कविताएँ – (लेखक – जयशंकर प्रसाद )

· July 15, 2014

1jpdआह ! वेदना मिली विदाई

आह ! वेदना मिली विदाई

मैंने भ्रमवश जीवन संचित,

मधुकरियों की भीख लुटाई

 

छलछल थे संध्या के श्रमकण

आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण

मेरी यात्रा पर लेती थी

नीरवता अनंत अँगड़ाई

 

श्रमित स्वप्न की मधुमाया में

गहन-विपिन की तरु छाया में

पथिक उनींदी श्रुति में किसने

यह विहाग की तान उठाई

 

लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी

रही बचाए फिरती कब की

मेरी आशा आह ! बावली

तूने खो दी सकल कमाई

 

चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर

प्रलय चल रहा अपने पथ पर

मैंने निज दुर्बल पद-बल पर

उससे हारी-होड़ लगाई

 

लौटा लो यह अपनी थाती

मेरी करुणा हा-हा खाती

विश्व ! न सँभलेगी यह मुझसे

इसने मन की लाज गँवाई

 

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती

 

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती

स्वयंप्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती

अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो

प्रशस्त पुण्य पंथ हैं – बढ़े चलो बढ़े चलो

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी

सपूत मातृभूमि के रुको न शूर साहसी

अराति सैन्य सिंधु में, सुबाड़वाग्नि से जलो

प्रवीर हो जयी बनो – बढ़े चलो बढ़े चलो

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