कविताये – तुम हमारे हो – (लेखक – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला)

· February 9, 2014

suryakant_tripathi_niralaनहीं मालूम क्यों यहाँ आया

ठोकरें खाते हु‌ए दिन बीते ।

उठा तो पर न सँभलने पाया

गिरा व रह गया आँसू पीते ।

 

ताब बेताब हु‌ई हठ भी हटी

नाम अभिमान का भी छोड़ दिया ।

देखा तो थी माया की डोर कटी

सुना व’ कहते हैं, हाँ खूब किया ।

 

पर अहो पास छोड़ आते ही

वह सब भूत फिर सवार हु‌ए ।

मुझे गफलत में ज़रा पाते ही

फिर वही पहले के से वार हु‌ए ।

 

एक भी हाथ सँभाला न गया

और कमज़ोरों का बस क्या है ।

कहा – निर्दय, कहाँ है तेरी दया,

मुझे दुख देने में जस क्या है ।

 

रात को सोते य’ सपना देखा

कि व’ कहते हैं “तुम हमारे हो

भला अब तो मुझे अपना देखा,

कौन कहता है कि तुम हारे हो ।

 

अब अगर को‌ई भी सताये तुम्हें

तो मेरी याद वहीं कर लेना

नज़र क्यों काल ही न आये तुम्हें

प्रेम के भाव तुर्त भर लेना” ।

 

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