कविता – रत्नसेन जन्म खंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

· March 22, 2014

RamChandraShukla_243172चितउरगढ़ कर एक बनिजारा । सिंघलदीप चला बैपारा॥

बाम्हन हुत एक निपट भिखारी । सो पुनि चला चलत बैपारी॥

 

ऋन काहू सन लीन्हेसि काढ़ी । मकु तहँ गए होइ किछु बाढ़ी॥

 

मारग कठिन बहुत दुख भयऊ । नाँघि समुद्र दीप ओहि गयऊ॥

 

देखि हाट किछु सूझ न ओरा । सबै बहुत, किछु दीख न थोरा॥

 

पै सुठि ऊँच बनिज तहँ केरा । धानी पाव, निधानी मुख हेरा॥

 

लाख करोरिन्ह वस्तु बिकाई । सहसन केरि न कोउ ओनाई॥

 

सबहीं लीन्ह बेसाहना, औ घर कीन्ह बहोर।

 

बाम्हन तहवाँ लेइ का? गाँठि साँठि सुठि थोर॥1॥

 

झूरै ठाढ़ हौं, काहे क आवा ? बनिज न मिला, रहा पछितावा॥

 

लाभ जानि आएउँ एहि हाटा । मूर गँवाइ चलेउँ तेहि बाटा॥

 

का मैं मरन सिखावन सिखी । आएउँ मरै, मीचु हति लिखी॥

 

अपने चलत सो कीन्ह कुबानी । लाभ न देख, मूर भै हानी॥

 

का मैं बोआ जनम ओहि भूँजी ? खोइ चलेऊँ घरहू कै पूँजी॥

 

जेहि ब्यौहरिया कर ब्यौहारू । का लेइ देब जौ छेंकिहि बारू॥

 

घर कैसे पैठब मैं छूछे । कौन उतर देबौं तेहि पूछे॥

 

साथि चले, संग बीछुरा, भए बिच समुद पहार।

 

आस निरासा हौं फिरौं, तू विधिा देहि अधाार॥2॥

 

तबहीं ब्याधा सुआ लेइ आवा । कंचन बरन अनूप सुहावा॥

 

बेंचै लाग हाट लै ओही । मोल रतन मानिक जहँ होही॥

 

सुअहिं को पूछ? पतंग मँडारे । चल न दीख आछै मन मारे॥

 

बाम्हन आइ सुआ सौं पूछा । दहुँ, गुनवंत कि निरगुन छूछा?॥

 

कहु परबत्तो! गुन तोहि पाहाँ । गुन न छपाइय हिरदय माहाँ॥

 

हम तुम जाति बराम्हन दोऊ । जातिहि जाति पूछ सब कोऊ॥

 

पंडित हौ तौ सुनावहु बेदू । बिनु पूछे पाइय नहिं भेदू॥

 

हौं बाम्हन औ पंडित, बहु आपन गुन सोइ।

 

पढ़े के आगे जो पढ़ै, दून लाभ तेहि होइ॥3।

 

तब गुन मोहि अहा, हो देवा । जब पिंजर हुत छूट परेवा॥

 

अब गुन कौन जो बँद, जजमाना । घालि मँजूसा बेचै आना॥

 

पंडित होइ सो हाट न चढ़ा । चहौं बिकाय, भूलि गा पढ़ा॥

 

दुइ मारग देखौं एहि हाटा । दई चलावै दहुँ केहि बाटा॥

 

रोवत रकत भयउ मुख राता । तन भा पियर कहौं का बाता?॥

 

राते स्याम कंठ दुइ गीवाँ । तेहिं दुइ फंद डरौं सुठि जीवा॥

 

अब हौं कंठ फंद दुइ चीन्हा । दहुँ ए फंद चाह का कीन्हा?॥

 

पढ़ि गुनि देखा बहुत मैं, है आगे डर सोइ।

 

धाुंधा जगत सब जानि कै, भूलि रहा बुधिा खोइ॥4॥

 

सुनि बाम्हन बिनवा चिरिहारू । करि पंखिन्ह कहँ मया न मारू॥

 

निठुर होइ जिउ बधासि परावा । हत्या केर न तोहि डर आवा॥

 

कहसि पंखि का दोस जनावा । निठुर तेइ जे परमस खावा॥

 

आवहिं रोइ, जात पुनि रोना । तबहुँ न तजहिं भोग सुख सोना॥

 

औ जानहिं तन होइहि नासू । पोखैं माँसु पराये माँसू॥

 

जो न होहिं अस परमँस खाधाू । कित पंखिन्ह कहँ धारै बियाधाू?॥

 

जो ब्याधाा नित पंखिन्ह धारई । सो बेचत मन लोभ न करई॥

 

बाम्हन सुआ बेसाहा, सुनि मति वेद गरंथ।

 

मिला आइ कै साथिन्ह, भा चितउर के पंथ॥5॥

 

तब लगि चित्रासेन सर साजा । रतनसेन चितउर भा राजा॥

 

आइ बात तेहि आगे चली । राजा बनिज आए सिंघली॥

 

हैं गजमोति भरी सब सीपी । और वस्तु बहु सिंघलदीपी॥

 

बाम्हन एक सुआ लेइ आवा । कंचनबरन अनूप सोहावा॥

 

राते स्याम कंठ दुइ काँठा । राते डहन लिखा सब पाठा॥

 

औ दुइ नयन सुहावन राता । राते ठौर अमीरस बाता॥

 

मस्तक टीका, काँधा जनेऊ । कवि बियास, पंडित सहदेऊ॥

 

राजमँदिर मँह चाहिय, अस वह सुआ अमोल॥6॥

 

भै रजाइ जन दस दौराए । बाम्हन सुआ बेगि लेइ आए॥

 

बिप्र असीसि बिनति औधाारा । सुआ जीउ नहिं करौं निनारा।

 

पै यह पेट महा बिसवासी । जेइ सब नाव तपा संन्यासी॥

 

डासन सेज जहाँ किछु नाहीं । भुइँ परि रहै लाइ गिउ बाहीं॥

 

ऑंधार रहै, जो देख न नैना । गूँग रहै, मुख आव न बैना॥

 

बहिर रहै, जो स्रवन न सुना । पै यह पेट न रह निरगुना॥

 

कै कै फेरा नित यह दोखी । बारहिं बार फिरै न सँतोषी॥

 

सो मोहि लेइ मँगावै, लावै भूख पियास।

 

जौ न होत अस बैरी, केहु न केहु कै आस॥7॥

 

सुआ असीस दीन्ह बड़ साजू । बड़ परताप अखंडित राजू॥

 

भागवंत बिधिा बड़ औतारा । जहाँ भाग तहँ रूप जोहारा॥

 

कोइ केहु पास आस कै गौना । जो निरास डिढ़ आसन मौना।

 

कोइ बिन पूछे बोल जो बोला । होइ बोल माटी के मोला॥

 

पढ़ि गुनि जानि वेदमति भेऊ । पूछै बात कहै सहदेऊ॥

 

गुनी न कोई आपु सराहा । जो बिकाइ, गुन कहा सो चाहा॥

 

जौ लगि गुन परगट नहिं होई । तौ लहि मरम न जानै कोई॥

 

चतुरवेद हौं पंडित, हीरामन मोहि नाँव।

 

पदमावति सौं मेरवौं, सेब करौं तेहि ठाँव॥8॥

 

रतनसेन हीरामन चीन्हा । एक लाख बाम्हन कहँ दीन्हा॥

 

विप्र असीसि जो कीन्ह पयाना । सुआ सो राजमँदिर महँ आना॥

 

बरनौं काह सुआ कै भाखा । धानि सो नावँ हीरामन राखा॥

 

जौ बोलै राजा मुख जोवा । जानौ मोतिन हार परोवा॥

 

जौ बोलै तो मानिक मूँगा । नाहिं त मौन बाँधा रह गूँगा॥

 

मनहुँ मारि मुख अमृत मेला । गुरु होइ आप, कीन्ह जग चेला॥

 

सुरुज चाँद कै कथा जो कहेऊ । पेम क कहनि लाइ चित गहेऊ॥

 

जो जो सुनै धाुनै सिर, राजहिं प्रीति अगाहु।

 

अस गुनवंता नाहिं भल, बाउर करिहै काहु॥9॥

 

(1)बनिजारा=वाणिज्य करने वाला, बनिया। मकु=शायद, चाहे; जैसे, गगन मगन मकु मे धाहि मिलई-तुलसी। बहोर=लौटना। साँठि=पूँजी, धान। सुठि=खूब।

 

(2)झूरै=निष्फल, व्यर्थ। कुबानी=कुवाणिज्य, बुरा व्यवसाय। भूँजि बोआ=भूनकर बीज बोया (भूनकर बोने से बीज नहीं जमता।

 

(3) पतंग-मँड़ारे=चिड़ियों के मड़रे में या झावे में। चल=चंचल, हिलता, डोलता।

 

(4)मंजूसा=मंजूषा, डला। कंठ=कंठा, काली लाल लकीर जो तोतों के गले पर होती है। धाुंधा=अंधाकार।

 

(5) परमंस=दूसरे का मांस। खाधाू=खानेवाला।

 

बोल अरथ सौं बोलै, सुनत सीस सब डोल।

 

(6) सर साजा=चिता पर चढ़ा, मर गया।

 

(7) बिसवासी=विश्वासघाती। नाव=नवाता है, नम्र करता है। न रह निरगुना=अपने गुण या क्रिया के बिना नहीं रहता। बारहिं बार=द्वार द्वार

 

(8) डिढ़=दृढ़। मेरवाँ=मिलाऊँ।

 

(9) बाउर=बावला, पागल।

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