अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 6 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

· June 23, 2012

Premchand_4_aमियाँ आजाद मुँह-अँधेरे तारों की छाँह में बिस्तर से उठे, तो सोचे; साँड़नी के घास-चारे की फिक्र करके सोचा कि जरा अदालत और कचहरी की भी दो घड़ी सैर कर आएँ। पहुँचे तो क्या देखते हैं, एक घना बाग है और पेड़ों की छाँह में मेला साल लगा है। कोई हलवाई से मीठी-मीठी बातें करता है। कोई मदारिए को ताजा कर रहा है। कूँजड़े फलों की डालियाँ लगाए बैठे हैं। पानवाले की दुकान पर वह भीड़ है कि खड़े होने की जगह नहीं मिलती। चूरनवाला चूरन बेच रहा है। एक तरफ एक हकीम साहब दवाओं की पुड़िया फैलाए जिरियान की दवा बेच रहे हैं। बीसों मुंशी-मुतसद्दी चटाइयों पर बैठे अर्जियाँ लिख रहे हैं। मुस्तगीस हैं कि एक-एक के पास दस-दस बैठे कानून छाँट रहे हैं – अरे मुंशी जी, यो का अंट-संट चिघटियाँ सी खँचाय दिहो? हम तो आपन मजमून बतावत हैं, तुम अपने अढ़ाई चाउर अलग चुरावत हौ। ले मोर मुंसी जी, तनिक अस सोच-विचार के लिखो कि फरीक सानी क्यार मुकद्दमा ढिसमिसाय जाय। ले तोहार गोड़ धरित है, दुइ कच्चा अउर लै लेव। आजाद ने जो गवाह-घर की ओर रुख किया, तो सुभानअल्लाह! काले-काले चोगों की बहार नजर आई। कोई इधर से उधर भागा जाता है, कोई मसनद लगाए बैठा गँवारों से डींग मार रहा है। जरा और आगे बढ़े थे कि चपरासी ने कड़क कर आवाज लगाई – सत्तारखाँ हाजिर हैं? एक ठठोल ने कहा – वाह जनाब, गिरे तो मुझसे पूछ क्यों न लिया? आजाद जरा और आगे बढ़े, तो एक आदमी ने डाँट बताई – कौन हो? क्या काम है?

आजाद – इसी शहर में रहता हूँ। जरा सैर करने चला आया।

आदमी – कचहरी में खड़े रहने का हुक्म नहीं है, यहाँ से जाइए, वरना चपरासी को आवाज देता हूँ।

आजाद – बिगड़िए नहीं, बस इतना बता दीजिए कि आपका ओहदा क्या है?

आदमी – हम उम्मेदवारी करते हैं। तीन महीने से रोज यहाँ काम सीखते हैं। अब फर्राटें उड़ाता हूँ। डाकेट तड़ से लिख लूँ, नकशा चुटकियों में बनाऊँ। किसी काम में बंद नहीं। पंद्रह रुपए की नौकरी हमें मिला ही चाहती है। मगर पहले तो घास छीलना मुश्किल मालूम होता था, अब लुकमान बन गया?

आजाद – क्यों मियाँ, तुम्हारे वालिद कहाँ नौकर हैं?

उम्मेदवार – जनाब, वह नौकर नहीं है, दस गाँव के जमींदार हैं।

आजाद – क्या तुमको घर से निकाल दिया, या कुछ खटपट है?

उम्मेदवार – तो जनाब हम पढ़े-लिखे हैं कि नहीं!

आजाद – हजरत, जिसे खाने को रोटियाँ न हों, वह सत्तू बाँध कर नौकरी के पीछे पड़े, तो मुजायका नहीं। तुम खुदा के करम के जमीदार हो, रुपएवाले हो, तुमको यह क्या सूझी कि दस-पाँच की नौकरी के लिए एड़ियाँ रगड़ते हो? इसी से तो हिंदुस्तान खराब है; जिसे देखो, नौकरी पर आशिक। मियाँ, कहा मानो, अपने घर जाओ, घर का काम देखो, इस फेर में न पड़ो। यह नहीं कि आमामा बाँधा और कचहरी में जूतियाँ चटकाते फिरते हैं! मुहर्रिर पर लोट, अमानत पर उधार खाए बैठे हैं।

दूसरे उम्मेदवार की निस्बत मालूम हुआ कि एक लखपति महाजन का लड़का है। बाप की कोठी चलती है। लाखों का वारा-न्यारा होता है। बेटा बारह रुपए की नौकरी के लिए सौ-सो चक्कर लगाता है। चौथे दर्जे से मदर्सा छोड़ा और अपरेंटिस हुए। काम खाक नहीं जानते। बाहर जाते हैं, तो मुंसरिम साहब से पूछ कर। इस वक्त जब दफ्तरवाले अपने-अपने घर जाने लगे, तो हजरत पूछते क्या हैं – क्यों जी, यह सब चले जाते हैं, अभी छुट्टी की घंटी तो बजी ही नहीं।

स्कूल की घंटी याद आ गई!

मियाँ आजाद दिल ही दिल में सोचने लगे कि ये कमसिन लड़के, पंद्रह-सोलह बरस का सिन; पढ़ने-लिखने के दिन, मदर्सा छोड़ा, कॉलेज से मुँह मोड़ा और उम्मेदवारों के गोल में शामिल हो गए। ‘अलिफबे नगाड़ा, इल्म को चने के खेत में पछाड़ा!’ मेहनत से जान निकलती है, किताब को देख कर बुखार चढ़ आता है। जिससे पूछो कि भाई, मदर्सा क्यों छोड़ बैठे, तो यही जवाब पाया कि उकलेदिस की अक्ल से नफरत है। तवारीख किसे याद रहे, यहाँ तो घर के बच्चों का नाम नहीं याद आता। हम भी सोचे, कहाँ का झंझट! अलग भी करो, चलता धंधा करो, जिसे देखिए, नौकरी के पीछे पड़ा हुआ है। जमींदार के लड़के को यह ख्वाहिश होती है कि कचहरी में घुसूँ, सौदागर के लड़के को जी से लगी है कि कॉलेज से चंपत हूँ और कचहरी की कुर्सी पर जा डटूँ। और मुहर्रिर-मुंशी, अमले तो नौकरी के हाथों बिक ही गए हैं। उनकी तो घूँटी ही में नौकरी है। बाबू बनने का शौक ऐसा चर्राता है कि अक्ल को ताक पर रख कर गुलामी करने को तैयार हो जाते हैं।

यह सोचते हुए मियाँ आजाद और आगे चले, तो चौंक में आ निकले। देखते क्या हैं, पंद्रह-बीस कमसिन लड़े बस्ते लटकाए, स्लेटें दबाए, परे जमाए, लपके चले आते हैं। पंद्रह-पंद्रह बरस का सिन, उठती जवानी के दिन, मगर कमर बहत्तर जगह से झुकी हुई, गालों पर झुर्रियाँ, आँखें गड्ढे में धँसी हुई। यह झुका हुआ सीना, नई जवानी में यह हाल! बुढ़ापे में तो शायद उठ कर पानी भी न पिया जायगा। एक लड़के से पूछा, क्यों मियाँ, तुम सब के सब इतने कमजोर क्यों दिखलाई देते हो? लड़के ने जवाब दिया, जनाब, ताकत किसके घर से लाएँ? दवा तो है नहीं कि अत्तार की दुकान पर जायँ, दुआ नहीं कि किसी शाह जी से सवाल करें।, हम तो बिना मौत ही मरे। दस बरस के सिन में तो बीवी छमछम करती हुई घर में आई। चलिए, उसी दिन से पढ़ना-लिखना छप्पर पर रखा। नई धुन सवार हुई। तेरहवें बरस एक बच्चे के अब्बाजान हो गए। रोटियों की फिक्र ने सताया। हम दुबले-पतले न हों, तो कौन हो? फिर अच्छी गिजा भी मयस्सर नहीं; आज तक कभी दूध की सूरत न देखी, घी का सिर्फ नाम सुनते हैं।

मियाँ आजाद दिल में सोचने लगे, इन गरीबों की जवानी कैसी बर्बाद हो रही है। इसी धुन में टहलते हुए हजरतगंज की तरफ निकल गए, तो देखा, एक मैदान में दस-दस पंद्रह-पंद्रह बरस के अंगरेजों के लड़के और लड़कियाँ खेल रहे हैं। कोई पेड़ की टहनी पर झूलता है, कोई दीवार पर दौड़ता है। दो-चार गेंद खेलने पर लट्टू हैं। एक जगह देखा, दो लड़कों ने एक रस्सी पकड़ कर तानी और एक प्यारी लड़की बदन तौल कर जमीन से उस पार उचक गई। सब के सब खुश और तंदुरुस्त हैं। आजाद ने उन होनहार लड़कों और लड़कियों को दिल से दुआ दी और हिंदुस्तान की हालत पर अफसोस करते हुए घर आए।

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