आत्मकथा – स्वर्ग (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

· August 13, 2012

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जब किसी के जी में यह बात जम जाती है कि अब जीवन के दिन इने-गिने ही हैं, जब कूच का नगारा बजने लगता है, मौत सामने खड़ी दिखलाती है, उस समय यदि जी ठिकाने रहता है, तो बार-बार वह यह सोचता है, कि मरने के बाद क्या होगा। क्या इसी शरीर तक सब कुछ है, आगे कुछ नहीं है। प्राण क्या-क्या है, शरीर से निकलने पर कहीं जायेगा, या शरीर के साथ ही वह भी मिट्टी में मिल जायेगा। प्राय: मरने वाला ही नहीं इन बातों को सोचता, मरने वालों को देखकर बहुतों के जी में इस प्रकार के विचार उठते हैं। विचार होने पर खोज होती है, खोज से अनेक बुध्दिमानों ने यह निश्चित किया है, कि मरने के उपरान्त, धर्मशील, सत्कर्मरत, महज्जन की आत्मा जहाँ जाती है उस स्थान का नाम ही स्वर्ग है।

संसार में जितने धर्म हैं, उन सबों ने स्वर्ग के अस्तित्व को स्वीकार किया है। इस विषय में सब धर्म वाले एक राय हैं, इसमें मत भिन्नता नहीं है। परन्तु परिस्थिति और उसके आयोजनादि के विषय में एक मत नहीं है। मैं स्वर्ग के विषय में यथार्थ ज्ञान उत्पादन के लिए विशेष-विशेष धर्मों के स्वर्ग वर्णन का चित्रण यहाँ कर देता हूँ। आशा है इससे पाठकों का विशेष मनोरंजन होगा, और स्वर्ग के विषय में किस धर्म का क्या विचार है, इस पर भी प्रकाश पड़ेगा।

ऋग्वेद के निम्नलिखित मन्त्रों में स्वर्ग का वर्णन पाया जाता है-

” ये नद्यौं रुग्रा पृथिवी च दृढ़ा ये नस्व: स्तंभित: येन नाक:।

यो अन्तरिक्षे रजसो विमान : कस्मै देवाय हविषा वि धेम। ”

ऋग्वेद – 10 । 21 1-10

जिसने अन्तरिक्ष, दृढ़ पृथिवी, स्वर्लोक, आदित्य, तथा अन्तरिक्षस्थ महान जल राशि का निर्माण किया आओ उसी को भजें।

अथर्ववेद में भी उसका वर्णन है-

” ईजानश्र्चित मारुक्षदिग्नं नाकस्य पृष्टाद् दिविमुत्पतिष्यन्।

तस्मै प्रभात नभसो ज्योतिमान् स्वर्ग : पन्था : सुकृते देवयान : । ”

अथर्व . 18 । 4 । 14

जो मनुष्य सुख भोग के लोक से प्रकाशमय ‘द्यौ’ लोक के प्रति ऊपर उठना चाहता हुआ, और इस प्रयोजन से वास्तविक यजन करता हुआ चित् स्वरूप अग्नि का आश्रय ग्रहण करता है, उस ही शोभन कर्म वाले मनुष्य के लिए ज्योतिर्मय स्वर्ग, आत्म सुख को प्राप्त कराने वाला देव यान मार्ग, इस प्रकाश रहित संसार आकाश के बीच में प्रकाशित हो जाता है-

” सह्स्त्रहण्यम् विपतौ अस्ययक्षौं हरेर्हं सस्य पतत : स्वर्गम्।

सदेवान्त्सर्वानुरस्यपदद्य संपश्यन् यातिभुववनानि वि श्र्वा । ”

अथर्व . 18-8

स्वर्ग को जाते हुए इस ह्रियमाण या हरणशील जीवात्मा हंस के पंख सह्स्त्रो दिनों से खुले हुए हैं, वह हंस सब देवों को अपने हृदय में लिए हुए सब भुवनों को देखता हुआ जा रहा है।

मनु संहिता अध्याय 11 के श्लोक 238 और 241 में स्वर्ग का वर्णन इस प्रकार किया गया है-

” औषधन्य गदो विद्धाद बीच विविधास्थिति:।

तपसैवप्रसिधयन्ति तपस्तेषां हि साधनम्। ”

”औषध नीरोगता और विद्या बल तथा अनेक प्रकार से स्वर्ग में स्थिति तपस्या से ही प्राप्त होती है”-

” कीटाश्र्चाहि पतंगाश्र्चपश्वश्र्च वयांसि च।

स्थावराणि च भूतानि दिवं यान्ति तपो बलात्। ”

”कीट सर्प पतंग पशु पक्षी और स्थावर आदि तपो बल से ही स्वर्ग में जाते हैं।”

बौद्ध ग्रन्थों में भी स्वर्ग का निरूपण पाया जाता है-‘धम्मपद’ के निम्नलिखित श्लोक इसका प्रमाण है-

” गब्भ मेके उपज्जन्तिनिरियं पाय कम्मिनो।

सगां सुगतिनोयन्ति परि निब्बन्ति अनासवा।। ”

”कोई-कोई मनुष्य मृत्यु लोक में जन्म लेते हैं, पापात्मा लोग नरक में उत्पन्न होते हैं। पुण्यात्मा स्वर्ग में उत्पन्न होते हैं। आशातीत महात्मा गण निर्वाण में जातेहैं-

” अन्धिभूतो अयं लोको तनु कैत्थ विपस्सति।

सकुन्तो जाल मुत्तोव अप्पो सग्गाय गच्छति।। ”

”यह लोक बिल्कुल अंधकार मय है, इसमें बिरले ही कोई ज्ञानी होते हैं। जाल से मुक्त पक्षी के सामन थोड़े ही मनुष्य स्वर्ग में जाते हैं।”

संसार का प्रधान धर्म इसलाम भी है, उसका प्रधान ग्रन्थ कुरान है, उसमें भी स्वर्ग का वर्णन है। सूरा-बकर, पहला पारा की चौबीसवीं आयत यह है-

” वोबश्शेरे अल्लजीना आमजीनं व अमेलू साहिलाते अन्नलहुम जन्नातिन , तजरी मिनत: तंहा अवहारो कुल्लमा रोज़ेक मिनहामिन समरतिन रिजकिन कालहाज़ा अल्लज़ी रोज़िकना मिनकबलो बहम तीहा ख़ालेदून। ”

”जो लोग ईमान लाए और जिन्होंने अच्छे काम किए, उनको यह मंगल समाचार सुना दो कि उनके लिए स्वर्ग के बाग है, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। जब उनमें का कोई फल (मेवा) खाने को दिया जायेगा, तो वे कहेंगे कि यह तो हमको पहले ही मिल चुका है। उनको एक ही तरह के फल मिला करेंगे। वहाँ उनके लिए पाकसाफ बीवियाँ होंगी, और उसमें सदैव रहेंगी।

सूरा सफर पहला पारा आयतन 81

” व अल्लज़ीना कफरु व कज्ज़बू वे अयातेना ऊलाएका-असहाब नारहुम फीहा खालेदून। ”

जो लोग ईमान लाए, और वे जिन्होंने नेक काम किए, वे ही स्वर्ग लोक निवासी हैं, वे हमेशा स्वर्ग में ही रहेंगे।

ईसाई धर्म का प्रधान ग्रन्थ बाइबिल है-इस ग्रन्थ में भी स्वर्ग का वर्णन पाया जाता है।

मत्ती नम्बर 13, संख्या 44

Again the kingdom of heaven is like unto treasure hid in a field; the which when a man hath found he hideth and for joy there of goeth and selleth all that he hath and buyeth that field.

”स्वर्ग का राज्य खेत में दिए हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया और मारे आनन्द के जाकर और अपना सब कुछ बेंच कर उसे मोल ले लिया।”

हमारे पुराण ग्रन्थों में स्वर्ग का जैसा विस्तृत वर्णन है, वह अविदित नहीं है। सर्व साधारण भी उससे अभिज्ञ हैं, पुराणों का स्वर्ग वर्णन विलक्षण तो है ही, लोकोत्तर भी है। जो विशेषताएँ उसमें पाई जाती हैं, और उसकी जैसी विभूतियाँ हैं, वे सर्वथा उसकी महत्ता के अनुकूल हैं। किसी धर्म के स्वर्ग में उतना विशद, विमुग्धकर, उदात्ता, और अलौकिक महत्व नहीं पाया जाता, जितना पौराणिक स्वर्ग में। अन्य धर्मों के स्वर्ग में सांसारिक अथवा पार्थिव सुखों की प्राप्ति की ही कल्पना की गयी है, उससे आगे नहीं बढ़ा गया है। और न इस लोक के सुखों से परलोक के सुखों में विशेष आकर्षण दिखलाया गया है। परन्तु पौराणिक अथवा हिन्दू धर्म के स्वर्ग में उन लोकोत्तर विभूतियों की प्राप्ति का वर्णन है जो इस लोक में प्राप्त हो ही नहीं सकतीं। मैंने अपनी एक कविता में उनका वर्णन किया है, उसको नीचे लिखता हूँ। उसके पठन से स्वर्ग और उसकी विभूतियों का ज्ञान बहुत कुछ हो जाएगा। विस्तार भय से पुराणों की कुल रचनाओं को मैं यहाँ नहीं उठाता। कविता पुराणों के आधार से ही लिखी गयी है, अतएव उसका आशय पुराणों पर ही अवलम्बित है।

शार्दूल विक्रीड़ित

है ऐरावत सा गजेन्द्र न कहीं , है कौन देवेन्द्र सा।

है कान्ता न शची समान अपरा देवापगा है कहाँ।

श्री जैसी गिरिजा गिरा सम नहीं देखीं कहीं देवियाँ।

पाई कल्पलतोपमा न लतिका है स्वर्ग ही स्वर्ग सा। 1 ।

शोभा संकलिता नितान्त ललिता कान्ता कलालंकृता।

लीला लोल सदैव यौवन वती सद्वेशवस्त्राबृता।

नाना गौरव गर्विता गुणमयी उल्लासिता संस्कृता।

होती है दिव दिव्यता बिलसिता स्वर्गांगना सुन्दरी। 2 ।

शुध्दा सिध्दि विधायिनी अमरता आधारिता निर्जरा।

सारी आधि उपाधि व्याधि रहिता वाधादि से वर्जिता।

कान्ता कान्ति निकेतनाति सरसा दिव्या सुधा सिंचिता।

नाना भूति विभूति मुर्तिमहती है स्वर्ग स्वर्गीयता। 3 ।

जो होती न विराजमान उसमें दिव्यांग देवांगना।

जो देते न उसे प्रभूत विभुता देवेशया देवते।

नाना दिव्य गुणावली सदनजो होती नहीं स्वर्गभू।

तो पाती न महान भूति , महती होती महत्ता नहीं। 4 ।

होते म्लान नहीं प्रसून , रहते उत्फुल्ल हैं सर्वदा।

पाके दिव्यहरीतिमा बिलसती है कान्त वृक्षावली।

पत्ते हैं परिणामरम्य फल हैं होते सुधा से भरे।

है उद्यान न अन्य स्वर्ग अवनी के नन्दनोद्यानसा। 5 ।

होती है विकरालता जगत की जाते जहाँ कम्पिता।

आता काल नहीं समीप जिसके आरक्त ऑंखें किये।

होता है भय आय भीत जिसकी निर्भीकता भूति से।

जा पाते यम दूत हैं न जिसमें है स्वर्ग सा स्वर्ग ही। 6 ।

होता क्रन्दन है नहीं , न मिलता है आर्त कोई कहीं।

हाहाकार हुआ कभी न , उसने आहें सुनी भी नहीं।

देखा दृश्य न मृत्यु का , न दव से दग्धाविलोकी चिता।

है आनन्द निधनस्वर्ग विभुता उत्फुल्लता मुर्ति है। 7 ।

गाता है वह गीत पून जिससे होती मनोवृत्ति है।

लेती है वह तान रीझ जिससे है रीझ जाती स्वयं।

ऐसी है कल कंठता कलित जो है मोहती विश्व को।

है संगीत सजीव मूर्ति दिव की लोकोत्तरा अप्सरा। 8 ।

सारी मोहन मंत्र सिध्दि स्वर में , आलाप में मुग्धता।

तालों में लय में महा मधुरता , शब्दावली में सुधा।

भावों में वरभावना , सरसता उत्कण्ठता कण्ठ में।

देती है भर भूत प्रीति ध्वनि में गन्धर्व गन्धर्वता। 9 ।

जागे सात्तिवक भावभूति टलती हैं तामसी वृत्तियाँ।

देखे दिव्य दिवा विकास छिपती है भीत भूतातमा।

जाती है मिट भाव भानुकर से अज्ञान की कालिमा।

पाते हैं द्युतिलोक लोक दिव की आलोक माला मिले। 10 ।

पाते हैं बहु दीप्ति देव गण से दिव्यां गवा वृन्द से।

होते झंकृत हैं सदैव बजते वीणादि झंकार से।

हो आरंजितरत्न से बिलसते हैं मोहते लोक के।

ऑंखों में बसते सदा बिहँसते आवास हैं स्वर्ग के। 11 ।

हो हो नृत्य कला निमग्न दिखला अत्यन्त तल्लीनता।

पाँवों के वर नूपुरादि ध्वनि से संसार को मोहती।

ले ले तान महान , मंजुरव से धारा सुधा की बहा।

नाना भाव भरी परी सहित गा है नाचती किन्नरी। 12 ।

नाना रोग वियोग दु : ख दल से जो द्वंद्व से है बचा।

सारी ऋध्दि प्रसिद्ध सिध्दि निधि या जो भूति से है भरा।

जो है मृत्यु प्रपंच हीन , जिसमें हैं जीवनी ज्योतियाँ।

तो क्या है अपवर्ग , पुण्य – बल से , जो स्वर्ग ऐसा मिले। 13 ।

हिन्दी शब्द सागर संख्या 40 पृष्ठ 3749 में स्वर्ग के विषय में लिखा है-

”हिन्दुओं के सात लोकों में से तीसरा लोक जो ऊपर आकाश में द्युलोक से लेकर ध्रुव लोक तक माना जाता है, स्वर्ग कहलाता है। किसी पुराण अनुसार यह सुमेरु पर्वत पर है। देवताओं का निवास स्थान यही-स्वर्ग लोक माना गया है, और कहा गया है कि जो लोग अनेक प्रकार के पुण्य और सत्कर्म करके मरते हैं, उनकी आत्माएँ इसी लोक में जाकर निवास करती हैं। यज्ञ दान आदि जितने पुण्य कार्य किए जाते हैं, वे सब स्वर्ग की प्राप्ति के उद्देश्य से ही किए जाते हैं। कहते हैं कि इस लोक में केवल सुख ही सुख है, दु:ख, शोक, रोग मृत्यु आदि का नाम भी नहीं है। जो प्राणी जितने ही अधिक सत्कर्म करता है, वह उतने ही अधिक समय तक इस लोक में निवास करने का अधिकारी होता है। परन्तु पुण्यों का क्षय हो जाने अथवा अवधि पूरी हो जाने पर जीव को फिर कर्मानुसार शरीर धारण करना पड़ता है, और वह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक उसकी मुक्ति नहीं हो जाती। यहाँ अच्छे-अच्छे फलों वाले वृक्षों, मनोहर वाटिकाओं और अप्सराओं आदि का निवास माना जाता है।

प्राय: सभी धर्मों, देशों और जातियों में स्वर्ग और नरक की कल्पना की गयी है। ईसाइयों के विचारानुसार स्वर्ग ईश्वर का निवास स्थान है, और वहाँ फरिश्ते तथा धर्मात्मा लोग अनन्त सुख का भोग करते हैं। मुसलमानों का स्वर्ग बिहिश्त कहलाता है। मुसलमान लोग भी बिहिश्त को खुदा और फरिश्तों के रहने की जगह मानते हैं, और कहते हैं कि दीनदार लोग मरने पर वहीं जायेंगे उनका विहिश्त इन्द्रिय सुख की सब प्रकार की सामग्री से परिपूर्ण कहा जाता है। वहाँ दूध और शहद की नदियाँ तथा समुद्र हैं। अंगूरों के वृक्ष हैं, और कभी वृद्ध न होने वाली अप्सरायें हैं। यहूदियों के यहाँ तीन स्वर्ग की कल्पना की गयी है।”

स्वर्ग में देवताओं का निवास माना जाता है, हिन्दी शब्द सागर संख्या पृष्ठ 1620 में उनके विषय में यह लिखा गया है-

”वेदों में देवता शब्द से कई प्रकार के भाव लिए गये हैं। साधारणत: मंत्रो के जितने विषय हैं, वे सब देवता कहलाते हैं। सिल, लोढ़े, मूसल, खली, नदी, पहाड़ इत्यादि से लेकर घोड़े, मेढ़क, मनुष्य (नारशंस) इन्द्र, आदित्य इत्यादि तक वेद मन्त्रों के देवता हैं। कात्यायन ने अनुक्रमणिका में मंत्र के वाच्य विषय को देवता कहा है। निरुक्तकार यास्क ने देवता शब्द को दान, दीपन, और द्युस्थान गत होने से निकाला है। देवता के संबंधा में प्राचीनों के चार मत पाए जाते हैं, ऐतिहासिक, याज्ञिक, नैरुक्तिक, और आध्यात्मिक। ऐतिहासिकों के मत से प्रत्येक मंत्र भिन्न घटनाओं या पदार्थों को लेकर बना है। याज्ञिक लोग मंत्र ही को देवता मानते हैं, जैसा कि जैमिनि ने मीमांसा में स्पष्ट किया है। मीमांसा दर्शन के अनुसार देवताओं का कोई रूप, विग्रह आदि नहीं, वे मंत्रत्मक हैं। याज्ञिकों ने देवताओं को दो श्रेणियों में विभक्त किया है, सोमप और असोमप। अष्ट वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य, प्रजापति और वषट्कार ये 33 सोमप देवता कहलाते हैं। एकादश प्रदाजा, एकादश अनुयाजा, और एकादश उपयाजा ए असोमप देवता कहलाते हैं। सोमपायी देवता सोम से सन्तुष्ट हो जाते हैं, और असोमपायी पशु से तुष्ट होते हैं। नैरुक्तिक लोग स्थान के अनुसार देवता लेते हैं, और तीन देवता मानते हैं, अर्थात् पृथिवी का अग्नि, अन्तरिक्ष का इन्द्र वा वायु और द्यु स्थान का सूर्य। बाकी देवता या तो इन्हीं तीनों के अन्तर्भूत हैं, अथवा होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, उद्गाता, आदि के कर्म भेद के लिए, इन्हीं तीनों के अलग-अलग नाम हैं, ऋग्वेद में कुछ ऐसे मन्त्र भी हैं, जिनमें भिन्न देवताओं में एक ही के अनेक नाम कहा है। जैसे, बुध्दिमान लोग, इन्द्र, मित्र, और अग्नि को एक होने पर भी इन्हें बहुत बतलाते हैं।” (ऋग्वेद 1।164।46)। ए ही मंत्र आध्यात्मिक पक्ष वा वेदान्त के मूल बीज हैं। उपनिषदों में इन्हीं के अनुसार एक ब्रह्म की भावना की गयी है।

प्रकृति के बीच जो वस्तुएँ प्रकाशमान, ध्यान देने योग्य और उपकारक देख पड़ीं, उनकी स्तुति या वर्णन ऋषियों ने मंत्रो द्वारा किया, जिन देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ आदि होते थे, उनकी कुछ विशेष स्थिति हुई, वे लोग धन, धन्य, युद्ध में जय, शत्रुओं का नाश आदि चाहते थे। देवता शक्ति से ऐसी ही, अगोचर सत्ताओं का भाव समझा जाने लगा, धीरे-धीरे पौराणिक काल में रुचि के अनुसार और भी अनेक देवताओं, की कल्पना की गयी। ऋग्वेद में जिन देवताओं के नाम आये हैं, उनमें से कुछ ए हैं-

अग्नि, वायु, इन्द्र, मित्र, वरुण, अश्र्चिद्वय, विश्वेदेवा, मरुद्गण, ऋतुगण, ब्रह्मणस्पति, सोम, त्वष्टा, सूर्य, विष्णु, पृश्नि; यम, पर्जन्य, अर्यमा, पूषा, रुद्रगण, वसुगण, आदित्य गण, उशना, त्रित, चैतन, अज, अहिर्बुध्न, एकयाक्त, ऋभुक्षा, गरुत्मान् इत्यादि। कुछ देवियों के नाम आये हैं, जैसे सरस्वती, सुनृता, इला, इन्द्राणी, होत्र, पृथिवी, उषा, आत्री, रोदसी, राका, सिनीवाली, इत्यादि।

ऋग्वेद में मुख्य देवता 33 माने गये हैं, जो शत्पथ ब्राह्मण में इस प्रकार गिनाये गये हैं, 8 वसु 11 रुद्र 12 आदित्य तथा इन्द्र और प्रजापति। ऋग्वेद में एक स्थान पर देवताओं की संख्या 3339 कही गयी है। 3।9।9 शतपथ ब्राह्मण और सांख्यायन श्रौत सूत्र में भी यह संख्या दी हुई है। इस पर सायण कहते हैं, कि देवता 33 ही हैं, 3339 नाम महिमा प्रकाशक है। देवता मनुष्यों से भिन्न अमर प्राणी माने जाते थे, इसका उल्लेख ऋग्वेद में स्पष्ट है। ”हे असुर वरुण! देवता हों या मर्त्य (मनुष्य) हों, तुम सब के राजा हो।” (ऋक् 2।27।10)।

पीछे पौराणिक काल में जिसका थोड़ा बहुत सूत्रपात शुक और सूत के समय में हो चुका था, वेद के 33 देवताओं से 33 कोटि-देवों की कल्पना की गयी। इन्द्र, विष्णु, रुद्र, प्रजापति इत्यादि वैदिक देवताओं के रूप रंग कुटुम्ब आदि की कल्पना की गयी। द्युस्थान (आकाश) के वैदिक देवता विष्णु (जो 12 आदित्यों में थे) आगे चलकर चतुर्भुज, शंख चक्र गदा पद्म, लक्ष्मी के पति हो गये। वैदिक रुद्र जटी, त्रिशूलधारी, पर्वतों के पति, गणेश, और स्कंद के पिता हो गये। वैदिक प्रजापति वेद के वक्ता चार मुख वाले ब्रह्मा हो गये। देवताओं की भावना और उपासना में यह भेद महाभारत समय से ही कुछ-कुछ पड़ने लगा। कृष्ण के समय तक वैदिक इन्द्र की पूजा होती थी, जो पीछे बन्द हो गयी, यद्यपि इन्द्र देवताओं के राजा और स्वर्ग के स्वामी बने रहे। आजकल हिन्दुओं में उपासना के लिए, पाँच देवते मुख्य माने गये हैं, विष्णु, शिव, सूर्य, गणेश, और दुर्गा। ये पंच देव कहे जाते हैं।

यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, और पुराणों के अनुसार इन्द्र चंद आदि देवते, कश्यप से उत्पन्न हुए। पुराणों में लिखा है, कि कश्यप की दिति नाम की स्त्री से दैत्य, और अदिति नाम की स्त्री से देवता उत्पन्न हुए।

बौद्ध और जैन लोग भी देवताओं को मानते हैं, और इसी पौराणिक रूप में, भेद केवल इतना है कि वे देवताओं को बुद्ध, बोधिसत्तव, वा तीर्थंकरों से निम्न श्रेणी का मानते हैं। बौद्ध लोग भी देवताओं के कई गण या वर्ग मानते हैं। चातुर, महारात्रिक, तुषिक आदि। जैन तीन चार प्रकार के देवता मानते हैं। वैमानिक या कल्पभव, कल्पातीत, ग्रैवेयक, और अनुत्तर। वैमानिक बारह हैं। सौधर्म, ईशान, सनत्कुमार, महेन्द्र, ब्रह्मा, अंतक शुक्र, सह्स्त्रर, नत, प्राणत, आरण, और अच्युत।”

जो अंश हिन्दी शब्द सागर से उद्धृत किये गये हैं, उनके पठन से स्वर्ग और देवताओं के विषय में पूरी अभिज्ञता प्राप्त होती है। यद्यपि विचारों में विभिन्नता और विविधाता भी अधिक है। फिर भी वेद जैसे प्रामाणिक, मान्य और अभ्रान्त ग्रन्थों को स्वर्ग और देवताओं का प्रतिपादन करते देखा जाता है। ऐसी अवस्था में स्वर्ग और देवताओं का अस्तित्व निर्विवाद, और युक्ति संगत हो जाता है। विशेष कर इस कारण से भी कि बौद्ध धर्म का भी यही सिद्धान्त है, और मुसलमान, ईसाई और यहूदी सम्प्रदाय भी इसी मत का प्रतिपादक है। आप पहले पढ़ चुके हैं, सूर्य और ध्रुव तारे के बीच में स्वर्ग का संस्थान है, यह भी कहा गया है कि स्वर्ग में देवताओं का निवास है। प्रसिद्ध देवताओं के नाम भी बतलाए गये हैं, और यह कहा गया है कि उनकी संख्या तैंतीस है। महाभारत और पुराणों में उनकी संख्या तैंतीस कोटि बताई गयी है। शास्त्रों और पुराणों में ही नहीं पवित्र वेदों में भी यह बात लिखी गयी है कि पुण्यात्मा अथच धर्मात्मा प्राणियों अर्थात् मनुष्यों का निवास मरणोपरान्त स्वर्ग में होता है। स्वर्ग में निवास देवत्व प्राप्त होने पर ही होगा। यदि यह सत्य है, तो स्वर्ग के देवताओं की संख्या तैंतीस ही क्यों होगी, तैंतीसकोटि या उससे भी अधिक क्यों न होगी, जैसा महाभारत और पुराणों में लिखा है। सूर्य यदि घड़े के समान है, तो पृथ्वी मटर के बराबर है। यदि इतनी छोटी पृथ्वी भाँति-भाँति के जीव जन्तु और मानवों से परिपूर्ण है, तो सूर्य जीवधरियों और प्राणियों से रहित होगा, इसे मतिमत्त नहीं मान सकती। सूर्य क्या, आकाश में जितने पिण्ड हैं, सब विचित्रतामय हैं, सबों में सृष्टि क्रम है, सबका आदि अन्त है, और सब अद्भुत प्राणियों और जीवों से भरे पड़े हैं। बहुत अधिक जाँच पड़ताल छानबीन और सोच-विचार के बाद बड़े-बड़े वैज्ञानिकों और विद्वानों ने यह बात बतलाई और स्वीकार की है। यदि उनका निर्णय सत्य है, तो स्वर्ग में केवल तैंतीस देवते नहीं माने जा सकते। धरातल के सब धर्म और मतवाले यह कहते और मानते हैं कि जितने पुण्यात्मा प्राणी हैं, शरीर त्याग के बाद स्वर्ग में उनका निवास होता है। यह संख्या कितनी अधिक हो सकती है, इसको प्रत्येक मतिमान समझ सकता है। अत: स्वर्ग में तैंतीस देवताओं का ही निवास मानना वास्तविक नहीं हो सकता। यह आदिम विचार हो सकता है। किन्तु वास्तविक विचार महाभारत और पुराणों का ही माना जा सकता है, जो चिर कालिक अन्वेषण का अन्तिम परिणाम है। तैंतीस करोड़ देवतों की संख्या उनके आधिक्य की अनुमानित कल्पना भी हो सकती है, क्योंकि इस विषय में इदमित्थं नहीं कहा जा सकता।

कुछ स्वतन्त्रता विचार के लोग स्वर्ग और नरक का अस्तित्व नहीं मानते। वे कहते हैं पुण्य में प्रवृत्ति उत्पन्न करने के लिए और पाप से दूर रखने के लिए स्वर्ग और नरक की कल्पना की गयी है। बंग भाषा में महापुरुष मुहम्मद और तत्प्रवर्तित इसलाम धर्म, नामक एक ग्रन्थ है। उस ग्रन्थ में नरक स्वर्ग के विषय में जो लिखा गया है, उसका अनुवाद नीचे दिये जाता है-

”वास्तविक स्वर्ग नरक बाहर नहीं है, उनका संबंध अन्तर से है। पुण्य कर्म करने से जो आत्म प्रसाद लाभ होता है, स्वर्ग सुख और पाप करने से जो अन्तर्दाह एवं आत्मग्लानि होती है वही है नरक दण्ड। केवल पाप मार्ग गामी अज्ञानी लोगों को भय प्रदर्शन पूर्वक धर्म पथ पर लाने के लिए सादृश्यात्मक रूप से इस प्रकार की उक्तियों का प्रयोग होता आया है। कहीं-कहीं इस प्रकार का वर्णन भी है कि पापात्मा अनन्त काल तक नरक दण्ड भोगता रहता है, यह कथन यत्परो नास्ति असम्भव और अस्वाभाविक है। इससे परमात्मा के मंगल स्वरूप और न्याय विचार पर दोषारोपण होता है। मनुष्य यदि अनन्त पाप निरत होता तो यह सम्भव होता कि परमेश्वर उसके लिए रोमांचकर अनन्त दण्डों का विधान करता। छुद्र मनुष्य पर परमित पापों के लिए वह अनन्त शक्ति विधान करता रहता है, यह सोचना या कहना, पूर्ण दयामय और न्यायपरायण जगदीश्वर की अलौकिक दया और महत् प्रेम पर प्रबल दोषारोपण करना होगा। पृथ्वी के माता पिता दुष्ट सन्तान का शासन करते हैं, उसको दण्ड देते हैं, उसके मंगल के लिए, उसके चरित्र के संशोधन के लिए, उसके विनाश के लिए नहीं। जिन्होंने जनक जननी के हृदय में स्नेह और प्रेम का संचार किया है। वही परम कारुणिक मंगलमय न्यायवान ईश्वर प्रेम और न्याय के अनुरोध से संशोधन और मंगल के लिए पापी को शास्ति प्रदान करते हैं पर किसी साधारण मनुष्य के समान निकृष्ट प्रवृत्ति क्रोध विद्वेषादि के अधीन होकर उसको शास्ति दान नहीं करते, न उनमें प्रतिशोध लेने की इच्छा होती है। उनसे किसी प्रकार का अन्याय और अप्रेम का कार्य भी नहीं होता। यदि वे ऐसा करते, ईश्वर न होते, भयंकर दैत्य माने जाते। समधिक दण्ड होने पर पापी का संशोधन कहाँ हुआ ? शास्ति नवजीवन प्रदान के लिए की जाती है, मार डालने के लिए नहीं। जैसे विशेष दु:ख और कष्ट होने पर लोग कहते हैं, हमारा कष्ट असीम है, और यातना अपरिमेय। तो उसका अर्थ दु:सह यातना और महान कष्ट होता है। उसी प्रकार अपार शास्ति का अर्थ विषम शास्ति और गुरु दण्ड होगा। ईश्वर में क्रोध और प्रतिहिंसा नहीं है, वे निर्विकार, पुण्यमय प्रेममय और न्यायवान हैं। निज सृष्ट और प्रतिपालित कोट तुल्य छुद्र मनुष्य को वह देव-देव विश्व-विधाता क्रोध करके न्याय से च्युत हो अपरिमेय शास्ति प्रदान करेगा, इसका अनुमान मात्र होने पर भी हृत्कम्प होने लगता है।”

देवात्मा ईसामसीह कहते हैं, ”स्वर्ग लोक यहाँ या वहाँ नहीं है, स्वर्ग अन्तस्तल में है।” ”वास्तविक स्वर्ग इन्द्रियातीत चिन्मय, इन्द्रिय गोचर बाह्य नहीं है, जड़ीय उपादान से स्वर्ग लोक नहीं निर्मित हुआ है।”

प्रकृतिवादी कहते हैं जैसे जब तक घड़ी के कल पुरजे ठीक रहते हैं, तब तक उसमें गति रहती है, वह ध्वनित होती है और ठीक-ठीक समय भी बतलाती है। कलपुरजों के बिगड़ते ही, उसकी समस्त क्रियायें समाप्त हो जाती हैं, वैसे ही मानव जीवन की व्यवस्था है। जब तक पाँच तत्तवों का समन्वय अनुकूल और जीवनोपयोगी, होता है, तब तक वह बना रहता है, और मानव शरीर अपना कार्य करता रहता है। उसमें विक्षेप और तारतम्य का अवांछित मात्र में ह्रास होते ही जीवन लीला समाप्त हो जाती है। और काल पाकर जिस पंच तत्तव से प्राणी बना था, उसी में वह समा जाता है। प्रकृति का यह प्रपंच है, ब्रह्म जीव की कल्पना, कल्पना मात्र है परोक्षवाद परोक्षवाद ही है। प्रामाणिक प्रत्यक्ष वाद ही है। जो गोचर है अगोचर नहीं। अपने इन विचारों पर आरूढ़ होकर प्रकृतिवादी भी स्वर्ग नरक को कल्पित मानते हैं।

मत भिन्नता स्वाभाविक है, कहा भी है, ‘मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना’ किसी सिद्धान्त का आधार संस्कार होता है, जैसे वायु मण्डल में प्राणी प्रतिपालित होता है, उसका आचार विचार भी वैसा ही होता है। चित्त की वृत्ति भी विभिन्न होती है, सब का ज्ञान भी समान नहीं होता। सबकी पहुँच भी एक सी नहीं पाई जाती। इसलिए तर्क वितर्क होने पर विशिष्ट सम्मति ही ग्राह्य होती है। यदि यह सम्मति एक देशी नहीं, बहु व्यापक हो, तो उसका समादर और अधिक हो जाता है और वह लोकमान्य हो जाती है। जितने धर्म भूतल के हैं, उन सबों ने स्वर्ग और नरक का अस्तित्व स्वीकार किया है। पवित्र ऋग्वेदादि और मुसलमान, ईसाई एवम् यहूदियों के धर्म ग्रन्थों की चर्चा पूर्णतया हो चुकी है। उपस्थित विषय में किसी की मत भिन्नता नहीं है, सब एक राय हैं। आजकल अध्यात्मविज्ञान (Mismerism) मेसमेरिज्म का प्रचार भूतल के प्रधान देशों में है। योरप और अमेरिका जैसे समुन्नत प्रदेश के अनेक महात्मा अध्यात्म विज्ञान के समर्थक और प्रचारक हैं। महाभारत हो जाने पर जैसे महर्षि वेद व्यास ने एक रात को गांधारी इत्यादि के दु:खमोचन और कष्ट निवारण के लिए परलोक से दुर्योधन आदि अनेक रण में निहत वीर पुंगवों का आह्वान किया था। उस प्रकार की क्रिया आजकल योरप और अमेरिका में अधिकतर हो रही है। मीडियम (प्रतिभू) द्वारा ही मुक्तामाओं का आह्वान नहीं किया जाता है, स्वयं मुक्तात्माओं का प्रत्यक्ष आह्वान होने लगा है। इसका समर्थन बड़े-बड़े ग्रन्थ लिखकर योरप और अमेरिका के बड़े-बड़े विद्वानों ने किया है। अतएव अध्यात्म विज्ञान द्वारा भी स्वर्ग के अस्तित्व की सिध्दि होती है। यह सिध्दि साधारण नहीं बहुत बड़ी इष्टि सिध्दि है।

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