अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 29 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

· May 29, 2012

Premchand_4_aआज तो निराला समाँ है। गरीब, अमीर, सब रँगरलियाँ मना रहे हैं। छोटे-बड़े खुशी के शादियाने बजा रहे हैं। कहीं बुलबुल के चहचहे, कहीं कुमरी के कह-कहे। ये ईद की तैयारियाँ हैं। नवाब साहब की मसजिद का हाल न पूछिए। रोजे तो आप पहले ही चट कर गए थे, लेकिन ईद के दिन धूमधाम से मजलिस सजी। नूर के तड़के से मुसाहबों ने आना शुरू किया और मुबारक-मुबारक की आवाज ऐसी बुलंद की कि फरिश्तों ने आसमान को थाम लिया, नहीं तो जमीन और आसमान के कुलाबे मिल जाते।

मुसाहब – खुदा ईद मुबारक करे। मेरे नवाब जुग-जुग जिए।

हाफिज जी – बरस दिन का दिन मुबारक करे।

रोशनअली – खुदा हुजूर की ईद मुबारक करे।

नवाब – आपको भी मुबारक हो। मगर सुना कि आज तो ईद में फर्क है। भई, आधा तीतर और आधा बटेर नहीं अच्छा।

मुसाहब – हुजूर, फिरंगीमहल के उलमा ने तो आज ही ईद का फतवा लगाया है।

नवाब – भला चाँद कल किसी ने देखा भी?

मुसाहब – हुजूर, पक्के पुल पर चार भिश्तियों ने देखा, राजा के बाजार में हाफिज जी ने देखा और मेरे घर में भी देखा।

नवाब – आपकी बेगम साहब का सिन क्या है? हैं कोई चौदह-पंद्रह बरस की?

मुसाहब ने शरमा कर गदरन झुका ली।

नवाब – आप अपनी बेगम साहबा की उम्र तो छिपाते हैं, फिर उनकी शहादत ही क्या? बाकी रहे हाफिज जी, उनकी आँखें पढ़ते-पढ़ते जाती रहीं; उनको दिन को ऊँट तो सूझता ही नहीं, भला सरेशाम, दोनों वक्त मिलते, नाखून के बराबर चाँद क्या सूझेगा।

आजाद – हजरत, मैंने और मियाँ खोजी ने कल शाम को अपनी आँखों देखा।

नवाब – तो तीन गवाहियाँ मोतबर हुईं। हमारी ईद तो हर तरह आज है।

इतने में फिटन पर से आबादीजान मुसकिराती हुई आई।

नवाब – आइए-आइए, आपकी ईद किस दिन है?

आबादीजान – क्या कोई भारी जोड़ा बनवा रखा है? फटे से मुँह शर्म नहीं आती?

नवाब – ईद कुरबाँ है यही दिन तो है कुरबानी का;

आज तलवार के मानिंद गले मिल कातिल।

हमको क्या, यहाँ तो तीसों रोजे चट किए बैठे हैं। दोवक्ता पुलाव उड़ता था। यह फिक्र तो उसको होगी जो दीन का टोकरा सिर पर लादे-लादे फिरते हैं।

आबादी – इन्हीं लच्छनों तो दोजख में जाओगे।

नवाब – खैर, एक तसकीन तो हुई! आपसे तो वहाँ जरूर गले मिलेंगे।

मुसाहब – सुभान-अल्लाह! क्या खूब सूझी, वल्लाह, खूब सूझी! क्या गरमा-गरम लतीफा कहा है।

इतने में चंपा लौंडी अंदर से घबराई हुई आई। लुट गए, लुट गए! ऐ हुजूर चोरी हो गई। सब मूस ले गया।

नवाब – क्या, क्या, चोरी हो गई! कब?

चंपा – रात को, और कब? इस वक्त जो बेगम साहबा कोठरी में जाती हैं, तो रोशनी देखते ही आँखों तले अँधेरा छा गया। जा कर देखती हैं, तो एक बिलूका। कपड़े-लत्ते सब तितर-बितर पड़े हैं।

मुसाहब – ऐ खुदावंद, कल तो एक बजे तक यहाँ दरबार गरम रहा। मालूम होता है, कोई पहले ही से घुसा बैठा था।

नवाब – जरी हमारी तलवार तो लाना भई! एहतियात शर्त है। शायद छिपा बैठा हो।

तलवार ले कर घर में गए, तो देखते हैं कि बेगम साहबा एक नाजुक पलंगड़ी पर सिर पकड़े बैठी हैं, और लौंडियाँ समझा रही हैं कि नवाब की सलामती रहे, एक से एक बढ़िया जोड़ा बन जायगा। आप घबराती काहे को हैं? नवाब ने जा कर कोठरी को देखा और तलवार हाथ में लिए पैतरे बदलते हुए घर-भर कर मुआयना किया। फिर बेगम से बोले – हमारा लहू पिए, जो रोए। आखिर यह रोना काहे का; माल गया, गया!

लौंडी – हाँ, सच तो फरमाते हैं। जान की सलामती रहे, माल भी कोई चीज है?

बेगम – आज ईद के दिन खुशियाँ मनाते, डोमनियाँ आतीं, मुबारकबादियाँ गातीं, दिन भर धमा-चौकड़ी मचती, रात को रतजगा करते, सो आज यह नया गुल खिला। मगर गहने की संदूकची छोड़ गया, इतना एहसान किया। अभी तक कलेजा धक-धक कर रहा है।

नवाब – हमारे सिर की कसम, लो उठो, मुँह धो डालो। ईद मनाओ, हमारा ही जनाजा देखे जो चोरी का गम करे। दो हजार कोई बड़ी चीज है!

आखिर बहुत कहने-सुनने पर बेगम साहबा उठीं। लौंडी ने मुँह धुलाया। नवाब साहब ने कहा – तुम्हें वल्लाह, हँस तो दो, वह होंठ पर हँसी आई! देखो मुसकिराती हो। वह नाक पर आई।

बेगम साहबा खिलखिला कर हँस पड़ी और घर-भर में कहकहे पड़ने लगे। यों बेगम साहबा को हँसा कर नवाब साहब बाहर निकले, तो मुसाहब, हवाली-मवाली, खिदमतगार गुल मचाने लगे – हुजूर, कुछ तो बतलाइए, यह मामला क्या है? आखिर किधर से चोर आया? कोई कहता है – हुजूर, बेघर के भदी के चोरी नहीं होती; हमको उस हब्शिन पर शक है। हब्शिन अंदर से गालियाँ दे रही है – अल्लाह करे झूठे पर बिजली गिरे, आसमान फट पड़े। किसी ने कहा – खुदावंद, चौकीदार की शरारत है। चौकीदार है कि लाखों कसमें खाता है। घर-भर में हरबोंग मचा हुआ है। इतने में एक मसखरे ने बढ़ कर कहा – हुजूर, कसम है कुरान की, हमें मालूम है। भला बेभला, हम पहचान गए, हमसे उड़ कर कोई जायगा कहाँ?

मुसाहब – मालूम है, तो फिर बताते क्यों नहीं?

मसखरा – अजी, बताने से फायदा क्या? मगर मालूम मुझको बेशक है। इसमें सुबहा नहीं। गलत हो, तो हाथ-हाथ बदते हैं।

नवाब – अरे, जिस पर तुझे शक है, उसका नाम बता क्यों नहीं देता।

मुसाहब – बताओ, तुम्हें खुदा की कसम। किस पर तुमको शक है? आखिर किसको ताका है? भई, हमको बचा देना उस्ताद।

मसखरा – (नवाब साहब के कान में) हुजूर, यह किसी चोर का काम है।

मुसाहब – क्या कहा हुजूर, किसका नाम लिया?

नवाब – (हँस कर) आप चुपके से फरमाते हैं, यह किसी चोर का काम है।

लोगों ने हँसते-हँसते पेट में बल पड़ गए। जिसे देखो, लोट रहा है। इतने में रेल के एक चपरासी ने आ कर तार का लिफाफा दिया। लिफाफा देखते ही नवाब साहब का चेहरा फक हो गया, हाथ-पाँव फूल गए। बोले – भई, किसी अंगरेजीदाँ को बुलाओ और तार पढ़वाओ। खुदा जाने, कहाँ से गोला आया है।

मुसाहब – क्यों मियाँ जवान, यह तार बड़े साहब के दफ्तर से आया है न?

चपरासी – नाहीं, रेलघर से आया है।

मुसाहब – वाह रे अंगरेजो, अल्लाह जानता हैं, अपने फन के उस्ताद हैं। और सुनिए, जल्दी के लिए अब तार की खबर भी रेल पर आने लगी। वाह रे उस्ताद, अकल काम नहीं करती।

हाफिज जी – खुदा जाने, यह तार बोलता क्योंकर है? आखिर तार के तो जान नहीं होती!

खिदमतगार एक अंगरेजीदाँ को ले आया। तार पढ़ा गया, तो मालूम हुआ कि किसी ने मिरजापुर से पूछा है कि ईद आज हैं, या कल होगी?

मुसाहब – यह तो फरमाइए, भेजा किसने?

बाबू – निसारहुसेन ने।

नवाब – समझ गया। मिरजापुर में हमारे एक दोस्त हैं निसारहुसेन। उन्हीं ने तार भेजा होगा। इसका जवाब किसी से लिखवाइए जिसमें आज ही पहुँच जाय। एक रुपया, दो रुपया, जो खर्च हो, दरोगा से दिलवा दो। और मियाँ नुदरत को तारघर भेजो और कहो कि अगर बाबू कुछ माँगे तो दे देना। मगर इतना कह देना कि खबर जरूर पहुँचे। ऐसा न हो कि कहीं राह में रुक रहे, तो गजब ही हो जाय।

मियाँ नुदरत लखनऊ के आदमी, नखास के बाहर उम्र भर कदम ही नहीं रखा। वह क्या जानें कि तारघर किस बला का नाम है। राह में एक-एक से पूछते जाते हैं – क्यों भई, तारघर कहाँ हैं? आखिरकार एक चपरासी ने कहा – कलकी बरक के सामने है। मियाँ नुदरत घबरा रहे थे, बुरे फँसे यार, तारघर में न जाने क्या वारदात हो। हम अंगरेजी कानून-वानून नहीं जानते। देखें, आज क्या मुसीबत पड़ती है? खैर, खुदा मालिक है। चलते-चलते कोई दो घंटे में ऐशबाग पहुँचे। यहाँ से पता पूछते-पूछते चले हुसेनगंज। वहाँ एक बाबू सड़क पर खड़े थे। उनसे पूछा – क्यों बाबूजी, तारघर कहाँ है? उन्होंने कहा, सामने चले जाओ। फिर पलटे। बाबू जी एक रुपया लाया हूँ और लिखवाना यह है कि आज ईद सुन्नियों की है, कल शियों की होगी। भला वहाँ बैठा रहूँ? जब खबर पहुँच जाय, तब आऊँ? बाबू ने कहा – ऐसा कुछ जरूरी नहीं। खैर, तारघर पहुँचे, तो कलेजा धक-धक कर रहा है कि देखिए जान क्योंकर बचती है। थोड़ी देर फाटक पर खड़े रहे और वहाँ से मारे डर के बेरंग वापस। राह में दोनों रुपए उन्होंने भुनाए और बीबी के लिए पँचमेल मिठाई चँगेल में ले चले। रास्ते में यही सोचते रहे कि नवाब से यों चकमा चलेंगे, यों झाँसा देंगे। चैन करो। उस्ताद, अब तुम्हारे पौ-बारह हैं। हलवाई की दुकान और दादा जी का फातिहा, घर में जो खुश-खुश घुसे, तो बीवी देखते ही खिल गईं। झपट कर चँगेल उनके हाथ से छीनी। देखा, तो मुँह में पानी भर आया। बरफी पर चाँदी का वरक लगा हुआ, इमर्तियाँ ताजी, लड्डू गरमागरम। पेड़े वह, जो मथुरा के पेड़ों के दाँत खट्टे कर दें। दो-तीन लड्डू और एक बरफी तो देखते ही देखते चट कर गईं। पेड़ा उठाने ही को थीं कि मियाँ नुदरत ने झल्ला कर पहुँचा पकड़ लिया और बोले – अरे, बस भी तो करोगी? एक लड्डू खाया, मैं कुछ न बोला; दूसरा निकाला, मैं चुपचाप देखा किया। तीसरे लड्डू पर हाथ बढ़ाया, बरफी खाई और अब चली पेड़े पर हाथ डालने! अब खाने-पीने की चीज में टोके कौन, इतनी बड़ी लूमड़ हो गईं, मगर बिल्लड़ ही बनी रहीं। मरभुक्खों की तरह मिठाई पर गिर पड़ने के क्या माने? दो प्यालियाँ लाओ, अफीम घोलो, पियो। जब खूब नशे गठें, तो मिठाइयाँ चखो। खुदा की कसम, यह अफीम भी नेमत की माँ का कलेजा है।

बीवी – (तिनक कर) बस, नेमत की माँ का कलेजा तुम्हीं खाओ। खाओ, चाहे भाड़ में जाओ। वाह, आज इतने बड़े त्योहार के दिन मिठाई क्या लाए कि दिमाग ही नहीं मिलता। मोती की सी आब उतार ली। एक पेड़े के खातिर पहुँचा धरके मरोड़ डाला।

इतने में बाहर से आवाज आई – मियाँ नुदरत हैं?

बीवी – सुनते हो, या कानों में ठेठियाँ हैं? एक आदमी गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला रहा है; दरवाजे को चूल से निकाले डालता है। बोलते क्यों नहीं? कहीं चोरी करके तो नहीं आए हो?

नुदरत – जरी आहिस्ते-आहिस्ते बातें करो।

बीवी – ऐ है, सच कहिएगा। हम तो खूब गुल मचाएँगे। मामा, हम परदे में हुए जाते हैं। जा कर उनसे कह दो – घर में घुले बैठे हैं।

नुदरत – नहीं, नहीं, यह दिल्लगी अच्छी नहीं। कह दो, नवाब साहब के यहाँ गए हैं।

मामा – (बाहर जा कर) मियाँ, क्या गुल मचा रहे हो? मैं तो समझी, कहीं से दौड़ आई है। वह तो सवेरे नवाब साहब के यहाँ गए थे, अभी आए नहीं जो मिलें, तो भेज दीजिएगा।

पुकारनेवाला – यह कैसी बात? नवाब साहब के यहाँ से तो हम भी अभी-अभी आ रहे हैं। वहाँ ढुँढ़स मची हुई है कि चल कहाँ दिए। अच्छा भाभी साहब से कहो, आज ईद के दिन दरवाजे पर आए हैं, कुछ सेवइयाँ-वेवइयाँ तो खिलाएँ। हम तो बेतकल्लुफ आदमी हैं। तकाजा करके दावत लेते हैं।

मामा ने अंदर से ले जा कर बाहर बरामदे में एक मोढ़ा डाल दिया। उधर मियाँ-बीवी में तकरार होने लगी।

मियाँ- अजी, टाल भी दो। ऐसे-ऐसे मुफ्तखोरे बहुत आया करते हैं। मामा, तुम भी पागल ही रहीं। मोढ़ा डालने की भला क्या जरूरत थी?

बीवी – ऐ वाह! हम तो जरूर खातिर करेंगे। यह अच्छा कि नवाब के यहाँ जा कर हमको गँवारिन बनाए? इसमें तुम्हारी नाक न कटेगी!

बीवी ने एक तश्तरी में पाँच-छह डलियाँ मिठाई की करीने से लगाकर उस पर रेशमी हरा रूमाल ढक दिया और मामा से कहा – जाओ, दे आओ। मियाँ नुदरत की रूह पर सदमा हुआ कि चार-पाँच डली तो बीबी बातें करते-करते चख गईं और पाँच-छह अब निकल गईं। गजब ही हो गया। मामा मिठाई ले कर चली, तो ड्योढ़ी में दो लड्डू चुपके से निकाल कर एक ताक में रख दिए। इत्तिफाक से एक छोकरा देख रहा था। जैसे मामा बाहर गई, वैसे ही दोनों लड्डू मजे से खा गया। चलिए, चोर के घर में मोर पैठा। मुसाहब ने रूमाल हटाया, तो कहा – वाह, भाभी साहब तो भाई साहब से भी बढ़ कर निकलीं। यह हाथी के मुँह में जीरा। खैर, पानी तो लाओ। हजरत ने मिठाई खाई और पानी पिया, तो पान की फर्माइश की। बीवी ने अपने हाथ से दो गिलौरियाँ बनाईं। मुसाहब ने चखीं, तो हुक्का माँगा। नुदरत ने कहा – देखा न, हाथ देते ही पहुँचा पकड़ लिया। मिठाई लाओ, पान खिलाओ, पानी पिलाओ, हुक्का भर लाओ; गोया बाबा के घर में बैठे हैं। इन मूजियों की तो कब्र तक से मैं वाकिफ हूँ। और इस पर क्या मौकूफ है। नवाब के यहाँ जितने हैं, सब गुरगे, मुफ्तखोरे, पराया माल ताकनेवाले। मामा, जा कर कह दो, हुक्का यहाँ कोई नहीं पीता। लेकिन बीवी ने हुक्का भरवा कर भेज ही दिया। जब पी चुके, तो बाहर से आवाज दी कि मामा, चारपाई यहाँ मौजूद हैं। जरा दरी या गलीचा दे जाइएगा। अब ठीक दोपहर में कौन इतनी दूर जाय। जरा कमर सीधी कर लें। तब तो मियाँ नुदरत खूब ही झल्लाए। आखिर शैतान का मंसूबा क्या है? देख रहा है कि मालिक घर में नहीं है; फिर यह दरवाजे पर चारपाई पर सोना क्या माने? और मुझसे-इससे कहाँ का ऐसा याराना है कि आते ही भाभी साहब से फरमाइशें होने लगीं।

इधर मामा ड्योढ़ी में गई कि लड्डू चुपके-चुपके खाय। ताक में ढूँढ़ मारा, पर लड्डुओं का कहीं पता नहीं। छोकरे ने पूछा – मामा, वहाँ क्या ढूँढ़ रही हो? वह तो चूहा खा गया। सच कहना, कैसी हुई? चूहे ने तुम्हारे अच्छे कान कतरे?

मुसाहब – मामा जी, जरी दरी दे जाइए।

मामा – यहाँ दरी-वरी नहीं है।

मुसाहब – हम जानते हैं, बड़े भाई कहीं इस वक्त ईद मिलने गए हैं। बस, समझ जाइए।

नुदरत ने कहा – खुश हुई? कुछ समझीं भी? अब यह इस फिक्र में हैं कि तुमको हमको लड़वा दें। और मिठाई भेजो! गिलौरियाँ चखाओ!

जब मियाँ मुसाहब चंपत हुए, तो मियाँ नुदरत भी चँगेल की तरफ बढ़े और अफीम की पिनक में खूब छक कर मिठाई चखी। फिर चले नवाब के घर। कदम-कदम पर फिकरे सोचते जाते हैं। बारे दाखिल हुए, तो लोगों ने आसमान सिर पर उठाया।

नवाब – शुक्र है, जिंदा तो बचे! यह आप अब तक रहे कहाँ आखिर?

मुसाहब – हुजूर, तारघर तो यह सामने है।

हाफिज – हाँ, और नहीं तो क्या? बात करते तो आदमी पहुँचता है।

रोशनअली – कौन, मुझसे कहिए, तो इतनी देर में अठारह फेरे करूँ।

नुदरत – हाँ भाई, घर बैठे जो चाहे कह लो, कोई जाय, तो आटे-दाल का भाव मालूम हो। चलते-चलते आँधी-रोग आ जाता है। बकरी मर गई और खानेवाले को मजा ही न आया। आप लोग थान के टर्रे हैं। कहने लगे, दो कदम पर है। यहाँ से गए सआदतगंज, वहाँ से धनिया महरी के पुल, वहाँ से ऐशबाग, वहाँ से गनेशगंज, वहाँ से अमीनाबाद होते हुए तारघर पहुँचे। दम टूट गया, शल हो गए, मर मिटे, न खाना, न दाना। आप लोग बैठे-बैठे यहाँ जो चाहे फरमायें, कहने और करने में फर्क है।

नवाब – तो इस ठाँय-ठाँय से वास्ता, यह कहिए, खबर पहुँची कि नहीं?

नुदरत – खुदावंद, भला मैं इसका क्या जवाब दूँ? खबर दे आया। बाबू ने मेरे सामने खट-खट किया, साहब ने रुपए लिए, चपरासियों को इनाम दिया। चार रुपए अपनी जेब से देने पड़े। वह तो कहिए, वहाँ मेरे एक जान-पहचान के निकल आए, नहीं बैरंग वापस आना पड़ता।

नवाब – खैर, तसकीन हुई। अब फरमाइए, इतनी देर कहाँ हुई?

नुदरत – खुदावंद, जल्दी के मारे बग्घी किराए करके गया था; लौटती बार उसने वह पलटा खाया कि मैं तो समझा, बस, कुचल ही गया। मगर खुदा कारसाज है, गिरा तो, लेकिन बच गया। कोई दो घंटे तक कोचवान बम ही दुरुस्त किया। इससे देर हुई। हुजूर, अब घर जाता हूँ।

नवाब – अरे भई, खाना तो खाते जाओ। अच्छा, चार रुपए वे हुए और बग्घी के किराए के भी कोई तीन रुपए हुए होंगे? सात रुपए दारोगा से ले लो।

नुदरत – नहीं खुदावंद झूठ नहीं बोलूँगा। चाहे फाका करूँ, मगर कहूँगा सच ही। यही तो गुलाम में जौहार है। दो रुपए और पाँच पैसे दिए। देखिए, खुदा को मुँह दिखाना है।

नवाब – दारोगा, इनको दस रुपए दे दो। सब बोलने का कुछ इनाम भी तो दूँ।

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