उपन्यास – रंगभूमि – 4 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

· October 8, 2013

Premchand_4_aसूरदास के आर्तनाद ने महेंद्रकुमार की ख्याति और प्रतिष्ठा को जड़ से हिला दिया। वह आकाश से बातें करनेवाला कीर्ति-भवन क्षण-भर में धाराशायी हो गया। नगर के लोग उनकी सेवाओं को भूल-से गए। उनके उद्योग से नगर का कितना उपकार हुआ था, इसकी किसी को याद ही न रही। नगर की नालियाँ और सड़कें, बगीचे और गलियाँ, उनके अविश्रांत प्रयत्नों की कितनी अनुगृहीत थीं! नगर की शिक्षा और स्वास्थ्य को उन्होंने किस हीनावस्था से उठाकर उन्नति के मार्ग पर लगाया था, इसकी ओर कोई धयान ही न देता था। देखते-देखते युगांतर हो गया। लोग उनके विषय में आलोचनाएँ करते हुए कहते-अब वह जमाना नहीं रहा, जब राजे-रईसों के नाम आदर से लिए जाते थे, जनता को स्वयं ही उनमें भक्ति होती थी। वे दिन बिदा हो गए। ऐश्वर्य-भक्ति प्राचीन काल की राज्य-भक्ति ही का एक अंश थी। राजा, जागीरदार, यहाँ तक कि अपने जमींदार पर प्रजा सिर कटा देती थी। यह सर्वमान्य नीति-सिध्दांत था कि राजा भोक्ता है, प्रजा भोग्य है। यही सृष्टि का नियम था,लेकिन आज राजा और प्रजा में भोक्ता और भोग्य का सम्बंधा नहीं है, अब सेवक और सेव्य का सम्बंधा है। अब अगर किसी राजा की इज्जत है, तो उसकी सेवा-प्रवृत्तिा के कारण, अन्यथा उसकी दशा दाँतों-तले दबी हुई जिह्ना की-सी है। प्रजा को भी उस पर विश्वास नहीं आता। जब जनता उसी का सम्मान करती है, उसी पर न्योछावर होती है, जिसने अपना सर्वस्व प्रजा पर अर्पित कर दिया हो, जो त्याग-धान का धानी हो। जब तक कोई सेवा-मार्ग पर चलना नहीं सीखता, जनता के दिलों में घर नहीं कर पर पाता।

राजा साहब को अब मालाूम हुआ कि प्रसिध्दि श्वेत वस्त्रा के सदृश है, जिस पर एक धाब्बा भी नहीं छिप सकता। जिस तरफ उनकी मोटर निकल जाती, लोग उन पर आवाजें कसते, यहाँ तक कि कभी-कभी तालियाँ भी पड़तीं। बेचारे बड़ी विपत्तिा में फँसे हुए थे। ख्याति-लाभ करने चले थे, मर्यादा से भी हाथ धाोया। और अवसरों पर इंदु से परामर्श कर लिया करते थे, इससे हृदय को शांति मिलती थी, पर अब वह द्वार भी बंद था। इंदु से सहानुभूति की कोई आशा न थी।

 

रात के नौ बजे थे। राजा साहब अपने दीवानखाने में बैठे हुए इसी समस्या पर विचार कर रहे थे-लाोग कितने कृतघ्न होते हैं; मैंने अपने जीवन के सात वर्ष उनकी निरंतर सेवा में व्यतीत कर दिए। अपना कितना समय, कितना अनुभव, कितना सुख उनकी नजर किया! उसका मुझे आज यह उपहार मिल रहा है कि एक अंधाा भिखारी मुझे सारे शहर में गालियाँ देता फिरता है और कोई उसकी जबान नहीं पकड़ता,बल्कि लोग उसे और भी उकसाते और उत्तोजित करते हैं। इतने सुव्यवस्थित रूप से अपने इलाके का प्रबंधा करता, तो अब तक निकासी में लाखों रुपये की वृध्दि हो गई होती। एक दिन वह था कि जिधार से निकल जाता था, लोग खड़े हो-होकर सलाम करते थे, सभाओं में मेरा व्याख्यान सुनने के लिए लोग उत्सुक रहते थे और मुझे अंत में बोलने का अवसर मिलता था; और एक दिन यह है कि मुझ पर तालियाँ पड़ती हैं और मेरा स्वाँग निकालने की तैयारियाँ की जाती हैं। अंधो में फिर भी विवेक है, नहीं तो बनारस के शोहदे दिन-दहाड़े मेरा घर लूट लेते।

 

सहसा अरदली ने आकर मि. क्लार्क का आज्ञा-पत्रा उनके सामने रख दिया। राजा साहब ने चौंककर लिफाफा खोला, तो अवाक् रह गए। विपत्तिा-पर-विपत्तिा! रही-सही इज्जत भी खाक में मिल गई।

 

चपरासी-हुजूर, कुछ जवाब देंगे?

 

राजा साहब-जवाब की जरूरत नहीं।

 

चपरासी-कुछ इनाम नहीं मिला। हुजूर ही…

 

राजा साहब ने उसे और कुछ न कहने दिया। जेब से एक रुपया निकालकर फेंक दिया। अरदली चला गया।

 

राजा साहब सोचने लगे-दुष्ट को इनाम माँगते शर्म भी नहीं आती, मानो मेरे नाम कोई धान्यवाद-पत्रा लाए हैं। कुत्तो हैं, और क्या, कुछ न दो, तो काटने दौड़ें, झूठी-सच्ची शिकायतें करें। समझ में नहीं आता, क्लार्क ने क्यों अपना हुक्म मंसूख कर दिया। जॉन सेवक से किसी बात पर अनबन हो गई क्या? शायद सोफ़िया ने क्लार्क को ठुकरा दिया। चलो, यह भी अच्छा ही हुआ। लोग यह तो कहेंगे ही कि अंधो ने राजा साहब को नीचा दिखा दिया; पर इस दुहाई से तो गला छूटेगा।

 

उनकी दशा इस समय उस आदमी की-सी थी, जो अपने मुँह-जोर घोड़े के भाग जाने पर खुश हो। अब हव्यिों के टूटने का भय तो नहीं रहा। मैं घाटे में नहीं हूँ। अब रूठी रानी भी प्रसन्न हो जाएँगी। इंदु से कहूँगा, मैंने ही मिस्टर क्लार्क से अपना फैसला मंसूख करने के लिए कहा है।

 

वह कई दिन से इंदु से मिलने न गए थे। अंदर जाते हुए डरते थे कि इंदु के तानों का क्या जवाब दूँगा। इंदु भी इस भय से उनके पास न आती थी कि कहीं फिर मेरे मुँह से कोई अप्रिय शब्द न निकल जाए। प्रत्येक दाम्पत्य-कलह के पश्चात् जब वह उसके कारणों पर शांत हृदय से विचार करती थी, तो उसे ज्ञात होता था कि मैं ही अपराधिान हूँ, और अपने दुराग्रह पर उसे हार्दिक दु:ख होता था। उसकी माता ने बाल्यावस्था ही से पातिव्रत्य का बड़ा ऊँचा आदर्श उसके सम्मुख रहा था। उस आदर्श से गिरने पर वह मन-ही-मन कुढ़ती और अपने को धिाक्कारती थी-मेरा धार्म उनकी आज्ञा का पालन करना है। मुझे तन-मन से उनकी सेवा करनी चाहिए। मेरा सबसे पहलार् कत्ताव्य उनके प्रति है, देश और जाति का स्थान गौण है; पर मेरा दुर्भाग्य बार-बार मुझेर् कत्ताव्य-मार्ग से विचलित कर देता है। मैं इस अंधो के पीछे बरबस उनसे उलझ पड़ी। वह विद्वान हैं, विचारशील हैं। यह मेरी धाृष्टता है कि मैं उनकी अगुआई करने का दावा करती हूँ। जब मैं छोटी-छोटी बातों में मानापमान का विचार करती हूँ, तो उनसे कैसे आशा करूँ कि वह प्रत्येक विषय में निष्पक्ष हो जाएँ।

 

कई दिन तक मन में यह खिचड़ी पकाते रहने के कारण उसे सूरदास से चिढ़ हो गई। सोचा-इसी अभागे के कारण मैं यह मनस्ताप भोग रही हूँ। इसी ने यह मनोमालिन्य पैदा कराया है। आखिर उस जमीन से मुहल्लेवालों ही का निस्तार होता है न, तो जब उन्हें कोई आपत्तिा नहीं है, तो अंधो की क्यों नानी मरती है! किसी की जमीन पर कोई जबरदस्ती क्यों अधिाकार करे, यह ढकोसला है, और कुछ नहीं। निर्बल जन आदिकाल से ही सताये जाते हैं और सताये जाते रहेंगे। जब यह व्यापक नियम है, तो क्या एक कम, क्या एक ज्यादा।

 

इन्हीं दिनों सूरदास ने राजा साहब को शहर में बदनाम करना शुरू किया, तो उसके ममत्व का पलड़ा बड़ी तेजी से दूसरी ओर झुका। उसे सूरदास के नाम से चिढ़ हो गई-यह टके का आदमी और इसका इतना साहस कि हम लोगों के सिर चढ़े। अगर साम्यवाद का यही अर्थ है, तो ईश्वर हमें इससे बचाए। यह दिनों का फेर है, नहीं तो इसकी क्या मजाल थी कि हमारे ऊपर छींटे उड़ाता।

 

इंदु दीन जनों पर दया कर सकती थी-दया में प्रभुत्व का भाव अंतर्हित है-न्याय न कर सकती थी, न्याय की भित्तिा साम्य पर है। सोचती-यह उस बदमाश को पुलिस के हवाले क्यों नहीं कर देते? मुझसे तो यह अपमान न सहा जाता। परिणाम कुछ होता, पर इस समय तो इस बुरी तरह पेश आती कि देखनेवालों के रोयें खड़े हो जाते।

 

वह इन्हीं कुत्सित विचारों में पड़ी हुई थी कि सोफ़िया ने जाकर उसके सामने राजा साहब पर सूरदास के साथ अन्याय करने का अपराधा लगाया, खुली हुई धामकी दे गई। इंदु को इतना क्रोधा आया कि सूरदास को पाती, तो उसका मुँह नोच लेती। सोफ़िया के जाने के बाद वह क्रोधा में भरी हुई राजा साहब से मिलने आई; पर बाहर मालूम हुआ कि वह कुछ दिन के लिए इलाके पर गए हुए हैं। ये दिन उसने बड़ी बेचैनी में काटे। अफसोस हुआ कि गए और मुझसे पूछा भी नहीं!

 

राजा साहब जब इलाके से लौटे, तो उन्हें मि. क्लार्क का परवाना मिला। वह उस पर विचार कर रहे थे कि इंदु उनके पास आई और बोली-इलाके पर गए और मुझे खबर तक न हुई, मानो मैं घर में हूँ ही नहीं।

 

राजा ने लज्जित होकर कहा-ऐसा ही एक जरूरी काम था। एक दिन की भी देर हो जाती, तो इलााके में फौजदारी हो जाती। मुझे अब अनुभव हो रहा है कि ताल्लुकेदारों के अपने इलाके पर न रहने से प्रजा को कितना कष्ट होता है।

 

‘इलाके में रहते, तो कम-से-कम इतनी बदनामी तो न होती।’

 

‘अच्छा, तुम्हें भी मालूम हो गया। तुम्हारा कहना न मानने में मुझसे बड़ी भूल हुई। इस अंधो ने ऐसी विपत्तिा में डाल दिया कि कुछ करते-धारते नहीं बनता। सारे शहर में बदनाम कर रहा है। न जाने शहरवालों को इससे इतनी सहानुभूति कैसे हो गई। मुझे इसकी जरा भी आशंका न थी कि शहरवालों को मेरे विरुध्द खड़ा कर देगा।’

 

‘मैंने तो जब से सुना है कि अंधाा तुम्हें बदनाम कर रहा है, तब से ऐसा क्रोधा आ रहा है कि वश चले, तो उसे जीता चुनवा दूँ।

 

राजा साहब ने प्रसन्न होकर कहा-तो हम दोनों घूम-घामकर एक ही लक्ष्य पर आ पहुँचे।

 

‘इस दुष्ट को ऐसा दंड देना चाहिए कि उम्र-भर याद रहे।’

 

‘मिस्टर क्लार्क ने इसका फैसला खुद ही कर दिया। सूरदास की जमीन वापस कर दी गई।’

 

इंदु को ऐसा मालूम हुआ कि जमीन धाँस रही है और मैं उसमें समाई जा रही हूँ। वह दीवार न थाम लेती, तो जरूर गिर पड़ती-सोफ़िया ने मुझे यों नीचा दिखाया है। मेरे साथ वह कूटनीति चली है। हमारी मर्यादा को धाूल में मिलाना चाहती है। चाहती है कि मैं उसके कदम चूमूँ। कदापि नहीं।

 

उसने राजा साहब से कहा-अब आप क्या करेंगे?

 

‘कुछ नहीं, करना क्या है। सच पूछो, तो मुझे इसका जरा भी दु:ख नहीं है। मेरा तो गला छूट गया।’

 

‘और हेठी कितनी हुई!’

 

‘हेठी जरूर हुई; पर इस बदनामी से अच्छी है।’

 

इंदु का मुख-मंडल गर्व से तमतमा उठा। बोली-यह बात आपके मुँह से शोभा नहीं देती। यह नेकनामी-बदनामी का प्रश्न नहीं है, अपनी मर्यादा-रक्षा का प्रश्न है। आपकी कुल-मर्यादा पर आघात हुआ है, उसकी रक्षा करना आपका परम धार्म है, चाहे उसके लिए न्याय के सिध्दांताें की बलि ही क्यों न देनी पड़े। मि. क्लार्क की हस्ती ही क्या है, मैं किसी सम्राट् के हाथों भी अपनी मर्यादा की हत्या न होने दूँगी, चाहे इसके लिए मुझे अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि प्राण भी देना पड़े। आप तुरंत गवर्नर को मि. क्लार्क के न्याय-विरुध्द हस्तक्षेप की सूचना दीजिए। हमारे पूर्वजों ने ऍंगरेजों की उस समय प्राण-रक्षा की थी, जब उनकी जानों के लाले पड़े हुए थे। सरकार उन एहसानों को मिटा नहीं सकती। नहीं, आप स्वयं जाकर गवर्नर से मिलिए, उनसे कहिए कि मि. क्लार्क के हस्तक्षेप से मेरा अपमान होगा, मैं जनता की दृष्टि में गिर जाऊँगा और शिक्षित-वर्ग को सरकार में लेश-मात्रा विश्वास न रहेगा। साबित कर दीजिए कि किसी रईस का अपमान करना दिल्लगी नहीं है।

 

राजा साहब ने चिंतित स्वर में कहा-मि. क्लार्क से सदा के लिए विरोधा हो जाएगा। मुझे आशा नहीं है कि उनके मुकाबले में गवर्नर मेरा पक्ष ले। तुम इन लोगों को जानती नहीं हो। इनकी अफसरी-मातहती दिखाने-भर की है, वास्तव में सब एक हैं। एक जो करता है, सब उसका समर्थन करते हैं। व्यर्थ की हैरानी होगी।

 

‘अगर गवर्नर न सुनें, तो वाइसराय से अपील कीजिए। विलायत जाकर वहाँ के नेताओं से मिलिए। यह कोई छोटी बात नहीं है, आपके सिर पर एक महान् उत्तारदायित्व का भार आ पड़ा है, उसमें जौ-भर भी दबना आपको सदा के लिए कलंकित कर देगा।’

 

राजा साहब ने एक मिनट तक विचार करके कहा-तुम्हें यहाँ के शिक्षितों का हाल मालूम नहीं है। तुम समझती होगी कि वे मेरी सहायता करेंगे, या कम-से-कम सहानुभूति ही दिखाएँगे; पर जिस दिन मैंने प्रत्यक्ष रूप से मि. क्लार्क की शिकायत की, उसी दिन से लोग मेरे घर आना-जाना छोड़ देंगे। कोई मुँह तक न दिखाएगा। लोग रास्ता कतराकर निकल जाएँगे। इतना ही नहीं, गुप्त रूप से क्लार्क से मेरी शिकायत करेंगे और मुझे हानि पहुँचाने में कोई बात उठा न रखेंगे। हमारे भद्र समाज की नैतिक दुर्बलता अत्यंत लज्जाजनक है। सब-के-सब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के आश्रित हैं। जब तक उन्हें मालूम है कि हुक्काम से मेरी मैत्राी है, तभी तक मेरा आदर-सत्कार करते हैं। जिस दिन उन्हें मालूम होगा कि जिलाधाीश की निगाह मुझसे फिर गई, उसी दिन से मेरे मान-सम्मान की इति समझो। अपने बंधाुओं की यही दुर्बलता और कुटिल स्वार्थ-लोलुपता है, जो हमारे निर्भीक, सत्यवादी और हिम्मत के धानी नेताओं को हताश कर देती है।

 

राजा साहब ने बहुत हीले-हवाले किए, परिस्थिति का बहुत ही दुराशापूर्ण चित्रा खींचा, लेकिन इंदु अपने धयेय से जौ-भर भी न टली। वह उनके हृदय में उस सोये हुए भाव को जगाना चाहती थी, जो कभी प्रताप और साँगा, टीपू और नाना के नाम पर लहालोट हो जाता था। वह जानती थी कि वह भाव प्रभुत्व-प्रेम की घोर निद्रा में मग्न है, मरा नहीं। बोली-अगर मान लें कि आपकी सारी शंकाएँ पूरी हो जाएँ, आपका सम्मान मिट जाए, सारा शहर आपका दुश्मन हो जाए, हुक्काम आपको संदेह की दृष्टि से देखने लगें, यहाँ तक कि आपके इलाके के जब्त होने की नौबत भी आ जाए, तब भी मैं आपसे यही कहती जाऊँगी, अपने स्थान पर अटल रहिए। यही हमारा क्षात्रा धार्म है। आज ही यह बात समाचार-पत्राों में प्रकाशित हो जाएगी और सारी दुनिया नहीं, तो कम-से-कम समस्त भारत आपकी ओर उत्सुक नेत्राों से देखेगा कि आप जातीय गौरव की कितने धौर्य, साहस और त्याग के साथ रक्षा करते हैं। इस संग्राम में हमारी हार भी महान् विजय का स्थान पाएगी; क्योंकि वह पशु-बल की नहीं, आत्मबल की लड़ाई है। लेकिन मुझे तो पूर्ण विश्वास है कि आपकी शंकाएँ निर्मूल सिध्द होंगी। एक कर्मचारी के अन्याय की फरियाद सरकार के कानों में पहुँचाकर आप उस सुदृढ़ राजभक्ति का परिचय देंगे, सरकार की उस न्याय-रीति पर पूर्ण विश्वास की घोषणा करेंगे, जो साम्राज्य का आधाार है। बालक माता के सामने रोये, हठ करे, मचले; पर माता की ममता क्षण-मात्रा भी कम नहीं होती। मुझे तो निश्चय है कि सरकार अपने न्याय की धााक जमाने के लिए आपका और भी सम्मान करेगी। जातीय आंदोलन के नेता प्राय: उच्च कोटि की उपाधिायों से विभूषित किए जाते हैं, और, कोई कारण नहीं कि आपको भी वही सम्मान न प्राप्त हो।

 

यह युक्ति राजा साहब को विचारणीय जान पड़ी। बोले-अच्छा, सोचूँगा। इतना कहकर चले गए।

 

दूसरे दिन सुबह जॉन सेवक राजा साहब से मिलने आए। उन्होंने भी यही सलाह दी कि इस मुआमले में जरा भी न दबना चाहिए। लड़ूँगा तो मैं, आप केवल मेरी पीठ ठोकते जाइएगा। राजा साहब को कुछ ढाढ़स हुआ, एक से दो हुए। संधया समय वह कुँवर साहब से सलाह लेने गए। उनकी भी यही राय हुई। डॉक्टर गांगुली तार द्वारा बुलाए गए। उन्होंने यहाँ तक जोर दिया कि ‘आप चुप भी हो जाएँगे, तो मैं व्यवस्थापक सभा में इस विषय को अवश्य उपस्थित करूँगा। सरकार हमारे वाणिज्य-व्यवसाय की ओर इतनी उदासीन नहीं रह सकती। यह न्याय-अन्याय या मानापमान का प्रश्न नहीं है, केवल व्यावसायिक प्रतिस्पधर्ाा का प्रश्न है।’

 

राजा साहब इंदु से बोले-लो भाई, तुम्हारी ही सलाह पक्की रही। जान पर खेल रहा हूँ।

 

इंदु ने उन्हें श्रध्दा की दृष्टि से देखकर कहा-ईश्वर ने चाहा तो आपकी विजय ही होगी।

 

 

सैयद ताहिर अली को पूरी आशा थी कि जब सिगरेट का कारखाना बनना शुरू हो जाएगा, तो मेरी कुछ-न-कुछ तरक्की हो जाएगी। मि. सेवक ने उन्हें इसका वचन दिया था। इस आशा के सिवा उन्हें अब तक ऋणों को चुकाने का कोई उपाय न नजर आता था, जो दिनों-दिन बरसात की घास के समान बढ़ते जाते थे। वह स्वयं बड़ी किफायत से रहते थे। ईद के अतिरिक्त कदाचित् और कभी दूधा उनके कंठ के नीचे न जाता था। मिठाई उनके लिए हराम थी। पान-तम्बाकू का उन्हें शौक ही न था। किंतु वह खुद चाहे कितने ही किफायत करें, घरवालों की जरूरत में काट-कपट करना न्याय-विरुध्द समझते थे। जैनब औैर रकिया अपने लड़कों के लिए दूधा लेना आवश्यक समझती थीं। कहतीं-यही तो लड़कों के खाने-पीने की उम्र है, इसी उम्र में तो उनकी हव्यिाँ चौड़ी-चकली होती हैं, दिल और दिमाग बढ़ते हैं। इस उम्र में लड़को को मुकब्बी खाना न मिले, तो उनकी सारी जिंदगी बरबाद हो जाती है।

 

लड़कों के विषय में यह कथन सत्य हो या नहीं; पर पान-तम्बाकू के विषय में ताहिर अली की विमाताएँ जिस युक्ति का प्रतिपादन करती थीं, उसकी सत्यता स्वयंसिध्द थी-स्त्रिायों का इनके बगैर निबाह ही नहीं हो सकता। कोई देखे तो कहे, क्या इनके यहाँ पान तक मयस्सर नहीं, यही तो अब शराफत की एक निशानी रह गई है, मामाएँ नहीं, खवासें नहीं, तो क्या पान से भी गए। मर्दों को पान की ऐसी जरूरत नहीं। उन्हें हाकिमों से मिलना-जुलना पड़ता है, पराई बंदगी करते हैं, उन्हें पान की क्या जरूरत!

 

विपत्तिा यह थी कि माहिर और जाबिर तो मिठाइयाँ खाकर ऊपर से दूधा पीते और साबिर और नसीमा खड़े मुँह ताका करते। जैनब बेगम कहतीं-इनके गुड़ के बाप कोल्हू ही, खुदा के फजल से जिंदा हैं। सबको खिलाकर खिलाएँ, तभी खिलाना कहलाए। सब कुछ तो उन्हीं की मुट्ठी में है, जो चाहें खिलाएँ, जैसे चाहें रखें; कोई हाथ पकड़नेवाला है?

 

वे दोनों दिन-भर बकरी की तरह पान चबाया करतीं, कुल्सूम को भोजन के पश्चात् एक बीड़ा भी मुश्किल से मिलता था। अपनी इन जरूरतों के लिए ताहिर अली से पूछने या चादर देखकर पाँव फैलाने की जरूरत न थी।

 

प्रात:काल था। चमड़े की खरीद हो रही थी। सैकड़ों चमार बैठे चिलम पी रहे थे। यही एक समय था, जब ताहिर अली को अपने गौरव का कुछ आनंद मिलता था। इस वक्त उन्हें अपने महत्तव का हलका-सा नशा हो जाता था। एक चमार द्वार पर झाड़ू लगाता, एक उनका तख्त साफ करता, एक पानी भरता। किसी को साग-भाजी लाने के लिए बाजार भेज देते और किसी से लकड़ी चिराते। इतने आदमियों को अपनी सेवा में तत्पर देखकर उन्हें मालूम होता था कि मैं भी कुछ हूँ। उधार जैनब और रकिया परदे में बैठी पानदान का खर्च वसूल करतीं। साहब ने ताहिर अली को दस्तूरी लेने से मना किया था, स्त्रिायों को पान-पत्तो का खर्च लेने का निषेधा न किया था। इस आमदनी से दोनों ने अपने-अपने लिए गहने बनवा लिए थे। ताहिर अली इस रकम का हिसाब लेना छोटी बात समझते थे।

 

इसी समय जगधार आकर बोला-मुंसीजी, हिसाब कब तक चुकता कीजिएगा? मैं कोई लखपती थोड़े ही हूँ कि रोज मिठाइयाँ देता जाऊँ, चाहे दाम मिलें या न मिलें। आप जैसे दो-चार गाहक और मिल जाएँ, तो मेरा दिवाला ही निकल जाए। लाइए, रुपये दिलवाइए, अब हीला-हवाला न कीजिए, गाँव-मुहल्ले की बहुत मुरौवत कर चुका। मेरे सिर भी तो महाजन का लहना-तगादा है। यह देखिए कागद, हिसाब कर दीजिए।

 

देनदारों के लिए हिसाब का कागज यमराज का परवाना है। वे उसकी ओर ताकने का साहस नहीं कर सकते। हिसाब देखने का मतलब है,रुपये अदा करना। देनदार ने हिसाब का चिट्ठा हाथ में लिया और पानेवाले का हृदय आशा से विकसित हुआ। हिसाब का परत हाथ में लेकर फिर कोई हीला नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि देनदारों को खाली हाथ हिसाब देखने का साहस नहीं होता।

 

ताहिर अली ने बड़ी नम्रता से कहा-भई, हिसाब सब मालूम है, अब बहुत जल्द तुम्हारा बकाया साफ़ हो जाएगा। दो-चार दिन और सब्र करो।

 

जगधार-कहाँ तक सबर करूँ साहब? दो-चार दिन करते-करते तो महीनों हो गए। मिठाइयाँ खाते बखत तो मीठी मालूम होती हैं, दाम देते क्यों कड़घवा लगता है?

 

ताहिर-बिरादर, आजकल ज़रा तंग हो गया हूँ, मगर अब जल्द कारखाने का काम शुरू होगा, मेरी भी तरक्की होगी। बस, तुम्हारी एक-एक कौड़ी चुका दूँगा।

 

जगधार-ना साहब, आज तो मैं रुपये लेकर ही जाऊँगा। महाजन के रुपये न दूँगा, तो आज मुझे छटाँक-भर भी सौदा न मिलेगा। भगवान् जानते हैं, जो मेरे घर में टका भी हो। यह समझिए कि आप मेरा नहीं, अपना दे रहे हैं। आपसे झूठ बोलता होऊँ, तो जवानी काम न आए,रात बाल-बच्चे भूखे ही सो रहे। सारे मुहल्ले में सदा लगाई, किसी ने चार आने पैसे न दिए।

 

चमारों के चौधारी को जगधार पर दया आ गई। ताहिर अली से बोला-मुंशीजी, मेरा पावना इन्हीं को दे दीजिए, मुझे दो-चार दिन में दीजिएगा।

 

ताहिर-जगधार, मैं खुदा को गवाह करके कहता हूँ, मेरे पास रुपये नहीं हैं, खुदा के लिए दो-चार दिन ठहर जाओ।

 

जगधार-मुंसीजी, झूठ बोलना गाय खाना है, महाजन के रुपये आज न पहँचे, तो कहीं का नहीं रहूँगा।

 

ताहिर अली ने घर में आकर कुल्सूम से कहा-मिठाईवाला सिर पर सवार है, किसी तरह टलता ही नहीं। क्या करूँ, रोकड़ में से दस रुपये निकालकर दे दूँ?

 

कुल्सूम ने चिढ़कर कहा-जिसके दाम आते हैं, वह सिर पर सवार होगा ही! अम्माँजान से क्यों नहीं माँगते? मेरे बच्चों को तो मिठाई मिली नहीं; जिन्होंने उचक-उचककर खाया-खिलाया है, वे दाम देने की बेर क्यों भीगी बिल्ली बनी बैठी हुई हैं?

 

ताहिर-इसी मारे तो मैं तुमसे बात कहता नहीं। रोकड़ से ले लेने में क्या हरज है? तनख्वाह मिलते ही जमा कर दूँगा।

 

कुल्सूम-खुदा के लिए कहीं यह गजब न करना। रोकड़ को काला साँप समझो। कहीं आज ही साहब रकम की जाँच करने लगे तो?

 

ताहिर-अजी नहीं, साहब को इतनी फुरसत कहाँ कि रोकड़ मिलाते रहें!

 

कुल्सूम-मैं अमानत की रकम छूने को न कहूँगी। ऐसा ही है, तो नसीमा का तौक उतारकर कहीं गिरो रख दो, और तो मेरे किए कुछ नहीं हो सकता।

 

ताहिर अली को दु:ख तो बहुत हुआ; पर करते क्या। नसीमा का तौक निकालते थे, और रोते थे। कुल्सूम उसे प्यार करती थी और फुसलाकर कहती थी, तुम्हें नया तौक बनवाने जा रहे हैं। नसीमा फूली न समाती थी कि मुझे नया तौक मिलेगा।

 

तौक माल में लिए हुए ताहिर अली बाहर निकले, और जगधार को अलग ले जाकर बोले-भई, इसे ले जाओ, कहीं गिरो रखकर अपना काम चलाओ। घर में रुपये नहीं हैं।

 

जगधार-उधाार सौदा बेचना पाप है, पर करूँ क्या, नगद बेचने लगूँ, तो घूमता ही रह जाऊँ।

 

यह कहकर उसने सकुचाते हुए तौक ले लिया और पछताता हुआ चला गया। कोई दूसरा आदमी अपने ग्राहक को इतना दिक करके रुपये न वसूल करता। उसे लड़की पर दया आ ही जाती, जो मुस्कराकर कह रही थी, मेरा तौक कब बनाकर लाओगे? परंतु जगधार गृहस्थी के असह्य भार के कारण उससे कहीं असज्जन बनने पर मजबूर था, जितना वह वास्तव में था।

 

जगधार को गए आधा घंटा भी न गुजरा था कि बजरंगी त्योरियाँ बदले हुए आकर बोला-मुंशीजी, रुपये देने हों, तो दीजिए, नहीं तो कह दीजिए, बाबा, हमसे नहीं हो सकता; बस, हम सबर कर लें। समझ लेंगे कि एक गाय नहीं लगीं रोज-रोज दौड़ाते क्यों हैं?

 

ताहिर-बिरादर, जैसे इतने दिनों तक सब्र किया है, थोड़े दिन और करो। खुदा ने चाहा, तो अबकी तुम्हारी एक पाई भी न रहेगी।

 

बजरंगी-ऐसे वादे तो आप बीसों बार कर चुके हैं।

 

ताहिर-अबकी पक्का वादा करता हूँ।

 

बजरंगी-तो किस दिन हिसाब कीजिएगा?

 

ताहिर अली असमंजस में पड़ गए, कौन-सा दिन बतलाएँ। देनदारों को हिसाब के दिन का उतना ही भय होता है, जितना पापियों को। वे’दो-चार’, ‘बहुत जल्द’, ‘आज-कल में’ आदि अनिश्चयात्मक शब्दों की आड़ लिया करते हैं। ऐसे वादे पूरे किए जाने के लिए नहीं, केवल पानेवालों को टालने के लिए किए जाते हैं। ताहिर अली स्वभाव से खरे आदमी थे। तकाजों से उन्हें बड़ा कष्ट होता था। वह तकाजों से उतना ही डरते थे, जितना शैतान से। उन्हें दूर से देखते ही उनके प्राण-पखेरू छटपटाने लगते थे। कई मिनट तक सोचते रहे, क्या जवाब दूँ, खर्च का यह हाल है, और तरक्की के लिए कहता हूँ, तो कोरा जवाब मिलता है। आखिरकार बोले-दिन कौन-सा बताऊँ, चार-छ: दिन में जब आ जाओगे, उसी दिन हिसाब हो जाएगा।

 

बजरंगी-मुंशीजी, मुझसे उड़नघाइयाँ न बताइए। मुझे भी सभी तरह के ग्राहकों से काम पड़ता है। अगर दस दिन में आऊँगा, तो आप कहेंगे,इतनी देर क्यों की, अब रुपये खर्च हो गए। चार-पाँच दिन में आऊँगा, तो आप कहेंगे, अभी तो रुपये मिले ही नहीं। इसलिए मुझे कोई दिन बता दीजिए, जिसमें मेरा भी हरज न हो और आपको भी सुबीता हो।

 

ताहिर-दिन बता देने में मुझे कोई उज्र न होता, लेकिन बात यह है कि मेरी तनख्वाह मिलने की कोई तारीख मुकर्रर नहीं है; दो-चार दिनों का हेर-फेर हो जाता है। एक हफ्ते के बाद किसी लड़के को भी भेज दोगे, तो रुपये मिल जाएँगे।

 

बजरंगी-अच्छी बात है, आप ही का कहना सही। अगर अबकी वादाखिलाफी कीजिएगा, तो फिर माँगने न आऊँगा।

 

बजरंगी चला गया, तो ताहिर अली डींग मारने लगे-तुम लोग समझते होगे, ये लोग इतनी-इतनी तलब पाते हैं, घर में बटोरकर रखते होंगे,और यहाँ खर्च का यह हाल है कि आधाा महीना भी नहीं खत्म होता और रुपये उड़ जाते हैं। शराफत रोग है, और कुछ नहीं।

 

एक चमार ने कहा-हुजूर, बड़े आदमियों का खर्च भी बड़ा होता है। आप ही लोगों की बदौलत तो गरीबोें की गुजर होती है। घोड़े की लात घोड़ा ही सह सकता है।

 

ताहिर-अजी, सिर्फ पान में इतना खर्च हो जाता है कि उतने में दो आदमियों का अच्छी तरह गुजर हो सकता है।

 

चमार-हुजूर, देखते नहीं हैं, बड़े आदमियों की बड़ी बात होती है।

 

ताहिर अली के ऑंसू अच्छी तरह न पुँछने पाए थे कि सामने से ठाकुरदीन आता हुआ दिखाई दिया। बेचारे पहले ही से कोई बहाना सोचने लगे। इतने में उसने आकर सलाम किया और बोला-मुंशीजी, कारखाने में कब से हाथ लगेगा?

 

ताहिर-मसाला जमा हो रहा है। अभी इंजीनियर ने नक्शा नहीं बनाया है, इसी वजह से देर हो रही है।

 

ठाकुरदीन-इंजीनियर ने भी कुछ लिया होगा? बड़ी बेईमान जात है हुजूर, मैंने भी कुछ दिन ठेकेदारी की है; जो कमाता था, इंजीनियरों को खिला देता था। आखिर घबराकर छोड़ बैठा। इंजीनियर के भाई डॉक्टर होते हैं। रोगी चाहे मरता हो, पर फीस लिए बिना बात न सुनेंगे। फीस के नाम से रिआयत भी करोगे, तो गाड़ी के किराए और दवा के दाम में कस लेंगे, (हिसाब का परत दिखाकर) जरा इधार भी एक निगाह हो जाए।

 

ताहिर-सब मालूम है, तुमने गलत थोड़े ही लिखा होगा।

 

ठाकुरदीन-हुजूर, ईमान है, तो सब कुछ है। साथ कोई न जाएगा। तो मुझे क्या हुकुम होता है?

 

ताहिर-दो-चार दिन की मुहलत दो।

 

ठाकुरदीन-जैसी आपकी मरजी। हुजूर, चोरी हो जाने से लाचार हो गया, नहीं तो दो-चार रुपयों की कौन बात थी। उस चोरी में तबाह हो गया। घर में फूटा लोटा तक न बचा। दाने को मुहताज हो गया हुजूर! चोरों को ऑंखों के सामने भागते देखा, उनके पीछे दौड़ा। पागलखाने तक दौड़ता चला गया। ऍंधोरी रात थी, ऊँच-खाल कुछ न सूझता था। एक गढ़े में गिर पड़ा। फिर उठा। माल बड़ा प्यारा होता है। लेकिन चोर निकल गए थे। थाने में इत्ताला की, थानेदारों की खुशामद की। मुदा गई हुई लच्छमी कहीं लौटती हैं। तो कब आऊँ?

 

ताहिर-तुम्हारे आने की जरूरत नहीं, मैं खुद भिजवा दूँगा।

 

ठाकुरदीन-जैसी आपकी खुशी, मुझे कोई उजर नहीं है। मुझे तगादा करते आप ही सरम आती है। कोई भलामानुस हाथ में पैसे रहते हुए टालमटोल नहीं करता, फौरन निकालकर फेंक देता है। आज जरा पान लेने जाना था, इसीलिए चला आया था। सब न हो सके, तो थोड़ा-बहुत दे दीजिए। किसी तरह काम न चला, तब आपके पास आया। आदमी पहचानता हूँ हुजूर, पर मौका ऐसा ही आ पड़ा है।

 

ठाकुरदीन की विनम्रता और प्रफुल्लित सहृदयता ने ताहिर अली को मुग्धा कर दिया। तुरंत संदूक खोला और पाँच रुपये निकालकर उसके सामने रख दिए। ठाकुरदीन ने रुपये उठाए नहीं, एक क्षण कुछ विचार करता रहा, तब बोला-ये आपके रुपये हैं कि सरकारी रोकड़ के हैं?

 

ताहिर-तुम ले जाओ, तुम्हें आम खाने से मतलब कि पेड़ गिनने से?

 

ठाकुरदीन-नहीं मुंशीजी, यह न होगा। अपने रुपये हों, तो दीजिए, मालिक की रोकड़ हो, तो रहने दीजिए; फिर आकर ले जाऊँगा। आपके चार पैसे खाता हूँ, तो आपको ऑंखों से देखकर गढ़े में न गिरने दूँगा। बुरा मानिए, तो मान जाइए, इसकी चिंता नहीं, साफ बात करने के लिए बदनाम हूँ, आपके रुपये यों अलल्ले-तलल्ले खर्च होंगे, तो एक दिन आप धाोखा खाएँगे। सराफत ठाटबाट बढ़ने में नहीं है, अपनी आबरू बचाने में है।

 

ताहिर अली ने सजल नयन होकर कहा-रुपये लेते जाओ।

 

ठाकुरदीन उठ खड़ा हुआ और बोला-जब आपके पास हों, तब देना।

 

अब तक तो ताहिर अली को कारखाने के बनने की उम्मीद थी। इधार आमदनी बढ़ी, उधार मैंने रुपये दिए; लेकिन जब मि. क्लार्क ने अनिश्चित समय तक के लिए कारखाने का काम बंद करवा दिया, तब ताहिर अली का अपने लेनदारों को समझाना मुश्किल हो गया। लेनदारों ने ज्यादा तंग करना शुरू किया। ताहिर अली बहुत चिंतित रहने लगे, बुध्दि कुछ काम न करती थी। कुल्सूम कहती थी-ऊपर का खर्च सब बंद कर दिया जाए। दूधा, पान और मिठाइयों के बिना आदमी को कोई तकलीफ नहीं हो सकती। ऐसे कितने आदमी हैं जिन्हें इस जमाने में ये चीजें मयस्सर हैं? और की क्या कहूँ, मेरे ही लड़के तरसते हैं। मैं पहले भी समझा चुकी हूँ और अब फिर समझाती हूँ कि जिनके लिए तुम अपना खून और पसीना एक कर रहे हो, वे तुम्हारी बात भी न पूछेंगे। पर निकलते ही साफ उड़ न जाएँ, तो कहना। अभी से रुख देख रही हूँ। औरों को सूद पर रुपये दिए जाते हैं, जेवर बनवाए जाते हैं; लेकिन घर के खर्च को कभी कुछ माँगो, तो टका-सा जवाब मिलता है, मेरे पास कहाँ। तुम्हारे ऊपर इन्हें कुछ तो रहम आना चाहिए। आज दूधा, मिठाइयाँ बंद कर दो, तो घर में रहना मुश्किल हो जाए।

 

तीसरा पहर था। ताहिर अली बरामदे में उदास बैठे हुए थे। सहसा भैरों आकर बैठ गया, और बोला-क्यों मुंशीजी, क्या सचमुच अब यहाँ कारखाना न बनेगा?

 

ताहिर-बनेगा क्यों नहीं, अभी थोड़े दिनों के लिए रुक गया है।

 

भैरों-मुझे तो बड़ी आशा थी कि कारखाना बन गया, तो मेरा बिकरी-बट्टा बढ़ जाएगा; दूकान पर बिक्री बिल्कुल मंदी है। मैं चाहता हूँ कि यहाँ सबेरे थोड़ी देर बैठा करूँ। आप मंजूर कर लें, तो अच्छा हो। मेरी थोड़ी-बहुत बिकरी हो जाएगी। आपको भी पान खाने के लिए कुछ नजर कर दिया करूँगा।

 

किसी और समय ताहिर अली ने भैरों को डाँट बताई होती। ताड़ी की दूकान खोलने की आज्ञा देना उनके धार्म-विरुध्द था। पर इस समय रुपये की चिंता ने उन्हें असमंजस में डाल दिया। इससे पहले भी धानाभाव के कारण उनके कर्म और सिध्दांतों में कई बार संग्राम हो चुका था,और प्रत्येक अवसर पर उन्हें सिध्दांतों ही का खून करना पड़ा था। आज वही संग्राम हुआ और फिर सिध्दांतों ने परिस्थितियों के सामने सिर झुका दिया। सोचने लगे-क्या करूँ? इसमें मेरा क्या कसूर? मैं किसी बेजा खर्च के लिए शरा को नहीं तोड़ रहा हूँ, हालत ने मुझे बेबस कर दिया है। कुछ झेंपते हुए बोले-यहाँ ताड़ी की बिकरी न होगी।

 

भैरों-हुजूर, बिकरी तो ताड़ी की महक से होगी। नसेबाजों की ऐसी आदत होती है कि न देखें, तो चाहे बरसों न पिएँ, पर नसा सामने देखकर उनसे नहीं रहा जाता।

 

ताहिर-मगर साहब के हुक्म के बगैर मैं कैसे इजाजत दे सकता हूँ?

 

भैरों-आपकी जैसी मरजी! मेरी समझ में तो साहब से पूछने की जरूरत ही नहीं। मैं कौन यहाँ दूकान रखूँगा। सबेरे एक घड़ा लाऊँगा, घड़ी-भर में बेचकर अपनी राह लूँगा। उन्हें खबर ही न होगी कि यहाँ कोई ताड़ी बेचता है।

 

ताहिर-नमकहरामी सिखाते हो, क्यों?

 

भैरों-हुजूर, इसमें नमकहरामी काहे की, अपने दाँव-घात पर कौन नहीं लेता?

 

सौदा पट गया। भैरों एकमुश्त 15 रुपये देने को राजी हो गया। जाकर सुभागी से बोला-देख, सौदा कर आया न! तू कहती थी, वह कभी न मानेंगे, इसलाम हैं, उनके यहाँ ताड़ी-सराब मना है, पर मैंने कह न दिया था कि इसलाम हो, चाहे बाम्हन हो, धारम-करम किसी में नहीं रह गया। रुपये पर सभी लपक पड़ते हैं। ये मियाँ लोग बाहर ही से उजले कपड़े पहने दिखाई देते हैं। घर में भूनी भाँग नहीं होती। मियाँ ने पहले तो दिखाने के लिए इधार-उधार किया, फिर 15 रुपये में राजी हो गए। पंद्रह रुपये तो पंद्रह दिन में सीधो हो जाएँगे।

 

सुभागी पहले घर की मालकिन बनना चाहती थी, इसलिए रोज डंडे खाती थी। अब वह घर-भर की दासी बनकर मालकिन बनी हुई है। रुपये-पैसे उसी के हाथ में रहते हैं। सास, जो उसकी सूरत से जलती थी, दिन में सौ-सौ बार उसे आशीर्वाद देती है। सुभागी ने चटपट रुपये निकालकर भैरों को दिए। शायद दो बिछुड़े हुए मित्रा इस तरह टूटकर गले न मिलते होंगे, जैसे ताहिर अली इन रुपयों पर टूटे। रकम छोटी थी इसके बदले में उन्हें अपने धार्म की हत्या करनी पड़ी थी। लेनदार अपने-अपने रुपये ले गए। ताहिर अली के सिर का बोझ हलका हुआ, मगर उन्हें बहुत रात तक नींद न आई। आत्मा की आयु दीर्घ होती है। उसका गला कट जाए, पर प्राण नहीं निकलते।

 

अब तक सूरदास शहर में हाकिमों के अत्याचार की दुहाई देता रहा, उसके मुहल्ले वाले जॉन सेवक के हितैषी होने पर भी उससे सहानुभूति करते रहे। निर्बलों के प्रति स्वभावत: करुणा उत्पन्न हो जाती है। लेकिन सूरदास की विजय होते ही यह सहानुभूति स्पध्र्दा के रूप में प्रकट हुई। यह शंका पैदा हुई कि सूरदास मन में हम लोगों को तुच्छ समझ रहा होगा। कहता होगा, जब मैंने राजा महेंद्रकुमार सिंह-जैसों को नीचा दिखा दिया, उनका गर्व चूर-चूर कर दिया, तो ये लोग किस खेत की मूली हैं। सारा मुहल्ला उससे मन-ही-मन खार खाने लगा। केवल एक ठाकुरदीन था, जो अब भी उसके पास आया-जाया करता था। उसे अब यकीन हो गया था कि सूरदास को अवश्य किसी देवता का इष्ट है,उसने जरूर कोई मंत्रा सिध्द किया है, नहीं तो उसकी इतनी कहाँ मजाल कि ऐसे-ऐसे प्रतापी आदमियों का सिर झुका देता। लोग कहते हैं,जंत्रा-मंत्रा सब ढकोसला है। यह कौतुक देखकर भी उनकी ऑंखें नहीं खुलतीं।

 

सूरदास के स्वभाव में भी अब कुछ परिवर्तन हुआ। धौर्यशील वह पहले ही से था; पर न्याय और धार्म के पक्ष में कभी-कभी उसे क्रोधा आ जाता था। अब उसमें अग्नि का लेशांश भी न रहा; घूर था, जिस पर सभी कूड़े फेंकते हैं। मुहल्लेवाले राह चलते उसे छेड़ते, आवाजें कसते,ताने मारते; पर वह किसी को जवाब न देता, सिर झुकाए भीख माँगने जाता और चुपके से अपनी झोंपड़ी में आकर पड़ रहता। हाँ, मिठुआ के मिजाज न मिलते थे, किसी से सीधो मुँह बात न करता। कहता, यह कोई न समझे कि अंधा भीख माँगता है, अंधा बड़े-बड़ों की पीठ में धाूल लगा देता है। बरबस लोगों को छेड़ता, भले आदमियों से बतबढ़ाव कर बैठता। अपने हमजोलियों से कहता, चाहूँ तो सारे मुहल्ले को बँधावा दूँ। किसानों के खेतों से बेधाड़क चने, मटर, मूली, गाजर उखाड़ लाता; अगर कोई टोकता, तो उससे लड़ने को तैयार हो जाता था। सूरदास को नित्य उलहने मिलने लगे। वह अकेले में मिठुआ को समझाता; पर उस पर कुछ असर न होता था। अनर्थ यह था कि सूरदास की नम्रता और सहिष्णुता पर तो किसी की निगाह न जाती थी, मिठुआ की लनतरानियों और दुष्टताओं पर सभी की निगाह पड़ती थी। लोग यहाँ तक कह जाते थे कि सूरदास ने ही उसे सिर चढ़ा लिया है, बछवा खूँटे ही के बल कूदता है।र् ईष्या बाल-क्रीड़ाओं को भी कपट-नीति समझती है।

 

आजकल सोफ़िया मि. क्लार्क के साथ सूरदास से अकसर मिला करती थी। वह नित्य उसे कुछ-न-कुछ देती और उसकी दिलजोई करती। पूछती रहती, मुहल्लेवाले या राजा साहब के आदमी तुम्हें दिक तो नहीं कर रहे हैं। सूरदास जवाब देता, मुझ पर सब लोग दया करते हैं, मुझे किसी से शिकायत नहीं है। मुहल्लेवाले समझते थे, वह बड़े साहब से हम लोगों की शिकायत करता है। अन्योक्तियों द्वारा यह भाव प्रकट भी करते-‘सैंयाँ भये कोतवाल, अब डर काहे का’? ‘प्यादे से फरजी भयो, टेढ़ो-टेढ़ो जाए।’ एक बार किसी चोरी के सम्बंधा में नायकराम के घर में तलाशी हो गई। नायकराम को संदेह हुआ, सूरदास ने यह तीर मारा है। इसी भाँति एक बार भैरों से आबकारी के दारोगा ने जवाब तलब किया। भैरों ने शायद नियम के विरुध्द आधाी रात तक दूकान खुली रखी थी। भैरों का भी शुभा सूरदास ही पर हुआ, इसी ने यह चिनगारी छोड़ी है। इन लोगों के संदेह पर तो सूरदास को बहुत दु:ख न हुआ, लेकिन जब सुभागी खुल्लमखुल्ला उसे लांछित करने लगी, तो उसे बहुत दु:ख हुआ। उसे विश्वास था कि कम-से-कम सुभागी को मेरी नीयत का हाल मालूम है। उसे मुझको इन लोगों के अन्याय से बचाना चाहिए था, मगर उसका मन भी मुझसे फिर गया।

 

इस भाँति कई महीने गुजर गए। एक दिन रात को सूरदास खा-पीकर लेटा हुआ था कि किसी ने आकर चुपके से उसका हाथ पकड़ा। सूरदास चौंका, पर सुभागी की आवाज़ पहचानकर बोला-क्या कहती है?

 

सुभागी-कुछ नहीं, जरा मड़ैया में चलो, तुमसे कुछ कहना है।

 

सूरदास उठा और सुभागी के साथ झोंपड़ी में आकर बोला-कह, क्या कहती है? अब तो तुझे भी मुझसे बैर हो गया है। गालियाँ देती फिरती है, चारों ओर बदनाम कर रही है। बतला, मैंने तेरे साथ कौन-सी बुराई की थी कि तने मेरी बुराई पर कमर बाँधा ली? और लोग मुझे भला-बुरा कहते हैं, मुझे रंज नहीं होता; लेकिन जब तुझे ताने देते सुनता हूँ, तो मुझे रोना आता है, कलेजे में पीड़ा-सी होने लगती है। जिस दिन भैरों की तलबी हुई थी, तूने कितना कोसा था। सच बता, क्या तुझे भी सक हुआ था कि मैंने ही दारोगाजी से शिकायत की है? क्या तू मुझे इतना नीच समझती है? बता।

 

सुभागी ने करुणावरुध्द कंठ से उत्तार दिया-मैं तुम्हारा जितना आदर करती हूँ, उतना और किसी का नहीं। तुम अगर देवता होते, तो भी इतनी ही सिरधा से तुम्हारी पूजा करती।

 

सूरदास-मैं क्या घमंड करता हूँ? साहब से किसकी शिकायत करता हूँ? जब जमीन निकल गई थी, तब तो लोग मुझसे न चिढ़ते थे। अब जमीन छूट जाने से क्यों सब-के-सब मेरे दुसमन हो गए हैं? बता, मैं क्या घमंड करता हूँ? मेरी जमीन छूट गई है, तो कोई बादसाही मिल गई है कि घमंड करूँगा?

 

सुभागी-मेरे मन का हाल भगवान जानते होंगे।

 

सूरदास-तो मुझे क्यों जलाया करती है?

 

सुभागी-इसलिए।

 

यह कहकर उसने एक छोटी-सी पोटली सूरदास के हाथ में रख दी। पोटली भारी थी। सूरदास ने उसे टटोला और पहचान गया। यह उसी की पोटली थी, जो चोरी गई थी। अनुमान से मालूम हुआ कि रुपये भी उतने ही हैं। विस्मित होकर बोला-यह कहाँ मिली?

 

सुभागी-तुम्हारी मिहनत की कमाई है, तुम्हारे पास आ गई। अब जतन से रखना।

 

सूरदास-मैं न रखूँगा। इसे ले जा।

 

सुभागी-क्यों? अपनी चीज लेने में कोई हरज है?

 

सूरदास-यह मेरी चीज नहीं; भैरों की चीज है। इसी के लिए भैरों ने अपनी आत्मा बेची है; महँगा सौदा लिया है। मैं इसे कैसे लू लूँ?

 

सुभागी-मैं ये सब बातें नहीं जानती। तुम्हारी चीज है, तुम्हें लेनी पड़ेगी। इसके लिए मैंने अपने घरवालों से छल किया है। इतने दिनों से इसी के लिए माया रच रही हूँ। तुम न लोगे, तो इसे मैं क्या करूँगी?

 

सूरदास-भैरों को मालूम हो गया, तो तुम्हें जीता न छोड़ेगा।

 

सुभागी-उन्हें न मालूम होने पाएगा। मैंने इसका उपाय सोच लिया है।

 

यह कहकर सुभागी चली गई। सूरदास को और तर्क-वितर्क करने का मौका न मिला। बड़े असमंजस में पड़ा-ये रुपये लूँ या क्या करूँ? यह थैली मेरी है या न हीं? अगर भैरों ने इसे खर्च कर दिया होता, तो? क्या चोर के घर चोरी करना पाप नहीं? क्या मैं अपने रुपये के बदले उसके रुपये ले सकता हूँ? सुभागी मुझ पर कितनी दया करती है! वह इसीलिए मुझे ताने दिया करती थी कि यह भेद न खुलने पाए।

 

वह इसी उधोड़बुन में पड़ा हुआ था कि एकाएक ‘चोर-चोर!’ का शोर सुनाई दिया। पहली ही नींद थी। लोग गाफिल सो रहे थे। फिर आवाज आई-‘चोर-चोर!’

 

भैरों की आवाज थी। सूरदास समझ गया, सुभागी ने यह प्रपंच रचा है। अपने द्वार पर पड़ा रहा। इतने में बजरंगी की आवाज सुनाई दी-किधार गया, किधार? यह कहकर वह लाठी लिए ऍंधोरे में एक तरफ दौड़ा। नायकराम भी घर से निकले और ‘किधार-किधार’ करते हुए दौड़े। रास्ते में बजरंगी से मुठभेड़ हो गई। दोनों ने एक दूसरे को चोर समझा। दोनों ने वार किया और दोनों चोट खाकर गिर पड़े। जरा देर में बहुत-से आदमी जमा हो गए। ठाकुरदीन ने पूछा-क्या-क्या ले गया? अच्छी तरह देख लेना, कहीं छत में न चिमटा हुआ हो। चोर दीवार से ऐसा चिमट जाते हैं कि दिखाई नहीं देते।

 

सुभागी-हाय, मैं तो लुट गई। अभी तो बैठी-बैठी अम्माँ का पाँव दबा रही थी। इतने में न जाने मुआ कहाँ से आ पहुँचा।

 

भैरों-(चिराग से देखकर) सारी जमा-जथा लुट गई। हाय राम!

 

सुभागी-हाय, मैंने उसकी परछाईं देखी, तो समझी यही होंगे। जब उसने संदूक पर हाथ बढ़ाया, तो भी समझी यही होंगे।

 

ठाकुरदीन-खपरैल पर चढ़कर आया होगा। मेरे यहाँ जो चोरी हुई थी, उसमें भी चोर सब खपरैल पर चढ़कर आए थे।

 

इतने में बजरंगी आया। सिर से रुधिार बह रहा था, बोला-मैंने उसे भागते देखा। लाठी चलाई। उसने भी वार किया। मैं तो चक्कर खाकर गिर पड़ा; पर उस पर भी ऐसा हाथ पड़ा है कि सिर खुल गया होगा।

 

सहसा नायकराम हाय-हाय करते आए और जमीन पर गिर पड़े। सारी देह खून से तर थी।

 

ठाकुरदीन-पंडाजी, तुमसे भी उसका सामना हो गया क्या?

 

नायकराम की निगाह बजरंगी की ओर गई। बजरंगी ने नायकराम की ओर देखा। नायकराम ने दिल में कहा-पानी का दूधा बनाकर बेचते हो; अब यह ढंग निकाला है। बजरंगी ने दिल में कहा-जात्रिायों को लूटते हो, अब मुहल्लेवालों ही पर हाथ साफ करने लगे।

 

नायकराम-हाँ भई, यहीं गली में तो मिला। बड़ा भारी जवान था।

 

ठाकुरदीन-तभी तो अकेले दो आदमियों को घायल कर गया। मेरे घर मेें जो चोर पैठे थे, वे सब देव मालूम होते थे। ऐसे डील-डौल के तो आदमी ही नहीं देखे। मालूम होता है, तुम्हारे ऊपर उसका भरपूर हाथ पड़ा।

 

नायकराम-हाथ मेरा भी भरपूर पड़ा है। मैंने उसे गिरते देखा। सिर जरूर फट गया होगा। जब तक पकड़ूँ, निकल गया।

 

बजरंगी-हाथ तो मेरा भी ऐसा पड़ा है कि बच्चा को छठी का दूधा याद आ गया होगा। चारों खाने चित गिरा था।

 

ठाकुरदीन-किसी जाने हुए आदमी का काम है। घर के भेदिए बिना कभी चोरी नहीं होती। मेरे यहाँ सबों ने मेरी छोटी लड़की को मिठाई देकर नहीं घर का सारा भेद पूछ लिया था?

 

बजरंगी-थाने में जरूर रपट करना।

 

भैरों-रपट ही करके थोड़े ही रह जाऊँगा। बच्चा से चक्की न पिसवाऊँ, तो कहना। चाहे बिक जाऊँ, पर उन्हें भी पीस डालूँगा। मुझे सब मालूम है।

 

ठाकुरदीन-माल-का-माल ले गया, दो आदमियों को चुटैल कर गया। इसी से मैं चोरों के नगीच नहीं गया था। दूर ही से ‘लेना-देना’ करता रहा। जान सलामत रहे, तो माल फिर आ जाता है।

 

भैरों को बजरंगी पर शुभा न था, न नायकराम पर; उसे जगधार पर शुभा था। शुभा ही नहीं, पूरा विश्वास था। जगधार के सिवा किसी को न मालूम था कि रुपये कहाँ रखे हुए हैं। जगधार लठैत भी अच्छा था। वह पड़ोसी होकर भी घटनास्थल पर सबसे पीछे पहुँचा था। ये सब कारण उसके संदेह को पुष्ट करते थे।

 

यहाँ से लोग चले, तो रास्ते में बातें होने लगीं। ठाकुरदीन ने कहा-कुछ अपनी कमाई के रुपये तो थे नहीं, वही सूरदास के रुपये थे।

 

नायकराम-पराया माल अपने घर आकर अपना हो जाता है।

 

ठाकुरदीन-पाप का दंड जरूर भोगना पड़ता है, चाहे जल्दी हो, चाहे देर।

 

बजरंगी-तुम्हारे चोरों को कुछ दंड न मिला।

 

ठाकुरदीन-मुझे कौन किसी देवता का इष्ट था। सूरदास को इष्ट है। उसकी एक कौड़ी भी किसी को हजम नहीं हो सकती, चाहे कितना ही चूरन खाए। मैं तो बदकर कहता हूँ अभी उसके घर की तलासी ली जाए, तो सारा माल बरामद हो जाए।

 

दूसरे दिन मुँह-ऍंधोरे भैरों ने कोतवाली में इत्ताला दी। दोपहर तक दारोगाजी तहकीकात करने आ पहुँचे। जगधार की खानातलाशी हुई, कुछ न निकला। भैरों ने समझा, इसने माल कहीं छिपा दिया, उस दिन से भैरों के सिर एक भूत-सा सवार हो गया। वह सबेरे ही दारोगाजी के घर पहुँच जाता, दिन-भर उनकी सेवा-टहल किया करता, चिलम भरता, पैर दबाता, घोड़े के लिए घास छील लाता, थाने के चौकीदारों की खुशामद करता, अपनी दूकान पर बैठा हुआ सारे दिन इसी चोरी की चर्चा किया करता-क्या कहूँ, मुझे कभी ऐसी नींद न आती थी, उस दिन न जाने कैसे सो गया। अगर बँधावा न दूँ, तो नाम नहीं। दारोगाजी ताक में हैं। उसमें सब रुपये ही नहीं हैं असरफियाँ भी हैं। जहाँ बिकेगी, बेचनेवाला तुरंत पकड़ा जाएगा।

 

शनै:-शनै: भैरों को मुहल्ले-भर पर संदेह होने लगा। और, जलते तो लोग उससे पहले ही थे, अब सारा मुहल्ला उसका दुश्मन हो गया। यहाँ तक कि अंत में वह अपने घरवालों ही पर अपना क्रोधा उतारने लगा। सुभागी पर फिर मार पड़ने लगी-तूने मुझे चौपट किया, तू इतनी बेखबर न होती, तो चोर कैसे घर में घुस आता? मैं तो दिन-भर दौरी-दूकान करता हूँ; थककर सो गया। तू घर में पड़े-पड़े क्या किया करती है? अब जहाँ से बने, मेरे रुपये ला, नहीं तो जीता न छोड़ईँगा। अब तक उसने अपनी माँ का हमेशा अदब किया था, पर अब उसकी भी ले-दे मचाता-तू कहा करती है, मुझे रात को नींद ही नहीं आती, रात भर जागती रहती हूँ। उस दिन तुझे कैसे नींद आ गई? सारांश यह कि उसके दिल में किसी की इज्जत, किसी का विश्वास, किसी का स्नेह न रहा। धान के साथ सद्भाव भी दिल से निकल गए। जगधार को देखकर तो उसकी ऑंखों में खून उतर आता था। उसे बार-बार छेड़ता कि यह गरम पड़े, तो खबर लूँ; पर जगधार उससे बचता रहता था। वह खुली चोटें करने की अपेक्षा छिपे वार करने में अधिाक कुशल था।

 

एक दिन संधया समय जगधार ताहिर अली के पास आकर खड़ा हो गया। ताहिर अली ने पूछा-कैसे चले जी?

 

जगधार-आपसे एक बात कहने आया हूँ। आबकारी के दारोगा अभी मुझसे मिले थे। पूछते थे-भैरों गोदाम पर दूकान रखता है कि नहीं?मैंने कहा-साहब, मुझे नहीं मालूम। तब चले गए, पर आजकल में वह इसकी तहकीकात करने जरूर आएँगे। मैंने सोचा, कहीं आपकी भी सिकायत न कर दें, इसलिए दौड़ा आया।

 

ताहिर अली ने दूसरे ही दिन भैरों को वहाँ से भगा दिया।

 

इसके कई दिन बाद एक दिन, रात के समय सूरदास बैठा भोजन बना रहा था कि जगधार ने आकर कहा-क्यों सूरे, तुम्हारी अमानत तो तुम्हें मिल गई न?

 

सूरदास ने अज्ञात भाव से कहा-कैसी अमानत?

 

जगधार-वही रुपये, जो तुम्हारी झोंपड़ी से उठ गए थे।

 

सूरदास-मेरे पास रुपये कहाँ थे?

 

जगधार-अब मुझसे न उड़ो, रत्ताी-रत्ताी बात जानता हूँ, और खुश हूँ कि किसी तरह तुम्हारी चीज उस पापी के चंगुल से निकल आई। सुभागी अपनी बात की पक्की औरत है।

 

सूरदास-जगधार, मुझे इस झमेले में न घसीटो, गरीब आदमी हूँ। भैरो के कान में जरा भी भनक पड़ गई, तो मेरी जान तो पीछे लेगा,पहले सुभागी का गला घोंट देगा।

 

जगधार-मैं उससे कहने थोड़े ही जाता हूँ; पर बात हुई मेरे मन की। बचा ने इतने दिनों तक हलवाई की दूकान पर खूब दादे का फातिहा पढ़ा, धारती पर पाँव ही न रखता था, अब होश ठिकाने आ जाएँगे।

 

सूरदास-तुम नाहक मेरी जान के पीछे पड़े हो।

 

जगधार-एक बार खिलखिलाकर हँस दो, तो मैं चला जाऊँ। अपनी गई हुई चीज पाकर लोग फूले नहीं समाते। मैं तुम्हारी जगह होता, तो नाचता-कूदता, गाता-बजाता, थोड़ी देर के लिए पागल हो जाता। इतना हँसता, इतना हँसता कि पेट में बावगोला पड़ जाता; और तुम सोंठ बने बैठे हो! ले, हँसो तो।

 

सूरदास-इस बखत हँसी नहीं आती।

 

जगधार-हँसी क्यों नहीं आएगी; मैं तो हँसा दूँगा।

 

यह कहकर उसने सूरदास को गुदगुदाना शुरू किया। सूरदास विनोदशील आदमी था। ठट्ठे मारने लगा।र् ईष्यामय परिहास का विचित्रा दृश्य था। दोनों रंगशाला के नटों की भाँति हँस रहे थे और यह खबर न थी कि इस हँसी का परिणाम क्या होगा। शाम की मारी सुभागी इसी वक्त बनिए की दूकान से जिंस लिए आ रही थी। सूरदास के घर से अट्टहास की आकाशभेदी धवनि सुनी, तो चकराई। अंधो कुएँ में पानी कैसा? आकर द्वार पर खड़ी हो गई और सूरदास से बोली-आज क्या मिल गया है सूरदास, जो फूले नहीं समाते?

 

सूरदास ने हँसी रोककर कहा-मेरी थैली मिल गई; चोर के घर में छिछोर पैठा।

 

सुभागी-तो सब माल अकेले हजम कर जाओगे?

 

सूरदास-नहीं, तुझे भी एक कंठी ला दूँगा, ठाकुरजी का भजन करना।

 

सुभागी-अपनी कंठी धार रखो, मुझे एक सोने का कंठा बनवा देना।

 

सूरदास-तब तो तू धारती पर पाँव ही न रखेगी!

 

जगधार-इसे चाहे कंठा बनवाना या न बनवाना, इसकी बुढ़िया को एक नथ जरूर बनवा देना। पोपले मुँह पर नथ खूब खिलेगी, जैसे कोई बंदरिया नथ पहने हो।

 

इस पर तीनों ने ठट्ठा मारा। संयोग से भैरों भी उसी वक्त थाने से चला आ रहा था। ठट्ठे की आवाज सुनी, तो झोंपड़ी के अंदर झाँका, ये आज कैसे गुलछर्रे उड़ रहे हैं। यह तिगड्डम देखा, तो ऑंखों में खून उतर आया, जैसे किसी ने कलेजे पर गरम लोहा रख दिया हो। क्रोधा से उन्मत्ता हो उठा। सुहागी को कठोर-से-कठोर, अश्लील-से-अश्लील दुर्वचन कहे, जैसे कोई सूरमा अपनी जान बचाने के लिए अपने शस्त्राों का घातक-से-घातक प्रयोग करे-तू कुलटा है, मेरे दुसमनों के साथ हँसती है, फाहसा कहीं की, टके-टके पर अपनी आबरू बेचती है। खबरदार, जो आज से मेरे घर में कदम रखा, खून चूस लूँगा। अगर अपनी कुशल चाहती है, तो इस अंधो से कह दे, फिर मुझे अपनी सूरत न दिखाए; नहीं तो इसकी और तेरी गरदन एक ही गँड़ासे से काटूँगा। मैं तो इधार-उधार मारा-मारा फिरूँ, और यह कलमुँही यारों के साथ नोक-झोंक करे! पापी अंधो को मौत भी नहीं आती कि मुहल्ला साफ हो जाता, न जाने इसके करम में क्या-क्या दु:ख भोगना लिखा है। सायद जेहल में चक्की पीसकर मरेगा।

 

यह कहता हुआ वह चला गया। सुभागी के काटो तो बदन में खून नहीं। मालूम हुआ, सिर पर बिजली गिर पड़ी। जगधार दिल में खुश हो रहा था, जैसे कोई शिकारी हरिन को तड़पते देखकर खुश हो। कैसा बौखला रहा है! लेकिन सूरदास? आह! उसकी वही दशा थी, जो किसी सती की अपना सतीत्व खो देने के पश्चात् होती है। तीनों थोड़ी देर तक स्तम्भित खड़े रहे। अंत में जगधार ने कहा-सुभागी, अब तू कहाँ जाएगी?

 

सुभागी ने उसकी ओर विषाक्त नेत्राों से देखकर कहा-अपने घर जाऊँगी! और कहाँ?

 

जगधार-बिगड़ा हुआ है प्रान लेकर छोड़ेगा।

 

सुभागी-चाहे मारे, चाहे जिलाए, घर तो मेरा वही है?

 

जगधार-कहीं और क्यों नहीं पड़ रहती, गुस्सा उतर जाए तो चली जाना।

 

सुभागी-तुम्हारे घर चलती हूँ, रहने दोगे?

 

जगधार-मेरे घर! मुझसे तो वह यों ही जलता है, फिर तो खून ही कर डालेगा।

 

सुभागी-तुम्हें अपनी जान इतनी प्यारी है, तो दूसरा कौन उससे बैर मोल लेगा?

 

यह कहकर सुभागी तुरंत अपने घर की ओर चली गई। सूरदास ने हाँ-नहीं कुछ न कहा। उसके चले जाने के बाद जगधार बोला-सूरे तुम आज मेरे घर चलकर सो रहो। मुझे डर लग रहा है कि भैरों रात को कोई उपद्रव न मचाए। बदमाश आदमी है, उसका कौन ठिकाना, मार-पीट करने लगे।

 

सूरदास-भैरों को जितना नादान समझते हो, उतना वह नहीं है। तुमसे कुछ न बोलेगा; हाँ, सुभागी को जी-भर मारेगा।

 

जगधार-नशे में उसे अपनी सुधा-बुधा नहीं रहती।

 

सूरदास-मैं कहता हूँ, तुमसे कुछ न बोलेगा। तुमने अपने दिल की कोई बात नहीं छिपाई है, तुमसे लड़ाई करने की उसे हिम्मत न पड़ेगी।

 

जगधार का भय शांत तो न हुआ; पर सूरदास की ओर से निराश होकर चला गया। सूरदास सारी रात जागता रहा। इतने बड़े लांछन के बाद उसे अब यहाँ रहना लज्जाजनक जान पड़ता था। अब मुँह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाने के सिवा उसे और उपाय न सूझता था-मैंने तो कभी किसी की बुराई नहीं की, भगवान् मुझे क्यों यह दंड दे रहे हैं? यह किन पापों का प्रायश्चित्ता पड़ रहा है? तीरथ-यात्राा से चाहे यह पाप उतर जाए। कल कहीं चल देना चाहिए। पहले भी भैरों ने मुझ पर यही पाप लगाया था। लेकिन तब सारे मुहल्ले के लोग मुझे मानते थे, उसकी यह बात हँसी में उड़ गई। उलटे लोगों ने उसी को डाँटा। अबकी तो सारा मुहल्ला मेरा दुश्मन है, लोग सहज ही में विश्वास कर लेंगे,मुँह में कालिख लग जाएगी। नहीं, अब यहाँ से भाग जाने ही में कुसल है। देवताओं की सरन लूँ, वह अब मेरी रच्छा कर सकते हैं। पर बेचारी सुभागी का क्या हाल होगा? भैरों अबकी उसे जरूर छोड़ देगा। इधार मैं भी चला जाऊँगा तो बेचारी कैसे रहेगी? उसके नैहर में भी तो कोई नहीं है। जवान औरत है, मिहनत-मजूरी कर नहीं सकती। न जाने कैसी पड़े, कैसी न पड़े। चलकर एक बार भैरों से अकेले में सारी बातें साफ-साफ कह दूँ। भैरों से मेरी कभी सफाई से बातचीत नहीं हुई। उसके मन में गाँठ पड़ी हुई है। मन में मैल रहने ही से उसे मेरी ओर से ऐसा भरम होता है। जब तक उसका मन साफ न हो जाए, मेरा यहाँ से जाना उचित नहीं। लोग कहेंगे, काम किया था, तभी तो डरकर भागा; न करता,तो डरता क्यों? ये रुपये भी उसे फेर दूँ। मगर जो उसने पूछा कि ये रुपये कहाँ मिले, तो सुभागी का नाम न बताऊँगा, कह दूँगा, मुझे झोंपड़ी में रखे हुए मिले। इतना छिपाए बिना सुभागी की जान न बचेगी। लेकिन परदा रखने से सफाई कैसे होगी? छिपाने का काम नहीं है। सब कुछ आदि से अंत तक सच-सच कह दूँगा। तभी उसका मन साफ होगा।

 

इस विचार से उसे बड़ी शांति मिली, जैसे किसी कवि को उलझी हुई समस्या की पूर्ति से होती है।

 

वह तड़के ही उठा और जाकर भैरों के दरवाजे पर आवाज दी। भैरों सोया हुआ था। सुभागी बैठी रो रही थी। भैरों ने उसके घर पहुँचते ही उसकी यथाविधिा ताड़ना की थी। सुभागी ने सूरदास की आवाज पहचानी। चौंकी कि यह इतने तड़के कैसे आ गया! कहीं दोनों में लड़ाई न हो जाए। सूरदास कितना बलिष्ठ है, यह बात उससे छिपी न थी। डरी कि सूरदास ही रात की बातों का बदला लेने न आया हो। यों तो बड़ा सहनशील है, पर आदमी है, क्रोधा आ गया होगा। झूठा इलजाम सुनकर क्रोधा आता ही है। कहीं गुस्से में आकर इन्हें मार न बैठे। पकड़ पाएगा, तो प्रान ही लेकर छोड़ेगा। सुभागी भैरों की मार खाती थी, घर से निकाली जाती थी, लेकन यह मजाल न थी कि कोई बाहरी आदमी भैरों को कुछ कहकर निकल जाए। उसका मुँह नोच लेती। उसने भैरों को जगाया नहीं, द्वार खोलकर पूछा-क्या है सूरे, क्या कहते हो?

 

सूरदास के मन में बड़ी प्रबल उत्कंठा हुई कि इससे पूछूँ, रात तुझ पर क्या बीती; लेकिन जब्त कर गया-मुझे इससे वास्ता? उसकी स्त्राी है। चाहे मारे, चाहे दुलारे। मैं कौन होता हूँ पूछनेवाला। बोला-भैरों क्या अभी सोते हैं? जरा जगा दे, उनसे कुछ बातें करनी हैं।

 

सुभागी-कौन बात है, मैं भी सुनूँ?

 

सूरदास-ऐसी ही एक बात है, जरा जगा तो दे।

 

सुभागी-इस बखत जाओ, फिर कभी आकर कह देना।

 

सूरदास-दूसरा कौन बखत आएगा। मैं सड़क पर जा बैठूँगा कि नहीं? देर न लगेगी।

 

सुभागी-और कभी तो इतने तड़के न आते थे, आज ऐसी कौन-सी बात है?

 

सूरदास ने चिढ़कर कहा-उसी से कहूँगा, तुझसे कहने की बात नहीं है।

 

सुभागी को पूरा विश्वास हो गया कि यह इस समय आपे में नहीं है। जरूर मारपीट करेगा। बोली-मुझे मारा-पीटा थोड़े ही था; बस वहीं जो कुछ कहा-सुना, वही कह-सुनकर रह गए।

 

सूरदास-चल, तेरे चिल्लाने की आवाज मैंने अपने कानों सुनी।

 

सुभागी-मारने को धामकाता था; बस, मैं जोर से चिल्लाने लगी।

 

सूरदास-न मारा होगा। मारता भी, तो मुझे क्या, तू उसकी घरवाली है; जो चाहे करे, तू जाकर उसे भेज दे। मुझे एक बात कहनी है।

 

जब अब भी सुभागी न गई तो सूरदास ने भैरों का नाम लेकर जोर-जोर से पुकारना शुरू किया। कई हाँकों के बाद भैरों की आवाज सुनाई दी-कौन है, बैठो, आता हूँ।

 

सुभागी यह सुनते ही भीतर गई और बोली-जाते हो, तो एक डंडा लेते जाओ, सूरदास है, कहीं लड़ने न आया हो।

 

भैरों-चल बैठ, लड़ाई करने आया है! मुझसे तिरिया-चरित्तार मत खेल।

 

सुभागी-मुझे उसकी त्योरियाँ बदली हुई मालूम होती हैं, इसी से कहती हूँ।

 

भैरों-यह क्यों नहीं कहती कि तू उसे चढ़ाकर लाई है। वह तो इतना कीना नहीं रखता। उसके मन में कभी मैल नहीं रहता।

 

यह कहकर भैरों ने अपनी लाठी उठाई और बाहर आया। अंधा शेर भी हो, तो उसका क्या भय? एक बच्चा भी उसे मार गिराएगा।

 

सूरदास ने भैरों से कहा-यहाँ और कोई तो नहीं है? मुझे तुमसे एक भेद की बात करनी है।

 

भैरों-कोई नहीं है। कहो, क्या बात कहते हो?

 

सूरदास-तुम्हारे चोर का पता मिल गया।

 

भैरों-सच, जवानी कसम?

 

सूरदास-हाँ, सच कहता हूँ। वह मेरे पास आकर तुम्हारे रुपये रख गया। और तो कोई चीज नहीं गई थी?

 

भैरों-मुझे जलाने आए हो, अभी मन नहीं भरा?

 

सूरदास-नहीं, भगवान् से कहता हूँ, तुम्हारी थैली मेरे घर में ज्यों-की-त्यों पड़ी मिली।

 

भैरों-बड़ा पागल था, फिर चोरी काहे को की थी?

 

सूरदास-हाँ, पागल ही था और क्या।

 

भैरों-कहाँ है, जरा देखूँ तो?

 

सूरदास ने थैली कमर से निकालकर भैरों को दिखाई। भैरों ने लपककर थैली ले ली। ज्यों-की-त्यों बंद थी।

 

सूरदास-गिन लो, पूरे हैं कि नहीं?

 

भैरों-हैं, पूरे हैं, सच बताओ, किसने चुराया था?

 

भैरों को रुपये मिलने की इतनी खुशी न थी, जितनी चोर का नाम जानने की उत्सुकता। वह देखना चाहता था कि मैंने जिस पर शक किया था, वही है कि कोई और।

 

सूरदास-नाम जानकर क्या करोगे? तुम्हें अपने माल से मतलब है कि चोर के नाम से?

 

भैरों-नहीं, तुम्हें कसम है, बता दो, है इसी मुहल्ले का न?

 

सूरदास-हाँ, है तो मुहल्ले ही का; पर नाम न बताऊँगा।

 

भैरों-जवानी की कसम खाता हूँ, उससे कुछ न कहूँगा।

 

सूरदास-मैं उसको वचन दे चुका हूँ कि नाम न बताऊँगा। नाम बता दूँ, और तुम अभी दंगा करने लगो, तब?

 

भैरों-विसवास मानो, मैं किसी से न बोलूँगा। जो कसम कहो, खा जाऊँ। अगर जबान खोलूँ, तो समझ लेना, इसके असल में फरक है। बात और बाप एक है। अब और कौन कसम लेना चाहते हो?

 

सूरदास-अगर फिर गए, तो यहीं तुम्हारे द्वार पर सिर पटककर जान दे दूँगा।

 

भैरों-अपनी जान क्यों दे दोगे, मेरी जान ले लेना; चूँ न करूँगा।

 

सूरदास-मेरे घर में एक बार चोरी हुई थी, तुम्हें याद है न? चोर को ऐसा सुभा हुआ होगा कि तुमने मेरे रुपये लिए हैं। इसी से उसने तुम्हारे यहाँ चोरी की, और मुझे रुपये लाकर दे दिए। बस, उसने मेरी गरीबी पर दया की, और कुछ नहीं। उससे मेरा और कोई नाता नहीं है।

 

भैरों-अच्छा, यह सब सुन चुका, नाम तो बताओ।

 

सूरदास-देखो, तुमने कसम खाई है।

 

भैरों-हाँ, भाई, कसम से मुकरता थोड़ा ही हूँ।

 

सूरदास-तुम्हारी घरवाली और मेरी बहन सुभागी।

 

इतना सुनना था कि भैरों जैसे पागल हो गया। घर में दौड़ा हुआ गया और माँ से बोला-अम्माँ, इसी डाइन ने मेरे रुपये चुराए थे। सूरदास अपने मुँह से कह रहा है। इस तरह मेरा घर मूसकर यह चुड़ैल अपने धाींगड़ों का घर भरती। उस पर मुझसे उड़ती थी। देख तो, तेरी क्या गत बनाता हूँ। बता, सूरदास झूठ कहता है कि सच?

 

सुभागी ने सिर झुकाकर कहा-सूरदास झूठ बोलते हैं।

 

उसके मुँह से बात पूरी न निकलने पाई थी कि भैरों ने लकड़ी खींचकर मारी। वार खाली गया। इससे भैरों का क्रोधा और भी बढ़ा। वह सुभागी के पीछे दौड़ा। सुभागी ने एक कोठरी में घुसकर भीतर से द्वार बंद कर लिया। भैरों ने द्वार पीटना शुरू किया। सारे मुहल्ले में हुल्लड़ मच गया, भैरों सुभागी को मारे डालता है। लोग दौड़ पड़े। ठाकुरदीन ने भीतर जाकर पूछा-क्या है भैरों, क्यों किवाड़ तोड़े डालते हो? भले आदमी, कोई घर के आदमी पर इतना गुस्सा करता है!

 

भैरों-कैसा घर का आदमी जी! ऐसे घर के आदमी का सिर काट लेना चाहिए, जो दूसरों से हँसे। आखिर मैं काना हूँ, कतरा हूँ, लूला हूँ,लँगड़ा हूँ, मुझमें क्या ऐब है, जो यह दूसरों से हँसती है? मैं इसकी नाक काटकर तभी छोड़ूँगा। मेरे घर जो चोरी हुई थी, वह इसी चुड़ैल की करतूत थी। इसी ने रुपये चुराकर सूरदास को दिए थे।

 

ठाकुरदीन-सूरदास को!

 

भैरों-हाँ-हाँ, सूरदास को। बाहर तो खड़ा है, पूछते क्यों नहीं? उसने जब देखा कि अब चोरी न पचेगी, तो लाकर सब रुपये मुझे दे गया है।

 

बजरंगी-अच्छा, तो रुपये सुभागी ने चुराए थे!

 

लोगों ने भैरों को ठंडा किया और बाहर खींच लाए। यहाँ सूरदास पर टिप्पणियाँ होने लगीं। किसी की हिम्मत न पड़ती थी कि साफ-साफ कहे? सब-के-सब डर रहे थे कि कहीं मेम साहब से शिकायत न कर दे। पर अन्योक्तियों द्वारा सभी अपने मनोविचार प्रकट कर रहे थे। सूरदास को आज मालूम हुआ कि पहले कोई मुझसे डरता न था, पर दिल में सब इज्जत करते थे; अब सब-के-सब मुझसे डरते हैं; पर मेरी सच्ची इज्जत किसी के दिल में नहीं है। उसे इतनी ग्लानि हो रही थी कि आकाश से वज्र गिरे और मैं यहीं जल-भुन जाऊँ।

 

ठाकुरदीन ने धाीरे से कहा-सूरे तो कभी ऐसा न था। आज से नहीं, लड़कपन से देखते हैं।

 

नायकराम-पहले नहीं था, अब हो गया। अब तो किसी को कुछ समझता ही नहीं।

 

ठाकुरदीन-प्रभुता पाकर सभी को मद हो जाता है, पर सूरे में तो मुझे कोई ऐसी बात नहीं दिखाई देती।

 

नायकराम-छिपा रुस्तम है! बजरंगी, मुझे तुम्हारे ऊपर सक था।

 

बजरंगी-(हँसकर) पंडाजी, भगवान् से कहता हूँ, मुझे तुम्हारे ऊपर सक था।

 

भैरों-और मुझसे जो सच पूछो, तो जगधार पर सक था।

 

सूरदास सिर झुकाए चारों ओर से ताने और लताड़ें सुन रहा था। पछता रहा था-मैंने ऐसे कमीने आदमी से यह बात बताई ही क्यों। मैंने तो समझा था, साफ-साफ कह देने से इसका दिल साफ हो जाएगा। उसका यह फल मिला! मेरे मुँह में तो कालिख लग ही गई, उस बेचारी का न जाने क्या हाल होगा। भगवान् अब कहाँ गए, क्या कथा-पुरानों ही में अपने सेवकों को उबारने आते थे, अब क्यों नहीं आकाश से कोई दूत आकर कहता कि यह अंधा बेकसूर है।

 

जब भैरों के द्वार पर यह अभिनय होते हुए आधा घंटे से अधिाक हो गया, तो सूरदास के धौर्य का प्याला छलक पड़ा। अब मौन बने रहना उसके विचार में कायरता थी, नीचता थी। एक सती पर इतना कलंक थोपा जा रहा है और मैं चुपचाप खड़ा सुनता हूँ। यह महापाप है। वह तनकर खड़ा हो गया और फटी हुई ऑंखें फाड़कर बोला-यारो, क्यों बिपत के मारे हुए दुखियों पर यह कीचड़ फेंक रहे हो, ये छुरियाँ चला रहे हो? कुछ तो भगवान् से डरो। क्या संसार में कहीं इंसाफ नहीं रहा? मैंने तो भलमनसी की कि भैरों के रुपये उसे लौटा दिए। उसका मुझे यह फल मिल रहा है! सुभागी ने क्यों यह काम किया और क्यों मुझे रुपये दिए यह मैं न बताऊँगा लेकिन भगवान् मेरी इससे भी ज्यादा दुर्गत करें, अगर मैंने सुभागी को अपनी छोटी बहन के सिवा कभी कुछ और समझा हो। मेरा कसूर इतना ही है कि वह रात को मेरी झोंपड़ी में आई थी। उस बखत जगधार वहाँ बैठा था। उससे पूछो कि हम लोगों में कौन-सी बातें हो रही थीं। अब इस मुहल्ले में मुझ-जैसे अंधो-अपाहिज आदमी का निबाह नहीं हो सकता। जाता हूँ; पर इतना कहे जाता हूँ कि सुभागी पर जो कलंक लगाएगा, उसका भला न होगा। वह सती है, सती को पाप लगाकर कोई सुखी नहीं हो सकता। मेरा कौन कोई रोनेवाला बैठा हुआ है; जिसके द्वार पर खड़ा हो जाऊँगा, वह चुटकी-भर आटा दे देगा। अब यहाँ से दाना-पानी उठता है। पर एक दिन आवेगा, जब तुम लोगों को सब बातें मालूम हो जाएँगी, और तब तुम जानोगे कि अंधा निरपराधा था।

 

यह कहकर सूरदास अपनी झोंपड़ी की तरफ चला गया।

 

सूरदास की जमीन वापस दिला देने के बाद सोफ़िया फिर मि. क्लार्क से तन गई। दिन गुजरते जाते थे और वह मि. क्लार्क से दूरतर होती जाती थी। उसे अब सच्चे अनुराग के लिए अपमान, लज्जा, तिरस्कार सहने की अपेक्षा कृत्रिाम प्रेम का स्वाँग भरना कहीं दुस्सह प्रतीत होता था। सोचती थी, मैं जल से बचने के लिए आग में कूद पड़ी। प्रकृति बल-प्रयोग सहन नहीं कर सकती। उसने अपने मन को बलात् विनय की ओर से खींचना चाहा था, अब उसका मन बड़े वेग से उनकी ओर दौड़ रहा था। इधार उसने भक्ति के विषय में कई ग्रंथ पढ़े थे और फलत: उसके विचारों में एक रूपांतर हो गया था। अपमान और लोक-निंदा का भय उसके दिल से मिटने लगा था। उसके सम्मुख प्रेम का सर्वोच्च आदर्श उपस्थित हो गया था, जहाँ अहंकार की आवाज नहीं पहुँचती। त्यागपरायण तपस्वी को सोमरस का स्वाद मिल गया था और उसके नशे में उसे सांसारिक भोग-विलास, मान-प्रतिष्ठा सारहीन जान पड़ती थी। जिन विचारों से प्रेरित होकर उसने विनय से मुँह फेरने और क्लार्क से विवाह करने का निश्चय किया था, वे अब उसे नितांत अस्वाभाविक मालूम होते थे। रानी जाह्नवी से तिरस्कृत होकर अपने मन का दमन करने के लिए उसने अपने ऊपर यह अत्याचार किया था। पर अब उसे नजर ही न आता था कि मेरे आचरण में कलंक की कौन-सी बात थी, उसमें अनौचित्य कहाँ था। उसकी आत्मा अब उस निश्चय का घोर प्रतिवाद कर रही थी, उसे जघन्य समझ रही थी। उसे आश्चर्य होता था कि मैंने विनय के स्थान पर क्लार्क को प्रतिष्ठित करने का फैसला कैसे किया। मि. क्लार्क में सद्गुणों की कमी नहीं, वह सुयोग्य हैं, शीलवान् हैं, उदार हैं, सहृदय हैं। वह किसी स्त्राी को प्रसन्न रख सकते हैं, जिसे सांसारिक सुख-भोग की लालसा हो। लेकिन उनमें वह त्याग कहाँ, वह सेवा का भाव कहाँ, वह जीवन का उच्चादर्श कहाँ, वह वीर-प्रतिज्ञा कहाँ, वह आत्मसमर्पण कहाँ? उसे अब प्रेमानुराग की कथाएँ और भक्ति-रस-प्रधाान काव्य, जीव और आत्मा, आदि और अनादि, पुनर्जन्म और मोक्ष आदि गूढ़ विषयों की व्यावख्या से कहीं आकर्षक मालूम होते थे। इसी बीच में उसे कृष्ण का जीवन-चरित्रा पढ़ने का अवसर मिला और उसने उस भक्ति की जड़ हिला दी, जो उसे प्रभु मसीह से थी। वह मन में दोनों महान् पुरुषों की तुलना किया करती। मसीह की दया की अपेक्षा उसे कृष्ण के प्रेम से अधिाक शांति मिलती थी। उसने अब तक गीता ही के कृष्ण को देखा था और मसीह की दयालुता, सेवाशीलता और पवित्राता के आगे उसे कृष्ण का रहस्यमय जीवन गीता की जटिल दार्शनिक व्याख्याओं से भी दुर्बोधा जान पड़ता था। उसका मस्तिष्क गीता के विचारोत्कर्ष के सामने झुक जाता था, पर उसने मन में भक्ति का भाव न उत्पन्न होता था। कृष्ण के बाल-जीवन को उसने भक्तों की कपोल-कल्पना समझ रखा था। और उस पर विचार करना ही व्यर्थ समझती थी। पर अब ईसा की दया इस बाल-क्रीड़ा के सामने नीरस थी। ईसा की दया में आधयात्मिकता थी, कृष्ण के प्रेम में भावुकता; ईसा की दया आकाश की भाँति अनंत थी, कृष्ण का प्रेम नवकुसुमित, नवपल्लवित उद्यान की भाँति मनोहर; ईसा की दया जल-प्रवाह की मधाुर धवनि थी,कृष्ण का प्रेम वंशी की व्याकुल टेर; एक देवता था, दूसरा मनुष्य; एक तपस्वी था, दूसरा कवि; एक में जागृति और आत्मज्ञान था, दूसरे में अनुराग और उन्माद; एक व्यापारी था, हानि-लाभ पर निगाह रखनेवाला, दूसरा रसिया था, अपने सर्वस्व को दोनों हाथों लुटानेवाला; एक संयमी था, दूसरा भोगी। अब सोफ़िया का मन नित्य इसी प्रेम-क्रीड़ा में बसा रहता था, कृष्ण ने उसे मोहित कर लिया था, उसे अपनी वंशी की धवनि सुना दी थी।

 

मिस्टर क्लार्क का लौकिक शिष्टाचार अब उसे हास्यास्पद मालूम होता था। वह जानती थी कि यह सारा प्रेमालाप एक परीक्षा में भी सफल नहीं हो सकता। वह बहुधाा उनसे रुखाई करती। वह बाहर से मुस्कराते हुए आकर उसकी बगल में कुर्सी खींचकर बैठ जाते, और वह उनकी ओर ऑंखें उठाकर भी न देखती। यहाँ तक कि कई बार उसने अपनी धाार्मिक अश्रध्दा से मिस्टर क्लार्क के धार्मपरायण हृदय को कठोर आधाात पहुँचाया। उन्हें सोफ़िया एक रहस्य-सी जान पड़ती थी, जिसका उद्धाटन करने में वह असमर्थ थे। उसका अनुपम सौंदर्य, उसकी हृदयहारिणी छवि, उसकी अद्भुत विचारशीलता उन्हें जितने जोर से अपनी ओर खींचती थी, उतनी ही उसकी मानशीलता, विचार-स्वाधाीनता और अनम्रता उन्हें भयभीत कर देती थी। उसके सम्मुख बैठे हुए वह अपनी लघुता का अनुभव करते थे, पग-पग पर उन्हें ज्ञात होता था कि मैं इसके योग्य नहीं हूँ। इसी वजह से इतनी घनिष्ठता होने पर भी उन्हें उसे वचनबध्द करने का साहस न होता था। मिसेज़ सेवक आग में ईंधान डालती रहती थीं-एक ओर क्लार्क को उकसातीं, दूसरी ओर सोफी को समझातीं-तू समझती है, जीवन में ऐसे अवसर बार-बार आते हैं,यह तेरी गलती है। मनुष्य को केवल एक अवसर मिलता है, और वही उसके भाग्य का निर्णय कर देता है।

 

मि. जॉन सेवक ने भी अपने पिता के आदेशानुसार दोरुखी चाल चलनी शुरू की। वह गुप्त रूप से तो राजा महेंद्रकुमार सिंह की कल घुमाते रहते थे; पर प्रकट रूप से मिस्टर क्लार्क के आदर-सत्कार में कोई बात उठा न रखते थे। रहे मि. ईश्वर सेवक, वह तो समझते थे, खुदा ने सोफ़िया को मिस्टर क्लार्क ही के लिए बनाया है। वह अकसर उनके यहाँ आते थे और भोजन भी वहीं कर लेते थे। जैसे कोई दलाल ग्राहक को देखकर उसके पीछे-पीछे हो लेता है, और उसे किसी दूसरी दूकान पर बैठने नहीं देता, वैसे ही वह मिस्टर क्लार्क को घेरे रहते थे कि कोई ऊँची दूकान उन्हें आकर्षित न कर ले। मगर इतने शुभेच्छुकों के रहते हुए भी मिस्टर क्लार्क को अपनी सफलता दुर्लभ मालूम होती थी।

 

सोफ़िया को इन दिनों बनाव-सिंगार का बड़ा व्यसन हो गया था। अब तक उसने माँग-चोटी या वस्त्रााभूषण की कभी चिंता न की थी। भोग-विलास से दूर रहना चाहती थी। धार्म-ग्रंथों की यही शिक्षा थी, शरीर नश्वर है, संसार असार है, जीवन मृग-तृष्णा है, इसके लिए बनाव-सँवार की जरूरत नहीं। वास्तविक शृंगार कुछ और ही है, उसी पर निगाह रखनी चाहिए। लेकिन अब तक वह जीवन को इतना तुच्छ न समझती थी। उसका रूप कभी इतने निखार पर न था। उसकी छवि-लालसा कभी इतनी सजग न थी।

 

संधया हो चुकी थी। सूर्य की शीतल किरणें, किसी देवता के आशीर्वाद की भाँति, तरु-पुंजों के हृदय को विहसित कर रही थीं। सोफ़िया एक क्ुं+ज में खड़ी आप-ही-आप मुस्करा रही थी कि मिस्टर क्लार्क की मोटर आ पहुँची। वह सोफ़िया को बाग में देखकर सीधो उसके पास आए और एक कृपा-लोलुप दृष्टि से देखकर उसकी ओर हाथ बढ़ा दिया। सोफ़िया ने मुँह फेर लिया, मानो उनके बढ़े हुए हाथ को देखा ही नहीं।

 

सहसा एक क्षण बाद उसने हास्य-भाव से पूछा-आज कितने अपराधिायों को दंड दिया?

 

मिस्टर क्लार्क झेंप गए। सकुचाते हुए बोले-प्रिये, यह तो रोज की बातें हैं, इनकी क्या चर्चा करूँ?

 

सोफी-तुम यह कैसे निश्चय करते हो कि अमुक अपराधाी वास्तव में अपराधाी है? इसका तुम्हारे पास कोई यंत्रा है?

 

क्लार्क-गवाह तो रहते हैं।

 

सोफी-गवाह हमेशा सच्चे होते हैं?

 

क्लार्क-कदापि नहीं। गवाह अकसर झूठे और सिखाए हुए होते हैं।

 

सोफी-और उन्हीं गवाहाें के बयान पर फैसला करते हो!

 

क्लार्क-इसके सिवा और उपाय ही क्या है!

 

सोफी-तुम्हारी असमर्थता दूसरे की जान क्यों ले? इसीलिए कि तुम्हारे वास्ते मोटरकार, बँगला, खानसामे, भाँति-भाँति की शराब और विनोद के अनेक साधान जुटाए जाएँ?

 

क्लार्क ने हतबुध्दि की भाँति कहा-तो क्या नौकरी से इस्तीफा दे दूँ?

 

सोफ़िया-जब तुम जानते हो कि वर्तमान शासन-प्रणाली में इतनी त्राुटियाँ हैं, तो तुम उसका एक अंग बनकर निरपराधिायों का खून क्यों करते हो?

 

क्लार्क-प्रिये, मैंने इस विषय पर कभी विचार नहीं किया।

 

सोफ़िया-और बिना विचार किए ही नित्य न्याय की हत्या किया करते हो। कितने निर्दयी हो!

 

क्लार्क-हम तो केवल कल के पुर्जे हैं, हमें ऐसे विचारों से क्या प्रयोजन?

 

सोफी-क्या तुम्हें इसका विश्वास है कि तुमने कोई अपराधा नहीं किया?

 

क्लार्क-यह दावा कोई मनुष्य नहीं कर सकता।

 

सोफी-तो तुम इसीलिए दंड से बचे हुए हो कि तुम्हारे अपराधा छिपे हुए हैं?

 

क्लार्क-यह स्वीकार करने को जी तो नहीं चाहता; विवश होकर स्वीकार करना पड़ेगा।

 

सोफी-आश्चर्य है कि स्वयं अपराधाी होकर तुम्हें दूसरे अपराधिायाें को दंड देते हुए जरा भी लज्जा नहीं आती!

 

क्लार्क-सोफी, इसके लिए तुम फिर कभी मेरा तिरस्कार कर लेना। इस समय मुझे एक महत्तव के विषय में तुमसे सलाह लेनी है। खूब विचार करके राय देना। राजा महेंद्रकुमार ने मेरे फैसले की अपील गवर्नर के यहाँ की थी, इसका जिक्र तो मैं तुमसे कर ही चुका हूँ। उस वक्त मैंने समझा था, गवर्नर अपील पर धयान न देंगे। एक जिले के अफसर के खिलाफ किसी रईस की मदद करना हमारी प्रथा के प्रतिकूल है,क्योंकि इससे शासन में विघ्न पड़ता है; किंतु 6-7 महीनों में परिस्थिति कुछ ऐसी हो गई है, राजा साहब ने अपनी कुल-मर्यादा, दृढ़ संकल्प और तर्क-बुध्दि से इतनी अच्छी तरह काम लिया है कि अब शायद फैसला मेरे खिलाफ होगा। काउंसिल में हिंदुस्तानियों का बहुमत हो जाने के कारण अब गवर्नर का महत्तव बहुत कम हो गया है। यद्यपि वह काउंसिल के निर्णय को रद्द कर सकते हैं, पर इस अधिाकार से वह असाधाारण अवसरों पर ही काम ले सकते हैं। अगर राजा साहब की अपील वापस कर दी गई, तो दूसरे ही दिन देश में कुहराम मच जाएगा और समाचार-पत्राों को विदेशी राज्य के एक नए अत्याचार पर शोर मचाने का वह मौका मिल जाएगा जो वे नित्य खोजते रहते हैं। इसलिए गवर्नर ने मुझसे पूछा है कि यदि राजा साहब के ऑंसू पोंछे जाएँ, तो तुम्हें कुछ दु:ख तो न होगा? मेरी समझ में नहीं आता, इसका क्या उत्तार दूँ। अभी तक कोई निश्चय नहीं कर सका।

 

सोफी-क्या इसका निर्णय करना मुश्किल है?

 

क्लार्क-हाँ, इसलिए मुश्किल है कि जन-सम्मत्तिा से राज्य करने की जो व्यवस्था हम लोगों ने खुद की है, उसे पैरों-तले कुचलना बुरा मालूम होता है। राजा कितना ही सबल हो, पर न्याय का गौरव रखने के लिए कभी-कभी राजा को भी सिर झुकाना पड़ता है। मेरे लिए कोई बात नहीं, फैसला मेरे अनुकूल हो प्रतिकूल, मेरे ऊपर इसका कोई असर नहीं पड़ता; बल्कि प्रजा पर हमारे न्याय की धााक और बैठ जाती है। (मुस्कराकर) गवर्नर ने मुझे इस अपराधा के लिए दंड भी दिया है। वह मुझे यहाँ से हटा देना चाहते हैं।

 

सोफ़िया-क्या तुम्हें इतना दबना पड़ेगा?

 

क्लार्क-हाँ, मैं रियासत का पोलिटिकल एजेंट बना दिया जाऊँगा, यह पद बड़े मजे का है। राजा तो केवल नाम के लिए होता है, सारा अख्तियार तो एजेंट ही के हाथों में रहता है। हममें जो बड़े भाग्यशाली होते हैं, उन्हीं को यह पद प्रदान किया जाता है।

 

सोफ़िया-तब तो तुम बड़े भाग्यशाली हो।

 

मिस्टर क्लार्क इस व्यंग से मन में कटकर रह गए। उन्होंने समझा था सोफी यह समाचार सुनकर फूली न समाएगी, और तब मुझे उससे यह कहने का अवसर मिलेगा कि यहाँ से जाने के पहले हमारा दाम्पत्य सूत्रा में बँधा जाना आवश्यक है। ‘तब तो तुम बड़े भाग्यशाली हो,’ इस निर्दय व्यंग ने उनकी सारी अभिलाषाओं पर पानी फेर दिया। इस वाक्य में वह निष्ठुरता, वह कटाक्ष, वह उदासीनता भरी हुई थी, जो शिष्टाचार की भी परवा नहीं करती। सोचने लगे-इसकी सम्मति की प्रतीक्षा किए बिना मैंने अपनी इच्छा प्रकट कर दी, कहीं यह तो इसे बुरा नहीं लगा?शायद समझती हो कि अपनी स्वार्थ-कामना से यह इतने प्रसन्न हो रहे हैं, पर उस बेकस अंधो की इन्हें जरा भी परवा नहीं कि उस पर क्या गुजरेगी। अगर यही करना था, तो यह रोग ही क्यों छेड़ा था। बोले-यह तो तुम्हारे फैसले पर निर्भर है।

 

सोफी ने उदासीन भाव से उत्तार दिया-इन विषयों में तुम मुझसे चतुर हो।

 

क्लार्क-उस अंधो की फिक्र है।

 

सोफी ने निर्दयता से कहा-उस अंधो के खुदा तुम्हीं नहीं हो।

 

क्लार्क-मैं तुम्हारी सलाह पूछता हूँ और तुम मुझी पर छोड़ती जाती हो।

 

सोफी-अगर मेरी सलाह से तुम्हारा अहित हो, तो?

 

क्लार्क ने बड़ी वीरता से उत्तार दिया-सोफी, मैं तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊँ कि मैं तुम्हारे लिए सब कुछ कर सकता हूँ?

 

सोफी-(हँसकर) इसके लिए मैं तुम्हारी बहुत अनुगृहीत हूँ।

 

इतने में मिसेज़ सेवक वहाँ आ गईं और क्लार्क से हँस-हँसकर बातें करने लगीं। सोफी ने देखा, अब मिस्टर क्लार्क को बनाने का मौका नहीं रहा, तो अपने कमरे में चली आई। देखा, तो प्रभु सेवक वहाँ बैठे हैं। सोफी ने कहा-इन हजरत को अब यहाँ से बोरिया-बँधाना सँभालना पड़ेगा। किसी रियासत के एजेंट होंगे।

 

प्रभु सेवक-(चौंककर) कब?

 

सोफी-बहुत जल्द। राजा महेंद्रकुमार इन्हें ले बीते।

 

प्रभु सेवक-तब तो तुम यहाँ थोड़े ही दिनों की मेहमान हो!

 

सोफी-मैं इनसे विवाह न करूँगी।

 

प्रभु सेवक-सच?

 

सोफी-हाँ, मैं कई दिन से यह फैसला कर चुकी हूँ, पर तुमसे कहने का मौका न मिला।

 

प्रभु सेवक-क्या डरती थीं कि कहीं मैं शोर न मचा दूँ?

 

सोफी-बात तो वास्तव में यही थी।

 

प्रभु सेवक-मेरी समझ में नहीं आता कि तुम मुझ पर इतना अविश्वास क्यों करती हो? जहाँ तक मुझे याद है, मैंने तुम्हारी बात किसी से नहीं कही।

 

सोफी-क्षमा करना प्रभु! न जाने क्यों मुझे तुम्हारे ऊपर विश्वास नहीं आता। तुममें अभी कुछ ऐसा लड़कपन है, कुछ ऐसे खुले हुए निर्द्वंद्व मनुष्य हो कि तुमसे कोई बात कहते उसी भाँति डरती हूँ, जैसे कोई आदमी वृक्ष की पतली टहनी पर पैर रखते डरता है।

 

प्रभु सेवक-अच्छी बात है, यों ही मुझसे डरा करो। वास्तव में मैं कोई बात सुन लेता हूँ, तो मेरे पेट में चूहे दौड़ने लगते हैं और जब तक किसी से कह न लूँ, मुझे चैन ही नहीं आता। खैर, मैं तुम्हें इस फैसले पर बधााई देता हूँ। मैंने तुमसे स्पष्ट तो कभी नहीं कहा; पर कई बार संकेत कर चुका हूँ कि मुझे किसी दशा में क्लार्क को अपना बहनोई बनाना पसंद नहीं है। मुझे न जाने क्यों उनसे चिढ़ है। वह बेचारे मेरा बड़ा आदर करते हैं; पर अपना जी उनसे नहीं मिलता। एक बार मैंने उन्हें अपनी एक कविता सुनाई थी। उसी दिन से मुझे उनसे चिढ़ हो गई है। बैठे सोंठ की तरह सुनते रहे, मानो मैं किसी दूसरे आदमी से बातें कर रहा हूँ। कविता का ज्ञान ही नहीं। उन्हें देखकर बस यही इच्छा होती है कि खूब बनाऊँ। मैंने कितने ही मनुष्यों को अपनी रचना सुनाई होगी, पर विनय-जैसा मर्मज्ञ और किसी को नहीं पाया। अगर वह कुछ लिखें तो खूब लिखें। उनका रोम-रोम काव्यमय है।

 

सोफी-तुम इधार कभी कुँवर साहब की तरफ नहीं गए थे?

 

प्रभु सेवक-आज गया था और वहीं से चला आ रहा हूँ। विनयसिंह बड़ी विपत्तिा में पड़ गए हैं। उदयपुर के अधिाकारियों ने उन्हें जेल में डाल रखा है।

 

सोफ़िया के मुख पर क्रोधा या शोक का कोई चिद्द न दिखाई दिया। उसने यह न पूछा, क्यों गिरफ्तार हुए? क्या अपराधा था? ये सब बातें उसने अनुमान कर लीं। केवल इतना पूछा-रानीजी तो वहाँ नहीं जा रही हैं?

 

प्रभु सेवक-न! कुँवर साहब और डॉक्टर गांगुली, दोनों जाने को तैयार हैं; पर रानी किसी को नहीं जाने देतीं। कहती हैं, विनय अपनी मदद आप कर सकता है। उसे किसी की सहायता की जरूरत नहीं।

 

सोफ़िया थोड़ी देर तक गम्भीर विचार में स्थिर बैठी रही। विनय की वीर मूर्ति उसकी ऑंखों के सामने फिर रही थी। सहसा उसने सिर उठाया और निश्चायात्मक भाव से बोली-मैं उदयपुर जाऊँगी।

 

प्रभु सेवक-वहाँ जाकर क्या करोगी?

 

सोफी-यह नहीं कह सकती कि वहाँ जाकर क्या करूँगी। अगर और कुछ न कर सकूँगी, तो कम-से-कम जेल में रहकर विनय की सेवा तो करूँगी, अपने प्राण तो उन पर निछावर कर दूँगी। मैंने उनके साथ जो छल किया है, चाहे किसी इरादे से किया हो, वह नित्य मेरे हृदय में काँटे की भाँति चुभा करता है। उससे उन्हें जो दु:ख हुआ होगा, उसकी कल्पना करते ही मेरा चित्ता विकल हो जाता है। मैं अब उस छल का प्रायश्चित्ता करूँगी, किसी और उपाय से नहीं, तो अपने प्राणों ही से।

 

यह कहकर सोफ़िया ने खिड़की से झाँका, तो मि. क्लार्क अभी तक खड़े मिसेज सेवक से बातें कर रहे थे। मोटरकार भी खड़ी थी। वह तुरंत बाहर आकर मि. क्लार्क से बोली-विलियम, आज मामा से बातें करने ही में रात खत्म कर दोगे? मैं सैर करने के लिए तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ।

 

कितनी मंजुल वाणी थी! कितनी मनोहारिणी छवि से, कमल-नेत्राों में मधाुर हास्य का कितना जादू भरकर, यह प्रेम-ाचना की गई थी! क्लार्क ने क्षमाप्रार्थी नेत्राों से सोफ़िया को देखा-यह वही सोफ़िया है, जो अभी एक ही क्षण पहले मेरी हँसी उड़ा रही थी! तब जल पर आकाश की श्यामल छाया थी, अब उसी जल में इंदु की सुनहरी किरण नृत्य कर रही थी, उसी लहराते हुए जल की कम्पित, विहसित, चंचल छटा उसकी ऑंखों में थी। लज्जित होकर बोले-प्रिये, क्षमा करो, मुझे याद ही न रही, बातों में देर हो गई।

 

सोफ़िया ने माता को सरल नेत्राों से देखकर कहा-मामा, देखती हो इनकी निष्ठुरता, यह अभी से मुझसे तंग आ गए हैं। मेरी इतनी सुधिा न रही कि झूठे ही पूछ लेते, सैर करने चलोगी?

 

मिसेज़ सेवक-हाँ, विलियम, यह तुम्हारी ज्यादती है। आज सोफी ने तुम्हें रँगे हाथों पकड़ लिया। मैं तुम्हें निर्दोष समझती थी और सारा दोष उसी के सिर रखती थी।

 

क्लार्क ने कुछ मुस्कराकर अपनी झेंप मिटाई और सोफ़िया का हाथ पकड़कर मोटर की तरफ चले। पर अब भी उन्हें शंका हो रही थी कि मेरे हाथ में नाजुक कलाई है, वह कोई वस्तु है या केवल कल्पना और स्वप्न। रहस्य और भी दुर्भेद्य होता हुआ दिखाई देता था। यह कोई बंदर को नचानेवाला मदारी है या बालक, जो बंदर को दूर से देखकर खुश होता है, पर बंदर के निकट आते ही भय से चिल्लाने लगता है!

 

जब मोटर चली, तो सोफ़िया ने कहा-एजेंट के अधिाकार तो बड़े होते हैं, वह चाहे तो किसी रियासत के भीतरी मुआमिलों में भी हस्तक्षेप कर सकता है, क्यों?

 

क्लार्क ने प्रसन्न होकर कहा-उसका अधिाकार सर्वत्रा, यहाँ तक कि राजा के महल के अंदर भी, होता है। रियासत का कहना ही क्या, वह राजा के खाने-सोने, आराम करने का समय तक नियत कर सकता है। राजा किससे मिले, किससे दूर रहे, किसका आदर करे, किसकी अवहेलना करे, ये सब बातें एजेंट के अधाीन हैं। वह यहाँ तक निश्चय कर सकता है कि राजा की मेज पर कौन-कौन-से प्याले आएँगे, राजा के लिए कैसे और कितने कपड़ों की जरूरत है, यहाँ तक कि वह राजा के विवाह का भी निश्चय करता है। बस, यों समझो कि वह रियासत का खुदा होता है।

 

सोफ़िया-तब तो वहाँ सैर-सपाटे का खूब अवकाश मिलेगा। यहाँ की भाँति दिन-भर दफ्तर में तो न बैठना पड़ेगा?

 

क्लार्क-वहाँ कैसा दफ्तर, एजेंट का काम दफ्तर में बैठना नहीं है। वह वहाँ बादशाह का स्थानापन्न होता है।

 

सोफ़िया-अच्छा, जिस रियासत में चाहो, जा सकते हो?

 

क्लार्क-हाँ, केवल पहले कुछ लिखा-पढ़ी करनी पड़ेगी। तुम कौन-सी रियासत पसंद करोगी?

 

सोफ़िया-मुझे तो पहाड़ी देशों से विशेष प्रेम है। पहाड़ों के दामन में बसे हुए गाँव, पहाड़ों की गोद में चरनेवाली भेड़ें और पहाड़ों से गिरनेवाले जल-प्रपात, ये सभी दृश्य मुझे काव्यमय प्रतीत होते हैं। मुझे मालूम होता है, वह कोई दूसरा ही जगत् है, इससे कहीं शांतिमय और शुभ्र। शैल मेरे लिए एक मधाुर स्वप्न है। कौन-कौन-सी रियासतें पहाड़ों में हैं?

 

क्लार्क-भरतपुर, जोधापुर, कश्मीर, उदयपुर…

 

सोफ़िया-बस, तुम उदयपुर के लिए लिखो। मैंने इतिहास में उदयपुर की वीरकथाएँ पढ़ी हैं और तभी से मुझे उस देश को देखने की बड़ी लालसा है। वहाँ के राजपूत कितने वीर, कितने स्वाधाीनता-प्रेमी, कितने आन पर जान देनेवाले होते थे! लिखा है, चित्ताौड़ में जितने राजपूतों ने वीरगति पाई, उनके जनेऊ तौले गए, तो 75 मन निकले। कई हजार राजपूत-स्त्रिायाँ एक साथ चिता पर बैठकर राख हो गईं। ऐसे प्रणवीर प्राणी संसार में शायद ही और कहीं हों।

 

क्लार्क-हाँ, वे वृत्ताांत मैंने भी इतिहास में देखे हैं। ऐसी वीर जाति का जितना सम्मान किया जाए, कम है। इसीलिए उदयपुर का राजा हिंदू राजों में सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है। उनकी वीर-कथाओं में अतिशयोक्ति से बहुत काम लिया गया है, फिर भी यह मानना पड़ेगा कि इस देश में इतनी जाँबाज और कोई जाति नहीं है।

 

सोफ़िया-तुम आज भी उदयपुर के लिए लिखो और सम्भव हो, तो हम लोग एक मास के अंदर यहाँ से प्रस्थान कर दें।

 

क्लार्क-लेकिन कहते हुए डर लगता है…तुम मेरा आशय समझ गई होगी…यहाँ से चलने के पहले मैं तुमसे वह चिर-सिंचित…मेरा जीवन…

 

सोफ़िया ने मुस्कराकर कहा-समझ गई, उसके प्रकट करने का कष्ट न उठाओ। इतनी मंदबुध्दि नहीं हूँ; लेकिन मेरी निश्चय-शक्ति अत्यंत शिथिल है, यहाँ तक कि सैर करने के लिए चलने का निश्चय भी मैं घंटों के सोच-विचार के बाद करती हूँ। ऐसे महत्तव के विषय में, जिसका सम्बंधा जीवन-पर्यंत रहेगा, मैं इतनी जल्द कोई फैसला नहीं कर सकती। बल्कि साफ तो यों है कि अभी तक मैं यही निर्णय नहीं कर सकी कि मुझ-जैसी निर्द्वंद्व, स्वाधाीन-विचार-प्रिय स्त्राी दाम्पत्य जीवन के योग्य है भी या नहीं। विलियम, मैं तुमसे हृदय की बात कहती हूँ,गृहिणी-जीवन से मुझे भय मालूम होता है। इसलिए जब तक तुम मेरे स्वभाव से भली भाँति परिचित न हो जाओ, मैं तुम्हारे हृदय में झूठी आशाएँ पैदा करके तुम्हें धाोखे में नहीं डालना चाहती। अभी मेरा और तुम्हारा परिचय केवल एक वर्ष का है। अब तक मैं तुम्हारे लिए केवल एक रहस्य हूँ। क्यों, हूँ या नहीं?

 

क्लार्क-हाँ सोफी! वास्तव में अभी मैं तुम्हें अच्छी तरह नहीं पहचान पाया हूँ।

 

सोफ़िया-फिर ऐसी दशा में तुम्हीं सोचो, हम दोनों का दाम्पत्य सूत्रा में बँधा जाना कितनी बड़ी नादानी है। मेरे दिल की जो पूछो, तो मुझे एक सहृदय, सज्जन विचारशील और सच्चरित्रा पुरुष के साथ मित्रा बनकर रहना, उसकी स्त्राी बनकर रहने से कम आनंददायक नहीं मालूम होता। तुम्हारा क्या विचार है, यह मैं नहीं जानती, लेकिन मैं सहानुभूति और सहवास को वासनामय सम्बंधा से कहीं महत्तवपूर्ण समझती हूँ।

 

क्लार्क-किंतु सामाजिक और धााािर्मक प्रथाएँ ऐसे सम्बंधाों को…

 

सोफ़िया-हाँ, ऐसे सम्बंधा अस्वाभाविक होते हैं और साधाारणत: उन पर आचरण नहीं किया जा सकता। मैं भी इसे सदैव के लिए जीवन का नियम बनाने को प्रस्तुत नहीं हूँ; लेकिन जब तक हम एक दूसरे को अच्छी तरह समझ न लें, जब तक हमारे अंत:करण एक दूसरे के सामने आईने न बन जाएँ, उस समय तक मैं ऐसे ही सम्बंधा को आवश्यक समझती हूँ।

 

क्लार्क-मैं तुम्हारी इच्छाओं का दास हूँ। केवल इतना कह सकता हूँ कि तुम्हारे बिना मेरा जीवन वह घर है, जिसमें कोई रहनेवाला नहीं;वह दीपक है, जिसमें उजाला नहीं; वह कवित्ता है, जिसमें रस नहीं।

 

सोफ़िया-बस, बस। यह प्रेमियों की भाषा केवल प्रेम-कथाओं के ही लिए शोभा देती है। यह लो, पाँड़ेपुर आ गए। ऍंधोरा हो रहा है। सूरदास चला गया होगा। यह हाल सुनेगा, तो उस गरीब का दिल टूट जाएगा।

 

क्लार्क-उसके निर्वाह का कोई और प्रबंधा कर दूँ?

 

सोफ़िया-इस भूमि से उसका निर्वाह नहीं होता था-केवल मुहल्ले के जानवर चरा करते थे। वह गरीब है, भिखारी है, पर लोभी नहीं। मुझे तो वह कोई साधु मालूम होता है।

 

क्लार्क-अंधो कुशाग्र बुध्दि और धार्मिक होते हैं।

 

सोफ़िया-मुझे तो उसके प्रति बड़ी श्रध्दा हो गई है। यह देखो, पापा ने काम शुरू कर दिया। अगर उन्होंने राजा की पीठ न ठोकी होती, तो उन्हें तुम्हारे सम्मुख आने का कदापि साहस न होता।

 

क्लार्क-तुम्हारे पापा बड़े चतुर आदमी हैं। ऐसे ही प्राणी संसार में सफल होते हैं। कम-से-कम मैं तो यह दोरुखी चाल न चल सकता।

 

सोफ़िया-देख लेना, दो-ही-चार वर्षों में मुहल्ले में कारखाने के मजदूरों के मकान होंगे, यहाँ का एक मनुष्य भी न रहने पाएगा।

 

क्लार्क-पहले तो अंधो ने बड़ा शोर-गुल मचाया था। देखें, अब क्या करता है?

 

सोफ़िया-मुझे तो विश्वास है कि वह चुप होकर कभी न बैठेगा, चाहे इस जमीन के पीछे जान ही क्यों न चली जाए।

 

क्लार्क-नहीं प्रिये, ऐसा कदापि न होने पाएगा। जिस दिन यह नौबत आएगी, सबसे पहले सूरदास के लिए मेरे कंठ से जय-धवनि निकलेगी, सबसे पहले मेरे हाथ उस पर फूलों की वर्षा करेंगे।

 

सोफ़िया ने क्लार्क को आज पहली बार सम्मानपूर्ण प्रेम की दृष्टि से देखा।

 

 

साल-भर तक राजा महेंद्रकुमार और मिस्टर क्लार्क में निरंतर चोटें चलती रहीं। पत्रा का पृष्ठ रणक्षेत्रा था और शृंखलित सूरमों की जगह सूरमों से कहीं बलवान् दलीलें। मनों स्याही बह गई, कितनी ही कलमें काम आईं। दलीलें कट-कटकर रावण की सेना की भाँति फिर जीवित हो जाती थीं। राजा साहब बार-बार हतोत्साह हो जाते, सरकार से मेरा मुकाबला करना चींटी का हाथी से मुकाबला करना है। लेकिन मिस्टर जॉन सेवक और उनसे अधिाक इंदु उन्हें ढाढ़स देती रहती थी। शहर के रईसों ने हिम्मत से कम, स्वार्थ-बुध्दि से अधिाक काम लिया। उस विनयपत्रा पर, जो डॉक्टर गांगुली ने नगर-निवासियों की ओर से गवर्नर की सेवा में भेजने के लिए लिखा था, हस्ताक्षर करने के समय अधिाकांश सज्जन बीमार पड़ गए, ऐसे असाधय रोग से पीड़ित हो गए कि हाथ में कलम पकड़ने की शक्ति न रही। कोई तीर्थ-यात्राा करने चला गया,कोई किसी परमावश्यक काम से कहीं बाहर रवाना हो गया, जो गिने-गिनाए लोग कोई हीला न कर सके, वे भी हस्ताक्षर करने के बाद मिस्टर क्लार्क से क्षमा-प्रार्थना कर आए-हुजूर, न जाने उसमें क्या लिखा था, हमारे सामने तो केवल सादा कागज आया था, हमसे यही कहा गया कि यह पानी का महसूल घटाने की दरखास्त है। हमें मालूम होता है कि उस पत्रा पर पीछे से हुजूर की शिकायत लिखी जाएगी, तो हम भूलकर भी कलम न उठाते। हाँ, जिन महानुभावों ने सिगरेट कम्पनी के हिस्से लिए थे, उन्हें विवश होकर हस्ताक्षर करने पड़े। हस्ताक्षर करनेवालों की संख्या यद्यपि बहुत न थी; पर डॉक्टर गांगुली को व्यवस्थापक सभा में सरकार से प्रश्न करने के लिए एक बहाना मिल गया। उन्होंने अदम्य उत्साह और धौर्य के साथ प्रश्नों की बाढ़ जारी रखी। सभा में डॉक्टर महोदय का विशेष सम्मान था, कितने ही सदस्यों ने उनके प्रश्नों का समर्थन किया, यहाँ तक कि डॉक्टर गांगुली के एक प्रस्ताव पर अधिाकारियों को बहुमत से हार माननी पड़ी। इस प्रस्ताव से लोगों को बड़ी-बड़ी आशाएँ थीं, किंतु जब इसका भी कुछ असर न हुआ, तो जगह-जगह सरकार पर अविश्वास प्रकट करने के लिए सभाएँ होने लगीं। रईसों और जमींदारों की तो भय के कारण जबान बंद थी; किंतु मधयम श्रेणी के लोगों ने खुल्लमखुल्ला इस निरंकुशता का विरोधा करना शुरू किया। कुँवर भरतसिंह को उनका नेतृत्व प्राप्त हुआ और यह स्पष्ट शब्दों में कहने लगे-अब हमें अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। हमारा उध्दार अपने ही हाथों होगा। महेंद्रकुमार भी गुप्त रूप से इस दल को प्रोत्साहित करने लगे। डॉक्टर गांगुली के बहुत कुछ आश्वासन देने पर भी शासकों पर उन्हें अश्रध्दा हो गई। निराशा निर्बलता से उत्पन्न होती है; पर उसके गर्भ से शक्ति का जन्म होता है।

 

रात के नौ बज गए थे। विनयसिंह को कारावास-दंड का समाचार पाकर कुँवर साहब ने अपने हितैषियों को इस स्थिति पर विचार करने के लिए आमंत्रिात किया था। डॉक्टर गांगुली, जॉन सेवक, प्रभु सेवक, राजा महेंद्रकुमार और कई अन्य सज्जन आए हुए थे। इंदु भी राजा साहब के साथ आई थी और अपनी माता से बातें कर रही थी। कुँवर साहब ने नायकराम को बुला भेजा था और वह कमरे के द्वार पर बैठे हुए तम्बाकू मल रहे थे।

 

महेंद्रकुमार बोले-रियासतों पर सरकार का बड़ा दबाव है। वे अपंग हैं और सरकार के इशारे पर चलने के लिए मजबूर हैं।

 

भरतसिंह ने राजा साहब का खंडन किया-जिससे किसी का उपकार न हो और जिसके व्यक्तित्व का आधाार ही अपकार पर हो, उसका निशान जितनी जल्द मिट जाए, उतना ही अच्छा। विदेशियों के हाथों में अन्याय का यंत्रा बनकर जीवित रहने से तो मर जाना ही उत्ताम है।

 

डॉक्टर गांगुली-वहाँ का हाकिम लोग खुद पतित है। डरता है कि रियासत में स्वाधाीन विचारों का प्रचार हो जाएगा, तो हम प्रजा को कैसे लूटेगा। राजा मनसद लगाकर बैठा रहता है, उसका नौकर-चाकर मनमाना राज करता है।

 

जॉन सेवक ने पक्षपात-रहित होकर कहा-सरकार किसी रियासत को अन्याय करने के लिए मजबूर नहीं करती। हाँ, चूँकि वे अशक्त हैं,अपनी रक्षा आप नहीं कर सकतीं, इसलिए ऐसे कामों में जरूरत से ज्यादा तत्पर हो जाती हैं, जिनसे सरकार के प्रसन्न होने का उन्हें विश्वास होता है।

 

भरतसिंह-विनय कितना नम्र, सुशील, सुधाीर है, यह आप लोगों से छिपा नहीं। मुझे इसका विश्वास ही नहीं हो सकता कि उसकी जात से किसी का अहित हो सकता है।

 

प्रभु सेवक कुँवर साहब के मुँह लगे हुए थे। अब तक जॉन सेवक के भय से न बोले थे; पर अब न रहा गया। बोले-क्यों, क्या पुलिस से चोरों का अहित नहीं होता? क्या साधाुओं से दुर्जनों का अहित नहीं होता? और फिर गऊ जैसे पशु की हिंसा करनेवाले क्या संसार में नहीं हैं?विनय ने दलित किसानों की सेवा करनी चाही थी। उसी का यह उन्हें उपहार मिला है। प्रजा की सहन-शक्ति की भी कोई सीमा होनी चाहिए और होती है। उसकी अवहेलना करके कानून कानून ही नहीं रह जाता। उस समय उस कानून को भंग करना ही प्रत्येक विचारशील प्राणी कार् कत्ताव्य हो जाता है। अगर आज सरकार का हुक्म हो कि सब लोग मुँह में कालिख लगाकर निकलें, तो इस हुक्म की उपेक्षा करना हमारा धार्म हो जाएगा। उदयपुर के दरबार को कोई अधिाकार नहीं है कि वह किसी को रियासत से निकल जाने पर मजबूर करे।

 

डॉक्टर गांगुली-उदयपुर ऐसा हुक्म दे सकता है। उसको अधिाकार है।

 

प्रभु सेवक-मैं उसे स्वीकार नहीं करता। जिस आज्ञा का आधाार केवल पशु-बल हो, उसका पालन करना आवश्यक नहीं। अगर उदयपुर में कोई उत्तारदायित्वपूर्ण सरकार होती और वह बहुमत से यह हुक्म देती, तो दूसरी बात थी। लेकिन जब कि प्रजा ने कभी दरबार से यह इच्छा नहीं की, बल्कि वह विनयसिंह पर जान देती है, तो केवल अधिाकारियों की स्वेच्छा हमको उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए बाधय नहीं कर सकती।

 

राजा साहब ने इधार-उधार भीत नेत्राों से देखा कि यहाँ कोई मेरा शत्राु तो नहीं बैठा हुआ है। जॉन सेवक भी त्योरियाँ बदलने लगे।

 

डॉक्टर गांगुली-हम दरबार में लड़ नहीं सकता।

 

प्रभु सेवक-प्रजा को अपने स्वत्व की रक्षा के लिए उत्तोजित तो कर सकते हैं।

 

भरतसिंह-इसका परिणाम विद्रोह के सिवा और क्या हो सकता है, और विद्रोह का दमन करने के लिए दरबार सरकार से सहायता लेगा। हजारों बेकसों का खून हो जाएगा।

 

प्रभु सेवक-जब तक हम खून से डरते रहेंगे, हमारे स्वत्व भी हमारे पास आने से डरते रहेंगे। उनकी रक्षा भी तो खून ही से होगी। राजनीति का क्षेत्रा समरक्षेत्रा से कम भयावह नहीं है। उसमें उतरकर रक्तपात से डरना कापुरुषता है।

 

जॉन सेवक से अब जब्त न हुआ। बोले-तुम-जैसे भावुक युवकों को ऐसे गहन राजनीतिक विषयों पर कुछ करने के पहले अपने शब्दों को खूब तौल लेना चाहिए। यह अवसर शांत और शीतल विचार से काम लेने का है।

 

प्रभु सेवक ने दबी जबान से कहा; मानो मन में यह कह रहा है-शीतल विचार कायरता का दूसरा नाम है।

 

डॉक्टर गांगुली-मेरे विचार में भारतीय सरकार की सेवा में डेपुटेशन जाना चाहिए।

 

भरतसिंह-सरकार कह देगी, हमें दरबार के आंतरिक विषय में दखल देने का अधिाकार नहीं।

 

महेंद्रकुमार-दरबार ही के पास क्यों न डेपुटेशन भेजा जाए?

 

जॉन सेवक-हाँ, यही मेरी भी सलाह है। राज्य के विरुध्द आंदोलन करना राज्य को निर्बल बना देता है और प्रजा को उद्दंड। राज्य-प्रभुत्व का प्रत्येक दशा में अक्षुण्ण रहना आवश्यक है, अन्यथा उसका फल वही होगा, जो आज साम्यवाद का व्यापक रूप धाारण कर रहा है। संसार ने तीन दशाब्दियों तक जनवाद की परीक्षा की और अंत में हताश हो गया। आज समस्त संसार जनवाद के आतंक से पीड़ित है। हमारा परम सौभाग्य है कि वह अग्नि-ज्वाला अभी तक हमारे देश में नहीं पहुँची, और हमें यत्न करना चाहिए कि उससे भविष्य में भी निश्शंक रहें।

 

कुँवर भरतसिंह जनवाद के बड़े पक्षपाती थे। अपने सिध्दांत का खंडन होते देखकर बोले-फूस का झोंपड़ा बनाकर आप अग्नि-ज्वाला से निश्शंक रह ही नहीं सकते। बहुत सम्भव है कि ज्वाला के बाहर से न आने पर भी घर ही की एक चिनगारी उड़कर उस पर गिर पड़े। आप झोंपड़ा रखिए ही क्यों! जनवाद आदर्श व्यवस्था न हो; पर संसार अभी उससे उत्ताम कोई शासन-विधाान नहीं निकाल सका है। खैर, जब यह सिध्द हो गया कि हम दरबार पर कोई असर नहीं डाल सकते, तो सब्र करने के सिवा और क्या किया जा सकता है। मैं राजनीतिक विषयों से अलग रहना चाहता हूँ, क्योंकि उससे कोई फायदा नहीं। स्वाधाीनता का मूल्य रक्त है। जब हममें उसके देने की शक्ति ही नहीं है, तो व्यर्थ में कमर क्यों बाँधों, पैंतरे क्यों बदलें, ताल क्यों ठोंकें? उदासीनता ही में हमारा कल्याण है।

 

प्रभु सेवक-यह तो बहुत मुश्किल है कि ऑंखों से अपना घर लुटते देखूँ और मुँह न खोलूँ।

 

भरतसिंह-हाँ, बहुत मुश्किल है, पर अपनी वृत्तिायों को साधाना पड़ेगा। उसका यही उपाय है कि हम कुल्हाड़ी का बेंट न बनें। बेंट कुल्हाड़ी की मदद न करे, तो कुल्हाड़ी कठोर और तेज होने पर भी हमें बहुत हानि नहीं पहुँचा सकती। यह हमारे लिए घोर लज्जा की बात है कि हम शिक्षा, ऐश्वर्य या धान के बल पर शासकों के दाहिने हाथ बनकर प्रजा का गला काटें और इस बात पर गर्व करें कि हम हाकिम हैं।

 

जॉन सेवक-शिक्षित वर्ग सदैव से राज्य का आश्रित रहा है और रहेगा। राज्य-विमुख होकर वह अपना अस्तित्व नहीं मिटा सकता।

 

भरतसिंह-यही तो सबसे बड़ी विपत्तिा है। शिक्षित वर्ग जब तक शासकों का आश्रित रहेगा, हम अपने लक्ष्य के जौ भर भी निकट न पहुँच सकेंगे। उसे अपने लिए थोड़े-बहुत थोड़े दिनों के लिए कोई दूसरा ही अवलम्ब खोजना पड़ेगा।

 

राजा महेंद्रसिंह बगलें झाँक रहे थे कि यहाँ से खिसक जाने का कोई मौका मिल जाए। इस वाद-विवाद का अंत करने के इरादे से बोले-तो आप लोगों ने क्या निश्चय किया? दरबार की सेवा में डेपुटेशन भेजा जाएगा?

 

डॉक्टर गांगुली-हम खुद जाकर विनय को छुड़ा लाएगा।

 

भरतसिंह-अगर वधिाक ही से प्राण-याचना करनी है, तो चुप रहना ही अच्छा, कम-से-कम बात तो बनी रहेगी।

 

डॉक्टर गांगुली-फिर वही च्मेपउपेउ का बात। हम विनय को समझाकर उसे यहाँ आने पर राजी कर लेगा।

 

रानी जाह्नवी ने इधार आते हुए इस वाक्य के अंतिम शब्द सुन लिए। गर्वसूचक भाव से बोलीं-नहीं डॉक्टर गांगुली, आप विनय पर यह कृपा न कीजिए। यह उसकी पहली परीक्षा है। इसमें उसको सहायता देना उसके भविष्य को नष्ट करना है। वह न्यायपक्ष पर है, उसे किसी से दबने की जरूरत नहीं। अगर उसने प्राण-भय से इस अन्याय को स्वीकार कर लिया, तो सबसे पहले मैं ही उसके माथे पर कालिमा का टीका लगा दूँगी।

 

रानी के ओजपूर्ण शब्दों ने लोगों को विस्मित कर दिया। ऐसा जान पड़ता था कि कोई देवी आकाश से यह संदेश सुनाने के लिए उतर आई है।

 

एक क्षण के बाद भरतसिंह ने रानी के शब्दों का भावार्थ किया-मेरे खयाल में अभी विनयसिंह को उसी दशा में छोड़ देना चाहिए। यह उसकी परीक्षा है। मनुष्य बड़े-से-बड़े काम जो कर सकता है, वह यही है कि आत्मरक्षा के लिए मर मिटे। यही मानवीय जीवन का उच्चतम उद्देश्य है। ऐसी ही परीक्षाओं में सफल होकर हमें वह गौरव प्राप्त हो सकता है कि जाति हम पर विश्वास कर सके।

 

गांगुली-रानी हमारी देवी हैं। हम उनके सामने कुछ नहीं कह सकता। पर देवी लोगों का बात संसारवालों के व्यवहार के योग्य नहीं हो सकता। हमको पूरा आशा है कि हमारा सरकार जरूर बोलेगा।

 

रानी-सरकार की न्यायशीलता का एक दृष्टांत तो आपके सामने ही है। अगर अब भी आपको उस पर विश्वास हो, तो मैं यही कहूँगी कि आपको कुछ दिनों किसी औषधिा का सेवन करना पड़ेगा।

 

गांगुली-दो-चार दिन में यह बात मालूम हो जाएगा। सरकार को भी तो अपनी नेकनामी-बदनामी का डर है।

 

महेंद्रकुमार बहुत देर के बाद बोले-राह देखते-देखते तो ऑंखें पथरा गईं। हमारी आशा इतनी चिरंजीवी नहीं।

 

सहसा टेलीफोन की घंटी बोली। कुँवर साहब ने पूछा-कौन महाशय हैं?

 

‘मैं हूँ प्राणनाथ। मिस्टर क्लार्क का तबादला हो गया।’

 

‘कहाँ?’

 

‘पोलिटिकल विभाग में जा रहे हैं। ग्रेड कम कर दिया गया है।’

 

डॉक्टर गांगुली-अब बोलिए, मेरा बात सच हुआ कि नहीं? आप लोग कहता था, सरकार का नीयत बिगड़ा हुआ है। पर हम कहता था,उसको हमारा बात मानना पड़ेगा।

 

महेंद्रकुमार-अजी, प्राणनाथ मसखरा है, आपसे दिल्लगी कर रहा होगा।

 

भरतसिंह-नहीं, मुझसे तो उसने कभी दिल्लगी नहीं की।

 

रानी-सरकार ने इतने नैतिक साहस से शायद पहली ही बार काम लिया है।

 

गांगुली-अब वह जमाना नहीं है, जब सरकार प्रजा-मत की उपेक्षा कर सकता था। अब काउंसिल का प्रस्ताव उसे मानना पड़ता है।

 

भरतसिंह-जमाना तो वही है, और सरकार की नीति में भी कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है। इसमें जरूर कोई-न-कोई राजनीतिक रहस्य है।

 

जॉन सेवक-व्यापारी मंडल ने मेरे प्र्रस्ताव को स्वीकार करके गवर्नमेंट के छक्के छुड़ा दिए।

 

महेंद्रकुमार-मेरा डेपुटेशन बड़े मौके से पहुँचा था।

 

गांगुली-मैंने काउंसिल को ऐसा संघटित कर दिया था कि हमको इतना बड़ा मेजारिटी कभी नहीं मिला।

 

इंदु रानी के पीछे खड़ी थी। बोली-विनयपत्रा पर मेरे ही उद्योग से इतने आदमियों के नाम आए थे। मुझे तो विश्वास है, यह उसी की करामात है।

 

नायकराम अब तक चुपचाप बैठे हुए थे। उनकी समझ में न आता था कि यहाँ क्या बातें हो रही हैं। टेलीफोन की बात उनकी समझ मेें आई। अब उन्हें ज्ञात हुआ कि लोग सफलता का सेहरा अपने-अपने सिर बाँधा रहे हैं। ऐसे अवसर पर भला वह कब चूकनेवाले थे। बोले-सरकार, यहाँ भी गाफिल बैठनेवाले नहीं हैं। सिविल सारजंट के कान में यह बात डाल दी थी कि राजा साहब की ओर से पूरा एक हजार लठैत जवान तैयार बैठा हुआ है। उनका हुक्म बहाल न हुआ, तो खून-खच्चर हो जाएगा, शहर में तूफान आ जाएगा। उन्होंने लाट साहब से यह बात जरूर ही कही होगी।

 

महेंद्रकुमार-मैं तो समझता हूँ, यह तुम्हारी धामकियों ही की करामात है।

 

नायकराम-धार्मावतार, धामकियाँ कैसी, खून की नदी बह जाती। आपका ऐसा अकबाल है कि चाहूँ, तो एक बार शहर लुटवा दूँ। ये लाल साफे खड़े मुँह ताकते रह जाएँ।

 

प्रभु सेवक ने हास्य-भाव से कहा-सच पूछिए, तो यह उस कविता का फल है, जो मैंने ‘हिंदुस्तान-रिव्यू’ में लिखी थी।

 

रानी-प्रभु, तुमने यह चपत खूब लगाई। डॉक्टर गांगुली अपना सिर सुहला रहे हैं। क्यों डॉक्टर, बैठी या नहीं? एक तुच्छ सफलता पर आप लोग इतने फूले नहीं समाते! इसे विजय न समझिए, यह वास्तव में पराजय है, जो आपको अपने अभीष्ट से कोसों दूर हटा देती है, आपके गले में फंदे को और भी मजबूत कर देती है। बाजेवाले सरदी में बाजे को आग से सेंकते हैं, केवल इसीलिए कि उसमें से कर्ण मधाुर स्वर निकले। आप लोग भी सेेंके जा रहे हैं, अब चोटों के लिए पीठ मजबूत कर लीजिए।

 

यह कहती हुई जाह्नवी अंदर चली गईं; पर उनके जाते ही इस तिरस्कार का असर भी जाता रहा, लोग फिर वही राग अलापने लगे।

 

महेंद्रकुमार-क्लार्क महोदय भी क्या याद करेंगे कि किसी से पाला पड़ा था।

 

गांगुली-अब इससे कौन इनकार कर सकता है कि ये लोग कितने न्यायप्रिय होते हैं।

 

जॉन सेवक-अब जरा उस अंधो की भी खबर लेनी चाहिए।

 

नायकराम-साहब, उसको हार-जीत का कोई गम नहीं है। उस जमीन की दस गुनी भी मिल जाए, तो भी वह इसी तरह रहेगा।

 

जॉन सेवक-मैं कल ही से मिल में काम लगा दूँगा। जरा मिस्टर क्लार्क को भी देख लूँ।

 

महेंद्रकुमार-मैं तो अभिवादन-पत्रा न दूँगा। उनकी तरफ से कोशिश तो होगी, पर बोर्ड का बहुमत मेरे साथ है।

 

गांगुली-ऐसा हाकिम लोग को अभिवादन-पत्रा देने का काम नहीं।

 

महेंद्रकुमार के पेट में चूहे दौड़ रहे थे कि इंदु से भी इस सुख-सम्वाद पर बातें करूँ। यों तो बहुत ही गम्भीर पुरुष थे; पर इस विजय ने बालोचित उल्लास से विह्नल कर दिया था। एक नशा-सा छाया हुआ था। रानी के जाने के जरा देर बार वह विहसित मुख, प्रसन्न चित्ता, अज्ञात भाव से अकड़ते, गर्व से मस्तक उठाए अंदर दाखिल हुए। इंदु रानी के पास बैठी हुई थी। खड़ी होकर बोली-आखिर साहब बहादुर को बोरिया-बँधाना सँभालना पड़ा न!

 

महेंद्रकुमार सिंह रानी के सामने अपना कुत्सित आनंद न प्रकट कर सके। बोले-हाँ, अब तो टलना ही पड़ेगा।

 

इंदु-अब कल मैं इन लेडी साहब का कुशल-समाचार पूछँगी, जो धारती पर पाँव न रखती थीं, अपने आगे किसी को कुछ समझती ही न थीं। बुलाकर दावत करूँ?

 

महेंद्रकुमार-कभी न आएगी, और जरूरत ही क्या है!

 

इंदु-जरूरत क्यों नहीं! झेंपेगी तो, सिर तो नीचा हो जाएगा। न आएगी, न सही। अम्माँ, आपने तो देखा है, सोफ़िया पहले कितनी नम्र और मिलनसार थी; लेकिन क्लार्क से विवाह की बातचीत होते ही मिजाज आसमान पर चढ़ गया।

 

रानी ने गम्भीर भाव से कहा-बेटी, यह तुम्हारा भ्रम है। सोफ़िया मिस्टर क्लार्क से कभी विवाह न करेगी। अगर मैं आदमियों को कुछ पहचान सकती हूँ तो देख लेना, मेरी बात ठीक उतरती है या नहीं।

 

इंदु-अम्माँ, क्लार्क से उसकी मँगनी हो गई है। सम्भव है, गुप्त रूप से विवाह भी हो गया हो। देखती नहीं हो, दोनों कितने घुले-मिले रहते हैं।

 

रानी-कितने ही घुले-मिले रहें; पर उनका विवाह न हुआ है, न होगा। मैं अपनी संकीर्णता के कारण सोफ़िया की कितनी ही उपेक्षा करूँ;किंतु वह सती है, इसमें अणुमात्रा भी संदेह नहीं। उसे लज्जित करके तुम पछताओगी।

 

इंदु-अगर वह इतनी उदार है, तो आपके बुलाने से अवश्य आएगी।

 

रानी-हाँ, मुझे पूर्ण विश्वास है।

 

इंदु-तो बुला भेजिए, मुझे दावत का प्रबंधा क्यों न करना पड़े?

 

रानी-तुम यहाँ बुलाकर उसका अपमान करना चाहती हो। मैं तुमसे अपने हृदय की बात कहती हूँ, अगर वह ईसाइन न होती, तो आज के पाँचवें वर्ष मैं उससे विनय का विवाह करती और इसे अपना धान्य भाग समझती।

 

इंदु को ये बातें कुछ अच्छी न लगीं। उठकर अपने कमरे में चली गई। एक क्षण में महेंद्रकुमार भी वहाँ पहुँच गए और दोनों डींगें मारने लगे। कोई लड़का खेल में जीतकर भी इतना उन्मत्ता न होता होगा।

 

उधार दीवानखाने से भी सभा उठ गई। लोग अपने-अपने घर गए। जब एकांत हो गया, तो कुँवर साहब ने नायकराम को बुलाकर कहा-पंडाजी, तुमसे मैं एक काम लेना चाहता हूँ, करोगे?

 

नायकराम-सरकार, हुकुम हो, तो सिर देने को हाजिर हैं। ऐसी क्या बात है भला?

 

कुँवर-देखो, दुनियादारी मत करो। मैं जो काम लेना चाहता हूँ, वह सहज नहीं। बहुत समय, बहुत बुध्दि, बहुत बल व्यय करना पड़ेगा। जान-जोखिम भी है। अगर दिल इतना मजबूत हो, तो हामी भरो, नहीं साफ-साफ जवाब दे दो, मैं कोई यात्राी नहीं कि तुम्हें अपनी धााक बिठाना जरूरी हो। मैं तुम्हें जानता हूँ और तुम मुझे जानते हो। इसलिए साफ बातचीत होनी चाहिए।

 

नायकराम-सरकार, आपसे दुनियादारी करके भगवान् को क्या मुँह दिखाऊँगा! आपका नमक तो रोम-रोम में सना हुआ है। अगर मेरे काबू की बात होगी, तो पूरी करूँगा, चाहे जान ही पर क्यों न आ बने। आपके हुकुम देने की देर है।

 

कुँवर-विनय को छुड़ाकर ला सकते हो?

 

नायकराम-दीनबंधाु, अगर प्राण देकर भी ला सकूँगा, तो उठा न रखूँगा।

 

कुँवर-तुम जानते हो, मैंने तुमसे यह सवाल क्यों किया! मेरे यहाँ सैकड़ों आदमी हैं। खुद डॉक्टर गांगुली जाने को तैयार हैं। महेंद्र को भेज दूँ, तो वह भी चले जाएँगे। लेकिन इन लोगों के सामने मैं अपनी बात नहीं छेड़ना चाहता। सिर पर यह इलजाम नहीं लेना चाहता कि कहते कुछ हैं, और करते कुछ। धार्म संकट में पड़ा हुआ हूँ। पर बेटे की मुहब्बत नहीं मानती। हूँ तो आदमी, काठ का कलेजा तो नहीं है? कैसे सब्र करूँ? उसे बड़े-बड़े अरमानों से पाला है, वही एक जिंदगी का सहारा है। तुम उसे किसी तरह अपने साथ लाओ। उदयपुर के अमले और कर्मचारी देवता नहीं, उन्हें लालच देकर जेल में जा सकते हो, विनयसिंह से मिल सकते हो, अमलाें की मदद से उन्हें बाहर ला सकते हो, यह कुछ कठिन नहीं। कठिन है विनय को आने पर राजी करना। वह तुम्हारी बुध्दि और चतुरता पर छोड़ता हूँ। अगर तुम मेरी दशा का ज्ञान उन्हें करा सकोगे, तो मुझे विश्वास है, वह आएँगे। बोलो, कर सकते हो यह काम? इसका मेहनताना एक बूढ़े बाप के आशीर्वाद के साथ और जो कुछ चाहोगे, पेश करूँगा।

 

नायकराम-महाराज, कल चला जाऊँगा। भगवान् ने चाहा, तो उन्हें साथ लाऊँगा, नहीं तो फिर मुँह न दिखाऊँगा।

 

कुँवर-नहीं पंडाजी, जब उन्हें मालूम हो जाएगा कि मैं कितना विकल हूँ, तो वह चले आएँगे; वह अपने बाप की जान को सिध्दांत पर बलिदान न करेंगे। उनके लिए मैंने अपने जीवन की कायापलट कर दी, यह फकीरी भेष धाारण्ा किया, क्या वह मेरे लिए इतना भी न करेंगे! पंडाजी, सोचो, जिस आदमी ने हमेशा मखमली बिछौनों पर आराम किया हो, उसे इस काठ के तख्त पर आराम मिल सकता है? विनय का प्रेम ही वह मंत्रा है, जिसके वश होकर मैं यह कठिन तपस्या कर रहा हूँ। जब विनय ने त्याग का व्रत ले लिया, तो मैं किस मुँह से बुढ़ापे में भोग-विलास में लिप्त रहता? आह! ये सब जाह्नवी के बोए हुए काँटे हैं। उसके आगे मेरी कुछ नहीं चलती। मेरा सुख-स्वर्ग उसी के कारण नरक तुल्य हो रहा है। उसी के कारण मेरा प्यारा विनय मेरे हाथों से निकला जाता है, ऐसा पुत्रा-रत्न खोकर यह संसार मेरे लिए नरक हो जाएगा। तुम कल जाओगे? मुनीम से जितने रुपये चाहो, ले लो।

 

नायकराम-आपके अकबाल से किसी बात की कमी नहीं। आपकी दया चाहिए, आपने इतने प्रतापी होकर जो त्याग किया है, वह कोई दूसरा करता, तो ऑंख निकल पड़ती। त्याग करना कोई हँसी है! यहाँ तो घर में भूँजी भाँग नहीं, जात्रिायों की सेवा-टहल न करें, तो भोजन का ठिकाना भी न हो; पर बूटी की ऐसी चाट पड़ गई है कि एक दिन न मिले, तो बावला हो जाता हूँ। कोई आपकी तरह क्या खाके त्याग करेगा?

 

कुँवर-यह तो मानी हुई बात है कि तुम गए, तो विनय को लेकर ही लौटोगे। अब यह बताओ कि मैं तुम्हें क्या दक्षिणा दूँ? तुम्हारी सबसे बड़ी अभिलाषा क्या है?

 

नायकराम-सरकार की कृपा बनी रहे, मेरे लिए यह कुछ कम नहीं।

 

कुँवर-तो इसका आशय यह है कि तुम मेरा काम नहीं करना चाहते?

 

नायकराम-सरकार, ऐसी बात न कहें। आप मुझे पालते हैं, आपका हुकुम न बजा लाऊँगा, तो भगवान् को क्या मुँह दिखाऊँगा। और फिर आपका काम कैसा, अपना ही काम है।

 

कुँवर-नहीं भाई, मैं तुम्हें सेंत में इतना कष्ट नहीं देना चाहता। यह सबसे बड़ा सलूक है, जो तुम मेरे साथ कर रहे हो। मैं भी तुम्हारे साथ वही सलूक करना चाहता हूँ, जिसे तुम सबसे बड़ा समझते हो। तुम्हारे कै लड़के हैं?

 

नायकराम ने सिर झुकाकर कहा-धार्मावतार, अभी तो ब्याह ही नहीं हुआ।

 

कुँवर-अरे, यह क्या बात है! आधाी उम्र गुजर गई और तुम अभी कुँआरे ही बैठे हो!

 

नायकराम-सरकार, तकदीर के सिवा और क्या कहूँ!

 

इन शब्दों में इतनी मर्मांतक वेदन भरी हुई थी कि कुँवर साहब पर नायकराम की चिरसंचित अभिलाषा प्रकट हो गई। बोले-तो तुम घर में अकेले ही रहते हो?

 

नायकराम-हाँ, धार्मावतार, भूत की भाँति अकेला ही पड़ा रहता हूँ। आपके अकबाल से दो खंड का मकान है, बाग-बगीचे हैं, गायें-भैंसें हैं; पर रहनेवाला कोई नहीं, भोगनेवाला कोई नहीं। हमारी बिरादरी में उन्हीं का ब्याह होता है, जो बड़े भाग्यवान होते हैं।

 

कुँवर-(मुस्कराकर) तो तुम्हारा विवाह कहीं ठहरा दूँ।

 

नायकराम-महाराज, ऐसी तकदीर कहाँ?

 

कुँवर-तकदीर मैं बना दूँगा, मगर यह कैद तो नहीं है कि कन्या बहुत ऊँचे कुल की हो?

 

नायकराम-दीनबंधाु, कन्याओं के लिए ऊँचा-नीचा कुल नहीं देखा जाता। कन्या और गऊ तो पवित्रा हैं। ब्राह्मण के घर आकर और भी पवित्रा हो जाती हैं। फिर जिसने दान लिया, संसार-भर का पाप हजम किया, तो फिर औरत की क्या बात है। जिसका ब्याह नहीं हुआ, सरकार,उसकी जिंदगी दो कौड़ी की।

 

कुँवर-अच्छी बात है, ईश्वर ने चाहा, तो लौटते ही दूल्हा बनोगे। तुमने पहले कभी चर्चा ही नहीं की।

 

नायकराम-सरकार, यह बात आपसे क्या कहता। अपने हेलियों-मेलियों के सिवा और किसी से चर्चा नहीं की। कहते लाज आती है। जो सुनेगा, वह समझेगा, इसमें कोई-न-कोई ऐब जरूर है। कई बार लबारियों की बातों में आकर सैकड़ों रुपये गँवाए। अब किसी से नहीं कह सकता। भगवान् के आसरे बैठा हूँ।

 

कुँवर-तो कल किस गाड़ी से जाओगे?

 

नायकराम-हुजूर, डाक से चला जाऊँगा।

 

कुँवर-ईश्वर करे, जल्द लौटो। मेरी ऑंखें, तुम्हारी ओर रहेंगी। यह लो, खर्च के लिए लेते जाओ।

 

यह कहकर कुँवर साहब ने मुनीम को बुलाकर उसके कान में कुछ कहा। मुनीम ने नायकराम को अपने साथ आने का इशारा किया और अपनी गद्द पर बैठाकर बोला-बोलो, कितना हमारा, कितना तुम्हारा?

 

नायकराम-क्या यह भी कोई दक्षिणा है?

 

मुनीम-रकम तो तुम्हारे हाथ जाती है?

 

नायकराम-मेरे हाथ में नहीं आती, विनयसिंह के पास भेजी जा रही है। बच्चा, मुसीबत में भी मालिक से नमकहरामी करते हो! उनके ऊपर तो बिपत पड़ी है और तुम्हें अपना घर भरने की धाुन है। तुम जैसे लालचियों को तो ऐसी जगह मारे, जहाँ पानी न मिले।

 

मुनीम ने लज्जित होकर नोटों का एक पुलिंदा नायकराम को दे दिया। नायकराम ने गिनकर नोटों को कमर में बाँधाा और मुनीम से बोले-मेरी कुछ दक्षिणा दिलवाते हो?

 

मुनीम-कैसी दक्षिणा?

 

नायकराम-नगद रुपयों की। नौकरी प्यारी है कि नहीं? जानते हो, यहाँ से निकाल दिए जाओगे, तो कहीं भीख न मिलेगी। अगर भला चाहते हो, तो पचास रुपये की गव्ी बायँ हाथ से बढ़ा दो, नहीं तो जाकर कुँवर साहब से जड़े देता हूँ। खड़े-खड़े निकाल दिए जाओगे। जानते हो कि नहीं रानीजी को? निकाले भी जाओगे और गर्दन भी नापी जाएगी। ऐसी बेभाव की पड़ेगी कि चाँद गंजी हो जाएगी।

 

मुनीम-गुरु, अब यारों ही से यह गीदड़ भभकी! इतने रुपये मिल गए, कौन कुँवर विनयसिंह रसीद लिख देते हैं।

 

नायकराम-रुपये लाते हो कि नहीं, बोलो चटपट?

 

मुनीम-गुरु, तुम तो…

 

नायकराम-रुपये लाते हो कि नहीं? यहाँ बातों की फुरसत नहीं। चटपट सोचो। मैं चला। याद रखो, कहीं भीख न मिलेगी।

 

मुनीम-तो यहाँ मेरे पास कहाँ है! यह तो सरकारी रकम है।

 

नायकराम-अच्छा, तो हैंडनोट लिख दो।

 

मुनीम-गुरु, जरा इधार देखो, गरीब आदमी हूँ।

 

नायकराम-तुम गरीब हो बच्चा! हराम की कौड़ियाँ खाकर मोटे पड़ गए हो, उस पर गरीब बनते हो। लिखो चटपट। कुँवर साहब जरा भी मुरौवत न करेंगे। यों ही मुझे इतने रुपये दिला दिए हैं। बस, मेरे कहने-भर की देर है। गबन का मुकदमा चल जाएगा बेटा, समझे? लाओ,बाप की पूजा करो। तुम-जैसे घाघ रोज थोड़े ही फँसते हैं।

 

मुनीम ने नायकराम की त्योरियों से भाँप लिया कि यह अब बिना दक्षिणा लिए न छोड़ेगा। चुपके से 25 रुपये निकालकर उसके हाथ में रखे और बोला-पंडित, अब दया करो, ज्यादा न सताओ।

 

नायकराम ने रुपये मुट्ठी में किए और बोले-ले बचा, अब किसी को न सताना, मैं तुम्हारी टोह में रहूँगा।

 

नायकराम चले गए, तो मुनीम ने मन में कहा-ले जाओ, समझ लेंगे, खैरात किया।

 

कुँवर भरतसिंह उस वक्त दीवानखाने के द्वार पर खड़े थे। आज वायु की शीतलता में आनंद न था। गगन-मंडल में चमकते हुए तारागण व्यंग-दृष्टि की भाँति हृदय में चुभते थे। सामने, वृक्षों के क्ुं+ज में विनय की स्मृति-मूर्ति, श्याम,. करुण स्वर की भाँति कम्पित, धाुएँ की भाँति असम्बध्द, यों निकलती हुई मालूम हुई, जैसे किसी संतप्त हृदय से हाय की धवनि निकलती है।

 

कुँवर साहब कई मिनट तक खड़े रोते रहे। विनय के लिए उनके अंत:करण से इस भाँति शुभेच्छाएँ निकल रही थीं, जैसे उषाकाल में बाल-सूर्य की स्निग्धा, मधाुर, मंद, शीतल किरणें निकलती हैं।

 

 

अरावली की हरी-भरी झूमती हुई पहाड़ियों के दामन में जसवंतनगर यों शयन कर रहा है, जैसे बालक माता की गोद में। माता के स्तन से दूधा की धारें, प्रेमोद्गार से विकल, उबलती, मीठे स्वरों में गाती निकलती हैं और बालक के नन्हे-से मुख में न समाकर नीचे बह जाती हैं। प्रभात की स्वर्ण-किरणों में नहाकर माता का स्नेह-सुंदर गात निखर गया है और बालक भी अंचल से मुँह निकाल-निकालकर माता के स्नेह-प्लावित मुख की ओर देखता है, हुमुकता है और मुस्कराता है; पर माता बार-बार उसे अंचल से ढँक लेती है कि कहीं उसे नजर न लग जाए।

 

सहसा तोप के छूटने की कर्ण-कटु धवनि सुनाई दी। माता का हृदय काँप उठा, बालक गोद में चिमट गया।

 

फिर वही भयंकर धवनि! माँ दहल उठी, बालक चिमट गया।

 

फिर तो लगातार तोपें छूटने लगीं। माता के मुख पर आशंका के बादल छा गए। आज रियासत के नए पोलिटिकल एजेंट यहाँ आ रहे हैं। उन्हीं के अभिवादन में सलामियाँ उतारी जा रही हैं।

 

मिस्टर क्लार्क और सोफिया को यहाँ आए एक महीन गुजर गया। जागीरदारों की मुलाकातों, दावतों, नजरानों से इतना अवकाश ही न मिला कि आपस में कुछ बातचीत हो। सोफिया बार-बार विनयसिंह का जिक्र करना चाहती; पर न तो उसे मौका ही मिलता और न यही सूझता कि कैसे वह जिक्र छेडर्ऌँ। आखिर जब पूरा महीना खत्म हो गया, तो एक दिन उसने क्लार्क से कहा-इन दावतों का ताँता तो लगा ही रहेगा,और बरसात बीती जा रही है। अब यहाँ जी नहीं लगता, जरा पहाड़ी प्रांतों की सैर करनी चाहिए। पहाड़ियों में खूब बहार होगी। क्लार्क भी सहमत हो गए।

 

एक सप्ताह से दोनों रियासतों की सैर कर रहे हैं। रियासत के दीवान सरदार नीलकंठ राव भी साथ हैं। जहाँ ये लोग पहुँचते हैं, बड़ी धाूमधााम से उनका स्वागत होता है, सलामियाँ उतारी जाती हैं, मान-पत्रा मिलते हैं, मुख्य-मुख्य स्थानों की सैर कराई जाती है। पाठशालाओं, चिकित्सालयों और अन्य सार्वजनिक संस्थाओं का निरीक्षण किया जाता है। सोफिया को जेलखानों के निरीक्षण का बहुत शौक है। वह बड़े धयान से कैदियों को, उनके भोजनालयों को, जेल के नियमों को देखती है और कैदखानों के सुधाार के लिए कर्मचारियों से विशेष आग्रह करती है। आज तक कभी इन अभागों की ओर किसी एजेंट ने धयान न दिया था। उनकी दशा शोचनीय थी, मनुष्यों से ऐसा व्यवहार किया जाता था, जिसकी कल्पना ही से रोमांच हो जाता है। पर सोफिया के अविरल प्रयत्न से उनकी दशा सुधारने लगी है। आज जसवंतनगर के मेजबानों को सेवा-सत्कार का सौभाग्य प्राप्त हुआ है और सारा कस्बा, अर्थात् वहाँ के राजकर्मचारी, पगड़ियाँ बाँधो इधार-उधार दौड़ते फिरते हैं। किसी के होश-हवास ठिकाने नहीं हैं, जैसे नींद में किसी ने भेड़ियों का स्वप्न देखा हो। बाजार कर्मचारियों ने सुसज्जित कराए हैं, जेल के कैदियों और शहर के चौकीदारों ने कुलियों और मजदूरों का काम किया है, बस्ती का कोई प्राणी बिना अपना परिचय दिए हुए सड़कों पर नहीं आने पाता। नगर के किसी मनुष्य ने इस स्वागत में भाग नहीं लिया है और रियासत ने उनकी उदासीनता का यह उत्तार दिया है। सड़कों के दोनों तरफ सशस्त्रा सिपाहियों की सफें खड़ी कर दी गई हैं कि प्रजा की अशांति का कोई चिद्द भी न नजर आने पाए। सभाएँ करने की मनाही कर दी गई है।

 

संधया हो गई थी। जुलूस निकला। पैदल और सवार आगे-आगे थे। फौजी बाजे बज रहे थे। सड़कों पर रोशनी हो रही थी, पर मकानों में,छतों पर अंधाकार छाया हुआ था। फूलों की वर्षा हो रही थी, पर छतों से नहीं, सिपाहियों के हाथों से। सोफी सब कुछ समझती थी, पर क्लार्क की ऑंखों पर परदा-सा पड़ा हुआ था। असीम ऐश्वर्य ने उनकी बुध्दि को भ्रांत कर दिया है। कर्मचारी सब कुछ कर सकते हैं, पर भक्ति पर उनका वश नहीं होता। नगर में कहीं आनंदोत्साह का चिद्द नहीं है, सियापा-सा छाया हुआ है, न पग-पग पर जय-धवनि है, न कोई रमणी आरती उतारने आती है, न कहीं गाना-बजाना है। मानो किसी पुत्रा-शोकमग्न माता के सामने विहार हो रहा हो।

 

कस्बे का गश्त करके सोफी, क्लार्क, सरदार नीलकंठ और दो-एक उच्च कर्मचारी तो राजभवन में आकर बैठे, और लोग बिदा हो गए। मेज पर चाय लाई गई। मि. क्लार्क ने बोतल से शराब उड़ेली, तो सरदार साहब, जिन्हें इसकी दुर्गंधा से घृणा थी, खिसककर सोफिया के पास आ बैठे और बोले-जसवंतनगर आपको कैसा पसंद आया?

 

सोफिया-बहुत ही रमणीक स्थान है। पहाड़ियों का दृश्य अत्यंत मनोहर है। शायद कश्मीर के सिवा ऐसी प्राकृतिक शोभा और कहीं न होगी। नगर की सफाई से चित्ता प्रसन्न हो गया। मेरा तो जी चाहता है, यहाँ कुछ दिनों रहूँ।

 

नीलकंठ डरे। एक-दो दिन तो पुलिस और सेना के बल से नगर को शांत रखा जा सकता है, पर महीने-दो महीने किसी तरह नहीं। असम्भव है। कहीं ये लोग यहाँ जम गए, तो नगर की यथार्थ स्थिति अवश्य ही प्रकट हो जाएगी। न जाने उसका क्या परिणाम हो। बोले-यहाँ की बाह्य छटा के धाोखे में न आइए। जलवायु बहुत खराब है। आगे आपको इससे कहीं सुंदर स्थान मिलेंगे।

 

सोफिया-कुछ भी हो, मैं यहाँ दो हफ्ते अवश्य ठहरूँगी। क्यों विलियम, तुम्हें यहाँ से जाने की कोई जल्दी तो नहीं है?

 

क्लार्क-तुम यहाँ रहो, तो मैं दफन होने को तैयार हूँ।

 

सोफिया-लीजिए सरदार साहब, विलियम को कोई आपत्तिा नहीं है।

 

सोफिया को सरदार साहब को दिक करने में मजा आ रहा था।

 

नीलकंठ-फिर भी मैं आपसे यही अर्ज करूँगा कि जसवंतनगर बहुत अच्छी जगह नहीं है। जलवायु की विषमता के अतिरिक्त यहाँ की प्रजा में अशांति के बीज अंकुरित हो गए हैं।

 

सोफिया-तब तो हमारा यहाँ रहना और भी आवश्यक है। मैंने किसी रिसायत में यह शिकायत नहीं सुनी। गवर्नमेंट ने रियासतों को आंतरिक स्वाधाीनता प्रदान कर दी है। लेकिन इसका यह आशय नहीं है कि रियासतों में अराजकता के कीटाणुओं को सेये जाने दिया जाए। इसका उत्तारदायित्व अधिाकारियों पर है, और गवर्नमेंट को अधिाकार है कि वह इस असावधाानी का संतोषजनक उत्तार माँगे।

 

सरदार साहब के हाथ-पाँव फूल गए। सोफिया से उन्होंने यह बात निश्शंक होकर कही थी। उसकी विनयशीलता से उन्होंने समझ लिया था कि मेरी नजर-भेंट ने अपना काम कर दिखाया। कुछ बेतकल्लुफ-से हो गए थे। यह फटकार पड़ी, तो ऑंखें चौंधिाया गईं। कातर स्वर में बोले-मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, कि यद्यपि रियासत पर इस स्थिति का उत्तारदायित्व है; पर हमने यथासाधय इसके रोकने की चेष्टा की और अब भी कर रहे हैं। यह बीज उस दिशा से आया, जिधार से उसके आने की सम्भावना न थी; या यों कहिए कि विष-बिंदु सुनहरे पात्राों में लाए गए। बनारस के रईस कुँवर भरतसिंह के स्वयंसेवकों ने कुछ ऐसे कौशल से काम लिया कि हमें खबर तक न हुई। डाकुओं से धान की रक्षा की जा सकती है, पर साधाुओं से नहीं। सेवकों ने सेवा की आड़ में यहाँ की मूर्ख प्रजा पर ऐसे मंत्रा फूँके कि उन मंत्राों के उतारने में रियासत को बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। विशेषत: कुँवर साहब का पुत्रा अत्यंत कुटिल प्रकृति का युवक है। उसने इस प्रांत में अपने विद्रोहात्मक विचारों का यहाँ तक प्रचार किया कि इसे विद्रोहियों का अखाड़ा बना दिया। उसकी बातों में कुछ ऐसा जादू होता था कि प्रजा प्यासों की भाँति उसकी ओर दौड़ती थी। उसके साधाु भेष, उसके सरल, नि:स्पृह जीवन, उसकी मृदुल सहृदयता और सबसे अधिाक उसके देवोपम स्वरूप ने छोटे-बड़े सभी पर वशीकरण-सा कर दिया था। रियासत को बड़ी चिंता हुई। हम लोगों की नींद हराम हो गई। प्रतिक्षण विद्रोह की आग भड़क उठने की आशंका होती थी। यहाँ तक कि हमें सदर से सैनिक सहायता भेजनी पड़ी। विनयसिंह तो किसी तरह गिरफ्तार हो गया; पर उसके अन्य सहयोगी अभी तक इलाके में छिपे हुए प्रजा को उत्तोजित कर रहे हैं। कई बार यहाँ सरकारी खजाना लुट चुका है। कई बार विनय को जेल से निकाल ले जाने का दुष्प्रयत्न किया जा चुका है, और कर्मचारियों को नित्य प्राणों की शंका बनी रहती है। मुझे विवश होकर आपसे यह वृत्ताांत कहना पड़ा। मैं आपको यहाँ ठहरने की कदापि राय न दूँगा। अब आप स्वयं समझ सकती हैं कि हम लोगों ने जो कुछ किया, उसके सिवा और क्या कर सकते थे।

 

सोफिया ने बड़ी चिंता के भाव से कहा-दशा उससे कहीं भयंकर है, जितना मैं समझती थी। इस अवस्था में विलियम का यहाँ से जानार् कत्ताव्य के विरुध्द होगा। वह यहाँ गवर्नमेंट के प्रतिनिधिा होकर आए हैं, केवल सैर-सपाटे करने के लिए नहीं। क्यों विलियम, तुम्हें यहाँ रहने में कोई आपत्तिा तो नहीं है? यहाँ की रिपोर्ट भी तो करनी पड़ेगी।

 

क्लार्क ने एक चुस्की लेकर कहा-तुम्हारी इच्छा हो, तो मैं नरक में भी स्वर्ग का सुख ले सकता हूँ। रहा रिपोर्ट लिखना, वह तुम्हारा काम है।

 

नीलकंठ-मेरी आपसे सविनय प्रार्थना है कि रियासत को सँभालने के लिए कुछ और समय दीजिए। अभी रिपोर्ट करना हमारे लिए घातक होगा।

 

इधार तो यह अभिनय हो रहा था, सोफिया प्रभुत्व के सिंहासन पर विराजमान थी, ऐश्वर्य चँवर हिलाता था, अष्टसिध्दि हाथ बाँधो खड़ी थी। उधार विनय अपनी ऍंधोरी कालकोठरी में म्लान और क्षुब्धा बैठा हुआ नारी जाति की निष्ठुरता और असहृदयता पर रो रहा था। अन्य कैदी अपने-अपने कमरे साफ कर रहे थे, उन्हें कल नए कम्बल और नए कुरते दिए गए थे, जो रियासत में एक नई घटना थी। जेल कर्मचारी कैदियों को पढ़ा रहे थे-मेम साहब पूछें, तुम्हें क्या शिकायत है, तो सब लोग एक स्वर से कहना, हुजूर के प्रताप से हम बहुत सुखी हैं और हुजूर के जान-माल की खैर मनाते हैं। पूछें, क्या चाहते हो, तो कहना, हुजूर की दिनोंदिन उन्नति हो, इसके सिवा हम कुछ नहीं चाहते। खबरदार, जो किसी ने सिर ऊपर उठाया और कोई बात मुँह से निकाली, खाल उधोड़ ली जाएगी। कैदी फूले न समाते थे। आज मेम साहब की आमद की खुशी में मिठाइयाँ मिलेंगी। एक दिन की छुट्टी होगी। भगवान उन्हें सदा सुखी रखें कि हम अभागों पर इतनी दया करती हैं।

 

-कतु विनय के कमरे में अभी तक सफाई नहीं हुई। नया कम्बल पड़ा हुआ है, छुआ तक नहीं गया। कुरता ज्यों-का-त्यों तह किया हुआ रखा है, वह अपना पुराना कुरता ही पहने हुए है। उसके शरीर के एक-एक रोम से, मस्तिष्क के एक-एक अणु से, हृदय की एक-एक गति से यही आवाज आ रही है-सोफिया! उसके सामने क्योंकर जाऊँगा। उसने सोचना शुरू किया-सोफिया यहाँ क्यों आ रही है? क्या मेरा अपमान करना चाहती है? सोफी, जो दया और प्रेम की सजीव मूर्ति थी, क्या वह मुझे क्लार्क के सामने बुलाकर पैराेंं से कुचलना चाहती है? इतनी निर्दयता, और मुझ जैसे अभागे पर, जो आप ही अपने दिनों को रो रहा है! नहीं, वह इतनी वज्र-हृदया नहीं है, उसका हृदय इतना कठोर नहीं हो सकता। यह सब मि. क्लार्क की शरारत है, वह मुझे सोफी के सामने लज्जित करना चाहते हैं; पर मैं उन्हें यह अवसर न दूँगा, मैं उनके सामने जाऊँगा ही नहीं, मुझे बलात् ले जाए; जिसका जी चाहे। क्यों बहाना करूँ कि मैं बीमार हूँ। साफ कह दूँगा, मैं वहाँ नहीं जाता। अगर जेल का यह नियम है, तो हुआ करे, मुझे ऐसे नियम की परवाह नहीं, जो बिलकुल निरर्थक है। सुनता हँ, दोनों यहाँ एक सप्ताह तक रहना चाहते हैं, क्या प्रजा को पीस ही डालेंगे? अब भी तो मुश्किल से आधो आदमी बच रहे होंगे, सैकड़ों निकाल दिए गए, सैकड़ों जेल में ठूँस दिए गए, क्या इस कस्बे को बिलकुल मिट्टी में मिला देना चाहते हैं?

 

सहसा जेल का दारोगा आकर कर्कश स्वर मेंं बोला-तुमने कमरे की सफाई नहीं की! अरे, तुमने तो अभी कुरता भी नहीं बदला, कम्बल तक नहीं बिछाया! तुम्हें हुक्म मिला या नहीं?

 

विनय-हुक्म तो मिला, मैंने उसका पालन करना आवश्यक नहीं समझा।

 

दारोगा ने और गरम होकर कहा-इसका यही नतीजा होगा कि तुम्हारे साथ भी और कैदियों का-सा सलूक किया जाए। हम तुम्हारे साथ अब तक शराफत का बर्ताव करते आए हैं, इसलिए कि तुम एक प्रतिष्ठित रईस के लड़के हो और यहाँ विदेश में आ पड़े हो। पर मैं शरारत नहीं बर्दाश्त कर सकता।

 

विनय-यह बतलाइए कि मुझे पोलिटिकल एजेंट के सामने तो न जाना पड़ेगा?

 

दारोगा-और यह कम्बल और कुरता किसलिए दिया गया है; कभी और भी किसी ने यहाँ नया कम्बल पाया है? तुम लोगों के तो भाग्य खुल गए।

 

विनय-अगर आप मुझ पर इतनी रियायत करें कि मुझे साहब के सामने जाने पर मजबूर न करें, तो मैं आपका हुक्म मानने को तैयार हूँ।

 

दारोगा-कैसे बेसिर-पैर की बातें करते हो जी, मेरा कोई अख्तियार है? तुम्हें जाना पड़ेगा।

 

विनय ने बड़ी नम्रता से कहा-मैं आपका यह एहसान कभी न भूलँगा।

 

किसी दूसरे अवसर पर दारोगाजी शायद जामे से बाहर हो जाते, पर आज कैदियों को खुश रखना जरूरी था। बोले-मगर भाई, यह रिआयत करनी मेरी शक्ति से बाहर है। मुझ पर न जाने क्या आफत आ जाए। सरदार साहब मुझे कच्चा ही खा जाएँगे, मेम साहब को जेलों को देखने की धाुन है। बड़े साहब तो कर्मचारियों के दुश्मन हैं, मेम साहब उनसे भी बढ़-चढ़कर हैं। सच पूछो तो जो कुछ हैं, वह मेम साहब ही हैं। साहब तो उनके इशारों के गुलाम हैं। कहीं वह बिगड़ गईं, तो तुम्हारी मियाद तो दूनी हो ही जाएगी, हम भी पिस जाएँगे।

 

विनय-मालूम होता है, मेम साहब का बड़ा दबाव है।

 

दारोगा-दबाव! अजी, यह कहो कि मेम साहब ही पोलिटिकल एजेंट हैं। साहब तो केवल हस्ताक्षर करने-भर को हैं। नजर-भेंट सब मेम साहब के ही हाथों में जाती है।

 

विनय-आप मेरे साथ इतनी रियाअत कीजिए कि मुझे उनके सामने जाने के लिए मजबूर न कीजिए। इतने कैदियों में एक आदमी की कमी जान ही न पड़ेगी। हाँ, अगर वह मुझे नाम लेकर बुलाएँगी, तो मैं चला जाऊँगा।

 

दारोगा-सरदार साहब मुझे जीता निगल जाएँगे।

 

विनय-मगर करना आपको यही पड़ेगा। मैं अपनी खुशी से कदापि न जाऊँगा।

 

दारोगा-मैं बुरा आदमी हूँ, मुझे दिक मत करो। मैंने इसी जेल में बड़े-बड़ों की गरदनें ढीली कर दी हैं।

 

विनय-अपने को कोसने का आपको अधिाकार है; पर आज जानते हैं, मैं जब्र के सामने सिर झुकानेवाला नहीं हूँ।

 

दारोगा-भाई, तुम विचित्रा प्राणी हो, उसके हुक्म से सारा शहर खाली कराया जा रहा है, और फिर भी अपनी जिद किए जाते हो। लेकिन तुम्हें अपनी जान भारी है, मुझे अपनी जान भारी नहीं है।

 

विनय-क्या शहर खाली कराया जा रहा है? यह क्यों?

 

दारोगा-मेम साहब का हुक्म है, और क्या, जसवंतनगर पर उनका कोप है। जब से उन्होंने यहाँ की वारदातें सुनी हैं, मिजाज बिगड़ गया है। उनका वश चले तो इसे खुदवाकर फेंक दें। हुक्म हुआ है कि एक सप्ताह तक कोई जवान आदमी कस्बे में न रहने पाए। भय है कि कहीं उपद्रव न हो जाए, सदर से मदद माँगी गई है।

 

दारोगा ने स्थिति को इतना बढ़ाकर बयान किया, इससे उनका उद्देश्य विनयसिंह पर प्रभाव डालना था और उनका उद्देश्य पूरा हो गया। विनयसिंह को चिंता हुई कि कहीं मेरी अवज्ञा से क्रुध्द होकर अधिाकारियों ने मुझ पर और भी अत्याचार करने शुरू किए और जनता को यह खबर मिली, तो वह बिगड़ खड़ी होगी और उस दशा में मैं उन हत्याओं के पाप का भागी ठहरूँगा। कौन जाने, मेरे पीछे मेरे सहयोगियों ने लोगों को और भी उभार रखा हो, उनमें उद्दंड प्रकृति के युवकों की कमी नहीं है। नहीं, हालत नाजुक है। मुझे इस वक्त धौर्य से काम लेना चाहिए। दारोगा से पूछा-मेम साहब यहाँ किस वक्त आएँगी?

 

दारोगा-उनके आने का कोई ठीक समय थोड़े ही है। धाोखा देकर किसी ऐसे वक्त आ पहुँचेंगी, जब हम लोग गाफिल पड़े होंगे। इसी से तो कहता हूँ कि कमरे की सफाई कर डालो; कपड़े बदल लो; कौन जाने, आज ही आ जाएँ।

 

विनय-अच्छी बात है; आप जो कुछ कहते हैं, सब कर लूँगा। अब आप निश्ंचित हो जाएँ।

 

दारोगा-सलामी के वक्त आने से इनकार तो न करोगे?

 

विनय-जी नहीं; आप मुझे सबसे पहले ऑंगन में मौजूद पाएँगे।

 

दारोगा-मेरी शिकायत तो न करोगे?

 

विनय-शिकायत करना मेरी आदत नहीं, इसे आप खूब जानते हैं।

 

दारोगा चला गया। ऍंधोरा हो चला था। विनय ने अपने कमरे में झाड़ू लगाई, कपड़े बदले, कम्बल बिछा दिया। वह कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे, जिससे किसी की दृष्टि उनकी ओर आकृष्ट हो; वह अपनी निरपेक्षता से हुक्काम के संदेहों को दूर कर देना चाहते थे। भोजन का समय आ गया, पर मिस्टर क्लार्क ने पदार्पण न किया। अंत मेंं निराश होकर दारोगा ने जेल के द्वार बंद कराए और कैदियों को विश्राम करने का हुक्म दिया। विनय लेटे, तो सोचने लगे-सोफी का यह रूपांतर क्योंकर हो गया? वही लज्जा और विनय की मूर्ति, वही सेवा और त्याग की प्रतिमा आज निरंकुशता की देवी बनी हुई है! उसका हृदय कितना कोमल था, कितना दयाशील, उसके मनोभाव कितने उच्च और पवित्रा थे, उसका स्वभाव कितना सरल था, उसकी एक-एक दृष्टि हृदय पर कालिदास की एक-एक उपमा की-सी चोट करती थी, उसके मुँह से जो शब्द निकलता था, वह दीपक की ज्योति की भाँति चित्ता को आलोकित कर देता था। ऐसा मालूम होता था, केवल पुष्प-सुगंधा से उसकी सृष्टि हुई है, कितना निष्कपट, कितना गम्भीर, कितना मधाुर सौंदर्य था! वह सोफी अब इतनी निर्दय हो गई है!

 

चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था, मानो कोई तूफान आनेवाला है। आज जेल के ऑंगन में दारोगा के जानवर न बँधो थे, न बरामदों में घास के ढेर थे। आज किसी कैदी को जेल-कर्मचारियों के जूठे बरतन नहीं माँजने पड़े, किसी ने सिपाहियों की चम्पी नहीं की। जेल के डॉक्टर की बुढ़िया महरी आज कैदियों को गालियाँ नहीं दे रही थी और दफ्तर में कैदियों से मिलनेवाले संबंधिायाेंं के नजरानों का बाँट-बखरा न होता था। कमराेंं में दीपक थे, दरवाजे खुले रखे गए थे। विनय के मन में प्रश्न उठा, क्यों न भाग चलूँ? मेरे समझाने से कदाचित् लोग शांत हो जाएँ। सदर सेना आ रही है, ज़रा-सी बात पर विप्लव हो सकता है। यदि मैं शांतिस्थापना करने में सफल हुआ, तो वह मेरे इस अपराधा का प्रायश्चित्ता होगा। उन्होंने दबी हुई नजरों से जेल की ऊँची दीवारों को देखा, कमरे से बाहर निकलने की हिम्मत न पड़ी। किसी ने देख लिया तो? लोग यही समझेंगे कि मैं जनता को भड़काने के इरादे से भागने की चेष्टा कर रहा था।

 

इस हैस-बैस में रात कट गई। अभी कर्मचारियों की नींद भी न खुली थी कि मोटर की आवाज ने आगंतुकाें की सूचना दी। दारोगा,डॉक्टर, वार्डर, चौकीदार हड़बड़ाकर निकल पड़े। पहली घंटी बजी, कैदी मैदान में निकल आए, उन्हें कतारों में खड़े होने का हुक्म दिया गया,और उसी क्षण सोफिया, मिस्टर क्लार्क और सरदार नीलकंठ जेल में दाखिल हुए।

 

सोफिया ने आते ही कैदियों पर निगाह डाली। उस दृष्टि में प्रतीक्षा न थी, उत्सुकता न थी, भय था, विकलता थी, अशांति थी। जिस आकांक्षा ने उसे बरसों रुलाया था, जो उसे यहाँ तक खींच लाई थी, जिसके लिए उसने अपने प्राणप्रिय सिध्दांतों का बलिदान किया था, उसी को सामने देखकर वह इस समय कातर हो रही थी, जैसे कोई परदेशी बहुत दिनों के बाद अपने गाँव में आकर अंदर कदम रखते हुए डरता है कि कहीं कोई अशुभ समाचार कानों में न पड़ जाए। सहसा उसने विनय को सिर झुकाए खड़े देखा। हृदय में प्रेम का एक प्रचंड आवेग हुआ,नेत्राों में ऍंधोरा छा गया। घर वही था, पर उजड़ा हुआ, घास-पात से ढंका हुआ, पहचानना मुश्किल था। वह प्रसन्न मुख कहाँ था, जिस पर कवित्व की सरलता बलि होती थी। वह पुरुषार्थ का-सा विशाल वृक्ष कहाँ था। सोफी के मन में अनिवार्य इच्छा हुई कि विनय के पैरों पर गिर पड़ूँ, उसे अश्रु-जल से धाोऊँ, उसे गले से लगाऊँ। अकस्मात् विनयसिंह मूख्रच्छत होकर गिर पड़े, एक आर्तधवनि थी, जो एक क्षण तक प्रवाहित होकर शोकावेग से निश्शब्द हो गई। सोफी तुरंत विनय के पास जा पहुँची। चारों तरफ शोर मच गया। जेल का डॉक्टर दौड़ा। दारोगा पागलों की भाँति उछल-कूद मचाने लगा-अब नौकरों की खैरियत नहीं। मेम साहब पूछेंगी, इसकी हालत इतनी नाजुक थी, तो इसे चिकित्सालय में क्यों नहीं रखा; बड़ी मुसीबत में फँसा। इस भले आदमी को भी इसी वक्त बेहोश होना था। कुछ नहीं, इसने दम साधाा है, बना हुआ है,मुझे तबाह करने पर तुला हुआ है। बच्चा, जाने दो मेम साहब को, तो देखना, तुम्हारी ऐसी खबर लेता हूँ कि सारी बेहोशी निकल जाए, फिर कभी बेहोश होने का नाम ही न लो। यह आखिर इसे हो क्या गया, किसी कैदी को आज तक यों मूख्रच्छत होते नहीं देखा। हाँ, किस्सों में लोगों को बात-बात में बेहोश हो जाते पढ़ा है। मिर्गी का रोग होगा और क्या।

 

दारोगा तो अपनी जान की खैर मना रहा था, उधार सरदार साहब मिस्टर क्लार्क से कह रहे थे-यह वही युवक है, जिसने रियासत में ऊधाम मचा रखा है। सोफी ने डॉक्टर से घुड़ककर कहा, हट जाओ, और विनय को उठवाकर दफ्तर में लाई। आज वहाँ बहुमूल्य गलीचे बिछे हुए थे। चाँदी की कुर्सियाँ थीं, मेज पर जरी का मेजपोश था, उस पर सुंदर गुलदस्ते थे। मेज पर जलपान की सामग्रियां चुनी हुई थीं। तजवीज थी कि निरीक्षण के बाद साहब यहाँ नाश्ता करेंगे। सोफी ने विनय को कालीन के फर्श पर लिटा दिया और सब आदमियों को वहाँ से हट जाने का इशारा किया। उसकी करुणा और दया प्रसिध्द थी, किसी को आश्चर्य न हुआ। जब कमरे में कोई न रहा, तो सोफी ने खिड़कियों पर परदे डाल दिए और विनय का सिर अपनी जाँघ पर रखकर अपनी रूमाल उस पर झलने लगी। ऑंसू की गरम-गरम बूँदें उसकी ऑंखों से निकल-निकलकर विनय के मुख पर गिरने लगीं। उन जल-बिंदुआेंं में कितनी प्राणप्रद शक्ति थी! उनमें उसकी समस्त मानसिक और आत्मिक शक्ति भरी हुई थी। एक-एक जल-बिंदु उसके जीवन का एक-एक बिंदु था। विनयसिंह की ऑंखें खुल गईं। स्वर्ग का एक पुष्प अक्षय, अपार,सौरभ में नहाया हुआ, हवा के मृदुल झोकों से हिलता, सामने विराज रहा था। सौंदर्य की सबसे मनोहर, सबसे मधाुर छवि वह है, जब वह सजल शोक से आर्द्र होता है, वही उसका आधयात्मिक स्वरूप होता है। विनय चौंककर उठे नहीं; यही तो प्रेम-योगियों की सिध्दि है, यही तो उनका स्वर्ग है, यही तो स्वर्ग-साम्राज्य है, यही तो उनकी अभिलाषाओं का अंत है, इस स्वर्गीय आनंद में तृप्ति कहाँ! विनय के मन में करुण भावना जागृत हुई-काश, इसी भाँति प्रेम-शय्या पर लेटे हुए सदैव के लिए ये ऑंखें बंद हो जातीं! सारी आकांक्षाओं का लय हो जाता। मरने के लिए इससे अच्छा और कौन-सा अवसर होगा!

 

एकाएक उन्हें याद आ गया, सोफी को स्पर्श करना भी मेरे लिए वर्जित है। उन्होंने तुरंत अपना सिर उसकी जाँघ पर से खींच लिया और अवरुध्द कंठ से बोले-मिसेज क्लार्क, आपने मुझ पर बड़ी दया की, इसके लिए आपका अनुगृहीत हूँ।

 

सोफिया ने तिरस्कार की दृष्टि से देखकर कहा-अनुग्रह गालियों के रूप में नहीं प्रकट किया जाता।

 

विनय ने विस्मित होकर कहा-ऐसा घोर अपराधा मुझसे कभी नहीं हुआ।

 

सोफिया-ख्वाहमखाह किसी शख्स के साथ मेरा सम्बंधा जोड़ना गाली नहीं तो क्या है?

 

विनय-मिस्टर क्लार्क?

 

सोफिया-क्लार्क को मैं तुम्हारी जूतियों का तस्मा खोलने के योग्य भी नहीं समझती।

 

विनय-लेकिन अम्माँजी ने…।

 

सोफिया-तुम्हारी अम्माँजी ने झूठ लिखा और तुमने उस पर विश्वास करके मुझ पर घोर अन्याय किया। कोयल आम न पाकर भी निम्बौड़ियों पर नहीं गिरती।

 

इतने में क्लार्क ने आकर पूछा-इस कैदी की क्या हालत है? डॉक्टर आ रहा है, वह इसकी दवा करेगा। चलो, देर हो रही है।

 

सोफिया ने रुखाई से कहा-तुम जाओ, मुझे फुरसत नहीं।

 

क्लार्क-कितनी देर तक तुम्हारी राह देखूँ।

 

सोफिया-यह मैं नहीं कह सकती। मेरे विचार में एक मनुष्य की सेवा करना सैर करने से कहीं अधिाक आवश्यक है।

 

क्लार्क-खैर, मैं थोड़ी देर और ठहरूँगा।

 

यह कहकर वह बाहर चले गए, तब सोफी ने विनय के माथे से पसीना पोंछते हुए कहा-विनय, मैं डूब रही हूँ, मुझे बचा लो। मैंने रानीजी की शंकाओं को निवृत्ता करने के लिए यह स्वाँग रचा था।

 

विनय ने अविश्वाससूचक भाव से कहा-तुम यहाँ क्लार्क के साथ क्यों आईं और उनके साथ कैसे रहती हो?

 

सोफिया का मुख-मंडल लज्जा से आरक्त हो गया। बोली-विनय, यह मत पूछो, मगर मैं ईश्वर को साक्षी देकर कहती हूँ, मैंने जो कुछ किया, तुम्हारे लिए किया। तुम्हें इस कैद से निकालने के लिए मुझे इसके लिए सिवा और कोई उपाय न सूझा। मैंने क्लार्क को प्रमाद में डाल रखा है। तुम्हारे ही लिए मैंने यह कपट-वेष धाारण किया है। अगर तुम इस वक्त कहो, सोफी, तू मेरे साथ जेल में रह, तो मैं यहाँ आकर तुम्हारे साथ रहूँगी। अगर तुम मेरा हाथ पकड़कर कहो, तू मेरे साथ चल तो आज ही तुम्हारे साथ चलूँगी। मैंने तुम्हारा दामन पकड़ लिया है और अब उसे किसी तरह नहीं छोड़ सकती; चाहे तुम ठुकरा ही क्यों न दो। मैंने आत्मसम्मान तक तुम्हें समर्पित कर दिया है। विनय, यह ईश्वरीय विधाान है, यह उसकी ही प्रेरणा है; नहीं तो इतना अपमान और उपहास सहकर तुम मुझे जिंदा न पाते।

 

विनय ने सोफी के दिल की थाह लेने के लिए कहा-अगर यह ईश्वरीय विधाान है, तो उसने हमारे और तुम्हारे बीच में यह दीवार क्यों खड़ी कर दी है?

 

सोफिया-यह दीवार ईश्वर ने नहीं खड़ी की, आदमियों ने खड़ी की है।

 

विनय-कितनी मजबूत है!

 

सोफिया-हाँ, मगर दुर्भेद्य नहीं।

 

विनय-तुम इसे तोड़ सकोगी?

 

सोफिया-इसी क्षण, तुम्हारी ऑंखों के एक इशारे पर। कोई समय था, जब मैं उस दीवार को ईश्वरकृत समझती थी और उसका सम्मान करती थी, पर अब उसका यथार्थ स्वरूप देख चुकी। प्रेम इन बाधााओं की परवा नहीं करता, यह दैहिक सम्बंधा नहीं, आत्मिक सम्बंधा है।

 

विनय ने सोफी का हाथ अपने हाथ में लिया, और उसकी ओर प्रेम-विह्नल नेत्राों से देखकर बोले-तो आज से तुम मेरी हो, और मैं तुम्हारा हूँ।

 

सोफी का मस्तक विनय के हृदय-स्थल पर झुक गया, नेत्राों से जल-वर्षा होने लगी, जैसे काले बादल धारती पर झुककर एक क्षण में उसे तृप्त कर देते हैं। उसके मुख से एक शब्द भी न निकला, मौन रह गई। शोक की सीमा कंठावरोधा है, पर शुष्क और दाह-युक्त; आनंद की सीमा भी कंठावरोधा है, पर आर्द्र और शीतल। सोफी को अब अपने एक-एक अंग में, नाड़ियों की एक-एक गति में, आंतरिक शक्ति का अनुभव हो रहा था। नौका ने कर्णधाार का सहारा पा लिया था। अब उसका लक्ष्य निश्चित था। वह अब हवा के झोकों या लहरों के प्रवाह के साथ डावाँडोल न होगी, वरन् सुव्यवस्थित रूप से अपने पथ पर चलेगी।

 

विनय भी दोनों पर खोले हुए आनंद के आकाश में उड़ रहे थे। वहाँ की वायु में सुगंधा थी, प्रकाश में प्राण, किसी ऐसी वस्तु का अस्तित्व न था, जो देखने में अप्रिय, सुनने में कटु, छूने में कठोर और स्वाद में कड़घई हो। वहाँ के फूलों में काँटे न थे, सूर्य में इतनी उष्णता न थी,जमीन पर व्याधिायाँ न थीं, दरिद्रता न थी, चिंता न थी, कलह न था, एक व्यापक शांति का साम्राज्य था। सोफिया इस साम्राज्य की रानी थी और वह स्वयं उसके प्रेम-सरोवर में विहार कर रहे थे। इस सुख-स्वप्न के सामने यह त्याग और तप का जीवन कितना नीरस, कितना निराशाजनक था, यह ऍंधोरी कोठरी कितनी भयंकर!

 

सहसा क्लार्क ने फिर आकर कहा-डार्लिंग, अब विलम्ब न करो, बहुत देर हो रही है, सरदार साहब आग्रह कर रहे हैं। डॉक्टर इस रोगी की खबर लेगा।

 

सोफी उठ खड़ी हुई और विनय की ओर से मुँह फेरकर करुण-कम्पित स्वर में बोली-घबराना नहीं, मैं कल फिर आऊँगी।

 

विनय को ऐसा जान पड़ा, मानो नाड़ियों में रक्त सूखा जा रहा है। वह मर्माहत पक्षी की भाँति पड़े रहे। सोफी द्वार तक आई, फिर रूमाल लेने के बहाने लौटकर विनय के कान में बोली-मैं कल फिर आऊँगी और तब हम दोनाेंं यहाँ से चले जाएँगे। मैं तुम्हारी तरफ से सरदार नीलकंठ से कह दूँगी कि वह क्षमा माँगते हैं।

 

सोफी के चले जाने के बाद भी ये आतुर, उत्सुक, प्रेम में डूबे हुए शब्द किसी मधाुर संगीत के अंतिम स्वरों की भाँति विनय के कानों में गूँजते रहे। किंतु वह शीघ्र ही इहलोक में आने के लिए विवश हुआ। जेल के डॉक्टर ने आकर उसे दफ्तर ही में एक पलंग पर लिटा दिया और पुष्टिकारक औषधिायाँ सेवन कराईं। पलंग पर नर्म बिछौना था, तकिए लगे थे, पंखा झला जा रहा था। दारोगा एक-एक क्षण में कुशल पूछने के लिए आता था, और डॉक्टर तो वहाँ से हटने का नाम ही न लेता था। यहाँ तक कि विनय ने इन शुश्रूषाओं से तंग आकर डॉक्टर से कहा-मैं बिलकुल अच्छा हूँ, आप सब जाएँ, शाम को आइएगा।

 

डॉक्टर साहब डरते-डरते बोले-आपको जरा नींद आ जाए, तो मैं चला जाऊँ।

 

विनय ने उन्हें विश्वास दिलाया कि आपके बिदा होते ही मुझे नींद आ जाएगी। डॉक्टर अपने अपराधाों की क्षमा माँगते हुए चले गए। इसी बहाने से विनय ने दारोगा को भी खिसकाया, जो आज शील और दया के पुतले बने हुए थे। उन्होंने समझा था, मेम साहब के चले जाने के बाद इसकी खूब खबर लूँगा; पर वह अभिलाषा पूरी न हो सकी। सरदार साहब ने चलते समय जता दिया था कि इनके सेवा-सत्कार में कोई कसर न रखना, नहीं तो मेम साहब जहन्नुम में भेज देंगी।

 

शांत विचार के लिए एकाग्रता उतनी ही आवश्यक है, जितनी धयान के लिए वायु की गति तराजू के पलड़ों को बराबर नहीं होने देती। विनय को अब विचार हुआ-अम्माँजी को यह हाल मालूम हुआ, तो वह अपने मन में क्या कहेंगी। मुझसे उनकी कितनी मनोकामनाएँ सम्बध्द हैं। सोफी के प्रेम-पाश से बचने के लिए उन्होंने मुझे निर्वासित किया, इसीलिए उन्होेंने सोफी को कलंकित किया। उनका हृदय टूट जाएगा। दु:ख तो पिताजी को भी होगा; पर वे मुझे क्षमा कर देंगे, उन्हें मानवीय दुर्बलताओं से सहानुभूति है। अम्माँजी में बुध्दि-ही-बुध्दि है; पिताजी में हृदय और बुध्दि दोनों हैं। लेकिन मैं इसे दुर्बलता क्यों कहूँ? मैं कोई ऐसा काम नहीं कर रहा हूँ, जो संसार में किसी ने न किया हो। संसार में ऐसे कितने प्राणी हैं, जिन्होंने अपने को जाति पर होम कर दिया हो? स्वार्थ के साथ जाति का धयान रखनेवाले महानुभावों ही ने अब तक जो कुछ किया है, किया है। जाति पर मर मिटनेवाले तो उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। फिर जाति के अधिाकारियों में न्याय और विवेक नहीं,प्रजा में उत्साह और चेष्टा नहीं, उसके लिए मर मिटना व्यर्थ है। अंधो के आगे रोकर अपना दीदा खोने के सिवा और क्या हाथ आता है?

 

शनै:-शनै: भावनाओं ने जीवन की सुख-सामग्रियाँ जमा करनी शुरू कीं-चलकर देहात में रहूँगा। वहीं एक छोटा-सा मकान बनवाऊँगा, साफ,खुला हुआ, हवादार, ज्यादा टीमटाम की जरूरत नहीं। वहीं हम दोनों सबसे अलग शांति से निवास करेंगे। आडम्बर बढ़ाने से क्या फायदा। मैं बगीचे में काम करूँगा, क्यारियाँ बनाऊँगा, कलमें लगाऊँगा और सोफी को अपनी दक्षता से चकित कर दूँगा। गुलदस्ते बनाकर उसके सामने पेश करूँगा और हाथ बाँधाकर कहूँगा-सरकार, कुछ इनाम मिले। फलों की डालियाँ लगाऊँगा और कहूँगा-रानीजी, कुछ निगाह हो जाए। कभी-कभी सोफी भी पौधाों को सींचेगी। मैं तालाब से पानी भर-भर दूँगा। वह लाकर क्यारियों में डालेगी। उसका कोमल गात पसीने से और सुंदर वस्त्रा पानी से भीग जाएगा। तब किसी वृक्ष के नीचे उसे बैठाकर पंखा झलँगा। कभी-कभी किश्ती में सैर करेंगे। देहाती डोंगी होगी, डाँड़े से चलनेवाली। मोटरबोट में वह आनंद कहाँ, वह उल्लास कहाँ! उसकी तेजी से सिर चकरा जाता है, उसके शोर से कान फट जाते हैं। मैं डोंगी पर डाँड़ा चलाऊँगा, सोफिया कमल के फूल तोड़ेगी। हम एक क्षण के लिए अलग न होंगे। कभी-कभी प्रभु सेवक भी आएँगे। ओह! कितना सुखमय जीवन होगा! कल हम दोनों घर चलेंगे, जहाँ मंगल बाँहें फैलाए हमारा इंतजार कर रहा है।

 

सोफी और क्लार्क की आज संधया समय एक जागीरदार के यहाँ दावत थी। जब मेजेेंं सज गईं और एक हैदराबाद के मदारी ने अपने कौतुक दिखाने शुरू किए, तो सोफी ने मौका पाकर सरदार नीलकंठ से कहा-उस कैदी की दशा मुझे चिंताजनक मालूम होती है। उसके हृदय की गति बहुत मंद हो गई है। क्यों विलियम, तुमने देखा, उसका मुख कितना पीला पड़ गया था?

 

क्लार्क ने आज पहली बार आशा के विरुध्द उत्तार दिया-मर्ूच्छा में बहुधाा मुख पीला हो जाता है।

 

सोफी-वही तो मैं भी कह रही थी कि उसकी दशा अच्छी नहीं, नहीं तो मर्ूच्छा ही क्यों आती। अच्छा हो कि आप उसे किसी कुशल डॉक्टर के सिपुर्द कर दें। मेरे विचार में अब वह अपने अपराधा की काफी सजा पा चुका है, उसे मुक्त कर देना उचित होगा।

 

नीलकंठ-मेम साहब, उसकी सूरत पर न जाइए। आपको ज्ञात नहीं, यहाँ जनता पर उसका कितना प्रभाव है। वह रियासत में इतनी प्रचंड अशांति उत्पन्न कर देगा कि उसे दमन करना कठिन हो जाएगा। बड़ा ही जिद्दी है, रियासत से बाहर जाने पर राजी ही नहीं होता।

 

क्लार्क-ऐसे विद्रोही को कैद रखना ही अच्छा है।

 

सोफी ने उत्तोजित होकर कहा-मैं इसे घोर अन्याय समझती हूँ और मुझे आज पहली बार यह मालूम हुआ कि तुम इतने हृदय-शून्य हो!

 

क्लार्क-मुझे तुम्हारा जैसा दयालु हृदय रखने का दावा नहीं।

 

सोफी ने क्लार्क के मुख को जिज्ञासा की दृष्टि से देखा। यह गर्व, यह आत्मगौरव कहाँ से आया? तिरस्कार भाव से बोली-एक मनुष्य का जीवन इतनी तुच्छ वस्तु नहीं।

 

क्लार्क-साम्राज्य-रक्षा के सामने एक व्यक्ति के जीवन की कोई हस्ती नहीं। जिस दया से, जिस सहृदयता से किसी दीन प्राणी का पेट भरता हो, उसके शारीरिक कष्टों का निवारण होता हो, किसी दु:खी जीव को सांत्वना मिलती हो, उसका मैं कायल हूँ, और मुझे गर्व है कि मैं उस सम्पत्तिा से वंचित नहीं हूँ; लेकिन जो सहानुभूति साम्राज्य की जड़ खोखली कर दे, विद्रोहियों को सर उठाने का अवसर दे, प्रजा में अराजकता का प्रचार करे, उसे मैं अदूरदर्शिता ही नहीं, पागलपन समझता हूँ।

 

सोफी के मुख-मंडल पर एक अमानुषीय तेजस्विता की आभा दिखाई दी, पर उसने जब्त किया। कदाचित् इतने धौर्य से उसने कभी काम नहीं लिया था। धार्म-परायणता का सहिष्णुता से वैर है। पर इस समय उसके मुँह से निकला हुआ एक अनर्गल शब्द भी उसके समस्त जीवन का सर्वनाश कर सकता है। नर्म होकर बोली-हाँ, इस विचार-दृष्टि से बेशक वैयक्तिक जीवन का कोई मूल्य नहीं रहता। मेरी निगाह इस पहलू पर न गई थी। मगर फिर भी इतना कह सकती हूँ कि अगर वह मुक्त कर दिया जाए, तो फिर इस रियासत में कदम न रखेगा, और मैं यह निश्चय रूप से कह सकती हूँ कि वह अपनी बात का धानी है।

 

नीलकंठ-क्या आपसे उसने वादा किया है?

 

सोफी-हाँ, वादा ही समझिए, मैं उसकी जमानत कर सकती हूँ।

 

नीलकंठ-इतना तो मैं भी कह सकता हूँ कि वह अपने वचन से फिर नहीं सकता।

 

क्लार्क-जब तक उसका लिखित प्रार्थना-पत्रा मेरे सामने न आए, मैं इस विषय में कुछ नहीं कर सकता।

 

नीलकंठ-हाँ, यह तो परमावश्यक ही है।

 

सोफी-प्रार्थना-पत्रा का विषय क्या होगा?

 

क्लार्क-सबसे पहले वह अपना अपराधा स्वीकार करे और अपनी राजभक्ति का विश्वास दिलाने के बाद हलफ लेकर कहे कि इस रियासत में फिर कदम न रखूँगा। उसके साथ जमानत भी होनी चाहिए। तो नकद रुपये हों, या प्रतिष्ठित आदमियों की जमानत। तुम्हारी जमानत का मेरी दृष्टि में कितना ही महत्तव हो, जाब्ते में उसका कुछ मूल्य नहीं।

 

दावत के बाद सोफी राजभवन में आई, तो सोचने लगी-यह समस्या क्योंकर हल हो? यों तो मैं विनय की मिन्नत-समाजत करूँ, तो वह रियासत से चले जाने पर राजी हो जाएँगे; लेकिन कदाचित् वह लिखित प्रतिज्ञा न करेंगे। अगर किसी भाँति मैंने रो-धाोकर उन्हें इस बात पर राजी कर लिया, तो यहाँ कौन प्रतिष्ठित आदमी उनकी जमानत करेगा? हाँ, उनके घर से नकद रुपये आ सकते हैं! पर रानी साहब कभी इसे मंजूर न करेंगी। विनय को कितने ही कष्ट सहने पड़ें, उन्हें इस पर दया न आएगी। मजा तो जब है कि लिखित प्रार्थना-पत्रा और जमानत की कोई शर्त ही न रहे। वह अवैधा रूप से मुक्त कर दिए जाएँ। इसके सिवा कोई उपाय नहीं।

 

राजभवन विद्युत-प्रकाश से ज्योतिर्मय हो रहा था। भवन के बाहर चारों तरफ सावन की काली घटा थी और अथाह अंधाकार। उस तिमिर-सागर में प्रकाशमय राजभवन ऐसा मालूम होता था, मानो नीले गगन पर चाँद निकला हो। सोफी अपने सजे हुए कमरे में आईने के सामने बैठी हुई उन सिध्दियों को जगा रही है, जिनकी शक्ति अपार है-आज उसने मुद्दत के बाद बालों में फूल गूँथे हैं, फीरोजी रेशम की साड़ी पहनी है और कलाइयों में कंगन धाारण किए हैं। आज पहली बार उसने उन लालित्य-प्रसारिणी कलाओं का प्रयोग किया है, जिनमें स्त्रिायाँ निपुण होती हैं। यह मंत्रा उन्हीं को आता है कि क्योंकर केशों की एक तड़प, अंचल की एक लहर चित्ता को चंचल कर देती है। आज उसने मिस्टर क्लार्क के साम्राज्यवाद को विजय करने का निश्चय किया है, वह आज अपनी सौंदर्य-शक्ति की परीक्षा करेगी।

 

रिमझिम बूँदें गिर रही थीं, मानो मौलसिरी के फूल झड़ रहे हों। बूँदों में एक मधाुर स्वर था। राजभवन, पर्वत-शिखर के ऊपर, ऐसा मालूम होता था, मानो देवताओं ने आनंदोत्सव की महफिल सजाई है। सोफिया प्यानो पर बैठ गई और एक दिल को मसोसनेवाला राग गाने लगी। जैसे ऊषा की स्वर्ण-छटा प्रस्फुटित होते ही प्रकृति के प्रत्येक अंग को सजग कर देती है, उसी भाँति सोफी की पहली ही तान ने हृदय में एक चुटकी-सी ली। मिस्टर क्लार्क आकर एक कोच पर बैठ गए और तन्मय होकर सुनने लगे, मानो किसी दूसरे ही संसार में पहुँच गए हैं। उन्हें कभी कोई नौका उमड़े हुए सागर में झकोले खाती नजर आती, जिस पर छोटी-छोटी सुंदर चिड़ियाँ मँडराती थीं। कभी किसी अनंत वन में एक भिक्षुक, झोली कंधो पर रखे, लाठी टेकता हुआ नजर आता। संगीत से कल्पना चित्रामय हो जाती है।

 

जब तक सोफी गाती रही, मिस्टर क्लार्क बैठे सिर धाुनते रहे। जब वह चुप हो गई, तो उसके पास गए और उसकी कुर्सी की बाँहों पर हाथ रखकर, उसके मुँह के पास मुँह ले जाकर बोले-इन उँगलियों को हृदय में रख लूँगा।

 

सोफी-हृदय कहाँ है?

 

क्लार्क ने छाती पर हाथ रखकर कहा-यहाँ तड़प रहा है।

 

सोफी-शायद हो, मुझे तो विश्वास नहीं आता। मेरा तो खयाल है, ईश्वर ने तुम्हें हृदय दिया ही नहीं।

 

क्लार्क-सम्भव है, ऐसा ही हो। पर ईश्वर ने जो कसर रखी थी, वह तुम्हारे मधाुर स्वर ने पूरी कर दी। शायद उसमें सृष्टि करने की शक्ति है।

 

सोफी-अगर मुझमें यह विभूति होती, तो आज मुझे एक अपरिचित व्यक्ति के सामने लज्जित न होना पड़ता।

 

क्लार्क ने अधाीर होकर कहा-क्या मैंने तुम्हें लज्जित किया? मैंने!

 

सोफी-जी हाँ, आपने। मुझे आज तुम्हारी निर्दयता से जितना दु:ख हुआ, उतना शायद और कभी न हुआ था। मुझे बाल्यावस्था से यह शिक्षा दी गई है कि प्रत्येक जीव पर दया करनी चाहिए, मुझे बताया गया है कि यही मनुष्य का सबसे बड़ा धार्म है। धाार्मिक ग्रंथों में भी दया और सहानुभूति ही मनुष्य का विशेष गुण बतलाई गई है। पर आज विदित हुआ कि निर्दयता का महत्तव दया से कहीं अधिाक है। सबसे बड़ा दु:ख मुझे इस बात का है कि अनजान आदमी के सामने मेरा अपमान हुआ।

 

क्लार्क-खुदा जानता है सोफी, मैं तुम्हारा कितना आदर करता हूँ। हाँ, इसका खेद मुझे अवश्य है कि मैं तुम्हारी उपेक्षा करने के लिए बाधय हुआ। इसका कारण तुम जानती ही हो। हमारा साम्राज्य तभी तक अजेय रह सकता है, जब तक प्रजा पर हमारा आतंक छाया रहे, जब तक वह हमें अपना हितचिंतक, अपना रक्षक, अपना आश्रय समझती रहे, जब तक हमारे न्याय पर उसका अटल विश्वास हो। जिस दिन प्रजा के दिल से हमारे प्रति विश्वास उठ जाएगा, उसी दिन हमारे साम्राज्य का अंत हो जाएगा। अगर साम्राज्य को रखना ही हमारे जीवन का उद्देश्य है,तो व्यक्तिगत भावों और विचारों को यहाँ कोई महत्तव नहीं। साम्राज्य के लिए हम बड़े-से-बड़े नुकसान उठा सकते हैं, बड़ी-से-बड़ी तपस्याएँ कर सकते हैं। हमें अपना राज्य प्राणों से भी प्रिय है, और जिस व्यक्ति से हमें क्षति की लेश-मात्रा भी शंका हो, उसे हम कुचल डालना चाहते हैं,उसका नाश कर देना चाहते हैं, उसके साथ किसी भाँति की रिआयत, सहानुभूति यहाँ तक कि न्याय का व्यवहार भी नहीं कर सकते।

 

सोफी-अगर तुम्हारा खयाल है कि मुझे साम्राज्य से इतना प्रेम नहीं, जितना तुम्हें है, और मैं उसके लिए इतने बलिदान नहीं सह सकती,जितने तुम कर सकते हो, तो तुमने मुझे बिलकुल नहीं समझा। मुझे दावा है, इस विषय में मैं किसी से जौ-भर भी पीछे नहीं। लेकिन यह बात मेरे अनुमान में भी नहीं आती कि दो प्रेमियों में कभी इतना मतभेद हो सकता है कि सहृदयता और सहिष्णुता के लिए गुंजाइश न रहे,और विशेषत: उस दशा में जबकि दीवार के कानों के अतिरिक्त और कोई कान भी सुन रहा हो। दीवान देश-भक्ति के भावों से शून्य है; उसकी गहराई और उसके विस्तार से जरा भी परिचित नहीं। उसने तो यही समझा होगा कि जब इन दोनों में मेरे सम्मुख इतनी तकरार हो सकती है,तो घर पर न जाने क्या दशा होगी। शायद आज से उसके दिल से मेरा सम्मान उठ गया। उसने औरों से भी यह वृत्ताांत कहा होगा। मेरी तो नाक-सी कट गई। समझते हो, मैं गा रही हूँ। यह गाना नहीं, रोना है। जब दाम्पत्य के द्वार पर यह दशा हो रही है, जहाँ फूलों से, हर्षनादों से, प्रेमालिंगनों से, मृदुल हास्य से मेरा अभिवादन होना चाहिए था, तो मैं अंदर कदम रखने का क्योंकर साहस कर सकती हूँ? तुमने मेरे हृदय के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। शायद तुम मुझे ैमदजपउमदजंस समझ रहे होगे; पर अपने चरित्रा को मिटा देना मेरे वश की बात नहीं। मैं अपने को धान्यवाद देती हूँ कि मैंने विवाह के विषय में इतनी दूर-दृष्टि से काम लिया।

 

यह कहते-कहते सोफी की ऑंखों से टप-टप ऑंसू गिरने लगे। शोकाभिनय में भी बहुधाा यथार्थ शोक की वेदना होने लगती है। मिस्टर क्लार्क खेद और असमर्थता का राग अलापने लगे; पर न उपयुक्त शब्द ही मिलते थे, न विचार। अश्रु-प्रवाह तर्क और शब्द-योजना के लिए निकलने का कोई मार्ग नहीं छोड़ता। बड़ी मुश्किल से उन्होंने कहा-सोफी, मुझे क्षमा करो, वास्तव में मैं न समझता था कि इस ज़रा-सी बात से तुम्हें इतनी मानसिक पीड़ा होगी।

 

सोफी-इसकी मुझे कोई शिकायत नहीं। तुम मेरे गुलाम नहीं हो कि मेरे इशारों पर नाचो। मुझमें वे गुण नहीं, जो पुरुषों का हृदय खींच लेते हैं, न वह रूप है, न वह छवि है, न वह उद्दीपन-कला। नखरे करना नहीं जानती, कोप-भवन में बैठना नहीं जानती। दु:ख केवल इस बात का है कि उस आदमी ने तो मेरे एक इशारे पर मेरी बात मान ली और तुम इतना अनुनय-विनय करने पर भी इनकार करते जाते हो। वह भी सिध्दांतवादी मनुष्य है; अधिाकारियों की यंत्राणाएँ सहीं, अपमान सहा, कारागार की ऍंधोरी कोठरी में कैद होना स्वीकार किया, पर अपने वचन पर सुदृढ़ रहा। इससे कोई मतलब नहीं कि उसकी टेक जा थी या बेजा, वह उसे जा समझता था। वह जिस बात को न्याय समझता था,उससे भय या लोभ या दंड उसे विचलित नहीं कर सके। लेकिन जब मैंने नरमी के साथ उसे समझाया कि तुम्हारी दशा चिंताजनक है, तो उसके मुख से ये करुण शब्द निकले-‘मेम साहब, जान की तो परवा नहीं, अपने मित्राों और सहयोगियाेंं की दृष्टि में पतित होकर जिंदा रहना श्रेय की बात नहीं; लेकिन आपकी बात नहीं टालना चाहता। आपके शब्दों में कठोरता नहीं, सहृदयता है, और मैं अभी तक भाव-विहीन नहीं हुआ हूँ। मगर तुम्हारे ऊपर मेरा कोई मंत्रा न चला। शायद तुम उससे बड़े सिध्दांतवादी हो, हालांकि अभी इसकी परीक्षा नहीं हुई। खैर, मैं तुम्हारे सिध्दांतों से सौतियाडाह नहीं करना चाहती। मेरी सवारी का प्रबंधा कर दो, मैं कल ही चली जाऊँगी और फिर अपनी नादानियों से तुम्हारे मार्ग का कटंक बनने न आऊँगी।

 

मिस्टर क्लार्क ने घोर आत्मवेदना के साथ कहा-डार्लिंग, तुम नहीं जानतीं, यह कितना भयंकर आदमी है। हम क्रांति से, षडयंत्राों से,संग्राम से इतना नहीं डरते, जितना इस भाँति के धौर्य और धाुन से। मैं भी मनुष्य हूँ सोफी, यद्यपि इस समय मेरे मुँह से यह दावा समयोचित नहीं पर कम-से-कम उस पवित्रा आत्मा के नाम पर, जिसका मैं अत्यंत दीनभक्त हूँ, मुझे यह कहने का अधिाकार है-मैं उस युवक का हृदय से सम्मान करता हूँ। उसके दृढ़ संकल्प की, उसके साहस की, उसकी सत्यवादिता की दिल से प्रशंसा करता हँ। जानता हूँ, वह एक ऐश्वर्यशाली पिता का पुत्रा है और राजकुमारों की भाँति आनंद-भोग में मग्न रह सकता है; पर उसके ये ही सद्गुण हैं, जिन्होंने उसे इतना अजेय बना रखा है। एक सेना का मुकाबला करना इतना कठिन नहीं, जितना ऐसे गिने-गिनाए व्रतधाारियों का, जिन्हें संसार में कोई भय नहीं है। मेरा जाति-धार्म मेरे हाथ बाँधो हुए है।

 

सोफी को ज्ञात हो गया कि मेरी धामकी सर्वथा निष्फल नहीं हुई। विवशता का शब्द जबान पर, खेद का भाव मन में आया, और अनुमति की पहली मंजिल पूरी हुई। उसे यह भी ज्ञात हुआ कि इस समय मेरे हाव-भाव का इतना असर नहीं हो सकता, जितना बलपूर्ण आग्रह था। सिध्दांतवादी मनुष्य हाव-भाव का प्रतिकार करने के लिए अपना दिल मजबूत कर सकता है, वह अपने अंत:करण के सामने अपनी दुर्बलता स्वीकार नहीं कर सकता, लेकिन दुराग्रह के मुकाबले में वह निष्क्रिय हो जाता है। तब उसकी एक नहीं चलती। सोफी ने कटाक्ष करते हुए कहा-अगर तुम्हारा जातीयर् कत्ताव्य तुम्हें प्यारा है, तो मुझे भी आत्मसम्मान प्यारा है। स्वदेश की अभी तक किसी ने व्याख्या नहीं की; पर नारियों की मान-रक्षा उसका प्रधाान अंग है और होनी चाहिए, इससे तुम इनकार नहीं कर सकते।

 

यह कहकर वह स्वामिनी-भाव से मेज के पास गई और एक डाकेट का पत्रा निकाला, जिस पर एजेंट आज्ञा-पत्रा लिखा करता था।

 

क्लार्क-क्या करती हो सोफी? खुदा के लिए जिद मत करो।

 

सोफी-जेल के दारोगा के नाम हुक्म लिखूँगी।

 

यह कहकर वह टाइपराइटर पर बैठ गई।

 

क्लार्क-यह अनर्थ न करो सोफी, गजब हो जाएगा।

 

सोफी-मैं गजब से क्या, प्रलय से भी नहीं डरती।

 

सोफी ने एक-एक शब्द का उच्चारण करते हुए आज्ञा-पत्रा टाइप किया। उसने एक जगह जान-बूझकर एक अनुपयुक्त शब्द टाइप कर दिया, जिसे एक सरकारी पत्रा में न आना चाहिए। क्लार्क ने टोका-यह शब्द मत रखो।

 

सोफी-क्यों, धान्यवाद न दूँ?

 

क्लार्क-आज्ञा-पत्रा में धान्यवाद का क्या जिक्र? कोई निजी थोड़े ही है।

 

सोफी-हाँ, ठीक है, यह शब्द निकाले देती हूँ। नीचे क्या लिखूँ।

 

क्लार्क-नीचे कुछ लिखने की जरूरत नहीं। केवल मेरा हस्ताक्षर होगा।

 

सोफी ने सम्पूर्ण आज्ञा-पत्रा पढ़कर सुनाया।

 

क्लार्क-प्रिये, यह तुम बुरा कर रही हो।

 

सोफी-कोई परवा नहीं, मैं बुरा ही करना चाहती हूँ। हस्ताक्षर भी टाइप कर दूँ? नहीं, (मुहर निकालकर) यह मुहर किए देती हूँ।

 

क्लार्क-जो चाहो करो। जब तुम्हें अपनी जिद के आगे कुछ बुरा-भला नहीं सूझता, तो क्या कहूँ?

 

सोफी-कहीं और तो इसकी नकल न होगी?

 

क्लार्क-मैं कुछ नहीं जानता।

 

यह कहकर मि. क्लार्क अपने शयन-गृह की ओर जाने लगे। सोफी ने कहा-आज इतनी जल्दी नींद आ गई?

 

क्लार्क-हाँ, थक गया हूँ। अब सोऊँगा। तुम्हारे इस पत्रा से रियासत में तहलका पड़ जाएगा।

 

सोफी-अगर तुम्हें इतना भय है, तो मैं इस पत्रा को फाड़े डालती हूँ। इतना नहीं गुदगुदाना चाहती कि हँसी के बदले रोना आ जाए। बैठते हो, या देखो, यह लिफाफा फाड़ती हूँ।

 

क्लार्क कुर्सी पर उदासीन भाव से बैठ गए और बोले-लो बैठ गया, क्या कहती हो?

 

सोफी-कहती कुछ नहीं हूँ, धान्यवाद का गीत सुनते जाओ।

 

क्लार्क-धान्यवाद की जरूरत नहीं।

 

सोफी ने फिर गाना शुरू किया और क्लार्क चुपचाप बैठे सुनते रहे।

 

उनके मुख पर करुण प्रेमाकांक्षा झलक रही थी। यह परख और परीक्षा कब तक? इस क्रीड़ा का कोई अंत भी है? इस आकांक्षा ने उन्हें साम्राज्य की चिंता से मुक्त कर दिया-आह! काश, अब भी मालूम हो जाता कि तू इतनी बड़ी भेंट पाकर प्रसन्न हो गई! सोफी ने उनकी प्रेमाग्नि को खूब उद्दीप्त किया और तब सहसा प्यानो बंद कर दिया और बिना कुछ बोले हुए अपने शयनागार में चली गई। क्लार्क वहीं बैठे रहे, जैसे कोई थका हुआ मुसाफिर अकेला किसी वृक्ष के नीचे बैठा हो।

 

सोफी ने सारी रात भावी जीवन के चित्रा खींचने में काटी, पर इच्छानुसार रंग न दे सकी। पहले रंग भरकर उसे जरा दूर से देखती, तो विदित होता, धाूप की जगह छाँह है, छाँह की जगह धाूप, लाल रंग का आधिाक्य है, बाग में अस्वाभाविक रमणीयता, पहाड़ों पर जरूरत से ज्यादा हरियाली, नदियों में अलौकिक शांति। फिर ब्रुश लेकर इन त्राुटियों को सुधाारने लगती, तो सारा दृश्य जरूरत से ज्यादा नीरस,उदास और मलिन हो जाता। उसकी धाार्मिकता अब अपने जीवन में ईश्वरीय व्यवस्था का रूप देखती थी। अब ईश्वर ही उसका कर्णधाार था,वह अपने कर्माकर्म के गुणदोष से मुक्त थी।

 

प्रात:काल वह उठी, तो मि. क्लार्क सो रहे थे। मूसलाधाार वर्षा हो रही थी। उसने शोफर को बुलाकर मोटर तैयार करने का हुक्म दिया और एक क्षण में जेल की तरफ चली, जैसे कोई बालक पाठशाला से घर की तरफ दौड़े।

 

उसके जेल पहुँचते ही हलचल-सी पड़ गई। चौकीदार ऑंखें मलते हुए दौड़-दौड़कर वर्दियाँ पहनने लगे। दारोगाजी ने उतावली में उलटी अचकन पहनी और बेतहाशा दौड़े। डॉक्टर साहब नंगे पाँव भागे, याद न आया कि रात को जूते कहाँ रखे थे और इस समय तलाश करने की फुरसत न थी। विनयसिंह बहुत रात गए सोए थे और अभी तक मीठी नींद के मजे ले रहे थे। कमरे में जल-कणों से भीगी हुई वायु आ रही थी। नरम गलीचा बिछा हुआ था। अभी तक रात का लैम्प न बुझा था, मानो विनय की व्यग्रता की साक्षी दे रहा था। सोफी का रूमाल अभी तक विनय के सिरहाने पड़ा हुआ था और उसमें से मनोहर सुगंधा उड़ रही थी। दारोगा ने जाकर सोफी को सलाम किया और वह उन्हें लिए विनय के कमरे में आई। देखा, तो नींद में है। रात की मीठी नींद से मुख पुष्प के समान विकसित हो गया है। ओठों पर हलकी-सी मुस्कराहट है; मानो फूल पर किरणें चमक रही हों। सोफी को विनय आज तक कभी इतना सुंदर न मालूम हुआ था।

 

सोफी ने डॉक्टर से पूछा-रात को इसकी कैसी दशा थी?

 

डॉक्टर-हुजूर, कई बार मर्ूच्छा आई; पर मैं एक क्षण के लिए भी यहाँ से न टला। जब इन्हें नींद आ गई, तो मैं भोजन करने चला गया। अब तो इनकी दशा बहुत अच्छी मालूम होती है।

 

सोफी-हाँ, मुझे भी ऐसा ही मालूम होता है। आज वह पीलापन नहीं है। मैं अब इससे यह पूछना चाहती हूँ कि इसे किसी दूसरे जेल में क्यों न भिजवा दूँ। यहाँ की जलवायु इसके लिए अनुकूल नहीं है। पर आप लोगों के सामने यह अपने मन की बातें न कहेगा। आप लोग जरा बाहर चले जाएँ, तो मैं इसे जगाकर पूछ लूँ, और इसका ताप भी देख लूँ। (मुस्कराकर) डॉक्टर साहब, मैं भी इस विद्या से परिचित हूँ। नीम हकीम हूँ, पर खतरे-जान नहीं।

 

जब कमरे में एकांत हो गया, तो सोफी ने विनय का सिर उठाकर अपनी जाँघ पर रख लिया और धाीरे-धाीरे उसका माथा सहलाने लगी। विनय की ऑंखें खुल गईं। इस तरह झपटकर उठा, जैसे नींद में किसी नदी से फिसल पड़ा हो। स्वप्न का इतना तत्काल फल शायद ही किसी को मिला हो।

 

सोफी ने मुस्कराकर कहा-तुम अभी तक सो रहे हो; मेरी ऑंखों की तरफ देखो, रात-भर नहीं झपकीं।

 

विनय-संसार का सबसे उज्ज्वल रत्न पाकर भी मीठी नींद न लूँ, तो मुझसा भाग्यहीन और कौन होगा?

 

सोफी-मैं तो उससे भी उज्ज्वल रत्न पाकर और भी चिंताओं में फँस गई। अब यह भय है कि कहीं वह हाथ से न निकल जाए। नींद का सुख अभाव में है, जब कोई चिंता नहीं होती। अच्छा, अब तैयार हो जाओ।

 

विनय-किस बात के लिए?

 

सोफी-भूल गए? इस अंधाकार से प्रकाश में आने के लिए, इस काल-कोठरी से बिदा होने के लिए। मैं मोटर लाई हूँ; तुम्हारी मुक्ति का आज्ञा-पत्रा मेरी जेब में है। कोई अपमानसूचक शर्त नहीं है। केवल उदयपुर राज्य में बिना आज्ञा के न आने की प्रतिज्ञा ली गई है। आओ,चलें। मैं तुम्हें रेल के स्टेशन तक पहुँचाकर लौट जाऊँगी। तुम दिल्ली पहुँचकर मेरा इंतजार करना। एक सप्ताह के अंदर मैं तुमसे दिल्ली में आ मिलूँगी, और फिर विधााता भी हमें अलग न कर सकेगा।

 

विनयसिंह की दशा उस बालक की-सी थी, जो मिठाइयों के खोंचे को देखता है, पर इस भय से कि अम्माँ मारेंगी, मुँह खोलने का साहस नहीं कर सकता। मिठाइयों के स्वाद याद करके उसकी राल टपकने लगती है। रसगुल्ले कितने रसीले हैं, मालूम होता है, दाँत किसी रसक्ुं+ड में फिसल पडे। अमिर्तियाँ कितनी कुरकुरी हैं, उनमें भी रस भरा होगा। गुलाबजामुन कितनी सोंधाी होती है कि खाता ही चला जाए। मिठाइयों से पेट नहीं भर सकता। अम्माँ पैसे न देंगी। होंगे ही नहीं, किससे माँगेगी ज्यादा हठ करूँगा, तो रोने लगेंगी। सजल नेत्रा होकर बोला-सोफी, मैं भाग्यहीन आदमी हूँ, मुझे इसी दशा मेेंं रहने दो। मेरे साथ अपने जीवन का सर्वनाश न करो। मुझे विधााता ने दु:ख भोगने ही के लिए बनाया है। मैं इस योग्य नहीं कि तुम…।

 

सोफी ने बात काटकर कहा-विनय, मैं विपत्तिा ही की भूखी हूँ। अगर तुम सुख-सम्पन्न होते, अगर तुम्हारा जीवन विलासमय होता, अगर तुम वासनाओं के दास होते, तो कदाचित् मैं तुम्हारी तरफ से मुँह फेर लेती। तुम्हारे सत्साहस और त्याग ही ने मुझे तुम्हारी तरफ खींचा है।

 

विनय-अम्माँजी को तुम जानती हो, वह मुझे कभी क्षमा न करेंगी।

 

सोफी-तुम्हारे प्रेम का आश्रय पाकर मैं उनके क्रोधा को शांत कर लूँगी। जब वह देखेंगी कि मैं तुम्हारे पैरों की जंजीर नहीं, तुम्हारे पीछे उड़नेवाली रज हूँ, तो उनका हृदय पिघल जाएगा।

 

विनय ने सोफी को स्नेहपूर्ण नेत्राों से देखकर कहा-तुम उनके स्वभाव से परिचित नहीं हो। वह हिंदू-धार्म पर जान देती हैं।

 

सोफी-मैं भी हिंदू-धार्म पर जान देती हूँ। जो आत्मिक शांति मुझे और कहीं न मिली, वह गोपियों की प्रेम-कथा में मिल गई। वह प्रेम का अवतार, जिसने गोपियों को प्रेम-रस पान कराया, जिसने कुब्जा का डोंगा पार लगाया, जिसने प्रेम के रहस्य दिखाने के लिए ही संसार को अपने चरणों से पवित्रा किया, उसी की चेरी बनकर जाऊँगी, तो वह कौन सच्चा हिंदू है, जो मेरी उपेक्षा करेगा?

 

विनय ने मुस्कराकर कहा-उस छलिया ने तुम पर भी जादू डाल दिया? मेरे विचार में तो कृष्ण की प्रेम-कथा सर्वथा भक्त-कल्पना है।

 

सोफी-हो सकती है। प्रभु मसीहा को भी तो कल्पित कहा जाता है। शेक्सपियर भी तो कल्पना-मात्रा है। कौन कह सकता है कि कालिदास की सृष्टि पंचभूतों से हुई है? लेकिन इन पुरुषों के कल्पित होते हुए भी हम उनकी पवित्रा कीर्ति के भक्त हैं, और वास्तविक पुरुषों की कीर्ति से अधिाक। शायद इसीलिए कि उनकी रचना स्थूल परमाणु से नहीं, सूक्ष्म कल्पना से हुई हो। ये व्यक्तियों के नाम हों न हों, पर आदर्शों के नाम अवश्य हैं। इनमें से प्रत्येक पुरुष मानवीय जीवन का एक-एक आदर्श है।

 

विनय-सोफी, मैं तुमसे तर्क में पार न पा सकूँगा। पर मेरा मन कह रहा है कि मैं तुम्हारी सरल हृदयता से अनुचित लाभ उठा रहा हूँ। मैं तुमसे हृदय की बात कहता हूँ सोफी, तुम मेरा यथार्थ रूप नहीं देख रही हो। कहीं उस पर निगाह पड़ जाए, तो तुम मेरी तरफ ताकना भी पसंद न करोगी। तुम मेरे पैरों की जंजीर चाहे न बन सको, पर मेरी दबी हुई आग को जगानेवाली हवा अवश्य बन जाओगी। माताजी ने बहुत सोच-समझकर मुझे यह व्रत दिया है। मुझे भय होता है कि एक बार मैं इस बंधान से मुक्त हुआ, तो वासना मुझे इतने वेग से बहा ले जाएगी कि फिर शायद मेरे अस्तित्व का पता ही न चले। सोफी, मुझे इस कठिनतम परीक्षा में न डालो। मैं यथार्थ में बहुत दुर्बल चरित्रा, विषयसेवी प्राणी हूँ। तुम्हारी नैतिक विशालता मुझे भयभीत कर रही है। हाँ, मुझ पर इतनी दया अवश्य करो कि आज यहाँ से किसी दूसरी जगह प्रस्थान कर दो।

 

सोफी-क्या मुझसे इतनी दूर भागना चाहते हो?

 

विनय-नहीं-नहीं, इसका और ही कारण है। न जाने क्योंकर यह विज्ञप्ति निकल गई है कि जसवंतनगर एक सप्ताह के लिए खाली कर दिया जाए। कोई जवान आदमी कस्बे में न रहने पाए। मैं तो समझता हूँ, सरदार साहब ने तुम्हारी रक्षा के लिए यह व्यवस्था की है, पर लोग तुम्हीं को बदनाम कर रहे हैं।

 

सोफी और क्लार्क का परस्पर तर्क-वितर्क सुनकर सरदार नीलकंठ ने तत्काल यह हुक्म जारी कर दिया था। उन्हें निश्चय था कि मेम साहब के सामने साहब की एक न चलेगी और विनय को छोड़ना पड़ेगा। इसलिए पहले ही से शांति-रक्षा का उपाय करना आवश्यक था। सोफी ने विस्मित होकर पूछा-क्या ऐसा हुक्म दिया गया है?

 

विनय-हाँ, मुझे खबर मिली है। कोई चपरासी कहता था।

 

सोफी-मुझे जरा भी खबर नहीं। मैं अभी जाकर पता लगाती हूँ और इस हुक्म को मंसूख करा देती हूँ। ऐसी ज्यादती रियासतों के सिवा और कहीं नहीं हो सकती। यह सब तो हो जाएगा, पर तुम्हें अभी मेरे साथ चलना पड़ेगा।

 

विनय-नहीं सोफी, मुझे क्षमा करो। दूर का सुनहरा दृश्य समीप आकर बालू का मैदान हो जाता है। तुम मेरे लिए आदर्श हो। तुम्हारे प्रेम का आनंद मैं कल्पना ही द्वारा ले सकता हूँ। डरता हूँ कि तुम्हारी दृष्टि में गिर न जाऊँ। अपने को कहाँ तक गुप्त रखूँगा? तुम्हें पाकर मेरा जीवन नीरस हो जाएगा, मेरे लिए उद्योग और उपासना की कोई वस्तु न रह जाएगी। सोफी, मेरे मुँह से न जाने क्या-क्या अनर्गल बातें निकल रही हैं। मुझे स्वयं संदेह हो रहा है कि मैं अपने होश में हूँ या नहीं। भिक्षुक राजसिंहासन पर बैठकर अस्थिर चित्ता हो जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं। मुझे यहीं पड़ा रहने दो। मेरी तुमसे यही अंतिम प्रार्थना है कि मुझे भूल जाओ।

 

सोफी-मेरी स्मरण-शक्ति इतनी शिथिल नहीं है।

 

विनय-कम-से-कम मुझे यहाँ से जाने के लिए विवश न करो; क्योंकि मैंने निश्चय कर लिया है, मैं यहाँ से न जाऊँगा। कस्बे की दशा देखते हुए मुझे विश्वास नहीं है कि मैं जनता को काबू में रख सकूँगा।

 

सोफी ने गम्भीर भाव से कहा-जैसी तुम्हारी इच्छा। मैं तुम्हें जितना सरल हृदय समझती थी, तुम उससे कहीं बढ़कर कूटनीतिज्ञ हो। मैं तुम्हारा आशय समझती हूँ, और इसलिए कहती हूँ, जैसी तुम्हारी इच्छा। पर शायद तुम्हें मालूम नहीं कि युवती का हृदय बालक के समान होता है। उसे जिस बात के लिए मना करो, उसी तरफ लपकेगा। अगर तुम आत्मप्रशंसा करते, अपने कृत्यों की अप्रत्यक्ष रूप से डींग मारते,तो शायद मुझे तुमसे अरुचि हो जाती। अपनी त्राुटियों और दोषों का प्रदर्शन करके तुमने मुझे और भी वशीभूत कर लिया। तुम मुझसे डरते हो, इसलिए तुम्हारे सम्मुख न आऊँगी, पर रहूँगी तुम्हारे ही साथ। जहाँ-जहाँ तुम जाओगे, मैं परछाईं की भाँति तुम्हारे साथ रहूँगी। प्रेम एक भावनागत विषय है, भावना से ही उसका पोषण होता है, भावना ही से वह जीवित रहता है और भावना से ही लुप्त हो जाता है। वह भौतिक वस्तु नहीं है। तुम मेरे हो, यह विश्वास मेरे प्रेम को सजीव और सतृष्ण रखने के लिए काफी है। जिस दिन इस विश्वास की जड़ हिल जाएगी,उसी दिन इस जीवन का अंत हो जाएगा। अगर तुमने यही निश्चय किया है कि इस कारागार में रहकर तुम अपने जीवन के उद्देश्य को अधिाक सफलता के साथ पूरा कर सकते हो, तो इस फैसले के आगे सिर झुकाती हूँ। इस विराग ने मेरी दृष्टि में तुम्हारे आदर को कई गुना बढ़ा दिया है। अब जाती हूँ। कल शाम को फिर आऊँगी। मैंने इस आज्ञा-पत्रा के लिए जितना त्रिाया-चरित्रा खेला है, वह तुमसे बता दूँ, तो तुम आश्चर्य करोगे। तुम्हारी एक ‘नहीं’ ने मेरे सारे प्रयास पर पानी फेर दिया। क्लार्क कहेगा, मैं कहता था, वह राजी न होगा, कदाचित् व्यंग्य करे; पर कोई चिंता नहीं, कोई बहाना कर दूँगी।

 

यह कहते-कहते सोफी के सतृष्ण अधार विनयसिंह की तरफ झुके, पर वह कोई पैर फिसलनेवाले मनुष्य की भाँति गिरते-गिरते सँभल गई। धाीरे से विनयसिंह का हाथ दबाया और द्वार की ओर चली; पर बाहर जाकर फिर लौट आई और अत्यंत दीन भाव से बोली-विनय, तुमसे एक बात पूछती हूँ। मुझे आशा है, तुम साफ-साफ बतला दोगे। मैं क्लार्क के साथ यहाँ आई, उससे कौशल किया, उसे झूठी आशाएँ दिलाईं और अब उसे मुगालते में डाले हुए हूँ। तुम इसे अनुचित तो नहीं समझते, तुम्हारी दृष्टि में मैं कलंकिनी तो नहीं हूँ?

 

विनय के पास इसका एक ही सम्भावित उत्तार था। सोफी का आचरण उसे आपत्तिाजनक प्रतीत होता था। उसे देखते ही उसने इस बात को आश्चर्य के रूप में प्रकट भी किया था। पर इस समय वह इस भाव को प्रकट न कर सका। यह कितना बड़ा अन्याय होता, कितनी घोर निर्दयता! वह जानता था कि सोफी ने जो कुछ किया है, वह एक धाार्मिक तत्तव के अधाीन होकर। वह इसे ईश्वरीय प्रेरणा समझ रही है। अगर ऐसा न होता, तो शायद अब तक वह हताश हो गई होती। ऐसी दशा में कठोर सत्य वज्रपात के समान होता। श्रध्दापूर्ण तत्परता से बोले-सोफी, तुम यह प्रश्न करके अपने ऊपर और उससे अधिाक मेरे ऊपर अन्याय कर रही हो। मेरे लिए तुमने अब तक त्याग-ही-त्याग किए हैं, सम्मान, समृध्दि, सिध्दांत एक की भी परवा नहीं की। संसार में मुझसे बढ़कर कृतघ्न और कौन प्राणी होगा, जो मैं इस अनुराग का निरादर करूँ।

 

यह कहते-कहते वह रुक गया। सोफी बोली-कुछ और कहना चाहते हो, रुक क्यों गए? यही न कि तुम्हें मेरा क्लार्क के साथ रहना अच्छा नहीं लगता। जिस दिन मुझे निराशा हो जाएगी कि मैं मिथ्याचरण से तुम्हारा कुछ उपकार नहीं कर सकती, उसी दिन मैं क्लार्क को पैरों से ठुकरा दूँगी। इसके बाद तुम मुझे प्रेम-योगिनी के रूप में देखोगे, जिसके जीवन का एकमात्रा उद्देश्य होगा तुम्हारे ऊपर समर्पित हो जाना।

 

नायकराम मुहल्लेवालों से बिदा होकर उदयपुर रवाना हुए। रेल के मुसाफिरों को बहुत जल्द उनसे श्रध्दा हो गई। किसी को तम्बाकू मलकर खिलाते, किसी के बच्चे को गोद में लेकर प्यार करते। जिस मुसाफिर को देखते, जगह नहीं मिल रही है, इधार-उधार भटक रहा है, जिस कमरे में जाता है, धाक्के खाता है, उसे बुलाकर अपनी बगल में बैठा लेते। फिर जरा देर में सवालों का ताँता बाँधा देते-कहाँ मकान है? कहाँ जाते हो? कितने लड़के हैं? क्या कारोबार होता है? इन प्रश्नों का अंत इस अनुरोधा पर होता कि मेरा नाम नायकराम पंडा है; जब कभी काशी जाओ,मेरा नाम पूछ लो, बच्चा-बच्चा जानता है; दो दिन, चार दिन, महीने, जब तक इच्छा हो, आराम से काशीवास करो; घर-द्वार, नौकर-चाकर सब हाजिर हैं, घर का-सा आराम पाओगे; वहाँ से चलते समय जो चाहो, दे दो, न दो, घर आकर भेज दो, इसकी कोई चिंता नहीं। यह कभी मत सोचो, अभी रुपये नहीं हैं, फिर चलेंगे। शुभ काम के लिए महूरत नहीं देखा जाता, रेल का किराया लेकर चल खड़े हो। काशी में तो मैं हूँ ही,किसी बात की तकलीफ न होगी। काम पड़ जाए तो जान लड़ा दें, तीरथ-जात्राा के लिए टालमटोल मत करो। कोई नहीं जानता, कब बड़ी जात्राा करनी पड़ जाए, संसार के झगड़े तो सदा लगे ही रहेंगे।

 

दिल्ली पहुँचे, तो कई नए मुसाफिर गाड़ी में आए। आर्य समाज के किसी उत्सव में जा रहे थे। नायकराम ने उनसे वही जिरह शुरू की। यहाँ तक कि एक महाशय गर्म होकर बोले-तुम हमारे बाप-दादे का नाम पूछकर क्या करोगे? हम तुम्हारे फंदे में फँसनेवाले नहीं हैं। यहाँ गंगाजी के कायल नहीं और न काशी ही को स्वर्गपुरी समझते हैं।

 

नायकराम जरा भी हताश नहीं हुए। मुस्कराकर बोले-बाबूजी, आप आरिया होकर ऐसा कहते हैं। आरिया लोगों ही ने तो हिंदू-धारम की लाज रखी, नहीं तो अब तक सारा देश मुसलमान-किरसतान हो गया होता। हिंदू-धारम के उध्दारक होकर आप काशी को भला कैसे न मानेंगे! उसी नगरी में राजा हरिसचंद की परीक्षा हुई थी, वहीं बुध्द भगवान ने अपना धारम-चक्र चलाया था, वहीं शंकर भगवान् ने मंडल मिसिर से सास्त्राार्थ किया था; वहाँ जैनी आते हैं, बौध्द आते हैं, वैस्नव आते हैं, वह हिंदुओं की नगरी नहीं है, सारे संसार की नगरी वही है। दूर-दूर के लोग भी जब तक काशी के दरसन न कर लें, उनकी जात्राा सुफल नहीं होती। गंगाजी मुकुत देती हैं, पाप काटती हैं, यह सब तो गँवारों को बहलाने की बातें हैं। उनसे कहो कि चलकर उस पवित्रा नगरी को देख आओ, जहाँ कदम-कदम पर आरिया जाति के निसान मिलते हैं, जिसका नाम लेते ही सैकड़ों महात्माओं, रिसियों-मुनियों की याद आ जाती है, तो उनकी समझ में यह बात न आएगी। पर जथारथ में बात यही है। कासी का महातम इसीलिए है कि वह आरिया जाति की जीति-जागती पुरातन पुरी है।

 

इन महाशयों को फिर काशी की निंदा करने का साहस न हुआ। वे मन में लज्जित हुए और नायकराम के धाार्मिक ज्ञान के कायल हो गए, हालाँकि नायकराम ने ये थोड़े-से वाक्य ऐसे अवसरों के लिए किसी व्याख्याता के भाषण से चुनकर रट लिए थे।

 

रेल के स्टेशन पर वह जरूर उतरते और रेल के कर्मचारियों का परिचय प्राप्त करते। कोई उन्हें पान खिला देता, कोई जलपान करा देता। सारी यात्राा समाप्त हो गई, पर वह लेटे तक नहीं, जरा भी ऑंख नहीं झपकी। जहाँ दो मुसाफिरों को लड़ते-झगड़ते देखते, तुरंत तीसरे बन जाते और उनमें मेल करा देते। तीसरे दिन वह उदयपुर पहुँच गए और रियासत के अधिाकारियों से मिलते-जुलते, घूमते-घामते जसवंतनगर में दाखिल हुए। देखा, मिस्टर क्लार्क का डेरा पड़ा हुआ है। बाहर से आने-जानेवालों की बड़ी जाँच-पड़ताल होती है, नगर का द्वार बंद-सा है,लेकिन पंडे को कौन रोकता? कस्बे में पहुँचकर सोचने लगे, विनयसिंह से क्योंकर मुलाकात हो? रात को तो धार्मशाला में ठहरे, सबेरा होते ही जेल के दारोगा के मकान में जा पहुँचे। दारोगाजी सोफी को बिदा करके आए थे और नौकर को बिगड़ रहे थे कि तूने हुक्का क्यों नहीं भरा,इतने में बरामदे में पंडाजी की आहट पाकर बाहर निकल आए। उन्हें देखते ही नायकराम ने गंगा-जल की शीशी निकाली और उनके सिर पर जल छिड़क दिया।

 

दारोगाजी ने अन्यमनस्क होकर कहा-कहाँ से आते हो?

 

नायकराम-महाराज, अस्थान तो परागराज है; पर आ रहा हूँ बड़ी दूर से। इच्छा हुई, इधार भी जजमानों को आसीरबाद देता चलूँ।

 

दारोगाजी का लड़का, जिसकी उम्र चौदह-पंद्रह वर्ष की थी, निकल आया। नायकराम ने उसे नख से शिख तक बड़े धयान से देखा, मानो उसके दर्शनों से हार्दिक आनंद प्राप्त प्राप्त हो रहा है और तब दारोगाजी से बोले-यह आपके चिरंजीव पुत्रा हैं न? पिता-पुत्रा की सूरत कैसी मिलती है दूर से ही पहचाना जाए। छोटे ठाकुर साहब, क्या पढ़ते हो?

 

लड़के ने कहा-ऍंगरेजी पढ़ता हूँ।

 

नायकराम-यह तो मैं पहले ही समझ गया था। आजकल तो इसी विद्या का दौरदौरा है, राजविद्या ठहरी। किस दफे में पढ़ते हो भैया?

 

दारोगा-अभी तो हाल ही में ऍंगरेजी शुरू की है, उस पर भी पढ़ने में मन नहीं लगाते, अभी थोड़ी ही पढ़ी है।

 

लड़के ने समझा, मेरा अपमान हो रहा है। बोला-तुमसे से तो ज्यादा पढ़ा हूँ।

 

नाकयराम-इसकी कोई चिंता नहीं, सब आ जाएगा, अभी इनकी औस्था ही क्या है। भगवान की इच्छा होगी, तो कुल का नाम रोसन कर देंगे। आपके घर पर कुछ जगह-जमीन भी है?

 

दारोगाजी ने अब समझा। बुध्दि बहुत तीक्ष्ण न थी। अकड़कर कुर्सी पर बैठ गए और बोले-हाँ, चित्ताौर के इलाके में कई गाँव हैं। पुरानी जागीर है। मेरे पिता महाराना के दरबारी थे। हल्दीघाटी की लड़ाई में राना प्रताप ने मेरे पूर्वजों को यह जागीर दी थी। अब भी मुझे दरबार में कुर्सी मिलती है और पान-इलायची से सत्कार होता है। कोई कार्य-प्रयोजन होता है, तो महाराना के यहाँ से आदमी आता है। बड़ा लड़का मरा था, तो महाराना ने शोकपत्रा भेजा था।

 

नायकराम-जागीरदार का क्या कहना! जो जागीरदार, वही राजा; नाम का फरक है। असली राजा तो जागीरदार ही होते हैं, राज तो नाम के हैं।

 

दारोगा-बराबर राजकुल से आना-जाना लगा रहता है।

 

नायकराम-अभी इनकी कहीं बातचीत तो नहीं हो रही है?

 

दारोगा-अजी, लोग तो जान खा रहे हैं, रोज एक-न-एक जगह से संदेशा आता रहता है; पर मैं सबों को टका-सा जवाब देता हूँ। जब तक लड़का पढ़-लिख न ले, तब तक उसका विवाह कर देना नादानी है।

 

नायकराम-यह आपने पक्की बात कही। जथारथ में ऐसा ही होना चाहिए। बड़े आदमियों की बुध्दि भी बड़ी होती है। पर लोक-रीति पर चलना ही पड़ता है। अच्छा, अब आज्ञा दीजिए, कई जगह जाना है। जब तक मैं लौटकर न आऊँ, किसी को जवाब न दीजिएगा। ऐसी कन्या आपको न मिलेगी और न ऐसा उत्ताम कुल ही पाइएगा।

 

दारोगा-वाह-वाह! इतनी जल्दी चले जाइएगा? कम-से-कम भोजन तो कर लीजिए। कुछ हमें भी तो मालूम हो कि आप किस का संदेसा लाए हैं? वह कौन हैं; कहाँ रहते हैं?

 

नायकराम-सब कुछ मालूम हो जाएगा, पर अभी बताने का हुक्म नहीं है।

 

दारोगा ने लड़के से कहा-तिलक, अंदर जाओ, पंडितजी के लिए पान बनवा लाओ, कुछ नाश्ता भी लेते आना।

 

यह कहकर तिलक के पीछे-पीछे खुद अंदर चले गए और गृहिणी से बोले-लो कहीं से तिलक के ब्याह का संदेसा आया है। पान तश्तरी में भेजना। नाश्ते के लिए कुछ नहीं है? वह तो मुझे पहले ही मालूम था। घर में कितनी ही चीज आए, दुबारा देखने को नहीं मिलती। न जाने कहाँ के मरभुखे जमा हो गए हैं। अभी कल ही एक कैदी के घर से मिठाइयों का पूरा थाल आया था, क्या हो गया?

 

स्त्राी-इन्हीं लड़कों से पूछो, क्या हो गया। मैं तो हाथ से छूने की भी कसम खाती हूँ। यह कोई संदूक में बंद करके रखने की चीज तो है नहीं। जिसका जब जी चाहता है, निकालकर खाता है। कल से किसी ने रोटियों की ओर नहीं ताका।

 

दारोगा-तो आखिर तुम किस मरज की दवा हो? तुमसे इतना भी नहीं हो सकता कि जो चीज घर में आए, उसे यत्न से रखो, हिसाब से खर्च करो। वह लौंडा कहाँ गया?

 

स्त्राी-तुम्हीं ने तो अभी उसे डाँटा था, बस चला गया। कह गया है कि घड़ी-घड़ी की डाँट-फटकार बरदाश्त नहीं हो सकती।

 

दारोगा-यह और मुसीबत हुई। ये छोटे आदमी दिन-दिन सिर चढ़ते जाते हैं, कोई कहाँ तक इनकी खुशामद करे, अब कौन बाजार से मिठाइयाँ लाए? आज तो किसी सिपाही को भी नहीं भेज सकता, न जाने सिर से कब यह बला टलेगी। तुम्हीं चले जाओ तिलक!

 

तिलक-शर्बत क्यों नहीं पिला देते?

 

स्त्राी-शकर भी तो नहीं है। चले क्यों नहीं जाते?

 

तिलक-हां, चले क्यों नहीं जाते! लोग देखेंगे हजरत मिठाई लिए जाते हैं।

 

दारोगा-तो इसमें क्या गाली है, किसी के घर चोरी तो नहीं कर रहे हो? बुरे काम से लजाना चाहिए, अपना काम करने में क्या लाज?

 

तिलक यों तो लाख सिर पटकने पर भी बाजार न जाते, पर इस वक्त अपने विवाह की खुशी थी, चले गए। दारोगाजी ने तश्तरी में पान रखे और नायकराम के पास लाए।

 

नायकराम-सरकार, आपके घर पान नहीं खाऊँगा।

 

दारोगा-अजी, अभी क्या हरज है, अभी तो कोई बात भी नहीं हुई।

 

नायकराम-मेरा मन बैठ गया, तो सब ठीक समझिए।

 

दारोगा-यह तो आपने बुरी पख लगाई। यह बात नहीं हो सकती कि आप हमारे द्वार पर आएँ और हम बिना यथेष्ट आदर-सत्कार किए आपको जाने दें। मैं तो मान भी जाऊँगा, पर तिलक की माँ किसी तरह राजी न होंगी।

 

नायकराम-इसी से मैं यह संदेसा लेकर आने से इनकार कर रहा था। जिस भले आदमी के द्वार पर जाइए, वह भोजन और दच्छिना के बगैर गला नहीं छोड़ता। इसी से तो आजकल कुछ लबाड़ियों ने बर खोजने को ब्यौसाय बना लिया है। इससे यह काम करते हुए और भी संकोच होता है।

 

दारोगा-ऐसे र्धाूत्ता यहाँ नित्य ही आया करते हैं; पर मैं तो पानी को भी नहीं पूछता। जैसा मुँह होता है, वैसा बीड़ा मिलता है। यहाँ तो आदमी को एक नजर देखा और उसकी नस-नस पहचान गया। आप यों न जाने पाएँगे।

 

नायकराम-मैं जानता कि आप इस तरह पीछे पड़ जाएँगे, तो लबाड़ियों ही की-सी बातचीत करता। गला तो छूट जाता।

 

दारोगा-यहाँ ऐसा अनाड़ी नहीं हूँ, उड़ती चिड़िया पहचानता हूँ।

 

नायकराम डट गए। दोपहर होते-होते बच्चे-बच्चे से उनकी मैत्राी हो गई। दारोगाइन ने भी पालागन कहला भेजा। इधार से भी आशीर्वाद दिया गया। दारोगा तो दस बजे दफ्तर चले गए। नायकराम के लिए पूरियाँ-कचौरियाँ, चटनी, हलवा बड़ी विधिा से बनाया गया। पंडितजी ने भीतर जाकर भोजन किया। रायता, दही; स्वामिनी ने स्वयं पंखा झला। फिर तो उन्होंने और रंग जमाया। लड़के-लड़कियों के हाथ देखे। दारोगाइन ने भी लजाते हुए हाथ दिखाया। पंडितजी ने अपने भाग्य-रेखा-ज्ञान का अच्छा परिचय दिया। और भी धााक जम गई। शाम को दारोगाजी दफ्तर से लौटे, तो पंडितजी शान से मसनद लगाए बैठे हुए थे और पड़ोस के कई आदमी उन्हें घेरे खड़े थे।

 

दारोगा ने कुर्सी पर लेटकर कहा-यह पद तो इतना ऊँचा नहीं, और न ही वेतन ही कुछ ऐसा अधिाक मिलता है, पर काम इतना जिम्मेदारी का है कि केवल विश्वासपात्राों को ही मिलता है। बड़े-बड़े आदमी किसी-न-किसी अपराधा के लिए दंड पाकर आते हैं। अगर चाहूँ,तो उनके घरवालों से एक-एक मुलाकात के लिए हजारों रुपये ऐंठ लूँ; लेकिन अपना यह ढंग नहीं। जो सरकार से मिलता है, उसी को बहुत समझता हूँ। किसी भीरु पुरुष का तो यहाँ घड़ी-भर निबाह न हो। एक-से-एक खूनी, डकैत, बदमाश आते रहते हैं, जिनके हजारों साथी होते हैं;चाहें तो दिन-दहाड़े जेल को लुटवा लें, पर ऐसे ढंग से उन पर रोब जमाता हूँ कि बदनामी भी न हो और नुकसान भी न उठाना पड़े। अब आज-ही-कल देखिए, काशी के कोई करोड़पति राजा हैं महाराजा भरतसिंह, उनका पुत्रा राजविद्रोह के अभियोग में फँस गया है। हुक्काम तक उसका इतना आदर करते हैं कि बड़े साहब की मेम साहब दिन में दो-दो बार उसका हाल-चाल पूछने आती हैं और सरदार नीलकंठ बराबर पत्राों द्वारा उसका कुशल-समाचार पूछते रहते हैं। चाहूँ तो महाराजा भरतसिंह से एक मुलाकात के लिए लाखों रुपये उड़ा लूँ; पर यह अपना धार्म नहीं।

 

नायकराम-अच्छा! क्या राजा भरतसिंह का पुत्रा यहीं कैद है?

 

दारोगा-और यहाँ सरकार को किस पर इतना विश्वास है?

 

नायकराम-आप-जैसे महात्माओं के दरसन दुरलभ हैं। किंतु बुरा न मानिए, तो कहूँ, बाल-बच्चों का भी धयान रखना चाहिए। आदमी घर से चार पैसे कमाने ही के लिए निकलता है।

 

दारोगा-अरे, तो क्या कोई कसम खाई है, पर किसी का गला नहीं दबाता। चलिए, आपको जेलखाने की सैर कराऊँ। बड़ी साफ-सुथरी जगह है। मेरे यहाँ तो जो कोई मेहमान आता है, उसे वहीं ठहरा देता हूँ। जेल के दारोगा की दोस्ती से जेल की हवा खाने के सिवा और क्या मिलेगा?

 

यह कहकर दारोगा मुस्कराए। वह नायकराम को किसी बहाने से यहाँ से टालना चाहते थे। नौकर भाग गया था, कैदियों और चपरासियों से काम लेने का मौका न था। सोचा, अपने हाथ चिलम भरनी पड़ेगी, बिछावन बिछाना पड़ेगा, मर्यादा में बाधाा उपस्थित होगी, घर का परदा खुल जाएगा। इन्हें वहाँ ठहरा दूँगा, खाना भिजवा दूँगा, परदा ढका रह जाएगा।

 

नायकराम-चलिए, कौन जाने, कभी आपकी सेवा में आना ही पड़े। पहले से ठौर-ठिकान देख लूँ। महाराजा साहब के लड़के ने कौन कसूर किया था?

 

दारोगा-कसूर कुछ नहीं था, बस हाकिमों की जिद है। यहाँ देहातों में घूम-घूमकर लोगों को उपदेश करता था, बस, हाकिमों को उस पर संदेह हो गया कि यह राजविद्रोह फैला रहा है। यहाँ लाकर कैद कर दिया। मगर आप तो अभी उसे देखिएगा ही, ऐसा गम्भीर, शांत, विचारशील आदमी आज तक मैंने नहीं देखा। हाँ, किसी से दबा नहीं। खुशामद करके चाहे कोई पानी भरा लें; पर चाहें कि रोब से उसे दबा लें, तो जौ-भर भी न दबेगा।

 

नायकराम दिल में खुश था कि बड़ी अच्छी साइत में चला था कि भगवान् आप ही सब द्वार खोल देते हैं। देखूँ, अब विनयसिंह से क्या बात होती है। याेंं तो वह न जाएँगे, पर रानीजी की बीमारी का बहाना करना पड़ेगा। वह राजी हो जाएँ, यहाँ से निकाल ले जाना तो मेरा काम है। भगवान् की इतनी दया हो जाती, तो मेरी मनो-कामना पूरी हो जाती, घर बस जाता, जिंदगी सुफल हो जाती।

 

सोफिया के चले जाने के बाद विनय के विचार-स्थल में भाँति-भाँति की शंकाएँ होने लगीं। मन एक भीरु शत्राु है, जो सदैव पीठ के पीछे से वार करता है। जब तक सोफी सामने बैठी थी, उसे सामने आने का साहस न हुआ। सोफी के पीठ फेरते ही उसने ताल ठोकनी शुरू की-न जाने मेरी बातों का सोफिया पर क्या असर हुआ। कहीं वह यह तो नहीं समझ गई कि मैंने जीवन-पर्यंत के लिए सेवा-व्रत धाारण कर लिया है। मैं भी कैसा मंद बुध्दि हूँ, उसे माताजी की अप्रसन्नता का भय दिलाने लगा, जैसे भोले-भाले बच्चों की आदत होती है कि प्रत्येक बात पर अम्माँ से कह देने की धामकी देते हैं। जब वह मेरे लिए इतना आत्मबलिदान कर रही है, यहाँ तक कि धार्म के पवित्रा बंधान को भी तोड़ देने के लिए तैयार है, तो उसके सामने मेरा सेवा-व्रत औरर् कत्ताव्य का ढोंग रचना सम्पूर्णत: नीति-विरुध्द है। मुझे वह मन में कितना निष्ठुर, कितना भीरु, कितना हृदय-शून्य समझ रही होगी। माना कि परोपकार आदर्श जीवन है; लेकिन स्वार्थ भी तो सर्वथा त्याज्य नहीं। बड़े-से-बड़ा जाति-भक्त भी स्वार्थ ही की ओर झुकता है। स्वार्थ का एक भाग मिटा देना जाति-सेवा के लिए काफी है। यही प्राकृतिक नियम है। आह! मैंने अपने पाँव में कुल्हाड़ी मारी। वह कितनी गर्वशीला है, फिर भी मेरे लिए उसने क्या-क्या अपमान न सहे! मेरी माता ने उसका जितना अपमान किया,उतना कदाचित् उसकी माता ने किया होता, तो वह उसका मुँह न देखती। मुझे आखिर सूझी क्या! निस्संदेह मैं उसके योग्य नहीं हूँ, उसकी विशाल मनस्विता मुझे भयभीत करती है; पर क्या मेरी भक्ति मेरी त्राुटियों की पूर्ति नहीं कर सकती? जहाँगीर-जैसा आत्म-सेवी, मंद बुध्दि पुरुष अगर नूरजहाँ को प्रसन्न रख सकता है, तो क्या मैं अपने आत्मसमर्पण से, अपने अनुराग से उसे संतुष्ट नहीं कर सकता? कहीं वह मेरी शिथिलता से अप्रसन्न होकर मुझसे सदा के लिए विरक्त न हो जाए! यदि मेरे सेवा-व्रत, मातृभक्ति और संकोच का यह परिणाम हुआ, तो यह जीवन दुस्सह हो जाएगा।

 

आह! कितना अनुपम सौंदर्य है! उच्च शिक्षा और विचार से मुख पर कैसी आधयात्मिक गम्भीरता आ गई है! मालूम होता है, कोई देवी इंद्रलोक से उतर आई है, मानो बहिर्जगत् से उसका कोई सम्बंधा ही नहीं, अंतर्जगत् ही में विचरती है। विचारशीलता स्वाभाविक सौंदर्य को कितना मधाुर बना देती है! विचारोत्कर्ष ही सौंदर्य का वास्तविक शृंगार है। वस्त्रााभूषणों से तो उसकी प्राकृतिक शोभा ही नष्ट हो जाती है, वह कृत्रिाम और वासनामय हो जाता है। टनसहंत शब्द ही इस आशय को व्यक्त कर सकता है। हास्य और मुस्कान में जो अंतर है, धाूप और चाँदनी में जो अंतर है, संगीत और काव्य में जो अंतर है, वही अंतर अलंकृत और परिष्कृत सौंदर्य में है। उसकी मुस्कान कितनी मनोहर है,जैसे बसंत की शीतल वायु, या किसी कवि की अछूती सूझ। यहाँ किसी रूपमयी सुंदरी से बातें करने लगे, तो चित्ता मलिन हो जाता है या तो शीन-काफ ठीक नहीं, या लिंग-भेद का ज्ञान नहीं। सोफी के लिए व्रत, नियम, सिध्दांत की उपेक्षा करना क्षम्य ही नहीं, श्रेयस्कर भी है। यह मेरे लिए जीवन और मरण का प्रश्न है। उसके बगैर मेरा जीवन एक सूखे वृक्ष की भाँति होगा, जिसे जल की अविरत वर्षा भी पल्लवित नहीं कर सकती। मेरे जीवन की उपयोगिता, सार्थकता ही लुप्त हो जाएगी। जीवन रहेगा, पर आनंद-विहीन, प्रेम-विहीन, उद्देश्य-विहीन!

 

विनय इन्हीं विचारों में डूबा हुआ था कि दारोगाजी आकर बैठ गए और बोले-मालूम होता है, अब यह बला सिर से जल्द ही टलेगी। एजेंट साहब यहाँ से कूच करनेवाले हैं। सरदार साहब ने शहर में डौंड़ी फिरवा दी है कि अब किसी को कस्बे से बाहर जाने की जरूरत नहीं। मालूम होता है, मेम साहब ने यह हुक्म दिया है।

 

विनय-मेम साहब बड़ी विचारशील महिला हैं।

 

दारोगा-यह बहुत ही अच्छा हुआ, नहीं तो अवश्य उपद्रव हो जाता और सैकड़ों जानें जातीं। जैसा तुमने कहा, मेम साहब बड़ी विचारशील हैं;हालांकि उम्र अभी कुछ नहीं।

 

विनय-आपको खूब मालूम है कि वह कल यहाँ से चली जाएँगी?

 

दारोगा-हाँ, और क्या सुनी-सुनाई कहता हूँ? हाकिमों की बातों की घंटे-घंटे टोह लगती है। रसद और बेगार, जो एक सप्ताह के लिए ली जानेवाली थी, बंद कर दी गई है।

 

विनय-यहाँ फिर न आएँगी?

 

दारोगा-तुम तो इतने अधाीर हो रहे हो, मानो उन पर आसक्त हो।

 

विनय ने लज्जित होकर कहा-मुझसे उन्होंने कहा था कि कल तुम्हें देखने आऊँगी।

 

दारोगा-कह दिया होगा, पर अब उनकी तैयारी है। यहाँ तो खुश हैं कि बेदाग बच गए, नहीं तो और सभी जगह जेलरों पर जुरमाने किए हैं।

 

दारोगाजी चले गए, तो विनय सोचने लगा-सोफिया ने कल आने का वादा किया था। क्या अपना वादा भूल गई? अब न आएगी? यदि एक बार आ जाती, तो मैं उसके पैरों पर गिरकर कहता, सोफी, मैं अपने होश में नहीं हूँ। देवी अपने उपासक से इसलिए तो अप्रसन्न नहीं होती कि वह उसके चरणों को स्पर्श करते हुए भी झिझकता है। यह तो उपासक की अश्रध्दा का नहीं, असीम श्रध्दा का चिद्द है।

 

ज्यों-ज्यों दिन गुजरता था, विनय की व्यग्रता बढ़ती जाती थी। मगर अपने मन की व्यथा किससे कहे। उसने सोचा-रात को यहाँ से किसी तरह भागकर सोफी के पास जा पहुँचूँ। हा दुर्दैव, वह मेरी मुक्ति का आज्ञा-पत्रा तक लाई थी, उस वक्त मेरे सिर पर न जाने कौन-सा भूत सवार था।

 

सूर्यास्त हो रहा था। विनय सिर झुकाए दफ्तर के सामने टहल रहा था। सहसा उसे धयान आया-क्यों न फिर बेहोशी का बहाना करके गिर पड़ूँ। यहाँ सब लोग घबरा जाएँगे और जरूर सोफी को मेरी खबर मिल जाएगी। अगर उसकी मोटर तैयार होगी, तो एक बार मुझे देखने आ जाएगी। पर यहाँ तो स्वाँग भरना भी नहीं आता। अपने ऊपर खुद ही हँसी आ जाएगी। कहीं हँसी रुक न सकी, तो भद्द हो जाएगी। लोग समझ जाएँगे, बना हुआ है। काश, इतना मूसलाधाार पानी बरस जाता कि वह घर के बाहर निकल ही न सकती। पर कदाचित इंद्र को भी मुझसे बैर है, आकाश पर बादल का कहीं नाम नहीं, मानो किसी हत्यारे का दयाहीन हृदय हो। क्लार्क ही को कुछ हो जाता, तो आज उसका जाना रुक जाता।

 

जब ऍंधोरा हो गया, तो उसे सोफी पर क्रोधा आने लगा-जब आज ही यहाँ से जाना था, तो उसने मुझसे कल आने का वादा ही क्यों किया, मुझसे जान-बूझकर झूठ क्यों बोली? क्या अब कभी मुलाकात ही न होगी; तब पूछूँगा। उसे खुद समझ जाना चाहिए था कि यह इस वक्त अस्थिर चित्ता हो रहा है। उससे मेरे चित्ता की दशा छिपी नहीं है। वह उस अंतर्द्वंद्व को जानती है, जो मेरे हृदय में इतना भीषण रूप धाारण किए हुए है। एक ओर प्रेम और श्रध्दा है, तो दूसरी ओर अपनी प्रतिज्ञा, माता की अप्रसन्नता का भय और लोक-निंदा की लज्जा। इतने विरुध्द भावों के समागम से यदि कोई अनर्गल बातें करने लगे, तो इसमें आश्चर्य ही क्या। उसे इस दशा में मुझसे खिन्न न होना चाहिए था। अपनी प्रेममय सहानुभूति से मेरी हृदयाग्नि को शांत करना चाहिए था। अगर उसकी यही इच्छा है कि मैं इसी दशा में घुल-घुलकर मर जाऊँ, तो यही सही। यह हृदय-दाह जीवन के साथ ही शांत होगा। आह! ये दो दिन कितने आनंद के दिन थे! रात हो रही है, फिर उसी ऍंधोरी, दुर्गंधामय कोठरी में बंद कर दिया जाऊँगा, कौन पूछेगा कि मरते हो या जीते। इस अंधाकार में दीपक की ज्योति दिखाई भी दी, तो जब तक वहाँ पहुँचूँ, नजरों से ओझल हो गई।

 

इतने में दारोगाजी फिर आए। पर अब की वह अकेले न थे, उनके साथ एक पंडितजी भी थे। विनयसिंह को ख्याल आया कि मैंने इन पंडितजी को कहीं देखा है; पर याद न आता था, कहाँ देखा है। दारोगाजी देर तक खड़े पंडितजी से बातें करते रहे। विनयसिंह से कोई न बोला। विनय ने समझा, मुझे धाोखा हुआ, कोई और आदमी होगा। रात को सब कैदी खा-पीकर लेटे। चारों ओर के द्वार बंद कर दिए गए। विनय थराथरा रहा था कि मुझे भी अपनी कोठरी में जाना पड़ेगा; पर न जाने क्याें, उसे वहीं पड़ा रहने दिया गया।

 

रोशनी गुल कर दी गई। चारों ओर सन्नाटा छा गया। विनय उसी उद्विग्न दशा में खड़ा सोच रहा था, कैसे यहाँ से निकलूँ। जानता था कि चारों तरफ से द्वार बंद हैं, न रस्सी है, न कोई यंत्रा, न कोई सहायक, न कोई मित्रा। तिस पर भी यह प्रतीक्षा भाव से द्वार पर खड़ा था कि शायद कोई हिकमत सूझ जाए। निराशा में प्रतीक्षा अंधो की लाठी है।

 

सहसा सामने से एक आदमी आता हुआ दिखाई दिया। विनय ने समझा, कोई चौकीदार होगा। डरा कि मुझे यहाँ खड़ा देखकर कहीं उसके दिल में संदेह न हो जाए। धाीरे-से कमरे की ओर चला। इतना भीरु वह कभी न हुआ था। तोप के सामने खड़ा सिपाही भी बिच्छू को देखकर सशंक हो जाता है।

 

विनय कमरे में गए ही थे कि पीछे से वह आदमी भी अंदर आ पहुँचा। विनय ने चौंककर पूछा-कौन?

 

नायकराम बोले-आपका गुलाम हूँ, नायकराम पंडा!

 

विनय-तम यहाँ कहाँ? अब याद आया, आज तुम्हीं तो दारोगा के साथ पगड़ी बाँधो खड़े थे? ऐसी सूरत बना ली थी कि पहचान ही में न आते थे। तुम यहाँ कैसे आ गए?

 

नायकराम-आप ही के पास तो आया हूँ।

 

विनय-झूठे हो। यहाँ कोई यजमानी है क्या?

 

नायकराम-जजमान कैसे, यहाँ तो मालिक ही हैं।

 

विनय-कब आए, कब? वहाँ तो सब कुशल है?

 

नायकराम-हाँ, सब कुशल ही है। कुँवर साहब ने जब से आपका हाल सुना है, बहुत घबराए हुए हैं, रानीजी बीमार हैं।

 

विनय-अम्माँजी कब से बीमार हैं?

 

नायकराम-कोई एक महीना होने आता है। बस, घुली जाती हैं। न कुछ खाती हैं, न पीती हैं, न किसी से बोलती हैं। न जाने कौन रोग है कि किसी बैद, हकीम, डॉक्टर की समझ ही में नहीं आता। दूर-दूर के डॉक्टर बुलाए गए हैं, पर मरज की थाह किसी को नहीं मिलती। कोई कुछ बताता है, कोई कुछ। कलकत्तो से कोई कविराज आए हैं, वह कहते हैं, अब यह बच नहीं सकतीं। ऐसी घुल गई हैं कि देखते डर लगता है। मुझे देखा, तो धाीरे से बोलीं-पंडाजी, अब डेरा कूच है। अब मैं खड़ा-खड़ा रोता रहा।

 

विनय ने सिसकते हुए कहा-हाय ईश्वर! मुझे माता के चरणों के दर्शन भी न होंगे क्या।

 

नायकराम-मैंने जब बहुत पूछा, सरकार किसी को देखना चाहती हैं, तो ऑंखों में ऑंसू भरकर बोलीं, एक बार विनय को देखना चाहती हूँ,पर भाग्य में देखना बदा नहीं है, न जाने उसका क्या हाल होगा।

 

विनय इतना रोये कि हिचकियाँ बँधा गईं। जब जरा आवाज काबू में हुई, तो बोले-अम्माँजी को कभी किसी ने रोते नहीं देखा था। अब चित्ता व्याकुल हो रहा है। कैसे उनके दर्शन पाऊँगा? भगवान् न जाने किन पापों का यह दंड मुझे दे रहे हैं।

 

नायकराम-मैंने पूछा, हुक्म हो, तो जाकर उन्हें लिवा लाऊँ? इतना सुना था कि वह जल्दी से उठकर बैठ गईं और मेरा हाथ पकड़कर बोलीं-तुम उसे लिवा लाओगे? नहीं, वह न आएगा, वह मुझसे रूठा हुआ है। कभी न आएगा। उसे साथ लाओ, तो तुम्हारा बड़ा उपकार होगा। इतना सुनते ही मैं वहाँ से चल खड़ा हुआ। अब विलम्ब न कीजिए, कहीं ऐसा न हो कि माता की लालसा मन ही में रह जाए, नहीं तो आपको जनम-भर पछताना पडेग़ा।

 

विनय-कैसे चलूँगा।

 

नायकराम-इसकी चिंता मत कीजिए, ले तो मैं चलूँगा। जब यहाँ तक आ गया, तो यहाँ से निकलना क्या मुसकिल है।

 

विनय कुछ सोचकर बोले-पंडाजी, मैं तो चलने को तैयार हूँ; पर भय यही है कि कहीं अम्माँजी नाराज न हो जाएँ, तुम उनके स्वभाव को नहीं जानते।

 

नायकराम-भैया, इसका कोई भय नहीं है। उन्होंने तो कहा है कि जैसे बने, वैसे लाओ। उन्होंने यहाँ तक कहा था कि माफी माँगनी पड़े, तो इस औसर पर माँग लेनी चाहिए।

 

विनय-तो चलो, कैसे चलते हो?

 

नायकराम-दिवाल फांदकर निकल जाएँगे, यह कौन मुसकिल है!

 

विनयसिंह को शंका हुई कि कहीं किसी की निगाह पड़ गई, तो! सोफी यह सुनेगी, तो क्या कहेगी? सब अधिाकारी मुझ पर तालियाँ बजाएँगे। सोफी सोचेगी, बडे सत्यवादी बनते थे, अब वह सत्यवादिता कहाँ गई! किसी तरह सोफी को यह खबर दी जा सकती, तो वह अवश्य आज्ञा-पत्रा भेज देती; पर यह बात नायकराम से कैसे कहूँ।

 

विनय-पकड़े गए, तो!

 

नायकराम-पकड़ेगा कौन? यहाँ कच्ची गोली नहीं खेले हैं। सब आदमियों को पहले ही से गाँठ रखा है।

 

विनय-खूब सोच लो। पकड़े गए, तो फिर किसी तरह न छुटकारा न होगा।

 

नायकराम-पकड़े जाने का तो नाम ही न लो। यह देखो, सामने कई ईंटें दिवाल से मिलाकर रखी हुई हैं। मैंने पहले ही से यह इंतज़ाम कर लिया है। मैं ईंटों पर खड़ा हो जाऊँगा। आप मेरे कंधो पर चढ़कर इस रस्सी को लिए हुए दिवाल पर चढ़ जाइएगा। रस्सी उस तरफ फेंक दीजिएगा। मैं इसे इधार मजबूत पकड़े रहूँगा, आप उधार धाीरे से उतर जाइएगा। फिर वहाँ आप रस्सी को मजबूत पकड़े रहिएगा, मैं भी इधार से चला आऊँगा। रस्सी बड़ी मजबूत है, टूट नहीं सकती। मगर हाँ, छोड़ न दीजिएगा, नहीं तो मेरी हव्ी-पसली टूट जाएगी।

 

यह कहकर नायकराम रस्सी का पुलिंदा लिए हुए ईंटों के पास जाकर खड़े हो गए। विनय भी धाीरे-धाीरे चले। सहसा किसी चीज़ के खटकने की आवाज आई। विनय ने चौंककर कहा-भाई, मैं न जाऊँगा। मुझे यहीं पड़ा रहने दो। माताजी के दर्शन करना मेरे भाग्य में नहीं है।

 

नायकराम-घबराइए मत, कुछ नहीं है।

 

विनय-मेरे तो पैर थरथरा रहे हैं।

 

नायकराम-तो इसी जीवट पर चले थे साँप के मुँह में उँगली डालने? जोखिम के समय पद-सम्मान का विचार नहीं रहता।

 

विनय-तुम मुझे जरूर फँसाओगे।

 

नायकराम-मरद होकर फँसने से इतना डरते हो! फँस ही गए, तो कौन चूड़ियाँ मैली हो जाएँगी! दुसमन की कैद से भागना लज्जा की बात नहीं।

 

यह कहकर वह ईंटों पर खड़ा हो गया और विनय से बोला-मेरे कंधो पर आ जाओ।

 

विनय-कहीं तुम गिर पडे, तो?

 

नायकराम-तुम्हारे जैसे पाँच सवार हो जाएँ, तो लेकर दौड़ईँ। धारम की कमाई में बल होता है।

 

यह कहकर उसने विनय का हाथ पकड़कर उसे अपने कंधो पर ऐसी आसानी से उठा लिया, मानो कोई बच्चा है।

 

विनय-कोई आ रहा है।

 

नायक-आने दो। यह रस्सी कमर में बाँधा लो और दिवाल पकड़कर चढ़ जाओ।

 

अब विनय ने हिम्मत मजबूत की। यही निश्चयात्मक अवसर था। सिर्फ एक छलाँग की जरूरत थी। ऊपर पहुँच गए, तो बेड़ा पार है; न पहुँच सके तो अपमान, लज्जा, दंड सब कुछ है। ऊपर स्वर्ग है, नीचे नरक; ऊपर मोक्ष है, नीचे माया-जाल। दीवार पर चढ़ने में हाथों के सिवा और किसी चीज से मदद न मिल सकती थी। विनय दुर्बल होने पर भी मजबूत आदमी थे। छलाँग मारी और बेड़ा पार हो गया; दीवार पर जा पहुँचे और रस्सी पकड़कर नीचे उतर पड़े। दुर्भाग्य-वश पीछे दीवार से मिली हुई गहरी खाई थी, जिसमें बरसात का पानी भरा हुआ था। विनय ने ज्यों ही रस्सी छोड़ी, गर्दन तक पानी में डूब गए और बड़ी मुश्किल से बाहर निकले। तब रस्सी पकड़कर नायकराम को इशारा किया। वह मँजा हुआ खिलाड़ी था। एक क्षण में नीचे आ पहुँचा। ऐसा जान पड़ता था कि वह दीवार पर बैठा था, केवल उतरने की देर थी।

 

विनय-देखना, खाई है।

 

नायकराम-पहले ही देख चुका हूँ। तुमसे बताने की याद ही न रही।

 

विनय-तुम इस काम में निपुण हो। मैं कभी न निकल सकता। किधार चलोगे?

 

नायकराम-सबसे पहले तो देवी के मंदिर चलूँगा, वहाँ से फिर मोटर पर बैठकर इसटेसन की ओर। ईश्वर ने चाहा, तो आज के तीसरे दिन घर पहुँच जाएँगे। देवी सहाय न होतीं, तो इतनी जल्दी और इतनी आसानी से यह काम न होता। उन्होंने यह संकट हरा। उन्हें अपना खून चढ़ाऊँगा।

 

अब दोनों आजाद थे। विनय को ऐसा मालूम हो रहा था कि मेरे पाँव आप-ही-आप उठे जाते हैं। वे इतने हलके हो गए थे। जरा देर में दोनों आदमी सड़क पर आ गए।

 

विनय-सबेरा होते ही दौड़-धाूप शुरू हो जाएगी।

 

नायकराम-तब तक हम लोग यहाँ से सौ कोस पर होंगे।

 

विनय-घर से भी तो वारंट द्वारा पकड़ मँगा सकते हैं।

 

नायकराम-वहाँ की चिंता मत करो। वह अपना राज है।

 

आज सड़क पर बड़ी हलचल थी। सैकड़ों आदमी लालटेनें लिए कस्बे में छावनी की तरफ जा रहे थे। एक गोल इधार से आता था, दूसरा उधार से। प्राय: लोगों के हाथों मेंं लाठियाँ थीं। विनयसिंह को कुतूहल हुआ, आज यह भीड़-भीड़ कैसी! लोगों पर वह नि:स्तब्धा तत्परता छाई थी, जो किसी भयंकर उद्वेग की सूचक होती है। किंतु किसी से कुछ पूछ न सकते थे कि कहीं वह पहचान न जाए।

 

नायकराम-देवी के मंदिर तक तो पैदल ही चलना पड़ेगा।

 

विनय-पहले इन आदमियों से तो पूछो, कहाँ दौड़े जा रहे हैं। मुझे तो ऐसा मालूम हो रहा है कि कहीं कुछ गड़बड़ हो गई।

 

नायकराम-होगी, हमें इन बातों से क्या मतलब? चलो, अपनी राह चलें।

 

विनय-नहीं-नहीं, जरा पूछो तो क्या बात है?

 

नायकराम ने एक आदमी से पूछा, तो ज्ञात हुआ कि नौ बजे के समय एजेंट साहब अपनी मेम साहब के साथ मोटर पर बैठे हुए बाजार की तरफ से निकले। मोटर बड़ी तेजी से जा रही थी। चौराहे पर पहुँची, तो एक आदमी, जो बाईं ओर से आ रहा था, मोटर से नीचे दब गया। साहब ने आदमी को दबते हुए देखा; पर मोटर को रोका नहीं। यहाँ तक कि कई आदमी मोटर के पीछे दौड़े। बाजार के इस सिरे तक आते-आते मोटर को बहुत-से आदमियों ने घेर लिया। साहब ने आदमियों को डाँटा कि अभी हट जाओ। जब लोग न हटे, तो उन्होंने पिस्तौल चला दी। एक आदमी तुरंत गिर पड़ा। अब लोग क्रोधाोन्माद की दशा में साहब के बँगले पर जा रहे थे।

 

विनय ने पूछा-वहाँ जाने की क्या जरूरत है?

 

एक आदमी-जो कुछ होना है, वह हो जाएगा। यही न होगा, मारे जाएँगे। मारे तो यों ही जा रहे हैं। एक दिन तो मरना है ही। दस-पाँच आदमी मर गए, तो कौन संसार सूना हो जाएगा?

 

विनय के होश उड़ गए। यकीन हो गया कि आज कोई उपद्रव अवश्य होगा। बिगड़ी हुई जनता वह जल-प्रवाह है, जो किसी के रोके नहीं रुकता। ये लोग झल्लाए हुए हैं। इस दशा में इनसे धौर्य और क्षमा की बातें करना व्यर्थ है। कहीं ऐसा न हो कि ये लोग बँगले को घेर लें। सोफिया भी वहीं है। कहीं उस पर आघात कर बैठे। दुरावेश में सौजन्य का नाश हो जाता है। नायकराम से बोले-पंडाजी, जरा बँगले तक होते चलें।

 

नायकराम-किसके बँगले तक?

 

विनय-पोलिटिकल एजेंट के।

 

नायकराम-उनके बँगले पर जाकर क्या कीजिएगा? क्या अभी तक परोपकार से जी नहीं भरा? ये जानें, वह जानें, हमसे-आपसे मतलब?

 

विनय-नहीं मौका नाजुक है, वहाँ जाना जरूरी है।

 

नायकराम-नाहक अपनी जान के दुसमन हुए हो। वहाँ कुछ दंगा हो जाए, तो! मरद हैं ही, चुपचाप खड़े मुँह तो देखा न जाएगा। दो-चार हाथ इधार या उधार चला ही देंगे। बस, धार-पकड़ हो जाएगी। इससे क्या फायदा?

 

विनय-कुछ भी हो, मैं यहाँ यह हंगामा होते देखकर स्टेशन नहीं जा सकता।

 

नायकराम-रानीजी तिल-तिल पर पूछती होंगी।

 

विनय-तो यहाँ कौन हमें दो-चार दिन लग जाते हैं। तुम यहीं ठहरो, मैं अभी आता हूँ।

 

नायकराम-जब तुम्हें कोई भय नहीं है, तो यहाँ कौन रोनेवाला बैठा हुआ है। मैं आगे-आगे चलता हूँ। देखना, साथ न छोड़ना। यह ले लो,जोखिम का मामला है। मेरे लिए यह लकड़ी काफी है।

 

यह कहकर नायकराम ने एक दो नलीवाली पिस्तौल कमर से निकालकर विनय के हाथ में रख दी। विनय पिस्तौल लिए हुए आगे बढ़ा। जब राजभवन के निकट पहुँचे, तो इतनी भीड़ देखी कि एक-एक कदम चलना मुश्किल हो गया, और भवन से एक गोली के टप्पे पर तो उन्हें विवश होकर रुकना पड़ा। सिर-ही-सिर दिखाई देते थे। राजभवन के सामने एक बिजली की लालटेन जल रही थी और उसके उज्ज्वल प्रकाश में हिलता, मचलता, रुकता, ठिठकता हुआ जन-प्रवाह इस तरह भवन की ओर चला रहा था, मानो उसे निगल जाएगा। भवन के सामने, इस प्रवाह को रोकने के लिए, वरदीपोश सिपाहियों की एक कतार, संगीनें चढ़ाए, चुपचाप खड़ी थी और ऊँचे चबूतरे पर खड़ी होकर सोफी कुछ कह रही थी; पर इस हुल्लड़ में उसकी आवाज सुनाई न देती थी। ऐसा मालूम होता था कि किसी विदुषी की मूर्ति है, जो कुछ कहने का संकेत कर रही है।

 

सहसा सोफिया ने दोनों हाथ ऊपर उठाए। चाराेंं ओर सन्नाटा छा गया। सोफी ने उच्च और कम्पित स्वर में कहा-मैं अंतिम बार तुम्हें चेतावनी देती हूँ कि यहाँ से शांति के साथ चले जाओ, नहीं तो सैनिकों को विवश होकर गोली चलानी पड़ेगी एक क्षण के अंदर यह मैदान साफ हो जाना चाहिए।

 

वीरपालसिंह ने सामने आकर कहा-प्रजा अब ऐसे अत्याचार नहीं सह सकती।

 

सोफी-अगर लोग सावधाानी से रास्ता चलें, तो ऐसी दुर्घटना क्यों हो!

 

वीरपाल-मोटरवालों के लिए भी कोई कानून है या नहीं?

 

सोफी-उनके लिए कानून बनाना तुम्हारे अधिाकार में नहीं है।

 

वीरपाल-हम कानून नहीं बना सकते, पर अपनी प्राण-रक्षा तो कर सकते हैं?

 

सोफी-तुम विद्रोह करना चाहते हो और उसके कुफल का भार तुम्हारे सिर पर होगा।

 

वीरपाल-हम विद्रोही नहीं हैं, मगर यह नहीं हो सकता कि हमारा एक भाई किसी मोटर के नीचे दब जाए, चाहे वह मोटर महारानी ही की क्यों न हो, और हम मुँह न खोलें।

 

सोफी-वह संयोग था।

 

वीरपाल-सावधाानी उस संयोग को टाल सकती थी। अब हम उस वक्त तक यहाँ से न जाएँगे, जब तक हमें वचन न दिया जाएगा कि भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं के लिए अपराधाी को उचित दंड मिलेगा, चाहे वह कोई हो।

 

सोफी-संयोग के लिए कोई वचन नहीं दिया जा सकता। लेकिन…

 

सोफी कुछ और कहना चाहती थी कि किसी ने एक पत्थर उसकी तरफ फेंका, जो उसके सिर में इतनी जोर से लगा कि वह वहीं सिर थामकर बैठ गई। यदि विनय तत्क्षण किसी ऊँचे स्थान पर खड़े होकर जनता को आश्वासन देते, तो कदाचित् उपद्रव न होता, लोग शांत होकर चले जाते। सोफी का जख्मी हो जाना जनता का क्रोधा शांत करने को काफी न था। किंतु जो पत्थर सोफी के सिर में लगा, वही कई गुने आघात के साथ विनय के हृदय में लगा। उसकी ऑंखों में खून उतर आया, आपे से बाहर हो गया। भीड़ को बलपूर्वक हटाता, आदमियों को ढकेलता, कुचलता सोफी के बगल में जा पहुँचा, पिस्तौल कमर से निकाली और वीरपालसिंह पर गोली चला दी। फिर क्या था, सैनिकों को मानो हुक्म मिल गया, उन्होंने बंदूकें छोड़नी शुरू कीं। कुहराम मच गया, लेकिन फिर भी कई मिनट तक लोग वहीं खड़े गोलियों का जवाब ईंट-पत्थर से देते रहे। दो-चार बंदूकें इधार से भी चलीं। वीरपाल बाल-बाल बच गया और विनय को निकट होने के कारण पहचानकर बोला-आप भी उन्हीं में हैं?

 

विनय-हत्यारा!

 

वीरपाल-परमात्मा हमसे फिर गया है।

 

विनय-तुम्हें एक स्त्राी पर हाथ उठाते लज्जा नहीं आती?

 

चारों तरफ से आवाजें आने लगीं-विनयसिंह हैं, यह कहाँ से आ गए, यह भी उधार मिल गए, इन्हीं ने तो पिस्तौल छोड़ी है!

 

‘शायद शर्त पर छोड़े गए हैं।’

 

‘धान की लालसा सिर पर सवार है।’

 

‘मार दो एक पत्थर, सिर फट जाए, यह भी हमारा दुश्मन है।’

 

‘दगाबाज है।’

 

‘इतना बड़ा आदमी और थोड़े-से धान के लिए ईमान बेच बैठा।’

 

बंदूकों के सामने निहत्थे लोग कब तक ठहरते! जब कई आदमी अपने पक्ष के लगातार गिरे, तो भगदड़ गच गई; कोई इधार भागा, कोई उधार। मगर वीरपालसिंह और उसके साथ के पाँचों सवार, जिनके हाथों में बंदूकें थीं, राजभवन के पीछे की ओर से विनयसिंह के सिर पर आ पहुँचे। ऍंधोरे में किसी की निगाह उन पर न पड़ी। विनय ने पीछे की तरफ घोड़ों की टाप सुनी, तो चौंके, पिस्तौल चलाई, पर वह खाली थी।

 

वीरपाल ने व्यंग करके कहा-आप तो प्रजा के मित्रा बनते थे?

 

तुम जैसे हत्यारों की सहायता करना मेरा नियम नहीं है।

 

वीरपाल-मगर हम उससे अच्छे हैं, जो प्रजा की गरदन पर अधिाकारियों से मिलकर छुरी चलाए।

 

विनय क्रोधावेश में बाज की तरह झपटे कि उसके हाथ से बंदूक छीन लें, किंतु वीरपाल के एक सहयोगी ने झपटकर विनयसिंह को नीचे गिरा दिया, दूसरा साथी तलवार लेकर उसी तरफ लपका ही था कि सोफी, जो अब तक चेतना-शून्य दशा में भूमि पर पड़ी थी, चीख मारकर उठी और विनयसिंह से लिपट गई। तलवार अपने लक्ष्य पर न पहुँचकर सोफी के माथे पर पड़ी। इतने में नायकराम लाठी लिए हुए आ पहुँचा और लाठियाँ चलाने लगा। दो विद्रोही आहत होकर गिर पड़े। वीरपाल अब तक हतबुध्दि की भाँति खड़ा था। न उसे ज्ञात था कि सोफी को पत्थर किसने मारा; न उसने अपने सहयोगियों ही को विनय पर आघात करने के लिए कहा था। यह सब कुछ उसकी ऑंखों के सामने, पर उसकी इच्छा के विरुध्द हो रहा था। पर अब अपने साथियों को देखकर वह तटस्थ न रह सका। उसने बंदूक का क्ुं+दा तौलकर इतनी जोर से नायकराम के सिर में मारा कि उसका सिर फट गया और एक पल में उसके तीनों साथी अपने आहत साथियों को लेकर भाग निकले। विनयसिंह सँभलकर उठे, तो देखा कि बगल में नायकराम खून से तर अचेत पड़ा है और सोफी का कहीं पता नहीं। उसे कौन ले गया, क्यों ले गया, कैसे ले गया, इसकी उन्हें खबर न थी।

 

मैदान में एक आदमी भी न था। दो-चार लाशें अलबत्ताा इधार-उधार पड़ी हुई थीं।

 

मिस्टर क्लार्क कहाँ थे? तूफान उठा और गया, आग लगी और बुझी, पर उनका कहीं पता तक नहीं। वह शराब के नशे में मस्त, दीन-दुनिया से बेखबर, अपने शयनागार में पड़े हुए थे। विद्रोहियों का शोर सुनकर सोफी भवन से बाहर निकल आई थी। मिस्टर क्लार्क को इसलिए जगाने की चेष्टा न की थी कि उनके आने से रक्तपात का भय था। उसने शांत उपायों से शांति-रक्षा करनी चाही थी कि उसी का यह फल था। वह पहले सतर्क हो जाती, तो कदाचित् स्थिति इतनी भयावह न होने पाती।

 

विनय ने नायकराम को देखा। नाड़ी का पता न था, ऑंखें पथरा गई थीं। चिंता शोक और पश्चात्तााप से चित्ता इतना विकल हुआ कि वह रो पड़े। चिंता थी माता की, उसके दर्शन भी न करने पाया; शोक था सोफिया का, न जाने उसे कौन ले गया; पश्चात्तााप था अपनी क्रोधाशीलता पर कि मैं ही इस सारे विद्रोह और रक्तपात का कारण हूँ। अगर मैंने वीरपाल पर पिस्तौल न चलाई होती, तो यह उपद्रव शांत हो जाता।

 

आकाश में श्यामल घन-घटा छाई हुई थी, पर विनय के हृदयाकाश पर छाई हुई शोक-घटा उससे कहीं घनघोर, अपार और असूझ थी।

 

 

मिस्टर विलियम क्लार्क अपने अन्य स्वदेश-बंधाुओं की भाँति सुरापान के भक्त थे, पर उसके वशीभूत न थे। वह भारतवासियों की भाँति पीकर छकना न जानते थे। घोड़े पर सवार होना जानते थे, उसे काबू से बाहर न होने देते थे। पर आज सोफी ने जान-बूझकर उन्हें मात्राा से अधिाक पिला दी थी, बढ़ावा देती जाती थी-वाह! इतनी ही, एक ग्लास तो और लो। अच्छा, यह मेरी खतिर से, वाह! अभी तुमने मेरे स्वास्थ्य का प्याला तो पिया ही नहीं। सोफी ने विनय से कल मिलने का वादा किया था, पर उनकी बातें उसे एक क्षण के लिए भी चैन न लेने देती थीं। वह सोचती थी-विनय ने आज ये नए बहाने क्यों ढूँढ़ निकाले? मैंने उनके लिए धार्म की भी परवा न की, फिर भी वह मुझसे भागने की चेष्टा कर रहे हैं। अब मेरे पास और कौन-सा उपाय है? क्या प्रेम का देवता इतना पाषाण हृदय है, क्या, वह बड़ी-से-बड़ी पूजा पाकर भी प्रसन्न नहीं होता? माता की अप्रसन्नता का इतना भय उन्हें कभी न था। कुछ नहीं, अब उनका प्रेम शिथिल हो गया है। पुरुषों का चित्ता चंचल होता है, उसका एक और प्रमाण मिल गया। अपनी अयोग्यता का कथन उनके मुँह से कितना अस्वाभाविक मालूम होता है। वह जो इतने उदार,इतने विरक्त, इतने सत्यवादी, इतनेर् कत्ताव्यनिष्ठ हैं, मुझसे कहते हैं, मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूँ! हाय! वह क्या जानते हैं कि मैं उनसे कितनी भक्ति रखती हूँ, मैं इस योग्य भी नहीं कि उनके चरण स्पर्श करूँ। कितनी पवित्रा आत्मा है, कितने उज्ज्वल विचार, कितना आलौकिक आत्मोत्सर्ग! नहीं, वह मुझसे दूर रहने ही के लिए ये बहाने कर रहे हैं। उन्हें भय है कि मैं उनके पैरों की जंजीर बन जाऊँगी, उन्हेंर् कत्ताव्य-मार्ग से हटा दूँगी, उनको आदर्श से विमुख कर दूँगी। मैं उनकी इस शंका का कैसे निवारण करूँ?

 

दिन-भर इन्हीं विचाराें में व्यग्र रहने के बाद संधया को वह इतनी व्याकुल हुई कि उसने रात ही को विनय से फिर मिलने का निश्चय किया। उसने क्लार्क को शराब पिलाकर इसीलिए अचेत कर दिया कि उसे किसी प्रकार का संदेह न हो। जेल के अधिाकारियों से उसे कोई भय न था। वह इस अवसर को विनय से अनुनय-विनय करने में, उनके प्रेम को जगाने में, उनकी शंकाओं को शांत करने में लगाना चाहती थी;पर उसका यह प्रयास उसी के लिए घातक सिध्द हुआ। मिस्टर क्लार्क मौके पर पहुँच सकते, तो शायद स्थिति इतनी भयंकर न होती, कम-से-कम सोफी को ये दुर्दिन न देखने पड़ते। क्लार्क अपने प्राणों से उसकी रक्षा करते। सोफी ने उनसे दगा करके अपना ही सर्वनाश कर लिया था। अब वह न जाने कहाँ और किस दशा में थी। प्राय: लोगों का विचार था कि विद्रोहियों ने उसकी हत्या कर डाली और उसके शव को आभूषणों के लोभ से अपने साथ ले गए। केवल विनयसिंह इस विचार से सहमत न थे। उन्हें विश्वास था कि सोफी अभी जिंदा है। विद्रोहियों ने जमानत के तौर पर उसे अपने यहाँ कैद कर रखा है, जिसमें संधिा की शतर्ें तय करने में सुविधाा हो। सोफी रियासत को दबाने के लिए उनके हाथों में एक यंत्रा के समान थी।

 

इस दुर्घटना से रियासत में तहलका मच गया। अधिाकारी वर्ग आपक्+ो डरते थे, प्रजा आपको। अगर रियासत के कर्मचारियों ही तक बात रहती, तो विशेष चिंता की बात न थी, रियासत खून के बदले खून लेकर संतुष्ट हो जाती, ज्यादा-से-ज्यादा एक जगह चार का खून कर डालती। पर सोफी के बीच में पड़ जाने से समस्या जटिल हो गई थी, मुआमला रियासत के अधिाकार-क्षेत्रा के बाहर पहुँच गया था, यहाँ तक कि लोगों को भय था, रियासत पर कोई जवाल न आ जाए। इसलिए अपराधिायों की पकड़-धाकड़ में असाधाारण तत्परता से काम लिया जा रहा था। संदेहमात्रा में लोग फाँस दिए जाते थे और उनको कठोरतम यातनाएँ दी जाती थीं। साक्षी और प्रमाण की कोई मर्यादा न रह गई थी। इन अपराधिायों के भाग्य-निर्णय के लिए एक अलग न्यायालय खोल दिया गया था। उसमें मँजे हुए प्रजा-द्रोहियों को छाँट-छाँटकर नियुक्त किया गया था। यह अदालत किसी को छोड़ना न जानती थी। किसी अभियुक्त को प्राण-दंड देने के लिए एक सिपाही की शहादत काफी थी। सरदार नीलकंठ बिना अन्न-जल, दिन-के-दिन विद्रोहियों की खोज लगाने में व्यस्त रहते थे। यहाँ तक कि हिज हाइनेस महाराजा साहब स्वयं शिमला, दिल्ली और उदयपुर एक किए हुए थे। पुलिस-कर्मचारियों के नाम रोज ताकिदें भेजी जाती थीं। उधार शिमला से भी ताकीदों का ताँता बँधाा हुआ था। ताकीदों के बाद धामकियाँ आने लगीं। उसी अनुपात में यहाँ प्रजा पर भी उत्तारोत्तार अत्याचार बढ़ता जाता था। मि. क्लार्क को निश्चय था कि इस विद्रोह में रियासत का हाथ भी अवश्य था। अगर रियासत ने पहले ही से विद्रोहियों का जीवन कठिन कर दिया होता, तो वे कदापि इस भाँति सिर न उठा सकते। रियासत के बड़े-बड़े अधिाकारी भी उनके सामने जाते काँपते थे। वह दौरे पर निकलते, तो एक ऍंगरेजी रिसाला साथ ले लेते और इलाके-के-इलाके उजड़वा देते, गाँव-के-गाँव तबाह करवा देते, यहाँ तक कि स्त्रिायाेंं पर भी अत्याचार होता। और, सबसे अधिाक खेद की बात यह थी कि रियासत और क्लार्क के इन सारे दुष्कृत्यों में विनय भी मनसा-वाचा-कर्मणा सहयोग करते थे। वास्तव में उन पर प्रमाद का रंग छाया हुआ था। सेवा और उपकार के भाव हृदय से सम्पूर्णत: मिट गए थे। सोफी और उसके शत्राुओं का पता लगाने का उद्योग, यही एक काम उनके लिए रह गया था। मुझे दुनिया क्या कहती है, मेरे जीवन का क्या उद्देश्य है,माताजी का क्या हाल हुआ, इन बातों की ओर अब उनका धयान ही न जाता था। अब तो वह रियासत के दाहिने हाथ बने हुए थे। अधिाकारी समय-समय पर उन्हें और भी उत्तोजित करते रहते थे। विद्रोहियों के दमन में कोई पुलिस का कर्मचारी, रिसायत का कोई नौकर इतना हृदयहीन, विचारहीन, न्यायहीन न बन सकता था। उनकी राज-भक्ति का पारावार न था, या यों कहिए कि इस समय वह रियासत के कर्णधाार बन हुए थे, यहाँ तक कि सरदार नीलकंठ भी उनसे दबते थे। महाराजा साहब को उन पर इतना विश्वास हो गया था कि उनसे सलाह लिए बिना कोई काम न करते। उनके लिए आने-जाने की कोई रोक-टोक न थी। और मि. क्लार्क से तो उनकी दाँतकाटी रोटी थी। दोनों एक ही बँगले में रहते थे और अंतरंग में सरदार साहब की जगह पर विनय की नियुक्ति की चर्चा की जाने लगी थी।

 

प्राय: साल-भर तक रियासत में यही आपाधाापी रही। जब जसवंतनगर विद्रोहियों से पाक हो गया, अर्थात् वहाँ कोई जवान आदमी न रहा,तो विनय ने स्वयं को सोफी का सुराग लगाने के लिए कमर बाँधाी। उनकी सहायता के लिए गुप्त पुलिस के कई अनुभवी आदमी तैनात किए गए। चलने की तैयारियाँ होने लगीं। नायकराम अभी तक कमजोर थे। उनके बचने की आशा ही न रही थी; पर जिंदगी बाकी थी, बच गए। उन्होंने विनय को जाने पर तैयार देखा, तो साथ चलने को निश्चय किया। आकर बोले-भैया, मुझे भी साथ ले चलो, मैं यहाँ अकेला न रहूँगा।

 

विनय-मैं कहीं परदेश थोड़े ही जाता हूँ। सातवेंं दिन यहाँ आया करूँगा, तुमसे मुलाकात हो जाएगी।

 

सरदार नीलकंठ वहीं बैठे हुए थे बोले- अभी तुम जाने के लायक नहीं हो।

 

नायकराम-सरदार साहब, आप भी इन्हीं की-सी कहते हैं। इनके साथ न रहूँगा, तो रानीजी को कौन मुँह दिखाऊँगा!

 

विनय-तुम यहाँ ज्यादा आराम से रह सकोगे, तुम्हारे ही भले की कहता हूँ।

 

नायकराम-सरदार साहब, अब आप ही भैया को समझाइए। आदमी एक घड़ी की नहीं चलाता, तो एक हफ्ता तो बहुत है। फिर मोरचा लेना है वीरपालसिंह से, जिसका लोहा मैं भी मानता हूँ। मेरी कई लाठियाँ उसने ऐसी रोक लीं कि एक भी पड़ जाती, तो काम तमाम हो जाता। पक्का फेकैत। क्या मेरी जान तुम्हारी जान से प्यारी है?

 

नीलकंठ-हाँ, वीरपाल है तो एक शैतान। न जाने कब, किधार से, कितने आदमियों के साथ टूट पड़े। उसके गोइंदे सारी रियासत में फैले हुए हैं।

 

नायकराम-तो ऐसे जोखिम में कैसे इनका साथ छोड़ दूँ? मालिक की चाकरी में जान भी निकल जाए, तो क्या गम है, और यह जिंदगानी किसलिए!

 

विनय-भाई; बात यह है कि मैं अपने साथ किसी गैर की जान जोखिम में नहीं डालना चाहता।

 

नायकराम-हाँ, अब आप मुझे गैर समझते हैं, तो दूसरी बात है। हाँ, गैर तो हूँ ही; गैर न होता, तो रानीजी के इशारे पर कैसे यहाँ दौड़ा आता, जेल में जाकर कैसे बाहर निकाल लाता और साल-भर तक खाट क्यों सेता? सरदार साहब, हुजूर ही अब इंसाफ कीजिए। मैं गैर हूँ?जिसके लिए जान हथेली पर लिए फिरता हूँ, वही गैर समझता है।

 

नीलकंठ-विनयसिंह, यह आपका अन्याय है। आप इन्हें गैर क्यों कहते हैं? अपने हितैषियों को गैर कहने से उन्हें दु:ख होता है।

 

नायकराम- बस, सरदार साहब, हुजूर ने लाख रुपये की बात कह दी। पुलिस के आदमी गैर नहीं हैं और मैं गैर हूँ!

 

विनय-अगर गैर कहने से तुम्हेंं दु:ख होता है, तो मैं यह शब्द वापस लेता हूँ! मैंने गैर केवल इस विचार से कहा था कि तुम्हारे सम्बंधा में मुझे घरवालों को जवाब देना पडेग़ा। पुलिसवालों के लिए तो मुझसे कोई जवाब न माँगेगा।

 

नायकराम-सरदार साहब, अब आप ही इसका जवाब दीजिए। यह मैं कैसे कहूँ कि मुझसे कुछ हो गया, तो कुँवर साहब कुछ पूछ-ताछ न करेंगे, उनका भेजा हुआ आया ही हूँ। भैया को जवाबदेही तो जरूर करनी पड़ेगी।

 

नीलकंठ-यह माना कि तुम उनके भेजे हुए आए हो; मगर तुम इतने अबोधा नहीं हो कि तुम्हारी हानि-लाभ की जिम्मेदारी विनयसिंह के सिर हो। तुम अपना अच्छा-बुरा आप सोच सकते हो। क्या कुँवर साहब इतना भी न समझेंगे?

 

नायकराम-अब कहिए धार्मावतार, अब तो मुझे ले चलना पड़ेगा, सरदार साहब ने मेरी डिग्री कर दी। मैं कोई नाबालिग नहीं हूँ कि सरकार के सामने आपको जवाब देना पड़े।

 

अंत में विनय ने नायकराम को साथ ले चलना स्वीकार किया और दो-तीन दिन पश्चात् दस आदमियों की एक टोली, भेष बदलकर, सब तरह लैस होकर, टोहिए कुत्ताों के साथ लिए, दुर्गम पर्वतों में दाखिल हुई। पहाड़ोेंं से आग निकल रही थी। बहुधाा कोसों तक पानी की एक बूँद भी न मिलती; रास्ते पथरीले, वृक्षों का पता नहीं। दोपहर को लोग गुफाओं में विश्राम करते थे, रात को बस्ती से अलग किसी चौपाल या मंदिर में पड़े रहते। दो-दो आदमियों का संग था। चौबीस घंटाेंं में एक बार सब आदमियों को एक स्थान पर जमा होना पड़ता था। दूसरे दिन का कार्यक्रम निश्चय करके लोग फिर अलग-अलग हो जाते थे। नायकराम और विनयसिंह की एक जोड़ी थी। नायकराम अभी तक चलने-फिरने में कमजोर था, पहाड़ाेंं की चढ़ाई में थककर बैठ जाता, भोजन की मात्राा भी बहुत कम हो गई थी, दुर्बल इतना हो गया था कि पहचानना कठिन था। किंतु विनयसिंह पर प्राणों को न्योछावर करने को तैयार रहता था। यह जानता था कि ग्रामीणों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, विविधा स्वभाव और श्रेणी के मनुष्यों से परिचित था। जिस गाँव में पहुँचता, धाूम मच जाती कि काशी के पंडाजी पधाारे हैं। भक्तजन जमा हो जाते, नाई-कहार आ पहुँचते, दूधा-घी, फल-फूल, शाक-भाजी आदि की रेल-पेल हो जाती। किसी मंदिर के चबूतरे पर खाट पड़ जाती, बाल-वृध्द, नर-नारी बेधाड़क पंडाजी के पास आते और यथाशक्ति दक्षिणा देते। पंडाजी बातों-बातों में उनसे गाँव का समाचार पूछ लेते। विनयसिंह को अब ज्ञात हुआ कि नायकराम साथ न होते, तो मुझे कितने कष्ट झेलने पड़ते। वह स्वभाव से मितभाषी, संकोचशील,गम्भीर आदमी थे। उनमें वह शासन-बुध्दि न थी, जो जनता पर आतंक जमा लेती है, न वह मधाुर वाणी, जो मन को मोहती है। ऐसी दशा में नायकराम का संग उनके लिए दैवी सहायता से कम न था।

 

रास्ते में कभी-कभी हिंसक जंतुओं से मुठभेड़ हो जाती। ऐसे अवसरों पर नायकराम सीनासिपर हो जाता था। एक दिन चलते-चलते दोपहर हो गया। दूर तक आबादी का कोई निशान न था। धाूप की प्रखरता से एक-एक पग चलना मुश्किल था। कोई कुऑं या तालाब भी नजर न आता था। सहसा एक ऊँचा टीकरा दिखाई दिया। नायकराम उस पर चढ़ गया कि शायद ऊपर से कोई गाँव या कुऑं दिखाई दे। उसने शिखर पर पहुँचकर इधार-उधार निगाह दौड़ाई, तो दूर पर एक आदमी जाता हुआ दिखाई दिया। उसके हाथ में एक लकड़ी और पीठ पर एक थैली थी। कोई बिना वर्दी का सिपाही मालूम होता था। नायकराम ने उसे कोई बार जोर-जोर से पुकारा, तो उसने गर्दन फेरकर देखा। नायकराम उसे पहचान गए। यह विनयसिंह के साथ का एक स्वयंसेवक था। उसे इशारे से बुलाया और टीले से उतरकर उसके पास आए। इस सेवक का नाम इंद्रदत्ता था।

 

इंद्रदत्ता ने पूछा-तुम यहाँ कैसे आ फँसे जी? तुम्हारे कुँवर कहाँ हैं?

 

नायकराम-पहले यह बताओ कि यहाँ कोई गाँव भी है, कहीं दाना-पानी मिल सकता है?

 

इंद्रदत्ता-जिसके राम धानी, उसे कौन कमी! क्या राजदरबार ने भोजन की रसद नहीं लगाई? तेली से ब्याह करके तेल का रोना!

 

नायकराम-क्या करूँ, बुरा फँस गया हूँ, न रहते बनता है, न जाते।

 

इंद्रदत्ता-उनके साथ तुम भी अपनी मिट्टी खराब कर रहे हो। कहाँ हैं आजकल?

 

नायकराम-क्या करोगे?

 

इंद्रदत्ता-कुछ नहीं, जरा मिलना चाहता था।

 

नायकराम-हैं तो वह भी। यहीं भेंट जो जाएगी। थैली में कुछ है?

 

यों बातें करते हुए दोनों विनयसिंह के पास पहुँचे। विनय ने इंद्रदत्ता को देखा, तो शत्राु-भाव से बोला-इंद्रदत्ता, तुम कहाँ? घर क्यों नहीं गए?

 

इंद्रदत्ता-आपसे मिलने की बड़ी आकांक्षा थी। आपसे कितनी ही बातें करनी हैं। पहले यह बतलाइए कि आपने यह चोला क्यों बदला?

 

नायकराम-पहले तुम अपनी थैली में से कुछ निकालो, फिर बातें होंगी।

 

विनयसिंह अपनी कायापलट का समर्थन करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। बोले-इसलिए कि मुझे अपनी भूल मालूम हो गई। मैं पहले समझता था कि प्रजा बड़ी सहनशील और शांतिप्रिय है। अब ज्ञात हुआ कि वह नीच और कुटिल है। उसे ज्यों ही अपनी शक्ति का कुछ ज्ञान हो जाता है, वह उसका दुरुपयोग करने लगती है। जो प्राणी शक्ति का संचार होते ही उन्मत्ता हो जाए, उसका अशक्त, दलित रहना ही अच्छा है। गत विद्रोह इसका ज्वलंत प्रमाण है। ऐसी दशा में मैंने जो कुछ किया और कर रहा हूँ, वह सर्वथा न्यायसंगत और स्वाभाविक है।

 

इंद्रदत्ता-क्या आपके विचार में प्रजा को चाहिए कि उस पर कितने ही अत्याचार किए जाएँ, वह मुँह न खोले?

 

विनय-हाँ, वर्तमान दशा में यही उसका धार्म है।

 

इंद्रदत्ता-उसके नेताओं को भी यही आदर्श उसके सामने रखना चाहिए?

 

विनय-अवश्य!

 

इंद्रदत्ता-तो जब आपने जनता को विद्रोह के लिए तैयार देखा, तो उसके सम्मुख खड़े होकर धौर्य और शांति का उपदेश क्यों नहीं दिया?

 

विनय-व्यर्थ था। उस वक्त कोई मेरी न सुनता।

 

इंद्रदत्ता-अगर न सुनता, तो क्या आपका यह धार्म नहीं था कि दोनों दलों के बीच में खड़े होकर पहले खुद गोली का निशाना बनते?

 

विनय-मैं अपने जीवन को इतना तुच्छ नहीं समझता।

 

इंद्रदत्ता-जो जीवन सेवा और परोपकार के लिए समर्पण हो चुका हो, उसके लिए इससे उत्ताम और कौन मृत्यु हो सकती थी?

 

विनय-आग में कूदने का नाम सेवा नहीं है। उसे दमन करना ही सेवा है।

 

इंद्रदत्ता-अगर वह सेवा नहीं है, तो दीन जनता की, अपनी कामुकता पर आहुति देना भी सेवा नहीं है। बहुत सम्भव था कि सोफिया ने अपनी दलीलों से वीरपालसिंह को निरुत्तार कर दिया होता। किंतु आपने विषय के वशीभूत होकर पिस्तौल का पहला वार किया, और इसलिए इस हत्याकांड का सारा भार आपकी ही गरदन पर है और जल्द या देर में आपको इसका प्रायश्चित्ता करना पड़ेगा। आप जानते हैं, प्रजा को आपके नाम से कितनी घृणा है? अगर कोई आदमी आपको यहाँ देखकर पहचान जाए, तो उसका पहला काम यह होगा कि आपके ऊपर तीर चलाए। आपने यहाँ की जनता के साथ, अपने सहयोगियों के साथ, अपनी जाति के साथ और सबसे अधिाक अपनी पूज्य माता के साथ जो कुटिल विश्वासघात किया है, उसका कलंक कभी आपके माथे से न मिटेगा। कदाचित् रानीजी आपको देखें, तो अपने हाथों से आपकी गरदन पर कटार चला दें। आपके जीवन से मुझे यह अनुभव हुआ कि मनुष्य का कितना नैतिक पतन हो सकता है।

 

विनय ने कुछ नम्र होकर कहा-इंद्रदत्ता, अगर तुम समझते हो कि मैंने स्वार्थवश अधिाकारियों की सहायता की, तो तुम मुझ पर घोर अन्याय कर रहे हो। प्रजा का साथ देने में जितनी आसानी से यश प्राप्त होता है, उससे कहीं अधिाक आसानी से अधिाकारियों का साथ देने में अपयश मिलता है। यह मैं जानता था। किंतु सेवक का धार्म यश और अपयश का विचार करना नहीं है, उसका धार्म सन्मार्ग पर चलना है। मैंने सेवा का व्रत धाारण किया है, और ईश्वर न करे कि वह दिन देखने के लिए जीवित रहूँ, जब मेरे सेवाभाव में स्वार्थ का समावेश हो। पर इसका आशय यह नहीं है कि मैं जनता का अनौचित्य देखकर भी उसका समर्थन करूँ। मेरा व्रत मेरे विवेक की हत्या नहीं कर सकता।

 

इंद्रदत्ता-कम-से-कम इतना तो आप मानते ही हैं कि स्वहित के लिए जनता का अहित न करना चाहिए।

 

विनय-जो प्राणी इतना न माने, वह मनुष्य कहलाने योग्य नहीं है।

 

इंद्रदत्ता-क्या आपने केवल सोफिया के लिए रियासत की समस्त प्रजा को विपत्तिा में नहीं डाला और अब भी उसका सर्वनाश करने की धाुन में नहीं हैं?

 

विनय-तुम मुझ पर यह मिथ्या दोषारोपण करते हो। मैं जनता के लिए सत्य से मुँह नहीं मोड़ सकता। सत्य मुझे देश और जाति, दोनों से प्रिय है। जब तक मैं समझता था कि प्रजा सत्य-पक्ष पर है, मैं उसकी रक्षा करता था। जब मुझे विदित हुआ कि उसने सत्य से मुँह मोड़ लिया, मैंने भी उससे मुँह मोड़ लिया। मुझे रियासत के अधिाकारियों से कोई आंतरिक विरोधा नहीं है। मैं वह आदमी नहीं हूँ कि हुक्काम को न्याय पर देखकर भी अनायास उनसे बैर करूँ, और न मुझसे यह हो सकता है कि प्रजा का विद्रोह और दुराग्रह पर तत्पर देखकर भी उसकी हिमायत करूँ। अगर कोई आदमी मिस सोफिया की मोटर के नीचे दब गया तो यह एक आकस्मिक घटना थी। सोफिया ने जान-बूझकर तो उस पर से मोटर को चला नहीं दिया। ऐसी दशा में जनता का उस भाँति उत्तोजित हो जाना, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण था कि वह अधिाकारियों को बलपूर्वक अपने वश में करना चाहती है। आप सोफिया के प्रति मेरे आचरण पर आक्षेप करके मुझ पर ही अन्याय नहीं कर रहे हैं, वरन् अपनी आत्मा को भी कलंकित कर रहे हैं।

 

इंद्रदत्ता-ये हजारों आदमी निरपराधा क्यों मारे गए? क्या यह भी प्रजा ही का कसूर था?

 

विनय-यदि आपको अधिाकारियों की कठिनाइयों का कुछ अनुभव होता, तो आप मुझसे कदापि यह प्रश्न न करते। इसके लिए आप क्षमा के पात्रा हैं। साल-भर पहले जब अधिाकारियों से मेरा कोई सम्बंधा न था, कदाचित् मैं भी ऐसा ही समझता था। किंतु अब मुझे अनुभव हुआ कि उन्हें ऐसे अवसरों पर न्याय का पालन करने में कितनी कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती है। मैं यह स्वीकार नहीं करता कि अधिाकार पाते ही मनुष्य का रूपांतर हो जाता है। मनुष्य स्वभावत: न्याय-प्रिय होता है। उसे किसी को बरबस कष्ट देने से आनंद नहीं मिलता, बल्कि उतना ही दु:ख और क्षोभ होता है, जितना किसी प्रजासेवक हो। अंतर केवल इतना ही है कि प्रजासेवक किसी दूसरे पर दोषारोपण करके अपने को संतुष्ट कर लेता है, यहीं उसकेर् कत्ताव्य की इतिश्री हो जाती है; अधिाकारियों को यह अवसर प्राप्त नहीं होता। वे आप अपने आचरण की सफाई नहीं पेश कर सकते। आपको खबर नहीं कि हुक्काम ने अपराधिायों को खोज निकालने में कितनी दिक्कतें उठाईं। प्रजा अपराधिायों को छिपा लेती थी और राजनीति के किसी सिध्दांत का उस पर कोई असर न होता था। अतएव अपराधिायों के साथ निरपराधिायों का फँस जाना सम्भव ही था। फिर आपको मालूम नहीं है कि इस विद्रोह ने रियासत को कितने महान् संकट में डाल दिया है। ऍंगरेजी सरकार को संदेह है कि दरबार ने ही यह सारा षडयंत्रा रचा था। अब दरबार कार् कत्ताव्य है कि वह अपने को इस आक्षेप से मुक्त करे, और जब तक मिस सोफिया का सुराग नहीं मिल जाता, रियासत की स्थिति अत्यंत चिंतामय है। भारतीय होने के नाते मेरा धार्म है कि रियासत के मुख पर से कालिमा को मिटा दूँ; चाहे इसके लिए मुझे कितना ही अपमान, कितना ही लांछन, कितना ही कटु वचन क्यों न सहना पड़े, चाहे मेरे प्राण ही क्यों न चले जाएँ। जाति-सेवक की अवस्था कोई स्थायी रूप नहीं रखती, परिस्थितियों के अनुसार उसमें परिवर्तन होता रहता है। कल मैं रियासत का जानी दुश्मन था, आज उसका अनन्य भक्त हूँ और इसके लिए मुझे लेशमात्रा भी लज्जा नहीं।

 

इंद्रदत्ता-ईश्वर ने आपको तर्क बुध्दि दी है और उससे आप दिन को रात सिध्द कर सकते हैं; किंतु आपकी कोई उक्ति प्रजा के दिल से इस खयाल को नहीं दूर कर सकती कि आपने उसके साथ दगा दी और इस विश्वासघात की जो यंत्राणा आपको सोफिया के हाथों मिलेगी, उससे आपकी ऑंखें खुल जाएँगी।

 

विनय ने इस भाँति लपककर इंद्रदत्ता का हाथ पकड़ लिया, मानो वह भागा जा रहा हो और बोले-तुम्हें सोफिया का पता मालूम है?

 

इंद्रदत्ता-नहीं।

 

विनय-झूठ बोलते हो!

 

इंद्रदत्ता-हो सकता है।

 

विनय-तुम्हें बताना पड़ेगा।

 

इंदद्रत्ता-आपको अब मुझसे यह पूछने का अधिाकार नहीं रहा। आपका या दरबार का मतलब पूरा करने के लिए मैं दूसरों की जान संकट में नहीं डालना चाहता। आपने एक बार विश्वासघात किया है और फिर कर सकते हैं।

 

नायकराम-बता देंगे, आप क्यों इतना घबराए जाते हैं। इतना तो बता ही दो भैया इंद्रदत्ता, कि मेम साहब कुशल से हैं न?

 

इंद्रदत्ता-हाँ, बहुत कुशल से हैं और प्रसन्न हैं। कम-से-कम विनयसिंह के लिए कभी विकल नहीं होतीं। सच पूछो, तो उन्हें अब इनके नाम से घृणा हो गई है।

 

विनय-इंद्रदत्ता, हम और तुम बचपन के मित्रा हैं। तुम्हें जरूरत पडे, तो मैं अपने प्राण तक दे दूँ; पर तुम इतनी जरा-सी बात बतलाने से इनकार कर रहे हो। यही दोस्ती है?

 

इंद्रदत्ता-दोस्ती के पीछे दूसरों की जान क्यों विपत्तिा में डालूँ?

 

विनय-मैं माता के चरणों की कसम खाकर कहता हूँ, मैं इसे गुप्त रख्रूगा। मैं केवल एक बार सोफिया से मिलना चाहता हूँ।

 

इंद्रदत्ता-काठ की हाँड़ी बार-बार नहीं चढ़ती।

 

विनय-इंद्र, मैं जीवनपर्यंत तुम्हारा उपकार मानूँगा।

 

इंद्रदत्ता-जी नहीं, बिल्ली बख्शे, मुरगा बाँड़ा ही अच्छा।

 

विनय-मुझसे जो कसम चाहे, ले लो।

 

इंद्रदत्ता-जिस बात के बतलाने का मुझे अधिाकार नहीं, उसे बतलाने के लिए आप मुझसे व्यर्थ आग्रह कर रहे हैं।

 

विनय-तुम पाषाण-हृदय हो।

 

इंद्रदत्ता-मैं उससे भी कठोर हूँ। मुझे जितना चाहिए, कोस लीजिए, पर सोफी के विषय में मुझसे कुछ न पूछिए।

 

नायकराम-हाँ भैया, बस यही टेक चली जाए; मरदों का यही काम है। दो टूक कह दिया कि जानते हैं, लेकिन बतलाएँगे नहीं, चाहे किसी को भला लगे या बुरा।

 

इंद्रदत्ता-अब तो कलई खुल गई न? क्यों कुँवर साहब महाराज, अब तो बढ़-बढ़कर बातें न करोगे?

 

विनय-इंद्रदत्ता, जले पर नमक न छिड़को। जो बात पूछता हूँ, बतला दो; नहीं तो मेरी जान को रोना पड़ेगा। तुम्हारी जितनी खुशामद कर रहा हूँ, उतनी आज तक किसी की नहीं की थी; पर तुम्हारे ऊपर जरा भी असर नहीं होता।

 

इंद्रदत्ता-मैं एक बार कह चुका कि मुझे जिस बात के बतलाने का अधिाकार नहीं वह किसी तरह न बताऊँगा। बस, इस विषय में तुम्हारा आग्रह करना व्यर्थ है। यह लो, अपनी राह जाता हूँ। तुम्हें जहाँ जाना हो, जाओ!

 

नायकराम-सेठजी, भागो मत, मिस साहब का पता बताए बिना न जाने पाओगे।

 

इंद्रदत्ता-क्या जबरदस्ती पूछोगे?

 

नायकराम-हाँ, जबरदस्ती पूछूँगा। बाम्हन होकर तुमसे भिक्षा माँग रहा हूँ और तुम इनकार करते हो, इसी पर धार्मात्मा, सेवक, चाकर बनते हो! यह समझ लो बाम्हन भीख लिए बिना द्वार से नहीं जाता; नहीं पाता, तो धारना देकर बैठ जाता है, और फिर ले ही कर उठता है।

 

इंद्रदत्ता-मुझसे ये पंडई चालें न चलो, समझे! ऐसे भीख देनेवाले कोई और होंगे।

 

नायकराम-क्यों बाप-दादों का नाम डुबाते हो भैया? कहता हूँ, यह भीख दिए बिना अब तुम्हारा गला नहीं छूट सकता।

 

यह कहते हुए नायकराम चट जमीन पर बैठ गए, इंद्रदत्ता के दोनों पैर पकड़ लिए, उन पर अपना सिर रख दिया और बोले-अब तुम्हारा जो धारम हो, वह करो। मैं मूरख हूँ, गँवार हूँ, पर बाम्हन हूँ। तुम सामरथी पुरुष हो। जैसा उचित समझो, करो।

 

इंद्रदत्ता अब भी न पसीजे, अपने पैरों को छुड़ाकर चले जाने की चेष्टा की, पर उनके मुख से स्पष्ट विदित हो रहा था कि इस समय बडे असमंजस में पडे हुए हैं, और इस दीनता की उपेक्षा करते हुए अत्यंत लज्जित हैं। वह बलिष्ठ पुरुष थे, स्वयंसेवकों में कोई उनका-सा दीर्घकाय युवक न था। नायकराम अभी कमजोर थे। निकट था कि इंद्रदत्ता अपने पैरों को छुड़ाकर निकल जाएँ कि नायकराम ने विनय से कहा-भैया,खड़े क्या देखते हो? पकड़ लो इनके पाँव, देखूँ, यह कैसे नहीं बताते।

 

विनयसिंह कोई स्वार्थ सिध्द करने के लिए खुशामद करना भी अनुचित समझते थे, पाँव पर गिरने की बात ही क्या। किसी संत-महात्मा के सामने दीन भाव प्रकट करने से उन्हें संकोच न था, अगर उससे हार्दिक श्रध्दा हो। केवल अपना काम निकालने के लिए उन्होंने सिर झुकाना सीखा ही न था। पर जब उन्होंने नायकराम को इंद्रदत्ता के पैरों पर गिरते देखा, तो आत्मसम्मान के लिए कोई स्थान न रहा। सोचा,जब मेरी खातिर नायकराम ब्राह्मण होकर यह अपमान सहन कर रहा है, तो मेरा दूर खड़े शान की लेना मुनासिब नहीं। यद्यपि एक क्षण पहले इंद्रदत्ता से उन्होंने अविनय-पूर्ण बातें की थीं और उनकी चिरौरी करते हुए लज्जा आती थी, पर सोफी का समाचार भी इसके सिवा अन्य किसी उपाय से मिलता हुआ नहीं नजर आता था। उन्होंने आत्म-सम्मान को भी सोफी पर समर्पण कर दिया। मेरे पास यही एक चीज है, जिस मैंने अभी तक तेरे हाथों में न दिया था। आज वह भी तेरे हवाले करता हूँ। आत्मा अब भी सिर न झुकाना चाहती थी, पर कमर झुक गई। एक पल में उनक हाथ इंद्रदत्ता के पैरों के पास पहुँचे। इंद्रदत्ता ने तुरंत पैर खींच लिए और विनय को उठाने की चेष्टा करते हुए बोले-विनय, यह क्या अनर्थ करते हो, हैं, हैं!

 

विनय की दशा उस सेवक की-सी थी, जिसे उसके स्वामी ने थूककर चाटने का दंड दिया हो। अपनी अधाोगति पर रोना आ गया।

 

नायकराम ने इंद्रदत्ता से कहा-भैया, मुझे भिच्छुकर समझकर दुतकार सकते थे; लेकिन अब कहो।

 

इंद्रदत्ता संकोच में पड़कर बोले-विनय, क्यों मुझे इतना लज्जित कर रहे हो! मैं वचन दे चुका हूँ कि किसी से यह भेद न बताऊँगा।

 

नायकराम-तुमसे कोई जबरदस्ती तो नहीं कर रहा है। जो अपना धारम समझो, वह करो, तुम आप बुध्दिमान हो।

 

इंद्रदत्ता ने खिन्न होकर कहा-जबरदस्ती नहीं, तो और क्या है! गरज बावली होती है, पर आज मालूम हुआ कि वह अंधाी भी होती है। विनय, व्यर्थ ही अपनी आत्मा पर यह अन्याय कर रहे हो। भले आदमी, क्या आत्मगौरव भी घोलकर पी गए? तुम्हें उचित था कि प्राण देकर भी आत्मा की रक्षा करते। अब तुम्हें ज्ञात हुआ होगा कि स्वार्थ-कामना मनुष्य को कितना पतित कर देती है। मैं जानता हूँ, एक वर्ष पहले सारा संसार मिलकर भी तुम्हारा सिर न झुका सकता था, आज तुम्हारा यह नैतिक पतन हो रहा है! अब उठो, मुझे पाप में न डुबाओ।

 

विनय को इतना क्रोधा आया कि इसके पैरों को खींच लूँ और छाती पर चढ़ बैठूँ। दुष्ट इस दशा में भी डंक मारने से बाज नहीं आता। पर यह विचार करके कि अब तो जो कुछ होना था, हो चुका, ग्लानि-भाव से बोले-इंद्रदत्ता, तुम मुझे जितना पामर समझते हो, उतना नहीं हूँ; पर सोफी के लिए मैं सब कुछ कर सकता हूँ। मेरा आत्म-सम्मान, मेरी बुध्दि, मेरा पौरुष, मेरा धार्म सब कुछ प्रेम के हवन-क्ुं+ड में स्वाहा हो गया। अगर तुम्हें अब भी मुझ पर दया न आए, तो मेरी कमर से पिस्तौल निकालकर एक निशाने से काम तमाम कर दो।

 

यह कहते-कहते विनय की ऑंखों में ऑंसू भर आए। इंद्रदत्ता ने उन्हें उठाकर कंठ से लगा लिया और करुण भाव से बोले-विनय, क्षमा करो, यद्यपि तुमने जाति का अहित किया है, पर मैं जानता हूँ कि तुमने वही किया, जो कदाचित् उस स्थिति में मैं या कोई भी अन्य प्राणी करता। मुझे तुम्हारा तिरस्कार करने का अधिाकार नहीं। तुमने अगर प्रेम के लिए आत्ममर्यादा को तिलांजलि दे दी, तो मैं भी मैत्राी और सौजन्य के लिए अपने वचन से विमुख हो जाऊँगा। जो तुम चाहते हो, वह मैं बता दूँगा। पर इससे तुम्हें कोई लाभ न होगा; क्योंकि मिस सोफिया की दृष्टि में तुम गिर गए हो, उसे अब तुम्हारे नाम से घृणा होती है। उससे मिलकर तुम्हें दु:ख होगा।

 

नायकराम-भैया, तुम अपनी-सी कर दो, मिस साहब को मनाना-जनाना इनका काम है। आसिक लोग बड़े चलते-पुरजे होते हैं, छँटे हुए सोहदे, देखने ही को सीधो होते हैं। मासूक को चुटकी बजाते अपना कर लेते हैं। जरा ऑंखों में पानी भरकर देखा, और मासूक पानी हुआ।

 

इंद्रदत्ता-मिस सोफिया मुझे कभी क्षमा न करेंगी; लेकिन अब उनका-सा हृदय कहाँ से लाऊँ। हाँ, एक बात बतला दो। इसका उत्तार पाए बिना मैं कुछ न बता सकूँगा।

 

विनय-पूछो।

 

इंद्रदत्ता-तुम्हें वहाँ अकेले जाना पड़ेगा। वचन दो कि खुफिया पुलिस का कोई आदमी साथ न रहेगा।

 

विनय-इससे तुम निश्चिंत रहो।

 

इंद्रदत्ता-अगर तुम पुलिस के साथ गए, तो सोफिया की लाश के सिवा और कुछ न पाओगे।

 

विनय-मैं ऐसी मूर्खता करूँगा ही क्यों!

 

इंद्रदत्ता-यह समझ लो कि मैं सोफी का पता बताकर उन लोगों के प्राण तुम्हारे हाथों में रखे देता हूँ, जिनकी खोज में तुमने दाना-पानी हराम कर रखा है।

 

नायकराम-भैया, चाहे अपनी जान निकल जाए, उन पर कोई रेप न आने पाएगा। लेकिन यह भी बता दो कि वहाँ हम लोगों की जान का जोखम तो नहीं है?

 

इंद्रदत्ता-(विनय से) अगर वे लोग तुमसे बैर साधाना चाहते, तो अब तक तुम लोग जीते न रहते। रियासत की समस्त शक्ति भी तुम्हारी रक्षा न कर सकती। उन लोगों को तुम्हारी एक-एक बात की खबर मिलती रहती है। यह समझ लो कि तुम्हारी जान उनकी मुट्ठी में है। उतने प्रजा-द्रोह के बाद अगर तुम अभी जिंदा हो, तो यह मिस सोफिया की कृपा है। अगर मिस सोफिया की तुमसे मिलने की इच्छा होती, तो इससे ज्यादा आसान कोई काम न था, लेकिन उनकी तो यह हालत है कि तुम्हारे नाम ही से चिढ़ती हैं। अगर अब भी उनसे मिलने की अभिलाषा हो, तो मेरे साथ आओ।

 

विनयसिंह को अपनी विचार-परिवर्तक शक्ति पर विश्वास था। इसकी उन्हें लेशमात्रा भी शंका न थी कि सोफी मुझसे बातचीत न करेगी। हाँ,खेद इस बात का था कि मैंने सोफी ही के लिए अधिाकारियों को जो सहायता दी, उसका परिणाम यह हुआ। काश, मुझे पहले ही मालूम हो जाता कि सोफी मेरी नीति को पसंद नहीं करती, वह मित्राों के हाथ में है और सुखी है, तो मैं यह अनीति करता ही क्यों? मुझे प्रजा से कोई बैर तो था नहीं। सोफी पर भी तो इसकी कुछ-न-कुछ जिम्मेवारी है। वह मेरी मनोवृत्तिायों को जानती थी। क्या वह एक पत्रा भेजकर मुझे अपनी स्थिति की सूचना न दे सकती थी! जब उसने ऐसा नहीं किया, तो उसे अब मुझ पर त्यौरियाँ चढ़ाने का क्या अधिाकार है?

 

यह सोचते वह इंद्रदत्ता के पीछे-पीछे चलने लगे। भूख-प्यास हवा हो गई।

 

शहर अमीरों के रहने और क्रय-विक्रय का स्थान है। उसके बाहर की भूमि उनके मनोरंजन और विनोद की जगह है। उसके मध्‍य भाग में उनके लड़कों की पाठशालाएँ और उनके मुकद़मेबाजी के अखाड़े होते हैं, जहाँ न्याय के बहाने गरीबों का गला घोंटा जाता है। शहर के आस-पास गरीबों की बस्तियाँ होती हैं। बनारस में पाँड़ेपुर ऐसी ही बस्ती है। वहाँ न शहरी दीपकों की ज्योति पहुँचती है, न शहरी छिड़काव के छींटे, न शहरी जल-खेतों का प्रवाह। सड़क के किनारे छोटे-छोटे बनियों और हलवाइयों की दूकानें हैं, और उनके पीछे कई इक्केवाले, गाड़ीवान, ग्वाले और मजदूर रहते हैं। दो-चार घर बिगड़े सफेदपोशों के भी हैं, जिन्हें उनकी हीनावस्था ने शहर से निर्वासित कर दिया है। इन्हीं में एक गरीब और अंधा चमार रहता है, जिसे लोग सूरदास कहते हैं। भारतवर्ष में अंधे आदमियों के लिए न नाम की जरूरत होती है, न काम की। सूरदास उनका बना-बनाया नाम है, और भीख माँगना बना-बनाया काम है। उनके गुण और स्वभाव भी जगत्-प्रसिध्द हैं-गाने-बजाने में विशेष रुचि, हृदय में विशेष अनुराग, अध्‍यात्‍म और भक्ति में विशेष प्रेम, उनके स्वाभाविक लक्षण हैं। बाह्य दृष्टि बंद और अंतर्दृष्टि खुली हुई।

 

सूरदास एक बहुत ही क्षीणकाय, दुर्बल और सरल व्यक्ति था। उसे दैव ने कदाचित् भीख माँगने ही के लिए बनाया था। वह नित्यप्रति लाठी टेकता हुआ पक्की सड़क पर आ बैठता और राहगीरों की जान की खैर मनाता। ‘दाता! भगवान् तुम्हारा कल्यान करें-‘ यही उसकी टेक थी, और इसी को वह बार-बार दुहराता था। कदाचित् वह इसे लोगों की दया-प्रेरणा का मंत्र समझता था। पैदल चलनेवालों को वह अपनी जगह पर बैठे-बैठे दुआएँ देता था। लेकिन जब कोई इक्का आ निकलता, तो वह उसके पीछे दौड़ने लगता, और बग्घियों के साथ तो उसके पैरों में पर लग जाते थे। किंतु हवा-गाड़ियों को वह अपनी शुभेच्छाओं से परे समझता था। अनुभव ने उसे शिक्षा दी थी कि हवागाड़ियाँ किसी की बातें नहीं सुनतीं। प्रात:काल से संध्‍या तक उसका समय शुभ कामनाओं ही में कटता था। यहाँ तक कि माघ-पूस की बदली और वायु तथा जेठ-वैशाख की लू-लपट में भी उसे नागा न होता था।

 

कार्तिक का महीना था। वायु में सुखद शीतलता आ गई थी। संध्‍या हो चुकी थी। सूरदास अपनी जगह पर मूर्तिवत् बैठा हुआ किसी इक्के या बग्घी के आशाप्रद शब्द पर कान लगाए था। सड़क के दोनों ओर पेड़ लगे हुए थे। गाड़ीवानों ने उनके नीचे गाड़ियाँ ढील दीं। उनके पछाईं बैल टाट के टुकड़ों पर खली और भूसा खाने लगे। गाड़ीवानों ने भी उपले जला दिए। कोई चादर पर आटा गूंधाता था, कोई गोल-गोल बाटियाँ बनाकर उपलों पर सेंकता था। किसी को बरतनों की जरूरत न थी। सालन के लिए घुइएँ का भुरता काफी था। और इस दरिद्रता पर भी उन्हें कुछ चिंता नहीं थी, बैठे बाटियाँ सेंकते और गाते थे। बैलों के गले में बँधी हुई घंटियाँ मजीरों का काम दे रही थीं। गनेस गाड़ीवान ने सूरदास से पूछा-क्यों भगत, ब्याह करोगे?

 

सूरदास ने गर्दन हिलाकर कहा-कहीं है डौल?

 

गनेस-हाँ, है क्यों नहीं। एक गाँव में एक सुरिया है, तुम्हारी ही जात-बिरादरी की है, कहो तो बातचीत पक्की करूँ? तुम्हारी बरात में दो दिन मजे से बाटियाँ लगें।

 

सूरदास-कोई जगह बताते, जहाँ धान मिले, और इस भिखमंगी से पीछा छूटे। अभी अपने ही पेट की चिंता है, तब एक अंधी की और चिंता हो जाएगी। ऐसी बेड़ी पैर में नहीं डालता। बेड़ी ही है, तो सोने की तो हो।

 

गनेस-लाख रुपये की मेहरिया न पा जाओगे। रात को तुम्हारे पैर दबाएगी, सिर में तेल डालेगी, तो एक बार फिर जवान हो जाओगे। ये हड्डियाँ न दिखाई देंगी।

 

सूरदास-तो रोटियों का सहारा भी जाता रहेगा। ये हड्डियाँ देखकर ही तो लोगों को दया आ जाती है। मोटे आदमियों को भीख कौन देता है? उलटे और ताने मिलते हैं।

 

गनेस-अजी नहीं, वह तुम्हारी सेवा भी करेगी और तुम्हें भोजन भी देगी। बेचन साह के यहाँ तेलहन झाड़ेगी तो चार आने रोज पाएगी।

 

सूरदास-तब तो और भी दुर्गति होगी। घरवाली की कमाई खाकर किसी को मुँह दिखाने लायक भी न रहूँगा।

 

सहसा एक फिटन आती हुई सुनाई दी। सूरदास लाठी टेककर उठ खड़ा हुआ। यही उसकी कमाई का समय था। इसी समय शहर के रईस और महाजन हवा खाने आते थे। फिटन ज्यों ही सामने आई, सूरदास उसके पीछे ‘दाता! भगवान् तुम्हारा कल्यान करें’ कहता हुआ दौड़ा।

 

फिटन में सामने की गद्दी पर मि. जॉन सेवक और उनकी पत्नी मिसेज जॉन सेवक बैठी हुई थीं। दूसरी गद्दी पर उनका जवान लड़का प्रभु सेवक और छोटी बहन सोफ़िया सेवक थी। जॉन सेवक दुहरे बदन के गोरे-चिट्टे आदमी थे। बुढ़ापे में भी चेहरा लाल था। सिर और दाढ़ी के बाल खिचड़ी हो गए थे। पहनावा ऍंगरेजी था, जो उन पर खूब खिलता था। मुख आकृति से गरूर और आत्मविश्वास झलकता था। मिसेज सेवक को काल-गति ने अधिक सताया था। चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गई थीं, और उससे हृदय की संकीर्णता टपकती थी, जिसे सुनहरी ऐनक भी न छिपा सकती थी। प्रभु सेवक की मसें भीग रही थीं, छरहरा डील, इकहरा बदन, निस्तेज मुख, ऑंखों पर ऐनक, चेहरे पर गम्भीरता और विचार का गाढ़ा रंग नजर आता था। ऑंखों से करुणा की ज्योति-सी निकली पड़ती थी। वह प्रकृति-सौंदर्य का आनंद उठाता हुआ जान पड़ता था। मिस सोफ़िया बड़ी-बड़ी रसीली ऑंखोंवाली, लज्जाशील युवती थी। देह अति कोमल, मानो पंचभूतों की जगह पुष्पों से उसकी सृष्टि हुई हो। रूप अति सौम्य, मानो लज्जा और विनय मूर्तिमान हो गए हों। सिर से पाँव तक चेतना ही चेतना थी, जड़ का कहीं आभास तक न था।

 

सूरदास फिटन के पीछे दौड़ता चला आता था। इतनी दूर तक और इतने वेग से कोई मँजा हुआ खिलाड़ी भी न दौड़ सकता था। मिसेज सेवक ने नाक सिकोड़कर कहा-इस दुष्ट की चीख ने तो कान के परदे फाड़ डाले। क्या यह दौड़ता ही चला जाएगा?

 

मि. जॉन सेवक बोले-इस देश के सिर से यह बला न-जाने कब टलेगी? जिस देश में भीख माँगना लज्जा की बात न हो, यहाँ तक कि सर्वश्रेष्ठ जातियाँ भी जिसे अपनी जीवन-वृत्ति बना लें, जहाँ महात्माओं का एकमात्र यही आधार हो, उसके उध्दार में अभी शताब्दियों की देर है।

 

प्रभु सेवक-यहाँ यह प्रथा प्राचीन काल से चली आती है। वैदिक काल में राजाओं के लड़के भी गुरुकुलों में विद्या-लाभ करते समय भीख माँगकर अपना और अपने गुरु का पालन करते थे। ज्ञानियों और ऋषियों के लिए भी यह कोई अपमान की बात न थी, किंतु वे लोग माया-मोह से मुक्त रहकर ज्ञान-प्राप्ति के लिए दया का आश्रय लेते थे। उस प्रथा का अब अनुचित व्यवहार किया जा रहा है। मैंने यहाँ तक सुना है कि कितने ही ब्राह्मण, जो जमींदार हैं, घर से खाली हाथ मुकदमे लड़ने चलते हैं, दिन-भर कन्या के विवाह के बहाने या किसी सम्बंधी की मृत्यु का हीला करके भीख माँगते हैं, शाम को नाज बेचकर पैसे खड़े कर लेते हैं, पैसे जल्द रुपये बन जाते हैं, और अंत में कचहरी के कर्मचारियों और वकीलों की जेब में चले जाते हैं।

 

मिसेज़ सेवक-साईस, इस अंधे से कह दो, भाग जाए, पैसे नहीं हैं।

 

सोफ़िया-नहीं मामा, पैसे हों तो दे दीजिए। बेचारा आधो मील से दौड़ा आ रहा है, निराश हो जाएगा। उसकी आत्मा को कितना दु:ख होगा।

 

माँ-तो उससे किसने दौड़ने को कहा था? उसके पैरों में दर्द होता होगा।

 

सोफ़िया-नहीं, अच्छी मामा, कुछ दे दीजिए, बेचारा कितना हाँफ रहा है। प्रभु सेवक ने जेब से केस निकाला; किंतु ताँबे या निकिल का कोई टुकड़ा न निकला, और चाँदी का कोई सिक्का देने में माँ के नाराज होने का भय था। बहन से बोले-सोफी, खेद है, पैसे नहीं निकले। साईस, अंधे से कह दो, धीरे-धीरे गोदाम तक चला आए; वहाँ शायद पैसे मिल जाएँ।

 

किंतु सूरदास को इतना संतोष कहाँ? जानता था, गोदाम पर कोई भी मेरे लिए खड़ा न रहेगा; कहीं गाड़ी आगे बढ़ गई, तो इतनी मेहनत बेकार हो जाएगी। गाड़ी का पीछा न छोड़ा, पूरे एक मील तक दौड़ता चला गया। यहाँ तक कि गोदाम आ गया और फिटन रुकी। सब लोग उतर पड़े। सूरदास भी एक किनारे खड़ा हो गया, जैसे वृक्षों के बीच में ठूँठ खड़ा हो। हाँफते-हाँफते बेदम हो रहा था।

 

मि. जॉन सेवक ने यहाँ चमड़े की आढ़त खोल रखी थी। ताहिर अली नाम का एक व्यक्ति उसका गुमाश्ता था बरामदे में बैठा हुआ था। साहब को देखते ही उसने उठकर सलाम किया।

 

जॉन सेवक ने पूछा-कहिए खाँ साहब, चमड़े की आमदनी कैसी है?

 

ताहिर-हुजूर, अभी जैसी होनी चाहिए, वैसी तो नहीं है; मगर उम्मीद है कि आगे अच्छी होगी।

 

जॉन सेवक-कुछ दौड़-धूप कीजिए, एक जगह बैठे रहने से काम न चलेगा। आस-पास के देहातों में चक्कर लगाया कीजिए। मेरा इरादा है कि म्युनिसिपैलिटी के चेयरमैन साहब से मिलकर यहाँ एक शराब और ताड़ी की दूकान खुलवा दूँ। तब आस-पास के चमार यहाँ रोज आएँगे, और आपको उनसे मेल-जोल करने का मौका मिलेगा। आजकल इन छोटी-छोटी चालों के बगैर काम नहीं चलता। मुझी को देखिए, ऐसा शायद ही कोई दिन जाता होगा, जिस दिन शहर के दो-चार धानी-मानी पुरुषों से मेरी मुलाकात न होती हो। दस हजार की भी एक पालिसी मिल गई, तो कई दिनों की दौड़धूप ठिकाने लग जाती है।

 

ताहिर-हुजूर, मुझे खुद फिक्र है। क्या जानता नहीं हूँ कि मालिक को चार पैसे का नफा न होगा, तो वह यह काम करेगा ही क्यों? मगर हुजूर ने मेरी जो तनख्वाह मुकर्रर की है, उसमें गुजारा नहीं होता। बीस रुपये का तो गल्ला भी काफी नहीं होता, और सब जरूरतें अलग। अभी आपसे कुछ कहने की हिम्म्त तो नहीं पड़ती; मगर आपसे न कहूँ, तो किससे कहूँ?

 

जॉन सेवक-कुछ दिन काम कीजिए, तरक्की होगी न। कहाँ है आपका हिसाब-किताब लाइए, देखूँ।

 

यह कहते हुए जॉन सेवक बरामदे में एक टूटे हुए मोढ़े पर बैठ गए। मिसेज सेवक कुर्सी पर बैठीं। ताहिर अली ने हिसाब की बही सामने लाकर रख दी। साहब उसकी जाँच करने लगे। दो-चार पन्ने उलट-पलटकर देखने के बाद नाक सिकोड़कर बोले-अभी आपको हिसाब-किताब लिखने का सलीका नहीं है, उस पर आप कहते हैं, तरक्की कर दीजिए। हिसाब बिलकुल आईना होना चाहिए; यहाँ तो कुछ पता नहीं चलता कि आपने कितना माल खरीदा, और कितना माल रवाना किया। खरीदार को प्रति खाता एक आना दस्तूरी मिलती है, वह कहीं दर्ज ही नहीं है!

 

ताहिर-क्या उसे भी दर्ज कर दूँ?

 

जॉन सेवक-क्यों, वह मेरी आमदनी नहीं है?

 

ताहिर-मैंने तो समझा कि वह मेरा हक है।

 

जॉन सेवक-हरगिज नहीं, मैं आप पर गबन का मामला चला सकता हूँ। (त्योरियाँ बदलकर) मुलाजिमों का हक है! खूब! आपका हक तनख्वाह, इसके सिवा आपको कोई हक नहीं है।

 

ताहिर-हुजूर, अब आइंदा ऐसी गलती न होगी।

 

जॉन सेवक-अब तक आपने इस मद में जो रकम वसूल की है, वह आमदनी में दिखाइए। हिसाब-किताब के मामले में मैं जरा भी रिआयत नहीं करता।

 

ताहिर-हुजूर, बहुत छोटी रकम होगी।

 

जॉन सेवक-कुछ मुजायका नहीं, एक ही पाई सही; वह सब आपको भरनी पड़ेगी। अभी वह रकम छोटी है, कुछ दिनों में उसकी तादाद सैकड़ों तक पहुँच जाएगी। उस रकम से मैं यहाँ एक संडे-स्कूल खोलना चाहता हूँ। समझ गए? मेम साहब की यह बड़ी अभिलाषा है। अच्छा चलिए, वह जमीन कहाँ है जिसका आपने जिक्र किया था?

 

गोदाम के पीछे की ओर एक विस्तृत मैदान था। यहाँ आस-पास के जानवर चरने आया करते थे। जॉन सेवक यह जमीन लेकर यहाँ सिगरेट बनाने का एक कारखाना खोलना चाहते थे। प्रभु सेवक को इसी व्यवसाय की शिक्षा प्राप्त करने के लिए अमेरिका भेजा था। जॉन सेवक के साथ प्रभु सेवक और उनकी माता भी जमीन देखने चलीं। पिता और पुत्रा ने मिलकर जमीन का विस्तार नापा। कहाँ कारखाना होगा, कहाँ गोदाम, कहाँ दफ्तर, कहाँ मैनेजर का बँगला, कहाँ श्रमजीवियों के कमरे, कहाँ कोयला रखने की जगह और कहाँ से पानी आएगा, इन विषयों पर दोनों आदमियों में देर तक बातें होती रहीं। अंत में मिस्टर सेवक ने ताहिर अली से पूछा-यह किसकी जमीन है?

 

ताहिर-हुजूर, यह तो ठीक नहीं मालूम, अभी चलकर यहाँ किसी से पूछ लूँगा, शायद नायकराम पंडा की हो।

 

साहब-आप उससे यह जमीन कितने में दिला सकते हैं?

 

ताहिर-मुझे तो इसमें भी शक है कि वह इसे बेचेगा भी।

 

जॉन सेवक-अजी, बेचेगा उसका बाप, उसकी क्या हस्ती है? रुपये के सत्तारह आने दीजिए, और आसमान के तारे मँगवा लीजिए। आप उसे मेरे पास भेज दीजिए, मैं उससे बातें कर लूँगा।

 

प्रभु सेवक-मुझे तो भय है कि यहाँ कच्चा माल मिलने में कठिनाई होगी। इधार लोग तम्बाकू की खेती कम करते हैं।

 

जॉन सेवक-कच्चा माल पैदा करना तुम्हारा काम होगा। किसान को ऊख या जौ-गेहूँ से कोई प्रेम नहीं होता। वह जिस जिन्स के पैदा करने में अपना लाभ देखेगा वही पैदा करेगा। इसकी कोई चिंता नहीं है। खाँ साहब, आप उस पण्डे को मेरे पास कल जरूर भेज दीजिएगा।

 

ताहिर-बहुत खूब, उसे कहूँगा।

 

जान सेवक-कहूँगा नहीं, उसे भेज दीजिएगा। अगर आपसे इतना भी न हो सका, तो मैं समझूँगा, आपको सौदा पटाने का जरा भी ज्ञान नहीं।

 

मिसेज सेवक-(ऍंगरेजी में) तुम्हें इस जगह पर कोई अनुभवी आदमी रखना चाहिए था।

 

जान सेवक-(ऍंगरेजी में) नहीं, मैं अनुभवी आदमियों से डरता हूँ। वे अपने अनुभव से अपना फायदा सोचते हैं, तुम्हें फायदा नहीं पहुँचाते। मैं ऐसे आदमियों से कोसों दूर रहता हूँ।

 

ये बातें करते हुए तीनों आदमी फिटन के पास गए। पीछे-पीछे ताहिर अली भी थे। यहाँ सोफ़िया खड़ी सूरदास से बातें कर रही थी। प्रभु सेवक को देखते ही बोली-‘प्रभु, यह अंधा तो कोई ज्ञानी पुरुष जान पड़ता है, पूरा फिलासफर है।’

 

मिसेज़ सेवक-तू जहाँ जाती है, वहीं तुझे कोई-न-कोई ज्ञानी आदमी मिल जाता है। क्यों रे अंधे, तू भीख क्यों माँगता है? कोई काम क्यों नहीं करता?

 

सोफ़िया-(ऍंगरेजी में) मामा, यह अंधा निरा गँवार नहीं है।

 

सूरदास को सोफ़िया से सम्मान पाने के बाद ये अपमानपूर्ण शब्द बहुत बुरे मालूम हुए। अपना आदर करनेवाले के सामने अपना अपमान कई गुना असह्य हो जाता है। सिर उठाकर बोला-भगवान् ने जन्म दिया है, भगवान् की चाकरी करता हूँ। किसी दूसरे की ताबेदारी नहीं हो सकती।

 

मिसेज़ सेवक-तेरे भगवान् ने तुझे अंधा क्यों बना दिया? इसलिए कि तू भीख माँगता फिरे? तेरा भगवान् बड़ा अन्यायी है।

 

सोफ़िया-(ऍंगरेजी में) मामा, आप इसका अनादर क्यों कर रही हैं कि मुझे शर्म आती है।

 

सूरदास-भगवान् अन्यायी नहीं है, मेरे पूर्व-जन्म की कमाई ही ऐसी थी। जैसे कर्म किए हैं, वैसे फल भोग रहा हूँ। यह सब भगवान् की लीला है। वह बड़ा खिलाड़ी है। घरौंदे बनाता-बिगाड़ता रहता है। उसे किसी से बैर नहीं। वह क्यों किसी पर अन्याय करने लगा?

 

सोफ़िया-मैं अगर अंधी होती, तो खुदा को कभी माफ न करती।

 

सूरदास-मिस साहब, अपने पाप सबको आप भोगने पड़ते हैं, भगवान का इसमें कोई दोष नहीं।

 

सोफ़िया-मामा, यह रहस्य मेरी समझ में नहीं आता। अगर प्रभु ईसू ने अपने रुधिार से हमारे पापों का प्रायश्चित्त कर दिया, तो फिर ईसाई समान दशा में क्यों नहीं हैं? अन्य मतावलम्बियों की भाँति हमारी जाति में अमीर-गरीब, अच्छे-बुरे, लँगड़े-लूले, सभी तरह के लोग मौजूद हैं। इसका क्या कारण है?

 

मिसेज़ सेवक ने अभी कोई उत्तर न दिया था कि सूरदास बोल उठा-मिस साहब, अपने पापों का प्रायश्चित्त हमें आप करना पड़ता है। अगर आज मालूम हो जाए कि किसी ने हमारे पापों का भार अपने सिर ले लिया, तो संसार में अंधेर मच जाए।

 

मिसेज़ सेवक-सोफी, बड़े अफसोस की बात है कि इतनी मोटी-सी बात तेरी समझ में नहीं आती, हालाँकि रेवरेंड पिम ने स्वयं कई बार तेरी शंका का समाधान किया है।

 

प्रभु सेवक-(सूरदास से) तुम्हारे विचार में हम लोगों को वैरागी हो जाना चाहिए। क्यों?

 

सूरदास-हाँ जब तक हम वैरागी न होंगे, दु:ख से नहीं बच सकते।

 

जॉन सेवक-शरीर में भभूत मलकर भीख माँगना स्वयं सबसे बड़ा दु:ख है; यह हमें दु:खों से क्योंकर मुक्त कर सकता है?

 

सूरदास-साहब, वैरागी होने के लिए भभूत लगाने और भीख माँगने की जरूरत नहीं। हमारे महात्माओं ने तो भभूत लगाने ओर जटा बढ़ाने को पाखंड बताया है। वैराग तो मन से होता है। संसार में रहे, पर संसार का होकर न रहे। इसी को वैराग कहते हैं।

 

मिसेज़ सेवक-हिंदुओं ने ये बातें यूनान के ैजवपबे से सीखी हैं; किंतु यह नहीं समझते कि इनका व्यवहार में लाना कितना कठिन है। यह हो ही नहीं सकता कि आदमी पर दु:ख-सुख का असर न पड़े। इसी अंधे को अगर इस वक्त पैसे न मिलें, तो दिल में हजारों गालियाँ देगा।

 

जॉन सेवक-हाँ, इसे कुछ मत दो, देखो, क्या कहता है। अगर जरा भी भुन-भुनाया, तो हंटर से बातें करूँगा। सारा वैराग भूल जाएगा। माँगता है भीख धोले-धोले के लिए मीलों कुत्तों की तरह दौड़ता है, उस पर दावा यह है कि वैरागी हूँ। (कोचवान से) गाड़ी फेरो, क्लब होते हुए बँगले चलो।

 

सोफ़िया-मामा, कुछ तो जरूर दे दो, बेचारा आशा लगाकर इतनी दूर दौड़ा आया था।

 

प्रभु सेवक-ओहो, मुझे तो पैसे भुनाने की याद ही न रही।

 

जॉन सेवक-हरगिज नहीं, कुछ मत दो, मैं इसे वैराग का सबक देना चाहता हूँ।

 

गाड़ी चली। सूरदास निराशा की मूर्ति बना हुआ अंधी ऑंखों से गाड़ी की तरफ ताकता रहा, मानो उसे अब भी विश्वास न होता था कि कोई इतना निर्दयी हो सकता है। वह उपचेतना की दशा में कई कदम गाड़ी के पीछे-पीछे चला। सहसा सोफ़िया ने कहा-सूरदास, खेद है, मेरे पास इस समय पैसे नहीं हैं। फिर कभी आऊँगी, तो तुम्हें इतना निराश न होना पड़ेगा।

 

अंधे सूक्ष्मदर्शी होते हैं। सूरदास स्थिति को भलीभाँति समझ गया। हृदय को क्लेश तो हुआ, पर बेपरवाही से बोला-मिस साहब, इसकी क्या चिंता? भगवान् तुम्हारा कल्याण करें। तुम्हारी दया चाहिए, मेरे लिए यही बहुत है।

 

सोफ़िया ने माँ से कहा-मामा, देखा आपने, इसका मन जरा भी मैला नहीं हुआ।

 

प्रभु सेवक-हाँ, दु:खी तो नहीं मालूम होता।

 

जॉन सेवक-उसके दिल से पूछो।

 

मिसेज़ सेवक-गालियाँ दे रहा होगा।

 

गाड़ी अभी धीरे-धीरे चल रही थी। इतने में ताहिर अली ने पुकारा-हुजूर, यह जमीन पंडा की नहीं, सूरदास की है। यह कह रहे हैं।

 

साहब ने गाड़ी रुकवा दी, लज्जित नेत्रों से मिसेज सेवक को देखा, गाड़ी से उतरकर सूरदास के पास आए, और नम्र भाव से बोले-क्यों सूरदास, यह जमीन तुम्हारी है?

 

सूरदास-हाँ हुजूर, मेरी ही है। बाप-दादों की इतनी ही तो निशानी बच रही है।

 

जॉन सेवक-तब तो मेरा काम बन गया। मैं चिंता में था कि न-जाने कौन इसका मालिक है। उससे सौदा पटेगा भी या नहीं। जब तुम्हारी है, तो फिर कोई चिंता नहीं। तुम-जैसे त्यागी और सज्जन आदमी से ज्यादा झंझट न करना पड़ेगा। जब तुम्हारे पास इतनी जमीन है, तो तुमने यह भेष क्यों बना रखा है?

 

सूरदास-क्या करूँ हुजूर, भगवान् की जो इच्छा है, वह कर रहा हूँ।

 

जॉन सेवक-तो अब तुम्हारी विपत्ति कट जाएगी। बस, यह जमीन मुझे दे दो। उपकार का उपकार, और लाभ का लाभ। मैं तुम्हें मुँह-माँगा दाम दूँगा।

 

सूरदास-सरकार, पुरुखों की यही निशानी है, बेचकर उन्हें कौन मुँह दिखाऊँगा?

 

जॉन सेवक-यहीं सड़क पर एक कुऑं बनवा दूँगा। तुम्हारे पुरुखों का नाम चलता रहेगा।

 

सूरदास-साहब, इस जमीन से मुहल्लेवालों का बड़ा उपकार होता है। कहीं एक अंगुल-भर चरी नहीं है। आस-पास के सब ढोर यहीं चरने आते हैं। बेच दूँगा, तो ढोरों के लिए कोई ठिकाना न रह जाएगा।

 

जॉन सेवक-कितने रुपये साल चराई के पाते हो?

 

सूरदास-कुछ नहीं, मुझे भगवान् खाने-भर को यों ही दे देते हैं, तो किसी से चराई क्यों लूँ? किसी का और कुछ उपकार नहीं कर सकता, तो इतना ही सही।

 

जॉन सेवक-(आश्चर्य से) तुमने इतनी जमीन यों ही चराई के लिए छोड़ रखी है? सोफ़िया सत्य कहती थी कि तुम त्याग की मूर्ति हो। मैंने बड़ों-बड़ों में इतना त्याग नहीं देखा। तुम धान्य हो! लेकिन जब पशुओं पर इतनी दया करते हो, तो मनुष्यों को कैसे निराश करोगे? मैं यह जमीन लिए बिना तुम्हारा गला न छोडूगा

 

सूरदास-सरकार, यह जमीन मेरी है जरूर, लेकिन जब तक मुहल्लेवालों से पूछ न लूँ, कुछ कह नहीं सकता। आप इसे लेकर क्या करेंगे?

 

जॉन सेवक-यहाँ एक कारखाना खोलूँगा, जिससे देश और जाति की उन्नति होगी, गरीबों का उपकार होगा, हजारों आदमियों की रोटियाँ चलेंगी। इसका यश भी तुम्हीं को होगा।

 

सूरदास-हुजूर, मुहल्लेवालों से पूछे बिना मैं कुछ नहीं कह सकता।

 

जॉन सेवक-अच्छी बात है, पूछ लो। मैं फिर तुमसे मिलूँगा। इतना समझ रखो कि मेरे साथ सौदा करने में तुम्हें घाटा न होगा। तुम जिस तरह खुश होगे, उसी तरह खुश करूँगा। यह लो (जेब से पाँच रुपये निकालकर), मैंने तुम्हें मामूली भिखारी समझ लिया था, उस अपमान को क्षमा करो।

 

सूरदास-हुजूर, मैं रुपये लेकर क्या करूँगा? धर्म के नाते दो-चार पैसे दे दीजिए, तो आपका कल्याण मनाऊँगा। और किसी नाते से मैं रुपये न लूँगा।

 

जॉन सेवक-तुम्हें दो-चार पैसे क्या दूँ? इसे ले लो, धार्मार्थ ही समझो।

 

सूरदास-नहीं साहब, धर्म में आपका स्वार्थ मिल गया है, अब यह धर्म नहीं रहा।

 

जॉन सेवक ने बहुत आग्रह किया, किंतु सूरदास ने रुपये नहीं लिए। तब वह हारकर गाड़ी पर जा बैठे।

 

मिसेज़ सेवक ने पूछा-क्या बातें हुईं?

 

जॉन सेवक-है तो भिखारी, पर बड़ा घमंडी है। पाँच रुपये देता था, न लिए।

 

मिसेज़ सेवक-है कुछ आशा?

 

जॉन सेवक-जितना आसान समझता था, उतना आसान नहीं है। गाड़ी तेज हो गई।

 

भैरों के घर से लौटकर सूरदास अपनी झोंपड़ी में आकर सोचने लगा, क्या करूँ कि सहसा दयागिरि आ गए और बोले-सूरदास, आज तो लोग तुम्हारे ऊपर बहुत गरम हो रहे हैं, इसे घमंड हो गया है। तुम इस माया-जाल में क्यों पड़े हो। क्यों नहीं मेरे साथ कहीं तीर्थयात्राा करने चलते?

 

सूरदास-यही तो मैं भी सोच रहा हूँ। चलो, तो मैं भी निकल पडर्ऌँ।

 

दयागिरि-हाँ, चलो, तब मैं मंदिर का कुछ ठिकाना कर लूँ। यहाँ कोई नहीं, जो मेरे पीछे यहाँ दिया-बत्ताी तक कर दे, भोग-भाग लगाना तो दूर रहा।

 

सूरदास-तुम्हें मंदिर से कभी छुट्टी न मिलेगी।

 

दयागिरि-भाई, यह भी नहीं होता कि मंदिर को यों ही निराधाार छोड़कर चला जाऊँ, फिर न जाने कब लौटूँ, तब तक तो यहाँ घास जम जाएगा।

 

सूरदास-तो जब तुम आप ही अभी माया में फँसे हुए हो, तो मेरा उध्दार क्या करोगे?

 

दयागिरि-नहीं, अब जल्दी ही चलूँगा। जरा पूजा के लिए फूल लेता आऊँ।

 

दयागिरि चले गए तो सूरदास फिर सोच में पड़ा-संसार की भी क्या लीला है कि होम करते हाथ जलते हैं। मैं तो नेकी करने गया था,उसका यह फल मिला। मुहल्लेवालों को विश्वास आ गया। बुरी बातों पर लोगों को कितनी जल्दी विश्वास आ जाता है! मगर नेकी-बदी कभी छिपी नहीं रहती। कभी-न-कभी तो असली बात मालूम हो ही जाएगी। हार जीत तो जिंदगानी के साथ लगी हुई है, कभी जीतूँगा, तो कभी हारूँगा, इसकी चिंता ही क्या? अभी कल बड़े-बड़ों से जीता था, आज जीत में भी हार गया। यह तो खेल में हुआ ही करता है। वह बेचारी सुभागी कहाँ जाएगी? मुहल्लेवाले तो अब उसे यहाँ रहने न देंगे, और रहेगी किसके आधाार पर? कोई अपना तो हो। मैके में भी कोई नहीं है। जवान औरत अकेली कहीं रह भी नहीं सकती। जमाना खराब आया हुआ है, उसकी आबरू कैसे बचेगी? भैराें को कितना चाहती है?समझती थी कि मैं उसे मारने गया हूँ; उसे सावधाान रहने के लिए कितना जोर दे रही थी! वह तो इतना प्रेम करती है, और भैरों का कभी मुँह ही सीधाा नहीं होता, अभागिनी है और क्या। कोई दूसरा आदमी होता, तो उसके चरन धाो-धाोकर पीता; पर भैरों को जब देखो, उस पर तलवार ही खींचे रहता है। मैं कहीं चला गया, तो उसका कोई पुछत्तार भी न रहेगा। मुहल्ले के लोग उसकी छीछालेदर होते देखेंगे, और हँसेंगे! कहीं-न-कहीं डूब मरेगी, कहाँ तक संतोष करेगी। इस ऑंखोंवाले अंधो भैरों को तनिक भी खयाल नहीं कि मैं इसे निकाल दँगा, तो कहाँ जाएगी। कल को मुसलमान या किरिसतान हो जाएगी, तो सारे शहर में हलचल पड़ जाएगी; पर अभी उसके आदमी को कोई समझानेवाला नहीं। कहीं भरतीवालों के हाथ पड़ गई, तो पता भी न लगेगा कि कहाँ गई। सभी लोग जानकर अनजान बनते हैं।

 

वह यही सोचता-विचारता सड़क की ओर चला गया कि सुभागी आकर बोली-सूरे, मैं कहाँ रहूँगी?

 

सूरदास ने कृत्रिाम उदासीनता से कहा-मैं क्या जानूँ, कहाँ रहोगी! अभी तू ही तो भैरों से कह रही थी कि लाठी लेकर जाओ। तू क्या यह समझती थी कि मैं भैरों को मारने गया हूँ?

 

सुभागी-हाँ, सूरे, झूठ क्यों बोलूँ? मुझे यह खटका तो हुआ था।

 

सूरदास-जब तेरी समझ में मैं इतना बुरा हूँ, तो फिर मुझसे क्यों बोलती है? अगर वह लाठी लेकर आता और मुझे मारने लगता, तो तू तमासा देखती और हँसती, क्यों तुझसे तो भैरों ही अच्छा कि लाठी-लबेद लेकर नहीं आया। जब तूने मुझसे बैर ठान रखा है, तो मैं तुझसे क्यों न बैर ठानूँ?

 

सुभागी-(रोती हुई) सूरे, तुम भी ऐसा कहोगे, तो यहाँ कौन है, जिसकी आड़ में मैं छिन-भर भी बैठूँगी। उसने अभी मारा है, मगर पेट नहीं भरा, कह रहा है कि जाकर पुलिस में लिखाए देता हूँ। मेरे कपड़े-लत्तो सब बाहर फेंक दिए हैं। इस झोंपड़ी के सिवा अब मुझे और कहीं सरन नहीं।

 

सूरदास-मुझे भी अपने साथ मुहल्ले से निकलवाएगी क्या?

 

सुभागी-तुम जहाँ जाओगे, मैं तुम्हारे साथ चलूँगी।

 

सूरदास-तब तो तू मुझे कहीं मुँह दिखाने लायक न रखेगी। सब यही कहेंगे कि अंधाा उसे बहकाकर ले गया।

 

सुभागी-तुम तो बदनामी से बच जाओगे, लेकिन मेरी आबरू कैसे बचेगी? है कोई मुहल्ले में ऐसा, जो किसी की इज्जत-आबरू जाते देखे,तो उसकी बाँह पकड़ ले? यहाँ तो एक टुकड़ा रोटी भी माँगूँ, तो न मिले। तुम्हारे सिवा अब मेरे और कोई नहीं है। पहले मैं तुम्हें आदमी समझती थी, अब देवता समझती हूँ। चाहो तो रहने दो; नहीं तो कह दो, कहीं मुँह में कालिख लगाकर जा मरूँ।

 

सूरदास ने देर तक चिंता में मग्न रहने के बाद कहा-सुभागी, तू आप समझदार है, जैसा जी आए, कर। मुझे तेरा खिलाना-पहनाना भारी नहीं है। अभी शहर में इतना मान है कि जिसके द्वार पर खड़ा हो जाऊँगा, वह नाहीं न करेगा। लेकिन मेरा मन कहता है कि तेरे यहाँ रहने से कल्याण न होगा। हम दोनों ही बदनाम हो जाएँगे। मैं तुझे अपनी बहन समझता हूँ, लेकिन अंधाा संसार तो किसी की नीयत नहीं देखता। अभी तूने देखा, लोग कैसी-कैसी बातें करते रहे। पहले भी गाली उठ चुकी है। जब तू खुल्लमखुल्ला मेरे घर में रहेगी, तब तो अनरथ ही हो जाएगा। लोग गरदन काटने पर उतारू हो जाएँगे। बता, क्या करूँ?

 

सुभागी-जो चाहो करो, पर मैं तुम्हें छोड़कर कहीं न जाऊँगी।

 

सूरदास-यही तेरी मरजी, तो यही सही। मैं सोच रहा था, कहीं चला जाऊँ। न ऑंखों देखूँगा, न पीर होगी; लेकिन तेरी बिपत देखकर अब जाने की इच्छा नहीं होती। आ, पड़ी रह। जैसी कुछ सिर पर आएगी देखी जाएगी। तुझे मँझधाार में छोड़ देने से बदनाम होना अच्छा है।

 

यह कहकर सूरदास भीख माँगने चला गया। सुभागी झोंपड़ी में आ बैठी। देखा, तो उस मुख्तसर घर की मुख्तसर गृहस्थी इधार-उधार फैली हुई थी। कहीं लुटिया औंधाी पड़ी थी, कहीं घड़े लुढ़के हुए थे। महीनों से अंदर सफाई न हुई थी, जमीन पर मानो धाूल बैठी हुई थी। फूस के छप्पर में मकड़ियों ने जाले लगा लिए थे। एक चिड़िया का घोंसला भी बन गया था। सुभागी सारे दिन झोंपड़े की सफाई करती रही। शाम को वही घर जो ‘बिन घरनी घर भूत का डेरा’ को चरितार्थ कर रहा था, साफ-सुथरा, लिपा-पुता नजर आता था कि उसे देखकर देवतों को रहने के लिए जी ललचाए। भैरों तो अपनी दूकान में चला गया था, सुभागी घर जाकर अपनी गठरी उठा लाई। सूरदास संधया समय लौटा, तो सुभागी ने थोड़ा-सा चबेना उसे जल-पान करने को दिया, लुटिया में पानी लाकर रख दिया और अंचल से हवा करने लगी। सूरदास को अपने जीवन में कभी यह सुख और शांति न नसीब हुई थी। गृहस्थी के दुर्लभ आनंद का उसे पहली बार अनुभव हुआ। दिन-भर सड़क के किनारे लू और लपट में जलने के बाद यह सुख उसे स्वर्गोपम जान पड़ा। एक क्षण के लिए उसके मन में एक नई इच्छा अंकुरित हो आई। सोचने लगा-मैं कितना अभागा हूँ। काश, यह मेरी स्त्राी होती, तो कितने आनंद से जीवन व्यतीत होता! अब तो भैरों ने इसे घर से निकाल ही दिया; मैं रख लूँ, तो इसमें कौन-सी बुराई है! इससे कहूँ कैसे, न जाने अपने दिल में क्या सोचे। मैं अंधाा हूँ, तो क्या आदमी नहीं हूँ! बुरा तो न मानेगी? मुझसे इसे प्रेम न होता, तो मेरी इतना सेवा क्यों करती?

 

मनुष्य-मात्रा को, जीव-मात्रा को, प्रेम की लालसा रहती है। भोग-लिप्सु प्राणियाेंं में यह वासना का प्रकट रूप है, सरल हृदयहीन प्राणियों में शांति-भोग का।

 

सुभागी ने सूरदास की पोटली खोली, तो उसमें गेहूँ का आटा निकला, थोड़ा-सा चावल, कुछ चने और तीन आने पैसे। सुभागी बनिये के यहाँ से दाल लाई और रोटियाँ बनाकर सूरदास को भोजन करने को बुलाया।

 

सूरदास-मिठुआ कहाँ है?

 

सुभागी-क्या जानूँ, कहीं खेलता होगा। दिन में एक बार पानी पीने आया था, मुझे देखकर चला गया।

 

सूरदास-तुझसे सरमाता होगा। देख, मैं उसे बुलाए लाता हूँ।

 

यह कहकर सूरदास बाहर जाकर मिठुआ को पुकारने लगा। मिठुआ और दिन जब जी चाहता, घर में जाकर दाना निकाल लाता, भुनवाकर खाता; आज सारे दिन भूखों मरा। इस वक्त मंदिर में प्रसाद के लालच में बैठा हुआ था। आवाज सुनते ही दौड़ा। दोनों खाने बैठे। सुभागी ने सूरदास के सामने चावल और रोटियाँ रख दीं और मिठुआ के सामने सिर्फ चावल। आटा बहुत कम था, केवल दो रोटियाँ बन सकी थीं।

 

सूरदास ने कहा-मिट्ठू, और रोटी लोगे?

 

मिटठ्-मुझे तो रोटी मिली ही नहीं।

 

सूरदास-तो मुझसे ले लो। मैं चावल ही खा लूँगा।

 

यह कहकर सूरदास ने दोनों रोटियाँ मिट्ठू को दे दीं। सुभागी क्रुध्द होकर मिट्ठू से बोली-दिन-भर साँड की तरह फिरते हो, कहीं मजूरी क्यों नहीं करते? इसी चक्कीघर में काम करो, तो पाँच-छ: आने रोज मिलें।

 

सूरदास-अभी वह कौन काम करने लायक है। इसी उमिर में मजूरी करने लगेगा, तो कलेजा टूट जाएगा!

 

सुभागी-मजूरों के लड़कों का कलेज इतना नरम नहीं होता। सभी तो काम करने जाते हैं, किसी का कलेजा नहीं टूटता।

 

सूरदास-जब उसका जी चाहेगा, आप काम करेगा।

 

सुभागी-जिसे बिना हाथ-पैर हिलाए खाने को मिल जाए, उसकी बला काम करने जाती है।

 

सूरदास-ऊँह, मुझे कौन किसी रिन-धान का सोच है। माँगकर लाता हूँ, खाता हूँं। जिस दिन पौरुख न चलेगा, उस दिन देखी जाएगी। उसकी चिंता अभी से क्यों करूँ?

 

सुभागी-मैं इसे काम पर भेजूँगी। देखूँ, कैसे नहीं जाता। यह मुटरमरदी है कि अंधाा माँगे और ऑंखवाले मुसंडे बैठे खाएँ। सुनते हो मिट्ठू,कल से काम करना पड़ेगा।

 

मिट्ठू-तेरे कहने से न जाऊँगा; दादा कहेंगे तो जाऊँगा।

 

सुभागी-मूसल की तरह घूमना अच्छा लगता है? इतना नहीं सूझता कि अंधाा आदमी तो माँगकर लाता है, और मैं चैन से खाता हूँ। जनम-भर कुमार ही बने रहोगे?

 

मिट्ठू-तुझसे क्या मतलब, मेरा जी चाहेगा, जाऊँगा, न जी चाहेगा, न जाऊँगा।

 

इसी तरह दोनों में देर तक वाद-विवाद हुआ, यहाँ तक कि मिठुआ झल्लाकर चौके से उठ गया। सूरदास ने बहुत मनाया, पर वह खाने न बैठा। आखिर सूरदास भी आधाा ही भोजन करके उठ गया।

 

जब वह लेटा, तो गृहस्थी का एक दूसरा चित्रा उसके सामने था। यहाँ न वह शांति थी, न वह सुषमा, न वह मनोल्लास। पहले ही दिन यह कलह आरम्भ हुआ, बिस्मिल्लाह ही गलत हुई, तो आगे कौन जाने, क्या होगा। उसे सुभागी की यह कठोरता अनुचित प्रतीत होती थी। जब तक मैं कमाने को तैयार हूँ, लड़के पर क्यों गृहस्थी का बोझ डालूँ? जब मर जाऊँगा, तो उसके सिर पर जैसी पड़ेगी, वैसी झेलेगा।

 

वह अंकुर, वह नन्ही-सी आकांक्षा, जो संधया समय उसके हृदय में उगी थी, इस ताप के झोंके से जल गई, अंकुर सूख गया।

 

सुभागी को नई चिंता सवार हुई-मिठुआ को काम पर कैसे लगाऊँ? मैं कुछ उसकी लौंडी तो हूँ नहीं कि उसकी थाली धाोऊँ, उसका खाना पकाऊँ और वह मटर-गस करे। मुझे भी कोई बिठाकर न खिलाएगा। मैं खाऊँ ही क्यों? जब सब काम करेंगे, तो यह क्यों छैला बना घूमेगा!

 

प्रात:काल जब वह झोंपड़ी से घड़ा लेकर पानी भरने निकली, तो घीसू की माँ ने देखकर छाती पर हाथ रख लिया और बोली-क्यों री, आज रात तू यहीं रही थी क्या?

 

सुभागी ने कहा-हाँ रही तो, फिर!

 

जमुनी-अपना घर नहीं था।

 

सुभागी-अब लात खाने की बूता नहीं है।

 

जमुनी-तो तू दो-चार सिर कटाकर तब चैन लेगी? इस अंधो की भी मत मारी गई है कि जान-बूझकर साँप के मुँह में उँगली देता है। भैरों गला काट लेनेवाले आदमी हैं। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, चली जा घर।

 

सुभागी-उस घर में तो अब पाँव न रखूँगी, चाहे कोई मार डाले। सूरे में इतनी दया तो है कि डूबते हुए की बाँह पकड़ ली; और दूसरा यहाँ कौन है?

 

जमुनी-जिस घर में कोई मेहरिया नहीं, वहाँ तेरा रहना अच्छा नहीं।

 

सुभागी-जानती हूँ, पर किसके घर जाऊँ? तुम्हारे घर आऊँ, रहने दोगी? जो कुछ करने को कहोगी, करूँगी, गोबर पाथूँगी, भैंसों को घास-चारा दूँगी, पानी डालूँगी, तुम्हारा आटा पिसूँगी। रखोगी?

 

जमुनी-न बाबा, यहाँ कौन बैठे-बिठाए रार मोल ले! अपना खिलाऊँ भी, उस पर बद्दू भी बनूँ।

 

सुभागी-रोज गाली-मार खाया करूँ?

 

जमुनी-अपना मरद है, मारता ही है, तो क्या घर छोड़कर कोई निकल जाता है?

 

सुभागी-क्यों बहुत बढ़-बढ़कर बात करती हो जमुनी! मिल गया है बैल, जिस कल चाहती हो, बैठाती हो। रात-दिन डंडा लिए सिर पर सवार रहता, तो देखती कि कैसे घर में रहती। अभी उस दिन दूधा में पानी मिलाने के लिए मारने उठा था, तो चादर लेकर मैके भागी जाती थी। दूसरों को उपदेश करना सहज नहीं है। जब अपने सिर पड़ती है, तो ऑंखें खुल जाती हैं।

 

यह कहती हुई सुभागी कुएँ पर पानी भरने चली गई। यहाँ भी उसने टीकाकारों को ऐसा ही अक्खड़ जवाब दिया। पानी लाकर बर्तन धाोये,चौका लगाया और सूरदास को सड़क पर पहुँचाने चली गई। अब तक वह लाठी से टटोलता हुआ अकेले ही चला जाता था, लेकिन सुभागी से यह न देखा गया। अंधाा आदमी है, कहीं गिर पड़े तो, लड़के ही दिक करते हैं। मैं बैठी ही तो हूँ। उससे फिर किसी ने कुछ न पूछा। यह स्थिर हो गया कि सूरदास ने उसे घर डाल लिया। अब व्यंग्य, निंदा, उपहास की गुंजाइश न थी। हाँ, सूरदास सबकी नजरों में गिर गया। लोग कहते-रुपये न लौटा देता, तो क्या करता। डर होगा कि सुभागी एक दिन भैरों से कह ही देगी, मैं पहले ही से क्यों न चौकन्ना हो जाऊँ। मगर सुभागी क्यों अपने घर से रुपये उड़ा ले गई? वाह! इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है? भैरों उसे रुपये-पैसे नहीं देता। मालकिन तो बुढ़िया है। सोचा होगा, रुपये उड़ा लूँ, मेरे पास कुछ पूँजी तो हो जाएगी, अपने पास कहाँ। कौन जाने, दोनों में पहले ही से साठ-गाँठ रही हो। सूरे को भला आदमी समझकर उसके पास रख आई हो। या सूरदास ने रुपये उठवा लिए हों, फिर लौटा आया हो कि इस तरह मेरा भरम बना रहेगा। अंधो पेट के बड़े गहरे होते हैं, इन्हें बड़ी दूर की सूझती है।

 

इस भाँति कई दिनों तक गद्देबाजियाँ हुईं।

 

परंतु लोगों में किसी विषय पर बहुत दिनों तक आलोचना करते रहने की आदत नहीं होती। न उन्हें इतना अवकाश होता है कि इन बातों में सिर खपाएँ, न इतनी बुध्दि ही कि इन गुत्थियों को सुलझाएँ। मनुष्य स्वभावत: क्रियाशील होते हैं, उनमें विवेचन-शक्ति कहाँ? सुभागी से बोलने-चालने, उसके साथ उठने-बैठने में किसी को आपत्तिा न रही; न कोई उससे कुछ पूछता, न आवाजें कसता। हाँ, सूरदास की मान-प्रतिष्ठा गायब हो गई। पहले मुहल्ले-भर में उसकी धााक थी, लोगों को उसकी हैसियत से कहीं अधिाक उस पर विश्वास था। उसका नाम अदब के साथ लिया जाता था। अब उसकी गणना भी सामान्य मनुष्यों में होने लगी, कोई विशेषता न रही।

 

किंतु भैरों के हृदय में सदैव यह काँटा खटका करता था। वह किसी भाँति इस सजीव अपमान का बदला लेना चाहता था। दूकान पर बहुत कम जाता। अफसरों से शिकायत भी की गई कि यह ठेकेदार दूकान नहीं खोलता, ताड़ी-सेवियों को निराश होकर जाना पड़ता है। मादक वस्तु-विभाग के कर्मचारियों ने भैरों को निकाल देने की धामकी भी दी; पर उसने कहा, मुझे दूकान का डर नहीं, आप लोग जिसे चाहें रख लें। पर वहाँ कोई दूसरा पासी न मिला और अफसरों ने एक दूकान टूट जाने के भय से कोई सख्ती करनी उचित न समझी।

 

धाीरे-धाीरे भैरों की सूरदास ही से नहीं, मुहल्ले-भर से अदावत हो गई। उसके विचार में मुहल्लेवालों का यह धार्म था कि मेरी हिमायत के लिए खड़े हो जाते और सूरे को कोई ऐसा दंड देते कि वह आजीवन याद रखता-ऐसे मुहल्ले में कोई क्या रहे, जहाँ न्याय और अन्याय एक ही भाव बिकते हैं। कुकर्मियों से कोई बोलता ही नहीं। सूरदास अकड़ता हुआ चला जाता है। यह चुड़ैल ऑंखों में काजल लगाए फिरा करती है। कोई इन दोनों के मुँह में कालिख नहीं लगाता। ऐसे गाँव में तो आग लगा देनी चाहिए। मगर किसी कारण उसकी क्रियात्मक शक्ति शिथिल पड़ गई थी। वह मार्ग मेंं सुभागी को देख लेता, तो कतराकर निकल जाता। सूरदास को देखता तो ओठ चबाकर रह जाता। वार करने की हिम्मत न होती। वह अब कभी मंदिर में भजन गाने न जाता; मेलों-तमाशों से भी उसे अरुचि हो गई, नशे का चस्का आप-ही-आप छूट गया। अपमान की तीव्र वेदना निरंतर होती रहती। उसने सोचा था, सुभागी मुँह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाएगी, मेरे कलंक का दाग मिट जाएगा। मगर वह अभी तक वहाँ उसकी छाती पर मूँग ही नहीं दल रही थी, बल्कि उसी पुरुष के साथ विलास कर रही थी, जो उसका प्रतिद्वंद्वी था। सबसे बढ़कर दु:ख उसे इस बात का था कि मुहल्ले के लोग उन दोनों के साथ पहले ही का-सा व्यवहार करते थे, कोई उन्हें न रगेदता था, न लताड़ता था। उसे अपना अपमान सामने बैठा मुँह चिढ़ाता हुआ मालूम होता था। अब उसे गाली-गलौज से तस्कीन न हो सकती थी। वह इस फिक्र में था कि इन दोनों का काम तमाम कर दूँ। इस तरह मारूँ कि एड़ियाँ रगड़-रगड़कर मरें, पानी की बूँद भी न मिले। लेकिन अकेला आदमी क्या कर सकता है? चारों ओर निगाह दौड़ाता, पर कहीं से सहायता मिलने की आशा न दिखाई देती। मुहल्ले में ऐसे जीवट का कोई आदमी न था। सोचते-सोचते उसे खयाल आया कि अंधो ने चतारी के राजा साहब को बहुत बदनाम किया था। कारखानेवाले साहब को भी बदनाम करता फिरता था। इन्हीं लोगों से चलकर फरियाद करूँ। अंधो से दिल में तो दोनों खार खाते ही होंगे, छोटे के मुँह लगना अपनी मर्यादा के विरुध्द समझकर चुप रह गए होंगे। मैं जो सामने खड़ा हो जाऊँगा, तो मेरी आड़ से वे जरूर निशाना मारेंगे। बड़े आदमी हैं, वहाँ तक पहुँचना मुश्किल है; लेकिन जो कहीं मेरी पहुँच हो गई और उन्होंने मेरी सुन ली, तो फिर इन बच्चा की ऐसी खबर लेंगे कि सारा अंधाापन निकल जाएगा। (अंधोपन के सिवा यहाँ और रखा ही क्या था।)

 

कई दिनों तक वह इसी हैस-बैस में पड़ा रहा कि उन लोगों के पास कैसे पहुँचूँ। जाने की हिम्मत न पड़ती थी। कहीं उलटे मुझी को मार बैठें, निकलवा दें तो और भी भद्द हो। आखिर एक दिन दिल मजबूत करके वह राजा साहब के मकान पर गया, और साईस के द्वार पर जाकर खड़ा हो गया। साईस ने देखा, तो कर्कश कंठ से बोला-कौन हो! यहाँ क्या उचक्कों की तरह झाँक रहे हो?

 

भैरों ने बड़ी दीनता से कहा-भैया, डाँटो मत, गरीब-दुखी आदमी हूँ।

 

साईस-गरीब दुखियारे हो, तो किसी सेठ-साहूकार के घर जाते, यहाँ क्या रखा है?

 

भैरों-गरीब हूँ, लेकिन भिखमंगा नहीं हूँ। इज्जत-आबरू सभी की होती है। तुम्हारी ही बिरादरी में कोई किसी की बहू-बेटी को लेकर निकल जाए, तो क्या उसे पंचाइत यों ही छोड़ देगी? कुछ-न-कुछ दंड देगी ही। पंचाइत न देगी, तो अदालत-कचहरी से तो कुछ होगा।

 

साईस जात का चमार था, जहाँ ऐसी दुर्घटनाएँ आए दिन होती रहती हैं, और बिरादरी को उनकी बदौलत नशा-पानी का सामान हाथ आता रहता है। उसके घर में नित्य यही चर्चा रहती थी। इन बातों में उसे जितनी दिलचस्पी थी, उतनी और किसी बात से न हो सकती थी। बोला-आओ बैठो, चिलम पियो, कौन भाई हो?

 

भैरों-पासी हूँ, यहीं पाँडेपुर में रहता हूँ।

 

वह साईस के पास जा बैठा और दोनों में सायँ-सायँ बातें होने लगीं, मानो वहाँ कोई कान लगाए उनकी बातें सुन रहा हो। भैरों ने अपना सम्पूर्ण वृत्ताांत सुनाया और कमर से एक रुपया निकालकर साईस के हाथ में रखता हुआ बोला-भाई, कोई ऐसी जुगुत निकालो कि राजा साहब के कानों में यह बात पड़ जाए। फिर तो मैं अपना सब हाल आप ही कह लूँगा। तुम्हारी दया से बोलने-चालने में ऐसा बुध्दू नहीं हूँ। दारोगा से तो कभी डरा ही नहीं।

 

साईस को रौप्य मुद्रा के दर्शन हुए, तो मगन हो गया। आज सबेरे-सबेरे अच्छी बोहनी हुई। बोला-मैं राजा साहब से तुम्हारी इत्ताला कराए देता हूँ। बुलाहट होगी, तो चले जाना। राजा साहब को घमंड तो छू ही नहीं गया। मगर देखना, बहुत देर न लगाना, नहीं तो मालिक चिढ़ जाएँगे। बस, जो कुछ कहना हो, साफ-साफ कह डालना। बड़े आदमियाेंं को बातचीत करने की फुरसत नहीं रहती। मेरी तरह थोड़े ही हैं कि दिन-भर बैठे गप्पें लड़ाया करें।

 

यह कहकर वह चला गया। राजा साहब इस वक्त बाल बनवा रहे थे, जो उनका नित्य का नियम था। साईस ने पहुँचकर सलाम किया।

 

राजा-क्या कहते हो? मेरे पास तलब के लिए मत आया करो।

 

साईस-नहीं हुजूर, तलब के लिए नहीं आया था। वह जो सूरदास पाँडेपुर में रहता है।

 

राजा-अच्छा, वह दुष्ट अंधाा!

 

साईस-हाँ हुजूर, वह एक औरत को निकाल ले गया है।

 

राजा-अच्छा! उसे तो लोग कहते थे, बड़ा भला आदमी है। अब यह स्वाँग रचने लगा!

 

साईस-हाँ हुजूर, उसका आदमी फरियाद करने आया है। हूकुम हो, तो लाऊँ।

 

राजा साहब ने सिर हिलाकर अनुमति दी और एक क्षण में भैरों दबकता हुआ आकर खड़ा हो गया।

 

राजा-तुम्हारी औरत है?

 

भैरों-हाँ हुजूर, अभी कुछ दिन पहले तो मेरी ही थी!

 

राजा-पहले से कुछ आमद-रफ्त थी?

 

भैरों-होगी सरकार, मुझे मालूम नहीं।

 

राजा-लेकर कहाँ चला गया?

 

भैरों-कहीं गया नहीं सरकार, अपने घर में है।

 

राजा-बड़ा ढीठ है। गाँववाले कुछ नहीं बोलते?

 

भैरों-कोई नहीं बोलता, हुजूर!

 

राजा-औरत को मारते बहुत हो?

 

भैरों-सरकार, औरत से भूल-चूक होती है, तो कौन नहीं मारता?

 

राजा-बहुत मारते हो कि कम?

 

भैरों-हुजूर, क्रोधा में यह विचार कहाँ रहता है।

 

राजा-कैसी औरत है, सुंदर?

 

भैरों-हाँ, हुजूर, देखने-सुनने में बुरी नहीं है।

 

राजा-समझ में नहीं आता, सुंदर स्त्राी ने अंधो को क्यों पसंद किया! ऐसा तो नहीं हुआ कि तुमने दाल में नमक ज्यादा हो जाने पर स्त्राी को मारकर निकाल दिया हो और अंधो ने रख लिया हो?

 

भैरों-सरकार, औरत मेरे रुपये चुराकर सूरदास को दे आई। सबेरे सूरदास रुपये लौटा गया। मैंने चकमा देकर पूछा, तो उसने चोर को भी बता दिया। इस बात पर मारता न, तो क्या करता?

 

राजा-और कुछ हो, अंधाा है दिल का साफ।

 

भैरों-हुजूर, नीयत का अच्छा नहीं।

 

यद्यपि महेंद्रकुमारसिंह बहुत न्यायशील थे और अपने कुत्सित मनोविचारों को प्रकट करने में बहुत सावधाान रहते थे। ख्याति-प्रिय मनुष्य को प्राय: अपनी वाणी पर पूर्ण अधिाकार होता है; पर वह सूरदास से इतने जले हुए थे, उसके हाथों इतनी मानसिक यातनाएँ पाई थीं कि इस समय अपने भावों को गुप्त न रख सके। बोले-अजी, उसने मुझे यहाँ इतना बदनाम किया कि घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया। क्लार्क साहब ने जरा उसे मुँह क्या लगा लिया कि सिर चढ़ गया। यों मैं किसी गरीब को सताना नहीं चाहता, लेकिन यह भी नहीं देख सकता कि वह भले आदमियों के बाल नोचे। इजलास तो मेरा ही है, तुम उस पर दावा कर दो। गवाह मिल जाएँगे न?

 

भैरों-हुजूर, सारा मुहल्ला जानता है।

 

राजा-सबों को पेश करो। यहाँ लोग उसके भक्त हो गए हैं। समझते हैं, वह कोई ऋषि है। मैं उसकी कलई खोल देना चाहता हूँ। इतने दिनों बाद यह अवसर मेरे हाथ आया है। मैंने अगर अब तक किसी से नीचा देखा, तो इसी अंधो से। उस पर न पुलिस का जोर था, न अदालत का। उसकी दीनता और दुर्बलता उसका कवच बनी हुई थी। यह मुकदमा उसके लिए वह गहरा गङ्ढा होगा, जिसमें से वह निकल न सकेगा। मुझे उसकी ओर से शंका थी, पर एक बार जहाँ परदा खुला कि मैं निश्ंचित हुआ। विष के दाँत टूट जाने पर साँप से कौन डरता है? हो सके, तो जल्दी ही मुकदमा दायर कर दो।

 

किसी बड़े आदमी को रोते देखकर हमें उससे स्नेह हो जाता है। उसे प्रभुत्व से मंडित देखकर हम थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं कि वह भी मनुष्य है। हम उसे साधाारण मानवीय दुर्बलताओं से रहित समझते हैं। वह हमारे लिए एक कुतूहल का विषय होता है। हम समझते हैं,वह न जाने क्या खाता होगा, न जाने क्या पीता होगा, न जाने क्या सोचता होगा, उसके दिल में सदैव ऊँचे-ऊँचे विचार आते होंगे, छोटी-छोटी बातों की ओर तो उसका धयान ही न जाता होगा-कुतूहल का परिष्कृत रूप ही आदर है। भैरों को राजा साहब के सम्मुख जाते हुए भय लगता था, लेकिन अब उसे ज्ञात हुआ कि यह भी हमीं-जैसे मनुष्य हैं। मानो उसे आज एक नई बात मालूम हुई। जरा बेधाड़क होकर बोला-हुजूर, है तो अंधाा, लेकिन बड़ा घमंडी है। आपने आगे तो किसी को समझता ही नहीं। मुहल्लेवाले जरा सूरदास-सूरदास कह देते हैं, तो बस, फूल उठता है। समझता है, संसार में जो कुछ हूँ, मैं ही हूँ। हुजूर, उसकी ऐसी सजा कर दें कि चक्की पीसते-पीसते दिन जाएँ। तब उसकी सेखी किरकिरी होगी।

 

राजा साहब ने त्योरी बदली। देखा, यह गँवार अब ज्यादा बहकने लगा। बोले-अच्छा, अब जाओ।

 

भैरों दिल में समझ रहा था, मैंने राजा साहब को अपनी मुट्ठी में कर लिया। अगर उसे चले जाने का हुक्म न मिला होता, तो एक क्षण में उसका ‘हुजूर’ ‘आप’ हो जाता। संधया तक उसकी बातों का ताँता न टूटता। वह न जाने कितनी झूठी बातें गढ़ता। पर-निंदा का मनुष्य की जिह्ना पर कभी इतना प्रभुत्व नहीं होता, जितना सम्पन्न पुरुषों के सम्मुख। न जानें क्यों हम उनकी कृपा-दृष्टि के इतने अभिलाषी होते हैं! हम ऐसे मनुष्यों पर भी, जिनसे हमारा लेश मात्रा भी वैमनस्य नहीं है, कटाक्ष करने लगते हैं। कोई स्वार्थ की इच्छा न रखते हुए भी हम उनका सम्मान प्राप्त करना चाहते हैं। उनका विश्वासपात्रा बनने की हमें एक अनिवार्य आंतरिक प्रेरणा होती है। हमारी वाणी उस समय काबू से बाहर हो जाती है।

 

भैरों यहाँ से कुछ लज्जित होकर निकला, पर उसे अब इसमें संदेह न था कि मनोकामना पूरी हो गई। घर आकर उसने बजरंगी से कहा-तुम्हें गवाही करनी पड़ेगी। निकल न जाना।

 

बजरंगी-कैसी गवाही?

 

भैरों-यही मेरे मामले की। इस अंधो की हेकड़ी अब नहीं देखी जाती। इतने दिनों तक सबर किए बैठा रहा कि अब भी वह सुभागी को निकाल दे, उसका जहाँ जी चाहे, चली जाए, मेरी ऑंखों के सामने से दूर हो जाए। पर देखता हूँ, तो दिन-दिन उसकी पेंग बढ़ती ही जाती है। अंधाा छैला बना जाता है। महीनों देह पर पानी नहीं पड़ता था, अब नित्य स्नान करता है। वह पानी लाती है, उसकी धाोती छाँटती है,उसके सिर में तेल मलती है। यह ऍंधोर नहीं देखा जाता।

 

बजरंगी-ऍंधोर तो है ही, ऑंखों से देख रहा हूँ। सूरे को इतना छिछोरा न समझता था। पर मैं कहीं गवाही-साखी करने न जाऊँगा।

 

जमुनी-क्यों कचहरी में कोई तुम्हारे कान काट लेगा?

 

बजरंगी-अपना मन है, नहीं जाते।

 

जमुनी-अच्छा तुम्हारा मन है! भैरों, तुम मेरी गवाही लिखा दो। मैं चलकर गवाही दूँगी। साँच को ऑंच क्या?

 

बजरंगी-(हंसकर) तू कचहरी जाएगी?

 

जमुनी-क्या करूँगी जब मरदों की वहाँ जाते चूड़ियाँ मैली होती हैं, तो औरत ही जाएगी। किसी तरह उस कसबिन के मुँह में कालिख तो लगे।

 

बजरंगी-भैरों, बात यह है कि सूरे ने बुराई जरूर की, लेकिन तुम भी तो अनीत ही पर चलते थे। कोई अपने घर के आदमी को इतनी बेदरदी से नहीं मारता। फिर तुमने मारा ही नहीं, मारकर निकाल भी दिया। जब गाय की पगहिया न रहेगी तो वह दूसरों के खेत में जाएगी ही। इसमें उसका क्या दोस?

 

जमुनी-तुम इन्हेंं बकने दो भैरों, मैं तुम्हारी गवाही करूँगी।

 

बजरंगी-तू सोचती होगी, यह धामकी देने से मैं कचहरी जाऊँगा; यहाँ इतने बुध्दू नहीं हैं। और, सच्ची बात तो यह है कि सूरे लाख बुरा हो,मगर अब भी हम सबों से अच्छा है। रुपयों की थैली लौटा देना कोई छोटी बात नहीं।

 

जमुनी-बस चुप रहो, मैं तुम्हें खूब समझती हूँ। तुम भी जाकर चार गाल हँस-बोल आते हो न, क्या इतनी यारी भी न निभाओगे! सुभागी को सजा हो गई, तो तुम्हें भी तो नजर लड़ाने को कोई न रहेगा।

 

बजरंगी यह लांछन सुनकर तिलमिला उठा। जमुनी उसका आसन पहचानती थी, बोला-मुँह में कीड़े पड़ जाएँगे।

 

जमुनी-तो फिर गवाही देते क्यों कोर दबती है?

 

बजरंगी-लिखा दो भैरों, मेरा नाम, यह चुडैल मुझे जीने न देगी। मैं अगर हारता हूँ, तो इसी से। पीठ में अगर धाूल लगाती है, तो यह। नहीं तो यहाँ कभी किसी से दबकर नहीं चले। जाओ, लिखा दो।

 

भैरों यहाँ से ठाकुरदीन के पास गया और वही प्रस्ताव किया। ठाकुरदीन ने कहा-हाँ-हाँ, मैं गवाही करने को तैयार हूँ। मेरा नाम सबसे पहले लिखा दो। अंधो को देखकर मेरी तो अब ऑंखें फूटती हैं। अब मुझे मालूम हो गया कि उसे जरूर कोई सिध्दि है; नहीं तो क्या सुभागी उसके पीछे यों दौड़ी-दौड़ी फिरती।

 

भैरों-चक्की पीसेें, तो बचा को मालूम हो जाएगा।

 

ठाकुरदीन-ना भैया, उसका अकबाल भारी है, वह कभी चक्की न पीसेगा, वहाँ से भी बेदाग लौट आएगा। हाँ, गवाही देना मेरा धारम है, वह मैं दे दूँगा। जो आदमी सिध्दि से दूसरों को अनभल करे, उसकी गरदन काट लेनी चाहिए। न जाने क्यों भगवान् संसार में चोरों और पापियों को जन्म देते हैं। यही समझ लो कि जब से मेरी चोरी हुई, कभी नींद-भर नहीं सोया। नित्य वही चिंता बनी रहती है। यही खटका लगा रहता है कि कहीं फिर न वही नौबत आ जाए। तुम तो एक हिसाब से मजे में रहे कि रुपये सब मिल गए, मैं तो कहीं का न रहा।

 

भैरों-तो तुम्हारी गवाही पक्की रही?

 

ठाकुरदीन-हाँ, एक बार नहीं, सौ बार पक्की। अरे, मेरा बस चलता, तो इसे खोदकर गाड़ देता। यों मुझसे सीधाा कोई नहीं है, लेकिन दुष्टों के हक में मुझसे टेढ़ा भी कोई नहीं है। इनको सजा दिलाने के लिए मैं झूठी गवाही देने को भी तैयार हूँ। मुझे तो अचरज होता है कि इस अंधो को क्या हो गया। कहाँ तो धारम-करम का इतना विचार, इतना परोपकार, इतना सदाचार, और कहाँ यह कुकर्म!

 

भैरों यहाँ से जगधार के पास गया, जो अभी खाेंंचा बेचकर लौटा था और धाोती लेकर नहाने जा रहा था।

 

भैरों-तुम भी मेरे गवाह हो न?

 

जगधार-तुम हक-नाहक सूरे पर मुकदमा चला रहे हो। सूरे निरपराधा हैं।

 

भैरों-कसम खाओगे?

 

जगधार-हाँ, जो कसम कहो, खा जाऊँ। तुमने सुभागी को अपने घर से निकाल दिया, सूरे ने उसे अपने घर में जगह दे दी। नहीं तो अब तक वह न जाने किस घाट लगी होती। जवान औरत है, सुंदर है, उसके सैकड़ों गाहक हैं। सूरे ने तो उसके साथ नेकी की कि उसे कहीं बहकने नहीं दिया। अगर तुम फिर उसे घर में लाकर रखना चाहो, और वह उसे आने न दे, तुमसे लड़ने पर तैयार हो जाए, तब मैं कहूँगा कि उसका कसूर है। मैंने अपने कानों से उसे सुभागी को समझाते सुना है। वह आती ही नहीं, तो बेचारा क्या करे?

 

भैरों समझ गया कि यह एक लोटे जल से प्रसन्न हो जानेवाले देवता नहीं, इसे कुछ भेंट करनी पड़ेगी। उसकी लोभी प्रकृत्तिा से वह परिचित था।

 

बोला-भाई, मुआमला इज्जत का है। ऐसी उड़नझाइयाँ न बताओ। पड़ोसी का हक बहुत कुछ होता है; पर मैं तुमसे बाहर नहीं हूँ, जो कुछ दस-बीस कहो, हाजिर है। पर गवाही तुम्हें देनी पड़ेगी।

 

जगधार-भैरों, मैं बहुत नीच हूँ, लेकिन इतना नीच नहीं कि जान-सुनकर किसी भले आदमी को बेकसूर फँसाऊँ।

 

भैरों ने बिगड़कर कहा-तो क्या समझते हो कि तुम्हारे ही नाम खुदाई लिख गई है? जिस बात को सारा गाँव कहेगा, उसे एक तुम न कहोगे, तो क्या बिगड़ जाएगा? टिव्ी के रोके ऑंधाी नहीं रुक सकती।

 

जगधार-तो भाई, उसे पीसकर पी जाओ। मैं कब कहता हूँ कि मैं उसे बचा लूँगा। हाँ, मैं उसे पीसने में तुम्हारी मदद न करूँगा।

 

भैरों तो उधार गया, इधार वही स्वार्थी, लोभी,र् ईष्यालु, कुटिल जगधार उसके गवाहों को फोड़ने का प्रयत्न करने लगा। उसे सूरदास से इतनी भक्ति न थी, जितनी भैरों सेर् ईष्या। भैरों अगर किसी सत्कर्म में भी उसकी सहायता माँगता, तो भी वह इतनी ही तत्परता से उसकी उपेक्षा करता।

 

उसने बजरंगी के पास जाकर कहा-क्यों बजरंगी, तुम भी भैरों की गवाही कर रहे हो?

 

बजरंगी-हाँ, जाता तो हूँ।

 

जगधार-तुमने अपनी ऑंखों कुछ देखा है।

 

बजरंगी-कैसी बातें करते हो, रोज की देखता हूँ, कोई बात छिपी थोड़े ही है।

 

जगधार-क्या देखते हो? यही न कि सुभागी सूरदास के झोंपड़े में रहती है? अगर कोई एक अनाथ औरत का पालन करे, तो बुराई है?अंधो आदमी के जीवट का बखान तो न करोगे कि जो काम किसी से न हो सका, वह उसने कर दिखाया, उलटे उससे और बैर साधाते हो। जानते हो, सूरदास उसे घर से निकाल देगा, तो उसकी क्या गत होगी? मुहल्ले की आबरू पुतलीघर के मजदूरों के हाथ बिकेगी। देख लेना। मेरा कहना मानो, गवाही-साखी के फेर में न पड़ो, भलाई के बदले बुराई हो जाएगी। भैरों तो सुभागी से इसलिए जल रहा है कि उसने उसके चुराए हुए रुपये सूरदास को क्यों लौटा दिए। बस, सारी जलन इसी की है। हम बिना जाने-बूझे क्यों किसी की बुराई करें? हाँ, गवाही देने ही जाते हो, तो पहले खूब पता लगा लो कि दोनों कैसे रहते हैं…

 

बजरंगी-(जमुनी की तरफ इशारा करके) इसी से पूछो, यही अंतरजामी है, इसी ने मुझे मजबूर किया है।

 

जमुनी-हाँ, किया तो है, क्या अब भी दिल काँप रहा है?

 

जगधार-अदालत में जाकर गवाही देना क्या तुमने हँसी समझ ली है? गंगाजली उठानी पड़ती है, तुलसी-जल लेना पड़ता है, बेटे के सिर पर हाथ रखना पड़ता है। इसी से बाल-बच्चेवाले डरते हैं कि और कुछ!

 

जमुनी-सच कहो, ये सब कसमें भी खानी पड़ती हैं?

 

जगधार-बिना कसम खाए तो गवाही होती ही नहीं।

 

जमुनी-तो भैया, बाज आई ऐसी गवाहों से, कान पकड़ती हूँ। चूल्हे में जाए सूरा और भाड़ में जाए भैरों, कोई बुरे दिन काम न आएगा। तुम रहने दो।

 

बजरंगी-सूरदास को लकड़पन से देख रहे हैं, ऐसी आदत तो उसमें न थी।

 

जगधार-न थी, न है और न होगी। उसकी बड़ाई नहीं करता, पर उसे लाख रुपये भी दो, तो बुराई में हाथ न डालेगा। कोई दूसरा होता, तो गया हुआ धान पाकर चुपके से रख लेता, किसी को कानोंकान खबर भी न होती। वह तो जाकर सब रुपये दे आया। उसकी सफाई तो इतने ही से हो जाती है।

 

बजरंगी को तोड़कर जगरधा ने ठाकुरदीन को घेरा। पूजा करके भोजन करने जा रहा था। जगधार की आवाज सुनकर बोला-बैठो, खाना खाकर आता हूँ।

 

जगधार-मेरी बात सुन लो, तो खाने बैठो। खाना कहीं भागा नहीं जाता है। तुम भी भैरों की गवाही देने जा रहे हो?

 

ठाकुरदीन-हाँ, जाता हूँ। भैरों ने न कहा होता, तो आप ही जाता। मुझसे यह अनीत नहीं देखी जाती। जमाना दूसरा है, नहीं नवाबी होती,तो ऐसे आदमी का सिर काट लिया जाता। किसी की बहू-बेटी को निकाल ले जाना कोई हँसी-ठट्ठा है?

 

जगधार-जान पड़ता है, देवतों की पूजा करते-करते तुम भी अंतरजामी हो गए हो। पूछता हूँ, किस बात की गवाही दोगे?

 

ठाकुरदीन-कोई लुका-छिपी बात है, सारा देस जानता है।

 

जगधार-सूरदास बड़ा गबरू जवान है, इसी से सुंदरी का मन उस पर लोट-पोट हो गया होगा, या उसके घर रुपये-पैसे, गहने-जेवर के ढेर लगे हुए हैं, इसी से औरत लोभ में पड़ गई होगी। भगवान् को देखा नहीं, लेकिन अकल से तो पहचानते हो। आखिर क्या देखकर सुभागी ने भैरों को छोड़ दिया और सूरे के घर पड़ गई?

 

ठाकुरदीन-कोई किसी के मन की बात क्या जाने, और औरत के मन की बात तो भगवान् भी नहीं जानते। देवता लोग तक उससे त्रााह-त्रााह करते हैं!

 

जगधार-अच्छा, तो जाओ, मगर यह कहे देता हूँ कि इसका फल भोगना पड़ेगा। किसी गरीब पर झूठा अपराधा लगाने से बड़ा दूसरा पाप नहीं होता।

 

ठाकुरदीन-झूठा अपराधा है?

 

जगधार-झूठा है, सरासर झूठा; रत्ताी-भर भी सच नहीं। बेकस की वह हाय पड़ेगी कि जिंदगानी भर याद करोगे। जो आदमी अपना गया हुआ धान पाकर लौटा दे, वह इतना नीच नहीं हो सकता।

 

ठाकुरदीन-(हँसकर) यही तो अंधो की चाल है। कैसी दूर की सूझी है कि जो सुने, चक्कर में आ जाए।

 

जगधार-मैंने जता दिया, आगे तुम जानो, तुम्हारा काम जाने। रखोगे सुभागी को अपने घर में? मैं उसे सूरे के घर से लिवाए लाता हूँ,अगर फिर कभी सूरे को उससे बातें करते देखना, तो जो चाहना, सो करना। रखोगे?

 

ठाकुरदीन-मैं क्यों रखने लगा!

 

जगधार-तो अगर शिवजी ने संसार-भर का बिस माथे पर चढ़ा लिया, तो क्या बुरा किया? जिसके लिए कहीं ठिकाना नहीं था, उसे सूरे ने अपने घर में जगह दी। इस नेकी की उसे यह सजा मिलनी चाहिए? यही न्याय है? अगर तुम लोगों के दबाव में आकर सूरे ने सुभागी को घर से निकाल दिया और उसकी आबरू बिगड़ी, तो उसका पाप तुम्हारे सिर भी पड़ेगा। याद रखना।

 

ठाकुरदीन देवभीरु आत्मा था, दुविधाा में पड़ गया। जगधार ने आसन पहचाना, इसी ढंग से दो-चार बातें और कीं। आखिर ठाकुरदीन गवाही देने से इनकार करने लगा। जगधार कीर् ईष्या किसी साधाु के उपदेश का काम कर गई। संधया होते-होते भैरों को मालूम हो गया कि मुहल्ले में कोई गवाह न मिलेगा। दाँत पीसकर रह गया। चिराग जल रहे थे। बाजार की और दूकानें बंद हो रही थीं। ताड़ी की दूकान खोलने का समय आ रहा था। ग्राहक जमा होते जाते थे। बुढ़िया चिखौने के लिए मटर के दालमोट और चटपटे पकौड़े बना रही थी, और भैरों द्वार पर बैठा हुआ जगधार को, मुहल्लेवालों को और सारे संसार को चौपालियाँ सुना रहा था-सब-के-सब नामरदे हैं, ऑंख के अंधो, जभी यह दुरदसा हो रही है। कहते हैं, सूखा क्यों पड़ता है, प्लेग क्यों आता है, हैजा क्यों फैलता है, जहाँ ऐसे-ऐसे बेईमान, पापी, दुष्ट बसेंगे, वहाँ और होगा ही क्या। भगवान इस देस को गारत क्यों नहीं कर देते, यही अचरज है। खैर, जिंदगानी है, तो हम और जगधार इसी जगह रहते हैं, देखी जाएगी।

 

क्रोधा के आवेश में अपनी नेकियाँ बहुत याद आती हैं। भैरों उन उपकारों का वर्णन करने लगा, जो उसने जगधार के साथ किए थे-इसकी घरवाली मर रही थी। किसी ने बता दिया, ताजी ताड़ी पिए, तो बच जाए। मुँह-ऍंधोरे पेड़ पर चढ़ता था और ताजी ताड़ी उतारकर उस पिलाता था। कोई पाँच रुपये भी देता, तो उतने सबेरे पेड़ पर न चढ़ता। मटकों ताड़ी पिला दी होगी। तमाखू पीना होता है, तो यहीं आता है। रुपये-पैसे का काम लगता है, तो मैं ही काम आता हूँ, और मेरे साथ यह घाट! जमाना ही ऐसा है।

 

जगधार का घर मिला हुआ था। यह सब सुन रहा था और मुँह न खोलता था। वह सामने से वार करने में नहीं, पीछे से वार करने में कुशल था।

 

इतने में मिल का एक मिस्त्राी, नीम-आस्तीन पहने, कोयले की भभूत लगाए और कोयले ही का-सा रंग, हाथ में हथौड़ा लिए, चमरौधाा जूता डाटे, आकर बोला-चलते हो दुकान पर कि इसी झंझट में पड़े रहोगे? देर हो रही है, अभी साहब के बँगले पर जाना है।

 

भैरों-अजी जाओ, तुम्हें दुकान की पड़ी हुई है। यहाँ ऐसा जी जल रहा है कि गाँव में आग लगा दूँ।

 

मिस्त्राी-क्या है क्या? किस बात पर बिगड़ रहे हो, मैं भी सुनूँ।

 

भैरों ने संक्षिप्त रूप से सारी कथा सुना दी और गाँववालों की कायरता और असज्जनता का दुखड़ा रोने लगा।

 

मिस्त्राी-गाँववालों को मारो गोली। तुम्हें कितने गवाह चाहिए? जितने गवाह कहो, दे दूँ, एक-दो, दस-बीस। भले आदमी, पहले ही क्यों न कहा? आज ही ठीक-ठाक किए देता हूँ। बस, सबों को भर-भर पेट पिला देना।

 

भैरों की बाँछेंं खिल गईं, बोला-ताड़ी की कौन बात है, दूकान तुम्हारी है, जितनी चाहो, पियो; पर जरा मोतबर गवाह दिलाना।

 

मिस्त्राी-अजी, कहो तो बाबू लोगों को हाजिर कर दूँ। बस, ऐसी पिला देना कि सब यहीं से गिरते हुए घर पहुँचें।

 

भैरों-अजी, कहो तो इतना पिला दूँ कि दो-चार लाशें उठ जाएँ।

 

यों बातें करते हुए दोनों दूकान पहुँचे। वहाँ 20-25 आदमी, जो इसी कारखाने के नौकर थे, बड़ी उत्कंठा से भैरों की राह देख रहे थे। भैरों ने तो पहुँचते ही ताड़ी नापनी शुरू कर की, और इधार मिस्त्राी ने गवाहों को तैयार करना शुरू किया। कानों में बातें होने लगीं।

 

एक-मौका अच्छा है। अंधो के घर से निकलकर जाएगी कहाँ! भैरों अब उसे न रखेगा।

 

दूसरा-आखिर हमारे दिल-बहलाव का भी तो कोई सामान होना चाहिए।

 

तीसरा-भगवान् ने आप ही भेज दिया। बिल्ली के भागों छींका टूटा।

 

इधार तो यह मिसकौट हो रही थी, उधार सुभागी सूरदास से कह रही थी-तुम्हारे ऊपर दावा हो रहा है।

 

सूरदास ने घबराकर पूछा-कैसा दावा?

 

सुभागी-मुझे भगा लाने का। गवाह ठीक किए जा रहे हैं। गाँव का तो कोई आदमी नहीं मिला, लेकिन पुतलीघर के बहुत-से मजूरे तैयार हैं। मुझसे अभी जगधार कह रहे थे, पहले गाँव के सब आदमी गवाही देने जा रहे थे।

 

सूरदास-फिर रुक कैसे गए?

 

सुभागी-जगधार ने सबको समझा-बुझाकर रोक लिया।

 

सूरदास-जगधार बड़ा भलामानुस है, मुझ पर बड़ी दया करता रहता है।

 

सुभागी-तो अब क्या होगा?

 

सूरदास-दावा करने दे, डरने की कोई बात नहीं। तू यही कह देना कि मैं भैरों के साथ न रहूँगी। कोई कारन पूछे, तो साफ-साफ कर देना,वह मुझे मारता है।

 

सुभागी-लेकिन इसमें तुम्हारी बदनामी होगी।

 

सूरदास-बदनामी की चिंता नहीं, जब तक वह तुझे रखने को राजी न होगा, मैं तुझे जाने ही न दूँगा।

 

सुभागी-वह राजी भी होगा, तो उसके घर न जाऊँगी। वह मन का बड़ा मैला आदमी है, इसकी कसर जरूर निकालेगा। तुम्हारे घर से भी चली जाऊँगी।

 

सूरदास-मेरे घर क्यों चली जाएगी? मैं तो तुझे नहीं निकालता।

 

सुभागी-मेरे कारन तुम्हारी कितनी जगहँसाई होगी। मुहल्लेवालों का तो मुझे कोई डर न था। मैं जानती थी कि किसी को तुम्हारे ऊपर संदेह न होगा, और होगा भी, तो छिन-भर में दूर हो जाएगा। लेकिन ये पुतलीघर के उजव् मजूरे तुम्हें क्या जानें। भैरों के यहाँ सब-के-सब ताड़ी पीते हैं। वह उन्हें मिलाकर तुम्हारी आबरू बिगाड़ देगा। मैं यहाँ न रहूँगी, तो उसका कलेजा ठंडा हो जाएगा। बिस की गाँठ तो मैं हूँ।

 

सूरदास-जाएगी कहाँ?

 

सुभागी-जहाँ उसके मुँह में कालिख लगा सकूँ, जहाँ उसकी छाती पर मूँग दल सकूँ।

 

सूरदास-उसके मुँह मे कालिख लगेगी, तो मेरे मुँह में पहले ही न लग जाएगी, तू मेरी बहन ही तो है?

 

सुभागी-नहीं, मै तुम्हारी कोई नहीं हूँ। मुझे बहन-बेटी न बनाओ।

 

सूरदास-मैं कहे देता हूँ, इस घर से न जाना।

 

सुभागी-मैं अब तुम्हारे साथ रहकर तुम्हें बदनाम न करूँगी।

 

सूरदास-मुझे बदनामी कबूल है, लेकिन जब तक यह न मालूम हो जाए कि तू कहाँ जाएगी, तब तक मैं तुझे जाने ही न दूँगा।

 

भैरों ने रात तो किसी तरह काटी। प्रात:काल कचहरी दौड़ा। वहाँ अभी द्वार बंद थे, मेहतर झाड़ई लगा रहे थे, अतएव वह एक वृक्ष के नीचे धयान लगाकर बैठ गया। नौ बजे से अमले, बस्ते बगल में दबाए, आने लगे और भैरों दौड़-दौड़कर उन्हें सलाम करने लगा। ग्यारह बजे राजा साहब इजलास पर आए तो भैरों ने मुहर्रिर से लिखवाकर अपना इस्तगासा दायर कर दिया। संधया-समय घर आया, तो बफरने लगा-अब देखता हूँ, कौन माई का लाल इनकी हिमायत करता है। दोनों के मुँह में कालिख लगवाकर यहाँ से निकाल न दिया, तो बाप का नहीं।

 

पाँचवेंं दिन सूरदास और सुभागी के नाम सम्मन आ गया। तारीख पड़ गई। ज्यों-ज्यों पेशी का दिन निकट आता जाता था, सुभागी के होश उड़े जाते थे। बार-बार सूरदास से उलझती-तुम्हीं यह सब करा रहे हो, अपनी मिट्टी खराब कर रहे हो और अपने साथ मुझे भी घसीट रहे हो। मुझे चले जाने दिया होता, तो कोई तुमसे क्यों बैर ठानता? वहाँ भरी कचहरी में जाना, सबके सामने खड़ी होना, मुझे जहर ही-सा लग रहा है। मैं उसका मुँह न देखूँगी, चाहे अदालत मुझे मार ही डाले।

 

आखिर पेशी की नियत तिथि आ गई। मुहल्ले में इस मुकदमे की इतनी धाूम थी कि लोगों ने अपने-अपने काम बंद कर दिए और अदालत में जा पहुँचे। मिल के श्रमजीवी सैकड़ों की संख्या में गए। शहर में सूरदास को कितने ही आदमी जान गए थे। उनकी दृष्टि में सूरदास निरपराधा था। हजारों आदमी कुतूहल-वश अदालत में आए। प्रभु सेवक पहले ही पहुँच चुके थे, इंदु रानी और इंद्रदत्ता भी मुकदमा पेश होते-होते आ पहुँचे। अदालत में यों ही क्या कम भीड़ रहती है, और स्त्राी का आना तो मंडप में वधाू का आना है। अदालत में एक बारजा-सा लगा हुआ था। इजलास पर दो महाशय विराजमान थे-एक तो चतारी के राजा साहब, दूसरे एक मुसलमान, जिन्होंने योरपीय महासमर में रंगरूट भरती करने में बड़ा उत्साह दिखाया था। भैरों की तरफ से एक वकील भी था।

 

भैरों का बयान हुआ। गवाहों का बयान हुआ। तब उसके वकील ने उनसे अपना पक्ष-समर्थन करने के लिए जिरह की।

 

तब सूरदास का बयान हुआ। उसने कहा-मेरे साथ इधार कुछ दिनों से भैरों की घरवाली रहती है। मैं किसी को क्या खिलाऊँ-पिलाऊँगा,पालनेवाले भगवान् है। वह मेरे घर में रहती है अगर भैरों उसे रखना चाहे और वह रहना चाहे, तो आज ही चली जाए, यही तो मैं चाहता हूँ। इसीलिए मैंने उसे अपने यहाँ रखा है, नहीं तो न जाने कहाँ होती।

 

भैरों के वकील ने मुस्कराकर कहा-सूरदास, तुम बड़े उदार मालूम होते हो; लेकिन युवती सुंदरियों के प्रति उदारता का कोई महत्तव नहीं रहता।

 

सूरदास-इसी से न यह मुकदमा चला है। मैंने कोई बुराई नहीं की। हाँ, संसार जो चाहे, समझे। मैं तो भगवान को जानता हूँ। वही सबकी करनी को देखनेवाला है। अगर भैरों उसे अपने घर न रखेगा और न सरकार कोई ऐसी जगह बताइएगी, जहाँ यह औरत इज्जत-आबरू के साथ रह सके, तो मैं उसे अपने घर से निकलने न दूँगा। वह निकलना भी चाहेगी, तो न जाने दूँगा। इसने तो जब से इस मुकदमे की खबर सुनी है, यही कहा करती है कि मुझे जाने दो, पर मैं उसे जाने नहीं देता।

 

वकील-साफ-साफ क्यों नहीं कहते कि मैंने उसे रख लिया है।

 

सूरदास-हाँ, रख लिया है, जैसे भाई अपनी बहन को रख लेता है, बाप बेटी को रख लेता है। अगर सरकार ने उसे जबरदस्ती मेरे घर से निकाल दिया, तो उसकी आबरू की जिम्मेदारी उसी के सिर होगी।

 

सुभागी का बयान हुआ-भैरों मुझे बेकसूर मारता, गालियाँ देता। मैं उसके साथ न रहँगी। सूरदास भला आदमी है, इसीलिए उसके पास रहती हूँ। भैरों यह नहीं देख सकता; सूरदास के घर से मुझे निकालना चाहता है।

 

वकील-तू पहले भी सूरदास के घर जाती थी?

 

सुभागी-जभी अपने घर मार खाती थी, तभी जान बचाकर उसके घर भाग जाती थी। वह मेरे आड़े आ जाता था। मेरे कारन उसके घर में आग लगी, मार पड़ी, कौन-कौन-सी दुर्गत नहीं हुई। अदालत की कसर थी, वह भी पूरी हो गई।

 

राजा-भैरों, तुम अपनी औरत रखोगे?

 

भैरों-हाँ सरकार, रखूँगा।

 

राजा-मारोगे तो नहीं?

 

भैरों-कुचाल न चलेगी, तो क्यों मारूँगा।

 

राजा-सुभागी, तू अपने आदमी के घर क्यों नहीं जाती? वह तो कह रहा है, न मारूँगा।

 

सुभागी-उस पर मुझे विश्वास नहीं। आज ही मार-मारकर बेहाल कर देगा।

 

वकील-हुजूर, मुआमला साफ है, अब मजीद-सबूत की जरूरत नहीं रही। सूरदास पर जुर्म साबित हो गया।

 

अदालत ने फैसला सुना दिया-सूरदास पर 200 रु. जुर्माना और जुर्माना न अदा करे, तो छ: महीने की कड़ी कैद। सुभागी पर 100 रु. जुर्माना, जुर्माना न दे सकने पर तीन महीने की कड़ी कैद। रुपये वसूल हों तो भैरों को दिए जाएँ।

 

दर्शकों में इस फैसले पर आलोचना होने लगी।

 

एक-मुझे तो सूरदास बेकसूर मालूम होता है।

 

दूसरा-सब राजा साहब की करामात है। सूरदास ने जमीन के बारे में उन्हें बदनाम किया था न। यह उसी की कसर निकाली गई है। ये हमारे यश-मान-भोगी लीडरों के कृत्य हैं।

 

तीसरा-औरत चरबाँक नहीं मालूम होती?

 

चौथा-भरी अदालत में बातें कर रही है, चरबाँक नहीं, तो और क्या है?

 

पाँचवाँ-वह तो यही कहती है कि मैं भैरों के पास न रहूँगी।

 

सहसा सूरदास ने उच्च स्वर में कहा-मैं इस फैसले की अपील करूँगा।

 

वकील-इस फैसले की अपील नहीं हो सकती।

 

सूरदास-मेरी अपील पंचों से होगी। एक आदमी के कहने से मैं अपराधाी नहीं हो सकता, चाहे वह कितना ही बड़ा आदमी हो। हाकिम ने सजा दे दी, सजा काट लूँगा; पर पंचों का फैसला भी सुन लेना चाहता हूँ।

 

यह कहकर उसने दर्शकों की ओर मुँह फेरा और मर्मस्पर्शी शब्दों में कहा-दुहाई है पंचो, आप इतने आदमी जमा हैं। आप लोगों ने भैरों और उसके गवाहों के बयान सुने, मेरा और सुभागी का बयान सुना, हाकिम का फैसला भी सुन लिया। आप लोगों से मेरी विनती है कि क्या आप भी मुझे अपराधाी समझते हैं? क्या आपको विश्वास आ गया कि मैंने सुभागी को बहकाया और अब अपनी स्त्राी बनाकर रखे हुए हूँ?अगर आपको विश्वास आ गया है, तो मैं इसी मैदान में सिर झुकाकर बैठता हूँ, आप लोग मुझे पाँच-पाँच लात मारें। अगर मैं लात खाते-खाते मर भी जाऊँ, तो मुझे दु:ख न होगा। ऐसे पापी का यही दंड है। कैद से क्या होगा! और अगर आपकी समझ में बेकसूर हूँ, तो पुकारकर कह दीजिए, हम तुझे निरपराधा समझते हैं। फिर मैं कड़ी-से-कड़ी कैद भी हँसकर काट लूँगा।

 

अदालत के कमरे में सन्नाटा छा गया। राजा साहब, वकील, अमले, दर्शक, सब-के-सब चकित हो गए। किसी को होश न रहा कि इस समय क्या करना चाहिए। सिपाही दर्जनों थे, पर चित्रा-लिखित-से खड़े थे। परिस्थिति ने एक विचित्रा रूप धाारण कर लिया था, जिसकी अदालत के इतिहास में कोई उपमा न थी। शत्राु ने ऐसा छापा मारा था कि उससे प्रतिपक्षी सेना का पूर्व-निश्चित क्रम भंग हो गया।

 

सबसे पहले राजा साहब सँभले। हुक्म दिया, इसे बाहर ले जाओ। सिपाहियों ने दोनाेंं अभियुक्तों को घेर लिया और अदालत के बाहर ले चले। हजारों दर्शक पीछे-पीछे चले।

 

कुछ दूर चलकर सूरदास जमीन पर बैठ गया और बोला-मैं पंचों का हुकुम सुनकर तभी आगे जाऊँगा।

 

अदालत के बाहर अदालत की मर्यादा भंग होने का भय न था। कई हजार कंठों से धवनि उठी-तुम बेकसूर हो, हम सब तुम्हें बेकसूर समझते हैं।

 

इंद्रदत्ता-अदालत बेईमान है!

 

कई हजार आवाजों ने दुहराया-हाँ, अदालत बेईमान है!

 

इंद्रदत्ता-अदालत नहीं, दीनों की बलि-वेदी है।

 

कई हजार कंठों से प्रतिधवनि निकली-अमीरों के हाथ में अत्याचार का यंत्रा है!

 

चौकीदारों ने देखा, प्रतिक्षण भीड़ बढ़ती और लोग उत्तोजित होते जाते हैं, तो लपककर एक बग्घीवाले को पकड़ा और दोनों को उसमें बैठाकर ले चले। लोगों ने कुछ दूर तक तो गाड़ी का पीछा किया, उसके बाद अपने-अपने घर लौट गए।

 

इधार भैरों अपने गवाहों के साथ घर चला, तो राह में अदालत के अरदली ने घेरा। उसे दो रुपये निकालकर दिए। दूकान में पहुँचते ही मटके खुल गए और ताड़ी के दौर चलने लगे। बुढ़िया पकौड़ियाँ और पूरियाँ पकाने लगी।

 

एक बोला-भैरों, यह बात ठीक नहीं, तुम भी बैठो, पियो और पिलाओ। हम-तुम बद-बदकर पिएँ।

 

दूसरा-आज इतनी पिऊँगा कि चाहे यहीं ढेर हो जाऊँ। भैरों, यह कुल्हड़ भर-भरकर क्या देते हो, हाँडी ही बढ़ा दो।

 

भैरों-अजी, मटके में मुँह डाल दो, हाँडी-कुल्हड़ की क्या बिसात है! आज मुद्दई का सिर नीचा हुआ है।

 

तीसरा-दोनों हिरासत में पड़े रो रहे होंगे। मगर भई, सूरदास को सजा हो गई, तो क्या, वह है बेकसूर।

 

भैरों-आ गए तुम भी उसके धाोखे में। इसी स्वाँग की तो वह रोटी खाता है। देखो, बात-की-बात में कैसा हजारों आदमियों का मन फेर दिया।

 

चौथा-उसे किसी देवता का इष्ट है।

 

भैरों-इष्ट तो तब जानें कि जेहल से निकल आए।

 

पहला-मैं बद कर कहता हूँ, वह कल जरूर जेहल से निकल आएगा।

 

दूसरा-बुढ़िया, पकौड़ियाँ ला।

 

तीसरा-अबे, बहुत न पी, नहीं मर जाएगा। है कोई घर पर रोनेवाला?

 

चौथा-कुछ गाना हो, उतारो ढोल-मँजीरा।

 

सबाेंं ने ढोल-मँजीरा सँभाला और खडे होकर गाने लगे :

 

छत्ताीसी, क्या नैना झमकावै!

 

थोड़ी देर में एक बुङ्ढा मिस्त्राी उठकर नाचने लगा। बुढ़िया से अब न रहा गया। उसने भी घूँघट निकाल लिया और नाचने लगी। शूद्रों में नृत्य और गान स्वाभाविक गुण हैं, सीखने की जरूरत नहीं। बुङ्ढा और बुढ़िया, दोनों अश्लील भाव से कमर हिला-हिलाकर थिरकने लगे। उनके अंगों की चपलता आश्चर्यजनक थी।

 

भैरों-मुहल्लेवाले समझते थे, मुझे गवाह ही न मिलेंगे।

 

एक-सब गीदड़ हैं, गीदड़।

 

भैरों-चलो, जरा सबों के मुँह में कालिख लगा आएँ।

 

सब-के-सब चिल्ला उठे-हाँ, हाँ, नाच होता चले।

 

एक क्षण में जुलूस चला। सब-के-सब नाचते-गाते, ढोल पीटते, ऊलजलूल बकते, हू-हा करते, लड़खड़ाते हुए चले। पहले बजरंगी का घर मिला। यहाँ सब रुक गए, और गाया:

 

ग्वालिन की गैया हिरानी, तब दूधा मिलावै पानी।

 

रात ज्यादा भीग चुकी थी, बजरंगी के द्वार बंद थे। लोग यहाँ से ठाकुरदीन के द्वार पर पहुँचे और गाया :

 

तमोलिन के नैना रसीले, याराेंं से नजर मिलावै।

 

ठाकुरदीन भोजन कर रहा था, पर डर के मारे बाहर न निकला। जुलूस आगे बढ़ा, तो सूरदास की झोंपड़ी मिली।

 

भैरों बोला-बस, यहीं डट जाओ।

 

‘ढोल ढीली पड़ गई।

 

‘सेंको, सेंको; झोंपड़े में से फूस ले लो।’

 

एक आदमी ने थोड़ा-सा फूस निकाला, दूसरे ने और ज्यादा, तीसरे ने एक बोझ खींच लिया। फिर क्या था, नशे की सनक मशहूर ही है,एक ने जलता हुआ फूस झोंपड़ी पर डाल दिया और बोला-होली है, होली है! कई आदमियों ने कहा-होली है, होली है!

 

भैरों-यारो, यह तुम लोग लोगों ने बुरा किया। भाग चलो, नहीं तो धार लिए जाओगे।

 

भय नशे में भी हमारा पीछा नहीं छोड़ता। सब-के-सब भागे।

 

उधार ज्वाला प्रचंड हुई, तो मुहल्ले के लोग दौड़ पड़े। लेकिन फूस की आग किसके वश की थी! झोंपड़ा जल रहा था और लोग खड़े दु:ख और क्रोधा की बातें कर रहे थे।

 

ठाकुरदीन-मैं तो भोजन पर बैठा, तभी सबों को आते देखा।

 

बजरंगी-ऐसा जी चाहता है कि जाकर भैरों को मारते-मारते बेदम कर दूँ।

 

जगधार-जब तक एक दफे अच्छी तरह मार न खा जाएगा, इसके सिर से भूत न उतरेगा।

 

बजरंगी-हाँ, अब यही होगा। घिसुआ, जरा लाठी तो निकाल ला। आज दो-चार खून हो जाएँगे, तभी आग बुझेगी!

 

जमुनी-तुम्हें क्या पड़ी है, चलकर लेटो। जो जैसा करेगा, उसका फल आप भगवान् से पाएगा।

 

बजरंगी-भगवान् चाहे फल दें या न दें, पर मैं तो अब नहीं मानता, जैसे देह में आग लगी हुई है।

 

जगधार-आग लगने की बात ही है। ऐसे पापी का तो सिर काट लेना भी पाप नहीं।

 

ठाकुरदीन-जगधार, आग पर तेल छिड़कना अच्छी बात नहीं। अगर तुमको भैरों से बैर है, तो आप जाकर उसे क्यों नहीं ललकारते, दूसरों को क्या उकसाते हो? यही चाहते हो कि ये दोनों लड़ मरें और मैं तमाशा देखूँ। हो बड़े नीच!

 

जगधार-अगर कोई बात कहना उकसाना है, तो लो, चुप रहूँगा।

 

ठाकुरदीन-हाँ, चुप रहना ही अच्छा है। तुम भी जाकर सोओ बजरंगी! भगवान् आप पापी को दंड देंगे। उन्होंने तो रावन-जैसे प्रतापी को न छोड़ा, यह किस खेत की मूली है! यह ऍंधोर उनसे भी न देखा जाएगा।

 

बजरंगी-मारे घमंड के पागल हो गया है। चलो जगधार, जरा इन सबों से दो-दो बातें कर लें।

 

जगधार-न भैया, मुझे साथ न ले जाओ। कौन जाने, वहाँ मार-पीट हो जाए, तो सारा इलजाम मेरे सिर जाए कि इसी ने लड़ा दिया। मैं तो आप झगड़े से कोसों दूर रहता हूँ।

 

इतने में मिठुआ दौड़ा हुआ आया। बजरंगी ने पूछा-कहाँ सोया था रे?

 

मिट्ठू-पंडाजी के दालान में तो। अरे, यह तो मेरी झोंपड़ी जल रही है! किसने आग लगाई?

 

ठाकुरदीन-इतनी देर में जागे हो। सुन नहीं रहे हो, गाना-बजाना हो रहा है?

 

मिट्ठू-भैरों ने लगाई है क्या! अच्छा बच्चा, समझूँगा।

 

जब लोग अपने-अपने घर लौट गए, तो मिठुआ धाीरे-धाीरे भैरों की दूकान की तरफ गया। महफिल उठ चुकी थी। ऍंधोरा छाया हुआ था। जाड़े की रात, पत्ताा तक न खड़कता था। दूकान के द्वार पर उपले जल रहे थे। ताड़ीखानों में आग कभी नहीं बुझती, पारसी पुरोहित भी इतनी सावधाानी से आग की रक्षा न करता होगा। मिठुआ ने एक जलता हुआ उपला उठाया और दूकान के छप्पर पर फेंक दिया। छप्पर में आग लग गई, तो मिठुआ बगटुट भागा और पंडाजी के दालान में मुँह ढाँपकर सो रहा, मानो उसे कुछ खबर ही नहीं। जरा देर में ज्वाला प्रचंड हुई, सारा मुहल्ला आलोकित हो गया, चिड़ियाँ वृक्षों पर से उड़-उड़कर भागने लगीं, पेड़ाेंं की डालें हिलने लगीं, तालाब का पानी सुनहरा हो गया और बाँसों की गाँठें जोर-जोर से चिटकने लगीं। आधाा घंटे तक लंकादहन होता रहा, पर यह सारा शोर वन्यरोदन के सदृश था। दूकान बस्ती से हटकर थी। भैरों नशे में बेसुधा पड़ा था, बुढ़िया नाचते-नाचते थक गई थी। और कौन था, जो इस वक्त आग बुझाने जाता? अग्नि ने निर्विघ्न अपना काम समाप्त किया। मटके टूट गए, ताड़ी बह गई। जब जरा आग ठंडी हुई, तो कई कुत्ताों ने आकर वहाँ विश्राम किया।

 

प्रात:काल भैरों उठा, तो दूकान सामने न दिखाई दी। दूकान और उसके घर के बीच के दो फरलाँग का अंतर था, पर कोई वृक्ष न होने के कारण दूकान साफ नजर आती थी। उसे विस्मय हुआ, दूकान कहाँ गई! जरा और आगे बढ़ा, तो राख का ढेर दिखाई दिया। पाँव-तले से मिट्टी निकल गई। दौड़ा। दूकान में ताड़ी के सिवा बिक्री के रुपये भी थे। ढोल-मँजीरा भी वहीं रखा रहता था। प्रत्येक वस्तु जलकर राख हो गई। मुहल्ले के लोग उधार तालाब मेंं मुँह-हाथ धाोने जाएा करते थे। सब आ पहुँचे। दूकान सड़क पर थी। पथिक भी खड़े हो गए। मेला लग गया।

 

भैरों ने रोकर कहा-मैं तो मिट्टी में मिल गया।

 

ठाकुरदीन-भगवान् की लीला है। उधार वह तमाशा दिखाया, इधार यह तमाशा दिखाया। धान्य हो महाराज!

 

बजरंगी-किसी मिस्त्राी की सरारत होगी। क्यों भैरों, किसी से अदावत तो नहीं थी?

 

भैरों-अदावत सारे मुहल्ले से है, किससे नहीं है। मैं जानता हूँ, जिसकी यह बदमासी है। बँधावा न दिया, तो कहना। अभी एक को लिया है,अब दूसरे की बारी है।

 

जगधार दूर ही से आनंद ले रहा था। निकट न आया कि कहीं भैरों कुछ कह बैठे, तो बात बढ़ जाए। ऐसा हार्दिक आनंद उसे अपने जीवन में कभी न प्राप्त हुआ था।

 

इतने में मिल के कई मजदूर आ गए। काला मिस्त्राी बोला-भाई, कोई माने या न माने, मैं तो यही कहूँगा कि अंधो को किसी का इष्ट है।

 

ठाकुरदीन-इष्ट क्यों नहीं है। मैं बराबर यही कहता आता हूँ। उससे जिसने बैर ठाना, उसने नीचा देखा।

 

भैरों-उसके इष्ट को मैं जानता हूँ। जरा थानेदार जा जाएँ, तो बता दूँ, कौन इष्ट है।

 

बजरंगी जलकर बोला-अपनी बेर कैसी सूझ रही है! क्या वह झोंपड़ा न था, जिसमें पहले आग लगी? ईंट का जवाब पत्थर मिलता ही है। जो किसी के लिए गढ़ा खोदेगा, उसके लिए कुऑं तैयार है। क्या उस झोंपड़े में आग लगाते समय समझे थे कि सूरदास का कोई है ही नहीं?

 

भैरों-उसके झोंपड़े में मैंने आग लगाई?

 

बजरंगी-और किसने लगाई?

 

भैरों-झूठे हो!

 

ठाकुरदीन-भैरों, क्यों सीनाजोरी करते हो! तुमने लगाई या तुम्हारे किसी यार ने लगाई, एक ही बात है। भगवान ने उसका बदला चुका दिया, तो रोते क्यों हो?

 

भैरों-सब किसी से समझ्रूगा।

 

ठाकुरदीन-यहाँ कोई तुम्हारा दबैल नहीं है।

 

भैरों ओठ चबाता हुआ चला गया। मानव-चरित्रा कितना रहस्यमय है! हम दूसरों का अहित करते हुए जरा भी नहीं झिझकते, किंतु जब दूसराें के हाथों हमें कोई हानि पहुँचती है, तो हमारा खून खौलने लगता है।

 

सूरदास के मुकदमे का फैसला सुनने के बाद इंद्रदत्ता चले, तो रास्ते में प्रभु सेवक से मुलाकात हो गई। बातें होने लगी।

 

इंद्रदत्ता-तुम्हारा क्या विचार है, सूरदास निर्दोष है या नहीं?

 

प्रभु सेवक-सर्वथा निर्दोष। मैं तो आज उसकी साधाुता पर कायल हो गया। फैसला सुनाने के वक्त तक मुझे विश्वास था कि अंधो ने जरूर इस औरत को बहकाया है, मगर उसके अंतिम शब्दों ने जादू का-सा असर किया। मैं तो इस विषय पर एक कविता लिखने का विचार कर रहा हूँ।

 

इंद्रदत्ता-केवल कविता लिख डालने से काम न चलेगा। राजा साहब की पीठ में धाूल लगानी पड़ेगी। उन्हें यह संतोष न होने देना चाहिए कि मैंने अंधो से चक्की पिसवाई। वह समझ रहे होंगे कि अंधाा रुपये कहाँ से लाएगा। दोनों पर 300 रुपये जुर्माना हुआ है, हमें किसी तरह से जुर्माना आज ही अदा करना चाहिए। सूरदास जेल से निकले, तो सारे शहर में उसका जुलूस निकालना चाहिए। इसके लिए 200 रुपये की और जरूरत होगी। कुल 500 रुपये हों, तो काम चल जाए। बोलो, देते हो?

 

प्रभु सेवक-जो उचित समझो, लिख लो।

 

इंद्रदत्ता-तुम 50 रुपये बिना कष्ट के दे सकते हो?

 

प्रभु सेवक-और तुमने अपने नाम कितना लिखा है?

 

इंद्रदत्ता-मेरी हैसियत 10 रुपये से अधिाक देने की नहीं। रानी जाह्नवी से 100 रुपये ले लूँगा। कुँवर साहब ज्यादा नहीं, तो 10 रुपये दे ही देंगे। जो कुछ कमी रह जाएगी, वह दूसरों से माँग ली जाएगी। सम्भव है, डाक्टर गांगुली सब रुपये खुद ही दे दें, किसी से माँगना ही न पड़े।

 

प्रभु सेवक-सूरदास के मुहल्लेवालों से भी कुछ मिल जाएगा।

 

इंद्रदत्ता-उसे सारा शहर जानता है, उसके नाम पर दो-चार हजार रुपये मिल सकते हैं; पर इस छोटी-सी रकम के लिए मैं दूसरों को कष्ट नहीं देना चाहता।

 

यों बातें करते हुए दोनों आगे बढ़े कि सहसा इंदु अपनी फिटन पर आती हुई दिखाई दी। इंद्रदत्ता को देखकर रुक गई और बोली-तुम कब लौटे? मेरे यहाँ नहीं आए!

 

इंद्रदत्ता-आप आकाश पर हैं, मैं पाताल में हूँ, क्या बातें हों?

 

इंदु-आओ, बैठ जाओ, तुमसे बहुत-सी बातें करनी हैं।

 

इंद्रदत्ता फिटन पर जा बैठा। प्रभु सेवक ने जेब से 50 रुपये का एक नोट निकाला और चुपके से इंद्रदत्ता के हाथ में रखकर क्लब को चल दिए।

 

इंद्रदत्ता-अपने दोस्तों से भी कहना।

 

प्रभु सेवक-नहीं भाई, मैं इस काम का नहीं हूँ। मुझे माँगना नहीं आता! कोई देता भी होगा, तो मेरी सूरत देखकर मुट्ठी बंद कर लेगा।

 

इंद्रदत्ता-(इंदु से) आज तो यहाँ खूब तमाशा हुआ।

 

इंदु-मुझे तो ड्रामा का-सा आनंद मिला। सूरदास के विषय में तुम्हारा क्या खयाल है?

 

इंद्रदत्ता-मुझे तो वह निष्कपट, सच्चा, सरल मनुष्य मालूम होता है।

 

इंदु-बस-बस यही मेरा भी विचार है। मैं समझती हूँ, उसके साथ अन्याय हुआ। फैसला सुनाते वक्त तक मैं उसे अपराधाी समझती थी, पर उसकी अपील ने मेरे विचार में कायापलट कर दी। मैं अब तक उसे मक्कार, धाूर्त, रँगा हुआ सियार समझती थी। उन दिनों उसने हम लोगों को कितना बदनाम किया! तभी से मुझे उससे घृणा हो गई थी। मैं उसे मजा चखाना चाहती थी। लेकिन आज ज्ञात हुआ कि मैंने उसके चरित्रा को समझने में भूल की। वह अपनी धाुन का पक्का, निर्भीक, नि:स्पृह, सत्यनिष्ठ आदमी है, किसी से दबना नहीं जानता।

 

इंद्रदत्ता-तो इस सहानुभूति को क्रिया के रूप में भी लाइएगा? हम लोग आपस में चंदा करके जुर्माना अदा कर देना चाहते हैं। आप भी इस सत्कार्य में योग देंगी?

 

इंदु ने मुस्कराकर कहा-मैं मौखिक सहानुभूति ही काफी समझती हूँ।

 

इंद्रदत्ता-आप ऐसा कहेंंगी, तो मेरा यह विचार पुष्ट हो जाएगा कि हमारे रईसों में नैतिक बल नहीं रहा। हमारे राव-रईस हर एक उचित और अनुचित कार्य में अधिाकारियाेंं की सहायता करते रहते हैं, इसीलिए जनता का उन पर से विश्वास उठ गया है। वह उन्हें अपना मित्रा नहीं, शत्राु समझती है। मैं नहीं चाहता कि आपकी गणना भी उन्हीं रईसाेंं में हो। कम-से-कम मैंने आपको अब तक उन रईसों से अलग समझा है।

 

इंदु ने गम्भीर भाव से कहा-इंद्रदत्ता, मैं ऐसा क्यों कर रही हूँ, इसका कारण तुम जानते हो। राजा साहब सुनेंगे, तो उन्हें कितना दु:ख होगा! मैं उनसे छिपकर कोई काम नहीं करना चाहती।

 

इंद्रदत्ता-राजा साहब से इस विषय में अभी मुझसे बातचीत नहीं हुई। लेकिन मुझे विश्वास है कि उनके भाव भी हमीं लोगों जैसे होंगे। उन्होंने इस वक्त कानूनी फैसला दिया है। सच्चा फैसला उनके हृदय ने किया होगा। कदाचित् उनकी तरह न्यायपद पर बैठकर मैं भी वही फैसला करता, जो उन्होंने किया है। लेकिन वह मेरे ईमान का फैसला नहीं, केवल कानून का विधाान होता। मेरी उनसे घनिष्ठता नहीं है, नहीं तो उनसे भी कुछ-न-कुछ ले मरता। उनके लिए भागने का कोई रास्ता नहीं था।

 

इंदु-सम्भव है, राजा साहब के विषय में तुम्हारा अनुमान सत्य हो। मैं आज उनसे पूछूँगी।

 

इंद्रदत्ता-पूछिए, मुझे भय है कि राजा साहब इतनी आसानी से न खुलेंगे।

 

इंदु-तुम्हें भय है, और मुझे विश्वास है। लेकिन यह जानती हूँ कि हमारे मनोभाव समान दशाओं में एक-से होते हैं; इसलिए आपको इंतजार के कष्ट में नहीं डालना चाहती। यह लीजिए, यह मेरी तुच्छ भेंट है।

 

यह कहकर इंदु ने एक सावरेन निकालकर इंद्रदत्ता को दे दिया।

 

इंद्रदत्ता-इसे लेते हुए शंका होती है।

 

इंदु-किस बात की?

 

इंद्रदत्ता-कि कहीं राजा साहब के विचार कुछ और ही हों।

 

इंदु ने गर्व से सिर उठाकर कहा-इसकी कुछ परवा नहीं।

 

इंद्रदत्ता-हाँ, इस वक्त आपने रानियों की-सी बात कही। यह सावरेन सूरदास की नैतिक विजय का स्मारक है। आपको अनेक धान्यवाद! अब मुझे आज्ञा दीजिए। अभी बहुत चक्कर लगाना है। जुर्माने के अतिरिक्त और जो कुछ मिल जाए, उसे अभी नहीं छोड़ना चाहता।

 

इंद्रदत्ता उतरकर जाना ही चाहते थे कि इंदु ने जेब से दूसरा सावरेन निकालकर कहा-यह लो, शायद इससे तुम्हारे चक्कर में कुछ कमी हो जाए।

 

इंद्रदत्ता ने सावरेन जेब में रखा, और खुश-खुश चले। लेकिन इंदु कुछ चिंतित-सी हो गई। उसे विचार आया-कहीं राजा साहब वास्तव में सूरदास को अपराधाी समझते हों, तो मुझे जरूर आड़े हाथों लेंगे। खैर, होगा, मैं इतना दबना भी नहीं चाहती। मेरार् कत्ताव्य है सत्कार्य में उनसे दबना। अगर कुविचार में पड़कर वह प्रजा पर अत्याचार करने लगे, तो मुझे उनसे मतभेद रखने का पूरा अधिाकार है। बुरे कामों में उनसे दबना मनुष्य के पद से गिर जाना है। मैं पहले मनुष्य हूँ; पत्नी, माता, बहिन, बेटी पीछे।

 

इंदु इन्हीं विचारों में मग्न थी कि मि. जॉन सेवक और उनकी स्त्राी मिल गई।

 

जॉन सेवक ने टोप उतारा। मिसेज सेवक बोलीं-हम लोग तो आप ही की तरफ जा रहे थे। इधार कई दिन से मुलाकात न हुई थी। जी लगा हुआ था। अच्छा हुआ, राह में मिल गईं।

 

इंदु-जी नहीं, मैं राह में नहीं मिली। यह देखिए, जाती हूँ; आप जहाँ जाती हैं, वहीं जाइए।

 

जॉन सेवक-मैं तो हमेशा ब्वउचतवउपेम पसंद करता हूँ; यह आगे पार्क आता है। आज बैंड भी होगा, वहीं जा बैठें।

 

इंदु-वह ब्वउचतवउपेम पक्षपात रहित तो नहीं है, लेकिन खैर!

 

पार्क में तीनों आदमी उतरे और कुर्सियों पर जा बैठे। इंदु ने पूछा-सोफिया का कोई पत्रा आया था?

 

मिसेज सेवक-मैंने तो समझ लिया कि वह मर गई। मि. क्लार्क जैसा आदमी उसे न मिलेगा। जब तक यहाँ रही, टालमटोल करती रही। वहाँ जाकर विद्रोहियों से मिल बैठी। न जाने उसकी तकदीर में क्या है। क्लार्क से सम्बंधा न होने का दु:ख मुझे हमेशा रुलाता रहेगा।

 

जॉन सेवक-मैं तुमसे हजार बार कह चुका, वह किसी से विवाह न करेगी। वह दाम्पत्य जीवन के लिए बनाई ही नहीं गई। वह आदर्शवादिनी है और आदर्शवादी सदैव आनंद के स्वप्न ही देखा करता है, उसे आनंद की प्राप्ति नहीं होती। अगर कभी विवाह करेगी भी, तो कुँवर विनयसिंह से।

 

मिसेज सेवक-तुम मेरे सामने कुँवर विनयसिंह का नाम न लिया करो। क्षमा कीजिएगा रानी इंदु, मुझे ऐसे बेजोड़ और अस्वाभाविक विवाह पसंद नहीं।

 

जॉन सेवक-पर ऐसे बेजोड़ और अस्वाभाविक विवाह कभी-कभी हो जाते हैं।

 

मिसेज सेवक-मैं तुमसे कहे देती हूँ, और रानी इंदु, आप गवाह रहिएगा कि सोफी की शादी कभी विनयसिंह से न होगी।

 

जॉन सेवक-आपका इस विषय में क्या विचार है रानी इंदु? दिल की बात कहिएगा।

 

इंदु-मैं समझती हूँ, लेडी सेवक का अनुमान सत्य है। विनय को सोफी से कितना ही प्रेम हो, पर वह माताजी की इतनी उपेक्षा न करेंगे। माताजी जैसी दुखी स्त्राी आज संसार में न होगी। ऐसा मालूम होता है, उन्हेंं जीवन में अब कोई आशा ही नहीं रही। नित्य गुमसुम रहती हैं। अगर किसी ने भूलकर भी विनय का जिक्र छेड़ दिया, तो मारे क्रोधा के उनकी त्योरियाँ बदल जाती हैं। अपने कमरे से विनय का चित्रा उतरवा डाला है। उनके कमरे का द्वार बंद करा दिया है, न कभी आप उसमें जाती हैं, न और किसी को जाने देती हैं, और मिस सोफिया का नाम ले लेना तो उन्हें चुटकी काट लेने के बराबर है। पिताजी को भी स्वयंसेवकों की संस्था से अब कोई प्रेम नहीं रहा। जातीय कामों से उन्हें कुछ अरुचि हो गई है। अहा! आज बहुत अच्छी साइत में घर से चली थी। वह डॉक्टर गांगुली चले आ रहे हैं। कहिए, डॉक्टर साहब, शिमले से कब लौटे?

 

गांगुली-सरदी पड़ने लगी। अब वहाँ से सब कोई कूच हो गया। हम तो अभी आपकी माताजी के पास गया। कुँवर विनयसिंह के हाल पर उनको बड़ा दु:ख है।

 

जॉन सेवक-अबकी तो आपने काउंसिल में धाूम मचा दी।

 

गांगुली-हाँ, अगर वहाँ भाषण करना, प्रश्न करना, बहस करना काम है, तो आप हमारा जितना बड़ाई करना चाहता है, करे; पर मैं उसे काम नहीं समझता, यह तो पानी चारना है। काम उसको कहना चाहिए, जिससे देश और जाति का कुछ उपकार हो। ऐसा तो हमने कोई काम नहीं किया। हमारा तो अब वहाँ मन नहीं लगता। पहले तो सब आदमी एक नहीं होता, और कभी हो ही गया, तो गवर्नमेंट हमारा प्रस्ताव खारिज कर देता है। हमारा मेहनत खराब जाता है। यह तो लड़कों का खेल है। हमको नए कानून से बड़ी आशा थी, पर तीन-चार साल उसका अनुभव करके देख लिया कि इससे कुछ नहीं होता। हम जहाँ तब था, वहीं अब भी है। मिलिटरी का खरच बढ़ता जाता है; उस पर कोई शंका प्रकट करे, तो सरकार बोलता है, आपको ऐसा बात नहीं करना चाहिए। बजट बनाने लगता है, तो हरएक आइटेम में दो-चार लाख ज्यादा लिख देता है। हम काउंसिल में जब जोर देता है, तो हमारा बात रखने के लिए वही फालतू रुपया निकाल देता है। मेम्बर खुशी के मारे फूल जाता है-हम जीत गया, हम जीत गया। पूछो, तुम क्या जीत गया? तुम क्या जीतेगा? तुम्हारे पास जीतने का साधान ही नहीं है, तुम कैसे जीत सकता है? कभी हमारे बहुत जोर देने पर किफायत किया जाता है, तो हमारे ही भाइयों का नुकसान होता है। जैसे अबकी हमने पुलिस विभाग में पाँच लाख काट दिया। मगर यह कमी बड़े-बड़े हाकिमों के भत्तो या तलब में नहीं किया गया। बिचारा चौकीदार, कांसटेबल, थानेदार का तलब घटावेगा, जगह तोड़ेगा। इससे अब किफायत का बात कहते हुए भी डर लगता है कि इससे हमारे ही भाइयों का गरदन कटता है। सारा काउंसिल जोर देता रहा कि बंगाल की बाढ़ के सताए हुए आदमियों के सहातार्थ 20 लाख मंजूर किया जाए; सारा काउंसिल कहता रहा कि मि. क्लार्क का उदयपुर से बदली कर दिया जाए, पर सरकार ने मंजूर नहीं किया। काउंसिल कुछ नहीं कर सकता। एक पत्ती तक नहीं तोड़ सकता। आदमी काउंसिल को बना सकता है, वही उसको बिगाड़ भी सकता है। भगवान् जिलाता है, तो भगवान ही मारता है। काउंसिल को सरकार बनाता है और वह सरकार के मुट्ठी में है। जब जाति द्वारा काउंसिल बनेगा, तब उससे देश का अकल्यान होगा। यह सब जानता है, पर कुछ न करने से कुछ करते रहना अच्छा है। मरना भी मरना है, और खाट पर पड़े रहना भी मरना है; लेकिन एक अवस्था में कोई आशा नहीं रहता, दूसरी अवस्था में कुछ आशा रहता है। बस, इतना ही अंतर है, और कुछ नहीं।

 

इंदु ने छेड़कर पूछा-जब आप जानते हैं कि वहाँ जाना व्यर्थ है, तो क्यों जाते हैं? क्या आप बाहर रहकर कुछ नहीं कर सकते?

 

गांगुली-(हँसकर) वही तो बात है इंदुरानी, हम खाट पर पड़ा है, हिल नहीं सकता, बात नहीं कर सकता, खा नहीं सकता; लेकिन बाबा,यमराज को देखकर हम तो उठ भागेगा, रोएगा कि महाराज, कुछ दिन और रहने दो। हमारा जिंदगी काउंसिल में गुजर गया, अब कोई दूसरा रास्ता नहीं दिखाई देता।

 

इंदु-मैं तो ऐसी जिंदगी से मर जाना बेहतर समझूँ। कम-से-कम यह तो आशा होगी कि कदाचित् आनेवाला जीवन इससे अच्छा हो।

 

गांगुली-(हँसकर) हमको कोई कह दे कि मरकर तुम फिर इसी देश में आएगा और फिर काउंसिल में जा सकेगा, तो हम यमराज से बोलेगा-बाबा, जल्दी कर। पर ऐसा तो कहता नहीं।

 

जॉन सेवक-मेरा विचार है कि नये चुनाव में व्यापार-भवन की ओर से खड़ा हो जाऊँ।

 

गांगुली-आप किस दल में रहेगा?

 

जॉन सेवक-मेरा कोई न दल है और न होगा। मैं इसी विचार और उद्देश्य से जाऊँगा कि स्वदेशी व्यापार की रक्षा कर सकूँ। मैं प्रयत्न करूँगा कि विदेशी वस्तुओं पर बड़ी कठोरता से कर लगाया जाए, इस नीति का पालन किए बिना हमारा व्यापार कभी सफल न होगा।

 

गांगुली-इंग्लैंड को क्या करेगा?

 

जॉन सेवक-उसके साथ भी अन्य देशों का-सा व्यवहार होना चाहिए। मैं इंग्लैंड की व्यावसायिक दासता का घोर विरोधाी हूँ।

 

गांगुली-(घड़ी देखकर) बहुत अच्छी बात है, आप खड़ा हो। अभी हमको यहाँ से अकेला जाना पड़ता है तब दो आदमी साथ-साथ जाएगा। अच्छा, अब जाता है। कई आदमियों से मिलना है।

 

डॉक्टर गांगुली के बाद जॉन सेवक ने घर की राह ली। इंदु मकान पर पहुँची, तो राजा साहब बोले-तुम कहाँ रह गईं?

 

इंदु-रास्ते में डॉक्टर गांगुली और मि. जॉन सेवक मिल गए, बातें होने लगीं।

 

महेंद्र-गांगुली को साथ क्यों न लाईं?

 

इंदु-जल्दी में थे। आज तो इस अंधो ने कमाल कर दिया।

 

महेंद्र-एक ही धाूर्त है। जो उसके स्वभाव से परिचित न होगा, जरूर धाोखे में आ गया होगा। अपनी निर्दोषिता सिध्द करने के लिए इससे उत्ताम और कोई ढंग धयान ही में नहीं आ सकता। इसे चमत्कार कहना चाहिए। मानना पड़ेगा कि उसे मानव चरित्रा का पूरा ज्ञान है। निरक्षर होकर भी आज उसने कितने ही शिक्षित और विचारशील आदमियों को अपना भक्त बना लिया। यहाँ लोग उसका जुर्माना अदा करने के लिए चंदा जमा कर रहे हैं। सुना है, जुलूस भी निकालना चाहते हैं। पर मेरा दृढ़ विश्वास है कि उसने उस औरत को बहकाया, और मुझे अफसोस है कि और कड़ी सजा क्यों न दी।

 

इंदु-तो आपने चंदा भी न दिया होगा?

 

महेंद्र-कभी-कभी तुम बेसिर-पैर की बातें करने लगती हो। चंदा कैसे देता, अपने मुँह में आप ही थप्पड़ मारता!

 

इंदु-लेकिन मैंने तो दिया है। मुझे…

 

महेंद्र-अगर तुमने दे दिया है, तो बुरा किया है।

 

इंदु-मुझे यह क्या मालूम था कि…

 

महेंद्र-व्यर्थ बातें न बनाओ। अपना नाम गुप्त रखने को तो कह दिया है?

 

इंदु-नहीं, मैंने कुछ नहीं कहा।

 

महेंद्र-तो तुमसे ज्यादा बेसमझ आदमी संसार में न होगा। तुमने इंद्रदत्ता को रुपये दिए होंगे। इंद्रदत्ता यों बहुत विनयशील और सहृदय युवक है, और मैं उसका दिल से आदर करता हूँ। लेकिन इस अवसर पर वह दूसरों से चंदा वसूल करने के लिए तुम्हारा नाम उछालता फिरेगा। जरा दिल से सोचो, लोग क्या समझेंगे। शोक है। अगर इस वक्त मैं दीवार से सिर नहीं टकरा लेता, तो समझ लो कि बड़े धौये से काम ले रहा हूँ। तुम्हारे हाथों मुझे सदैव अपमान ही मिला, और तुम्हारा यह कार्य तो मेरे मुख पर कालिमा का चिद्द है, जो कभी नहीं मिट सकता।

 

यह कहकर महेंद्रकुमार निराश होकर आरामकुर्सी पर लेट गए और छत की ओर ताकने लगे। उन्होंने दीवार से सिर न टकराने में चाहे असीम धौर्य से काम लिया या न लिया हो, पर इंदु ने अपने मनोभावों को दबाने में असीम धौर्य से जरूर काम लिया। जी में आता था कह दूँ, मैं आपकी गुलाम नहीं हूँ, मुझे यह बात सम्भव ही नहीं मालूम होती थी कि कोई ऐसा प्राणी भी हो सकता है, जिस पर ऐसी करुण अपील का कुछ असर न हो। मगर भय हुआ कि कहीं बात बढ़ न जाए। उसने चाहा कि कमरे में चली जाऊँ और निर्दय प्रारब्धा को, जिसने मेरी शांति में विघ्न डालने का ठेका-सा ले लिया है, पैराें-तले कुचल डालूँ और दिखा दूँ कि धौर्य और सहनशीलता से प्रारब्धा के कठोरतम आघातों का प्रतिकार किया जा सकता है, किंतु ज्यों ही वह द्वार की तरफ चली कि महेंद्रकुमार फिर तनकर बैठ गए और बोले-जाती कहाँ हो,क्या मेरी सूरत से भी घृणा हो गई? मैं तुमसे बहुत सफाई से पूछना चाहता हूँ कि तुम इतनी निरंकुशता से क्यों काम करती हो? मैं तुमसे कितनी बार कह चुका हूँ कि जिन बातों का सम्बंधा मुझसे हो, वे मुझसे पूछे बिना न की जाएा करें। हाँ, अपनी निजी बातों में तुम स्वाधाीन हो; मगर तुम्हारे ऊपर मेरी अनुनय-विनय का कोई असर क्यों नहीं होता? क्या तुमने कसम खा ली है कि मुझे बदनाम करके, मेरे सम्मान को धाूल में मिलाकर, मेरी प्रतिष्ठा को पैरों से कुचलकर तभी दम लोगी?

 

इंदु ने गिड़गिड़ाकर कहा-ईश्वर के लिए इस वक्त मुझे कुछ कहने के लिए विवश न कीजिए। मुझसे भूल हुई या नहीं, इस पर मैं बहस नहीं करना चाहती, मैं माने लेती हूँ कि मुझसे भूल हुई और जरूर हुई। उसका प्रायश्चित्ता करने को तैयार हूँ। अगर अब भी आपका जी न भरा हो,तो लीजिए, बैठी जाती हूँ। आप जितनी देर तक और जो कुछ चाहें, कहें; मैं सिर न उठाऊँगी।

 

मगर क्रोधा अत्यंत कठोर होता है। वह देखना चाहता है कि मेरा एक-एक वाक्य निशाने पर बैठता है या नहीं, वह मौन को सहन नहीं कर सकता। उसकी शक्ति अपार है। ऐसा कोई घातक-से-घातक शस्त्रा नहीं है, जिससे बढ़कर काट करने वाले यंत्रा उसकी शस्त्राशाला में न हो;लेकिन मौन वह मंत्रा है, जिसके आगे उसकी सारी शक्ति विफल हो जाती है। मौन उसके लिए अजेय है। महेंद्रकुमार चिढ़कर बोले-इसका यह आशय है कि मुझे बकवास का रोग हो गया है और कभी-कभी उसका दौरा हो जाएा करता है?

 

इंदु-यह आप खुद कहते हैं।

 

इंदु से भूल हुई कि वह अपने वचन को निभा न सकी। क्रोधा को एक चाबुक और मिला। महेंद्र ने ऑंखें निकालकर कहा-यह मैं नहीं कहता, तुम कहती हो। आखिर बात क्या है? मैं तुमसे जिज्ञासा-भाव से पूछ रहा हूँ कि तुम क्यों बार-बार वे ही काम करती हो, जिनसे मेरी निंदा और जग-हँसाई हो, मेरी मान-प्रतिष्ठा धाूल में मिल जाए, मैं किसी को मुँह दिखाने लायक न रहूँ? मैं जानता हूँ, तुम जिद से ऐसा नहीं करतीं। मैं यहाँ तक कह सकता हूँ, तुम मेरे आदेशानुसार चलने का प्रयास भी करती हो। किंतु फिर भी जो यह अपवाद हो जाता है, उसका क्या कारण है? क्या यह बात तो नहीं कि पूर्वजन्म में हम और तुम एक दूसरे के शत्राु थे; या विधााता ने मेरी अभिलाषाओं और मंसूबों का सर्वनाश करने के लिए तुम्हें मेरे पल्ले बाँधा दिया है? मैं बहुधाा इसी विचार में पड़ा रहता हूँ, पर कुछ रहस्य नहीं खुलता।

 

इंदु-मुझे गुप्त ज्ञान रखने का तो दावा नहीं है। हाँ, अगर आपकी इच्छा हो, तो मैं जाकर इंद्रदत्ता को ताकीद कर दूँ कि मेरा नाम न जाहिर होने पाए।

 

महेंद्र-क्या बच्चों की-सी बातें करती हो; तुम्हें यह सोचना चाहिए था कि यह चंदा किस नीयत से जमा किया जा रहा है। इसका उद्देश्य है मेरे न्याय का अपमान करना, मेरी ख्याति की जड़ खोदना। अगर मैं अपने सेवक की डाँट-फटकार करूँ और तुम उसकी पीठ पर हाथ फेरो, तो मैं इसके सिवा और क्या समझ सकता हूँ कि तुम मुझे कलंकित करना चाहती हो? चंदा तो खैर होगा ही, मुझे उसके रोकने का अधिाकार नहीं है-जब तुम्हारे ऊपर कोई वश नहीं है, तो दूसरों का क्या कहना-लेकिन मैं जुलूस कदापि न निकलने दूँगा। मैं उसे अपने हुक्म से बंद कर दूँगा। और अगर लोगों को ज्यादा तत्पर देख्रूगा, तो सैनिक-सहायता लेने में भी संकोच न करूँगा।

 

इंदु-आप जो उचित समझें, करें; मुझसे ये सब बातें क्यों कहते हैं?

 

महेंद्र-तुमसे इसलिए कहता हूँ कि तुम भी उस अंधो के भक्तों में हो। कौन कह सकता है कि तुमने उससे दीक्षा लेने का निश्चय नहीं किया है! आखिर रैदास भगत के चेले ऊँची जातों में भी तो हैं?

 

इंदु-मैं दीक्षा को मुक्ति का साधान नहीं समझती और शायद कभी दीक्षा न लूँगी। मगर हाँ; आप चाहे जितना बुरा समझें, दुर्भाग्यवश मुझे यह पूरा विश्वास हो गया है कि सूरदास निरपराधा है। अगर यही उसकी भक्ति है, तो मैं अवश्य उसकी भक्त हूँ!

 

महेंद्र-तुम कल जुलूस में तो न जाओ?

 

इंदु-जाना तो चाहती थी, पर अब आपकी खातिर से न जाऊँगी। अपने सिर पर नंगी तलवार लटकते नहीं देख सकती।

 

महेंंद्र-अच्छी बात है, इसके लिए तुम्हें अनेक धान्यवाद!

 

इंदु अपने कमरे में जाकर लेट गई। उसका चित्ता बहुत खिन्न हो रहा था। वह देर तक राजा साहब की बातों पर विचार करती रही, फिर आप-ही-आप बोली-भगवान्, यह जीवन असह्य हो गया है। या तो तुम इनके हृदय को उदार कर दो, या मुझे संसार से उठा लो। इंद्रदत्ता इस वक्त न जाने कहाँ होगा? क्यों न उसके पास एक रुक्का भेज दूँ कि खबरदार, मेरा नाम जाहिर न होने पाए! मैंने इनसे नाहक कह दिया कि चंदा दिया। क्या जानती थी कि यह गुल खिलेगा!

 

उसने तुरंत घंटी बजाई, नौकर अंदर आकर खड़ा हो गया। इंदु ने रुक्का लिखा-प्रिय इंद्र, मेरे चंदे को किसी पर जाहिर मत करना, नहीं तो मुझे बड़ा दु:ख होगा। मुझे बहुत विवश होकर ये शब्द लिखने पड़े हैं।

 

फिर रुक्के को नौकर को देकर बोली-इंद्रदत्ता बाबू का मकान जानता है?

 

नौकर-होई तो कहूँ सहरै मँ न? पूछ लेबै!

 

इंदु-शहर में तो शायद उम्र-भर उनके घर का पता न लगे।

 

नौकर-आप चिट्ठी तो दें, पता तो हम लगाउब, लगी न, का कही!

 

इंदु-ताँगा ले लेना, काम जल्दी का है।

 

नौकर-हमार गोड़ ताँगा से कम थोरे है। का हम कौनों ताँगा ससुर से कम चलित है!

 

इंदु-बाजार चौक से होते हुए मेरे घर तक जाना। बीस बिस्वे वह तुम्हें मेरे घर पर ही मिलेंगे। इंद्रदत्ता को देखा है? पहचानता है न?

 

नौकर-जेहका एक बार देख लेई, ओहका जनम-भर न भूली। इंदर बाबू का तो सैकरन बेर देखा है।

 

इंदु-किसी को यह खत मत दिखाना।

 

नौकर-कोऊ देखी कइस, पहले औकी ऑंखि न फोरि डारब?

 

इंदु ने रुक्का दिया और नौकर चला गया। तब वह फिर लेट गई और वे ही बातें सोचने लगी-मेरा यह अपमान इन्हीं के कारण हो रहा है। इंद्र अपने दिल में क्या सोचेगा। यही न कि राजा साहब ने इसे डाँटा होगा। मानो मैं लौंडी हूँ, जब चाहते हैं डाँट देते हैं। मुझे कोई काम करने की स्वाधाीनता नहीं है। उन्हें अख्तयार है, जो चाहें, करें। मैं उनके इशारों पर चलने के लिए मजबूर हूँ। कितनी अधाोगति है!

 

यह सोचते ही वह तेजी से उठी और घंटी बजाई। लौंडी आकर खड़ी हो गई। इंदु बोली-देख, भीखा चला तो नहीं गया? मैंने उसे एक रुक्का दिया है। जाकर उससे वह रुक्का माँग ला। अब न भेजूँगी। चला गया हो, तो किसी को साइकिल पर दौड़ा देना। चौक की तरफ मिल जाएगा।

 

लौंडी चली गई और जरा देर में भीखा को लिए हुए आ पहुँची। भीख बोला-जो छिन-भर और न जाता, तो हम घरमा न मिलित।

 

इंदु-काम तो तुमने जुर्माने का किया है कि इतना जरूरी खत और अभी तक घर में पड़े रहे। लेकिन इस वक्त यही अच्छा हुआ। वह रुक्का अब न जाएगा, मुझे दो।

 

उसने रुक्का लेकर फाड़ डाला। तब आज का समाचार-पत्रा खोलकर देखने लगी। पहला ही शीर्षक था-‘शास्त्राीजी की महत्तवपूर्ण वक्तृता’। इंदु ने पत्रा को नीचे डाल दिया-यह महाशय तो शैतान से ज्यादा प्रसिध्द हो गए। जहाँ देखो, वहीं शास्त्राी। ऐसे मनुष्य की योग्यता की चाहे जितनी प्रशंसा की जाए, पर उसका सम्मान नहीं किया जा सकता। शास्त्राीजी का नाम आते ही मुझे इसकी याद आ जाती है। जो आदमी जरा-जरा-से मतभेद पर सिर हो जाए, दाल में जरा-सा नमक ज्यादा हो जाने पर स्त्राी को घर से निकाल दे, जिसे दूसरों के मनोभावों का जरा भी लिहाज न हो, जिसे जरा भी चिंता न हो कि मेरी बातों से किसी के दिल पर क्या असर होगा, वह भी कोई आदमी है! हो सकता है कि कल को कहने लगें, अपने पिता से मिलने मत जाओ। मानो, मैं इनके हाथों बिक गई!

 

दूसरे दिन प्रात:काल उसने गाड़ी तैयार कराई और दुशाला ओढ़कर घर से निकली। महेंद्रकुमार बाग में टहल रहे थे। यह उनका नित्य का नियम था। इंदु को जाते देखा, तो पूछा-इतने सबेरे कहाँ?

 

इंदु ने दूसरी ओर ताकते हुए कहा-जाती हूँ आपकी आज्ञा का पालन करने। इंद्रदत्ता से रुपये वापस लूँगी।

 

महेंद्र-इंदु, सच कहता हूँ, तुम मुझे पागल बना दोगी।

 

इंदु-आप मुझे कठपुतलियों की तरह नाचना चाहते हैं। कभी इधार, कभी उधार?

 

सहसा इंद्रदत्ता सामने से आते हुए दिखाई दिए। इंदु उनकी ओर लपककर चली, मानो अभिवादन करने जा रही है, और फाटक पर पहुँचकर बोली-इंद्रदत्ता, सच कहना, तुमने किसी से मेरे चंदे की चर्चा तो नहीं की?

 

इंद्रदत्ता सिटपिटा-सा गया, जैसे कोई आदमी दुकानदार को पैसे की जगह रुपया दे आए। बोला-आपने मुझे मना तो नहीं किया था?

 

इंदु-तुम झूठे हो, मैंने मना किया था।

 

इंद्रदत्ता-इंदुरानी, मुझे खूब याद है कि आपने मना नहीं किया था। हाँ, मुझे स्वयं बुध्दि से काम लेना चाहिए था। इतनी भूल जरूर मेरी है।

 

इंदु-(धाीरे से) तुम महेंद्र से इतना कह सकते हो कि मैंने इनकी चर्चा किसी से नहीं की, मुझ पर तुम्हारी बड़ी कृपा होगी। बड़े नैतिक संकट में पड़ी हुई हूँ।

 

यह कहते-कहते इंदु की ऑंखें डबडबा आईं। इंद्रदत्ता वातावरण ताड़ गया! बोला-हाँ, कह दूँगा-आपकी खातिर से।

 

एक क्षण में इंद्रदत्ता राजा के पास जा पहुँचा। इंदु घर में चली गई।

 

महेंद्रकुमार ने पूछा-कहिए महाशय, इस वक्त कैसे कष्ट किया?

 

इंद्रदत्ता-मुझे तो कष्ट नहीं हुआ, आपको कष्ट देने आया हूँ। क्षमा कीजिएगा। यद्यपि यह नियम-विरुध्द है, पर मेरी आपसे प्रार्थना है कि सूरदास और सुभागी का जुर्मान आप इसी वक्त मुझसे ले लें और उन दोनों को रिहा करने का हुक्म दे दें। कचहरी अभी देर में खुलेगी। मैं इसे आपकी विशेष कृपा समझूँगा।

 

महेंद्रकुमार-हाँ, नियम-विरुध्द तो है, लेकिन तुम्हारा लिहाज करना पड़ता है। रुपये मुनीम को दे दो, मैं रिहाई का हुकम लिखे देता हूँ। कितने रुपये जमा किए?

 

इंद्रदत्ता-बस, शाम को चुने हुए सज्जनों के पास गया था। कोई पाँच सौ रुपये हो गए।

 

महेंद्रकुमार-तब तो तुम इस कला में निपुण हो। इंदुरानी का नाम देखकर न देनेवालों ने भी दिए होंगे।

 

इंद्रदत्ता-मैं इंदुरानी के नाम का इससे ज्यादा आदर करता हूँ। अगर उनका नाम दिखाता, तो पाँच सौ रुपये न लाता, पाँच हजार लाता।

 

महेंद्रकुमार-अगर यह सच है, तो तुमने मेरी आबरू रख ली।

 

इंद्रदत्ता-मुझे आपसे एक याचना और करनी है। कुछ लोग सूरदास को इज्जत के साथ उनके घर पहुँचाना चाहते हैं। सम्भव है, दो-चार सौ दर्शक जमा हो जाएँ। मैं आपसे इसका आज्ञा चाहता हूँ।

 

महेंद्रकुमार-जुलूस निकालने की आज्ञा नहीं दे सकता। शांति-भंग हो जाने की शंका है।

 

इंद्रदत्ता-मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि पत्ताा तक न हिलेगा।

 

महेंद्रकुमार-यह असम्भव है।

 

इंद्रदत्ता-मैं इसकी जमानत दे सकता हूँ।

 

महेंद्रकुमार-यह नहीं हो सकता।

 

इंद्रदत्ता समझ गया कि राजा साहब से अब ज्यादा आग्रह करना व्यर्थ है। जाकर मुनीम को रुपये दिए और ताँगे की ओर चला। सहसा राजा साहब ने पूछा-जुलूस तो न निकलेगा न?

 

इंद्रदत्ता-निकलेगा। मैं रोकना चाहूँ, तो भी नहीं रोक सकता।

 

इंद्रदत्ता वहाँ से अपने मित्राों को सूचना देने के लिए चले। जुलूस का प्रबंधा करने में घंटों की देर लग गई। इधार उनके जाते ही राजा साहब ने जेल के दारोगा को टेलीफोन कर दिया कि सूरदास और सुभागी को छोड़ दिया जाए और उन्हें बंद गाड़ी में बैठाकर उनके घर पहुँचा दिया जाए। जब इंद्रदत्ता सवारी, बाजे आदि लिए हुए जेल पहुँचे, तो मालूम हुआ, पिंजरा खाली है, चिड़ियाँ उड़ गईं। हाथ मलकर रह गए। उन्हीं पाँवों पाँडेपुर चले। देखा, तो सूरदास एक नीम के नीचे राख के ढेर के पास बैठा हुआ है। एक ओर सुभागी सिर झुकाए खड़ी है। इंद्रदत्ता को देखते ही जगधार और अन्य कई आदमी इधार-उधार से आकर जमा हो गए।

 

इंद्रदत्ता-सूरदास, तुमने तो बड़ी जल्दी की। वहाँ लोग तुम्हारा जुलूस निकालने की तैयारियाँ किए हुए थे। राजा साहब ने बाजी मार ली। अब बतलाओ, वे रुपये क्या हों, जो जुलूस के खर्च के लिए जमा किए गए थे?

 

सूरदास-अच्छा ही हुआ कि मैं यहाँ चुपके से आ गया, नहीं तो सहर-भर में घूमना पड़ता! जुलूस बड़े-बड़े आदमियों का निकालता है कि अंधो-भिखारियों का? आप लोगों ने जरीबाना देकर छुड़ा दिया, यही कौन कम धारम किया?

 

इंद्रदत्ता-अच्छा बताओ, ये रुपये क्या किए जाएँ? तुम्हें दे दूँ?

 

सूरदास-कितने रुपये होंगे?

 

इंद्रदत्ता-कोई तीन सौ होंगे।

 

सूरदास-बहुत हैं। इतने में भैरों की दूकान मजे में बन जाएगी।

 

जगधार को बुरा लगा, बोला-पहले अपनी झोंपड़ी की तो फिकर करो!

 

सूरदास-मैं इसी पेड़ के नीचे पड़ रहा करूँगा, या पंडाजी के दालान में।

 

जगधार-जिसकी दूकान जली है, वह बनवाएगा, तुम्हें क्या चिंता है?

 

सूरदास-जली तो है मेरे ही कारण!

 

जगधार-तुम्हारा घर भी तो जला है?

 

सूरदास-यह भी बनेगा, लेकिन पीछे से। दूकान न बनी, तो भैरों को कितना घाटा होगा! मेरी भीख तो एक दिन भी बंद न होगी!

 

जगधार-बहुत सराहने से भी आदमी का मन बिगड़ जाता है। तुम्हारी भलमनसी को लोग बखान करने लगे, तो अब तुम सोचते होगे कि ऐसा काम करूँ, जिसमें और बड़ाई हो। इस तरह दूसरों की ताली पर नाचना न चाहिए।

 

इंद्रदत्ता-सूरदास, तुम इन लोगों को बकने दो, तुम ज्ञानी हो, ज्ञान-पक्ष को मत छोड़ो। ये रुपये पास रखे जाता हूँ; जो इच्छा हो, करना।

 

इंद्रदत्ता चला गया, तो सुभागी ने सूरदास से कहा-उसकी दूकान बनवाने का नाम न लेना।

 

सूरदास-मेरे घर से पहले उसकी दूकान बनेगी। यह बदनामी सिर पर कौन ले कि सूरदास ने भैरों का घर जलवा दिया। मेरे मन में यह बात समा गई है कि हमीं में से किसी ने उसकी दूकान जलाई।

 

सुभागी-उससे तुम कितना ही दबो, पर वह तुम्हारा दुसमन ही बना रहेगा। कुत्तो की पूँछ कभी सीधाी नहीं होती।

 

सूरदास-तुम दोनों फिर एक हो जाओगे, तब तुझसे पूछँगा।

 

सुभागी-भगवान मार डालें, पर उसका मुँह न दिखावें।

 

सूरदास-मैं कहे देता हूँ, एक दिन तू भैरों के घर की देवी बनेगी।

 

सूरदास रुपये लिए हुए भैरों के घर की ओर चला। भैरों रपट करने जाना तो चाहता था; पर शंका हो रही थी कि कहीं सूरदास की झोंपड़ी की भी बात चली, तो क्या जवाब दँगा। बार-बार इरादा करके रुक जाता था। इतने में सूरदास को सामने आते देखा, तो हक्का-बक्का रह गया। विस्मित होकर बोला-अरे, क्या जरीबाना दे आया क्या?

 

बुढ़िया बोली-बेटा, इसे जरूर किसी देवता का इष्ट है, नहीं तो वहाँ से कैसे भाग आता!

 

सूरदास ने बढ़कर कहा-भैरों, मैं ईश्वर को बीच में डालकर कहता हूँ, मुझे कुछ नहीं मालूम कि तुम्हारी दूकान किसने जलाई। तुम मुझे चाहे जितना नीच समझो; पर मेरी जानकारी में यह बात कभी न होने पाती। हाँ, इतना कह सकता हूँ कि यह किसी मेरे हितू का काम है।

 

भैरों-पहले यह बताओ कि तुम छूट कैसे आए? मुझे तो यही बड़ा अचरज है।

 

सूरदास-भगवान् की इच्छा। सहर के कुछ धार्मात्मा आदमियों ने आपस में चंदा करके मेरा जरीबाना भी दे दिया और कोई तीन सौ रुपये जो बच रहे हैं, मुझे दे गए हैं। मैं तुमसे यह कहने आया हूँ कि तुम ये रुपये लेकर अपनी दूकान बनवा लो, जिसमें तुम्हारा हरज न हो। मैं सब रुपये ले आया हूँ।

 

भैरों भौंचक्का होकर उसकी ओर ताकने लगा, जैसे कोई आदमी आकाश से मोतियों की वर्षा होते देखे। उसे शंका हो रही थी कि इन्हें बटोरूँ या नहीं, इनमें कोई रहस्य तो नहीं है, इनमें कोई जहरीला कीड़ा तो नहीं छिपा हुआ है, कहीं इनको बटोरने से मुझ पर कोई आफत तो न आ जाएगी। उसके मन में प्रश्न उठा, यह अंधाा सचमुच रुपये देने के लिए आया है, या मुझे ताना दे रहा है। जरा इसका मन टटोलना चाहिए,बोला-तुम अपने रुपये रखो, यहाँ कोई रुपयों के भूखे नहीं हैं! प्यासाें मरते भी हों, तो दुसमन के हाथ से पानी न पिएँ।

 

सूरदास-भैरों, हमारी-तुम्हारी दुसमनी कैसी? मैं तो किसी को अपना दुसमन नहीं देखता। चार दिन की जिंदगानी के लिए क्या किसी से दुसमनी की जाए! तुमने मेरे साथ कोई बुराई नहीं की। तुम्हारी जगह मैं होता और समझता कि तुम मेरी घरवाली को बहकाए लिए जाते हो,तो मैं भी वहीं करता, जो तुमने किया। अपनी आबरू किसको प्यारी नहीं होती? जिसे अपनी आबरू प्यारी न हो, उसकी गिनती आदमियों में नहीं, पशुओं में है। मैं तुमसे सच कहता हूँ, तुम्हारे ही लिए मैंने ये रुपये लिए, नहीं तो मेरे लिए तो पेड़ की छाँह बहुत थी। मैं जानता हूँ,अभी तुम्हें मेरे ऊपर संदेह हो रहा है, लेकिन कभी-न-कभी तुम्हारा मन मेरी ओर से साफ हो जाएगा। ये रुपये लो और भगवान् का नाम लेकर दूकान बनवाने में हाथ लगा दो। कम पड़ेंगे, तो जिस भगवान् ने इतनी मदद की है, वही भगवान् और मदद भी करेंगे।

 

भैरों को इन वाक्यों में सहृदयता और सज्जनता की झलक दिखाई दी। सत्य विश्वासोत्पादक होता है। नरम होकर बोला-आओ, बैठो, चिलम पियो। कुछ बातें हों, तो समझ में आए। तुम्हारे मन का भेद ही नहीं खुलता। दुसमन के साथ कोई भलाई नहीं करता। तुम मेरे साथ क्यों इतनी मेहरबानी करते हो?

 

सूरदास-तुमने मेरे साथ कौन-सी दुसमनी की? तुमने वही किया, जो तुम्हारा धारम था! मैं रात-भर हिरासत में बैठा यही सोचता रहा कि तुम क्यों मेरे पीछे पड़े हुए हो, मैंने तुम्हारे साथ कोई बुराई नहीं की, तो मुझे मालूम हुआ कि तुम मेरे साथ कोई बुराई नहीं कर रहे हो। यही तुम्हारा धारम है। औरत के पीछे तो खून हो जाता है। तुमने नालिस ही कर दी, तो कौन बुरा काम किया! बस, अब तुमसे मेरी यही विनती है कि जिस तरह कल भरी अदालत में पंचों ने मुझे निरपराधा कह दिया, उसी तरह तुम भी मेरी ओर से अपना मन साफ कर लो। मेरी इससे भी बड़ी दुर्गत हो, अगर मैंने तुम्हारे साथ कोई घाटा किया है। हाँ, मुझसे एक ही बात नहीं हो सकती। मैं सुभागी को अपने घर से निकाल नहीं सकता। डरता हूँ कि कोई आड़ न रहेगी, तो न जाने उसकी क्या दसा हो। मेरे यहाँ रहेगी, तो कौन जाने, कभी तुम्हीं उसे फिर रख लो।

 

भैरों का मलिन हृदय इस आंतरिक निर्मलता से प्रतिबिम्बित हो गया। आज पहली बार उसे सूरदास की नेकनीयती पर विश्वास हुआ। सोचा-अगर इसका दिल साफ न होता, तो मुझसे ऐसी बातें क्यों करता? मेरा कोई डर तो इसे है नहीं। मैं जो कुछ कर सकता था, कर चुका। इसके साथ तो सारा सहर है। सबों ने जरीबाना अदा कर दिया। ऊपर से कई सौ रुपए और दे गए। मुहल्ले में भी इसकी धााक फिर बैठ गई। चाहे तो बात-की-बात में मुझे बिगाड़ सकता है। नीयत साफ न होती, तो अब सुभागी के साथ आराम से रहता। अंधाा है, अपाहिज है, भीख माँगता है; पर उसकी कितनी मरजाद है, बड़े-बडे आदमी आव-भगत करते हैं! मैं कितना अधाम, नीच आदमी हूँ, पैसे के लिए रात-दिन दगा-फरेब करता रहता हूँ। कौन-सा पाप है, जो मैंने नहीं किया! इस बेचारे का घर जलाया, एक बार नहीं, दो बार इसके रुपये उठा ले गया। यह मेरे साथ नेकी ही करता चला आता है। सुभागी के बारे में मुझे सक-ही-सक था। अगर कुछ नीयत बद होती, तो इसका हाथ किसने पकड़ा था,सुभागी को खुले-खजाने रख लेता। अब तो अदालत-कचहरी का भी डर नहीं रहा। यह सोचता हुआ वह सूरदास के पास आकर बोला-सूरे, अब तक मैंने तुम्हारे साथ जो बुराई-भलाई की, उसे माफ करो। आज से अगर तुम्हारे साथ कोई बुराई करूँ, तो भगवान मुझसे समझें। ये रुपये मुझे मत दो, मेरे पास रुपये हैं। ये भी तुम्हारे ही रुपये हैं। दूकान बनवा लूँगा। सुभागी पर भी मुझे अब कोई संदेह नहीं रहा। मैं भगवान् को बीच में डालकर कहता हूँ, अब मैं कभी उसे कोई कड़ी बात तक न कहूँगा। मैं अब तक धाोखे में पड़ा हुआ था। सुभागी मेरे यहाँ आने पर वह तुम्हारी बात को नाहीं तो न करेगी?

 

सूरदास-राजी ही है, बस उसे यही डर है कि तुम फिर मारने-पीटने लगोगे।

 

भैरों-सूरे, अब मैं उसे भी पहचान गया। मैं उसके जोग नहीं था। उसका ब्याह तो किसी धार्मात्मा आदमी से होना चाहिए था। (धाीरे से) आज तुमसे कहता हूँ, पहली बार भी मैंने ही तुम्हारे घर में आग लगाई थी और तुम्हारे रुपये चुराए थे।

 

सूरदास-उन बातों को भूल जाओ भैराें! मुझे सब मालूम है। संसार में कौन है, जो कहे कि मैं गंगाजल हूँ। जब बडे-बड़े साधाु-संन्यासी माया-मोह में फँसे हुए हैं, तो हमारी-तुम्हारी क्या बात है! हमारी बड़ी भूल यही है कि खेल को खेल की तरह नहीं खेलते। खेल में धााँधाली करके कोई जीत ही जाए, तो क्या हाथ आएगा? खेलना तो इस तरह चाहिए कि निगाह जीत पर रहे; पर हार से घबराए नहीं, ईमान को न छोड़े। जीतकर इतना न इतराए कि अब कभी हार होगी ही नहीं। यह हार-जीत तो जिंदगानी के साथ है। हाँ, एक सलाह की बात कहता हूँ। तुम ताड़ी की दुकान छोड़कर कोई दूसरा रोजगार क्यों नहीं करते?

 

भैरों-जो कहो, वह करूँ। यह रोजगार खराब है। रात-दिन जुआरी, चोर, बदमाश आदमियों का ही साथ रहता है। उन्हीं की बातें सुनो, उन्हीं के ढंग सीखो। अब मुझे मालूम हो रहा है कि इसी रोजगार ने मुझे चौपट किया। बताओ, क्या करूँ?

 

सूरदास-लकड़ी का रोजगार क्यों नहीं कर लेते? बुरा नहीं है। आजकल यहाँ परदेसी बहुत आएँगे, बिक्री भी अच्छी होगी। जहाँ ताड़ी की दूकान थी, वहीं एक बाड़ा बनवा दो और इन रुपयों से लकड़ी का काम करना शुरू कर दो।

 

भैरों-बहुत अच्छी बात है। मगर ये रुपये अपने ही पास रखो। मेरे मन का क्या ठिकाना!

 

रुपये पाकर कोई और बुराई न कर बैठूँ। मेरे-जैसे आदमी को तो कभी आधो पेट के सिवा भोजन न मिलना चाहिए। पैसे हाथ में आए, और सनक सवार हुई।

 

सूरदास-मेरे घर न द्वार, रखूँगा कहाँ?

 

भैरों-इससे तुम अपना घर बनवा लो।

 

सूरदास-तुम्हें लकड़ी की दुकान से नफा हो, तो बनवा देना।

 

भैरों-सुभागी को समझा दो।

 

सूरदास-समझा दूँगा।

 

सूरदास चला गया। भैरों घर गया, तो बुढ़िया बोली-तुझसे मेल करने आया था न?

 

भैरों-हाँ, क्यों न मेल करेगा, मैं बड़ा लाट हूँ न! बुढ़ापे में तुझे और कुछ नहीं सूझता। यह आदमी नहीं, साधाु है!

 

फैक्टरी करीब-करीब तैयार हो गई थी। अब मशीनें गड़ने लगीं। पहले तो मजदूर-मिस्त्राी आदि प्राय: मिल के बरामदों ही में रहते थे, वहीं पेड़ों के नीचे खाना पकाते और सोते; लेकिन जब उनकी संख्या बहुत बढ़ गई, तो मुहल्ले में मकान ले-लेकर रहने लगे। पाँड़ेपुर छोटी-सी बस्ती तो थी ही, वहाँ इतने मकान कहाँ थे, नतीजा यह हुआ कि मुहल्लेवाले किराए के लालच से परदेशियों को अपने-अपने घरों में ठहराने लगे। कोई परदे की दीवार खिंचवा लेता था, कोई खुद झोंपड़ा बनाकर उसमें रहने लगता और मकान भड़ैतों को दे देता। भैरों ने लकड़ी की दूकान खोल ली थी। वह अपनी माँ के साथ वहीं रहने लगा, अपना घर किराए पर दे दिया। ठाकुरदीन ने अपनी दुकान के सामने एक टट्टी लगाकर गुजर करना शुरू किया, उसके घर में एक ओवरसियर आ डटे। जगधार सबसे लोभी था, उसने सारा मकान उठा दिया और आप एक फूस के छप्पर में निर्वाह करने लगा। नायकराम के बरामदे में तो नित्य एक बरात ठहरती थी। यहाँ तक लोभ ने लोगों को घेरा कि बजरंगी ने भी मकान का एक हिस्सा उठा दिया। हाँ, सूरदास ने किसी को नहीं टिकाया। वह अपने नए मकान में, जो इंदुरानी के गुप्त दान से बना था, सुभागी के साथ रहता था। सुभागी अभी तक भैरों के साथ रहने पर राजी न हुई थी। हाँ, भैरों की आमद-रफ्त अब सूरदास के घर अधिाक रहती थी। कारखाने में अभी मशीनें न गड़ी थीं, पर उसका फ्ै+लाव दिन-दिन बढ़ता जाता था। सूरदास की बाकी पाँच बीघे जमीन भी उसी धाारा के अनुसार मिल के अधिाकार में आ गई। सूरदास ने सुना, तो हाथ मलकर रह गया। पछताने लगा कि जॉन साहब ही से क्यों न सौदा कर लिया! पाँच हजार देते थे। अब बहुत मिलेंगे, दो-चार सौ रुपये मिल जाएँगे। अब कोई आंदोलन करना उसे व्यर्थ मालूम होता था। जब पहले ही कुछ न कर सका, तो अबकी क्या कर लूँगा। पहले ही यह शंका थी, वह पूरी हो गई। दोपहर का समय था। सूरदास एक पेड़ के नीचे बैठा झपकियाँ ले रहा था कि इतने में तहसील के एक चपरासी ने आकर उसे पुकारा और एक सरकारी परवाना दिया। सूरदास समझ गया कि हो-न-हो जमीन ही का कुछ झगड़ा है। परवाना लिए हुए मिल में आया कि किसी बाबू से पढ़वाए। मगर कचहरी की सुबोधा लिपि बाबुओं से क्या चलती! कोई कुछ बता न सका। हारकर लौट रहा था कि प्रभु सेवक ने देख लिया। तुरंत अपने कमरे में बुला लिया और परवाने को देखा। लिखा हुआ था-अपनी जमीन के मुआवजे के 1,000 रुपये तहसील में आकर ले जाओ। सूरदास-कुल एक हजार है? प्रभु सेवक-हाँ, इतना ही तो लिखा है। सूरदास-तो मैं रुपये लेने न जाऊँगा। साहब ने पाँच हजार देने कहे थे, उनके एक हजार रहे, घूस-घास में सौ-पचास और उड़ जाएँगे। सरकार का खजाना खाली है, भर जाएगा। प्रभु सेवक-रुपये न लोगे, तो जब्त हो जाएँगे। यहाँ तो सरकार इसी ताक में रहती है कि किसी तरह प्रजा का धान उड़ा ले। कुछ टैक्स के बहाने से, कुछ रोजगार के बहाने से, कुछ किसी बहाने से हजम कर लेती है। सूरदास-गरीबों की चीज है, तो बाजार-भाव से दाम देना चाहिए। एक तो जबरदस्ती जमीन ले ली, उस पर मनमाना दाम दे दिया। यह तो कोई न्याय नहीं है। प्रभु सेवक-सरकार यहाँ न्याय करने नहीं आई है भाई, राज्य करने आई है। न्याय करने से उसे कुछ मिलता है? कोई समय वह था, जब न्याय को राज्य की बुनियाद समझा जाता था। अब वह जमाना नहीं है। अब व्यापार का राज्य है, और जो इस राज्य को स्वीकार न करे, उसके लिए तारों का निशाना मारनेवाली तोपें हैं। तुम क्या कर सकते हो? दीवानी में मुकदमा दायर करोगे, वहाँ भी सरकार ही के नौकर-चाकर न्याय-पद पर बैठे हुए हैं। सूरदास-मैं कुछ न लूँगा। जब राजा ही अधार्म करने लगा, तो परजा कहाँ तक जान बचाती फिरेगी? प्रभु सेवक-इससे फायदा क्या? एक हजार मिलते हैं, ले लो; भागते भूत की लँगोटी ही भली। सहसा इंद्रदत्ता आ पहुँचे और बोले-प्रभु, आज डेरा कूच है, राजपूताना जा रहा हूँ। प्रभु सेवक-व्यर्थ जाते हो। एक तो ऐसी सख्त गरमी, दूसरे वहाँ की दशा अब बड़ी भयानक हो रही है। नाहक कहीं फँस-फँसा जाओगे। इंद्रदत्ता-बस, एक बार विनयसिंह से मिलना चाहता हूँ। मैं देखना चाहता हूँ कि उनके स्वभाव, चरित्रा, आचार-विचार में इतना परिवर्तन, नहीं रूपांतर कैसे हो गया। प्रभु सेवक-जरूर कोई-न-कोई रहस्य है। प्रलोभन में पड़नेवाला आदमी तो नहीं है। मैं तो उनका परम भक्त हूँ। अगर वह विचलित हुए, तो मैं समझ जाऊँगा कि धार्मनिष्ठा का संसार से लोप हो गया। इंद्रदत्ता-यह न कहो प्रभु, मानव-चरित्रा बहुत ही दुर्बोधा वस्तु है। मुझे तो विनय की काया-पलट पर इतना क्रोधा आता है कि पाऊँ, तो गोली मार दूँ। हाँ, संतोष इतना ही है कि उनके निकल जाने से इस संस्था पर कोई असर नहीं पड़ सकता। तुम्हें तो मालूम है, हम लोगों ने बंगाल में प्राणियों के उध्दार के लिए कितना भगीरथ प्रयत्न किया। कई-कई दिन तक तो हम लोगों को दाना तक न मयस्सर होता था। सूरदास-भैया, कौन लोग इस भाँति गरीबों का पालन करते हैं? इंद्रदत्ता-अरे सूरदास! तुम यहाँ कोने में खड़े हो! मैंने तो तुम्हें देखा ही नहीं। कहो, सब कुशल है न? सूरदास-सब भगवान् की दया है। तुम अभी किन लोगाेंं की बात कर रहे थे? इंद्रदत्ता-अपने ही साथियों की। कुँवर भरतसिंह ने कुछ जवान आदमियों को संगठित करके एक संगत बना दी है, उसके खर्च के लिए थोड़ी-सी जमीन भी दान कर दी है। आजकल हम लोग कई सौ आदमी हैं। देश की यथाशक्ति सेवा करना ही हमारा परम धार्म और व्रत है। इस वक्त हममें से कुछ लोग तो राजपूताना गए हुए हैं और कुछ लोग पंजाब गए हुए हैं, जहाँ सरकारी फौज ने प्रजा पर गोलियाँ चला दी हैं। सूरदास-भैया, यह तो बड़े पुन्न का काम है। ऐसे महात्मा लोगों के तो दरसन करने चाहिए। तो भैया, तुम लोग चंदे भी उगाहते होगे? इंद्रदत्ता-हाँ, जिसकी इच्छा होती है, चंदा भी दे देता है; लेकिन हम लोग खुद नहीं माँगते फिरते। सूरदास-मैं आप लोगों के साथ चलूँ, तो आप मुझे रखेंगे? यहाँ पड़े-पड़े अपना पेट पालता हूँ, आपके साथ रहूँगा, तो आदमी हो जाऊँगा। इंद्रदत्ता ने प्रभु सेवक से ऍंगरेजी में कहा-कितना भोला आदमी है। सेवा और त्याग की सदेह मूर्ति होने पर भी गरूर छू तक नहीं गया, अपने सत्कार्य का कुछ मूल्य नहीं समझता। परोपकार इसके लिए कोई इच्छित कर्म नहीं रहा, इसके चरित्रा में मिल गया है। सूरदास ने फिर कहा-और कुछ तो न कर सकूँगा, अपढ़, गँवार ठहरा, हाँ, जिसके सरहाने बैठा दीजिएगा, पंखा झलता रहूँगा, पीठ पर जो कुछ लाद दीजिएगा, लिए फिरूँगा। इंद्रदत्ता-तुम सामान्य रीति से जो कुछ करते हो, वह उससे कहीं बढ़कर है, जो हम लोग कभी-कभी विशेष अवसरों पर करते हैं। दुश्मन के साथ नेकी करना रोगियों की सेवा से छोटा काम नहीं है। सूरदास का मुख-मंडल खिल उठा, जैसे किसी कवि ने किसी रसिक से दाद पाई हो। बोला-भैया, हमारी क्या बात चलाते हो? जो आदमी पेट पालने के लिए भीख माँगेगा, वह पुन्न-धारम क्या करेगा! बुरा न मानो, तो एक बात कहूँ। छोटा मुँह बड़ी बात है; लेकिन आपका हुकुम हो, तो मुझे मावजे के जो रुपये मिले हैं, उन्हें आपकी संगत की भेंट कर दूँ। इंद्रदत्ता-कैसे रुपये? प्रभु सेवक-इसकी कथा बड़ी लम्बी है। बस, इतना ही समझ लो कि पापा ने राजा महेंद्रकुमार की सहायता से इसकी जो जमीन ले ली थी, उसका एक हजार रुपया इसे मुआवजा दिया गया है। यह मिल उसी लूट के माल पर बन रही है। इंद्रदत्ता-तुमने अपने पापा को मना नहीं किया? प्रभु सेवक-खुदा की कसम, मैं और सोफी, दोनों ही ने पापा को बहुत रोका, पर तुम उनकी आदत जानते ही हो, कोई धाुन सवार हो जाती है, तो किसी की नहीं सुनते। इंद्रदत्ता-मैं तो अपने बाप से लड़ जाता, मिल बनती या भाड़ में जाती! ऐसी दशा में तुम्हारा कम-से-कम यहर् कत्ताव्य था कि मिल से बिलकुल अलग रहते। बाप की आज्ञा मानना पुत्रा का धार्म है, यह मानता हूँ; लेकिन जब बाप अन्याय करने लगे, तो लड़का उसका अनुगामी बनने के लिए बाधय नहीं। तुम्हारी रचनाओं मेंं तो एक-एक शब्द से नैतिक विकास टपकता है, ऐसी उड़ान भरते हो कि हरिश्चंद्र और हुसैन भी मात हो जाएँ; मगर मालूम होता है, तुम्हारी समस्त शक्ति शब्द योजना ही में उड़ जाती है, क्रियाशीलता के लिए कुछ बाकी नहीं बचता यथार्थ तो यह है कि तुम अपनी रचनाओं की गर्द को भी नहीं पहुँचते। बस, जबान के शेर हो। सूरदास, हम लोग तुम-जैसे गरीबों से चंदा नहीं लेते। हमारे दाता धानी लोग हैं। सूरदास-भैया; तुम न लोगे, तो कोई चोर ले जाएगा। मेरे पास रुपयों का काम ही क्या है। तुम्हारी दया से पेट-भर अन्न मिल ही जाता है, रहने के लिए झोंपड़ी बन ही गई है, और क्या चाहिए। किसी अच्छे काम में लग जाना इससे कहीं अच्छा है कि चोर उठा ले जाएँ। मेरे ऊपर इतनी दया करो। इंद्रदत्ता-अगर देना ही चाहते हो, तो कोई कुऑं खुदवा दो। बहुत दिनों तक तुम्हारा नाम रहेगा। सूरदास-भैया, मुझे नाम की भूख नहीं। बहाने मत करो, ये रुपये लेकर अपनी संगत में दे दो। मेरे सिर से बोझ टल जाएगा। प्रभु सेवक-(अंग्रेजी में) मित्रा, इसके रुपये ले लो, नहीं तो इसे चैन न आएगा। इस दयाशीलता को देवोपम कहना उसका अपमान करना है। मेरी तो कल्पना भी वहाँ तक नहीं पहुँच सकती। ऐसे-ऐसे मनुष्य भी संसार में पड़े हुए हैं। एक हम हैं कि अपने भरे हुए थाल में से एक टुकड़ा उठाकर फेंक देते हैं, तो दूसरे दिन पत्राों में अपना नाम देखने को दौड़ते हैं। सम्पादक अगर उस समाचार को मोटे अक्षरों में प्रकाशित न करे, तो उसे गोली मार दें। पवित्रा आत्मा है! इंद्रदत्ता-सूरदास, अगर तुम्हारी यही इच्छा है, तो मैं रुपये ले लूँगा, लेकिन इस शर्त पर कि तुम्हें जब कोई जरूरत हो, हमें तुरंत सूचना देना। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि शीघ्र ही तुम्हारी कुटी भक्तों का तीर्थ बन जाएगी, और लोग तुम्हारे दर्शनों को आया करेंगे। सूरदास-तो मैं आज रुपये लाऊँगा। इंद्रदत्ता-अकेले न जाना, नहीं तो कचहरी के कुत्तो तुम्हें बहुत दिक करेंगे। मैं तुम्हारे साथ चलूँगा। सूरदास-अब एक अर्ज आपसे भी है साहब! आप पुतलीघर के मजूरों के लिए घर क्यों नहीं बनवा देते? वे सारी बस्ती में फ्ै+ले हुए हैं और रोज ऊधाम मचाते रहते हैं। हमारे मुहल्ले में किसी ने औरत को नहीं छेड़ा था, न कभी इतनी चोरियाँ हुईं, न कभी इतने धाड़ल्ले से जुआ हुआ, न शराबियों का ऐसा हुल्लड़ रहा। जब तक मजदूर लोग वहाँ काम पर नहीं आ जाते, औरतें घरों से पानी भरने नहीं निकलतीं। रात को इतना हुल्लड़ होता है कि नींद नहीं आती। किसी को समझाने जाओ, तो लड़ने पर उतारू हो जाता है। यह कहकर सूरदास चुप हो गया और सोचने लगा, मैंने बात बहुत बढ़ाकर तो नहीं कही! इंद्रदत्ता ने प्रभु सेवक को तिरस्कारपूर्ण लोचनों से देखकर कहा-भाई, यह तो अच्छी बात नहीं। अपने पापा से कहो, इसका जल्दी प्रबंधा करें। न जाने, तुम्हारे वे सब सिध्दांत क्या हो गए। बैठे-बैठे यह सारा माजरा देख रहे हो, और कुछ करते-धारते नहीं। प्रभु सेवक-मुझे तो सिरे से इस काम से घृणा है, मैं न इसे पसंद करता हूँ और न इसके योग्य हूँ। मेरे जीवन का सुख-स्वर्ग तो यही है कि किसी पहाड़ी के दामन में एक जलधाारा के तट पर, छोटी-सी झोंपड़ी बनाकर पड़ा रहूँ। न लोक की चिंता हो, न परलोक की। न अपने नाम को कोई रोनेवाला हो, न हँसनेवाला। यही मेरे जीवन का उच्चतम आदर्श है। पर इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए जिस संयम और उद्योग की जरूरत है, उससे वंचित हूँ। खैर, सच्ची बात तो यह है कि इस तरफ मेरा धयान ही नहीं गया। मेरा तो यहाँ आना न आना दोनों बराबर हैं। केवल पापा के लिहाज से चला आता हूँ। अधिाकांश समय यही सोचने में काटता हूँ कि क्योंकर इस कैद से रिहाई पाऊँ। आज ही पापा से कहूँगा। इंद्रदत्ता-हाँ, आज ही कहना। तुम्हें संकोच हो, तो मैं कह दूँ? प्रभु सेवक-नहीं जी, इसमें क्या संकोच है। इससे तो मेरा रंग और जम जाएगा। पापा को खयाल होगा, अब इसका मन लगने लगा, कुछ इसने कहा तो! उन्हें तो मुझसे यही रोना है कि मैं किसी बात में बोलता ही नहीं। इंद्रदत्ता यहाँ से चले तो सूरदास बहुत दूर तक उनके साथ सेवा-समिति की बातें पूछता हुआ चला आया। जब इंद्रदत्ता ने बहुत आग्रह किया, तो लौटा। इंद्रदत्ता वहीं सड़क पर खड़ा उस दुर्बल, दीन प्राणी को हवा के झोंके से लड़खड़ाते वृक्षों की छाँह में विलीन होते देखता रहा। शायद यह निश्चय करना चाहता था कि वह कोई देवता है या मनुष्य!

 

प्रभु सेवक ने घर आते ही मकान का जिक्र छेड़ दिया। जान सेवक यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए कि अब इसने कारखाने की ओर धयान देना शुरू किया। बोले-हाँ, मकानों का बनना बहुत जरूरी है। इंजीनियर से कहो, एक नक्शा बनाएँ। मैं प्रबंधाकारिणी समिति के सामने इस प्रस्ताव को रख्रूगा। कुलियों के लिए अलग-अलग मकान बनवाने की जरूरत नहीं। लम्बे-लम्बे बैरक बनवा दिए जाएँ, ताकि एक-एक कमरे में 10-12 मजदूर रह सकें। प्रभु सेवक-लेकिन बहुत-से कुली ऐसे भी तो होंगे, जो बाल-बच्चों के साथ रहना चाहेंगे? मिसेज सेवक-कुलियों के बाल-बच्चों को वहाँ जगह दी जाएगी तो एक शहर आबाद हो जाएगा। तुम्हें उनसे काम लेना है कि उन्हें बसाना है! जैसे फौज के सिपाही रहते हैं, उसी तरह कुली भी रहेंगे। हाँ, एक छोटा-सा चर्च जरूर होना चाहिए। पादरी के लिए एक मकान भी होना जरूरी है। ईश्वर सेवक-खुदा तुझे सलामत रखे बेटी, तेरी यह राय मुझे बहुत पसंद आई। कुलियों के लिए धाार्मिक भोजन शारीरिक भोजन से कम आवश्यक नहीं। प्रभु मसीह, मुझे अपने दामन में छिपा। कितना सुंदर प्रस्ताव है! चित्ता प्रसन्न हो गया। वह दिन कब आएगा, जब कुलियों के हृदय मसीह के उपदेशों से तृप्त हो जाएँगे। जॉन सेवक-लेकिन यह तो विचार कीजिए कि मैं यह साम्प्रदायिक प्रस्ताव समिति के सम्मुख कैसे रख सकूँगा? मैं अकेला तो सब कुछ हूँ नहीं। अन्य मेम्बरों ने विरोधा किया, तो उन्हें क्या जवाब दूँगा? मेरे सिवा समिति में और कोई क्रिश्चियन नहीं है। नहीं, मैं इस प्रस्ताव को कदापि समिति के सामने न रख्रूगा। आप स्वयं समझ सकते हैं कि इस प्रस्ताव में कितना धाार्मिक पक्षपात भरा हुआ है! मिसेज सेवक-जब कोई धाार्मिक प्रश्न आता है, तो तुम उसमें खामख्वाह मीन-मेख निकालने लगते हो! हिंदू-कुली तो तुरंत किसी वृक्ष के नीचे दो-चार ईंट-पत्थर रखकर जल चढ़ाना शुरू कर देंगे, मुसलमान लोग भी खुले मैदान में नमाज पढ़ लेंगे, तो फिर चर्च से किसी को क्या आपत्तिा हो सकती है! ईश्वर सेवक-प्रभु मसीह, मुझ पर अपनी दया-दृष्टि कर। बाइबिल के उपदेश प्राणिमात्रा के लिए शांतिप्रिय हैं। उनके प्रचार में किसी को कोई एतराज नहीं हो सकता और अगर एतराज हो भी, तो तुम इस दलील से उसे रद्द कर सकते हो कि राजा का धार्म भी राजा है। आखिर सरकार ने धार्म-प्रचार का विभाग खोला है, तो कौन एतराज करता है, और करे भी कौन उसे सुनता है? मैं आज ही इस विषय को चर्च में पेश करूँगा और अधिाकारियों को मजबूर करूँगा कि वे कम्पनी पर अपना दबाव डालें। मगर यह तुम्हारा काम है, मेरा नहीं; तुम्हें खुद इन बातों का खयाल होना चाहिए। न हुए मि. क्लार्क इस वक्त! मिसेज सेवक-वह होते, तो कोई दिक्कत ही न होती। जॉन सेवक-मेरी समझ में नहीं आता कि मैं इस तजवीज को कैसे पेश करूँगा। अगर कम्पनी कोई मंदिर या मस्जिद बनवाने का निश्चय करती, तो मैं भी चर्च बनवाने पर जोर देता। लेकिन जब तक और लोग अग्रसर न हों, मैं कुछ नहीं कर सकता और न करना उचित ही समझता हूँ। ईश्वर सेवक-हम औरों के पीछे-पीछे क्यों चलें? हमारे हाथों में दीपक है, कंधो पर लाठी है, कमर में तलवार है, पैरों में शक्ति है, हम क्यों आगे न चलें? क्यों दूसरों का मुँह देखें? मि. जॉन सेवक ने पिता से और ज्यादा तर्क-वितर्क करना व्यर्थ समझा। भोजन के पश्चात् वह आधाी रात तक प्रभु सेवक के साथ बैठे हुए भिन्न-भिन्न रूप से नक्शे बनाते-बिगाड़ते रहे-किधार की जमीन ली जाए, कितनी जमीन काफी होगी, कितना व्यय होगा, कितने मकान बनेंगे। प्रभु सेवक हाँ-हाँ करता जाता था। इन बातों में मन न लगता था। कभी समाचार-पत्रा देखने लगता, कभी कोई किताब उलटने-पलटने लगता, कभी उठकर बरामदे में चला जाता। लेकिन धाुन सूक्ष्मदर्शी नहीं होती। व्याख्याता अपनी वाणी के प्रवाह में यह कब देखता है कि श्रोताओं में कितनी की ऑंखें खुली हुई हैं। प्रभु सेवक को इस समय एक नया शीर्षक सूझा था और उस पर अपने रचना-कौशल की छटा दिखाने के लिए वह अधाीर हो रहा था। नई-नई उपमाएँ, नई-नई सूक्तियाँ किसी जलधाारा में बहकर आनेवाले Qwलों के सदृश उसके मस्तिष्क में दौड़ती चली आती थीं और वह उसका संचय करने के लिए उकता रहा था; क्याेंंकि एक बार आकर, एक बार अपनी झलक दिखाकर, वे सदैव के लिए विलुप्त हो जाती है। बारह बजे तक इसी संकट में पड़ा रहा। न बैठते बनता था, न उठते। यहाँ तक कि उसे झपकियाँ आने लगीं। जॉन सेवक ने भी अब विश्राम करना उचित समझा। लेकिन जब प्रभु सेवक पलंग पर गया, तो निद्रा देवी रूठ चुकी थीं। कुछ देर तक तो उसने देवी को मनाने का प्रयत्न किया, फिर दीपक के सामने बैठकर उसी विषय पर पद्य-रचना करने लगा। एक क्षण में वह किसी दूसरे ही जगत् में था। वह ग्रामीणों की भाँति सराफे में पहुँचकर उसकी चमक-दमक पर लट्टई न हो जाता था। यद्यपि उस जगत् की प्रत्येक वस्तु रसमयी, सुरभित, नेत्रा-मधाुर, मनोहर मालूम होती थी, पर कितनी ही वस्तुओं को धयान से देखने पर ज्ञात होता था कि उन पर केवल सुनहरा आवरण चढ़ा है; वास्तव में वे या तो पुरानी हैं, अथवा कृत्रिाम! हाँ, जब उसे वास्तव में कोई नया रत्न मिल जाता था, तो उसकी मुखश्री प्रज्वलित हो जाती थी! रचयिता अपनी रचना का सबसे चतुर पारखी होता है। प्रभु सेवक की कल्पना कभी इतनी ऊँची न उड़ी थी। एक-एक पद्य लिखकर वह उसे स्वर में पढ़ता और झूमता। जब कविता समाप्त हो गई, तो वह सोचने लगा-देखूँ, इसका कवि-समाज कितना आदर करता है। सम्पादकों की प्रशंसा का तो कोई मूल्य नहीं। उनमें बहुत कम ऐसे हैं, जो कविता के मर्मज्ञ हों। किसी नए, अपरिचित कवि की सुंदर-से-सुंदर कविता स्वीकार न करेंगे, पुराने कवियों की सड़ी-गली, खोगीर की भरती, सब कुछ शिरोधाार्य कर लेंगे। कवि मर्मज्ञ होते हुए भी कृपण होते हैं। छोटे-मोटे तुकबंदी करनेवालों की तारीफ भले ही कर दें; लेकिन जिसे अपना प्रतिद्वंद्वी समझते हैं, उसके नाम से कानों पर हाथ रख लेते हैं। कुँवर साहब तो जरूर फड़क जाएँगे। काश, विनय यहाँ होते, तो मेरी कलम चूम लेते। कल कुँवर साहब से कहूँगा कि मेरा संग्रह प्रकाशित करा दीजिए। नवीन युग के कवियों में तो किसी का मुझसे टक्कर लेने का दावा हो नहीं सकता, और पुराने ढंग के कवियाेंं से मेरा कोई मुकाबला नहीं। मेरे और उनके क्षेत्रा अलग हैं। उनके यहाँ भाषा-लालित्य है, पिंगल की कोई भूल नहीं, खोजने पर भी कोई दोष न मिलेगा, लेकिन उपज का नाम नहीं, मौलिकता का निशान नहीं, वही चबाए हुए कौर चबाते हैं, विचारोत्कर्ष का पता नहीं होता। दस-बीस पद्य पढ़ जाओ तो कहीं एक बात मिलती है, यहाँ तक कि उपमाएँ भी वही पुरानी-धाुरानी, जो प्राचीन कवियों ने बाँधा रखी हैं। मेरी भाषा इतनी मँजी हुई न हो, लेकिन भरती के लिए मैंने एक पंक्ति भी नहीं लिखी। फायदा ही क्या? प्रात:काल वह मुँह-हाथ धाो, कविता जेब में रख, बिना जलपान किए घर से चला, तो जॉन सेवक ने पूछा-क्या जलपान न करोगे? इतने सबेरे कहाँ जाते हो? प्रभु सेवक ने रुखाई से उत्तार दिया-जरा कुँवर साहब की तरफ जाता हूँ। जॉन सेवक-तो उनसे कल के प्रस्ताव के सम्बंधा में बातचीत करना। अगर वह सहमत हो जाएँ, तो फिर किसी को विरोधा करने का साहस न होगा। मिसेज सेवक-वही चर्च के विषय में न? जॉन सेवक-अभी नहीं, तुम्हें अपने चर्च ही की पड़ी हुई है। मैंने निश्चय किया है कि पाँड़ेपुर की बस्ती खाली करा ली जाए और वहीं कुलियों के मकान बनवाए जाएँ। उससे अच्छी वहाँ कोई दूसरी जगह नहीं नजर आती। प्रभु सेवक-रात को आपने उस बस्ती को लेने की चर्चा तो न की थी! जॉन सेवक-नहीं, आओ जरा यह नक्शा देखो। बस्ती के बाहर किसी तरफ काफी काफी जमीन नहीं है। एक तरफ सरकारी पागलखाना है, तो दूसरी रायसाहब का बाग, तीसरी तरफ हमारी मिल। बस्ती के सिवा और जगह ही कहाँ है? और, बस्ती है ही कौन-सी बड़ी! मुश्किल से 15-20 या अधिाक से अधिाक 30 घर होंगे। उनका मुआवजा देकर जमीन लेने की क्यों न कोशिश की जाए? प्रभु सेवक-अगर बस्ती को उजाड़कर मजदूरों के लिए मकान बनवाने हैं, तो रहने ही दीजिए, किसी-न-किसी तरह गुजर तो हो ही रहा है। अगर ऐसी बस्तियों की रक्षा का विचार किया होता, तो आज यहाँ एक बंगला भी नजर न आता। ये बँगले ऊसर में नहीं बने हैं। प्रभु सेवक-मुझे ऐसे बँगले से झोंपड़ी ही पसंद है, जिसके लिए कई गरीबों के घर गिराने पड़ें। मैं कुँवर साहब से इस विषय में कुछ न कहूँगा। आप खुद कहिएगा। जॉन सेवक-यह तुम्हारी अकर्मण्यता है। इसे संतोष और दया कहकर तुम्हें धाोखे में न डालँगा। तुम जीवन की सुख-सामग्रियाँ तो चाहते हो, लेकिन उन सामग्रियाें के लिए जिन साधानों की जरूरत है, उनसे दूर भागते हो। हमने तुम्हें क्रियात्मक रूप से कभी धान और विभव से घृणा करते नहीं देखा। तुम अच्छे से अच्छा मकान, अच्छे से अच्छा भोजन, अच्छे से अच्छे वस्त्रा चाहते हो, लेकिन बिना हाथ-पैर हिलाए ही चाहते हो कि कोई तुम्हारे मुँह में शहद और शर्बत टपका दे। प्रभु सेवक-रस्म-रिवाज से विवश होकर मनुष्य को बहुधाा अपनी आत्मा के विरुध्द आचरण करना पड़ता है। जॉन सेवक-जब सुख-भोग के लिए तुम रस्म-रिवाज से विवश हो जाते हो, तो सुख-भोग के साधानों के लिए क्यों उन्हीं प्रथाओें से विवश नहीं होते! तुम मन और वचन से वर्तमान सामाजिक प्रणाली की कितनी ही उपेक्षा क्यों न करो, मुझे जरा भी आपत्तिा न होगी। तुम इस विषय पर व्याख्यान दो, कविताएँ लिखो, निबंधा रचो, मैं खुश होकर उन्हें पढ़ईँगा औैर तुम्हारी प्रशंसा करूँगा; लेकिन कर्मक्षेत्रा में आकर उन भावों को उसी भाँति भूल जाओ, जैसे अच्छे-से-अच्छे सूट पहनकर मोटर पर सैर करते समय तुम त्याग, संतोष और आत्मनिग्रह को भूल जाते हो। प्रभु सेवक और कितने ही विलास-भोगियों की भाँति सिध्दांत-रूप से जनवाद के कायल थे। जिन परिस्थितियों में उनका लालन-पालन हुआ था, जिन संस्कारों से उनका मानसिक और आत्मिक विकास हुआ था, उनसे मुक्त हो जाने के लिए जिस नैतिक साहस की, उद्दंडता की जरूरत है, उससे वह रहित थे। वह विचार-क्षेत्रा में त्याग के भावों को स्थान देकर प्रसन्न होते थे और उन पर गर्व करते थे। उन्हें शायद कभी सूझा ही न था कि इन भावों को व्यवहार रूप में भी लाया जा सकता है। वह इतने संयमशील न थे कि अपनी विलासिता को उन भावाेंं पर बलिदान कर देते। साम्यवाद उनके लिए मनोरंजन का एक विषय था, और बस। आज तक कभी किसी ने उनके आचरण की आलोचना न की थी, किसी ने उनको व्यंग्य का निशाना न बनाया था, और मित्राों पर अपने विचार-स्वातंत्रय की धााक जमाने के लिए उनके विचार काफी थे। कुँवर भरतसिंह के संयम और विराग का उन पर इसलिए असर न होता था कि वह उन्हें उच्चतर श्रेणी के मनुष्य समझते थे। अशर्फियों की थैली मखमल की हो या खद्दर की, अधिाक अंतर नहीं। पिता के मुख से वह व्यंग्य सुनकर ऐसे तिलमिला उठे, मानो चाबुक पड़ गया हो। आग चाहे फूस को न जला सके, लोहे की कील मिट्टी मेंं चाहे न समा सके, काँच चाहे पत्थर की चोट से न टूट सके, व्यंग्य विरले ही कभी हृदय को प्रज्वलित करने, उसमें चुभने और उसे चोट पहुँचाने में असफल होता है, विशेष करके जब वह उस प्राणी के मुख से निकले, जो हमारे जीवन को बना या बिगाड़ सकता है। प्रभु सेवक को मानो काली नागिन ने डस लिया, जिसके काटे को लहर भी नहीं आती। उनकी सोई हुई लज्जा जाग उठी। अपनी अधाोगति का ज्ञान हुआ। कुँवर साहब के यहाँ जाने को तैयार थे, गाड़ी तैयार कराई थी; पर वहाँ न गए। आकर अपने कमरे में बैठ गए। उनकी ऑंखें भर आईं, इस वजह से नहीं कि मैं इतने दिनों तक भ्रम में पड़ा रहा, बल्कि इस खयाल से कि पिताजी को मेरा पालन-पोषण अखरता है-यह लताड़ पाकर मेरे लिए डूब मरने की बात होगी, अगर मैं उनका आश्रित बना रहूँ। मुझे स्वयं अपनी जीविका का प्रश्न हल करना चाहिए। इन्हें क्या मालूम नहीं था कि मैं प्रथाओं से विवश होकर ही इस विलास-वासना में पड़ा हुआ हूँ? ऐसी दशा में इनका मुझे ताना देना घोर अन्याय है। इतने दिनों तक कृत्रिाम जीवन व्यतीत करके अब मेरे लिए अपना रूपांतर कर लेना असम्भव है। यही क्या कम है कि मेरे मन में ये विचार पैदा हुए। इन विचारों के रहते हुए कम-से-कम मैं औरों की भाँति स्वार्थांधा और धान-लोलुप तो नहीं हो सकता। लेकिन मैं व्यर्थ इतना खेद कर रहा हूँ। मुझे तो प्रसन्न होना चाहिए कि पापा ने वह काम कर दिया, जो सिध्दांत और विचार से न हुआ था। अब मुझे उनसे कुछ कहने-सुनने की जरूरत नहीं। उन्हें शायद मेरे जाने से दु:ख भी न होगा। उन्हें खूब मालूम हो गया कि मेरी जात से उनकी धान-तृष्णा तृप्त नहीं हो सकती। आज यहाँ से डेरा कूच है, यही निश्चय है। चलकर कुँवर साहब से कहता हूँ, मुझे भी स्वयं-सेवकों में ले लीजिए। कुछ दिनों उस जीवन का आनंद भी उठाऊँ। देखूँ, मुझमें और भी कोई योग्यता है, या केवल पद्य-रचना ही कर सकता हूँ। अब गिरिशृंगों की सैर करूँगा, देहातों में घूमूँगा, प्राकृतिक सौंदर्य की उपासना करूँगा, नित्य नया दाना, नया पानी, नई सैर, नए दृश्य। इससे ज्यादा आनंदप्रद और कौन जीवन हो सकता है! कष्ट भी होंगे। धाूप है, वर्षा है, सरदी है, भयंकर जंतु हैं; पर कष्टों से मैं कभी भयभीत नहीं हुआ। उलझन तो मुझे गृहस्थी के झंझटों से होती है। यहाँ कितने अपमान सहने पड़ते हैं! रोटियों के लिए दूसरों की गुलामी! अपनी इच्छाओं को पराधाीन बना देना! नौकर अपने स्वामी को देखकर कैसा दबक जाता है, उसके मुख-मंडल पर कितनी दीनता, कितना भय छा जाता है! न, मैं अपनी स्वतंत्राता की अब से ज्यादा इज्जत करना सीखूँगा। दोपहर को जब घर के सब प्राणी पंखों के नीचे आराम से सोए, तो प्रभु सेवक ने चुपके से निकलकर कुँवर साहब के भवन का रास्ता लिया। पहले तो जी में आया कि कपड़े उतार दूँ और केवल एक कुरता पहनकर चला जाऊँ। पर इन फटे हालों घर से कभी न निकला था। वस्त्रा-परिवर्तन के लिए कदाचित् विचार-परिवर्तन से भी अधिाक नैतिक बल की जरूरत होती है। उसने केवल अपनी कविताओं की कापी ले ली और चल खड़ा हुआ। उसे जरा भी खेद न था, जरा भी ग्लानि न थी। ऐसा खुश था, मानो कैद से छूटा है-आप लोगों को अपनी दौलत मुबारक हो। पापा ने मुझे बिलकुल निर्लज्ज, आत्मसम्मानहीन, विलास-लोलुप समझ रखा है, तभी तो जरा-सी बात पर उबल पड़े। अब उन्हें मालूम हो जाएगा कि मैं बिलकुल मुर्दा नहीं हूँ। कुँवर साहब दोपहर को सोने के आदी नहीं थे। फर्श पर लेटे कुछ सोच रहे थे। प्रभु सेवक जाकर बैठ गए। कुँवर साहब ने कुछ न पूछा, कैसे आए, क्यों उदास हो? आधा घंटे तक बैठे रहने के बाद भी प्रभु सेवक को उनसे अपने विषय में कुछ कहने की हिम्मत न पड़ी। कोई भूमिका ही न सूझती। यह महाशय आज गुम-सुम क्यों हैं? क्या मेरी सूरत से ताड़ तो नहीं गए कि कुछ स्वार्थ लेकर आया है? यों तो मुझे देखते ही खिल उठते थे, दौड़कर छाती से लगा लेते थे, आज मुखातिब ही नहीं होते। पर-मुखापेक्षी होने का यही दंड है। मैं भी घर से चला, तो ठीक दोपहर को, जब चिड़ियाँ तक घोंसले से नहीं निकलतीं। आना ही था, तो शाम को आता। इस जलती हुई धाूप में कोई गरज का बावला ही घर से निकल सकता है। खैर, यह पहला अनुभव है। वह निराश होकर चलने के लिए उठे तो भरतसिंह बोले-क्यों-क्यों, जल्दी क्या है? या इसीलिए कि मैंने बातें नहीं कीं? बातों की कमी नहीं है; इतनी बातें तुमसे करनी हैं कि समझ में नहीं आता, शुरू क्यों कर करूँ! तुम्हारे विचार में विनय ने रियासत का पक्ष लेने में भूल की? प्रभु सेवक ने द्विविधाा में पड़कर कहा-इस पर भिन्न-भिन्न पहलुओं से विचार किया जा सकता है। कुँवर-इसका आशय यह है कि बुरा किया। उसकी माता का भी यही विचार है। वह तो इतनी चिढ़ी हुई हैं कि उसकी सूरत भी नहीं देखना चाहतीं। लेकिन मेरा विचार है कि उसने जिस नीति का अनुसरण किया है, उस पर उसे लज्जित होने का कोई कारण नहीं। कदाचित् उन दशाओं में मैं भी यही करता। सोफी से उसे प्रेम न होता, तो भी उस अवसर पर जनता ने जो विद्रोह किया, वह उसके साम्यवाद के सिध्दांतों को हिला देने को काफी था। पर जब यह सिध्द है कि सोफिया का अनुराग उसके रोम-रोम में समाया है, तो उसका आचरण क्षम्य ही नहीं, सर्वथा स्तुत्य है। वह धार्म केवल जत्थेबंदी है, जहाँ अपनी बिरादरी से बाहर विवाह करना वर्जित हो, क्योंकि इससे उसकी क्षति होने का भय है। धार्म और ज्ञान दोनों एक हैं और इस दृष्टि से संसार में केवल एक धार्म है। हिंदू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, बौध्द धार्म ये नहीं हैं, भिन्न-भिन्न स्वार्थों के दल हैं, जिनसे हानि के सिवा आज तक किसी को लाभ नहीं हुआ। अगर विनय इतना भाग्यवान हो कि सोफिया को विवाह-सूत्रा में बाँधा सके, तो कम-से-कम मुझे जरा भी आपत्तिा न होगी। प्रभु सेवक-मगर आप जानते हैं, इस विषय में रानीजी को जितना दुराग्रह है, उतना ही मामा को भी है। कुँवर-इसका फल यह होगा कि दोनों का जीवन नष्ट हो जाएगा। ये दोनों अमूल्य रत्न धार्म के हाथों मिट्टी में मिल जाएँगे। प्रभु सेवक-मैं तो खुद इन झगड़ों से इतना तंग आ गया हूँ कि मैंने दृढ़ संकल्प कर लिया है, घर से अलग हो जाऊँ। घर के साम्प्रदायिक जलवायु और सामाजिक बंधानों से मेरी आत्मा दुर्बल हुई जा रही है। घर से निकल जाने के सिवा मुझे और कुछ नहीं सूझता। मुझे व्यवसाय से पहले ही बहुत प्रेम न था, और अब, इतने दिनों के अनुभव के बाद तो मुझे उससे घृणा हो गई है। कुँवर-लेकिन व्यवसाय तो नई सभ्यता का सबसे बड़ा अंग है, तुम्हें उससे क्या इतनी अरुचि है? प्रभु सेवक-इसलिए कि यहाँ सफलता प्राप्त करने के लिए जितनी स्वार्थपरता और नर-हत्या की जरूरत है, वह मुझसे नहीं हो सकती। मुझमें उतना उत्साह ही नहीं है। मैं स्वभावत: एकांतप्रिय हूँ और जीवन-संग्राम में उससे अधिाक नहीं पड़ना चाहता जितना मेरी कला के पूर्ण विकास और उसमें यथार्थता का समोवश करने के लिए काफी हो। कवि प्राय: एकांतसेवी हुआ किए हैं, पर इससे उनकी कवित्व-कला में कोई दूषण नहीं आने पाया। सम्भव था, वे जीवन का विस्तृत और पर्याप्त ज्ञान प्राप्त करके अपनी कविता को और भी मार्मिक बना सकते, लेकिन साथ ही यह शंका भी थी कि जीवन-संग्राम में प्रवृत्ता होने से उनकी कवि-कल्पना शिथिल हो जाती। होमर अंधाा था, सूर भी अंधाा था, मिल्टन भी अंधाा था, पर ये सभी साहित्य-गगन के उज्ज्वल नक्षत्रा हैं; तुलसी, वाल्मीकि आदि महाकवि संसार से अलग, कुटियों में बसनेवाले प्राणी थे; पर कौन कह सकता है कि उनकी एकांतसेवा से उनकी कवित्व-कला दूषित हो गई! नहीं कह सकता कि भविष्य में मेरे विचार क्या होंगे, पर इस समय द्रव्योपासना से बेजार हो रहा हूँ। कुँवर-तुम तो इतने विरक्त कभी न थे, आखिर बात क्या है? प्रभु सेवक ने झेंपते हुए कहा-अब तक जीवन के कुटिल रहस्यों को न जानता था। पर अब देख रहा हूँ कि वास्तविक दशा उससे कहीं जटिल है, जितनी मैं समझता था। व्यवसाय कुछ नहीं है, अगर नर-हत्या नहीं है। आदि से अंत तक मनुष्यों को पशु समझना और उनसे पशुवत् व्यवहार करना इसका मूल सिध्दांत है। जो यह नहीं कर सकता, वह सफल व्यवसायी नहीं हो सकता। कारखाना अभी बनकर तैयार नहीं हुआ, और भूमि-विस्तार की समस्या उपस्थित हो गई। मिस्त्रिायों और कारीगरों के लिए बस्ती में रहने की जगह नहीं है। मजदूरों की संख्या बढ़ेगी, तब वहाँ निर्वाह ही न हो सकेगा। इसलिए पापा की राय है कि उसी कानूनी दफा के अनुसार पाँड़ेपुर पर भी अधिाकार कर लिया जाए और वाशिंदों को मुआवजा देकर अलग कर दिया जाए। राजा महेंद्रकुमार की पापा से मित्राता है ही और वर्तमान जिलाधाीश मि. सेनापति रईसों से उतना ही मेल-जोल रखते हैं जितना मि. क्लार्क उनसे दूर रहते थे। पापा का प्रस्ताव बिना किसी कठिनाई के स्वीकृत हो जाएगा और मुहल्लेवाले जबरदस्ती निकाल दिए जाएँगे। मुझसे यह अत्याचार नहीं देखा जाता। मैं इसे रोक नहीं सकता हूँ कि उससे अलग रहूँ। कुँवर-तुम्हारे विचार में कम्पनी को नफा होगा? प्रभु सेवक-मैं समझता हूँ, पहले ही साल 25 रुपये सैकड़े नफा होगा। कुँवर-तो क्या तुमने कारखाने से अलग होने का निश्चय कर लिया? प्रभु सेवक-पक्का निश्चय कर लिया। कुँवर-तुम्हारे पापा काम सँभाल सकेंगे? प्रभु सेवक-पापा ऐसे आधे दर्जन कारखानों को सँभाल सकते हैं। उनमें अद्भुत अधयवसाय है। जमीन का प्रस्ताव बहुत जल्दी कार्यकारिणी समिति के सामने आएगा। मेरी आपसे यह विनीत प्रार्थना है कि आप उसे स्वीकृत न होने दें। कुँवर-(मुस्कराकर) बुङ्ढा आदमी इतनी आसानी से नई शिक्षा नहीं ग्रहण कर सकता। बूढ़ा तोता पढ़ना नहीं सीखता। मुझे तो इसमें कोई आपत्तिा नहीं नजर आती कि बस्तीवालों का मुआवजा देकर जमीन ले ली जाए। हाँ, मुआवजा उचित होना चाहिए। जब तुम कारखाने से अलग ही हो रहे हो, तो तुम्हें इन झगड़ों से क्या मतलब? ये तो दुनिया के धांधो हैं, होते आए हैं और होते जाएँगे। प्रभु सेवक-तो आप इस प्रस्ताव का विरोधा न करेंगे? कुँवर-मैं किसी ऐसे प्रस्ताव का विरोधा न करूँगा, जिससे कारखाने की हानि हो। कारखाने से मेरा स्वार्थ-सम्बंधा है, मैं उसकी उन्नति में बाधाक नहीं हो सकता। हाँ, तुम्हारा वहाँ से निकल आना मेरी समिति के लिए शुभ लक्षण है। तुम्हें मालूम है, समिति के अधयक्ष डॉक्टर गांगुली हैं; पर कुछ वृध्दावस्था और काउंसिल के कामों में व्यस्त रहने के कारण वह इस भार से मुक्त होना चाहते हैं। मेरी हार्दिक इच्छा है कि तुम इस भार को ग्रहण करो। समिति इस समय मँझधाार में है, विनय के आचरण ने उसे एक भयंकर दशा में डाल दिया है। तुम्हें ईश्वर ने विद्या, बुध्दि, उत्साह, सब कुछ दिया है। तुम चाहो, तो समिति को उबार सकते हो, और मुझे विश्वास है, तुम मुझे निराश न करोगे। प्रभु सेवक की ऑंखें सजल हो गईं। वह अपने को इस सम्मान के योग्य न समझते थे। बोले-मैं इतना उत्तारदायित्व स्वीकार करने के योग्य नहीं हूँ। मुझे भय है कि मुझ-जैसा अनुभवहीन, आलसी प्रकृति का मनुष्य समिति की उन्नति नहीं कर सकता। यह आपकी कृपा है कि मुझे इस योग्य समझते हैं। मेरे लिए सफ ही काफी है। कुँवर साहब ने उत्साह बढ़ाते हुए कहा-तुम जैसे आदमियों को सफ में रखूँ तो नायकों को कहाँ से लाऊँ? मुझे विश्वास है कि कुछ दिनों डॉ. गांगुली के साथ रहकर तुम इस काम में निपुण हो जाओगे। सज्जन लोग सदैव अपनी क्षमता की अपेक्षा करते हैं, पर मैं तुम्हें पहचानता हूँ। तुममें अद्भुत विद्युत-शक्ति है; उससे कहीं अधिाक, जितनी तुम समझते हो। अरबी घोड़ा हल में नहीं चल सकता, उसके लिए मैदान चाहिए। तुम्हारी स्वतंत्रा आत्मा कारखाने में संकुचित हो रही थी, संसार के विस्तीर्ण क्षेत्रा में निकलकर उसके पर लग जाएँगे। मैंने विनय को इस पद के लिए चुन रखा था, लेकिन उसकी वर्तमान दशा देखकर मुझे अब उस पर विश्वास नहीं रहा। मैं चाहता हूँ, इस संस्था को ऐसी सुव्यवस्थित दशा में छोड़ जाऊँ कि यह निर्विघ्न अपना काम करती रहे। ऐसा न हुआ, तो मैं शांति से प्राण भी न त्याग सकूँगा। तुम्हारे ऊपर मुझे भरोसा है, क्याेंंकि तुम नि:स्वार्थ हो। प्रभु, मैंने अपने जीवन का बहुत दुरुपयोग किया है। अब पीछे फिरकर उस पर नजर डालता हूँ, तो उसका कोई भाग ऐसा नहीं दिखाई देता, जिस पर गर्व कर सकूँ। एक मरुस्थल है, जहाँ हरियाली का निशान नहीं। इस संस्था पर मेरे जीवन-पर्यंत के दुष्कृत्यों का बोझ लदा हुआ है। यही मेरे प्रायश्चित्ता का साधान और मेरे मोक्ष का मार्ग है। मेरी सबसे बड़ी अभिलाषा यही है कि मेरा सेवक-दल संसार में कुछ कर दिखाए। उसमें सेवा का अनुराग हो, बलिदान का प्रेम हो, जातीय गौरव का अभिमान हो। जब मैं ऐसे प्राणियों को देश के लिए प्राण-समर्पण करते देखता हूँ, जिनके पास प्राण के सिवा और कुछ नहीं है, तो मुझे अपने ऊपर रोना आता है कि मैंने सब कुछ रहते हुए भी कुछ न किया। मेरे लिए इससे घातक और कोई चोट नहीं है कि यह संस्था विफल मनोरथ हो। मैं इसके लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हूँ। मैंने दस लाख रुपये इस खाते में जमा कर दिए हैं और इच्छा है कि इस पर प्रतिवर्ष एक लाख और बढ़ाता जाऊँ। इतने विशाल देश के लिए 100 सेवक बहुत कम हैं। कम-से-कम 500 आदमी होने चाहिए। अगर दस साल भी और जीवित रहा, तो शायद मेरी यह मनोकामना पूरी हो जाए। इंद्रदत्ता में सब गुण तो हैं, पर वह उद्दंड स्वभाव का आदमी है। इस कारण मेरा मन उस पर नहीं जमता। मैं तुमसे साग्रह… डॉक्टर गांगुली आ पहुँचे, और प्रभु सेवक को देखकर बोले-अच्छा, तुम यहाँ कुँवर साहब को मंत्रा दे रहा है, तुम्हारा पापा महेंद्रकुमार को पट्टी पढ़ा रहा है। पर मैंने साफ-साफ कह दिया कि ऐसा बात नहीं हो सकता। तुम्हारा मिल है, उसका हानि-लाभ तुमको और तुम्हारे हिस्सेदार को होगा, गरीबों को क्यों उनके घर से निकालता है; पर मेरी कोई नहीं सुनता। हम कड़वा बात कहता है न, वह काहे को अच्छा लगेगा? मैं काउंसिल में इस पर प्रश्न करूँगा। यह कोई बात नहीं है कि आप लोग अपना स्वार्थ के लिए दूसरों पर अन्याय करें। शहर का रईस लोग हमसे नाराज हो जाएगा, हमको परवाह नहीं है। हम तो वहाँ वही करेगा, जो हमारा आत्मा कहेगा। तुमको दूसरे किसिम का आदमी चाहिए, तो बाबा हमसे इस्तीफा ले लो। पर हम पाँडेपुर को उजड़ने न देगा। कुँवर-यह बेचारे तो खुद उस प्रस्ताव का विरोधा करते हैं। आज इसी बात पर पिता और पुत्रा में मनमुटाव भी हो गया है। यह घर से चले आए हैं और कारखाने से कोई सम्पर्क नहीं रखना चाहते। गांगुली-अच्छा, ऐसा बात है! बहुत अच्छा हुआ। ऐसा विचारवान् लोग मील का काम नहीं कर सकता। ऐसा लोग मील में जाएगा, तो हम लोग कहाँ से आदमी लाएगा? प्रभु, हम बूढ़ा हो गया, कल मर जाएगा। तुम हमारा काम क्यों नहीं सँभालता? हमारा सेवक दल तुम्हारा रेस्पेक्ट करता है। तुम हमें इस भार से मुक्त कर सकता है। बुङ्ढा आदमी और सब कुछ कर सकता है, उत्साह तो उसके बस का बात नहीं! हम तुमको अब न छोड़ेगा। काउंसिल में इतना काम है कि हमको इस काम के लिए अवकाश ही नहीं मिलता। हम काउंसिल में न गया होता, तो उदयपुर में यह सब कुछ नहीं होने पाता। हम जाकर सबको शांत कर देता। तुम इतना विद्या पढ़कर उसको धान कमाने में लगाएगा, छि:-छि:! प्रभु सेवक-मैं तो सेवकों में भरती होने के लिए घर से आया ही हूँ, पर मैं उसका नायक होने के योग्य नहीं हूँं। यह पद आप ही को शोभा देता है। मुझे सिपाहियों ही में रहने दीजिए। मैं इसी को अपने लिए गौरव की बात समझूँगा। गांगुली-(हँसकर) ह:-ह: काम तो अयोग्य ही लोग करता है। योग्य आदमी काम नहीं करता, वह बस बातें करता है। योग्य आदमी का आशय है बातूनी आदमी, खाली बात, बात, जो जितना ही बात करता है, उतना ही योग्य होता है। वह काम का ढंग बता देगा; कहाँ कौन भूल हो गया, यह बता देगा; पर काम नहीं कर सकता। हम ऐसा योग्य आदमी नहीं चाहता। यहाँ बातें करने का काम नहीं है। हम तो ऐसा आदमी चाहता है, जो मोटा खाए, मोटा पहने, गली-गली, नगर-नगर दौड़े, गरीबों का उपकार करे, कठिनाइयों में उनका मदद करे। तो कब से आएगा? प्रभु सेवक-मैं तो अभी से हाजिर हूँ। गांगुली-(मुस्कराकर) तो पहला लड़ाई तुमको अपने पापा से लड़ना पड़ेगा। प्रभु सेवक-मैं समझता हूँ, पापा स्वयं इस प्रस्ताव को न उठाएँगे। गांगुली-नहीं-नहीं, वह कभी अपना बात नहीं छोड़ेगा। हमको उससे युध्द करना पड़ेगा। तुमको उससे लड़ना पड़ेगा। हमारी संस्था न्याय को सर्वोपरि मानती है, न्याय हमको माता-पिता से, धान-दौलत से, नाम और जस से प्यारा है। हम और सब कुछ छोड़ देगा, न्याय को न छोड़ेगा, यही हमारा व्रत है। तुमको खूब सोच-विचारकर तब यहाँ आना होगा। प्रभु सेवक-मैंने खूब सोच-विचार लिया है। गांगुली-नहीं-नहीं, जल्दी नहीं है, खूब सोच-विचार लो, यह तो अच्छा नहीं होगा कि एक बार आकर तुम फिर भाग जाए। प्रभु सेवक-अब मृत्यु ही मुझे इस संस्था से अलग कर सकती है। गांगुली-मि. जॉन सेवक तुमसे कहेगा, हम न्याय-अन्याय के झगड़े में नहीं पड़ता, तुम हमारा बेटा है, हमारा आज्ञा पालन करना तुम्हारा धार्म है, तो तुम क्या जवाब देगा? (हँसकर) मेरा बाप ऐसा कहता, तो मैं उससे कभी न कहता कि हम तुम्हारा बात न मानेगा। वह हमसे बोला, तुम बैरिस्टर हो जाए, हम इंगलैंड चला गया। वहाँ से बैरिस्टर होकर आ गया। कई साल तक कचहरी जाकर पेपर पढ़ा करता था। जब फादर का डेथ हो गया तो डॉक्टरी पढ़ने लगा। पिता के सामने हमको यह कहने का हिम्मत नहीं हुआ कि हम कानून नहीं पढ़ेगा। प्रभु सेवक-पिता का सम्मान करना दूसरी बात है, सिध्दांत का पालन करना दूसरी बात। अगर आपके पिता कहते कि जाकर किसी के घर में आग लगा दो, तो आप आग लगा देते? गांगुली-नहीं-नहीं, कभी नहीं, हम कभी आग न लगाता, चाहे पिताजी हमीं को क्यों न जला देता। लेकिन पिता ऐसी आज्ञा दे भी तो नहीं सकता। सहसा रानी जाह्नवी ने पदार्पण किया, शोक और क्रोधा की मूर्ति, भौएँ झुकी हुई, माथा सिकुड़ा हुआ, मानो स्नान करके पूजा करने जाते समय कुत्तो ने छू लिया हो। गांगुली को देखकर बोलीं-आपकी तबियत काउंसिल से नहीं थकती, मैं तो जिंदगी से थक गई। जो कुछ चाहती हूँ, वह नहीं होता; जो नहीं चाहती, वही होता है। डॉक्टर साहब, सब कुछ सहा जाता है, बेटे का कुत्सित व्यवहार नहीं सहा जाता, विशेषत: ऐसे बेटे का, जिसके बनाने में लिए कोई बात उठा न रखी गई हो। दुष्ट जसंवतनगर के विद्रोह में मर गया होता, तो मुझे इतना दु:ख न होता। कुँवर साहब और ज्यादा न सुन सके। उठकर बाहर चले गए। रानी ने उसी धाुन में कहा-यह मेरा दु:ख क्या समझेंगे! इनका सारा जीवन भोग-विलास में बीता है। आत्मसेवा के सामने इन्होंने आदर्शों की चिंता नहीं की। अन्य रईसों की भाँति सुख-भोग में लिप्त रहे। मैंने तो विनय के लिए कठिन तप किया है, उसे साथ लेकर महीनों पहाड़ो में पैदल चली हूँ, केवल इसीलिए कि छुटपन से ही उसे कठिनाइयों का आदी बनाऊँ। उसके एक-एक शब्द, एक-एक काम को धयान से देख रही हूँ कि उसमें बुरे संस्कार न आ जाएँ। अगर वह कभी नौकर पर बिगड़ा है, तो तुरंत उसे समझाया है; कभी सत्य से मुँह मोड़ते देखा, तो तुरंत तिरस्कार किया। यह मेरी व्यथा क्यों जानेंगे? यह कहते-कहते रानी की निगाह प्रभु सेवक पर पड़ गई, जो कोने में खड़ा कुछ उलट-पलट रहा था। उनकी जबान बंद हो गई। आगे कुछ न कह सकीं। सोफिया के प्रति जो कठोर वचन मन में थे, वे मन ही में रह गए। केवल गांगुली से इतना बोलीं-‘जाते समय मुझसे मिल लीजिएगा’ और चली गईं।

 

 

विनयसिंह आबादी में दाखिल हुए, तो सबेरा हो गया था। थोड़ी दूर चले थे कि एक बुढ़िया लाठी टेकती सामने से आती हुई दिखाई दी। इन्हें देखकर बोली-बेटा, गरीब हूँ। बन पडे, तो कुछ दे दो। धारम होगा।

 

नायकराम-सवेरे राम-नाम नहीं लेती, भीख माँगने चल खड़ी हुई। तुझे तो जैसे रात को नींद नहीं आई। माँगने को तो दिन-भर है।

 

बुढ़िया-बेटा, दुखिया हूँ।

 

नायकराम-यहाँ कौन सुखिया है। रात-भर भूखों मरे। मासूक की घुड़कियाँ खाईं। पैर तो सीधो पड़ते नहीं, तुम्हें कहाँ से पैसा दें?

 

बुढ़िया-बेटा, धाूप में मुझसे चला नहीं जाता, सिर में चक्कर आ जाता है। नई-नई विपत है, भैया, भगवान् उस अधाम पापी विनयसिंह का बुरा करे, उसी के कारण बुढ़ापे में यह दिन देखना पड़ा; नहीं तो बेटा दूकान करता था, हम घर में रानी बनी बैठी रहती थीं, नौकर-चाकर थे, कौन-सा सुख नहीं था। तुम परदेसी हो, न जानते होगे, यहाँ दंगा हो गया था। मेरा लड़का दूकान से हिला तक नहीं, पर उस निगोड़े विनयसिंह ने सहादत दे दी कि यह भी दंगे में मिला हुआ था। पुलिस हमारे ऊपर बहुत दिनों से दाँत लगाए थी, कोई दाँव न पाती थी। यह सहादत पाते ही दौड़ आ गई, लड़का पकड़ लिया गया और तीन साल की सजा हो गई। एक हजार जरीबाना हुआ। घर की बीस हजार की गृहस्थी तहस-नहस हो गई। घर में बहू है, बच्चे हैं, इसी तरह माँग-जाँचकर उनको पालती-पोसती हूँ। न जाने उस कलमुँहे ने कब का बैर निकाला।

 

विनय ने जेब से एक रुपया निकालकर बुढ़िया को दिया और आकाश की ओर देखकर ठंडी साँस ली। ऐसी मानसिक वेदना उन्हें कभी न हुई थी।

 

बुढ़िया ने रुपया देखा, तो चौंक पड़ी। समझी, शायद भूल से दिया है। बोली-बेटा, यह तो रुपया है।

 

विनय ने अवरुध्द कंठ से कहा-हाँ, ले जाओ। मैंने भूल से नहीं दिया है।

 

वृध्दा आशीर्वाद देती हुई चली गई। दोनों आदमी और आगे बढ़े तो राह में एक कुऑं मिला। उस पर पीपल का पेड़ था। एक छोटा-सा मंदिर भी बना हुआ था। नायकराम ने सोचा, यहीं हाथ-मुँह धाो लें। दोनों आदमी कुएँ पर गए, तो देखा एक विप्र महाराज पीपल के नीचे बैठे पाठ कर रहे हैं। जब वह पाठ कर चुके, तो विनय ने पूछा-आपको मालूम है, सरदार नीलकंठ आजकल कहाँ हैं?

 

पंडितजी ने कर्कश कंठ से कहा-हम नहीं जानते।

 

विनय-पुलिस के मंत्राी तो होंगे?

 

पंडित-कह दिया, मैं नहीं जानता।

 

विनय-मि. क्लार्क तो दौरे पर होंगे?

 

पंडित-मैं कुछ नहीं जानता।

 

नायकराम-पूजा-पाठ में देस-दुनिया की सुधा ही नहीं!

 

पंडित-हाँ, जब तक मनोकामना न पूरी हो जाए, तब तक मुझे किसी से कुछ सरोकार नहीं। सबेरे तुमने म्लेच्छों का नाम सुना दिया, न जाने दिन कैसे कटेगा।

 

नायकराम-वह कौन-सी मनोकामना है?

 

पंडित-अपने अपमान का बदला।

 

नायकराम-किससे?

 

पंडित-उसका नाम न लूँगा। किसी बड़े रईस का लड़का है। काशी से दीनों की सहायता करने आया था। सैकड़ों घर उजाड़कर न जाने कहाँ चल दिया। उसी के निमित्ता यह अनुष्ठान कर रहा हूँ। यहाँ आधाा नगर मेरा यजमान था, सेठ-साहूकार मेरा आदर करते थे। विद्यार्थियों को पढ़ाया करता था। बुराई यह थी कि नाजिम को सलाम करने न जाता था। अमलों की कोई बुराई देखता, तो मुँह पर खोलकर कह देता। इसी से सब कर्मचारी मुझसे जलते थे। पिछले दिनों जब यहाँ दंगा हुआ, तो सबों ने उसी बनारस के गुंडे से मुझ पर राजद्रोह का अपराधा लगवा दिया। सजा हो गई, बेंत पड़ गए, जरीबाना हो गया, मर्यादा मिट्टी में मिल गई। अब नगर में कोई द्वार पर खड़ा नहीं होने देता। निराश होकर देवी की शरण आया हूँ। पुरश्चरण का पाठ कर रहा हूँ। जिस दिन सुनूँगा कि उस हत्यारे पर देवी ने कोप किया, उसी दिन मेरी तपस्या पूरी हो जाएगी। द्विज हूँ, लड़ना-भिड़ना नहीं जानता, मेरे पास इसके सिवा और कौन-सा हथियार है?

 

विनय किसी शराबखाने से निकलते हुए पकड़े जाते, तो भी इतने शर्मिंदा न होते। उन्हें अब इस ब्राह्मण की सूरत याद आई। याद आया कि मैंने ही पुलिस की प्रेरणा से इसे पकड़ा दिया था। जेब से पाँच रुपये निकाले और पंडितजी से बोले-यह लीजिए, मेरी ओर से भी उस नर-पिशाच के प्रति मारण-मंत्रा का जाप कर दीजिएगा। उसने मेरा भी सर्वनाश किया है। मैं भी उसके खून का प्यासा हो रहा हूँ।

 

पंडित-महाराज, आपका भला होगा। शत्राु की देह में कीड़े न पड़ जावें तो कहिएगा कि कोई कहता था। कुत्ताों की मौत मरेगा। यहाँ सारा नगर उसका दुश्मन है। अब तक इसलिए उसकी जान बची कि पुलिस उसे घेरे रहती थी। मगर कब तक? जिस दिन अकेला घर से निकला, उसी दिन देवी का उस पर कोप गिरा है। वह इसी राज्य में है, कहीं बाहर नहीं गया है, और न अब बचकर जा ही सकता है। काल उसके सिर पर खेल रहा है। इतने दीनों की हाय क्या निष्फल हो जाएगी?

 

जब यहाँ से और आगे चले, तो विनय ने कहा-पंडाजी, जल्दी से एक मोटर ठीक कर लो। मुझे भय लग रहा है कि कोई मुझे पहचान न ले। अपने प्राणों का इतना भय मुझे कभी न हुआ था। अगर ऐसे ही दो-एक दृश्य और सामने आए, तो शायद मैं आत्मघात कर लूँ। आह! मेरा कितना पतन हुआ है! और अब तक मैं यही समझ रहा था कि मुझसे कोई अनौचित्य नहीं हुआ। मैंने सेवा का व्रत लिया था, घर से परोपकार करने चला था। खूब परोपकार किया! शायद ये लोग मुझे जीवन-पर्यंत न भूलेंगे।

 

नायकराम-भैया, भूल-चूक आदमी ही से होती है। अब उसका पछतावा न करो।

 

विनय-नायकराम, यह भूल-चूक नहीं है, ईश्वरीय विधाान है; ऐसा ज्ञात होता है कि ईश्वर सद्व्रतधाारियों की कठिन परीक्षा लिया करते हैं। सेवक का पद इन परीक्षाओं में सफल हुए बिना नहीं मिलता। मैं परीक्षा में गिर गया, बुरी तरह गिर गया।

 

नायकराम का विचार था कि जरा जेल के दारोगा साहब का कुशल-समाचार पूछते चलें; लेकिन मौका न देखा तो तुरंत मोटर-सर्विस के दफ्तर में गए। वहाँ मालूम हुआ कि दरबार ने सब मोटरों को एक सप्ताह के लिए रोक लिया है।

 

मिस्टर क्लार्क के कई मित्रा बाहर से शिकार खेलने आए हुए थे। अब क्या हो? नायकराम को घोड़े पर चढ़ना न आता था और विनय को यह उचित न मालूम होता था कि आप तो सवार होकर चलें और वह पाँव-पाँव।

 

नायकराम-भैया, तुम सवार हो जाओ, मेरी कौन, अभी अवसर पड़ जाए, तो दस कोस जा सकता हूँ।

 

विनय-तो मैं ही ऐसा कौन मरा जाता हूँ। अब रात की थकावट दूर हो गई।

 

दोनों आदमियों ने जलपान किया और उदयपुर चले। आज विनय ने जितनी बात की, उतनी शायद और कभी न की थी, और वह भी नायकराम-जैसे लट्ठ गँवार से। सोफी की तीव्र आलोचना अब उन्हें सर्वथा न्याय-संगत जान पड़ती थी। बोले-पंडाजी, यह समझ लो कि अगर दरबार ने उन सब कैदियों को छोड़ न दिया, जो मेरी शहादत से फँसे हैं, तो मैं भी अपना मुँह किसी को न दिखाऊँगा। मेरे लिए यही एक आशा रह गई है। तुम घर जाकर माताजी से कह देना कि वह कितना दुखी और अपनी भूल पर कितना लज्जित था।

 

नायकराम-भैया, तुम घर न जाओगे, तो मैं भी न जाऊँगा। अब तो जहाँ तुम हो, वहीं मैं भी हूँ। जो कुछ बीतेगी, दोनों ही के सिरे बीतेगी।

 

विनय-बस, तुम्हारी यही बात बुरी मालूम होती है। तुम्हारा और मेरा कौन-सा साथ है। मैं पातकी हूँ। मुझे अपने पातकों का प्रायश्चित्ता करना है। तुम्हारे माथे पर तो कलंक नहीं है। तुम अपना जीवन क्यों नष्ट करोगे? मैंने अब तक सोफिया को न पहचाना था। आज मालूम हुआ कि उसका हृदय कितना विशाल है। मुझे उससे कोई शिकायत नहीं है। हाँ, शिकायत केवल इस बात की है कि उसने मुझे अपना न समझा। वह अगर समझती कि यह मेरे हैं, तो मेरी एक-एक बात क्यों पकड़ती, जरा-जरा-सी बातों पर क्यों गुप्तचरों की भाँति दृष्टि रखती! वह यह जानती है कि मैं ठुकरा दूँगी, तो यह जान पर खेल जाएँगे। यह जानकर भी उसने मेरे साथ इतनी निर्दयता क्यों की? वह यह क्यों भूल गई कि मनुष्य से भूलें होती ही हैं। सम्भव है, अपना समझकर ही उसने मुझे यह कठोर दंड दिया हो। दूसरों की बुराइयों की हमें परवाह नहीं होती, अपनों ही को बुरी राह चलते देखकर दंड दिया जाता है। मगर अपनों को दंड देते समय इसका तो धयान रखना चाहिए कि आत्मीयता का सूत्रा न टूटने पाए! यह सोचकर मुझे ऐसा मालूम होता है कि उसका दिल मुझसे सदैव के लिए फिर गया।

 

नायकराम-ईसाइन है न! किसी ऍंगरेज को गाँठेगी।

 

विनय-तुम बिलकुल बेहूदे हो, बात करने की तमीज नहीं। मैं कहता हूँ, वह अब उम्र-भर ब्रह्मचारिणी रहेगी। तुम उसे क्या जानो, बात समझो न बूझो, चट से कह उठे, किसी ऍंगरेज को गाँठेगी। मैं उसे कुछ-कुछ जानता हूँ। मेरे लिए उसने क्या-क्या नहीं किया, क्या-क्या नहीं सहा। जब उसका प्रेम याद आता है, तो कलेजे में ऐसी पीड़ा होती है कि कहीं पत्थरों से सिर टकराकर प्राण दे दूँ। अब वह अजेय है, उसने अपने प्रेम का द्वार बंद कर लिया। मैंने उस जन्म में न जाने कौन-सी तपस्या की थी, जिसका सुफल इतने दिनों भोगा। अब कोई देवता बनकर भी उसके सामने आए, तो वह उसकी ओर ऑंख उठाकर भी न देखेगी। जन्म से ईसाइन भले ही हो, पर संस्कारों से, कर्मों से वह आर्य महिला है। मैंने उसे कहीं का न रखा। आप भी डूबा, उसे भी ले डूबा। अब तुम देखना कि रियासत को वह कैसा नाकाेंं चने चबवाती है। उसकी वाणी में इतनी शक्ति है कि आन-की-आन मे रियासत का निशान मिटा सकती है।

 

नायकराम-हाँ, है तो ऐसी ही आफत की परकाला।

 

विनय-फिर वही मूर्खता की बात! मैं तुमसे कितनी बार कह चुका कि मेरे सामने उसका नाम इज्जत से लिया करो। मैं उसके विषय में किसी के मुख से एक भी अनुचित शब्द नहीं सुन सकता। वह अगर मुझे भालों से छेद दे, तो भी उसके प्रति मेरे मन में उपेक्षा का भाव न आएगा। प्रेम में प्रतिकार नहीं होता। प्रेम अनंत क्षमा, अनंत उदारता, अनंत धौर्य से परिपूर्ण होता है।

 

यों बातें करते हुए दोनों ने दोपहर तक आधाी मंजिल काटी। दोपहर को आराम करने लगे, तो ऐसे सोए कि शाम हो गई। रात को वहीं ठहरना पड़ा। सराय मौजूद थी, विशेष कष्ट न हुआ। हाँ, नायकराम को आज जिंदगी में पहली बार भंग न मिली और वह बहुत दुखी रहे। एक तोले भंग के लिए एक से दस रुपये तक देने को तैयार थे, पर आज भाग्य में उपास ही लिखा था। चाराेंं ओर से हारकर वह सिर थाम कुएँ की जगत पर आ बैठे, मानो किसी घर के आदमी का दाह-क्रिया करके आए हों।

 

विनय ने कहा-ऐसा व्यसन क्यों करते हो कि एक दिन भी उसके बिना न रहा जाए? छोड़ो इसे, भले आदमी, व्यर्थ में प्राण दिए देते हो।

 

नायकराम-भैया, इस जन्म में तो छूटती नहीं, आगे की दैव जाने। यहाँ तो मरते समय भी एक गोला सिरहाने रखे लेंगे, वसीयत कर जाएँगे कि एक सेर भंग हमारी चिता में डाल देना। कोई पानी देनेवाला तो है नहीं, लेकिन अगर कभी भगवान् ने वह दिन दिखाया, तो लड़कों से कह दूँगा कि पिंड के साथ भंग का पिंडा भी जरूर देना। इसका मजा वही जानता है, जो इसका सेवन करता है।

 

नायकराम को आज भोजन अच्छा न लगा, नींद न आई, देह टूटती रही। गुस्से में सरायवाले को खूब गालियाँ दीं। मारने दौड़े। बनिये को डाँटा कि साफ शक्कर क्यों न दी। हलवाई से उलझ पड़े कि मिठाइयाँ क्यों खराब दीं। देख तो, तेरी क्या गत बनाता हूँ, चलकर सीधो सरदार साहब से कहता हूँ। बच्चा! दूकान न लुटवा दूँ, तो कहना। जानते हो, मेरा नाम नायकराम है। यहाँ तेल की गंधा से घिन है। हलवाई पैरों पड़ने लगा; पर उन्होंने एक न सुनी। यहाँ तक कि धामकाकर उससे 25 रुपये वसूल किए। किंतु चलते समय विनय ने रुपये वापस करा दिए। हाँ,हलवाई को ताकीद कर दी कि ऐसी खराब मिठाइयाँ न बनाया करे और तेल की चीज के घी के दाम न लिया करे।

 

दूसरे दिन दोनों आदमी दस बजते-बजते उदयपुर पहुँच गए। पहला आदमी जो उन्हें दिखाई दिया, वह स्वयं सरदार साहब थे। वह टमटम पर बैठे हुए दरबार से आ रहे थे। विनय को देखते ही घोड़ा रोक दिया और पूछा-आप कहाँ?

 

विनय ने कहा-यहीं तो आ रहा था।

 

सरदार-कोई मोटर न मिला? हाँ, न मिला होगा। तो टेलीफोन क्यों न कर दिया? यहाँ से सवारी भेज दी जाती। व्यर्थ इतना कष्ट उठाया।

 

विनय-मुझे पैदल चलने का अभ्यास है, विशेष कष्ट नहीं हुआ। मैं आज आपसे मिलना चाहता हूँ, और एकांत में। आप कब मिल सकेंगे?

 

सरदार-आपके लिए समय निश्चित करने की जरूरत नहीं। जब जी चाहे, चले आइएगा, बल्कि वहीं ठहरिएगा भी।

 

विनय-अच्छी बात है।

 

सरदार साहब ने घोड़ों को चाबुक लगाया और चल दिए। यह न हो सका कि विनय को भी बिठा लेते, क्योंकि उनके साथ नायकराम को भी बैठाना पड़ता। विनयसिंह ने एक ताँगा किया और थोड़ी देर में सरदार साहब के मकान पर जा पहुँचे।

 

सरदार साहब ने पूछा-इधार कई दिनों से आपका कोई समाचार नहीं मिला। आपके साथ के और लोग कहाँ हैं? कुछ मिसेज क्लार्क का पता चला?

 

विनय-साथ के आदमी तो पीछे हैं; लेकिन मिसेज क्लार्क का कहीं पता न चला, सारा परिश्रम विफल हो गया। वीरपालसिंह की तो मैंने टोह लगा ली, उसका घर भी देख आया। पर मिसेज क्लार्क की खोज न मिली।

 

सरदार साहब ने विस्मित होकर कहा-यह आप क्या कह रहे हैं? मुझे जो सूचना मिली है, वह तो यह कहती है कि आपसे मिसेज क्लार्क की मुलाकात हुई और अब मुझे आपसे होशियार रहना चाहिए। देखिए, मैं वह खत आपको दिखाता हूँ।

 

यह कहकर सरदार साहब मेज के पास गए, एक बादामी मोटे कागज पर लिखा हुआ खत उठा लाए और विनयसिंह के हाथ में रख दिया।

 

जीवन में यह पहला अवसर था कि विनय ने असत्य का आश्रय लिया था। चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। बात क्योंकर निबाहें, यह समझ में न आया। नायकराम भी फर्श पर बैठे हुए थे। समझ गए कि यह असमंजस में पड़े हुए हैं। झूठ बोलने और बातें बनाने में अभ्यस्त थे। बोले-कुँवर साहब, जरा मुझे दीजिए, किसका खत है?

 

विनय-इंद्रदत्ता का।

 

नायकराम-ओहो! उस पगले का खत है! वही लौंडा न, जो सेवा समिति में आकर गाया करता था? उसके माँ-बाप ने घर से निकाल दिया था। सरकार, पगला है। ऐसी ही ऊटपटाँग बात किया करता है।

 

सरदार-नहीं, किसी पगले लौंडे की लेखन-शैली ऐसी नहीं हो सकती। बड़ा चतुर आदमी है। इसमें कोई संदेह नहीं। उसके पत्रा इधार कई दिनों से बराबर मेरे पास आ रहे हैं। कभी मुझको धामकाता है, कभी नीति के उपदेश देता है। किंतु जो कुछ कहता है, शिष्टाचार के साथ। एक भी अशिष्ट अथवा अनर्गल शब्द नहीं होता। अगर यह वही इंद्रदत्ता है, जिसे आप जानते हैं, तो और भी आश्चर्य है। सम्भव है, उसके नाम से कोई दूसरा आदमी पत्रा लिखता हो। यह कोई साधाारण शिक्षा पाया हुआ, आदमी नहीं मालूम होता।

 

विनयसिंह तो ऐसे सिटपिटा गए, जैसे कोई सेवक अपने स्वामी का संदूक खोलता हुआ पकड़ा जाए। मन में झुँझला रहे थे कि क्यों मैंने मिथ्या भाषण किया? मुझे छिपाने की जरूरत ही क्या थी? लेकिन इंद्रदत्ता का इस पत्रा से क्या उद्देश्य है? क्या मुझे बदनाम करना चाहता है?

 

नायकराम-कोई दूसरा ही आदमी होगा। उसका मतलब यही है कि यहाँ के हाकिमों को कुँवर साहब से भड़का दे। क्यों भैया, समिति में कोई विद्वान् आदमी था?

 

विनय-सभी विद्वान थे, उनमें मूर्ख कौन है? इंद्रदत्ता भी उच्च कोटि की शिक्षा पाए हुए है। पर मुझे न मालूम था कि वह मुझसे इतना द्वेष रखता है।

 

यह कहकर विनय ने सरदार साहब को लज्जित नेत्राों से देखा। असत्य का रूप प्रतिक्षण भयंकर तथा मिथ्यांधाकार और भी सघन होता जाता था।

 

तब वह सकुचाते हुए बोले-सरदार साहब, क्षमा कीजिएगा, मैं आपसे झूठ बोल रहा था। इस पत्रा में जो कुछ लिखा है, वह अक्षरश: सत्य है। नि:संदेह मेरी मुलाकात मिसेज क्लार्क से हुई। मैं इस घटना को आपसे गुप्त रखना चाहता था, क्योंकि मैंने उन्हें इसका वचन दे दिया था। वह वहाँ बहुत आराम से हैं, यहाँ तक कि मेरे बहुत आग्रह करने पर भी मेरे साथ न आईं।

 

सरदार साहब ने बेपरवाही से कहा-राजनीति में वचन का बहुत महत्तव नहीं है। अब मुझे आपसे चौकन्ना रहना पड़ेगा। अगर इस पत्रा ने मुझे सारी बातों का परिचय न दे दिया होता, तो आपने तो मुझे मुगालता देने में कोई बात उठा न रखी थी। आप जानते हैं, हमें आजकल इस विषय में गवर्नमेंट से कितनी धामकियाँ मिल रही हैं या कहिए मिसेज क्लार्क के सकुशल लौट आने पर ही हमारी कारगुजारी निर्भर है। खैर, यह क्या बात है? मिसेज क्लार्क आईं क्यों नहीं? क्या बदमाशों ने उन्हें आने न दिया?

 

विनय-वीरपालसिंह तो बड़ी खुशी से उन्हें भेजना चाहता था। यही एक साधान है, जिससे वह अपनी प्राणरक्षा कर सकता है। लेकिन वह खुद ही आने पर तैयार न हुईं।

 

सरदार-मिस्टर क्लार्क से नाराज तो नहीं हैं?

 

विनय-हो सकता है। जिस दिन विद्रोह हुआ था, मिस्टर क्लार्क नशे में अचेत पड़े थे, शायद इसी कारण उनसे चिढ़ गई हों। ठीक-ठीक कुछ नहीं कह सकता। हाँ, उनसे भेंट होने से यह बात स्पष्ट हो गई कि हमने जसंवतनगरवालों का दमन करने में बहुत-सी बातें न्याय-विरुध्द कीं। हमें शंका थी कि विद्रोहियों ने मिसेज क्लार्क को या तो कैद कर रखा है या मार डाला है। इसी शंका पर हमने दमन-नीति का व्यवहार किया। सबको एक लाठी से हाँका। किंतु दो बातों में से एक भी सच न निकली। मिसेज क्लार्क जीवित हैं और प्रसन्न हैं। वह वहाँ से स्वयं नहीं आना चाहतीं। जसवंतनगरवाले अकारण ही हमारे कोप के भागी हुए, और मैं आपसे बड़े आग्रह से प्रार्थना करता हूँ कि उन गरीबों पर दया होनी चाहिए। सैकड़ाें निरपराधिायों की गर्दन पर छुरी फिर रही है।

 

सरदार साहब जान-बूझकर किसी पर अन्याय न करना चाहते थे, पर अन्याय कर चुकने के बाद अपनी भूल स्वीकार करने का उन्हें साहस न होता था। न्याय करना उतना कठिन नहीं है, जितना अन्याय का शमन करना। सोफी के गुम हो जाने से उन्हें केवल गवर्नमेंट की वक्र दृष्टि का भय था। पर सोफी का पता मिल जाना, समस्त देश के सामने अपनी अयोग्यता और नृशंसता का डंका पीटना था। मिस्टर क्लार्क को खुश करके गवर्नमेंट को खुश किया जा सकता था, पर प्रजा की जबान इतनी आसानी से न बंद की जा सकती थी।

 

सरदार साहब ने कुछ सकुचाते हुए कहा-या तो मैं मान सकता हूँ क मिसेज क्लार्क जीवित हैं। लेकिन आप तो क्या, ब्रह्मा भी आकर कहें कि वह वहाँ प्रसन्न हैं और आना नहीं चाहतीं, तो भी मैं स्वीकार न करूँगा। यह बच्चों की-सी बात है। किसी को अपने घर से अरुचि नहीं होती कि वह शत्राुआें के साथ साथ रहना पसंद करे। विद्रोहियों ने मिसेज क्लार्क को यह कहने के लिए मजबूर किया होगा। वे मिसेज क्लार्क को उस वक्त तक न छोड़ेंगे, जब तक हम सारे कैदियों को मुक्त न कर दें। यह विजेताओं की नीति है और मैं इसे नहीं मान सकता। मिसेज़ क्लार्क को कड़ी-से-कड़ी यातनाएँ दी जा रही हैं, और उन्हाेंंने उन यातनाओं से बचने के लिए आपसे यह सिफारिश की है, और कोई बात नहीं है।

 

विनय-मैं इस विचार से सहमत नहीं हो सकता। मिसेज क्लार्क बहुत प्रसन्न दिखाई देती थीं। पीड़ित हृदय कभी इतना निश्शंक नहीं हो सकता।

 

सरदार-यह आपकी ऑंखों का दोष है। अगर मिसेज क्लार्क स्वयं आकर मुझसे कहें कि मैं बड़े आराम से हूँ, तो भी मुझे विश्वास न आएगा। आप नहीं जानते, ये लोग किन सिध्दियों से स्वाधाीनता पर जान देनेवाले प्राण्0श्निायों पर भी आतंक जमा लेते हैं; यहाँ तक कि उनके पंजे से निकल आने पर भी कैदी उन्हीं की-सी कहता है और उन्हीं की-सी करता है। मैं एक जमाने में पुलिस की कर्मचारी था। आपसे सच कहता हूँ, मैंने कितने ही राजनीतिक अभियोगों में बड़े-बड़े व्रतधाारियों से ऐसे अपराधा स्वीकार करा दिए, जिनकी उन्होंने कल्पना तक न की थी। वीरपालसिंह इस विषय में हमसे कहीं चतुर है।

 

विनय-सरदार साहब, अगर थोड़ी देर के लिए मुझे यह विश्वास भी हो जाए कि मिसेज क्लार्क ने दबाव में आकर मुझसे ये बातें कही हैं,तो भी अब ठंडे हृदय से विचार करने पर मुझे ज्ञात हो रहा है कि इतनी निर्दयता से दमन न करना चाहिए था। अब उन अभियुक्तों पर कुछ रिआयत होनी चाहिए।

 

सरदार-रिआयत राजनीति में पराजय का सूचक है। अगर मैं यह भी मान लूँ कि मिसेज क्लार्क वहाँ आराम से हैं और स्वतंत्रा हैं, तथा हमने जसवंतनगरवालों पर घोर अत्याचार किया, फिर भी मैं रिआयत करने को तैयार नहीं हूँ। रिआयत करना अपनी दुर्बलता और भ्रांति की घोषणा करना है। आप जानते हैं, रिआयत का परिणाम क्या होगा? विद्रोहियों के हौसले बढ़ जाएँगे, उनके दिल में रियासत का भय जाता रहेगा और जब भय न रहा तो राज्य भी नहीं रह सकता। राज्य-व्यवस्था का आधाार न्याय नहीं, भय है। भय को आप निकाल दीजिए,और राज्य-विधवंस हो जाएगा, फिर अर्जुन की वीरता और युधिाष्ठिर का न्याय भी उनकी रक्षा नहीं कर सकता। सौ-दो सौ निरपराधिायों का जेल में रहना, राज्य न रहने से कहीं अच्छा है। मगर मैं उन विद्रोहियों को निरपराधा क्योंकर मान लूँ? कई हजार आदमियों का सशस्त्रा होकर एकत्रा हो जाना, यह सिध्द करता है कि वहाँ लोग विद्रोह करने के विचार से ही गए थे।

 

विनय-किंतु जो लोग उसमें सम्मिलित न थे, वे तो बेकसूर हैं?

 

सरदार-कदापि नहीं, उनकार् कत्ताव्य था कि अधिाकारियों को पहले ही से सचेत कर देते। एक चोर को किसी के घर में सेंधा लगाते देखकर घरवालों को जगाने की चेष्टा न करें, तो आप स्वयं चोर की सहायता कर रहे हैं। उदासीनता बहुधाा अपराधा से भी भयंकर होती है।

 

विनय-कम-से-कम इतना तो कीजिए कि जो लोग मेरी शहादत पर पकड़े गए हैं, उन्हें बरी कर दीजिए।

 

सरदार-असम्भव है।

 

विनय-मैं शासन-नीति के नाते नहीं, दया और सौजन्य के नाते आपसे यह विनीत आग्रह करता हूँ।

 

सरदार-कह दिया भाईजान, कि यह असम्भव है। आप इसका परिणाम नहीं सोच रहे हैं।

 

विनय-लेकिन मेरी प्रार्थना को स्वीकार न करने का परिणाम भी अच्छा न होगा। आप समस्या को और जटिल बना रहे हैं।

 

सरदार-मैं खुले विद्रोह से नहीं डरता। डरता हूँ केवल सेवकों से; प्रजा के हितैषियों से और उनसे यहाँ की प्रजा का जी भर गया है। बहुत दिन बीत जाएँगे, इसके पहले कि प्रजा देश-सेवकों पर फिर विश्वास करे।

 

विनय-अगर इसी नियत से आपने मेरे हाथों प्रजा का अनिष्ट कराया, तो आपने मेरे साथ घोर विश्वासघात किया, लेकिन मैं आपको सतर्क किए देता हूँ कि यदि आपने मेरा अनुरोधा न माना, तो आप रियासत में ऐसा विप्लव मचा देंगे, जो रियासत की जड़ हिला देगा। मैं यहाँ से मिस्टर क्लार्क के पास जाता हूँ। उनसे भी यही अनुरोधा करूँगा और यदि वह भी न सुनेंगे, तो हिज़ हाइनेस की सेवा में यही प्रस्ताव उपस्थित करूँगा। अगर उन्होंने भी न सुना, तो फिर इस रियासत का मुझसे बड़ा और कोई शत्राु न होगा।

 

यह कहकर विनयसिंह उठ खड़े हुए और नायकराम को साथ लेकर मिस्टर क्लार्क के बँगले पर जा पहुँचे। वह आज ही अपने शिकारी मित्राों को बिदा करके लौटे थे और इस समय विश्राम कर रहे थे। विनय ने अरदली से पूछा, तो मालूम हुआ कि साहब काम कर रहे हैं। विनय बाग में टहलने लगे। जब आधा घंटे तक साहब ने न बुलाया तो उठे और सीधो क्लार्क के कमरे में घुस गए, वह इन्हें देखते ही उठ बैठे, और बोले-आइए-आइए, आप ही की याद कर रहा था। कहिए, क्या समाचार है? सोफ़िया का पता तो आप लगा ही आए होंगे?

 

विनय-जी हाँ, लगा आया।

 

यह कहकर विनय ने क्लार्क से भी वही कथा कही, जो सरदार साहब से कही थी, और वही अनुरोधा किया।

 

क्लार्क-मिस सोफी आपके साथ क्यों नहीं आईं?

 

विनय-यह तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन वहाँ उन्हें कोई कष्ट नहीं है।

 

क्लार्क-तो फिर आपने नई खोज क्या की? मैंने तो समझा था, शायद आपके आने से इस विषय पर कुछ प्रकाश पड़ेगा। यह देखिए,सोफ़िया का पत्रा है। आज ही आया है। इसे आपको दिखा तो नहीं सकता, पर इतना कह सकता हूँ कि वह इस वक्त मेरे सामने आ जाए, तो उस पर पिस्तौल चलाने में एक क्षण भी विलम्ब न करूँगा। अब मुझे मालूम हुआ कि धार्मपरायणता छल और कुटिलता का दूसरा नाम है। इसकी धार्म-निष्ठा ने मुझे बड़ा धाोखा दिया। शायद कभी किसी ने इतना बड़ा धाोखा न खाया होगा। मैंने समझा था, धाार्मिकता से सहृदयता उत्पन्न होती है; पर यह मेरी भ्रांति थी। मैं इसकी धार्म-निष्ठा पर रीझ गया। मुझे इंग्लैंड की रँगीली युवतियों से निराशा हो गई थी। सोफ़िया का सरल स्वभाव और धाार्मिक प्रवृत्तिा देखकर मैंने समझा, मुझे इच्छित वस्तु मिल गई। अपने समाज की उपेक्षा करके मैं उसके पास जाने-आने लगा और अंत में प्रोपोज़ किया। सोफ़िया ने स्वीकार तो कर लिया, पर कुछ दिनों तक विवाह को स्थगित रखना चाहा। मैं क्या जानता था कि उसके दिल में क्या है? राजी को गया। उसी अवस्था में वह मेरे साथ यहाँ आई, बल्कि यों कहिए कि वही मुझे यहाँ लाई। दुनिया समझती है, वह मेरी विवाहिता थी, कदापि नहीं। हमारी तो मँगनी भी न हुई थी। अब जाकर रहस्य खुला कि वह बोलशेविकों की एजेंट है। उसके एक-एक शब्द से उसकी बोलशेविक प्रवृत्तिा टपक रही है। प्रेम का स्वाँग भरकर वह ऍंगरेजों के आंतरिक भावों का ज्ञान प्राप्त करना चाहती थी। उसका यह उद्देश्य पूरा हो गया। मुझसे जो कुछ काम निकल सकता था, वह निकालकर उसने मुझे दुतकार दिया। विनयसिंह, तुम नहीं अनुमान कर सकते कि मैं उससे कितना प्रेम करता था। इस अनुपम रूपराशि के नीचे इतनी घोर कुटिलता! मुझे धामकी दी है कि इतने दिनों में ऍंगरेजी समाज का मुझे जो कुछ अनुभव हुआ है, उसे मैं भारतवासियों के विनोदार्थ प्रकाशित कर दूँगी। वह जो कुछ कहना चाहती है,मैं स्वयं क्यों न बतला दूँ? ऍंगरेज-जाति भारत का अनंत काल तक अपने साम्राज्य का अंग बनाए रखना चाहती है। कंजरवेटिव हो या लिबरल, रेडिकल हो या लेबर, नेशनलिस्ट हो या सोशलिस्ट, इस विषय में सभी एक ही आदर्श का पालन करते हैं। सोफी के पहले मैं स्पष्ट कह देना चाहता हूँ कि रेडिकल और लेबर नेताओं के धाोखे में न आओ। कंजरवेटिव दल में और चाहे कितनी बुराइयाँ हों, वह निर्भीक है,तीक्ष्ण सत्य से नहीं डरता। रेडिकल और लेबर अपने पवित्रा और उज्ज्वल सिध्दांतों का समर्थन करने के लिए ऐसी आशाप्रद बातें कह डालते हैं, जिनका व्यवहार में लाने का उन्हें साहस नहीं हो सकता। आधिापत्य त्याग करने की वस्तु नहीं है। संसार का इतिहास केवल इसी शब्द’आधिापत्य-प्रेम’ पर समाप्त हो जाता है। मानव स्वभाव अब भी वही है, जो सृष्टि के आदि में था। ऍंगरेज-जाति कभी त्याग के लिए, उच्च सिध्दांतों पर प्राण देने के लिए प्रसिध्द नहीं रही। हम सब-के-सब-मैं लेबर हूँ-साम्राज्यवादी हैं। अंतर केवल उस नीति में है, जो भिन्न-भिन्न दल इस जाति पर आधिापत्य जमाए रखने के लिए ग्रहण करते हैं। कोई शासन का उपासक है, कोई सहानुभूति का, कोई चिकनी-चुपड़ी बातों से काम निकालने का। बस, वास्तव में नीति कोई है ही नहीं, केवल उद्देश्य है, और वह यह कि क्योंकर हमारा आधिापत्य उत्तारोत्तार सुदृढ़ हो। यही वह गुप्त रहस्य है, जिसको प्रकट करने की मुझे धामकी दी गई है। यह पत्रा मुझे न मिला हाता, तो मेरी ऑंखों पर परदा पड़ा रहता और सोफी के लिए क्या कुछ न कर डालता। पर इस पत्रा ने मेरी ऑंखें खोल दीं और अब मैं आपकी सहायता नहीं कर सकता; बल्कि आपसे भी अनुरोधा करता हूँ कि इस बोलशेविक आंदोलन को शांत करने में रियासत की सहायता कीजिए। सोफी-जैसी चतुर, कार्यशील, धाुन की पक्की युवती के हाथों में यह आंदोलन कितना भयंकर हो सकता है, इसका अनुमान करना कठिन नहीं है।

 

विनय यहाँ से भी निराश होकर बाहर निकले, तो सोचने लगे, अब महाराजा साहब के पास जाना व्यर्थ है। वह साफ कह देंगे, जब मंत्राी और एजेंट कुछ नहीं कर सकते, तो मैं क्या कर सकता हूँ। लेकिन जी न माना, ताँगेवाले को राजभवन की ओर चलने का हुक्म दिया।

 

नायकराम-क्या गिटपिट करता रहा? आया राह पर?

 

विनय-यही राह पर आ जाता, तो महाराज साहब के पास क्यों चलते?

 

नायकराम-हजार-दो हजार माँगता हो, तो दे क्यों नहीं देते? अफसर छोटे हों या बड़े, लोभी होते हैं।

 

विनय-क्या पागलों की-सी बात करते हो! ऍंगरेज में अगर ये बुराइयाँ होतीं, तो इस देश से ये लोग कब के सिधाार गए होते। यों ऍंगरेज भी रिश्वत लेते हैं, देवता नहीं हैं, पहले-पहल ऍंगरेज यहाँ आए थे, वे तो पूरे डाकू थे, लेकिन अपने राज्य का अपकार करके ये लोग कभी अपना उपकार नहीं करते। रिश्वत भी लेंगे, तो उसी दशा में, जब राज्य को उससे कोई हानि न पहुँचे!

 

नायकराम चुप हो रहे। ताँगा राज-भवन की ओर जा रहा था। रास्ते में कई सड़कें, कई पाठशालाएँ, कई चिकित्सालय मिले। इन सबों के नाम ऍंगरेजी थे। यहाँ तक एक पार्क मिला, वह भी किसी ऍंगरेज एजेंट के नाम से अलंकृत था। ऐसा जान पड़ता था, यह कोई भारतीय नगर नहीं, ऍंगरेजों का शिविर है। ताँगा जब राजभवन के सामने पहुँचा तो विनयसिंह उतर पड़े और महाराजा के प्राइवेट सेक्रेटरी के पास गए। यह एक ऍंगरेज था। विनय से हाथ मिलाते हुए बोला-महाराजा साहब तो अभी पूजा पर है। ग्यारह बजे बैठा था, चार बजे उठेगा। क्या आप लोग इतनी देर तक पूजा किया करता है?

 

विनय-हमारे यहाँ ऐसे-ऐसे पूजा करनेवाले हैं, जो कई-कई दिन तक समाधिा में मग्न रहते हैं। पूजा का वह भाग, जिसमें परमात्मा या अन्य देवताओं से कल्याण की याचना की जाती है, शीघ्र समाप्त हो जाता है; लेकिन वह भाग, जिसमें योग-क्रियाओं द्वारा आत्मशुध्दि की जाती है, बहुत विशद होता है।

 

सेक्रेटरी-हम जिस राजा के साथ पहले था, वह सबेरे से दो बजे तक पूजा करता था, तब भोजन करता था और चार बजे सोता था। फिर नौ बजे पूजा पर बैठ जाता था और दो बजे रात को उठता था। वह एक घंटे के लिए सूर्यास्त के समय बाहर निकलता था। इतनी लम्बी पूजा मेरे विचार में अस्वाभाविक है। मैं समझता हूँ कि यह न तो उपासना है, न आत्मशुध्दि की क्रिया, केवल एक प्रकार की अकर्मण्यता है।

 

विनय का चित्ता इस समय इतना व्यग्र हो रहा था कि उन्होंने इस कटाक्ष का कुछ उत्तार न दिया। सोचने लगे-अगर राजा साहब ने भी साफ जवाब दिया, तो मेरे लिए क्या करना उचित होगा? अभी इतने बेगुनाहों के खून से हाथ रँगे हुए हैं, कहीं सोफी ने गुप्त हत्याओं का अभिनय आरम्भ किया, तो उसका खून भी मेरी ही गर्दन पर होगा। इस विचार से वह इतने व्याकुल हुए कि एक ठंडी साँस लेकर आराम-कुर्सी पर लेट गए और ऑंखें बंद कर लीं। यों वह नित्य संधया करते थे, पर आज पहली बार ईश्वर से दया-प्रार्थना की। रात-भर के जागे, दिन-भर के थके थे ही, एक झपकी आ गई। जब ऑंखें खुलीं, तो चार बज चुके थे। सेक्रेटरी से पूछा-अब तो हिज़ हाइनेस पूजा पर से उठ गए होंगे?

 

सेक्रेटरी-आपने तो एक लम्बी नींद ले ली।

 

यह कहकर उसने टेलीफोन द्वारा कहा-कुँवर विनयसिंह हिज़ हाइनेस से मिलना चाहते हैं।

 

एक क्षण में जवाब आया-आने दो।

 

विनयसिंह महाराज के दीवाने-खाने में पहुँचे। वहाँ कोई सजावट न थी, केवल दीवारों पर देवताओं के चित्रा लटके हुए थे। कालीन के फर्श पर सफेद चादर बिछी हुई थी। महाराज साहब मसनद पर बैठे हुए थे। उनकी देह पर केवल एक रेशमी चादर थी और गले में एक तुलसी की माला। मुख से साधाुता झलक रही थी। विनय को देखते ही बोले-आओ जी, बहुत दिन लगा दिए। मिस्टर क्लार्क की मेम का कुछ पता चला?

 

विनय-जी हाँ, वीरपालसिंह के घर है, और बड़े आराम से है। वास्तव में अभी मिस्टर क्लार्क से उसका विवाह नहीं हुआ है, केवल मँगनी हुई है। इनके पास आने पर राजी नहीं होती है। कहती है, मैं यहीं बड़े आराम से हूँ और मुझे भी ऐसा ही ज्ञात होता है।

 

महाराज-हरि-हरि! यह तो तुमने विचित्रा बात सुनाई! इनके पास आती ही नहीं! समझ गया, उन सबों ने वशीकरण कर दिया होगा। शिव-शिव! इनके पास आती ही नहीं।

 

विनय-अब विचार कीजिए कि वह तो जीवित है, और सुखी है और यहाँ हम लोगों ने कितने ही निरपराधिायों को जेल में डाल दिया,कितने ही घरों को बरबाद कर दिया और कितने ही को शारीरिक दंड दिए।

 

महाराजा-शिव-शिव! घोर अनर्थ हुआ।

 

विनय-भ्रम में हम लोगों ने गरीबाेंं पर कैसे-कैसे अत्याचार किए कि उनकी याद ही से रोमांच हो आता है। महाराज बहुत उचित कहते हैं, घोर अनर्थ हुआ। ज्यों ही यह बात लोगाेंं को मालूम हो जाएगी, जनता में हाहाकर मच जाएगा। इसलिए अब यही उचित है कि हम अपनी भूल स्वीकार कर लें और कैदियों को मुक्त कर दें।

 

महाराज-हरि-हरि, यह कैसे होगा बेटा? राजों से भी कहीं भूल होती है। शिव-शिव! राजा तो ईश्वर का अवतार है। हरि-हरि! वह एक बार जो कर देता है, उसे फिर नहीं मिटा सकता। शिव-शिव! राजा का शब्द ब्रह्मलेख है, वह नहीं मिट सकता, हरि-हरि!

 

विनय-अपनी भूल स्वीकार करने में जो गौरव है, वह अन्याय को चिरायु रखने में नहीं। अधाीश्वरों के लिए क्षमा ही शोभा देती है। कैदियों को मुक्त करने की आज्ञा दी जाए, जुरमाने के रुपये लौटा दिए जाएँ और जिन्हें शारीरिक दंड दिए गए हैं, उन्हें धान देकर संतुष्ट किया जाए। इससे आपकी कीर्ति अमर हो जाएगी, लोग आपका यश गाएँगे और मुक्त कंठ से आशीर्वाद देेंगे।

 

महाराज-शिव-शिव! बेटा, तुम राजनीति की चालें नहीं जानते। यहाँ एक कैदी भी छोड़ा गया और रियासत पर वज्र गिरा। सरकार कहेगी,मेम को न जाने किस नीयत से छिपाए हुए है, कदाचित् उस पर मोहित है, तभी तो पहले दंड का स्वाँग भरकर अब विद्रोहियों को छोड़े देता है! शिव-शिव! रियासत धाूल में मिल जाएगी, रसातल को चली जाएगी। कोई न पूछेगा कि यह सच है या झूठ। कहीं इस पर विचार न होगा। हरि-हरि! हमारी दशा साधाारण अपराधिायों से भी गई-बीती है। उन्हें तो सफाई देने का अवसर दिया जाता है, न्यायालय में उन पर कोई धाारा लगाई जाती है और उसी धाारा के अनुसार दंड दिया जाता है। हमसे कौन सफाई लेता है, हमारे लिए कौन-सा न्यायालय है! हरि-हरि! हमारे लिए न कोई कानून है, न कोई धाारा। जो अपराधा चाहा, लगा दिया; जो दंड चाहा, दे दिया। न कहीं अपील है, न फरियाद। राजा विषय-प्रेमी कहलाते ही हैं, उन पर यह दोषारोपण होते कितनी देर लगती है। कहा जाएगा, तुमने क्लार्क की अति रूपवती मेम को अपने रनिवास में छिपा लिया और झूठमूठ उड़ा दिया कि वह गुम हो गई? हरि-हरि! शिव-शिव! सुनता हूँ, बड़ी रूपवती स्त्राी है, चाँद का टुकड़ा है,अप्सरा है। बेटा, इस अवस्था में यह कलंक न लगाओ। वृध्दावस्था भी हमें ऐसे कुत्सित दोषों से बचा नहीं सकती। मशहूर है, राजा लोग रसादि का सेवन करते हैं, इसलिए जीवन-पर्यंत हृष्ट-पुष्ट बने रहते हैं। शिव-शिव! यह राज्य नहीं है, अपने कर्मों का दंड है। नकटा जिया बुरे हवाल। शिव-शिव! अब कुछ नहीं हो सकता। सौ-पचास निर्दोष मनुष्यों का जेल में पड़ा रहना कोई असाधाारण बात नहीं। वहाँ भी तो भोजन-वस्त्रा मिलता ही है। अब तो जेलखानों की दशा बहुत अच्छी है। नए-नए कुरते दिए जाते हैं। भोजन भी अच्छा दिया जाता है। हाँ, तुम्हारी खातिर से इतना कर सकता हूँ कि जिन परिवारों का कोई रक्षक न रह गया हो, अथवा जो जुरमाने के कारण दरिद्र हो गए हों, उन्हें गुप्त रीति से कुछ सहायता दे दी जाए। हरि-हरि! तुम अभी क्लार्क के पास तो नहीं गए थे?

 

विनय-गया था, वहीं से तो आ रहा हूँ।

 

महाराजा-(घबराकर) उनसे तो यह नहीं कह दिया कि मेम साहब बड़े आराम से हैं और आने पर राजी नहीं है?

 

विनय-यह भी कह दिया, छिपाने की कोई बात न थी। किसी भाँति उन्हें धौर्य तो हो।

 

महाराजा-(जाँघ पर हाथ पटककर) सर्वनाश कर दिया! हरि-हरि चौपट-नाश कर दिया। शिव-शिव! आग तो लगा दी, अब मेरे पास क्यों आए हो। शिव-शिव! क्लार्क कहेगा, कैदी कैद में आराम से है, तो इसमें कुछ-न-कुछ रहस्य है। अवश्य कहेगा! ऐसा कहना स्वाभाविक भी है। मेरे अदिन आ गए, शिव-शिव ! मैं इस आक्षेप का क्या उत्तार दूँगा! भगवन्, तुमने घोर संकट में डाल दिया। यह कहते हैं बचपन की बुध्दि! वहाँ न जाने कौन-सा शुभ समाचार कहने दौड़े थे। पहले प्रजा को भड़काया, रियासत में आग लगाई, अब यह दूसरा आघात किया। मूर्ख! तुझे क्लार्क से कहना चाहिए था, वहाँ मेम को नाना प्रकार के कष्ट दिए जा रहे हैं, अनेक यातनाएँ मिल रही हैं। ओह! शिव-शिव!

 

सहसा प्राइवेट सेक्रेटरी ने फोन में कहा-मिस्टर क्लार्क आ रहे हैं।

 

महाराजा ने खड़े होकर कहा-आ गया यमदूत, आ गया। कोई है? कोट-पतलून लाओ। तुम जाओ विनय, चले जाओ, रियासत से चले जाओ। फिर मुझे मुँह मत दिखाना। जल्दी पगड़ी लाओ, यहाँ से उगालदान हटा दो।

 

विनय को आज राजा से घृणा हो गई। सोचा, इतना पतन, इतनी कायरता! यों राज्य करने से डूब मरना अच्छा है! वह बाहर निकले, तो नायकराम ने पूछा-कैसी छनी?

 

विनय-इनकी तो मारे भय से आप ही जान निकली जाती है। ऐसा डरते हैं, मानो मिस्टर क्लार्क कोई शेर हैं और इन्हें आते-ही-आते खा जाएँगे। मुझसे तो इस दशा में एक दिन भी न रहा जाता।

 

नायकराम-भैया, मेरी तो अब सलाह है कि घर लौट चलो, इस जंजाल में कब तक जान खपाओगे?

 

विनय ने सजल नयन होकर कहा-पंडाजी, कौन मुँह लेकर घर जाऊँ? मैं अब घर जाने योग्य नहीं रहा। माताजी मेरा मुँह न देखेंगी। चला था जाति की सेवा करने, जाता हूँ सैकड़ों परिवारों का सर्वनाश करके। मेरे लिए तो अब डूब मरने के सिवा और कुछ नहीं रहा। न घर का रहा न घाट का। मैं समझ गया नायकराम, मुझसे कुछ न होगा, मेरे हाथों किसी का उपकार न होगा, मैं विष बोने ही के लिए पैदा किया गया हूँ;मैं सर्प हूँ, जो काटने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता। जिस पामर प्राणी को प्रांत-का-प्रांत गालियाँ दे रहा हो, जिसके अहित के लिए अनुष्ठान किए जा रहे हों, उसे संसार पर भार-स्वरूप रहने का क्या अधिाकार है? आज मुझ पर कितने बेकसों की आहें पड़ रही हैं। मेरे कारण कितना ऑंसू बहा है, उसमें मैं डूब सकता हूँ। मुझे जीवन से भय लग रहा है। जितना जिऊँगा, उतना ही अपने ऊपर पापों का भार बढ़ाऊँगा। इस वक्त अगर अचानक मेरी मृत्यु हो जाए, तो समझ्रू, ईश्वर ने मुझे उबार लिया।

 

इस तरह ग्लानि में डूबे हुए विनय उस मकान में पहुँचे, जो रियासत की ओर से उन्हें ठहरने को मिला था। विनय को देखते ही नौकर-चाकर दौड़े, कोई पानी खींचने लगा, कोई झाड़ई देने लगा, कोई बरतन धाोने लगा। विनय ताँगे से उतरकर सीधो दीवानखाने में गए। अंदर कदम रखा ही था कि मेज पर बंद लिफाफा मिला। विनय का हृदय धाक-धाक करने लगा। यह रानी जाह्नवी का पत्रा था। लिफाफा खोलने की हिम्मत न पड़ी। कोई माता परदेश में पड़े हुए बीमार बेटे का तार पाकर इतनी शंकातुर न होती होगी। लिफाफा हाथ में लिए हुए सोचने लगे-इसमें मेरी भर्त्सना के सिवा और क्या होगा? इंद्रदत्ता ने जो कुछ कहा है, वही तीव्र शब्दों में यहाँ दुहराया गया होगा। लिफाफा ज्यों-का-त्यों रख दिया और सोचने लगे-अब क्या करना चाहिए? क्यों न यहाँ बाजार में खड़े होकर जनता को सूचित कर दूँ कि दरबार तुम्हारे साथ यह अन्याय कर रहा है? लेकिन इस समय पीड़ित जनता को सहायता की जरूरत है, धान कहाँ से आए? पिताजी को लिखूँ कि आप इस समय मेरे पास जितने रुपये भेज सकें, भेज दीजिए? रुपये आ जाएँ, तो यहाँ अनाथों में बाँट दूँ? नहीं, सबसे पहले वायसराय से मिलूँ और यहाँ की यथार्थ स्थिति उनसे बयान करूँ। सम्भव है, वह दरबार पर दबाव डालकर कैदियों को मुक्त करा दें। यही ठीक है। अब मुझे सब काम छोड़कर वाइसराय से मिलना चाहिए।

 

वह यात्राा की तैयारियाँ करने लगे, लेकिन रानीजी के पत्रा की याद, सिर पर लटकती हुई नंगी तलवार की भाँति उन्हें उद्विग्न कर रही थी। आखिर उनसे न रहा गया, पत्रा खोलकर पढ़ने लगे :

 

विनय, आज से कई मास पहले मैं तुम्हारी माता होने पर गर्व करती थी, पर आज तुम्हें पुत्रा कहते हुए लज्जा से गड़ी जाती हूँ। तुम क्या थे, क्या हो गए! और अगर यही दशा रही, तो अभी और न जाने, क्या हो जाओगे। अगर मैं जानती कि तुम इस भाँति मेरा सिर नीचा करोगे, तो आज तुम इस संसार में न होते। निर्दयी! इसीलिए तूने मेरी कोख में जन्म लिया था! इसीलिए मैंने तुझे अपना हृदय-रक्त पिला-पिलाकर पाला था! चित्राकार जब कोई चित्रा बनाते-बनाते देखता है कि इससे मेरे मन के भाव व्यक्त नहीं होते, तो वह तुरंत उसे मिटा देता है। उसी भाँति मैं तुझे भी मिटा देना चाहती हूँ। मैंने ही तुम्हें रचा है। मैंने ही तुम्हें यह देह प्रदान की है। आत्मा कहीं से आई हो, देह मेरी है। मैं उसे तुमसे वापस माँगती हूँ। अगर तुममें अब भी कुछ आत्मसम्मान है, तो मेरी अमानत मुझे लौटा दो। तुम्हें जीवित देखकर मुझे दु:ख होता है। जिस काँटे से हृदय-वेदना हो रही है, उसे निकाल सकूँ, तो क्यों न निकाल दूँ! क्या तुम यह मेरी अंतिम अभिलाषा पूरी करोगे या अन्य अभिलाषाओं की भाँति इसे भी धाूल में मिला दोगे? मैं अब भी तुम्हें इतना लज्जा-शून्य नहीं समझती, नहीं तो मैं स्वयं आती और तुम्हारे मर्मस्थल से वह वस्तु निकाल लेती, जो तुम्हारी कुमति का मूल है। क्या तुम्हेंं मालूम नहीं कि संसार में कोई ऐसी वस्तु भी है, जो संतान से भी अधिाक प्रिय होती है? वह आत्मगौरव है। अगर तुम्हारे-जैसे मेरे सौ पुत्रा होते, तो मैं उन सबों को उसकी रक्षा के लिए बलिदान कर देती। तुम समझते होगे, मैं क्रोधा से बावली हो गई हूँ। यह क्रोधा नहीं है, अपनी आत्मवेदना का रोदन है। जिस माता की लेखनी से ऐसे निर्दय शब्द निकलें, उसके शोक, नैराश्य और लज्जा का अनुमान तुम-जैसे दुर्बल प्राणी नहीं कर सकते। अब मैं और कुछ न लिखूँगी। तुम्हें समझाना व्यर्थ है। जब उम्र-भर की शिक्षा निष्फल हो गई, तो एक पत्रा की शिक्षा का क्या फल होगा! अब केवल दो इच्छाएँ हैं-ईश्वर से तो यह कि तुम-जैसी संतान सातवें वैरी को भी न दें, और तुमसे यह कि अपने जीवन की क्रूर लीला को समाप्त करो।

 

विनय यह पत्रा पढ़कर रोए नहीं, क्रुध्द नहीं हुए, ग्लानित भी नहीं हुए। उनके नेत्रा गर्वोत्तोजना से चमक उठे, मुख-मंडल पर आरक्त तेज की आभा दिखाई दी, जैसी किसी कवीश्वर के मुख से अपने पूर्वजों की वीरगाथा सुनकर मनचले राजपूत का मुख तमतमा उठे-माता, तुम्हें धान्य है। स्वर्ग में बैठी हुई वीर राजपूतानियाेंं की वीर आत्माएँ तुम्हारी आदर्शवादिता पर गर्व करती होंगी। मैंने अब तक तुम्हारी अलौकिक वीरता का परिचय न पाया था। तुमने भारत की विदुषियों का मस्तक उन्नत कर दिया। देवी! मैं स्वयं अपने को तुम्हारा पुत्रा कहते हुए लज्जित हूँ! हा, मैं तुम्हारा पुत्रा कहलाने योग्य नहीं हूँ। तुम्हारे फ्ै+सले के आगे सिर झुकाता हूँ। अगर मेरे पास सौ जानें होतीं, तो न सबों को तुम्हारे आत्मगौरव की रक्षा के लिए बलिदान कर देता। अभी इतना निर्लज्ज नहीं हुआ हूँ। लेकिन यों नहीं। मैं तुम्हें इतना संतोष देना चाहता हूँ कि तुम्हारा पुत्रा जीना नहीं जानता, पर मरना जानता है। अब विलम्ब क्यों? जीवन में जो कुछ न करना था, वह सब कर चुका। उसके अंत का इससे उत्ताम और कौन अवसर मिलेगा? यह मस्तक केवल एक बार तुम्हारे चरणाेंं पर तड़पेगा। सम्भव है, अंतिम समय तुम्हारा पवित्रा आशीर्वाद पा जाऊँ। शायद तुम्हारे मुख से ये पावन शब्द निकल जाएँ कि ‘मुझे तुझसे ऐसी ही आशा थी, तूने जीना न जाना, लेकिन मरना जानता है।’ यदि अंत समय भी तुम्हारे मुख से ‘प्रिय पुत्रा’, ये दो शब्द सुन सका, तो मेरी आत्मा शांत हो जाएगी, और नरक में भी सुख का अनुभव करेगी। काश! ईश्वर ने पर दिए होते, तो उड़कर तुम्हारे पास पहुँच जाता।

 

विनय ने बाहर की तरफ देखा। सूर्यदेव किसी लज्जित प्राणी की भाँति अपना कांतिहीन मुख पर्वतों की आड़ में छिपा चुके थे। नायकराम पल्थी मारे भंग घोट रहे थे। यह काम वह सेवकों से नहीं लेते थे। कहते-यह भी एक विद्या है, कोई हल्दी-मसाला तो है नहीं कि जो चाहे, पीस दे। इसमें बुध्दि खर्च करनी पड़ती है, तब जाकर बूटी बनती है। कल नागा भी हो गया। तन्मय होकर भंग पीसते और रामायण की दो-चार चौपाइयाँ, जो याद थीं, लय से गाते जाते थे। इतने में विनय ने बुलाया।

 

नायकराम-क्या है भैया? आज मजेदार बूटी बन रही है। तुमने कभी काहे को पी होगी। आज थोड़ी-सी ले लेना, सारी थकावट भाग जाएगी।

 

विनय-अच्छा, इस वक्त बूटी रहने दो। अम्माँजी का पत्रा आया है, घर चलना है, एक ताँगा ठीक कर लो।

 

नायकराम-भैया, तुम्हारे तो सब काम उतावली के होते हैं। घर चलना है, तो कल आराम से चलेंगे। बूटी छानकर रसोई बनाता हूँ। तुमने बहुत कशमीरी रसोइयों का बनाया हुआ खाना खाया होगा, आज जरा मेरे हाथ के भोजन का भी स्वाद लो।

 

विनय-अब घर पहुँचकर ही तुम्हारे हाथ के भोजन का स्वाद लूँगा।

 

नायकराम-माताजी ने बुलाया होगा?

 

विनय-हाँ, बहुत जल्द।

 

नायकराम-अच्छा, बूटी तो तैयार हो जाए। गाड़ी तो नौ बजे रात को जाती है।

 

विनय-नौ बजने में देर नहीं है। सात तो बज ही गए होंगे।

 

नायकराम-जब तक असबाब बँधावाओ, मैं जल्दी से बनाए लेता हूँ। तकदीर में इतना सुख भी नहीं लिखा है कि निश्ंचित होकर बूटी तो बनाता।

 

विनय-असबाब कुछ नहीं जाएगा। मैं घर से कोई असबाब लेकर नहीं आया था। यहाँ से चलते समय घर की क्ुं+जी सरदार साहब को दे देनी होगी।

 

नायकराम-और यह सारा असबाब?

 

विनय-कह दिया कि मैं कुछ न ले जाऊँगा।

 

नायकराम-भैया, तुम कुछ न लो, पर मैं तो यह दुशाला और यह संदूक जरूर लूँगा। जिधार से दुशाला ओढ़कर निकल जाऊँगा, देखनेवाले लोट जाएँगे।

 

विनय-ऐसी घातक वस्तु लेकर क्या करोगे, जिसे देखकर ही सुथराव हो जाए। यहाँ की कोई चीज मत छूना, जाओ।

 

नायकराम भाग्य को कोसते हुए घर से निकले, तो घंटे-भर तक गाड़ी का किराया ठीक करते रहे। आखिर जब यह जटिल समस्या किसी विधिा न हल हुई, तो एक को जबरदस्ती पकड़ लाया। ताँगेवाला भुनभुनाता हुआ आया-सब हाकिम-ही-हाकिम तो हैं, मुदा जानवर के पेट को भी तो कुछ मिलना चाहिए; कोई माई का लाल यह नहीं सोचता कि दिन-भर तो बेगार में मरेगा, क्या आप खाएगा, क्या जानवर को खिलाएगा, क्या बाल-बच्चों को देगा। उस पर निखरनामा लिखकर गली-गली लटका दिया। बस, ताँगेवाले ही सबको लूटे खाते हैं, और तो जितने अमले-मुलाजिम हैं, सब दूधा के धाोए हुए हैं। वकचा ढो ले, भीख माँग खाए, मगर ताँगा कभी न चलाए।

 

ज्यों ही ताँगा द्वार पर आया, विनय आकर बैठ गए, लेकिन नायकराम अपनी अधाघुटी बूटी क्योंकर छोड़ते? जल्दी-जल्दी रगड़ी, छानकर पी, तमाखू खाई, आईना के सामने खड़े होकर पगड़ी बाँधाी, आदमियों को राम-राम कहा और दुशाले को सचेष्ट नेत्राों से ताकते हुए बाहर निकले। ताँगा चला। सरदार साहब का घर रास्ते ही में था। वहाँ जाकर नायकराम ने क्ुं+जी उनके द्वारपाल के हवाले की और आठ बजते-बजते स्टेशन पर पहुँच गए। नायकराम ने सोचा, राह में तो कुछ खाने को मिलेगा नहीं, और गाड़ी पर भोजन करेंगे कैसे, दौड़कर पूरियाँ लीं,पानी लाए और खाने बैठ गए। विनय ने कहा, मुझे अभी इच्छा नहीं है। वह खड़े गाड़ियों की समय-सूची देख रहे थे कि यह गाड़ी अजमेर कब पहुँचेगी, दिल्ली में कौन-सी गाड़ी मिलेगी। सहसा क्या देखते हैं कि एक बुढ़ियार् आत्तानाद करते हुए चली आ रही है। दो-तीन आदमी उसे सँभाले हुए हैं। वह विनयसिंह के समीप आकर बैठ गई। विनय ने पूछा, तो मालूम हुआ कि इसका पुत्रा जसवंतनगर की जेल का दारोगा था,उसे दिन-दहाड़े किसी ने मार डाला। अभी समाचार आया है, और यह बेचारी शोकातुरा माता यहाँ से जसवंतनगर जा रही है। मोटरवाले किराया बहुत माँगते थे, इसलिए रेलगाड़ी से जाती है। रास्ते में उतरकर बैलगाड़ी कर लेगी। एक ही पुत्रा था; बेचारी को बेटे का मुँह देखना भी न बदा था।

 

विनयसिंह को बड़ा दु:ख हुआ-दारोगा बड़ा सीधाा-सादा आदमी था। कैदियों पर बड़ी दया किया करता था। उसके किसी को क्या दुश्मनी हो सकती थी? उन्हें तुरंत संदेह हुआ कि यह भी वीरपालसिंह के अनुयायियों की क्रूर लीला है। सोफी ने कोरी धामकी न दी थी। मालूम होता है, उसने गुप्त हत्याओं के साधान एकत्रा कर लिए हैं। भगवान्, मेरे दुष्कृत्यों का क्षेत्रा कितना विकसित है! इन हत्याओं का अपराधा मेरी गर्दन पर है, सोफी की गर्दन पर नहीं। सोफिया जैसी करुणामयी विवेकशीला, धार्मनिष्ठ रमणी मेरी ही दुर्बलता से प्रेरित होकर हत्या-मार्ग पर अग्रसर हुई है। ईश्वर! क्या अभी मेरी यातनाओं की मात्राा पूरी नहीं हुई? मैं फिर सोफ़िया के पास जाऊँगा और उसके चरणों पर सिर रखकर विनीत भाव से कहँगा-देवी! मैं अपने किए का दंड पा चुका, अब यह लीला समाप्त कर दो, अन्यथा यहीं तुम्हारे सामने प्राण त्याग दूँगा! लेकिन सोफी को पाऊँ कहाँ? कौन मुझे उस दुर्गम दुर्ग तक ले जाएगा।

 

जब गाड़ी आई, तो विनय ने वृध्दा को अपनी ही गाड़ी में बैठाया। नायकराम दूसरी गाड़ी में बैठे, क्योंकि विनय के सामने उन्हें मुसाफिरों से चुहल करने का मौका न मिलता। गाड़ी चली। आज पुलिस के सिपाही प्रत्येक स्टेशन पर टहलते हुए नजर आते थे। दरबार ने मुसाफिरों की रक्षा के लिए यह विशेष प्रबंधा किया था। किसी स्टेशन पर मुसाफिर सवार होते न नजर आते थे। विद्रोहियों ने कई जागीरदारों को लूट लिया था।

 

पाँचवें स्टेशन से थोड़ी ही दूर पर एकाएक गाड़ी रुक गई। वहाँ कोई स्टेशन न था। लाइन के नीचे कई आदमियों की बातचीत सुनाई दी। फिर किसी ने विनय के कमरे का द्वार खोला। विनय ने पहले तो आगंतुक को रोकना चाहा, गाड़ी में बैठते ही उनका साम्यवाद स्वार्थ का रूप धाारण कर लेता था। यह भी संदेह हुआ कि डाकू न हों, लेकिन निकट से देखा, तो किसी स्त्राी के हाथ थे, अलग हट गए, और एक क्षण में एक स्त्राी गाड़ी पर चढ़ आई। विनय देखते ही पहचान गए, वह मिस सोफ़िया थी। उसके बैठते ही गाड़ी फिर चलने लगी।

 

सोफ़िया ने गाड़ी में आते ही विनय को देखा, तो चेहरे का रंग उड़ गया। जी में आया, गाड़ी से उतर जाऊँ। पर वह चल चुकी थी। एक क्षण तक वह हतबुध्दि-सी खड़ी रही, विनय के सामने उसकी ऑंखें न उठती थीं, तब उसी वृध्दा के पास बैठ गई और खिड़की की ओर ताकने लगी। थोड़ी देर तक दोनों मौन बैठे रहे, किसी को बात करने की हिम्मत न पड़ती थी।

 

वृध्दा ने सोफी से पूछा-कहाँ जाओगी बेटी?

 

सोफ़िया-बड़ी दूर जाना है।

 

वृध्दा-यहाँ कहाँ से आ रही हो?

 

सोफ़िया-यहाँ से थोड़ी दूर एक गाँव है, वहीं से आती हूँ।

 

वृध्दा-तुमने गाड़ी खड़ी करा दी थी क्या?

 

सोफ़िया-स्टेशनों पर आजकल डाके पड़ रहे हैं। इसी से बीच मेंं गाड़ी रुकवा दी।

 

वृध्दा-तुम्हारे साथ और कोई नहीं है क्या? अकेले कैसे जाओगी?

 

सोफिया-आदमी न हो, ईश्वर तो है!

 

वृध्दा-ईश्वर है कि नहीं, कौन जाने। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि संसार का करता-धारता कोई नहीं है, तभी तो दिन-दहाड़े डाके पड़ते हैं, खून होते हैं। कल मेरे बेटे को डाकुओं ने मार डाला। (रोकर) गऊ था, गऊ। कभी मुझे जवाब नहीं दिया। जेल के कैदी उसको असीस दिया करते थे। कभी भलेमानस को नहीं सताया। उस पर यह वज्र गिरा, तो कैसे कहूँ कि ईश्वर है।

 

सोफ़िया-क्या जसवंतनगर के जेलर आपके बेटे थे?

 

वृध्दा-हाँ बेटी, यही एक लड़का था, सो भगवान् ने हर लिया।

 

यह कहकर वृध्दा सिसकने लगी। सोफ़िया का मुख किसी मरणासन्न रोगी के मुख की भाँति निष्प्रभ हो गया। जरा देर तक वह करुणा के आवेश को दबाए हुए खड़ी रही। तब खिड़की के बाहर सिर निकालकर फूट-फूटकर रोने लगी। उसका कुत्सित प्रतिकार नग्न रूप में उसके सामने खड़ा था।

 

सोफी आधा घंटे तक मुँह छिपाए रोती रही, यहाँ तक कि वह स्टेशन आ गया जहाँ वृध्दा उतरना चाहती थी। जब वह उतरने लगी, तो विनय ने उसका असबाब उतारा और उसे सांत्वना देकर बिदा किया।

 

अभी विनय गाड़ी में बैठे भी न थे कि सोफी नीचे आकर वृध्दा के सम्मुख खड़ी हो गई और बोली-माता, तुम्हारे पुत्रा की हत्या करनेवाली मैं हूँ। जो दंड चाहो, दो! तुम्हारे सामने खड़ी हूँ।

 

वृध्दा ने विस्मित होकर कहा-क्या तू ही वह पिशाचिनी है, जिसने दरबार से लड़ने के लिए डाकुओं को जमा किया है? नहीं, तू नहीं हो सकती। तू तो मुझे करुणा और दया की मूर्ति-सी दीखती है।

 

सोफी-हाँ, माता, मैं वही पिशाचिनी हूँ।

 

वृध्दा-जैसा तूने किया वैसा तेरे आगे आएगा। मैं तुझे और क्या कहूँ। मेरी भाँति तेरे भी दिन रोते बीतें।

 

एंजिन ने सीटी दी। सोफी संज्ञा-शून्य-सी खड़ी रही। वहाँ से हिली तक नहीं। गाड़ी चल पड़ी। सोफी अब भी वहीं खड़ी थी। सहसा विनय गाड़ी से कूद पड़े, सोफ़िया का हाथ पकड़कर गाड़ी में बैठा दिया और बड़ी मुश्किल से आप भी गाड़ी में चढ़ गए। एक पलक भी विलम्ब होता,तो वहीं रह जाते।

 

सोफ़िया ने ग्लानि-भाव से कहा-विनय, तुम मेरा विश्वास करो या न करो; पर मैं सत्य कहती हूँ कि मैंने वीरपाल को एक हत्या की भी अनुमति नहीं दी। मैं उसकी घातक प्रवृत्तिा को रोकने का यथाशक्ति प्रयत्न करती रही; पर यह दल इस प्रत्याघात की धाुन में उन्मत्ता हो रहा है। किसी ने मेरी न सुनी। यही कारण है कि मैं अब यहाँ से जा रही हूँ। मैंने उसे रात को अमर्ष की दशा में तुमसे न जाने क्या-क्या बातें कीं, लेकिन ईश्वर ही जानते हैं, इसका मुझे कितना खेद और दु:ख है। शांत मन से विचार करने पर मुझे मालूम हो रहा है कि निरंतर दूसरों को मारने और दूसरों के हाथाें मारे जाने के लिए आपत्काल में ही हम तत्पर हो सकते हैं। यह दशा स्थायी नहीं हो सकती। मनुष्य स्वभावत: शांतिप्रिय होता है। फिर जब सरकार की दमननीति ने निर्बल प्रजा को प्रत्याघात पर आमादा कर दिया, तो क्या सबल सरकार और भी कठोर नीति का अवलम्बन न करेगी? लेकिन मैं तुमसे ऐसी बातें कर रही हूँ, मानो तुम घर के आदमी हो। मैं भूल गई थी कि तुम राजभक्तों के दल में हो। पर इतनी दया करना कि मुझे पुलिस के हवाले न कर देना। पुलिस से बचने के लिए ही मैंने रास्ते में गाड़ी को रोककर सवार होने की व्यवस्था की। मुझे संशय है कि इस समय भी तुम मेरी ही तलाश में हो।

 

विनयसिंह की ऑंखें सजल हो गईं। खिन्न स्वर में बोले-सोफ़िया, तुम्हें अख्यितार है मुझे जितना नीच और पतित चाहो, समझो; मगर एक दिन आएगा, जब तुम्हें इन वाक्यों पर पछताना पड़ेगा और तुम समझोगी कि तुमने मेरे ऊपर कितना अन्याय किया है। लेकिन जरा शांत मन से विचार करो, क्या घर पर, यहाँ आने के पहले, मेरे पकड़े जाने की खबर पाकर तुमने भी वही नीति न धाारण की थी? अंतर केवल इतना था कि मैंने दूसरों को बरबाद किया, तुम अपने ही को बरबाद करने पर तैयार हो गईं। मैंने तुम्हारी नीति को क्षम्य समझा, वह आपध्दर्म था। तुमने मेरी नीति को अम्य समझा और कठोर-से-कठोर आघात जो तुम कर सकती थीं, वह कर बैठीं। किंतु बात एक ही है! तुम्हें मुझको पुलिस की सहायता करते देखकर इतना शोकमय आश्चर्य न हुआ होगा, जितना मुझको तुम्हें मिस्टर क्लार्क के साथ देखकर हुआ। इस समय भी तुम उसी प्रतिहिंसक नीति का अवलम्बन कर रही हो, या कम-से-कम मुझसे कर चुकी हो। इतने पर भी तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती। तुम्हारी झिड़कियाँ सुनकर मुझे जितना मानसिक कष्ट हुआ और हो रहा है, वही मेरे लिए असाधय था। उस पर तुमने इस समय और भी नमक छिड़क दिया। कभी तुम इस निर्दयता पर खून के ऑंसू बहाओगी। खैर।

 

यह कहते-कहते विनय का गला भर आया। फिर वह और कुछ न कह सके।

 

सोफ़िया ने ऑंखों में असीम अनुराग भरकर कहा-आओ, अब हमारी-तुम्हारी मैत्राी हो जाए। मेरी उन बातों को क्षमा कर दो।

 

विनय ने कंठ-स्वर को सँभालकर कहा-मैं कुछ कहता हूँ? अगर जी न भरा हो, तो और जो चाहो, कह डालो। जब बुरे दिन आते हैं, तो कोई साथी नहीं होता। तुम्हारे यहाँ से आकर मैंने कैदियों को मुक्त करने के लिए अधिाकारियों से, मिस्टर क्लार्क से, यहाँ तक कि महाराजा साहब से जितनी अनुनय-विनय की, वह मेरा ही दिल जानता है। पर किसी ने मेरी बातें तक न सुनीं। चारों तरफ से निराश होना पड़ा।

 

सोफी-यह तो मैं जानती थी। इस वक्त कहाँ जा रहे हो?

 

विनय-जहन्नुम में।

 

सोफी-मुझे भी लेते चलो।

 

विनय-तुम्हारे लिए स्वर्ग है।

 

एक क्षण बाद फिर बोले-घर जा रहा हूँ। अम्माँजी ने बुलाया है। मुझे देखने के लिए उत्सुक हैं।

 

सोफ़िया-इंद्रदत्ता तो कहते थे, तुमसे बहुत नाराज हैं?

 

विनय ने जेब से रानीजी का पत्रा निकालकर सोफी को दे दिया और दूसरी ओर ताकने लगे। कदाचित् वह सोच रहे थे कि यह तो मुझसे इतनी खिंच रही है, और मैं बरबस इसकी ओर दौड़ा जाता हूँ। सहसा सोफ़िया ने पत्रा फाड़कर खिड़की के बाहर फेंक दिया और प्रेमविह्नल होकर बोली-मैं तुम्हें न जाने दूँगी। ईश्वर जानता है, न जाने दूँगी। तुम्हारे बदले मैं स्वयं रानीजी के पास जाऊँगी और उनसे कहूँगी, तुम्हारी अपराधिानी मैं हूँ…यह कहते-कहते उसकी आवाज फँस गई। उसने विनय के कंधो पर सिर रख दिया और फूट-फूटकर रोने लगी। आवाज हल्की हुई, तो फिर बोली-मुझसे वादा करो न कि न जाऊँगा। तुम नहीं जा सकते। धार्म और न्याय से नहीं जा सकते। बोलो, वादा करते हो?

 

उन सजल नेत्राों में कितनी करुणा, कितनी याचना, कितनी विनय, कितना आग्रह था!

 

विनय ने कहा-नहीं सोफी, मुझे जाने दो। तुम माताजी को खूब जानती हो। मैं न जाऊँगा, तो वह अपने दिल में मुझे निर्लज्ज, बेहया,कायर समझने लगेंगी और इस उद्विग्नता की दशा में न जाने क्या कर बैठें।

 

सोफिया-नहीं विनय, मुझ पर इतना जुल्म न करो। ईश्वर के लिए दया करो। मैं रानीजी के पास जाकर रोऊँगी, उनके पैरों पर गिरूँगी और उनके मन में तुम्हारे प्रति जो गुबार भरा हुआ है, उसे अपने ऑंसुओं से धाो दूँगी। मुझे दावा है कि मैं उनके पुत्रावात्सल्य को जागृत कर दूँगी। मैं उनके स्वभाव से परिचित हूँ। उनका हृदय दया का आगार है। जिस वक्त मैं उनके चरणों पर गिरकर कहूँगी, अम्माँ, तुम्हारा बेटा मेरा मालिक है, मेरे नाते उसे क्षमा कर दो, उस वक्त वह मुझे पैरों से ठुकराएँगी नहीं। वहाँ से झल्लाई हुई उठकर चली जाएँगी, लेकिन एक क्षण बाद मुझे बुलाएँगी और प्रेम से गले लगाएँगी। मैं उनसे तुम्हारी प्राण-भिक्षा माँगूँगी, फिर तुम्हें माँग लूँगी। माँ का हृदय कभी इतना कठोर नहीं हो सकता। वह यह पत्रा लिखकर शायद इस समय पछता रही होंगी, मना रही होंगी कि पत्रा न पहुँचा हो। बोलो, वादा करो।

 

ऐसे प्रेम से सने, अनुराग में डूबे वाक्य विनय के कानों ने कभी न सुने थे, उन्हें अपना जीवन सार्थक मालूम होने लगा। आह! सोफी अब भी मुझे चाहती है, उसने मुझे क्षमा कर दिया। वह जीवन, तो पहले मरुभूमि के समान निर्जन, निर्जल, निर्जीव था, अब पशु-पक्षियों,सलिल-धााराओं और पुष्प-लतादि से लहराने लगा। आनंद के कपाट खुल गए थे और उसके अंदर से मधाुर गान की तानें, विद्युद्दीपों की झलक, सुगंधिात वायु की लपट बाहर आकर चित्ता को अनुरक्त करने लगी। विनयसिंह को इस सुरम्य दृश्य ने मोहित कर लिया। जीवन के सुख जीवन के दु:ख हैं। विराग और आत्मग्लानि ही जीवन के रत्न हैं। हमारी पवित्रा कामनाएँ, हमारी निर्मल सेवाएँ, हमारी शुभ कल्पनाएँ विपत्तिा ही की भूमि में अंकुरित और पल्लवित होती हैं।

 

विनय ने विचलित होकर कहा-सोफी, अम्माँजी के पास एक बार मुझे जाने दो। मैं वादा करता हूँ कि जब तक वह फिर स्पष्ट रूप से न कहेंगी…

 

सोफ़िया ने विनय की गर्दन में बाँहें डालकर कहा-नहीं-नहीं, मुझे तुम्हारे ऊपर भरोसा नहीं। तुम अकेले अपनी रक्षा नहीं कर सकते। तुममें साहस है, आत्माभिमान है, शील है, सब कुछ है, पर धौर्य नहीं। पहले मैं अपने लिए तुम्हें आवश्यक समझती थी, अब तुम्हारे लिए अपने को आवश्यक समझती हूँ। विनय, जमीन की तरफ क्यों ताकते हो? मेरी ओर देखो। मैंने जो तुम्हें कटु वाक्य कहे, उन पर लज्जित हूँ। ईश्वर साक्षी है, सच्चे दिल से पश्चात्तााप करती हूँ। उन बातों को भूल जाओ। प्रेम जितना ही आदर्शवादी होता है, उतना ही क्षमाशील भी। बोलो, वादा करो। अगर तुम मुझसे गला छुड़ाकर चले जाओगे, तो फिर…तुम्हें सोफी फिर न मिलेगी।

 

विनय ने प्रेम-पुलकित होकर कहा-तुम्हारी इच्छा है, तो न जाऊँगा।

 

सोफी-तो हम अगले स्टेशन पर उतर पड़ेंगे।

 

विनय-नहीं पहले बनारस चलें। तुम अम्माँजी के पास जाना। अगर वह मुझे क्षमा कर देंगी…

 

सोफी-विनय, अभी बनारस मत चलो। कुछ दिन चित्ता को शांत होने दो, कुछ दिन मन को विश्राम लेने दो। फिर रानीजी का तुम पर क्या अधिाकार है? तुम मेरे हो, समस्त नीतियों के अनुसार, जो ईश्वर ने और मनुष्य ने रची हैं, तुम मेरे हो। मैं रिआयत नहीं, अपना स्वत्व चाहती हूँ। हम अगले स्टेशन पर उतर पड़ेंगे। इसके बाद सोचेंगे, हमें क्या करना है, कहाँ जाना है।

 

विनय ने सकुचाते हुए कहा-जीवन का निर्वाह कैसे होगा? मेरे पास जो कुछ है, वह नायकराम के पास है। वह किसी दूसरे डब्बे में है। अगर उसे खबर हो गई, तो वह भी हमारे साथ चलेगा।

 

सोफी-इसकी क्या चिंता। नायकराम को जाने दो। प्रेम जंगलों में भी सुखी रह सकता है।

 

ऍंधोरी रात में गाड़ी शैल और शिविर को चीरती चली जाती थी। बाहर दौड़ती हुई पर्वत-मालाओं के सिवा और कुछ न दिखाई देता था। विनय तारों की दौड़ देख रहे थे, सोफ़िया देख रही थी कि आस-पास कोई गाँव है या नहीं।

 

इतने में स्टेशन नज़र आया। सोफी ने गाड़ी का द्वार खोल दिया और दोनों चुपके से उतर पड़े, जैसे चिड़ियों का जोड़ा घोंसले से दाने की खोज में उड़ जाए। उन्हें इसकी चिंता नहीं कि आगे ब्याधा भी है, हिंसक पक्षी भी हैं, किसान की गुलेल भी है। इस समय तो दोनों अपने विचारों में मग्न हैं, दाने से लहराते हुए खेतों की बहार देख रहे हैं। पर वहाँ तक पहुँचना भी उनके भाग्य में है, यह कोई नहीं जानता।

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