आत्मकथा – बनारस और कलकत्ता – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

· May 8, 2012

download (6)जब मैं चुनार से बनारस पढ़ने आया तब मन-ही-मन अपने सामाजिक स्‍टेटस पर बड़ा ही लज्जित-जैसा महसूस करता था। गुणहीन, ग़रीब, गर्हित चरित्र-लेकिन साल-दो साल रहकर जब काशी में कलियुगी रंग देखे तब दुखदायी होने पर भी चरित्रहीनता में मेरा बड़ा भाई मन के मुकाबिले में माशा-मात्र मालूम पड़ा। माफ़ी जलालपुर गाँववाले जिसे पाप मानते थे, चुनारवाले चरित्रहीनता, बनारसवालों की नज़र में वह रोज़मर्रा था। ‘आँखें नीचे कर चल रे!’ कहावत की बहू से सास ने कहा था— ‘बनारसवाले आँखों ही से बलात्‍कार करते हैं।’ भारतेन्‍दु हरिश्‍चन्‍द्र ने दुछत्ती के दरवाज़े से देखा था नीचे ठठेरी बाज़ार में किसी परम सुन्‍दर रमणी के पीछे-पीछे कनफटे बाबा को ताक-झाँक में जाते और कहा— ‘मृग-नैनी को नैन-सर बाबाजी को लाग, गयो कमण्‍डल… में, चर्रानो बैराग।’ चुनार में चित्त या पट्ट पातक को पापी छिपाने की कोशिश करता, लेकिन बनारस में उसी को मज़ाक-ही-मज़ाक में मुश्‍क बू की तरह हवा के हवाले किया जाता। कैसा भी अधम पातकी समाज के परमपावन की तरफ़ अँगुली उठाकर उसको प्रमाणित कर सकता था पाषंडी—परम; हृदय आन, मुख आन; डूबकर निगलनेवाला; घउरघप्‍प! सेन्‍टर जेल में पहुँचने पर एकबारा अपराधी जब शत-शत दोबारा और सेबारा अपराधियों को देख लेता है—स्‍वयं से कहीं भयानकतर—तब उसे जो आत्‍म-सन्‍तोष होता है वही सन्‍तोष चुनार से बदमाशी सीखकर आने के बाद बनारस के एक-से-एक प्रतिभाशाली, भाग्‍यशाली, बदमाशों को देखने पर मुझे हुआ। फलत: मन से हीनता की भावना धुल-सी गई। लगा, यहाँ यही सही कि करो कुछ, बताओ कुछ। या करो भी—बताओ भी। डरो, क्‍यों? आलोचक ऊपरी मात्र होते हैं—चलते—नहीं तो यहाँ दूसरे की ख़बर लेने जितनी फुरसत है किस भले आदमी को? सामने पड़े, झट से राय दी, आगे बढ़े और भूल एक! सो, छान! छान! किसी रण्‍डी-भड़वे की न मान! काशी की हवा में ज्ञान इस क़दर कि शंकराचार्य से वहाँ का चाण्‍डाल बहस कर बैठा था; मंडन मिश्र की मज़दूरन दो-चार सुना गई थी; काशी के तोते तक शंकराचार्य से संस्‍कृत में टर्रर-टर्रर करने की हिमाकत कर सकते थे। जब मैं विद्यार्थी था तब की काशी में प्रियंवदा मज़दूर में थीं, चार्वाक चाण्‍डाल थे, टर्रर-टर्रर तोता-रटन्‍त श्रुति-धारी द्विज थे—अलबत्ता नहीं थे तो करुणामय संन्‍यासी दार्शनिक दिव्‍य शंकराचार्य महाराज। कुछ लोग कमज़ोर भी होते हैं और कुरूप भी। कमज़ोरी भी अगर ‘कट’ वाली हो—अदावाली—तो कलामयी हो उठती है। मेरे एक परम आदरणीय बन्‍धु थे। अच्‍छे पढ़े-लिखे, ख़ासे खाते-पीते। कविता का शौक़, कसरत का शौक़, दिलफेंक यार। जवानी में एक हाकी खिलाड़ी नौजवान की सुगठित देह देखी और फ़िदा हो गए। बरसों उनकी भावुकता उस देही से गिर्द भ्रमराती रही। ब्‍याह और दो-तीन बच्‍चे तक हो जाने के बाद जनाब की नमकीन निगाहों में दालमण्‍डी की एक तवायफ़ नाच ही गई। हज़रत का रोम-रोम गा चला वसन्‍त बहार—ललकार, ललकार! पत्‍नी से भी जनाब ने बतला दिया कि उनकी जान की राहत तो फलाँ जान हैं। वह मुझसे उम्र में दूने रहे होंगे—ज़ियादा ही, लेकिन—घण्‍टे-घण्‍टे–भर वह उस तवायफ़ के नाक-नक्‍़श के फ़साने मजनूँ-मुख बनाए गाते रहते। बात यह थी कि औक़ातवाले दिखने पर भी वह दिल ही फेंक सकते थे—दिरमोदाम नहीं। और वह थी रण्‍डी। मजनूँ को भी ख़ाली हाथ देख झाड़ू उठाने वाली और नामालूम खाँ पर भी टके पाते ही टकटकी लगाने वाली। सो, मेरे यार का इश्‍क़ बेक़रार वसन्‍त-बहार के आगे न जा पाता। श्रीमान् माशूक की तरह सज-बजकर दालमण्‍डी जाते!—क्‍या साज-बाज! घण्‍टे-भर में दाढ़ी बनाते, आधे घंटे तक मूँछों का ‘कर्व’ या बाँकपन सँवारते, होंठ देखते, नासिका पर सपाटक हाथ फेरते, कपड़ों पर इस्‍तरी-ब्रश करके भूल जाते—फिर करते। ज़ियादा समय वह पूजा में लगाते थे या अंग्रेज़ी बूट पर पालिश करने में, कहना कठिन है। इसके बाद महफ़िल में जिस आहिस्‍तगी से उन दिनों तवायफ़ें सजा करती थीं उसी आराम से लैस होकर, हाथ में छड़ी, सर पर क़श्‍तीनुमा टोपी ओढ़े महाशयजी दालमण्‍डी की उस तवायफ़ के दीदारों को चलते, जेब में हद-से-हद रुपया आठ आने की खेरची लिये। उस वेश्‍या के ठीक सामने वाली पानों की दुकान पर दो पैसों की गिलौरियाँ खाने के बाद यह मेरा बाँका यार नौ बजे से बारह बजे रात तक उस मंगलामुखी की तरफ़ देखता ही! जैसे सूरजमुखी देखे सूरज की तरफ़, अनवरत, एक पाँव पर पुलकित गात, पात-पात। कहते तो नहीं थे, पर सोचते वह मन में यही थे कि पैसे नहीं हैं जेब में तो क्‍या — बड़ी काया तो है, बड़ी आँखें, खड़ी-खड़ी मूँछें तो हैं। फिर विश्‍वनाथ-अन्‍नपूर्णा-दर्शन के पुण्‍य, पूजा-पाठ का प्रभाव। वह सोचते कि आँखों ही से उस वार वनिता को अर्श से फ़र्श पर खींच लाएँगे! लेकिन पैसे से खिंचनेवाली ऐसे-वैसे जैसे-तैसे से कैसे खिंचती? मेरे मित्र के इस फोटक इश्‍क़ पर उनका भानजा खूब ही हँसता। वह भी जवान, तगड़ा बनारसी था। उसने मामाजी के प्रेम को नामर्दों का प्रेम बतलाया। वह किसी दिन जब मामाजी पान की दुकान पर खड़े वेश्‍या को घूर रहे थे तब, दस-बीस रुपये लेकर, उसी रूपा के कोठे पर चढ़ गया। इसके ज़रा ही बाद फ़र्श से मामाजी ने देखा कि उनका योग्‍य भानजा उनके सपनों की रानी के गाल-से-गाल सटाए ख़ुशहाल निहाल अर्श पर था। इस पर महाशय का दिल कुछ ऐसा चकनाचूर हुआ कि तबीअत हरी रखने के लिए हज़रत ससुराल चले गए। आठ बरस से नहीं गए थे जहाँ। वहाँ जाकर क्‍या देखते हैं आठ साल पहले उनकी जो साली दस साल की थी वह अब अट्ठारह की हो गई थी। ब्‍याह उसका कई वर्ष पूर्व हो चुका था लेकिन आराम से उस पर निगाह बनारसी रसज्ञ की अब पड़ी थी। ओ हो! इसका नक्‍़शा वही है जो उस वेश्‍या का! दोनों ही जैसे गुलाब के फूल, इस फ़र्क के साथ कि वेश्‍या का रस सूख रहा था और साली सरासर रसाली थी। मेरे मित्र बातों के सौदागर होने के सबब प्रभाव सामने वाले पर गुरुआई-भरा फ़ौरन डाल देते थे। उनका साला चेले की तरह उनके प्रभाव में था! सो, उन्‍होंने साले से कहा — साफ़ शब्‍दों में — कि उन्‍हें उसकी छोटी बहन जँच गई है, सो उसे उनके कमरे में वह किसी बहाने भेजे। और समझदार पढ़े-लिखे साले ने — आचरण पर सन्‍देह किए बग़ैर — छोटी बहन को बड़े बहनोई के कमरे में भेज दिया। और हिमाक़त यह कि ससुराल से लौटकर उन्‍होंने अपनी पत्‍नी को भी बतला दिया। छोटी-बहन-विजय की वार्ता। फलत: इसके तीसरे ही दिन जेठ की दुपहरी में दुछत्ती के कमरे में झाँकने पर बनारसी रसज्ञजी ने देखा! क्‍या देखा? देखा उनकी पत्‍नी उन्‍हीं के तगड़े, सुदर्शन, कुँवारे छोटे भाई अधरपान कर रही है—पिपासाकुल! मुझे कहना चाहिए कि वह ‘स्‍पोर्ट’ थे। चुपचाप, दबे-पाँव, छत से बैठक में आ रहे। मुझे कहना चाहिए कि वह साधु थे। सारे-का-सारा यह क़िस्‍सा उन्‍होंने ‘सरल-सुभाव-छुआ-छल-नहीं मुझे सुना दिया था।’ मुझे कहना चाहिए, ऐसे अल्‍हड़-बिल्‍हड़ आदमी ऐबों के बावजूद मुझे बहुत ही पसन्‍द आते हैं। कौन है बे-ऐब? बे-ऐब—बस एक ख़ुदा की जात है। ख़ुदा? जात? बाभन के हाथ की लेखनी भूल ही जाती है कि यह एटम युग है और राकेटों में कुत्ते और बन्‍दर अन्‍तरिक्ष की तरफ़ उड़ाए जा रहे हैं — अल्‍लाह के आसन की तरफ़ — भूँकने, बन्‍दर घुड़कियाँ दिखलाने के लिए।

बनारस देखने के बाद चुनारवाली इनफ़ीरिआरिटी कॉम्‍प्‍लेक्‍स मेरे मन से जाती रही —इस चर्चा में यह वर्णन हुआ है। चुनार में, फिर भी, लुके-छिपे जुआ होता, लेकिन बनारस में तो बागों में, बँगलों में, बजड़ों पर एक तरह खुले आम जुआ होता, शराबें होतीं, सुन्‍दरियाँ होतीं, वार-नारी, जार-नारी। चुनार में तब दो-ही-चार वेश्‍याएँ घोड़चढ़ी रही होंगी। सो भी शहर से दूर, सराय के नज़दीक। बनारस में पब्लिक-परियाँ बीच शहर में शत-शत की संख्‍या में प्रकट वेश्‍यालयों में थीं और शत-ही-शत संख्‍या में अप्रकट वेश्‍यालयों में। ऐसी रसीलियों की कमाई चुनार में सम्‍भ्रान्‍तों की नहीं बदमाशों और ब्रिटिश टामियों की थी जो इन्‍हें ‘लाल बीबी’ कहा करते थे, लेकिन बनारस की बिगड़ी औरतों की गहरी, सही कमाई वहाँ के छिपे-प्रकट रुस्‍तम मनचले बुद्ध‍ि और धनपतियों की थी।

कलकत्ता

‘यद्यपि विश्‍वनाथजी त्रिपाठी चुनार चले गए हैं, फिर भी चुनार ही के एक मुंशीजी उन्‍हीं के साथ रहते हैं, वह होंगे; मैं आपको अपने आदमी के साथ त्रिपाठीजी के स्‍थान पर सिंधीबागान में पहुँचवा देता हूँ।’ मुझे निराश-हताश देख, सम्‍भवत: मेरी दिक्क़त समझकर सहृदय मूलचन्‍दजी अग्रवाल ने कहा था। विश्‍वनाथ भाई के साथ चुनार के जो मुंशीजी रहा करते थे वह मेरे परिचित ही नहीं यजमान भी थे। उसी दिन उन्‍होंने चुनार सूचना भेज दी कि बेचन भाग आए हैं। एक ही हफ़्ते बाद विश्‍वनाथ भाई भी चुनार से आ गए थे। उन्‍हें मेरा वहाँ आना और रहना, उनकी सुविधाओं में ख़लल डालना, सुहाया नहीं था। फिर भी, तिरस्‍कार उन्‍होंने नहीं किया। एक ‘बासे’ वाले को कहकर मेरे खाने की व्‍यवस्‍था करा दी। जल्‍द ही उन्‍होंने मेरे लिए एक नौकरी भी तलाश की — आर.एल. बर्मन कम्‍पनी में। एक रुपया रोज़ पर मैं उस कम्‍पनी के दफ़्तर के बाहर की तरफ़ तख़्त पर बैठकर ग्राहकों के पते छपे फ़ार्मों पर लिखा करता। विश्‍वनाथ त्रिपाठी जब ‘विश्‍वमित्र’ के लिए विज्ञापन ढूँढ़ने निकलते तब अक्‍सर मुझे भी साथ ले लेते ताकि वह धन्‍धा भी मैं समझ की खोपड़ी में ढूँस लूँ। उन्‍हीं दिनों सन् 1920 वाली मशहूर महा कांग्रेस हुई थी जिसके अध्‍यक्ष थे लाला लाजपतरायजी! उसी कांग्रेस सेशन में असहयोग का प्रस्‍ताव पास हुआ था। प्रस्‍ताव के विपक्ष में बोले थे मालवीयजी, मोतीलाल नेहरूजी, विपिन चन्‍द्रपाल जी। कैसा जोश, कैसा ख़रोश, कैसे-कैसे हृदयस्‍पर्शी भाषण हुए थे! कितनी इज्ज़त थी गांधीजी की! प्रेसिडेण्‍ट होने के बावजूद लालाजी महात्‍माजी को पंखा झल रहे थे। राष्‍ट्रीय महासभा के उस क्रांतिकारी अधिवेशन के दर्शनों ने मेरे मन में जैसे राष्‍ट्रीय नशा भर दिया था, प्राणों में एक सपना—गौरव! मुझे लगा बनारस छोड़ राष्‍ट्रीय-रण के इस मौक़े पर कलकत्ता मैं अकारण ही आया! मुझे पुन: बनारस ही लौट जाना चाहिए। बनारस में फिर भी मेरा व्‍यक्तित्‍व विकस रहा था। लेकिन अपार कलकत्ता में तो मैं कुलीगीरी करने क़ाबिल भी कायाधारी नहीं था। कलकत्ता जाने पर, नौकरी तलाशने पर मुझे पता चला कि मैं किसी भी काम-क़ाबिल नहीं था। राष्‍ट्रीय-भावना के साथ इस नाक़ाबलियत ने भी कलकत्ता छोड़ने को मुझे कम उत्‍साहित नहीं किया। तब तक चुनार से बड़े भाई का पत्र विश्‍वनाथ भाई पर आया कि वह मुझे बनारस भेज दें — टिकट के रुपये समय पर मिलने वाला उधार। तब तक मैं एक मास के करीब आर.एल. बर्मन कं. में एड्रेस लिखने की नौकरी कर चुका था। लेकिन बिना नोटिस जो मैं छोड़ चलने पर आमादा हुआ तो कम्‍पनीवालों ने भी तनख्‍़वाह के नाम अँगूठा दिखा दिया। विश्‍वास करें — ज़िन्‍दगी में वही मेरी एकमात्र नौकरी थी जिसका वेतन आज तक मुझे नहीं मिला है। फिर मेरे पिता की सुगति विचारिए जो सारी ज़िन्‍दगी पुजारी की नौकरी करते रहे, लेकिन तनख्‍़वाह के रुपये मन्दिर-मालिक सेठ ही के यहाँ समय पर लेने को छोड़ देते थे। लेकिन जब समय आया, वह बीमार पड़े, तब साहूकार ने रुपये न दिए। न दिए मेरी भगिनी की शादी में— पिता दिवंगत हो गए। रुपये मिलते ही रहे।

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