उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 10 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

· October 24, 2012

download (4)कहा जाता है, दिन फल अपने हाथ नहीं, करम का लिखा हुआ अमिट है, हम अपने बस भर कोई बात उठा नहीं रखते, पर होता वही है, जो होना है, जतन उपाय ब्योंत सब ठीक है-पर उस खेलाड़ी के आगे किसी की नहीं चलती, चुटकी बजाते ही वह सब कुछ करता है और पलक मारते ही सबको बिगाड़ कर रख देता है। हम मिट्टी के पुतले क्या हैं, जो उस की बातों में हाथ डालें। यह सच है, यहाँ कौन जीभ हिला सकता है। पर हम यह कहेंगे-ये बातें उन्हीं के लिए हैं-जो सचमुच जी से ऐसा मानते हैं-उन लोगों के लिए नहीं हैं, जिनके भीतर कुछ और बाहर कुछ और, जहाँ बस चलता है कोई काम बन जाता है, वहाँ तो सब करतूत उनकी है। और जहाँ बस नहीं चलता, काम बिगड़ने लगता है वहाँ सब होनहार करती है। ये दुरंगी बातें ठीक नहीं, पक्का एक ही रंग होता है। एक ही समय में दो नाव पर चढ़ने में बहुत कुछ डर रहता है-पार एक ही नाव करती है। जिसको धरती पर रहकर बहुत सा काम करना है, घरबारी बनना है, उस को जतन, ब्योंत उपाय का सहारा न छोड़ना चाहिए। उस खेलाड़ी को सब करने योग्य कामों में अपना सहाई समझकर जो जतन ब्योंत और उपाय करता है, वही जग में कुछ कर पाता है। जो ऐसा नहीं कर सकता वह पास की पूँजी भी गँवा देता है!

हमारे हरमोहन पाण्डे इसी ढंग के लोग हैं-होनहार के भरोसे बाप का कमाया लाखों रुपया उड़ा चुके हैं। बीसों गाँव पास थे, पर एक-एक करके सब बिक चुके हैं। अब तक रहने का घर बचा था। आज उससे भी हाथ धोना चाहते हैं। बाहर बोली हो रही है, पर करम ठोककर आप भीतर पलँग पर पड़े हैं। उनकी यह गत देखकर उनकी सीधी सच्ची घरनी उनके पास आयी। प्यार के साथ पास बैठ गयी। दोनों में इस भाँत बातचीत होने लगी।

घरनी-घर बिक रहा है-बाहर बोली हो रही है, क्या आप उनको सुनते हैं?

हरमोहन-सुनता हूँ-जो भाग में लिखा है, होगा।

घरनी-मैं यह नहीं कहती, मैं यह कहती हूँ-थोड़ी ही बेर में यह घर छोड़ना होगा-उस घड़ी हम लोग क्या करेंगे, कहाँ रहेंगे?

हरमोहन-इस घर के पास जो हमारा खंडहर है, उसमें चलकर रहेंगे। भाग्य में तो खंडहर लिखा है, घर रहने को कहाँ मिलेगा?

घरनी-खंडहर में दिन कैसे बीतेगा? मेरा मुँह आज तक किसी पराये ने नहीं देखा, खंडहर में लाज क्योंकर रहेगी?

हरमोहन-भगवान जिसकी लाज नहीं रखना चाहते, उसकी लाज कौन रखे?

घरनी-अच्छा, मैं कुछ कहूँ? आप मानेंगे?

हरमोहन-कहो, क्या कहती हो?

घरनी-बंसनगर में मेरी बहिन रहती है, यह आप जानते हैं। जैसी भलमनसाहत उसमें है, वैसे ही देवता हमारे बहनोई भी हैं, यह बात भी आपसे छिपी नहीं है। इनके पास दो घर हैं-एक में वह आप रहते हैं, एक यों ही पड़ा है। मेरी बहन ने हम लोगों का दुख सुना है-कुछ दिन हुए उसने कहला भेजा था-जो घर भी बिक जाय तो ये यहाँ आकर रहें। हम लोगों का अब यहाँ क्या रखा है-जो आप चाहें तो वहाँ चल सकते हैं। यहाँ से वहाँ अच्छा ही बीतेगा।

हरमोहन-तुमने अच्छा कहा, चलो वहीं चलें। हमारा सोलह सौ रुपया भी तो उनके यहाँ है।

घरनी-रुपये की बात जाने दीजिए। दुख में उन लोगों ने हम लोगों को बहुत सम्हाला है। सोलह सौ का चौबीस सौ दे चुके हैं।

हरमोहन-अच्छा जाने दो-हम रुपये की बात नहीं चलाते हैं।

इस बातचीत के दूसरे दिन अपनी घरनी, एक लड़के और एक लड़की के साथ हरमोहन ने अपने जनम के गाँव देवनगर को छोड़ा। चौबीस घण्टे चलकर बंसनगर पहुँचे, और वहीं रहने लगे। यहाँ कहने सुनने को वह कुछ काम भी करने लगे और इसी से उनका दिन बीतने लगा, पर इन लोगों का सब भार उन्हीं लोगों पर था, जिनके बुलाने से ये लोग वहाँ गये थे। उन लोगों ने इनके लड़के के पढ़ने-लिखने की ओर भी पूरा ध्यान रखा।

धीरे-धीरे तीन बरस बीत गये, चौथे बरस इन लोगों ने एक ऐसी बात सुनी, जिससे इन लोगों का रहा सहा कलेजा और टूट गया। इन लोगों ने सुना इनका एक ही जमाई घरबार छोड़कर किसी साधु के साथ कहीं चला गया, बहुत कुछ ढूँढ़ा गया, पर कहीं कुछ खोज न मिली।

हरमोहन पाण्डे सीधे और सच्चे थे, अपने कामकाजियों और टहलुओं पर भरोसा बहुत रखते थे। आँख में शील इतनी थी, जो आजकल नहीं देखा जाता। जिसने आकर आँसू बहाकर कुछ माँगा, उसी ने कुछ पाया। बिना कुछ लिखाये-पढ़ाये सैकड़ों दे देते। जो कोई कुछ कहता, कहते जब उसको होगा दे ही जावेगा, ब्राह्मण का रुपया थोड़े ही मार लेगा। जो यहीं तक होता, बहुत बिगाड़ न होता! हरमोहन में बड़ा भारी औगुन आलस था। आलस होने के कारण वह सब कामों में टाल टूल बहुत करते, कामकाजियों ने लाकर जो लेखा साम्हने रखा, उसी को सच माना, कभी यह न कहा, इतने छोटे काम में इतना रुपया कैसे लगाया, किसी ने कभी कुछ कहा तो होनहार की दुहाई दे कर, भाग्य पर सब बातों का होना बतला कर उस से पीछा छुड़ाया। ऐसे लोगों का बेड़ा पार कब तक हो सकता है-इन सब बातों का बुरा फल हुआ, वह थोड़े ही दिनों में लुट गये। लोगों ने उनको सीधा पाकर अपना घर भर लिया, और इधर कान पर जूँ तक न रेंगी। धीरे-धीरे गाँव घर सब छोड़ना पड़ा। इन बातों को छोड़ हरमोहन में जितनी बातें थीं, बड़े काम की थीं, वह झूठ कभी नहीं कहते, छोटे-बड़े सबसे प्यार से मिलते। पखंडियों से दूर भागते, और दीन दुखियों के तो माँ बाप थे।

ऐसे लोगों के लिए भी बिपत है-बिपत किसी को नहीं छोड़ती-जब आती है भले ही आती है। बापुरे हरमोहन का सब तो गया ही था, आज उसको अपने जमाई के लिए भी रोना पड़ा। जीना तो भारी हो ही रहा था, उस पर और रंग चढ़ गया। हरमोहन की स्त्री रुपया-पैसा, गहने-कपड़े को कुछ नहीं समझती थी, वह हरमोहन का मुँह देखकर सब भूल जाती। इसी से हरमोहन को बिपत में भी बहुत कुछ सहारा रहता था। पर आज जो चोट हरमोहन को लगी है वही चोट दूनी होकर उसकी स्त्री को लगी। इससे वह जहाँ पड़ी है वहीं बिलख रही है, हरमोहन की सुधा कौन ले। हरमोहन बहुत घबराये। कब किसके जी में कैसा उलट फेर होता है, इसको कोई क्या जान सकता है। आज भी हरमोहन को भाग्य और होनहार से काम लेना चाहिए था, पर बन नहीं पड़ा। वह घबराये हुए घर के बाहर निकले, और सीधे एक ओर चल खड़े हुए। गाँव के बाहर एक ने पूछा-कहाँ जाते हो? कहा, कहीं जाता नहीं। गाँव के पूरब ओर एक बन था, उसी को दिखलाकर कहा, इसी बन तक जाता हूँ। धीरे-धीरे बात उनकी स्त्री के कानों तक पहँची, वह और घबरायी, लोग दौड़ाये, पर हरमोहन किसी को न मिले। एक-एक करके दिन बीतने लगे, महीने हुए, दो बरस बीत गये, पर हरमोहन फिर न लौटे। लोगों ने उनको मरा ही समझा, क्योंकि न वह कहीं जा सकते थे, और न कुछ कर सकते थे। स्त्री का दिन अपने एक लड़के और एक लड़की के साथ बड़े दुख से बीतने लगा।

यह स्त्री और हरमोहन कौन हैं? यह तो आप लोग समझ ही गये होंगे। पर जो न समझे हों तो, मैं बतलाता हँ। स्त्री पारबती है-लड़की देवहूती है-लड़का देवकिशोर है-और इन दोनों का बाप हरमोहन है।

हरमोहन को लोगों ने मरा समझा, हम क्या समझें? जब पता नहीं लगा; तो हम और क्या समझेंगे, गाँववालों का साथ हम भी देते हैं।

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