उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 14 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

· October 20, 2012

download (4)कामिनीमोहन की फुलवारी के चारों ओर जो पक्की भीत है उसमें से उत्तरवाली भीत में एक छोटी सी खिड़की है। यह खिड़की बाहर की ओर ठीक धरती से मिली हुई है, पर भीतर की ओर फुलवारी की धरती से कुछ ऊँचाई पर है। खिड़की से फुलवारी की धरती तक नीचे उतरने को बारह सीढ़ियाँ हैं। इस घड़ी इन्हीं सीढ़ियों से होकर बासमती और देवहूती फुलवारी में उतर रही हैं। पर जिस झोंक से देवहूती का पाँव उतरने के लिए उठ रहा है, बासमती का पाँव वैसा नहीं उठता। वह कुछ ठहर-ठहर कर नीचे उतर रही है। देवहूती सीढ़ियों से जब फुलवारी में उतरी, बासमती चार सीढ़ी ऊपर थी, देवहूती फुलवारी में उतर कर दो डेग आगे बढ़ी थी-त्योंही उसका पाँव नीचे की ओर धरती में धंसने लगा। देवहूती बहुत घबड़ायी, उसने बहुत चाहा, कुछ पकड़कर ऊपर ही रह जावे, पर चाह पूरी न हुई-उसके औसान जाते रहे। देखते-ही-देखते देवहूती धरती में लोप हुई। जब उसका पाँव नीचे की धरती से लगा, उसकी आँखें खुलीं। आँखें खुलते ही उसने देखा, जिस छीके में वह ऊपर से नीचे आयी थी, और धरती पर पाँव लगते ही जिससे खट से अलग हो गयी थी, वह अब बड़े वेग से ऊपर को उठ रहा था। ज्यों-ज्यों वह ऊपर उठ रहा था, ऊपर का वह बड़ा छेद, जिसमें होकर देवहूती नीचे आयी थी, मुँद रहा था। देखते-ही-देखते छेद मँद गया, और छीका उसी छेद के ऊपर छत में जा लगा-जो अब देखने में छत का बेल बूटा जान पड़ता था।

देवहूती इस घड़ी एक बहुत ही सजी हुई कोठरी में थी, सजने के लिए जो जो चाहिए, वह सब इसमें था। इस कोठरी की भीतों की बनावट भी निराली थी, ऐसे-ऐसे नग इसमें लगे थे, जिससे सारा घर जगमगा रहा था। कोठरी के सामने एक छोटा सा आँगन था, आँगन के चारों ओर पहाड़ सी ऊँची-ऊँची भीतें थीं। बाहर निकलने का कहीं कोई पथ न था। देवहूती ने यह बस देखा, और सोचने लगी, अब मैं क्या करूँ। कामिनीमोहन की ही यह चाल है, यह बात उसके जी में भली-भाँति जँच गयी, पर अब छुटकारा कैसे हो-यही वह सोच रही थी। इतने में ऐसा जान पड़ा, जैसे सामने की भीत को पीछे से कोई ठोंक रहा है, एक-एक करके तीन बार ऐसा हुआ, चौथी बार खटके के साथ भीत के भीतर छिपी हुई एक खिड़की खुल गयी-और इसी पथ से कामिनीमोहन ने बड़े ठाट से कोठरी के भीतर पाँव रखा। कामिनीमोहन के कोठरी में आते ही फिर भीत जैसी की तैसी हुई-अब कहीं खिड़की का चिह्न न था।

पुरुषों के विचलाने के लिए उस खेलाड़ी ने स्त्रियों को बहुत से हथियार दिये हैं, कौन हथियार कब काम में लाना चाहिए, इसको वे भली-भाँति जानती हैं। देवहूती भी स्त्री है, वह इस बात को नहीं जानती थी, यह नहीं कहा जा सकता। हाँ! इतना हो सकता है, सब स्त्रियों अपने हथियारों को एक ही ढंग से काम में नहीं ला सकतीं, जैसे भाला बरछी चलाने में कोई बहुत ही चौकस होता है-कोई कुछ उससे घटकर-कोई उससे भी घटकर। उसी भाँत अपना हथियार चलाने में स्त्रियों की गत है-देवहूती किस ढंग की थी, हम नहीं बतला सकते-पर जिस घड़ी देवहूती और कामिनीमोहन की चार आँखें हुईं-देवहूती ने अपनी आँखों से बहुत-सा विष उसके ऊपर उगल दिया। इस घड़ी उसके सर का कपड़ा माँग से भी कुछ पीछे था, बिखरे हुए बाल दोनों गालों पर बड़े अनूठेपन के साथ हिलते थे, होठ अनोखे ढंग से खुले थे, जिस के भीतर मीठी मुसकिराहट झलक रही थी। भौंहें कुछ टेढ़ी थीं, आँखों में लाल डोरे पड़ रहे थे, और मुखड़े का ढंग बहुत ही निराला था। वह झुकी हुई अपने बालों में उलझी कान की बालियों को सुलझा रही थी, बीच-बीच में उसके हाथों की चूड़ियाँ बहुत ही मीठेपन से बजती थीं। यह सब देख सुनकर कामिनीमोहन का अपने आपे में न रहना कोई बड़ी बात नहीं है-सचमुच इस घड़ी वह अपने आपे में नहीं था-और सब भाँत देवहूती के हाथों का खिलौना हो गया था। कुछ घड़ी हक्का-बक्का बना वह उसको देखता रहा, पीछे जी सम्हाल कर बोला, देवहूती! तुम जितनी सुन्दर हो उतनी ही कठोर हो।

देवहूती-कठोर पुरुष लोग होते हैं, उन्हीं का कलेजा पत्थर का होता है, हम स्त्रियों कठोर होना क्या जानें।

कामिनीमोहन-हम महीनों से तुम्हारे लिए मर रहे हैं, आँसू बहा रहे हैं, पर तुमने कभी हमारी ओर आँख उठाकर देखा तक नहीं, उलटे कहती हो, पुरुषों का ही कलेजा पत्थर का होता है।

देवहूती-तुम हमारे जी की क्या जानते हो! जो तुम मेरे लिए मर रहे हो-तो मैं तुम्हारे लिए मर चुकी हूँ-जीती क्योंकर हूँ यह नहीं समझ में आता। तुम मेरे लिए आँसू बहा रहे हो, तो तुम्हारे लिए मेरा कलेजा जलकर राख हो गया है, उस में एक बूँद लहू नहीं जो आँसू निकाले। हाँ, यह सच है, मैंने तुम्हारी ओर कभी आँख उठाकर नहीं देखा, पर तुमने कभी भले घर की बहू बेटी को किसी को किसी के सामने आँख उठाकर देखते देखा है? मैं कब अकेली रही जो तुम्हारी ओर आँख उठाकर देखती। बासमती के सामने मुझसे ऐसा काम नहीं हो सकता।

कानिमीमोहन-क्या बासमती कोई और है?

देवहूती-और क्यों नहीं है! जो बात हमारे तुम्हारे बीच की है, उसको तुम जानो, मैं जानूँ-तीसरी को जनाना मैं नहीं चाहती। इसलिए मैंने तुम्हारी चीठी के पलटे में कोई चीठी भी नहीं भेजी-किसके हाथ भेजती। पर मेरा सब किया कराया आज मिट्टी हुआ, आज बासमती ने सब जाना, मेरा यही उलाहना है-और कुछ नहीं।

कामिनीमोहन-यह चूक तो हुई। पर तुम्हारे फाँसने के लिए ही मैंने ऐसा किया, तुम्हारे जी की बात मैं नहीं जानता था, नहीं तो कभी ऐसा न करता।

देवहूती-तुम्हारा रूप, तुम्हारी मतवाली करनेवाली आँखें, तुम्हारी जी उलझानेवाली लटें, तुम्हारी रसभरी मुसकिराहट, जिसको न फाँसेगी-तुम्हारी यह चाल उसको नहीं फाँस सकती। इस निराली कोठरी में भी तुम उसका कुछ नहीं कर सकते। पर मैं तो यों ही तुम्हारे ऊपर मर रही हूँ-चाहे यों फाँसो चाहे वों-

कामिनीमोहन-यह कौन जानता था, आज जो कुछ मैंने किया उसमें बासमती ही आँखों की किरकिरी है, नहीं तो क्या तुम्हारे जी की बात मैं किसी भाँत जान सकता था?

देवहूती-तुम यह क्या कहते हो, जिस दिन मेरी आँख तुम्हारे ऊपर पड़ी, उसी दिन तुमको समझ लेना चाहिए था, मैं तुम्हारी हो चुकी। वह कौन स्त्री है जो तुमको देख कर तुम्हारे ऊपर निछावर न होगी।

कामिनीमोहन-यह बात दूसरी स्त्री कहे, पर तुम मत कहो, देवहूती। मैं आप तुम पर निछावर हूँ, मैं ही नहीं, मेरा धन, प्राण, सब तुम पर निछावर है, मेरे घर की लक्ष्मी तुम्हीं हो, मैं तुम्हारे लिए सब छोड़ सकता हूँ-पर तुमको नहीं छोड़ सकता। जिस दिन तुम आँख भरकर मुझको देखोगी, जिस दिन अपनी फूल ऐसी बाँहों को फैलाकर मुझसे मिलोगी उस दिन मैं अपना बड़ा भाग समझूँगा।

देवहूती-मुझको धन संपत से कुछ काम नहीं, मैं तुम्हारे रूप गुण की भिखारिनी हूँ-वही मुझको चाहिए। तुम्हारे संग उजाड़ में भी रहना हो तो वही स्वर्ग है। मुझको अब किसका आसरा है, जो मैं हाथ लगे सोने से भी मुँह मोडूँगी। पर बात इतनी है-मैं आजकल देवी की पूजा कर रही हूँ-कल्ह पूजा पूरी होगी-फिर मैं आपसे बाहर नहीं। देवी देवते की बात में सदा डरना चाहिए, पीछे कुछ हुआ तो जनम भर पछतावा रहेगा। मेरे दिन खोटे हैं, इसमें मैं फूँक-फूँक कर पाँव रखती हूँ। थोड़ा सा आज बासमती का भी खटका लगा है-दूसरे दिन यह खटका भी न रहेगा। जितनी घड़ियाँ यहाँ बीत रही हैं, मैं लाजों मर रही हूँ, न जाने बासमती क्या सोचती होगी।

कामिनीमोहन-मैं तुम्हारा दास हूँ-जो तुम कहती हो मैं उससे बाहर नहीं हो सकता। मैं तुमको अभी फुलवारी में पहुँचाऊँगा-पर फिर मैं कैसे तुमसे मिलूँगा-यह बात मेरी समझ में नहीं आती।

देवहूती-मैं जिस घर में रहती हूँ-उसमें दक्खिन ओर एक बड़ा कोठा है, कोठे में दो खिड़कियाँ हैं, एक बड़ी और एक छोटी। बड़ी पर मैं बहुत बैठा करती हूँ-तुम भी उस ओर बहुत आते जाते हो, परसों मैं तुमको जाते देखकर उस पर से एक चीठी गिराऊँगी, उस चीठी में जो लिखा हो, वही करना, क्या जाने मेरे दिन फिर पलटें।

कामिनीमोहन-अच्छा देवहूती, जाओ, मुझमें इतना बल नहीं, जो मैं तुम्हारी बात न मानूँ, पर इस दास को न भूलना।

इतना कहकर कामिनीमोहन ने देवहूती के पीछेवाली भीत को पहले ही की भाँति तीन बार ठोंका, चौथी बार ठोकने पर इस भीत में भी एक खिड़की दिखलायी पड़ी। देवहूती चट उसी में से होकर बाहर हुई, भीत फिर जैसी की तैसी हुई। जाते-जाते देवहूती कह गयी, मैं सब भूल सकती हूँ-पर तुमको भूल नहीं सकती।

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