तपै जस भानू॥

 

ऊँच छत्रा जाकर जग माहाँ । जग जो छाहँ सब ओहि कै छाहाँ॥

 

बैठि सिंघासन गरबहिगूँजा । एक छत्रा चारिउ ख्रड भूजा॥

 

निरखि न जाइ सौंह ओहि पाहीं । सबै नवहिं करि दिस्टि तराहीं॥

 

मनि माथे,ओहि रूप नदूजा । सब रूपवंत करहिं ओहि पूजा॥

 

हम अस कसा कसौटीआरस । तहूँ देखु कस कंचन, पारस॥

 

बादसाह दिल्ली कर, कित चितउर महँ आव।

 

देखि लेहु पदमावति! जेहि न रहै पछिताव॥17॥

 

बिगसै कुमुद कहे ससि ठाऊँ । बिगसै कवँल सुने रवि नाऊँ॥

 

भइ निसि ससि धाौराहर चढ़ी । सोरह कला जैस बिधिा गढ़ी॥

 

बिहँसि झरोखे आइ सरेखी । निरखि साह दरपन महँ देखी॥

 

होतहि दरस परसभा लोना । धारती सरग भयउ सब सोना॥

 

रुख माँगत रुख तासहुँ भयउ । भा शह मात, खेल मिटि गयऊ॥

 

राजा भेद न जानै झाँपा । भा बिसँभार, पवन बिनु काँपा।

 

राघव कहाकि लागि सोपारी । लेइ पौढ़ावहिं सेज सँवारी॥

 

रैनि बीति गइ, भोर भा, उठा सूर तब जागि।

 

जो देखै ससि नाहीं, रही करा चित लागि॥18॥

 

भोजन प्रेम सो जान जो जेंवा । भँवरहि रुचै बास-रस-केवा॥

 

दरस देखाइ जाइ ससि छपी । उठा भानु जस जोगी तपी॥

 

राघव चेति साह पहँ गयउ । सूरज देखि कवँल बिसमयऊ॥

 

छत्रापती मन कीन्ह सो पहुँचा । छत्रा तुम्हार जगत पर ऊँचा॥

 

पाट तुम्हार देवतन्ह पीठी । सरग पतार रहै दिन दीठी॥

 

छोह ते पलुहहिं उकठे रूखा । कोह ते महि सायर सब सूखा॥

 

सकल जगत तुम्ह नावै माथा । सब कर जियन तुम्हारे हाथा॥

 

दिनहिं नयन लाएहु तुम, रैनि भयहु नहिं जाग।

 

कस निचिंत अस सोयहु, काह विलँब अस लाग?॥19॥

 

देखि एक कौतुक हौं रहा । रहा ऍंतरपट, पै नहिं अहा॥

 

सरवर देख एक मैं सोई । रहा पानि, पै पान न होई॥

 

सरग आइ धारती महँ छावा । रहा धारति, पै धारत न आवा॥

 

तिन्ह महँ पुनि एक मंदिरऊँचा । करन्ह अहा, पर कर न पहूँचा॥

 

तेहि मंडप मूरति मैं देखी । बिनु तन, बिनु जिउ जाइ बिसेखी॥

 

पूरन चँद होइ जनु तपी । पारस रूप दरस देइ छपी॥

 

अब जहँ चतुरदसी जिउ तहाँ । भानु अमावस पावा कहाँ?॥

 

बिगसा कँवल सरग निसि, जनहुँ लौकि गइ बीजु।

 

ओहि राहु भा भानुहि, राघव मनहिं पतीजु॥20॥

 

अति बिचित्रा देखा सो ठाढ़ी । चित कै चित्रा, लीन्ह जिउ काढ़ी।

 

सिंघ लंक, कुंभस्थल जोरू । ऑंकुस नाग, महाउत मोरू॥

 

तेहि ऊपर भा कँवल बिगासू । फिरि अलि लीन्ह पुहुप मधाु बासू॥

 

दुइ खंजन बिच बैठउ सूआ । दुइज क चाँद धानुक लेइ ऊआ॥

 

मिरिग देखाइ गवन फिरि किया । ससि भा नाग, सूर भा दिया॥

 

सुठि ऊँचे देखत वह उचका । दिस्टि पहुँचि, कर पहुँचि न सका॥

 

पहुँच बिहून दिस्टि कित भई? । गहि न सका, देखत वह गई॥

 

राघव! हेरत जिउ गयउ, कित आछत जो असाधा।

 

यह तन राख पाँख कै सकै न, केहि अपराधा?॥21॥

 

राघव सुनत सीस भुइँ धारा । जुग जुग राज भानु कै करा॥

 

उहै कला, वह रूप बिसेखी । निसचै तुम्ह पदमावति देखी॥

 

केहरि लंक कुँभस्थल हीया । गीउ मयूर, अलक बेधिाया॥

 

कवँल बदन औ बास सरीरू । खंजन नयन, नासिका कीरू॥

 

भौंह धानुक, ससि दुइज लिलाटू । सब रानिन्ह ऊपर ओहि पाटू॥

 

सोई मिरिग देखाइ जो गयऊ । बेनी नाग, दिया चित भयऊ॥

 

दरपन महँ देखी परछाहीं । सो मूरति, भीतर जिउ नाहीं॥

 

सबै सिंगार बनी धानि, अब सोई मति कीज।

 

अलक जो लरकै अधार पर, सो गहि कै रस लीज॥22॥

 

(1) जेवाँ=भोजन किया। बिहान=सवेरा। मन तें अधिाक=मन से अधिाक वेगवाला। पवँरि=डयोढ़ी। गाढ़=कठिन। नाके=चौकियाँ। जिन्ह तें नवहिं करोरि=जिनके सामने करोड़ों आदमी आवें तो सहम जायँ।

 

(2) घरियारा=घँटे। फिरै=जब फिरे। भँवरी=चक्कर। पीढ़ी=सिंहासन। लेखा=समझा, समझ पड़ा। फुर=सचमुच।

 

(3) संगति=सभा। सुख चाउ=आनंद मंगल। मादर=मर्दल, एक प्रकार का ढोल। घूरन्ह=कूड़ेखानों में। छहराने=बिखरे हुए। पाँसासारि=चौपड़। ओनाहिं=झुके या लगे हैं।

 

(4) पुरइन=(सं. पुटकिनी) कमल। अगोरे=रखवाली या सेवा में खड़ी है। सारदूल=सिंह। गलगाजहिं=गरजते हैं। कटाऊ=कटाव, बेलबूटे।

 

(5) राता=लाल। दरपन भाव…देखरावा=दर्पण के समान ऐसा साफ झकाझक है कि प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है। ऍंकूर=अंकुर। नयनहिं न आव=नजर में नहीं जँचता है।

 

(6) उपराहीं=ऊपर। सूर=सूर्य के समान बादशाह। ससि=चंद्रमा के समान राजा। ससि…दीठी=सूर्य के समान चंद्रमा (राजा) की ओर नजर नहीं जाती है। अखाड़=अखाड़ा, रंगभूमि : जैसे-इंद्र का अखाड़ा। जानहु सब धांधाा=मानो नाच-कूद तो संसार का काम ही है यह समझकर उस ओर धयान नहीं देता है। कह=कहता है। दहक=जिससे दहकता है। गुन=डोरी। खाँच=खींचती है।

 

(7) रावत=सामंत। दुवौ जनु बाहाँ=मानो राजा की दोनों भुजाएँ हैं। òवन लागे=कान में लगकर सलाह देने लगे। मूसि न जाहिं=लूटे नहीं जाते हैं। बाचा परखि…बूझा=उस मुसलमान की मैं बात परखकर समझ गया हूँ। मेर=मेल। कै फेरू=घुमा-फिराकर। बैरी=(क) शत्राु; (ख) बेर का पेड़। सो मकोय रह‑‑‑ऑंटा=उसे मकोय की तरह (काँटे लिये हुए) रहकर ओट या दावँ में रख सकते हैं। ऑंटा=दावँ, जैसे-”न ये बिससिए लखि नये, दुर्जन दुसह सुभाय। ऑंटे पर प्रानन हरैं, काँटे लौं लगि पाय॥”-(बिहारी)। अगोटी=छेंका। ओछ=ओछे, नीच। पावा धाातू=दाँव-पेंच समझ गया। मूल गए…पातू=उसने सोचा है कि राजा को पकड़ लें तो सेना सामंत आप ही न रह जाएँगे। कृस्न=विष्णु, वामन। छर बाँधा=छल का आयोजन। काँधा दीजिए=स्वीकार कीजिए।

 

(8) विषहार=विष हरनेवाला। बिसहर=विषधार, साँप। होइ लोन बिलाई=नमक की तरह गल जाता है। कर लेइ=हाथ में लेता है। मारे लोन=नमक से मारने से, अर्थात् नमक का एहसान ऊपर डालने से। बाजा=ऊपर पड़ता है। लोन जस लाग=अप्रिय लगा, बुरा लगा। कोहाइ=रूठकर। मंदिर=अपने घर। छान=बाँधाती है। गोन=रस्सी। सिंघ…गोन=सिंह अब रस्सी से बँधाा चाहता है।

 

(9) रायमुनी=मुनिया नाम की छोटी सुंदर चिड़िया। सारँग=धानुष।

 

(10) आउ=आयु। कहँ केतकी…बासी=वह केतकी यहाँ कहाँ है (अर्थात् नहीं है। जिस पर भौंरे बसते हैं।) पदारथ=रत्न। जौ लगि सूर…परगासू=जब तक सूर्य ऊपर रहता है तब तक चंद्रमा का उदय नहीं होता, अर्थात् जब तक आपकी दृष्टि ऊपर लगी रहेगी तब तक पद्मावती नहीं आएगी। हेरै=देखता है। हना राहु अर्जुन परछाहीं=जैसे अर्जुन ने नीचे छाया देखकर मत्स्य का बेधा किया था वैसे ही आपको किसी प्रकार दर्पण आदि में उसकी छाया देखकर ही उसे प्राप्त करने का उद्योग करना होगा। सूख=सूखता है।

 

1. एक ब्राह्मण देवता ने दया करके एक शेर को पिंजड़े से निकाल दिया। शेर उन्हें खाने दौड़ा। ब्राह्मण ने कहा, भलाई के बदले में बुराई नहीं करनी चाहिए। शेर कहने लगा, अपना भक्ष्य नहीं छोड़ना चाहिए। अंत में गीदड़ पंच हुआ। उसने कहा तुम दोनों जिस दशा में थे उसी दशा में थोड़ी देर के लिए फिर हो जाओ तो मैं मामला समझूँ। शेर फिर पिंजड़े में चला गया। गीदड़ ने इशारा किया और ब्राह्मण ने पिंजड़े का द्वार फिर बंद कर दिया।

 

(11) पनवार=बड़ा पत्ताल। माड़े=एक प्रकार की चपाती। जूरी=गव्ी लगाकर। सँधाान=अचार। बूकहिं बूक=चंगुल भर-भरकर। करहिं सँवार गोसाईं=डर के मारे ईश्वर का स्मरण करने लगती हैं।

 

(12) नखत=पदमावती की दासियाँ। ससि=पदमावती। जेंवा=भोजन करना। बहु परकार=बहुत प्रकार की स्त्रिायाँ। परीं असूझ=ऑंख उन पर नहीं पड़ती। लोनी=सुंदरी पदमावती। लोन सब खारी=सब खारी नमक के समान कड़वी लगती हैं। आवहिं गड़ि=गड़ जाते हैं। न ऑंटा=नहीं पहुँचता है। कँवल के डंडी=मृणाल रूप पदमावती में। कनउँड़ी=दासी। अनभावत=बिना मन से। बैरागा=विरक्त। उपास=उपवास।

 

(13) कचोरा=कटोरा। अघा=अघाता, तृप्त होता है। मघा=मघा नक्षत्रा। कोपर=एक प्रकार का बड़ा थाल या परात। हाथ धाोवाईं=बादशाह ने मानो पदमावती के दर्शन से हाथ धाोया। बिरह करोरा=हाथ जो धाोने के लिए मलता है मानो विरह खरोच रहा है। हाथ मरोरा=हाथ धाोता है, मानो पछताकर हाथ मलता है।

 

(14) सेव=सेवा में। घालि गिउ पागा=गले में पगड़ी डालकर (अधाीनतासूचक)। सीऊ=शीत। रैनि मसि=रात की कालिमा। तेहु चाहि=उससे भी बढ़कर। सँघार=नष्ट कर।

 

(15) दिपा=चमका। मसि=कालिमा। खाहु=भोग करो। माँडौ=माँडौगढ़। देवा=देव, राजा। लीक पखान=पत्थर की लीक सा (न मिटनेवाला)। धाुव=धा्रुव। पसाउ=प्रसाद, भेंट। मूरू=मूलधान। प्रीति=प्रीति से। छल=छल से। रतन=राजा रत्नसेन। पदारथ=पदमावती।

 

(16) घरिक=एक घड़ी, थोड़ी देर। भीति=दीवार में। लावा=लगाया। रह साजा=लगा रहता है। पियादे पाऊँ=पैदल। पियादे=शतरंज की एक गोटी। फरजी=शतरंज का वह मोहरा जो सीधाा और टेढ़ा दोनों चलता है। फरजीबंद=वह घात जिसमें फरजी किसी प्यादे के जोर पर बादशाह को ऐसी शह देता है जिससे विपक्षी की हार होती है। शह=बादशाह को रोकनेवाला घात। रथ=शतरंज का वह मोहरा जिसे आजकल ऊँट कहते हैं (जब चतुरंग का पुराना खेल हिंदुस्तान से फारस अरब की ओर गया तब वहाँ ‘रथ’ के स्थान पर ‘ऊँट’ हो गया)। बुर्द=खेल में वह अवस्था जिसमें किसी पक्ष के सब मोहरे मारे जाते हैं, केवल बादशाह बच रहता है, वह आधाी हार मानी जाती है। शह मात=पूरीहार।

 

(17) सूर देख…तरई दासी=दासी रूप नक्षत्राों ने जब सूर्य रूप बादशाह को देखा। जहँ ससि…परगासी=जहाँ चंद्ररूप पदमावती थी वहाँ जाकर कहा। परगासी=प्रकट किया, कहा। भूजा=भोग करता है। आरस=आदर्श, दर्पण। कसा कसौटी आरस=दर्पण्ा में देखकर परीक्षा की। कित आव=फिर कहाँ आता है, अर्थात् न आएगा।

 

(18) कहे ससि ठाऊँ=इस जगह चंद्रमा है, यह कहने से। सुने=सुनने से। परस भा लोना=पारस या स्पर्शमणि का स्पर्श सा हो गया। रुख=शतरंज का रुख। रुख=सामना। भा शह मात=(क) शतरंज में पूरी हार हुई; (ख) बादशाह बेसुधायामतवाला हो गया। झाँपा=छिपा, गुप्त। भा बिसँभार=बादशाह बेसुधा हो गया। लागि सोपारी=सुपारीके टुकड़े निगलने में छाती में रुक जाने से कभी-कभी एकबारगी पीड़ा होने लगती है जिससे आदमी बेचैन हो जाता है; इसी को सुपारी लगना कहते हैं। देखै=जो उठकर देखता है तो। करा=कला, शोभा।

 

(19) भोजन प्रेम=प्रेम का भोजन (इस प्रकार के उलटे समास जायसी में प्राय: मिलते हैं।-शायद फारसी के ढंग पर हों।) सो जान=वह जानता है। बास-रस-केवा=केबा बास-रस अर्थात् कमल का गंधा और रस। सूरुज देखि…बिसमयऊ=(वहाँ जाकर देखा कि) सूर्य बादशाह कमल पदमावती को देखकर स्तब्धा हो गया है। दिन=प्रतिदिन, सदा। पलुहहिं=पनपते हैं। उकठें=सूखै। तुम्ह=तुम्हें। दिनहिं नयन…जाग=दिन के सोए आप रात होने पर भी न जागे। निचिंत=बेखबर।

 

(20) रहा ऍंतरपट…अहा=(क) परदा था भी और नहीं भी था अर्थात् परदे के कारण मैं उस तक पहुँच नहीं सकता था। पर उसकी झलक देखता था (पदमावती के प्रतिबिंब को शाह ने दर्पण में देखा था); (ख) यह जगत् ब्रह्म और जीव के बीच परदा है पर उसमें उसकी झलक भी दिखाई पड़ती है। रहा पानि…न होई=उसमें पानी था पर उस तक पहुँच मैं पी नहीं सकता था। सरवर=वह दर्पण ही यहाँ सरोवर के समान दिखाई पड़ा। सरग आइ धारती…आवा=सरोवर में आकाश (उसका प्रतिबिंब) दिखाई पड़ता है पर उसे कोई छू नहीं सकता। धारति=धारती पर। धारत न आवा=पकड़ाई नहीं देता था। करन्ह अहा=हाथों में ही था। अब जहँ चतुरदसी…कहाँ=चौदस (पूर्णिमा) के चंद्र के समान जहाँ पदमावती है जीव तो वहाँ है, अमावस्या में सूर्य (शाह) तो है ही नहीं। वह तो चतुर्दशी में है, चतुर्दशी में ही उसे अद्भुत ग्रहण लग रहा है। लौकि गइ=चमक उठी, दिखाई पड़ गई।

 

(21) चित कै चित्रा=चित्ता या हृदय में अपना चित्रा पैठाकर। कुंभस्थल जोरू=हाथी के उठे हुए मस्तकों का जोड़ा (अर्थात् दोनों कुच)। ऑंकुस नाग=साँपों (अर्थात् बाल की लटों) का अंकुश। मोरू=मयूर। मिरिग=अर्थात् मृगनयनी पदमावती। गवन फिरि किया=पीछे फिरकर चली गई। ससि भा नाग=उसके पीछे फिरने से चंद्र्रमा के स्थान पर नाग हो गया, अर्थात् मुख के स्थान पर वेणी दिखाई पड़ी। सूर भा दिया=उस नाग को देखते ही सूर्य (बादशाह) दीपक के समान तेजहीन हो गया (ऐसा कहा जाता है कि साँप के सामने दीपक की लौ झिलमिलाने लगती है)। पहुँच बिहून…कित भई?=जहाँ पहुँच ही नहीं हो सकती वहाँ दृष्टि क्यों जाती है? हेरत जिउ गयउ=देखते ही मेरा जीव चला गया। कित आछत जो असाधा=जो वश में नहीं था वह रहता कैसे? यह तन…अपराधा=यह मिट्टी का शरीर पंख लगाकर क्यों नहीं जा सकता; इसने क्या अपराधा किया है? (22) बेधिाया=बेधा करनेवाला अंकुश। ओहि=उसका। दिया चित भयउ=वह तुम्हारा चित्रा था जो नाग के सामने दीपक के समान तेजहीन हो गया। मति कीज=ऐसी सलाह या युक्ति कीजिए। अलक…रस लीज=साँप की तरह जो लटें हैं उन्हें पकड़कर अधाररस लीजिए (राजा को पकड़ने का इशारा करता है)।

 

 

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मीत भै माँगा बेगि बिवाँनू । चला सूर, सँवरा अस्थानू॥

 

चलत पंथ राखा जौ पाऊ । कहाँ रहे थिर चलत बटाऊ॥

 

पंथी कहाँ कहाँ सुसताई । पंथ चलै तब पंथ सेराई॥

 

छर कीजै बरजहाँ न ऑंटा । लीजै फूल टारि कै काँटा॥

 

बहुत मया सुनि राजा फूला । चला साथ पहुँचावै भूला॥

 

साह हेतु राजा सौं बाँधाा । बातन्ह लाइ लीन्ह गहि काँधाा॥

 

घिउ मधाु सानि दीन्ह रस सोई । जो मुँह मीठ पेट बिष होई॥

 

अमिय बचन औ माया, को न मुयउ रस भीज॥

 

सत्राु मरै जौ अमृत, कित ता कहँ बिष दीज?॥1॥

 

चाँद घरहि जौ सूरुज आवा । होइ सो अलोप अमावस पावा॥

 

पूछहिं नखतमलीन सो मोती । सोरह कला, न एकौ जोती॥

 

चाँद क गहन अगाह जनावा । राज भूल गहि साह चलावा॥

 

पहिलौं पँवरि नाँघि जौ आवा । ठाढ़ होइ राजहि पहिरावा॥

 

सौ तुषार, तेइस गजपावा । दुंदुभि औ चौघड़ा दियावा॥

 

दूजी पँवरि दीन्ह असवारा । तीजि पँवरि नग दीन्ह अपारा॥

 

चौथि पँवरि देइ दरब करोरी । पँचईं दुइ हीरा कै जोरी॥

 

छठईं पँवरि देइ माँडौ, सतईं दीन्ह चँदेरि।

 

सात पँवरि नाँघत नृपहि, लेइगा बाँधिा गरेरि॥2॥

 

एहिजग बहुत नदी जल जूड़ा । कोउ पार भा, कोऊ बूड़ा॥

 

कोउ अंधा भा आगु नदेखा । कोउ भयउ डिठियार सरेखा॥

 

राजा कहँ बियाधा भइमाया । तजि कबिलास धारा भुइँ पाया॥

 

जेहिकारन गढ़ कीन्हअगोठी । कित छाँड़ै जौ आवै मूठी॥

 

सत्राुहि कोउ पाव जौ बाँधाी । छोड़ि आपु कहँ करै बियाधाी॥

 

चारा मेलि धारा जस माछू । जल हुँत निकसि मुवै कित काछू॥

 

सत्राू नाग पेटारी मूँदा । बाँधाा मिरिग पैग नहिं खूँदा॥

 

राजहि धारा, आनि कै, तन पहिरावा लोह।

 

ऐस लोह सो पहिरै, चीत सामि कै दोह॥3॥

 

पायँन्ह गाढ़ी बेड़ी परी । साँकर गीउ हाथ हथकरी॥

 

औ धारि बाँधिा मँजूषा मेला । ऐस सत्राु जिनि होइ दुहेला!॥

 

सुनि चितउर महँ परा बखाना । देस देस चारिउ दिसि जाना॥

 

आजु नरायन फिरि जग खूँदा । आजु सो सिंघ मँजूषा मूँदा॥

 

आजु खसे रावन दस माथा । आजु कान्ह कालीफन नाथा॥

 

आजु परान कंस कर ढीला । आजु मीन संखासुर लीला॥

 

आजु परे पंडव बँदि माहाँ । आजु दुसासन उतरी बाहाँ॥

 

आजु धारा बलि राजा, मेला बाँधिा पतार।

 

आजु सूर दिन अथवा, भा चितउर ऍंधिायार॥4॥

 

देव सुलेमाँ के बँदि परा । जहँ लगि देव सबै सत हरा॥

 

साहि लीन्ह गहि कीन्ह पयाना । जो जहँ सत्राु सो तहाँ बिलाना॥

 

खुरासान औ डरा हरेऊ । काँपा बिदर, धारा अस देऊ!॥

 

बाँधाौ, देवगिरि, धाौलागिरी । काँपी सिस्टि, दोहाई फिरी॥

 

उवा सूर, भइ सामुहँ करा । पाला फूट, पानि होइ ढरा॥

 

दुंदुहि डाँड़ दीन्ह, जहँताईं । आइ दँडवत कीन्ह सबाईं॥

 

दुंद डाँड़ सब सरगहि गई । भूमि जो डोली अहथिर भई॥

 

बादशाह दिल्ली महँ, आइ बैठ सुख पाट।

 

जेइ जेइ सीस उठावा, धारती धारा लिलाट॥5॥

 

हबसी बँदवाना जिउबधाा । तेहि सौंपा राजा अगिदधाा॥

 

पानि पवन कहँ आस करेई । सो जिउ बधिाक साँस भर देई॥

 

माँगत पानिआगि लेइ धाावा । मुँगरी एक आनि सिर लाबा॥

 

पानि पवन तुइँ पिया सो पीया । अब को आनि देइ पानीया॥

 

तब चितउरजिउ रहा न तोरे । बादसाह है सिर पर मोरे॥

 

जबहि हँकारे है उठि चलना । सकती करै होइ कर मलना॥

 

करै सो मीत गाँढ़ बँदि जहाँ । पान फूल पहुँचावै तहाँ॥

 

जब अंजल मुँह सोवा, समुद्र न सँवरा जागि।

 

अब धारि काढ़ि मच्छ जिमि, पानी माँगति आगि॥6॥

 

पुनि चलि दुइ जन पूछै आए । ओउ सुठि दगधा आइ देखराए॥

 

तुइँ मरपुरी न कबहूँ देखी । हाड़ जो बिथुरे देखि न लेखी॥

 

जाना नहिं कि होब अस महूँ । खोजे खोज न पाउब कहूँ॥

 

अब हम्ह उतर देहु रेदेवा । कौने गरब न मानेसि सेवा?॥

 

तोहि अस बहुत गाड़ि खनि मूँदे । बहुरि न निकसि बार होइ खूँदे॥

 

जो जस हँसा तो तैसे रोवा । खेलत हँसत अभय भुइँ सोवा॥

 

जस अपने मुँह काढ़े धाूवाँ । मेलेसि आनि नरक के कूऑं॥

 

जरसि मरसि अब बाँधाा, तैसे लाग तोहि दोख।

 

अबहूँ माँगु पदमावति, जौ चाहसि भा मोख॥7॥

 

पूछहिं बहुत, न बोला राजा । लीन्हेसि जोउ मीचु कर साजा1॥

 

खनि गढ़वा चरनन्ह देइ राखा । नित उठि दगधा होहिं नौ लाखा॥

 

ठाँव सो साँकर औ ऍंधिायारा । दूसर करवट लेइ न पारा॥

 

बीछी साँप आनि तहँ मेला । बाँका आइ छुवावहिं हेला॥

 

धारहिं सँड़ासन्ह, छूटै नारी । राति दिवस दुख पहुँचै भारी॥

 

जो दु:ख कठिन न सहै पहारू । सो ऍंगवा मानुष सिर भारू॥

 

जे सिर परै आइ सो सहै । किछु न बसाइ, काह सौं कहै?॥

 

दुख जारै, दुख भूँजै, दुख खोवै सब लाज।

 

गाजहु चाहि अधिाक दुख , दुखी जान जेहि बाज॥8॥

 

(1) मीत भै=मित्रा से (‘भै’ के इस प्रयोग पर नोट दिया जा चुका है)। सेराई=समाप्त होता है। छर=छल। बर=बल। न ऑंटा=नहीं पूरा पड़ता है। हेतु=प्रेम। घिउ मधाु=कहते हैं, घी और शहद बराबर मिलाने से विष हो जाता है। मुँह=मुँह में।

 

(2) चाँद=पदमावती। सूरुज=बादशाह। नखत=अर्थात् पदमावती की सखियाँ। अगाह=आगे से, पहले से। राज भूल=राजा भूला हुआ है। पहिरावा=राजा को खिलअत पहनाई। चौघड़ा=एक प्रकार का बाजा। माँड़ौ=माँड़ौगढ़। चँदेरि=चँदेरी का राज्य। गरेरि=घेरकर।

 

(3) एहि जग…जूड़ा=(यह संसार समुद्र है) इसमें बहुत सी नदियों का जल इकट्ठा हुआ है, अर्थात् इसमें बहुत तरह के लोग हैं। आगु=आगम। डिठियार=दृष्टिवाला। सरेखा=चतुर। तजि कबिलास…पाया=किले के नीचे उतरा; सुख के स्थान से दु:ख के स्थान में गिरा। अगोठी=अगोठा, छेका, घेरा। जल हुँत…काछू=वही कछुवा है जो जल से नहीं निकलता और नहीं मरता। सत्राू…मूँदा=शत्राु रूपी नाग की पेटारी में बंद कर लिया। पैग नहिं खूँदा=एक कदम भी नहीं कूदता। चीत सामि कै दोह=जो स्वामी का द्रोह मन में विचारता है।

 

(4) ऐस सत्राु…दुहेला=शत्राु भी ऐसे दु:ख में न पड़े। बखाना=चर्चा। जग खूँदा=संसार में आकर कूदे। मूँदा=बंद किया। मीन=मत्स्य अवतार। पंडव=पांडव।

 

(5) देव=(क) राजा; (ख) दैत्य। सूलेमाँ=यहूदियों के बादशाह सुलेमान ने देवों और परियों को वश में किया था। बँदि परा=कैद में पड़ा। सतहरा=सत्य छोड़े हुए, बिना सत्य के। धारा अस देऊ=कि ऐसे बड़े राजा को पकड़ लिया। दुँदुहि=दुँदुभी या नगाड़े पर। डाँड़ हीन्ह=डंडा या चोट मारी।

 

(6) बँदवाना=बंदीगृह का रक्षक, दारोगा। जिउबधाा=बधिाक, जल्लाद। अगिदधा=आग से जले हुए। साँस भर=साँस भर रहने के लिए। पानीया=पानी। जिउ रहा=जी में यह बात नहीं रही कि। सकती=बल। जब अंजल मुँह सोवा=जब तक अन्न-जल मुँह में पड़ता रहा तब तक तो सोया किया।

 

(7) मरपुरी=यमपुरी। हाड़ जो…लेखी=बिखरी हुई हड्डियों को देखकर भी तुझे उसका चेत न हुआ। महूँ=मैं भी। खोज=पता। बार होइ खूँदै=अपने द्वार पर पैर न रखा। धूँवाँ=गर्व या क्रोधा की बात। तस=ऐसा। माँग=बुला भेज।

 

1. पाठांतर-पूछहिं बहुत न राजा बोला। दिहे केवार, न कैसेहु खोला॥

 

(8) गड़वा=गङ्ढा। चरनन्ह देइ राखा=पैरों को गङ्ढे में गाड़ दिया। बाँका=धारकारों का टेढ़ा औजार जिससे वे बाँस छीलते हैं। हेला=डोम। सँड़ास=सँड़सी, जिससे पकड़कर गरम बटलोई उतारते हैं। गाजहु चाहि=बज्र से बढ़कर। बाज=पड़ता है।

 

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पदमावति बिनु कंत दुहेली । बिनु जल कवँल सूखि जस बेली॥ गाढ़ी प्रीति सो मोसौं लाए । दिल्ली कंत निचिंत होइ छाए॥ सो दिल्ली अस निबहुरदेसू । कोइ न बहुरा कहै सँदेसू॥ जो गवनै सो तहाँ कर होई । जो आवै किछु जान न सोई॥ अगम पंथ पिय तहाँ सिधाावा । जो रे गयउ सो बहुरि न आवा॥ कुबाँ धाार जल जैस बिछोवा । डोल भरे नैनन्ह धानि रोवा॥ लेजुरि भई नाह बिनु तोहीं । कुवाँ परी, धारि काढ़सि मोहीं॥ नैन डोल भरि ढारै, हिये न आगि बुझाइ। घरी घरी जिउ आवै, घरी घरी जिउ जाइ॥1॥ नीर गँभीर कहाँ हो पीया । तुम्ह बिनु फाटै सरवर हीया॥ गयहु हेराइ, परेहु केहि हाथा? । चलत सरोवर लीन्ह न साथा॥ चरत जो पंखि केलि कै नीरा । नीर घटे कोइ आव न तीरा॥ कवँल सूख, पखुरी बेहरानी । गलि गलि कै मिलि छार हेरानी॥ विरह रेत कंचन तन लावा । चून चून कै खेह मेरावा॥ कनक जो कन कन होइ बेहराई । पिय कहँ? छार समेटै आई॥ बिरह पवन बह छार सरीरू । छारहि आनि मेरावहु नीरू॥ अबहुँ जियाबहु कै मया, बिथुरी छार समेट। नइ काया अवतार नव, होइ तुम्हारे भेंट॥2॥ नैन सीप, मोती भरि ऑंसू । टुटि-टुटि परहिं करहिं तन नासू॥ पदिक पदारथ पदमावति नारी । पिय बिनु भइ कौड़ी बर बारी॥ सँग लेइ गयउ रतन सब जोती । कंचन कया काँच कै पोती॥ बूड़ति हौं दुख दगधा गँभीरा । तुम बिनु कंत! लाव को तीरा?॥ हिये बिरह होइ चढ़ा पहारू । चल जोबन सहि सकै न भारू॥ जल महँ अगिनि सो जान बिछूना । पाहन जरहिं, होहिं सब चूना॥ कौने जतन, कंत! तुम्ह पावौं । आजु आगि हौं जरत बुझावौं॥ कौन खंड हौं हेरौं, कहाँ बँधो हौ नाह। हेरे कतहुँ न पावौं, बसै तु हिरदय माहँ॥3॥ नागमतिहि ‘पिय पिय’ रट लागी । निसि दिन तपै मच्छ जिमिआगी॥ भँवर, भुजंग कहाँ, हो पिया । हम ठेघा तुम कान न किया॥ भूलि न जाहि कँवल के पाहाँ । बाँधात बिलँब न लागै नाहा॥ कहाँ सो सूर पास हौं जाऊँ । बाँधाा भँवर छोरि कै लाऊँ॥ कहाँ जाउँ को कहै सँदेसा? । जाउँ सो तहँ जोगिन के भेसा॥ फारि पट रहि, पहिरौं कंथा । जौ मोहिं कोउ देखावै पंथा॥ वह पथपलकन्ह जाइ बोहारौं । सीस चरन कै तहाँ सिधाारौं॥ को गुरु अगुवा होइ, सखि! मोहि लावै पथ माँह। तन मन धान बलि बलि करौं, जो रे मिलावै नाह॥4॥ कै कै कारन रोवै बाला । जनु टुटहिं मोतिन्ह कै माला॥ रोवति भई, न साँस सँभारा । नैन जस ओरति धारा॥ जाकर रतन परै पर हाथा । सो अनाथ किमि जीवै नाथा!॥ पाँच रतन ओहि रतनहि लागे । बेगि आउ पिय रतन सभागे!॥ रही न जोति नैन भए खीने । òवन न सुनौं, बैन तुम लीने॥ रसनहिं रस नहिं एकौ भावा । नासिक और बास नहिं आवा॥ तचि तचि तुम्ह बिनु ऍंग मोहिलागे । पाँचौ दगधिा बिरह अबजागे॥ बिरह सो जारि भसम कै, चहै उड़ावा खेह। आइ जो धानि पिय मेरवै, करि सो देइ नइ देह॥5॥ पिय बिनु ब्याकुल बिलपै नागा । बिरहा तपनि साम भए कागा॥ पवन पानि कह सीतल पीऊ? । जेहि देखे पलुहै तन जीऊ॥ कहँ सौ बासमलयगिरि नाहा । जेहि कल परति देत गलबाहाँ॥ पदमावतिठगिनिभईकितसाथा । जेहिं तें रतन परा पर हाथा॥ होइ बसंत आवहु पिय केसरि । देखे फिर फूलै नागेसरि॥ तुम्ह बिनु, नाह! रहै हिय तचा । अब नहिं बिरह गरुड़ सौ बचा॥ अब ऍंधिायार परा, मसि लागी । तुम्ह बिनु कौन बुझावै आगी?॥ नैन, òवन, रस रसना, सबै खीन भए, नाह। कौन सो दिन जेहि भेंटि कै, आइ करै सुख छाँह॥6॥ (1) निबहुर=जहाँ से कोई न लौटे (स्त्रिायाँ निबहुरा कहकर गाली भी देती हैं)। लेजुरि=रस्सी, डोरी (रज्जु का मागधाी रूप)। (2) बह=बहता है, उड़ा-उड़ा फिरता है। छारहि…नीरू=तुम जल होकर धाूल के कणों को मिलाकर फिर शरीर दो। (3) पोती=गुरिया। चल=चंचल, अस्थिर। बिछूना=बिछोह। जल महँ… बिछूना=वियोग को जल में की आग समझो, जिससे पत्थर के टुकड़े पिघलकर चूना हो जाते हैं (चूने के कड़े टुकड़ों पर पानी पड़ते ही वे गरम होकर गल जाते हैं)। (4) आगी=आग में। ठेघा=सहारा या आश्रय लिया। सूर=भौंरे का प्रतिद्वंद्वी सूर्य। बोहारौं=झाड़ँ लगाऊँ। सीस चरन कै=सिर को पैर बनाकर अर्थात् सिर के बल चलकर। (5) कारन=कारुण्य, करुणा, विलाप (अवधाी)। ओरति=ओलती। पाँच रतन=पाँचों इंद्रियाँ। ओहि रतनहि लागे=उस रत्नसेन की ओर लगे हैं। तचि तचि=जल जलकर, तपते से। पाँचौ=पाँचों इंद्रियाँ। (6) नागा=नागमती। गरुड़=गरुड़ जो नाग (यहाँ नागमती) का शत्रु  है।

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