उपन्यास – प्रेमा – 1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

· October 19, 2013

Premchand_4_aसंध्या का समय है, डूबने वाले सूर्य की सुनहरी किरणें रंगीन शीशो की आड़ से, एक अंग्रेजी ढंग पर सजे हुए कमरे में झॉँक रही हैं जिससे सारा कमरा रंगीन हो रहा है। अंग्रेजी ढ़ंग की मनोहर तसवीरें, जो दीवारों से लटक रहीं है, इस समय रंगीन वस्त्र धारण करके और भी सुंदर मालूम होती है। कमरे के बीचोंबीच एक गोल मेज़ है जिसके चारों तरफ नर्म मखमली गद्दोकी रंगीन कुर्सियॉ बिछी हुई है। इनमें से एक कुर्सी पर एक युवा पुरूष सर नीचा किये हुए बैठा कुछ सोच रहा है। वह अति सुंदर और रूपवान पुरूष है जिस पर अंग्रेजी काट के कपड़े बहुत भले मालूम होते है। उसके सामने मेज पर एक कागज है जिसको वह बार-बार देखता है। उसके चेहरे से ऐसा विदित होता है कि इस समय वह किसी गहरे सोच में डूबा हुआ है। थोड़ी देर तक वह इसी तरह पहलू बदलता रहा, फिर वह एकाएक उठा और कमरे से बाहर निकलकर बरांडे में टहलने लगा, जिसमे मनोहर फूलों और पत्तों के गमले सजाकर धरे हुए थे। वह बरांडे से फिर कमरे में आया और कागज का टुकड़ा उठाकर बड़ी बेचैनी के साथ इधर-उधर टहलने लगा। समय बहुत सुहावना था। माली फूलों की क्यारियों में पानी दे रहा था। एक तरफ साईस घोड़े को टहला रहा था। समय और स्थान दोनो ही बहुत रमणीक थे। परन्तु वह अपने विचार में ऐसा लवलीन हो रहा था कि उसे इन बातों की बिलकुल सुधि न थी। हाँ, उसकी गर्दन आप ही आप हिलाती थी और हाथ भी आप ही आप इशारे करते थे-जैसे वह किसी से बातें कर रहा हो। इसी बीच में एक बाइसिकिल फाटक के अंदर आती हुई दिखायी दी और एक गोरा-चिटठा आदमी कोट पतलून पहने, ऐनक लगाये, सिगार पीता, जूते चरमर करता, उतर पड़ा और बोला, गुड ईवनिंग, अमृतराय।

अमृतराय ने चौंककर सर उठाया और बोले-ओ। आप है मिस्टर दाननाथ। आइए बैठिए। आप आज जलसे में न दिखायी दियें।

 

दाननाथ-कैसा जलसा। मुझे तो इसकी खबर भी नहीं।

 

अमृतराय-(आश्चर्य से) ऐं। आपको खबर ही नहीं। आज आगरा के लाला धनुषधारीलाल ने बहुत अच्छा व्याख्यान दिया और विरोधियो के दॉँत खटटे कर दिये।

 

दाननाथ-ईश्वर जानता है मुझे जरा भी खबर न थी, नहीं तो मैं अवश्य आता। मुझे तो लाला साहब के व्याख्यानों के सुनने का बहुत दिनों से शौंक है। मेरा अभाग्य था कि ऐसा अच्छा समय हाथ से निकल गया। किस बात पर व्याख्यान था?

 

अमृतराय-जाति की उन्नति के सिवा दूसरी कौन-सी बात हो सकती थी? लाला साहब ने अपना जीवन इसी काम के हेतु अर्पण कर दिया है। आज ऐसा सच्चा देशभक्त और निष्कास जाति-सेवक इस देश में नहीं है। यह दूसरी बात है कि कोई उनके सिद्वांतो को माने या न माने, मगर उनके व्याख्यानों में ऐसा जादू होता है कि लोग आप ही आप खिंचे चले आते है। मैंने लाला साहब के व्याख्यानों के सुनने का आनंद कई बार प्राप्त किया है। मगर आज की स्पीच में तो बात ही और थी। ऐसा जान पड़ता है कि उनकी ज़बान में जादू भरा है। शब्द वही होते है जो हम रोज़ काम में लाया करते है। विचार भी वही होते है जिनकी हमारे यहाँ प्रतिदिन चर्चा रहती है। मगर उनके बोलने का ढंग कुछ ऐसा अपूर्व है कि दिलों को लुभा लेता है।

 

दाननाथ को ऐसी उत्तम स्पीच को न सुनने का अत्यंत शोक हुआ। बोले-यार, मैं जंम का अभागा हूँ। क्या अब फिर कोई व्याख्यान न होगा?

 

अमृतराय-आशा तो नहीं हैं क्योंकि लाला साहब लखनऊ जा रहे है, उधर से आगरा को चले जाएंगे। फिर नहीं मालूम कब दर्शन दें।

 

दाननाथ-अपने कर्म की हीनता की क्या कहूँ। आपने उसस्पीच कीकोई नकल की हो तो जरा दीजिए। उसी को देखकर जी को ढारस दूँ।

 

इस पर अमृतराय ने वही कागज का टुकड़ा जिसको वे बार-बार पढ़ रहे थे दाननाथ के हाथ में रख दिया और बोले-स्पीच के बीच-बीच में जो बाते मुझको सवार हो जाती है तो आगा-पीछा कुछ नहीं सोचते, समझाने लगे-मित्र, तुम कैसी लड़कपन की बातें करते हो। तुमको शायद अभी मालूम नहीं कि तुम कैसा भारी बोझ अपने सर पर ले रहे हो। जो रास्ता अभी तुमको साफ दिखायी दे रहा है वह कॉँटो से ऐसा भरा है कि एक-एक पग धरना कठिन है।

 

अमृतराय-अब तो जो होना हो सो हो। जो बात दिल में जम गयी वह तम गयीं। मैं खूबजानता हूं कि मुझको बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। मगर आज मेरा हिसाब ऐसा बढ़ा हुआ हैं कि मैं बड़े से बड़ा काम कर सकता हूं और ऊँचे से ऊँचे पहाड़ पर चढ़ सकता हूँ।

 

दाननाथ-ईश्वर आपके उत्साह को सदा बढ़ावे। मैं जानता हूँ कि आप जिस काम के लिए उद्योग करेगें उसे अवश्य पूरा कर दिखायेगें। मैं आपके इरादों में विध्न डालना कदापि नहीं चाहता। मगर मनुष्य का धर्म हैं कि जिस काम में हाथ लगावे पहले उसका ऊँच-नीच खूब विचार ले। अब प्रच्छन बातों से हटकर प्रत्यक्ष बातों की तरफा आइए। आप जानते हैकि इस शहर के लोग, सब के सब,पुरानी लकीर के फकीर है। मुझे भय है कि सामाजिक सुधार का बीज यहाँ कदापि फल-फुल न सकेगा। और फिर, आपका सहायक भी कोई नजर नहीं आता। अकेले आप क्या बना लेंगे। शायद आपके दोस्त भी इस जोखिम के काम में आपका हाथ न बँटा सके। चाहे आपको बुरा लगे, मगर मैं यह जरूर कहूँगा कि अकेले आप कुछ भी न कर सकेंगे।

 

अमृतराय ने अपने परम मित्र की बातों को सुनकर सा उठाया और बड़ी गंभीरता से बोले-दाननाथ। यह तुमको क्या हो गया है। क्या मै तुम्हारे मुँह से ऐसी बोदेपन की बातें सुन रहा हूं। तुम कहते हो अकेले क्या बना लोगे? अकेले आदमियों की कारगुजारियों से इतिहास भरे पड़े हैं। गौतम बुद्व कौन था? एक जंगल का बसनेवाला साधु, जिसका सारे देश में कोई मददगार न था। मगर उसके जीवन ही में आधा हिन्दोस्तान उसके पैरों पर सर धर चुका था। आपको कितने प्रमाण दूँ। अकेले आदमियों से कौमों के नाम चल रहे है। कौमें मर गयी है। आज उनका निशान भी बाकी नहीं। मगर अकेले आदमियों के नाम अभी तक जिंदा है। आप जानते हैं कि प्लेटों एक अमर नाम है। मगर आपमें कितने ऐसे हैं जो यह जानते हों कि वह किस देश का रहने वाला है।

 

दाननाथ समझदार आदमी थे। समझ गये कि अभी जोश नया है और समझाना बुझाना सब व्यर्थ होगा। मगर फिर भी जी न माना। एक बार और उलझना आवश्यक ‘अच्छी जान पड़ी मैने उनको तुरंत नकल कर लिया। ऐसी जल्दी में लिखा है कि मेरे सिवा कोई दूसरा पढ़ भी न सकेगा। देखिए हमारी लापरवाही को कैसा आड़े हाथों लिया है:

 

सज्जनों। हमारी इस दुर्दशा का कारण हमारी लापरवाही हैं। हमारी दशा उस रोगी की-सी हो रही है जो औषधि को हाथ में लेकर देखता है मगर मुँह तक नहीं ले जाता। हाँ भाइयो। हम आँखे रचाते है मगर अंधे है, हम कान रखते है मगर बहरें है, हम जबान रखते है मगर गूँगे हैं। परंतु अब वह दिन नहीं रहे कि हमको अपनी जीत की बुराइयाँ न दिखायी देती हो। हम उनको देखते है और मन मे उनसे घृणा भी करते है। मगर जब कोई समय आ जाता है तो हम उसी पुरानी लकीर पर जाते है और नर्अ बातों को असंभव और अनहोनी समझकर छोड़ देते है। हमारे डोंगे का पार लगाना, जब कि मल्लाह ऐसे बाद और कादर है, कठिन ही नहीं प्रत्युत दुस्साध्य है।

 

अमृतराय ने बड़े ऊँचे स्वरों में उस कागज को पढ़ा। जब वह चुप हुए तो दाननाथ ने कहा-नि:संदेह बहुत ठीक कहा है। हमारी दशा के अनुकूल ही है।

 

अमृतराय-मुझकों रह-रहकर अपने ऊपर क्रोध आता है कि मैंने सारी स्पीच क्यों न नकल कर ली। अगर कहीं अंग्रेजी स्पीच होती तो सबेरा होते ही सारे समाचारपत्रों में छप जाती। नहीं तो शायद कहीं खुलासा रिपोर्ट छपे तो छपे। (रूककर) तब मैं जलसे से लौटकर आया हूँ तब से बराबर वही शब्द मेरे कान में गूँज रहे है। प्यारे मित्र। तुम मेरे विचारों को पहले से जानते हो, आज की स्पीच ने उनको और भी मजबूत कर दिया है। आज से मेरी प्रतिज्ञा है कि मै अपने को जाति पर न्यौछावर कर दूँगा। तन, मन, धन सब अपनी गिरी हुई जाति की उन्नति के निमित्त अर्पण कर दूँगा। अब तक मेरे विचार मुझ ही तक थे पर अब वे प्रत्यक्ष होंगे। अब तक मेरा हदय दुर्बल था, मगर आज इसमें कई दिलों का बल आ गया है। मैं खूब जानता हूँ कि मै कोई उच्च-पदवी नहीं रखता हूं। मेरी जायदाद भी कुछ अधिक नहीं है। मगर मैं अपनी सारी जमा जथा अपने देश के उद्वार के लिए लगा दूँगा। अब इस प्रतिज्ञा से कोई मुझको डिगा नहीं सकता। (जोश से)ऐ थककर बैठी हुई कौम। ले, तेरी दुर्दशा पर आँसू बहानेवालों में एक दुखियारा और बढ़ा। इस बात का न्याय करना कि तुझको इस दुखियारे से कोई लाभ हागा या नहीं, समय पर छोड़ता हूँ।

 

यह कहकर अमृतराय जमीन की ओर देखने लगे। दाननाथ, जो उनके बचपन के साथी थे और उनके बचपन के साथी थे और उनके स्वभाव से भलीभॉँति परिचित थे कि जब उनको कोई धुन मालूम हुआ। बोले-अच्छा मैंने मान लिया कि अकेले लोगों ने बड़ेबड़े काम किये हैं और आप भी अपनी जाति का कुछ न कुछ भला कर लेंगे मगर यह तो सोचिये कि आप उन लोगों को कितना दुख पहुँचायेंगे जिनका आपसे कोई नाता है। प्रेमा से बहुत जल्द आपका विवाह होनेवाला है। आप जानते है कि उसके मॉँ-बाप परले सिरे के कटटर हिन्दू है। जब उनको आपकी अंग्रेजी पोशाक और खाने-पीने पर शिकायत है तो बतलाइए जब आप सामजिक सुधार पर कमर बांधेगे तब उनका क्या हाल होगा। शायद आपको प्रेमा से हाथ धोना पड़े।

 

दाननाथ का यह इशारा कलेजे में चुभ गया। दो-तीन मिनट तक वह सन्नाटे में जमीन की तरफ ताकते रहे। जब सर उठाया तो आँखे लाल थीं और उनमें आँसू डबडबाये थे। बोले-मित्र, कौम की भलाई करना साधारण काम नहीं है। यद्यपि पहले मैने इस विषय पर ध्यान न दिया था, फिर भी मेरा दिल इस वक्त ऐसा मजबूत हो रहा है कि जाति के लिए हर एक दुख भोगने को मै कटिबद्व हूँ। इसमें संदेह नहीं कि प्रेमा से मुझको बहुत ही प्रेम था। मैं उस पर जान देता था और अगर कोई समय ऐसा आता कि मुझको उसका पति बनने का आनंद मिलता तो मैं साबित करता कि प्रेम इसको कहते है। मगर अब प्रेमा की मोहनी मूरत मुझ पर अपना जादू नहीं चला सकती। जो देश और जाति के नाम पर बिक गया उसके दिल मे कोई दूसरी चीज जगह नहीं पा सकती। देखिए यह वह फोटो है जो अब तक बराबर मेरे सीने से लगा रहता था। आज इससे भी अलग होता हूं यह कहते-कहते तसवीर जेब से निकली और उसके पुरजे-पुरजे कर डाले, ‘प्रेमा को जब मालूम होगा कि अमृतराय अब जाति पर जान देने लगा, उसके दिन में अब किसी नवयौवना की जगह नही रही तो वह मुझे क्षमा कर देगी।

 

दाननाथ ने अपने दोस्त के हाथों से तसवीर छीन लेना चाही। मगर न पा सके। बोले-अमृतराय बड़े शोक की बात है कि तुमने उस सुन्दरी की तसवीर की यह दशा की जिसकी तुम खूब जानते हो कि तुम पर मोहित है। तुम कैसे निठुर हो। यह वही सुंदरी है जिससे शादी करने का तुम्हारे वैकुंठवासी पिता ने आग्रह किया था और तुमने खुद भी कई बार बात हारी। क्या तुम नहीं जानते कि विवाह का समय अब बहुत निकट आ गया है। ऐसे वक्त में तुम्हारा इस तरह मुँह मोड़ लेना उस बेचारी के लिए बहुत ही शोकदायक होगा।

 

इन बातों को सुनकर अमृतराय का चेहरा बहुत मलिन हो गया। शायद वे इस तरह तस्वीर के फाड़ देने का कुछ पछतावा करने लगे। मगर जिस बात पर अड़ गये थे उस पर अड़े ही रहे। इन्हीं बातों में सूर्य अस्त हो गया। अँधेरा छा गया। दाननाथ उठ खड़े हुए। अपनी बाइसिकिल सँभाली और चलते-चलते यह कहा-मिस्टर राय। खूब सोच लो। अभी कुछ नहीं बिंगड़ा है। आओ आज तुमको गंगा की सैर करा लाये। मैंने एक बजरा किराये पर ले रक्खा है। उस पर चॉँदनी रात में बड़ी बहार रहेगी।

 

अमृतराय-इस समय आप मुझको क्षमा कीजिए। फिर मिलूँगा।

 

दाननाथ तो यह बातचीत करके अपने मकान को रवाना हुए और अमृतराय उसी अँधेरे में, बड़ी देर तक चुपचाप खड़े रहे। वह नहीं मालूम क्या सोच रहे थे। जब अँधेरा अधिक हुआ तो वह जमीन पर बैठ गये। उन्होंने उस तसवीर के पुर्जे सब एक-एक करके चुन लिये। उनको बड़े प्यार से सीने में लगा लिया और कुछ सोचते हुए कमरे में चले गए।

 

बाबू अमृतराय शहर के प्रतिष्ठित रईसों में समझे जाते थे। वकालत का पेशा कई पुश्तों से चला आता था। खुद भी वकालत पास कर चुके थे। और यद्यपि वकालत अभी तक चमकी न थी, मगर बाप-दादे ने नाम ऐसा कमाया था कि शहर के बड़े-बड़े रईस भी उनका दाब मानते थे। अंग्रेजी कालिज मे इनकी शिक्षा हुई थी और यह अंग्रेजी सभ्यता के प्रेमी थे। जब तक बाप जीते थे तब तक कोट-पतलून पहनते तनिक डरते थे। मगर उनका देहांत होते ही खुल पड़े। ठीक नदी के समीप एक सुंदर स्थान पर कोठी बनवायी। उसको बहुत कुछ खर्च करके अंग्रेजी रीति पर सजाया। और अब उसी में रहते थे। ईश्वर की कृपा से किसी चीज कीकमी न थी। धन-द्रव्य, गाड़ी-घोड़े सभी मौजूद थे।

 

अमृतराय को किताबों से बहुत प्रेम था। मुमकिन न था कि नयी किताब प्रकाशित हो और उनके पास न आवे। उत्तम कलाओं से भी उनकी तबीयत को बहुत लगाव था। गान-विद्या पर तो वे जान देते थे। गो कि वकालत पास कर चुके थे मगर अभी वह विवाह नहीं हुआ था। उन्होने ठान लिया था कि जब वह वकालत खूब न चलने लगेगी तब तक विवाह न करूँगा। उस शहर के रईस लाला बदरीप्रसाद साहब उनको कईसाल से अपनी इकलौती लड़की प्रेमा के वास्ते, चुन बैठे थे। प्रेमा अति सुंदर लड़की थी और पढ़ने लिखने , सीने पिरोने में निपुण थी। अमृतराय के इशारे से उसको थोड़ी सही अंग्रेजी भी पढ़ा दी गयी थी जिसने उसके स्वभाव में थोड़ी-सी स्वतंत्रता पैदा कर दी थी। मुंशी जी ने बहुत कहने-सुनने से दोनो प्रेमियों को चिटठी पत्री लिखने की आज्ञा दे दी थी। और शायद आपस में तसवीरों की भी अदला-बदली हो गये थी।

 

बाबू दाननाथ अमृतराय के बचपन के साथियों में से थे। कालिज मे भी दोनों का साथ रहा। वकालत भी साथ पास की और दो मित्रों मे जैसी सच्ची प्रीति हो सकती है वह उनमे थी। कोई बात ऐसी न थी जो एक दूसरे के लिए उठा रखे। दाननाथ ने एक बार प्रेमा को महताबी पर खड़े देख लिया था। उसी वक्त से वह दिल में प्रेमा की पूजा किया करता था। मगर यह बात कभी उसकी जबान पर नहीं आयी। वह दिल ही दिल में घुटकर रह जाता। सैकड़ों बार उसकी स्वार्थ दृष्टि ने उसे उभारा था कि तू कोई चाल चलकर बदरीप्रसाद का मन अमृतराय से फेर दे, परंतु उसने हर बार इस कमीनेपन के ख्याल को दबाया था। वह स्वभाव का बहुत निर्मल और आचरण का बहुत शुद्व था। वह मर जाना पसंद करता मगर किसी को हानि पहुँचाकर अपना मनोरथ कदापि पूरा नहीं कर सकता था। यह भी न था कि वह केवल दिखाने के लिए अमृतराय से मेल रखता हो और दिल में उनसे जलता हो। वह उनके साथ सच्चे मित्र भाव का बर्ताव करता था।

 

आज भी, जब अमृतराय ने उससे अपने इरादे जाहिर किये तब उसेन सच्चे दिल से उनको समझाकर ऊँच नीच सुझाया। मगर इसका जो कुछ असर हुआ हम पहले दिखा चुके है। उसने साफ साफ कह दिया कि अगर तुम रिर्फामरों कीमंडली में मिलोगे तो प्रेमा से हाथ धोना पडेगा। मगर अमृतराय ने एक न सुनी। मित्र का जो धर्म है वह दाननाथ ने पूरा कर दिया। मगर जब उसने देखा कि यह अपने अनुष्ठान पर अड़े ही रहेगें तो उसको कोई वजह न मालूम हुई कि मैं यह सब बातें बदरी प्रसाद से बयान करके क्यों न प्रेमा का पति बनने का उद्योग करूँ। यहां से वह यही सब बातें सोचते विचारते घर पर आये। कोट-पतलून उतार दिया और सीधे सादे कपड़े पहिन मुंशी बदरीप्रसाद के मकान को रवाना हुए। इस वक्त उसके दिन की जो हालत हो रही थी, बयान नही की जा सकती। कभी यह विचार आता कि मेरा इस तरह जाना, लोगों को मुझसे नाराज न कर दे। मुझे लोग स्वार्थी न समझने लगें। फिर सोचता कि कहीं अमृतराय अपना इरादा पलट दें और आश्चर्य नहीं कि ऐसा ही हो, तो मैं कहीं मुँह दिखाने योग्य न रहूँगा। मगर यह सोचते सोचते जब प्रेमा की मोहनी मूरत आँख के सामने आ गयी। तब यह सब शंकाए दूर हो गयी। और वह बदरीप्रसाद के मकान पर बातें करते दिखायी दिये।

 

काशी के आर्य-मंदिर में पंडित अमरनाथ का व्याख्यान हो रहा था। श्रोता लोग मंत्रमुग्ध से बैठे सुन रहे थे। प्रोफेसर दाननाथ ने आगे खिसक कर अपने मित्र बाबू अमृतराय के कान में कहा – ‘रटी हुई स्पीच है।’ अमृतराय स्पीच सुनने में तल्लीन थे। कुछ जवाब न दिया।

 

अमृतराय ने फिर भी कुछ जवाब न दिया। एक क्षण के बाद दाननाथ ने फिर कहा – ‘भाई, मैं तो जाता हूँ।’

 

दाननाथ – ‘तुम कब तक बैठे रहोगे?’

 

दाननाथ – ‘बस, हो निरे बुद्धू, अरे स्पीच में है क्या? रट कर सुना रहा है।’

 

दाननाथ – ‘अजी घंटों बोलेगा। राँड़ का चर्खा है या स्पीच है।’

 

दाननाथ – ‘पछताओगे। आज प्रेमा भी खेल में आएगी।’

 

दाननाथ – ‘मुझे क्या गरज पड़ी है जो आपकी तरफ से क्षमा माँगता फिरूँ।’

 

दाननाथ इतनी आसानी से छोड़ने वाले आदमी न थे। घड़ी निकाल कर देखी, पहलू बदला और अमरनाथ की ओर देखने लगे। उनका ध्यान व्याख्यान पर नहीं, पंडित जी की दाढ़ी पर था। उसके हिलने में उन्हें बड़ा आनंद आया। बोलने का मर्ज था। ऐसा मनोरंजक दृश्य देख कर वह चुप कैसे रहते? अमृतराय का हाथ दबा कर कहा – ‘आपकी दाढ़ी कितनी सफाई से हिल रही है, जी चाहता है, नोच कर रख लूँ।’

 

अमरनाथ जी ने कहा – ‘मैं आपके सामने व्याख्यान देने नहीं आया हूँ।’

 

अमरनाथ – ‘बातें बहुत हो चुकीं, अब काम करने का समय है।’

 

अमरनाथ – ‘आप लोगों में जिन महाशयों को पत्नी-वियोग हो चुका है, वह कृपया हाथ उठाएँ।’

 

अमरनाथ – ‘आप लोगों में कितने महाशय ऐसे हैं, जो वैधव्य की भँवर में पड़ी हुई अबलाओं के साथ अपने कर्तव्य का पालन करने का साहस रखते हैं। कृपया वे हाथ उठाए रहें।’

 

दाननाथ ने अमृतराय के कान में कहा – ‘यह तुम क्या कर रहे हो! हाथ नीचे करो।’

 

वक्ता ने कहा – ‘इतनी बड़ी सभा में केवल एक हाथ उठा देखता हूँ। क्या इतनी बड़ी सभा में केवल एक ही हृदय है, और सब पाषाण हैं?’

 

दाननाथ – ‘मुझमें नक्कू बनने का साहस नहीं है।’

 

सभा विसर्जित हो गई। लोग अपने-अपने घर चले। पंडित अमरनाथ भी विदा हुए। केवल एक मनुष्य अभी तक सिर झुकाए सभा-भवन में बैठा हुआ था। यह बाबू अमृतराय थे।

 

अमृतराय ने चौंक कर कहा – ‘हाँ-हाँ, चलो।’

 

दाननाथ के पेट में चूहे दौड़ रहे थे। बोले – ‘आज तुम्हें यह क्या सूझी।’

 

दाननाथ – ‘प्रेमा सुनेगी तो क्या कहेगी?’

 

दाननाथ – ‘अजी जाओ भी, बातें बनाते हो। उसे तुमसे कितना प्रेम है, तुम खूब जानते हो। यद्यपि अभी विवाह नहीं हुआ, लेकिन सारा शहर जानता है कि वह तुम्हारी मँगेतर है। सोचो, उसे तुम कितनी बार प्रेम-पत्र लिख चुके हो। तीन साल से वह तुम्हारे नाम पर बैठी हुई है। भले आदमी, ऐसा रत्न तुम्हें संसार में और कहाँ मिलेगा? अगर तुमने उससे विवाह न किया तो तुम्हारा जीवन नष्ट हो जाएगा। तुम कर्तव्य के नाम पर जो चाहे करो पर उसे अपने हृदय से नहीं निकाल सकते।’

 

दाननाथ ने अमरनाथ का नाम आते ही नाक सिकोड़ कर कहा – ‘क्या कहना है, वाह! रट कर एक व्याख्यान दे दिया और तुम लट्टू हो गए। वह बेचारे समाज की क्या खाक व्यवस्था करेंगे? यह अच्छा सिद्धांत है कि जिसकी पहली स्त्री मर गई हो, वह विधवा से विवाह करे!’

 

दाननाथ – ‘बस, तुम्हारे न्याय-पथ पर चलने ही से तो सारे संसार का उद्धार हो जाएगा। तुम अकेले कुछ नहीं कर सकते। हाँ, नक्कू बन सकते हो!’

 

दाननाथ सरल स्वभाव के मनुष्य थे। जीवन के सरलतम मार्ग पर चलने ही में वह संतुष्ट थे। किसी सिद्धांत या आदर्श के लिए कष्ट सहना उन्होंने न सीखा था। वह एक कॉलेज में अध्यापक थे। दस बजे कॉलेज जाते। एक बजे लौट आते। बाकी सारा दिन सैर-सपाटे और हँसी-खेल में काट देते थे।

 

दाननाथ यह लंबा व्याख्यान सुन कर बोले – ‘तो तुमने निश्चय कर लिया?’

 

दाननाथ – ‘और प्रेमा?’

 

दाननाथ ने तिरस्कार-भाव से कहा – ‘क्या बातें करते हो। तुम समझते हो, प्रेमा कोई बाजार का सौदा है, जी चाहा लिया, जी चाहा न लिया। प्रेम एक बीज है, जो एक बार जम कर फिर बड़ी मुश्किल से उखड़ता है। कभी-कभी तो जल, प्रकाश और वायु बिना ही जीवन पर्यंत जीवित रहता है। प्रेमा केवल तुम्हारी मँगेतर नहीं है, वह तुम्हारी प्रेमिका भी है। यह सूचना उसे मिलेगी तो उसका हृदय भग्न हो जाएगा। कह नहीं सकता, उसकी क्या दशा हो जाए। तुम उस पर घोर अन्याय कर रहे हो।’

 

बोले – ‘अगर वह उतनी ही सहृदय है, जितना मैं समझता हूँ, तो मेरी प्रतिज्ञा पर उसे दुःख न होना चाहिए। मुझे विश्वास है कि उसे सुन कर हर्ष होगा, कम-से-कम मुझे ऐसी ही आशा है।’

 

अमृतराय का मकान आ गया। टमटम रूक गया। अमृतराय उतर कर अपने कमरे की तरफ चले। दाननाथ जरा देर तक इंतजार में खड़े रहे कि यह मुझे बुलावें तो जाऊँ, पर जब अमृतराय ने उनकी तरफ फिर कर भी न देखा, तो उन्हें भय हुआ, मेरी बातों से कदाचित इन्हें दुःख हुआ है। कमरे के द्वार पर जा कर बोले – ‘क्यों भाई, मुझसे नाराज हो गए क्या?’

 

दाननाथ ने स्नेह से अमृतराय का हाथ पकड़ लिया और बोले – ‘फिर सोच लो, ऐसा न हो पीछे पछताना पड़े।’

 

यह संकेत किसकी ओर था, दाननाथ से छिपा न रह सका। जब अमृतराय की पहली स्त्री जीवित थी, उसी समय दाननाथ से प्रेमा के विवाह की बातचीत हुई थी। जब प्रेमा की बहन का देहांत हो गया तो उसके पिता लाला बदरीप्रसाद ने दाननाथ की ओर से मुँह फेर लिया । दाननाथ विद्या, धन और प्रतिष्ठा किसी बात में भी अमृतराय की बराबरी न कर सकते थे। सबसे बड़ी बात यह थी कि प्रेमा भी अमृतराय ही की ओर झुकी हुई मालूम होती थी। दाननाथ इतने निराश हुए कि आजीवन अविवाहित रहने का निश्चय कर लिया। दोनों मित्रों में किसी प्रकार का द्वेष-भाव न आया। दाननाथ यों देखने में तो नित्य प्रसन्नचित्त रहते थे, लेकिन वास्तव में वह संसार से विरक्त से हो गए थे। उनका जीवन ही आनंद-विहीन हो गया था। अमृतराय को अपने प्रिय मित्र की आंतरिक व्यथा देख-देख कर दुःख होता था। वह अपने चित्त को इस परीक्षा के लिए महीनों से तैयार कर रहे थे। किंतु प्रेमा-जैसी अनुपम सुंदरी का त्याग करना आसान न था। ऐसी दशा में अमृतराय की ये बातें सुन कर दाननाथ का हृदय आशा से पुलकित हो उठा। जिस आशा को उन्होंने हृदय को चीर कर निकाल डाला था, जिसकी इस जीवन में वह कल्पना भी न कर सकते थे, जिसकी अंतिम ज्योति बहुत दिन हुए शांत हो चुकी थी, वही आशा आज उनके मर्मस्थल को चंचल करने लगी। इसके साथ ही अमृतराय के देवोपम त्याग ने उन्हें वशीभूत कर लिया। वह गदगद कंठ से बोले – ‘क्या इसीलिए तुमने आज प्रतिज्ञा कर डाली? अगर वह मित्र तुम्हारी इस उदारता से लाभ उठाए, तो मैं कहूँगा वह मित्र नहीं, शत्रु है और यही क्या निश्चय है कि इस दशा में प्रेमा का विवाह तुम्हारे उसी मित्र से हो?’

 

दाननाथ ने तिरस्कार का भाव धारण करके कहा – ‘तुम उसे इतना नीच समझना चाहते हो, तो समझ लो, लेकिन मैं कहे देता हूँ कि यदि मैं उस मित्र का ठीक अनुमान कर सका हूँ, तो वह अपने बदले तुम्हें निराशा की भेंट न होने देगा।’

 

यह कहते हुए दाननाथ बाहर निकल आए और अमृतराय द्वार पर खड़े, उन्हें रोकने की इच्छा होने पर भी बुला न सके।

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