आत्मकथा – जन्मान्तर वाद (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

· August 10, 2012

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पुनर्जन्म का सिद्धान्त आर्य जाति की उच्च कोटि की मननशीलता का परिणाम है। इसीलिए चाहे सनातन धर्म हो, चाहे बौद्ध धर्म उनमें पुनर्जन्म वाद स्वीकृत है। अन्य धर्मों अर्थात् ईसवी, मुसल्मान, और यहूदी धर्मों में उसका विवेक तक नहीं है। मुसल्मानों में सूफी मज़हब वालों में से किसी किसी ने कभी कभी ऐसे विचार प्रकट किए हैं, जिससे जन्मांतर वाद की ओर उनकी दृष्टि पाई जाती है, मौलाना रूम कहते हैं-

” हफत सदाहफताद कलिब दीदा अम।

हमचु सबज़ा बारहा रोईदा अम। ”

”सात सौ सत्तर कलिब (शरीर) मैंने देखा है, दूब की तरह मैं बारहा जम चुका हँ।”

परन्तु इस प्रकार के विचार शून्य के बराबर ही हैं। दूसरे ऐसे पद्यों का अर्थ भी दूसरा ही किया जाता है। मौलाना रूम के सात सौ सत्तर कषलिब का अर्थ सात सौ सत्तर समाधि सम्बंधी अवस्था किया जाता है, यद्यपि इस अर्थ का बाधक-दूब की तरह जमना है, फिर भी अपना पक्ष प्रतिपादन में कसर नहीं की जाती है। बाइबिल को आद्योपान्त देख जाइये उसमें मृतक को ईसामसीह द्वारा जीवित करने के अनेक कथानक मिलेंगे। परन्तु पुनर्जन्म का प्रसंग कहीं नहीं पाया जाता। यहूदियों के धर्म ग्रन्थ तौरेत की भी यही अवस्था है। इसलिए इसी सिद्धान्त पर उपनीत होना पड़ता है कि भूतल में यदि जन्मान्तर वाद प्रतिपादक हैं तो वैदिक धर्म और बौद्ध धर्म ही, अन्य कोई धर्म नहीं।

आर्य जाति का सबसे प्राचीन, प्रामाणिक और मान्यग्रन्थ ऋग्वेद है। पाश्चात्य विद्वानों ने भी उसको ईसवी सन् से चार सह्स्त्र वर्ष पहले का माना है। भूतल की लाइव्रेरी (पुस्तकागार) में इतना प्राचीन कोई ग्रन्थ नहीं है, यहाँ के धर्म निर्णायक पवित्र ग्रन्थों में भी उसको प्राधन्य प्राप्त है, क्योंकि धर्म, सदाचार, एवम् सत्कर्म अथच सद्विवेक सम्बंधी जितने आचार विचार हैं, उन सबका आदि निरूपण कर्ता भी ऋग्वेद ही है, उसी की छाया समस्त धरातल के धर्म ग्रन्थों पर पड़ी दृष्टिगत होती है। जन्मान्तरवाद के विषय में उसकी निम्नलिखित पंक्तियाँ प्रबल प्रमाण स्वरूपा हैं-

” असुनीते पुनरस्मासु चक्षु: पुन: प्राण मिहनो धोहि भोगम्।

ज्योक पश्येम सूर्य मुच्चरन्त मनुमते मृडयान : स्वस्ति। 1 ।

पुनर्नो असुं पृथिवी ददातु पुनद्र्यौ दैवी पुनरन्तरिक्षम्।

पुनर्न : सोमस्तन्वं ददातु पुन : पूषां पथ्यांया स्वस्ति : । 2 ।

ऋग , अ . 8 । अ . 1 । ब . 23 मन्त्र . 677 ।

”हे सुखदायक परमेश्वर आप कृपा करके पुनर्जन्म में हमारे गात्र में उत्तम नेत्र आदि सब इन्द्रियां स्थापन कीजिए, अर्थात् मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार बल पराक्रम आदि युक्त पुनर्जन्म हमें दीजिए। इस संसार में अर्थात् इस जन्म और पर जन्म में हम लोग उत्तम उत्तम भोगों को प्राप्त हों, तथा हे भगवान् आपकी कृपा से सूर्य लोक, प्राण और आपको विज्ञान तथा प्रेम से सदा देखते रहें, हे अनुमते! सबको मान देने वाले सब जन्मों में हम लोगों को सुखी रखिये जिससे हम लोगों को स्वस्ति मिले।1। हे सर्व शक्तिमान! आपके अनुग्रह से हमारे लिए बारम्बार पृथ्वी प्राण को प्रकाश चक्षु को और अन्तरिक्ष नानादि अवकाशों को देते रहें। पुनर्जन्म में सोम अर्थात् औषधियों का रस हमको उत्तम शरीर देने में अनुकूल रहे। तथा पुष्टि देने वाला परमेश्वर कृपा करके सब जन्मों में हमको सब दु:ख निवारण करने वाली पथ्य स्वरूपा स्वस्ति देता रहे।”

ऋग्वेदादि भाषयम् भिक्षपृष्ट 212, 213

ऋग वेदालोचन ग्रन्थ देखने से ज्ञात होता है, कि पुनर्जन्म का निरूपण यजुर्वेद और अथर्ववेद में भी है, ग्रन्थकारों ने इस विषय की जो तालिका दी है वह नीचे उद्धृत की जाती है-

पुनर्मन: (यजु:-4-15)

द्वेस्टती (यजु:-19-47)

पुनर्मैत्विन्द्रियं (अथर्व का, 7 अनु. 6 व. 27)

आयोद्धार्माणि (अथर्व का. 5 अनु. 1.व. 1मं. 2)

ऋग्वेदालोचन, पृष्ठ 295

माननीय मनुस्मृतिकार पुनर्जन्म के विषय में यह लिखते हैं-द्वादश अध्याय श्लोक 57, 58।

लूताहि शरटा नाझतिश्र्चारन्बुचारिणाम्।

हिंस्त्राणाअंचपिशाचानांस्तेनो विप्र : सह्स्त्रश : । 57 ।

तृणगुल्मलतानाश्र्च क्रव्यादा द्रृंष्टिणामपि।

क्रूर कर्म्मकृताअचैव शतशोगुरु तल्पग : । 58 ।

”सोना चुराने वाले ब्राह्मण, उर्ण नाग, सर्प, कृकलास, जलचर मगर आदि जन्तु और हिंसाशील पिशाच आदि योनि में सह्स्त्र बार जन्म लेते हैं।57। गुरु स्त्री हरने वाले तृण गुल्मलता आम मांस भक्षक जन्तु सिंह आदि तथा क्रूर कर्म करने वाले व्याघ्र आदि योनि में सौ बार जन्म लेते हैं।58।

श्रीमद्भगवद्गीताकार पुनर्जन्म के विषय में क्या कहते हैं, यह लिखने के पहले मैं यह प्रमाणित कर देना चाहता हूँ कि वह कितना प्रामाणिक ग्रन्थ है। धरातल का कोई ऐसा धर्म नहीं है, जिसके प्रधान और मान्य पुरुषों में अनेकों ने जिसकी महत्ता खुले दिल से न स्वीकार की हो, और जिसको महाग्रन्थ न माना हो। मेरे पास सब सम्मतियों के उठाने का स्थान नहीं है, कतिपय सम्मतियाँ प्रमाण स्वरूप उपस्थित की जाती हैं। जर्मनी के प्रसिध्द विद्वान विलियमवानहम बाल्ड (Williamvanhum bold) कहते हैं-

“The geeta is the most beautiful, perhaps, the only true philosophical song existing in any known tongue.”

”श्री गीता सब से सुन्दर गीत है संसार की सभी भाषाओं में यह अद्वितीय दार्शनिक गीत है।”

कल्याण का भगवद्गीतांक, पृष्ठ 244

अमरीकन ग्रन्थकार मिस्टर वू्रक्स कहते हैं-

Geeta is India’s contribution to the future religion of the world.

”भावी विश्व धर्म के निर्माण में भारत की ओर से गीता के रूप में बहुत अधिक सहायता मिलेगी” कल्याण का भगवद्गीतांक, पृष्ठ 190

”गीता भारत के विभिन्न मतों को मिलाने वाली रज्जु तथा राष्ट्रीय जीवन की अमूल्य सम्पत्ति है। भारतवर्ष के राष्ट्रीय धर्म ग्रन्थ बनने के लिए जिन जिन नियमों की आवश्यकता है, वे सब गीता में मिलते हैं। इसमें केवल उपर्युक्त बातें ही नहीं हैं अपितु यह सबसे बढ़कर भावी विश्वधर्म का धर्मग्रन्थ है। भारतवर्ष के प्रकाशपूर्ण अतीत का यह महादान। मनुष्य जाति के और भी उज्ज्वल भविष्य का निर्माता है।

कल्याण का भगवद्गीतांक, पृष्ठ 93

श्रीमान् वारन हेस्ंटिग्स महोदय कहते हैं-

”किसी भी जाति को उन्नति शिखर पर चढ़ाने के लिए गीता का उपदेश अद्वितीय है।”

कल्याण का भगवद्गीतांक, पृष्ठ-108

श्रीमती डॉक्टर वीसेंट महोदया लिखती हैं-

”मानसिक विकास के निमित्त गीता का अधययन कर रुक जाना ठीक नहीं है, अपितु उसके सिध्दान्तों को कुछ अंश तक कार्य रूप में परिणत करना आवश्यक है। गीता कोई साधारण संगीत अथवा ग्रन्थ नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसका उपदेश उस समय किया था, जिस समय उनका आत्मा अत्यन्त प्रबुद्ध था।”

कल्याण का भगवद्गीतांक, पृष्ठ 145

श्रीमान् लार्डरोनाल्डशे कहते हैं-

”सत्य की कोई निर्दोष कसौटी निर्धारित करना कितना कठिन है, यह मैं भली भाँति जानता हूँ। सत् विश्वास, सत् संकल्प, सत्य भाषणादि आठ प्रकार के श्रेष्ठ कर्तव्यों में सत् क्या है, इसका निर्णय कौन करे? इस प्रश्न का उत्तर एक प्रकार से बौद्ध धर्म में मिलता है। परन्तु भगवद्गीता में इसका विवेचन बहुत सुन्दर ढंग से किया गया है। उसमें यह निश्चित रूप से बतलाया गया है कि मनुष्य स्वयं कर्मों को त्याग कर ही उनके बन्धन से मुक्त नहीं होता, और न केवल संन्यास से ही वह परम पद को प्राप्त कर सकता है। परमपद को वह पाता है, जिसके कर्म आकांक्षा रहित होते हैं। जिसने कर्मों के फल की आसक्ति को त्याग दिया है, जिसको किसी वस्तु की इच्छा अथवा लोभ नहीं है, जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, और जो निरीह होकर शरीर मात्र से ही कर्म करता है।

कल्याण का भगवद्गीतांक, पृष्ठ 393

मुसल्मान् निद्वान् सय्यद मुहम्मद हाफिज साहब एम.ए.एल. टी लिखते हैं-

”भगवद्गीता योग का एक ऐसा ग्रन्थ है जो सर्व भूतों के लिए अर्थात् किसी जाति वर्ण अथवा धर्म विशेष के लिए नहीं, किन्तु सारी मानव जाति के लिए उपयोगी हो सकता है।”

कल्याण का भगवद्गीतांक, पृष्ठ 194

”जगत के सम्पूर्ण साहित्य में, चाहे सार्वजनिक लाभ की दृष्टि से देखा जाय, और चाहे व्यावहारिक प्रभाव की दृष्टि से देखा जाय, भगवद्गीता के जोड़ का अन्य कोई भी काव्य नहीं है। दर्शन शास्त्र होते हुए भी यह सर्वदा पद्य की भाँति नवीन और रस पूर्ण है। इसमें मुख्यत: तार्किक शैली होने पर भी यह एक भक्ति ग्रन्थ है। यह भारतवर्ष प्राचीन इतिहास के अत्यन्त घातक युद्ध का एक अभिनय पूर्ण दृश्य चित्र होने पर भी शान्ति तथा सूक्ष्मता से पूर्ण है। और सांख्यसिध्दान्तों पर प्रतिष्ठित होने पर भी यह उस सर्व स्वामी की अनन्य भक्ति का प्रचार करता है। अधययन के लिए इससे अधिक आकर्षक सामग्री कहाँ उपलब्ध हो सकती है।”

जे.एन.पूर व्यूहर एम.ए., पृष्ठ 18

”यह प्रत्यक्ष है कि ईसा तथा उनके धर्म प्रचारक ख़ास करके पाल (Paul) इन वैदिक शास्त्रों को अपने साथ रखते थे, और वे स्वयं श्री कृष्ण द्वारा उपदेश किये हुए इस (गीता संबंधी) धर्म ज्ञान के समझने में निपुण थे।”

हाल्डेन एडवर्ड सैम्पसन, पृष्ठ 207

”गीता में भगवान श्री कृष्ण के विचार भरे हैं। यह ग्रन्थ इतना अमूल्य और आध्यात्मिक भावों से पूर्ण है कि मैं समय-समय पर परमात्मा से सर्वदा यह प्रार्थना करता आया हूँ कि मुझ पर इतनी दया करें और शक्ति प्रदान करें जिससे मैं मृत्यु काल पर्यंत इस सन्देश को एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुँचा सकूँ।

साधु टी.एल. बस्वानी, पृष्ठ 343

गीता के प्रामाणिक और सर्वमान्य ग्रन्थ होने के प्रमाण स्वरूप जितने विदेशी और विजातीय सज्जनों के लेख और नोटिस मैंने उद्धृत किये हैं, उनके अतिरिक्त भगवद्गीतांक में महात्मा थारो, डॉक्टर मेकनिकल, चार्लस जोन्सटन रेवरेंड, ई-डी. आइस, सर एडविन और नोल्ड, डॉक्टर एलजेल्यूडसे की पत्नी (जर्मनी) और न्यूयार्क (अमेरिका) निवासी ईष्ट ऐंड वेस्ट के एडीटर के भी नोट्स और लेख भगवद्गीतांक में हैं, पर मैंने उनको विस्तार भय से नहीं उठाया है। अंग्रेजी में दो ही लेख मिले, जो यथा तथ्य लिख लिए गये हैं। शेष लेख हिन्दी भाषा में ही लिखे गये। इसलिए उनको हिन्दी भाषा में लिखा गया है। भगवद्गीतांक के प्रकाशक ने लेखकों के अपनी भाषा में लिखे गये लेखों का अनुवाद कराकर उन्हें हिन्दी भाषा में छापा है। या लेखकों ने ही अपने-अपने लेखों और नोटों का अनुवाद कराकर उनके पास भेजा है। मुझको भगवद्गीता का महत्व प्रकट करने के लिए ही उन लेखों और नोटों को यथातथ्य उध्दृत करना पड़ा है। मैं समझता हूँ उन सबके पढ़ जाने पर यह ज्ञात हो जायेगा कि भगवद्गीता का कितना अधिक महत्व है और अन्य धर्म वालों में भी उसका कितना अधिक आदर है। मैं भगवद्गीता की जन्मान्तरवाद सम्बन्धी सम्मति को नीचे लिखता हूँ, वह कितनी उपपत्ति मूलक और अनुपम है, इसे वह स्वयं सूचित करेगी-

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय। नवानिर्गृीति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणिविहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानिदेही।

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।

तथा देहान्तरप्राप्तिधीरस्तत्र न मुह्यति।

जातस्य हि ध्रुववो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च।

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप।

जैसे पुराने कपड़े को उतार कर मनुष्य दूसरा नया कपड़ा धारण करता है, उसी प्रकार जीर्ण शरीर को छोड़कर वह मरने पर दूसरा नया शरीर प्राप्त कर जन्म लेता है। ”जैसे देह धारी के इस देह में कौमार, यौवन और जरा है, उसी प्रकार मरने पर देहान्तर की प्राप्ति है, धीरे मनुष्य को इससे मोहग्रस्त न होना चाहिए” ”जो उत्पन्न हुआ है वह अवश्य मरेगा और जो मरेगा फिर उसका जन्म अवश्य होगा” ”बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञानवान मुझको (ईश्वर को) पाता है” ”हे अर्जुन हमारे और तुमारे बहुत जन्म व्यतीत हो चुके हैं, उन सबों का ज्ञान मुझको है, हे परन्तप! तुम्हें उसका ज्ञान नहीं है।”

उपनिषदों, दर्शन ग्रन्थों, महाभारत और पुराणों में जन्मान्तर वाद का वर्णन विशद रूप में उदाहरणों के साथ है, परन्तु लोक मान्य ऋग्वेद, पुनीत-मनु स्मृति और समादरणीय भगवद्गीता का प्रमाण उपस्थित करने के बाद अब मैं उन ग्रन्थों में से कुछ प्रमाण उपस्थित करने की आवश्यकता नहीं समझता। अब मैं योरप और अमेरिका आदि के कुछ विजातीय विद्वानों और बहुतों की सम्मति आप लोगों के सामने उपस्थित करूँगा, जिससे यह ज्ञात हो सके कि परधर्मी और विजातीय होने पर भी सत्यता अनुरोध और वास्तवता के आग्रह से जन्मान्तर वाद के विषय में उन लोगों ने क्या लिखा है। फ्रेंच भाषा में डॉक्टर लूइस साहब ने एक पुस्तक लिखी, उसका अनुवाद अंग्रेजी में हुआ, पश्चात् उसका अनुवाद मुंशी शिवबरन लाल वर्मा ने उर्दू में किया, उसका नाम ‘अलहयात वादुल ममात है। उस ग्रंथ में से जन्मान्तरवाद विषयक कुछ अंश लेकर उपस्थित किये जाते हैं। ग्रन्थ की उर्दू भाषा जहाँ जहाँ गहन प्रतीत हुई, वहाँ उसे सरल बना दिया गया है। और प्राय: फारसी शब्दों के स्थान पर संस्कृत शब्द लिख दिये गये हैं।

”यदि पुनर्जन्म का सिद्धान्त ठीक नहीं है, तो मानना पड़ेगा कि जीव शरीर के साथ पैदा होता है, और प्रत्येक मनुष्य के शरीर की उत्पत्ति के साथ नया जीव भी जन्म लेता है। यहाँ यह प्रश्न होगा कि ऐसी दशा में सब जीव एक प्रकार के क्यों नहीं हैं? जब शरीर एक प्रकार के हैं तो जीव को भी वैसा ही होना चाहिए और उनकी बुध्दि और शक्ति इत्यादि में अधिक अन्तर न होना चाहिए। साथ ही यह भी पूछा जा सकता है कि किसी-किसी की प्रकृति की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ क्यों इतनी दृढ़ होती हैं, कि शिक्षा और सुधार का उद्योग व्यर्थ हो जाता है? क्या कारण है कि कोई लड़का जन्म से भला और कोई बुरा होता है। कोई अभिमानी और क्रूर प्रकृति होते हैं, और अपने वंश वालों से अधिक कुचरित्र पाए जाते हैं। कोई लड़के जानवरों को सताकर सुखी होते हैं। कोई-कोई उनको कष्टित और पीड़ित देखकर प्रभावित होते हैं और उन पर दया करते हैं। यदि सबकी आत्मा एक ढाँचे में ढली है, तो शिक्षा और संगति का प्रभाव प्रत्येक बच्चे पर एक-सा क्यों नहीं होता। दो भाई एक ही दर्जे में पढ़ते हैं, एक ही अध्यापक उनको पढ़ाता है, तो भी उनकी उन्नति में बुध्दिमत्त में अन्तर रहता है, एक नेक, सभ्य, परिश्रमी, और सुजन बनता है, दूसरे की प्रकृति बिल्कुल उसके प्रतिकूल होती है। यदि इन दोनों खेतों में एक ही बीज पड़कर इस विपरीत भाव से उगता और पनपता है, तो कल यह न कहा जायगा कि खेतों में अर्थात् दोनों भाइयों की आत्माओं में अन्तर है।

यदि आत्मायें एक प्रकार की होतीं, तो यह दशा कभी न होती। पशुओं के शरीर, वृक्षों के पत्ते, मनुष्यों के तन एक ढंग के होते हैं, उनमें बहुत कम अन्तर होता है। एक मनुष्य की हद्दी का ढाँचा दूसरे जैसा ही होता है। परन्तु आत्माओं में बहुत अन्तर होता है। हम प्रतिदिन सुनते हैं, किसी लड़के को गणित विद्या का अनुराग होता है, अन्य गान विद्या का प्रेमी होता है। तीसरा नक्शा बनाना पसन्द करता है, कोई कुचरित्रता का प्रेमिक होता है और जीवन के आरम्भ में ही बदचलन और विषयी बना दिखलाई देता है।

इतिहासों में भी मानव प्रकृति की स्वाभाविक प्रवृत्ति की विभिन्नता अंकित हुई है। पसकल ने बारह बरस की अवस्था में रेखागणित के एक बड़े विभाग की जाँच पड़ताल की थी, उसको किसी ने शिक्षा नहीं दी थी। न वह गणित विद्या का ही अभिज्ञ था। रेखागणित के चित्र उसके कमरे के दरवाजे पर खींचे हुए मिलते थे। मगीनामेलो नामक गड़रिये ने पाँच बरस की अवस्था में हिसाब लगाने वाली कल निर्माण की थी। मुजारत ने चार ही बरस में बाजा बजाना आरम्भ किया और आठ बरस की अवस्था में पद्य में नाटक रचना की। करासानाम की लड़की चार बरस की अवस्था में इस सुन्दरता से बीन बजाती थी कि मानो उसे माँ के पेट ही में उसने सीखा था। मबरंटे पढ़ने के पहले उस्ताद की तरह नक्शा और तसवीर खींच सकता था।

नये शरीर में नयी आत्मा की उत्पत्ति का सिद्धान्त इस प्रकार की योग्यताओं का विवेचन उपपत्ति के साथ नहीं कर सकता। किन्तु पुनर्जन्म का सिद्धान्त इसको तुरत सिद्ध कर देता है। मनुष्यों में प्राय: सदाचार से बँधी सत् सिध्दान्तों की दृढ़ता प्रत्युत्पन्नमतित्व और विभिन्न प्रकार की उल्लेखनीय योग्यता, पहले जन्म के परिश्रम और सदुद्योगशीलता का फल अथवा परिणाम होती है। दूसरी दृष्टि से पृथ्वी पर मानवी जीवन का सिद्धान्त उपपत्ति मूलक नहीं रह जाता, परन्तु पुनर्जन्म अथवा आवागमन के विचार से वह हल हो जाता है और इस निर्णय से ईश्वरीय न्याय पर कोई आक्षेप भी नहीं हो सकता।”

”मिस्र वाले मृतक शरीर को सुरक्षित रखते थे, इसलिए कि उसकी आत्मा और जगह न चली जावे, परन्तु रोम वाले उसको जला दिया करते थे, जिसमें आत्मा को स्वातन्त्रय प्राप्त हो, कि तत्काल वह प्रकृति नियमानुसार पुनर्जन्म लाभ करे।”

”फीसागोरस यूनानियों में सबसे बड़ा दार्शनिक था। उसने पुनर्जन्म सिद्धान्त रोम वालों से सीखा था, उसने इस विचार का प्रचार यूनान में किया, वहाँ यह विचार इतना मान्य हुआ कि सब लोग विश्वास करने लगे कि पापियों को पशुयोनि में जन्म लेना पड़ता है।”

”अफलातून ने आत्मा की अमरता का वर्णन करते हुए, इस विचार को अधिक व्यापक बनाया है। उसका विश्वास था, कि जो कुछ हमने पहले जन्म में किया है, संसार में उन घटनाओं का ज्ञान किसी-किसी रूप में अवश्य रहता है और इस जन्म में हमारा नयी-नयी बातें सीखना अपने आपको स्मरण रखने की दलील है।”

”उन तीन उपादानों में से जो मनुष्य को प्राप्त हैं, केवल आत्मा ही अमर है। शरीर के नाश और जीवन के समाप्त होने पर जब आत्मा परमाणु सम्बन्धी शृंखला को तोड़ डालती है, तब उसको अनुभव, प्यार और विचारों के लिए नया शरीर धारण करना पड़ता है, जो मानवी शरीर से विशेषता प्राप्त और अनुपम ज्ञान शक्ति से सम्पन्न होता है। इस शरीर की देहधारी आत्मा को पितर (पितृ) कहते हैं। प्रश्न यह होगा, पितर रहते कहाँ हैं। उत्तर यह है कि जब पानी में, हवा में, मिट्टी में जीव पाये जाते हैं तो अन्तरिक्ष (ईश्वर) उनसे रहित क्यों होगा। वास्तव बात यह है कि पितर लोगों का ही निवास अन्तरिक्ष में है, जिनको नये जन्म के महज्जन कहते हैं और जिनमें सब प्रकार का सदाचार सम्बन्धी कमाल होता है।”

जन्मान्तर वाद सम्बन्धी मैंने जितने प्रमाण ‘अलहयात बादुलममात’ से उठाए हैं, वे सब युक्ति संगत और पक्षपात रहित हैं और विवेकशील विदेशी विजातीय सत्पुरुषों द्वारा लिखे गये हैं। अतएव उक्त सिद्धान्त की व्यापकता और वास्तवता निर्विवाद है। कुछ तर्क पितृलोक के विषय में हो सकता है अतएव इस सिद्धान्त के प्रतिपादन के लिए भी मैं आप लोगों के सामने कुछ प्रमाण उपस्थित कर देना चाहता हूँ। उनसे उक्त सिद्धान्त का प्रतिपादन न होगा, एक लोकोत्तर विषय पर भी प्रकाश पड़ जावेगा।

हिन्दी शब्द सागर पृष्ठ 2119 में पितृलोक के विषय में यह लिखा गया है-

”छांदोग्योपनिषद् में पितृगण का वर्णन करते हुए पितृ लोक को चन्द्रमा से ऊपर कहा है। अथर्ववेद में जो उदन्वती, पीलुमती और प्रद्यौ-ए तीन कक्षायें द्युलोक की कही गयी हैं, उनमें चन्द्रमा प्रथम कक्षा में और पितृलोक या प्रद्यौ तीसरी कक्षा में कहा गया है।” एक स्थान पर ‘अलहयात बादुलममात’ के रचयिता यह लिखते हैं-

”हमने मानव जन्म के पश्चात् आने वाले व्यक्तित्व को पितर (पितृ) कहा है, पितर के उपरान्त आने वाले शरीर धारी को देवता बतलाया है, परन्तु इससे आगे हम नहीं बढ़ सकते। देवता के बाद उन्नत होकर आत्मा का जो स्वरूप होगा, और क्रमश: तीसरे चौथे ऊँचे-ऊँचे लोकों में उसका जो आकार प्रकार होगा, उसके विषय में यही कहा जा सकता है कि जो आत्मा आदि में मनुष्य के शरीर से निकली थी, वह क्रमश: उन सब उच्च पदों पर से उन्नत और मुकम्मल होती जायगी। राह में कितने उच्च पद और आयेंगे, हमको इसका पूरा पता नहीं है, हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि उनकी संख्या अवश्य अधिक होगी।

”प्रत्येक उच्च पद पर, आकाश सम्बन्धी शरीर की शक्ति, ज्ञान, विवेक,समझबूझ, और अभिज्ञता बढ़ती जावेगी, एवम् ईश्वरीय कार्य कलाप का ज्ञान अधिकाधिक होता जायेगा, और मृत्यु कष्ट के बदले में उसको परमानन्द लाभ होता रहेगा।”

”फिर भी चूंकि इस संसार में प्रत्येक कार्य की समाप्ति होती है, अतएव यही दशा इन उच्च पदों पर क्रमश: चढ़ने वालों की भी रहेगी। इन सब लोकों की यात्रा समाप्त करने और प्रतिष्ठित स्थानों का सुखभोग कर वे अपनी आकाश सम्बन्धी यात्रा को समाप्त करेंगे, और एक विशिष्ट स्थान पर पहुँचेंगे, वह स्थान कौन होगा, हमारा उत्तर है, वह स्थान सूर्य लोक होगा।”

अध्यात्म विज्ञान (Mismerism) द्वारा भी जन्मान्तर वाद की पुष्टि होती है। फ्रांसिस देश के मेसमर नाम के एक साहब ने यह रीति पहले पहल निकाली थी, इसीलिए इसका नाम मिसमेरिज्म है। अमेरिका इस समय का प्रधान समुन्नत और सभ्य देश है, इन दिनों उस देश में मिसमेरिज्म अर्थात् अध्यात्म विज्ञान का बहुत अधिक प्रचार है। इस विज्ञान द्वारा परलोक गत आत्मायें बुलाई जाती हैं, और उनसे कितनी ज्ञातव्य बातों का ज्ञान प्राप्त किया जाता है, इस क्रिया से उनके अस्तित्व का प्रमाण् भी मिलता है। परलोक ग्रन्थ के रचयिता लिखते हैं-

”अध्यात्म विज्ञान की जैसी चर्चा अमेरिका देश में है, वैसी और कहीं नहीं है। इसलिए इस शास्त्र के आधुनिक प्रमाणों की खोज करने से पहले अमेरिका देश में ही जाना पड़ता है। कर्नल प्रलकाट हिन्दुस्तान में आने के पहले अमेरिका देश के वासी थे। आजकल यह जैसे सुविख्यात, धार्मिक सज्जन और सत्य वक्ता कह के परिचित है, अमेरिका देश में भी वे वैसे ही परिचित थे। इस कारण जब उस देश में अध्यात्म विज्ञान सम्बन्धी खबरें बहुत जारी होने लगीं और उनके अद्भुत समझ का जैसे-जैसे आधुनिक वैज्ञानिक लोग उनमें अविश्वास प्रकट करने लगे, वैसे वैसे वे खबरें और भी बहुतायत और विचित्रता से प्रकट होने लगीं। तब अमेरिका देश के प्रधान नगर न्यूयार्क के दो प्रधान समाचार पत्रों ने उन ख़बरों की सत्यता की परीक्षा करने के लिए कर्नल साहब को ही मुकर्रर किया।”

उक्त ग्रन्थकार ने भूमिका में लिखा है कि कर्नल अलकाट ने अध्यात्म विज्ञान पर अंग्रेजी में एक ग्रन्थ भी लिखा है, उस ग्रन्थ का नाम है, ‘पीपुल फ्रौमदी अदर वर्ल्ड’, उसने यह भी लिखा है, कि परलोक ग्रन्थ का तीसरा भाग उन्हीं के ग्रन्थ के आधार पर लिखा गया है। उसके पढ़ने पर ज्ञात होता है कि अध्यात्म विज्ञान पर उनका अटल विश्वास है। और यह विश्वास उन्होंने उसकी कठोरतम परीक्षा करने के बाद लाभ किया है। परलोक ग्रन्थकार अन्त में लिखते हैं-

”कर्नल अलकाट साहब ने अपनी बड़ी पुस्तक में1 मुक्तत्माओं के संबंध में जितनी बातें लिखी हैं, उन सबका संक्षेप हाल भी देना इस छोटी-सी पुस्तक के लिए सम्भव नहीं। उन्होंने कैसी-कैसी परीक्षा की थी, धोखेबाजी रोकने के लिए कैसे-कैसे यत्न किए थे। किन-किन तदबीरों से2 चक्र के समय3 मीडिपम को उन्हांने बेबस किया था, उन सब बातों का उल्लेख करने से पुस्तक बहुत बड़ी हो जाती। उन्होंने अपने सामने जो कुछ देखा सुना ये सब बातें ऐसे आश्चर्य जनक और अलौकिक अथच अपूर्व मालूम होती हैं कि उन्हें पाठकों के सामने रखने का शौक होने पर भी हम स्थानाभाव से कुछ नहीं लिख सके।”

परलोकगत आत्माओं का धरातल में आह्वान आर्य जाति का चिरकालिक संस्कार है। महाभारत की वह कथा इसका प्रमाण है, जिसमें महर्षि वेदव्यास द्वारा एकरात्रि में परलोकगत दुर्योधानादि वीरों का आह्वान गांधारी आदि को शान्ति प्रदान के लिए हुआ था, जिसकी चर्चा तेरहवें प्रसंग में भी हो चुकी है। इस प्रसंग में जो इस विषय की चर्चा विशेषता से की गयी, उसका उद्देश्य यह है कि यह ज्ञात हो जाये कि योरप और अमेरिका आदि के बड़े-बड़े मान्य अनेक विद्वानों ने भी इस सिद्धान्त को माना है और उसकी पुष्टि यथा अवसर सबलता के साथ की है। जिसका मर्म यह है कि यथा काल जन्मान्तरवाद का समर्थन करते आर्येतर जातियाँ भी पाई जाती हैं, जो उसकी वास्तवता का स्वाभाविक सबल प्रमाण हैं।

बौद्ध धर्म आर्य धर्मान्तर गत है, अतएव उसको भी जन्मान्तरवाद का प्रतिपादन करते देखा जाता है। धर्म्मपद के निम्नलिखित श्लोक इसके प्रमाण है-

अनेक जाति संसार संधा बिस्सं अनिव्विस्सं।

गहकारकं गवेसन्तो दुक्खाजाति पुनप्पुनं।

हे तृष्णे! तुझको खोजते अनेक बार संसार में भ्रमण करना पड़ा, बार-बार जन्म लेना बड़े दु:ख की बात है-

पथय्य एक रज्जेनसग्गस्सगमनेन वा।

सब्ब लोकाधिपच्चेन सोतापत्तिा फलंवरं।

पृथ्वी का एक छत्र राज और स्वर्ग गमन तथा सम्पूर्ण लोकाधिकारी से श्रोतापत्ति

1. मुक्तात्मा-जो आत्मा शरीर को त्याग कर मुक्त हो गयी है।

2. चक्र-गोष्टी-अध्यात्म विज्ञानियों की मण्डली।

3. मिडिपम-आवाहन के समय जिस व्यक्ति पर मुक्तात्मा का आविर्भाव होता है।

नाममार्ग श्रेष्ठ है। स्थूल तृष्णा को विध्वंसकर शेष सूक्ष्म तृष्णा को भी सातवें जन्म तक शोध कर मुक्त हो जाना श्रोतापत्ति मार्ग कहलाता है।

पुनर्जन्म के विषय में इस्लाम धर्म का निम्नलिखित विचार है। ‘महापुरुष मोहम्मद एवम् तत् प्रवर्तित इसलाम धर्म’ के रचयिता लिखते हैं-

”इसलाम धर्म में पारलौकिक मत के अन्तर्गत पुनरुत्थान अन्यतर मत है। एक दिन जगत का प्रलय होगा, मरने पर जीवात्मा मृत देह का अवलम्बन कर प्रलय होने तक कब्र में स्थित रहेगा। प्रलय के समय जीव जीर्ण शीर्ण जर्जर देह के बदले नवल शरीर लाभ कर कब्र से निकलेगा, और ईश्वर के विचारासन के सामने जाकर खड़ा होगा। उस समय विचार होने पर ईश्वर पुण्यात्मा प्राणी नित्यस्वर्ग में प्रवेश करेगा। उस समय महापुरुष मुहम्मद स्वीय मण्डलीस्थ पापी लोगों के लिए पाप क्षमा की प्रार्थना करेंगे, अतएव उन लोगों को क्षमा मिलेगी और काफिर लोग अनन्त नरक में निवास करेंगे। जगत का प्रलय कब होगा, यह कोई बतला नहीं सकता। करोड़ों युग अथवा करोड़ों बत्सर के बाद भी वह हो सकता है। प्रलय को हशर या कयामत कहा गया है। इसी कयामत तक आत्मा कब्र में रहेगी। पर कब्रस्थित पुण्यात्मा यथा कथंचित स्वर्गसुख भोग करेंगे। पापी लोगों का कब्र संकीर्ण और अंधाकाराच्छन्न होगी और उसमें वे लोग अत्यन्त दु:ख और कष्ट पाते रहेंगे। प्रलय काल में अशराफील नामक फिरिश्ता सिंगा बजावेगा। कब्र सेस शरीर इस प्रकार आत्मा का उत्थान और विचारादि पारलौकिक मत इसलाम धर्म में नूतन नहीं है। यहूदी और ईसाई लोगों के शास्त्र और बाइबिल में भी इसी तरह का आभास मिलता है।”

यह लिखकर ग्रन्थकार पुनर्जन्म के विषय में अपनी यह सम्मति लिखते हैं-

”हम लोग आध्यात्मिक पुनरुत्थान और पुनर्जन्म स्वीकार करते हैं बाह्यिक और शारीरिक नहीं।” आत्मा जब ईश्वर सहवास और दर्शन श्रवण से विमुग्ध हो जाता है तब उसका उत्थान अर्थात् स्वर्गवास होता है और वह जब ईश्वर के सम्मुख और संसार में पाप परायण रहता है, तब इस लोक में उसका पुनर्जन्म होता है। प्रतिदिन इस प्रकार उत्थान पतन वा जन्म पुन: पुन: होता है। पुण्य से आत्मा से स्वर्ग में उत्थान और पाप से उसका नरक में पतन या संसार में जन्म होता है। नव विधानवादी विज्ञानविरुद्ध, अनैसर्गिक समझकर शारीरिक पुनरुत्थान और पुनर्जन्म पर विश्वास नहीं करते। वे लोग विज्ञान को अभ्रान्त, जीवनशास्त्र, ध्रुवसत्य, समझ कर सर्वदा उसको मान्य करते हैं।”

अन्तिम दोनों विचार जन्मान्तरवाद का प्रतिपादन नहीं करते। प्रथम विचार कितना युक्तिसंगत और विवेकपूर्ण है, उसको साधारण विद्या बुध्दि का मनुष्य भी समझ सकता है, इसलिए उसके विषय में मैं कुछ लिखना नहीं चाहता। रहा दूसरा विचार, उसके लेखक वैज्ञानिक अपने को मानते हैं और कहते हैं, ”विज्ञान को अभ्रान्त, जीवन शास्त्र, धु्रव सत्य समझकर वे सर्व उसका मान्य करते हैं।” किन्तु जो विचार उन्होंने प्रकट किये हैं उसको धरातल का कोई धार्मिक सम्प्रदाय कदापि न स्वीकार करेगा। दूसरी बात यह कि श्रीमद्भगवद्गीता वैज्ञानिक ग्रन्थ माना जाता है, जीवन शास्त्र ही नहीं, उस सिद्धान्त को ध्रुव सत्य कहा जाता है, आर्य जाति ही ऐसा मानती और कहती है, यह बात ही नहीं यूरोप और अमेरिका के बहुत से बड़े-बड़े विद्वानों की वही धारणा है। यही बात अध्यात्म विज्ञानियों के विषय में भी कही जा सकती है। उन्होंने पुनर्जन्म के सिद्धान्त को माना है। अध्यात्म विज्ञान वाले परम्परागत आत्माओं का साक्षात्कार धरातल में आह्वान कर कराया करते हैं। इन बातों का उल्लेख पहले पर्याप्त मात्र में हो चुका है। फिर भी ऐसे विचार प्रकट किये जाते हैं, जैसे विचार दूसरे विचार वाले के हैं, तो क्या कहें। सब को धूल उड़ाकर छिपाना यही है। सत्यमेव जयते नानृतम्। सत्य की विजय होती है, झूठ की नहीं।

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