अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 25 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

· June 2, 2012

Premchand_4_aमियाँ आजाद हुस्नआरा के यहाँ से चले, तो घूमते-घामते हँसोड़ के मकान पर पहुँचे और पुकारा। लौंड़ी बोली कि वह तो कहाँ गए हैं, आप बैठिए।

आजाद – भाभी साहब से हमारी बंदगी कह दो ओर कहो, मिजाज पूछते हैं।

लौंडी – बेगम साहबा सलाम करती हैं और फर्माती हैं कि कहाँ रहे?

आजाद – इधर-उधर मारा-मारा फिरता था।

लौंडी – वह कहती हैं, हमसे बहुत न उड़िए। यहाँ कच्ची गोलियाँ नहीं खेलीं। कहिए, आपकी हुस्नआरा तो अच्छी है। यह बजरे पर हवा खाना और यहाँ आ कर बुत्ते बताना।

आजाद – आपसे यह कौन कच्चा चिट्ठा कह गया?

लौंडी – कहती हैं कि मुझसे भी परदा है? इतना तो बता दीजिए कि बरात किस दिन चढ़ेगी? हमने सुना है, हुस्नआरा आप पर बेतरह रीझ गईं। और, क्यों न रीझें, आप भी तो माशाअल्लाह गबरू जवान हैं।

आजाद – फिर भाई किसके हैं, जैसे वह खूबसूरत, वैसे हम।

लौंडी – फर्माती हैं कि धाँधली रहने दीजिए।

आजाद – भाभी साहब, यह घूँघट कैसा? हमसे कैसा परदा?

इतने में किसी ने पीछे से मियाँ आजाद की आँखें बंद कर लीं।

आजाद चिल्ला उठे – भाई साहब।

हँसोड़ – वहाँ तो आपने खूब रंग जमाया।

आजाद – अजी, आपकी दुआ है, मैं भला क्या रंग जमाता। मगर दोनों बहनें एक से एक बढ़ कर हैं। हुस्नआरा की दो बहनें और आई थीं। वल्लाह, खूब-मजे रहे।

हँसोड़ – खुशनसीब हो भाई, जहाँ जाते हो, वहीं पौ-बारह होते हैं। वल्लाह, मान गया।

आजाद – मगर भाई, एक गलती हो गई। उन्होंने किसी तरह भाँप लिया कि मैं शराब भी पीता हूँ।

हँसोड़ – बड़े अहमक हो भई, कोई ऐसी हरकत करता है। तुम्हारी सूरत से नफरत हो गई।

आजाद – अजी, मुझे तो अपनी सूरत से आप नफरत हो गई। मगर अब कुछ तदबीर तो बताओ ?

हँसोड़ – उसी बुड्ढे को साँटो, तो काम चले।

इस वक्त दोनों आदमी खाना खा कर लेटे। जब शाम हुई, तो दोनों हुस्नआरा की तरफ चले। भरी बरसात के दिन, कोई गोली के टप्पे पर गए होंगे कि पश्चिम की तरफ से मतवाली काली घटा झूमती हुई आई और दम के दम में चारों तरफ अँधेरा छा गया। दुकानदार दूकानें झटपट बंद करने लगे। खोंचे वालों ने खोंचा सँभाला, और लंबे हुए। कोई टट्टू को सोंटे पर सोंटा लगता है; किसी का बैल दुम दबाए भागा जाता है। कहार पालकी उठाए,कदम जमाए उड़े जाते हैं, दहने जंगी, बाएँ चरखा-हूँ-हूँ-हूँ। पैदल चलनेवाले तेज कदम उठाते हैं, पाँयचे चढ़ाते हें। किसी ने जूतियाँ बगल में दबाईं और सरपट भागा। किसी ने कमर कसी और घोड़े को एँड़ दी। अँधेरा इस गजब का है कि राह सूझती ही नहीं, एक पर एक भद-भद करके गिरता है और मियाँ आजाद कहकहे लगाते हैं। क्यों हजरत, पूछना न पाछना और धमाक से लुढ़क जाना!

आजाद – बस, और थोड़ी दूर रह गया है।

हँसोड़ – आपको थोड़ी दूर होगा,यहाँ तो कदम भर चलना मुश्किल हो रहा है। जरी देख-भाल कर कदम उठाइएगा। उफ्, हवा ने क्या जोर बाँधा, मैं तो वल्लाह, काँपने लगा। अगर सलाह हो, घर पलट चलें। वह लीजिए, बूँदें भी पड़ने लगीं। किसी भले मानुस के पास जाने का भला यह कौन मौका है।

आजाद – अजी, ये बातें उससे कीजिए, जो अपने होश में हो। यहाँ तो दीवानापन सवार है।

इतने में बड़ी बेगम का महल नजर पड़ा। आजाद ने मारे खुशी के टोपी उछाल दी। तब तो हँसोड़ ने बिगड़ कर उसे एक अँधे कुएँ में फेंक दिया और कहा – बस, तुममें यही तो ऐब है कि अपने आपे में नहीं रहते। ‘ओछे के घर तीतर, बाहर रखूँ कि भीतर।’

आजाद – या तंग न कर नासेह नादाँ, मुझे इतना,

या लाके दिखा दे दहन ऐसा, कमर ऐसी।

तुम रूखे-फीके आदमी, चेहरे पर भूसा उड़ रहा है। तुम ये मुहब्बत की बातें क्या जानो?

जब महल के करीब पहुँचे, तो चौकीदार ने ललकारा – कौन? मियाँ हँसोड़ तो झिझके, मगर, आजाद ने बढ़ कर कहा – हम हैं, हम।

चौकीदार – अजी, हम का नाम तो फर्माइए, या ठंडी-ठंडी हवा खाइए।

आजाद – हम? हमारा नाम मियाँ आजाद है। तुम दिलबहार को इत्तिला कर दो।

खैर, किसी तरह आजाद अंदर पहुँचे। हुस्नआरा उस वक्त सो रही थीं और सिपहआरा बैठी एक शायर का दीवान पढ़ रही थी। आजाद की खबर सुनते ही बोली – कहाँ हैं कहाँ, बुला लाओ। मियाँ आजाद मकान में दाखिल हुए।

सिपहआरा – वह आए घर में हमारे

खुदा की कुदरत है;

कभी हम उनको, कभी

अपने घर को देखते हैं।

आजाद – यह रूखी खातिरदारी कब तक होगी? हमें दूल्हा भाई कब से कहिएगा?

सिपहआरा – खुदा वह दिन दिखाए तो।

आजाद – आपकी बाजी कहाँ है?

सिपहआरा – आज कुछ तबीयत नासाज है। दिलबहार, जगा दो। कहो मियाँ आजाद आए हैं।

हुस्नआरा अँगड़ाई लेती अठखेलियाँ करती चलीं और आजाद के करीब आ कर बैठ गईं।

आजाद – इस वक्त हमारे दिल की कली खिल गई।

सिपहआरा – क्यों नहीं, फिर मुँह-माँगी मुराद भी तो मिल गई।

आजाद – आखिर अब हम कब तक तरसा करें? आज मैं बेकबुलवाए उठूँ, तो आजाद नहीं।

हुस्नआरा – हमारा तो इस वक्त बुरा हाल है। नींद उमड़ी चली आती है। अब हमें सोने जाने दीजिए।

आजाद – (दुपट्टा पाँव से दबाकर) हाँ, जाइए, आराम कीजिए।

हुस्नआरा – शरारत से आप बाज नहीं आते। दामन तो दबाए हैं और कहते हैं, जाइए-जाइए, क्योंकर जायँ?

आजाद – दुपट्टे को फेंक जाइए।

हुस्नआरा – बजा है, यह किसी और को सिखाइए, (बैठकर) अब साफ कह दूँ।

आजाद – जरूर; मगर आपके तेवर इस वक्त बेढब हैं, खुदा ही खैर करे! जो कुछ कहना हो कह डालिए। खुदा करे, मेरे मतलब की बात मुँह से निकले!

हुस्नआरा – आप लायक हैं, मगर एक परदेसी आदमी, ठौर न ठिकाना, घर न बार। किसी से आपका जिक्र करूँ, तो क्या कहूँ? किसके लड़के हैं? किसके पोते हैं? किस खानदान के हैं? शहर भर में यही खबर मशहूर हो जायगी कि हुस्नआरा ने एक परदेसी के साथ शादी कर ली। मुझे तो इसकी परवा नहीं; लेकिन डर यह है कि कहीं इस निकाह से लोग पढ़ी-लिखी औरतों को नीची नजर से न देखने लगें। बात वह करनी चाहिए कि धब्बा न लगे। मैं पहले भी कह चुकी हूँ और अब फिर कहती हूँ कि शहर में नाम पैदा कीजिए, इज्जत कमाइए, चार भले आदमियों में आपकी कदर हो।

आजाद – कहिए, आग में फाँद पड़ूँ?

हुस्नआरा – माशा-अल्लाह, कही भी तो निराली? अगर आप आग में फाँद पड़े, तो लोग आपको सिड़ी समझेंगे।

सिपहआरा – कोई किताब लिखिए।

हुस्नआरा – नहीं; कोई बहादुरी की बात हो कि जो सुने, वाह-वाह करने लगे, और फिर अच्छी-अच्छी रईसजादियाँ चाहें कि उनके साथ मियाँ आजाद का ब्याह हो जाय। इस वक्त मौका भी अच्छा है। रूम और रूस में लड़ाई छिड़नेवाली है। रूम की मदद करना आपका फर्ज है। आप रूम की तरफ से लड़िए और जवाँमर्दी के जौहर दिखाइए, तमगे लटकाए हुए आइए, तो फिर हिंदोस्तान भर में आप ही की चर्चा हो।

आजाद – मंजूर, दिलोजान से मंजूर। जाऊँ और बीच खेत जाऊँ। मरे, तो सीधे जन्नत में जायँगे। बचे, तो तुमको पाएँगे।

सिपहआरा – मेरे तो लड़ाई के नाम से होश उड़े जाते हैं। (हुस्नआरा से चिमट कर) बाजी, तुम कैसी बेदर्द हो, कहाँ काले कोसों भेजती हो! तुम्हें खुदा की कसम, इस खयाल से बाज आओ। आजाद जाएँगे, तो फिर उनकी सूरत देखने को तरस जाओगी। दिन-रात आँसू बहाओगी। क्यों मुफ्त में किसी की जान की दुश्मन हुई हो?

किनारे दरिया पहुँच के पानी

पिया नहीं एक बूँद तिस पर,

चढ़ी है मौजों की हमसे त्यौरी

हुबाब आँखें बदल रहे हैं।

यह कहते-कहते सिपहआरा की आँखों से गोल-गोल आँसू की बूँदे गिरने लगीं।

हुस्नआरा – हैं-हैं, बहन, यह मुफ्त का रोना धोना अच्छा स्वाँग है, वह मुबारक दिन मेरी आँखों के सामने फिर रहा है, जब आजाद तमगे लटकाए हुए हमारे दरवाजे पर खड़े होंगे।

मियाँ आजाद पर इस वक्त वह जोबन था कि ओहोहो, जवानी फटी पड़ती थी। आँखें सुर्ख, जैसे कबूतर का खून; मुखड़ा गोरा, जैसे गुलाब का फूल; कपड़े वह बाँके पहने थे कि सिर से पाँव तक एक-एक अंग निखर गया था; टोपी वह बाँकी की बाँकपन भी लोट जाय; कमर से दोहरी तलवारें लटकी हुई। हुस्नआरा को उनका चाँद सा मुखड़ा ऐसा भाया कि जी चाहा, इसी वक्त निकाह कर लूँ; मगर दिल पर जब्त किया।

आजाद – आज हम घर से मौत की तलाशी में ही निकले थे –

जब से सुना कि मरने का है नाम जिंदगी;

सिर से कफन को बाँधे कातिल को ढूँढ़ते हैं।

सिपहआरा – प्यारे आजाद, खुदा के वास्ते इस खयाल से बाज आओ।

आजाद – या हाथ तोड़ जायँगे, या खोलेंगे नकाब। हुस्नआरा सी बीबी पाना दिल्लगी नहीं। अब हम फिर शादी का हर्फ भी जबान पर लाएँ, तो जवाँ-मर्द नहीं। अब हमारी इनकी शादी उसी रोज होगी, जब हम मैदान में सुर्खरू हो कर लौटेंगे। हम सिर कटवाएँ, जख्म पर जख्म खाएँगे मगर मैदान से कदम न हटाएँगे।

सिपहआरा – जो आपने दालान तक भी कदम रखा तो हम रो-रोक कर जान दे देंगे।

आजाद – तुम घबराओ नहीं जीते बचे, तो फिर आएँगे। हमारे दिल से हुस्नआरा की और तुम्हारी मुहब्बत जाती रहे, यह मुश्किल है। तुम मेरी खातिर से रोना-धोना छोड़ दो। आखिर क्या लड़ाई में सब के सब मर ही जाते हैं?

सिपहआरा – इतनी दूर जा कर ऐसी ही तकदीर हो, तो आदमी लौटे। अब मेरी जिंदगी मुहाल है। मुझे दफना के जाना। अल्लाह जाने, किन-किन जंगलों में रहोगे, कैसे-कैसे पहाड़ों पर चढ़ना होगा, कहाँ-कहाँ लड़ना-भिड़ना होगा। एक जरा सी गोली तो हाथी का काम तमाम कर देती है, इनसान की कौन कहे। तुम वहाँ गोलियाँ खाओगे और हम दिन-रात बैठे-बैठे कुढ़ा करेंगे। एक-एक दिन एक-एक बरस हो जाएगा! और फिर क्या जाने, आओ न आओ, लड़ाई-चढ़ाई पर जाना कुछ हँसी थोड़े ही है। यह तो तुम्हीं मरदों का काम है। हम तो यही से नाम सुन-सुन कर काँपते हैं।

हुस्नआरा – मेरी प्यारी बहन, जरा सब्र से काम लो।

सिपहआरा – न मानूँगी, न मानूँगी।

हुस्नआरा – सुन तो लो।

सिपहआरा – जी, बस, सुन चुकी। खून कीजिए, और कहिए, सुन तो लो।

हुस्नआरा – यह क्या बुरी-बुरी बातें मुँह से निकालती हो। हमें बुरा मालूम होता है। मैं उनको जबरदस्ती थोड़े ही भेजती हूँ। वह तो आप जाते हैं।

सिपहआरा – समुंदर समुंदर जाना पड़ेगा। कोई तूफान आ गया, तो जहाज ही डूब जायगा।

आजाद – अब रात ज्यादा आई, आप लोग आराम करें, हम कल रात को यहाँ से कूच करेंगे।

सिपहआरा – इस तरह जाना था, तो हमारे पास दिल दुखाने आए क्यों थे? (हाथ पकड़ कर) देखूँ, क्योंकर जाते हैं,

आजाद – दिलोजिगर खून हो चुके हैं।

हवास तक अपने जा चुके हैं।

वही मुहब्बत का हौसला है,

हजार सदमे उठा चुके हैं।

हुस्नआरा – हाय, किस गजब में जान पड़ी। हाथ पाँव टूटे जाते हैं, आँखें जल रही हैं। आजाद, अगर मुझे दुनिया में किसी की चाह है, तो तुम्हारी। लेकिन दिल से लगी है कि तुम रूसियों को नीचा दिखाओ। मरना-जीना मुकद्दर के हाथ है। कौन रहा है, और कौन रहेगा।

ताज में जिनके टँकते थे गौहर;

ठोकरें खाते हैं वह सर-ता-सर।

है न शीरीं न कोहकन का पता;

न किसी जा है नल-दमन का पता

यही दुनियाँ का कारखाना है;

यह उलट फेर का जमाना है।

आजाद – हम तो जाते हैं, तुम सिपहआरा को समझाती रहना। नहीं तो राह में मेरे कदम न उठेंगे। कल रात को मिल कर कूच करूँगा।

हुस्नआरा – बहन, इनको जाने दो, कल आएँगे।

सिपहआरा – जाइए, मैं आपको रोकनेवाली कौन?

आजाद यहाँ से चले कि सामने से मियाँ चंडूबाज आते हुए मिल गए। गले से लिपट कर बोले – वल्लाह, आँखें आपको ढूँढ़ती थीं। सूरत देखने को तरस गए। वह जो चलते वक्त आपने तान कर चाबुक जमाया था, उसका निशान अब तक बना है। बारे मिले खूब। बी अलारक्खी तो मर गईं, बेचारी मरते वक्त खुदा की कसम, अल्लाह-अल्लाह कहा की और दम तोड़ने के पहले तीन दफा आजाद-आजाद कह कर चल बसीं।

आजाद ने चंडूबाज की सूरत देखी, तो हाथ-पाँव फूल गए। रूस का जाना और तमगे लटकाना भूल गए। सोचे, अब इज्जत खाक में मिली। लेकिन जब चंडूबाज ने बयान किया कि अलारक्खी चल बसीं और मरते वक्त तक मेरे ही नाम की रट लगाती रहीं, तो बड़ा अफसोस हुआ। आँखों से आँसू बहने लगे।

बोले – भाई, तुमने बुरी खबर सुनाई। हाय, मरते वक्त दो बातें भी न करने पाए।

चंडूबाज – क्या अर्ज करूँ, कसम खुदा की, इस प्यार और इस हसरत से तुम्हें याद किया कि क्या कहूँ। मेरी तो रोते-रोते हिचकी बँध गई। जरा सा भी खटका होता तो कहतीं – आजाद आए। आप अपना एक रूमाल वहाँ भूल आए हैं, उसको हर रोज देख लिया करती थीं, मरते वक्त कहा कि हमारी कब्र पर यह रूमाल रख देना।

आजाद – (रो कर) उफ, कलेजा मुँह को आता है। मुझे क्या मालूम था कि उस गरीब को मुझसे इतनी मुहब्बत थी।

चंडूबाज – एक गुलदस्ता अपने हाथ से बना कर दे गई हैं कि अगर मियाँ आजाद आ जायँ, तो उनको दे देना और कहना, अब हश्र में आपकी सूरत देखेंगे।

आजाद – भई, इसी वक्त दो। खुदा के वास्ते अभी लाओ। मैं तो मरा बेमौत, लाओ, गुलदस्ता जरा चूम लूँ। आँखों से लगाऊँ, गले से लगाऊँ।

चंडूबाज – (आँसू बहा कर) चलिए, मैं सराय में उतरा हुआ हूँ। गुलदस्ता साथ है। उसको जान से भी ज्यादा प्यार करता हूँ।

दोनों आदमी मिल कर चले, राह में अलारक्खी के रूप-रंग और भोली-भाली बातों का जिक्र रहा। चलते-चलते दोनों सराय में दाखिल हुए। मियाँ आजाद जैसे ही चंडूबाज की कोठरी में घुसे, तो क्या देखते हैं कि बी अलारक्खी बगले के पर जैसा सफेद कपड़ा पहने खड़ी हैं। देखते ही मियाँ आजाद का रंग फक हो गया। चुप, अब हिलते हैं न बोलते हैं।

अलारक्खी – (तालियाँ बजा कर) आदाब अर्ज करती हूँ। जरी इधर नजर कीजिए। यह कोसों की राह तय करके हम आप ही की जियारत के लिए आए हैं और आपको हमसे ऐसी नफरत कि आँख तक नहीं मिलाते! वाह री किस्मत! अब जरा सिर तो हिलाइए, गरदन तो उठाइए, वह चाँद सा मुखड़ा तो दिखाइए! कहिए, आपकी हुस्नआरा तो अच्छी हैं? जरा हमको तो उनका जोबन दिखाओ। हमने सुना, कभी-कभी बजरों पर दरिया की सैर की जाती हैं, कभी हमजोलियों को ले कर जश्न मनाती हैं। क्यों हजरत, हम बक रहे हैं? हमारा ही लहू पिए, जो इधर न देखे।

आजाद – खुदा की कसम, सिर्फ तुम्हीं को देखने आया हूँ।

चंडूबाज – भई, आजाद की रोते-रोते हिचकी बँध गई थी। कसम खुदा की, मैंने जो यह फिकरा चुस्त किया कि अलारक्खी ने मरते वक्त आजाद-आजाद कह के दम तोड़ा, तो यह बेहोश हो कर गिर पड़े।

अलारक्खी – खैर, इतनी तो ढारस हुई कि मरने के बाद भी हमको कोई पूछेगा। लेकिन-

आए तुरबत पे बहुत रोए, किया याद मुझे;

खाक उड़ाने लगे, जब कर चुके बरबाद मुझे।

आजाद – अलारक्खी, अब हमारी इज्जत तुम्हारे हाथ है। अगर तुम्हें हमसे मुहब्बत है, तो हमें दिक न करो। नहीं हम संखिया खा कर जान दे देंगे। अगर हमें जिलाना चाहती हो, तो हमें आजाद कर दो।

अलारक्खी – सुनो आजाद, हम भी शरीफजादी हैं, मगर अल्लाह को यही मंजूर था कि हम भठियारी बन कर रहें। याद है, हमारे बूढ़े मियाँ ने तुम्हें खत दे कर हमारे मकान पर भेजा था और तुम कई दिन तक हमारे घर का चक्कर लगाते रहे थे? हम दिन-रात कुढ़ा करते थे। आखिर वह तो कब्र में पाँव लटकाए बैठे ही थे, चल बसे। उस दिन हमने मजसिद में घी के चिराग जलाए। मुकद्दर खींच कर यहाँ लाया। लेकिन अल्लाह जानता है, जो मेरी आँख किसी से लड़ी हो। तुमसे ब्याह करने का बहुत शौक था, लेकिन तुम राजी न हुए। अब हमने सुना है कि हुस्नआरा के साथ तुम्हारा निकाह होने वाला है। अल्लाह मुबारक करे। अब हमने आपको इजाजत दे दी, खुशी से ब्याह कीजिए; लेकिन हमें भूल न जाना। लौंडी बन कर रहूँगी, मगर तुमको न छोड़ूँगी।

आजाद – उफ, तुम वह हो, जिसका उस बूढ़े से ब्याह हुआ था? यह भेद तो अब खुला। मगर हाय, अफसोस, तुमने यह क्या किया। तुम्हारी माँ ने बड़ी बेवकूफी की, जो तुम जैसी कामिनी का एक बुड्ढे के साथ ब्याह कर दिया।

अलारक्खी – अपनी तकदीर!

कुछ देर तक आजाद बैठे अलारक्खी को तसल्ली देते रहे। फिर गला छुड़ा कर, चकमा देकर निकल खड़े हुए। कुछ ही दूर आगे बढ़े थे कि तबले की थपक कानों में आई। घर का रास्ता छोड़ महफिल में जा पहुँचे। देखा, वहाँ खूब धमा चौकड़ी मच रही है। एक ने गजल गाई, दूसरे ने ठुमरी, तीसरे ने टप्पा। आजाद एक ही रसिया, वहीं जम गए। अब इस सनक की देखिए कि गैर की महफिल और आप इंतजाम करते हैं, किसी हुक्के की चिलम भरवाते हैं, किसी गुड़गुड़ी को ताजा करवाते हैं; कभी ठुमरी की फर्माइश की, कभी गजल की। दस-पंद्रह गँवारों ने जो गाने की आवाज सुनी, तो धँस पड़े। मियाँ आजाद ने उन्हें धक्के दे कर बाहर किया। मालिक मकान ने जो देखा कि एक शरीफ नौजवान आदमी इंतजाम कर रहे हैं, तो इनको पास बुलाया, तपाक से बिठाया, खाना खिलाया। यही बहार देखते-देखते आजाद ने रात काट दी। वहाँ से उठे, तो तड़का हो गया था।

मियाँ आजाद को आज ही रूम के सफर की तैयारी करनी थी। इसी फिक्र में बदहवास जा रहे थे। क्या देखते हैं, एक बाग में झूले पड़े हैं; कई लड़कियाँ हाथ-पाँव में मेहँदी रचाए, गले में हार डाले पेंग लगा रही हैं और सब की सब सुरीली आवाज से लहरा-लहरा कर यों गा रही हैं –

नदिया-किनारे बेला किसने बोय, नदिया-किनारे;

बेला भी बोया, चमेली भी बोई

बिच-बिच बोया रे गुला, नदिया-किनारे।

आजाद को यह गीत ऐसा भाया कि थोड़ी देर ठहर गए। फिर खुद झूले पर जा बैठे और पेंग लगाने लगे। कभी-कभी गाने भी लगते, इस पर लड़कियाँ खिलखिला कर हँस पड़ती थीं। एकाएक क्या देखते हैं कि एक काला-कलूटा मरियल सा आदमी खड़ा लड़कियों को घूर रहा है। आजाद ने कई बार यह कैफियत देखी, तो उनसे रहा न गया, एक चपत जमा ही तो दी। टीप खाते ही वह झल्ला उठा और गालियाँ दे कर कहने लगा – न हुई विलायती इस वक्त पास, नहीं तो भुट्टा सा सिर उड़ा देता। और जो कहीं जवान होता, तो खोद कर गाड़ देता। और, जो कहीं भूखा होता, तो कच्चा ही खा जाता। और जो कहीं नशे की चाट होती, तो घोल के पी जाता।

आजाद पहचान गए, यह मियाँ खोजी थे। कौन खोजी? नवाब के मुसाहब। कौन नवाब? वही बटेरबाज, जिनके सफशिकन को ढूँढ़ने आजाद निकले थे। बोले – अरे; भाई खोजी हैं? बहुत दिनों के बाद मुलाकात हुई। मिजाज तो अच्छा है?

खोजी – जी हाँ, मिजाज तो अच्छा है; लेकिन खोपड़ी भन्ना रही है। भला हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था। वह तो कहिए मैं तुम्हें पहचान गया; नहीं तो इस वक्त जान से मार डालता।

आजाद – इसमें क्या शक, आप हैं ही ऐसे दिलेर! आप इधर कैसे आ निकले?

खोजी – आप ही की तलाश में तो आया था।

आजाद – नवाब तो अच्छे हैं?

खोजी – अजी वह गए चूल्हे में। यहाँ सर भन्ना रहा है।ले अब चलो, तुम्हारे साथ चलें। कुछ तो खिलवाओ यार। मारे भूख के बेदम हुए जाते हैं।

आजाद – हाँ,हाँ, चलिए खूब शौक से।

दोनों मिल कर चले, तो आजाद ने खोजी को शराब की दुकान पर ले जा कर इतनी शराब पिलाई कि वह टें हो गए, उन्हें वही छोड़ मियाँ हँसोड़ के घर जा पहुँचे।

मियाँ हँसोड़ बहुत नाराज हुए कि मुझे तो ले जा कर हुस्नआरा के मकान के सामने खड़ा कर दिया और आप अंदर हो रहे। आधी रात तक तुम्हारी राह देखता रहा। यह आखिर आप रात को थे कहाँ?

आजाद अभी कुछ जवाब देनेवाले ही थे कि एक तरफ से मियाँ पीरबख्श को आते देखा और दूसरी तरफ से चंडूबाज को। आप दूर ही से बोले – अजीब तरह के आदमी हो मियाँ! वहाँ से कह कर चले कि अभी आता हूँ, पल भर की भी देर न होगी, और तब के गए-गए अब तक सूरत नहीं दिखाई, अलारक्खी बेचारी ढाढ़ें मार-मार कर रो रही हैं। चलिए उनके आँसू तो पोंछिए।

मियाँ पीरबख्श ने बातें सुनीं, तो उनके कान खड़े हुए। हज्जाम के मुँह से तो यह सुन ही चुके थे कि मियाँ आजाद किसी सराय में एक भठियारिन पर लट्टू हो गए थे, पर अब तक हुस्नआरा से उन्होंने यह बात छिपा रखी थी। इस वक्त जो फिर वही जिक्र सुना, तो दिल में सोचने लगे कि यहाँ तो लड़कियों को रात-रात भर नींद नहीं आती; हुस्नआरा तो किसी कदर जब्त भी करती हैं, मगर सिपहआरा बेचारी फूट-फूट कर रोती है; या यहाँ बैठे हुए बी अलारक्खी के दुखड़े सुनिएगा? अगर कहीं दोनों बहनें सुन ले, तो कैसी हो? बस, अब भलमंसी इसी में है कि मेरे साथ चले चलिए; नहीं तो हुस्नआरा से हाथ धोइएगा और फिर अपनी फूट किस्मत को रोइएगा।

चंडूबाज – मियाँ, होश की दवा करो? भला मजाल है कि यह अलारक्खी को छोड़ कर यहाँ से जायँ। क्या खूब, हम तो सैकड़ों कुएँ झाकते यहाँ आए, आप बीच में बोलनेवाले कौन?

आजाद – अजी, इन्हें बकने भी दो, हम तुम्हारे साथ अलारक्खी के पास चलेंगे। उस मुहब्बत की पुतली को दगा न देंगे। तुम घबराते क्यों हो? खाना तैयार है; आज मीठा पुलाव पकवाया है; तुम जरा बाजार से लपक कर चार आने की बालाई ले लो। मजे से खाना खायँ। क्यों उस्ताद, है न मामले की बात, लाना हाथ।

चंडूबाज बालाई का नाम सुनते ही खिल उठे। झप से पैसे लिए और लुढ़कते हुए चले बालाई लाने। मियाँ आजाद उन्हें बुत्ता दे कर पीरबख्श से बोले – चलिए हजरत, हम और आप चलें। रास्ते में बातें होती जायँगी।

दोनों आदमी वहाँ से चले। आजाद तो डबल चाल चलने लगे, पर मियाँ पीरबख्श पीछे रह गए। तब बोले – अजी, जरा कदम रोके हुए चलिए। किसी जमाने में हम भी जवान थे। अब यह फर्माइए कि यह अलारक्खी कौन है? जो कहीं हुस्नआरा सुन पाएँ, तो आपकी सूरत न देखें; बड़ी बेगम को तुमको अपने महल के एक मील इधर-उधर फटकने न दें। आप अपने पाँव में आप कुल्हाड़ी मार रहे हैं। अब शादी-वादी होना खैर-सल्लाह है। सोच लीजिए कि अगर वहाँ इनकी बात चली, तो क्या जवाब दीजिएगा।

आजाद – जनाब, यहाँ सोचने का मरज नहीं। उस वक्त जो जबान पर आएगा, कह जाऊँगा। ऐसी वकालत करूँ कि आप भी दंग हो जायँ – जबान से फुलझड़ी छूटने लगे।

इतने में कोठी सामने नजर आई और जरा देर में दोनों आदमी महल में दाखिल हुए। सिपहआरा तो आजाद से मिलने दौड़ी, मगर हुस्नआरा अपनी जगह से न उठी। वह इस बात पर रूठी हुई थी कि इतना दिन चढ़ आया और मियाँ आजाद ने सूरत न दिखाई।

हुस्नआरा – बहन, इनसे पूछो कि आप क्या करने आए हैं?

आजाद – आप खुद पूछिए। क्या मुँह नहीं है या मुँह में जबान नहीं है!

सिपहआरा – यह अब तक आप कहाँ गायब रहे?

हुस्नआरा – अजी, हमें इनकी क्या परवा। कोई आए या न आए, हम किसी के हाथ बिके थोड़े ही हैं।

सिपहआरा – बाजी की आँखें रोते-रोते लाल हो गईं।

हुस्नआरा – पूछो, आखिर आप चाहते क्या हैं?

आजाद – पूछे कौन, आखिर आप खुद क्यों नहीं पूछतीं –

कहूँ क्या मैं तुझसे कि क्या चाहता हूँ,

जफा हो चुकी, अब वफा चाहता हूँ।

बहुत आशना हैं जमाने में, लेकिन –

कोई दोस्त दर्द-आशना चाहता हूँ।

हुस्नआरा – इनसे कह दो, यहाँ किसी की वाही-तबाही बकवाद सुनने का शौक नहीं है। मालूम है, आप बड़े शायर की दुम हैं?

सिपहआरा – बहन, तुम लाख बनो, दिल की लगी कहीं छिपाने से छिपती है।

हुस्नआरा – चलो, बस, चुप भी रहो। बहुत कलेजा न पकाओ। हमारे दिल पर जो गुजर रही है, हमीं जानते हैं। चलो, हम और तुम कमरा खाली कर दें, जिसका जी चाहे बैठे, जिसका जी चाहे जाय। हयादार के लिए एक चुल्लू काफी है।

यह कह कर हुस्नआरा उठी और सिपहआरा भी खड़ी हुई। मियाँ आजाद ने सिपहआरा का पहुँचा पकड़ लिया। अब दिल्लगी देखिए कि मियाँ आजाद तो उसे अपनी तरफ खींचते हैं और हुस्नआरा अपनी तरफ घसीटती हुई कह रही हैं – हमारी बहन का हाथ कोई पकड़े, तो हाथ ही टूटें। जब हमने टका सा जवाब दे दिया, तो फिर यहाँ आनेवाला कोई कौन! वाह, ऐसे हयादार भी नहीं देखे!

आजाद – साहब, आप इतना खफा क्यों होती हैं? खुदा के वास्ते जरा बैठ जाइए। माना कि हम खतावार हैं, मगर हमसे जवाब तो सुनिए। खुदा गवाह है, हम बेकसूर हैं।

हुस्नआरा – बस बस, जबान न खुलवाइए। बस अब रुखसत। आप अब छह महीने के बाद सूरत दिखाइएगा, हम भी कलेजे पर पत्थर रख लेंगे।

यह कह कर हुस्नआरा तो वहाँ से चली गई और मियाँ आजाद अकेले बैठे-बैठे सोचने लगे कि इसे कैसे मनाऊँ। आखिर उन्हें एक चाल सूझीं। अरगनी पर से चादर उतार ली और मुँह ढाँप कर लेट रहे। चेहरा बीमारों का सा बना लिया और कराहने लगे। इत्तिफाक से मियाँ पीरबख्श उस कमरे में आ निकले। आजाद की सूरत जो देखी, तो होश उड़ गए। जा कर हुस्नआरा से बोले – जल्द पलंग बिछवाओ, मियाँ आजाद को बुखार हो आया है।

हुस्नआरा – हैं हैं, यह क्या कहते हो। पाँव-तले से मिट्टी निकल गई।

सिपहआरा – कलेजा धड़-धड़ करने लगा! ऐसी सुनानी अल्लाह सातवें दुश्मन को भी न सुनाए।

हुस्नआरा – हाय मेरे अल्लाह, मैं क्या करूँ। मैंने अपने पैरों में आप कुल्हाड़ी मारी।

जरा देर में पलंग बिछ गया! हुस्नआरा, उसकी बहन, पीरबख्श और दिल बहार चारपाई के पास खड़े हो कर आँसू बहाने लगे।

दिलबहार – मियाँ, किसी हकीम जी को बुलाओ।

सिपहआरा – चेहरा कैसा जर्द हो गया!

पीरबख्श – मैं अभी जा कर हकीम साहब को लाता हूँ।

हुस्नआरा – हकीम जी का यहाँ क्या काम है? और, यों आप चाहे जिसको बुलाएँ।

मियाँ पीरबख्श तो बाहर गए और हुस्नआरा पलंग पर जा बैठी, मियाँ आजाद का सिर अपने जानू पर रखा। सिपहआरा फूलों का पंखा झलने लगी।

हुस्नआरा – मेरी जबान कट पड़े। मेरी ही जली-कटी बातों ने यह बुखार पैदा किया।

यह कह कर उसने आहिस्ता-आहिस्ता आजाद की पेशानी को सहलाना शुरू किया। आजाद ने आँखें खोल दीं और बोले –

मेरे जनाजे को उनके कूचे में

नाहक अहबाब लेके आए;

निगाहे-हसरत से देखते हैं

वह रुख से परदा हटा-हटा कर।

शहर है नजदीक, शब है आखिर,

सरा से चलते हैं हम मुसाफिर;

जिन्हें है मिलना, वे सब हैं हाजिर,

जरस से कह दो, कोई सदा कर।

हुस्नआरा – क्यों हजरत, यह मक्कारी! खुदा की पनाह, मेरी तो बुरी गत हो गई।

आजाद – जरा उसी तरह इन नाजुक हाथों से फिर माथा सहलाओ।

हुस्नआरा – मेरी बला जाती है, वह वक्त ही और था।

आजाद – मैंने कहा जो उनसे कि शब को यहीं रहो;

आँखें झुकाए बोले कि किस एतबार पर?

हुस्नआरा – आपने आखिर यह स्वाँग क्यों रचा? छिपाइए नहीं, साफ-साफ बताइए।

आजाद – अब कहती हो कि तुम मेरी

महफिल में आए क्यों;

आता था कौन, कोई

किसी को बुलाए क्यों?

कहता हूँ साफ-साफ

कि मरता हूँ आप पर;

जाहिर जो बात हो,

उसे कोई छिपाए क्यों?

यहाँ मारे बुखार के दम निकल रहा है, आप मक्र समझती हैं।

यहाँ दोनों में यही नोकझोंक हो रही थी, इतने में मियाँ खोजी पता पूछते हुए आ पहुँचे।

खोजी – मियाँ होत, जरा आजाद को तो बुलाओ।

दरवान – किससे कहते हो? आए कहाँ से? हो कौन?

खोजी – ऐं, यह तो कुछ बातूनी सा मालूम होता है। अबे, इत्तला कर दे कि ख्वाजा साहब आए हैं।

दरवान – ख्वाजा साहब! हमें तो जुलाहे से मालूम होते हो। भलेमानसों की सूरत ऐसी ही हुआ करती हैं?

आजाद ने यहे बातें सुनीं, तो बाहर निकल आए और खोजी को बुला लिया।

खोजी – भाई, जरा आईना तो मँगवा देना।

आजाद – यह आईना क्या होगा? बंदगी न सलाम, बात न चीत, आते ही आते आईना याद आया। बंदर के हाथ में आईना भला कौन देने लगा!

खोजी – अजी मँगवाते हो या दिल्लगी करते हो। दरबान से हमसे झौड़ हो गई। मरदूद कहता है, तुम्हारी सूरत भलेमानसों की सी नहीं। अब कोई उससे पूछे, फिर क्या चमार की सी है, या पाजी की सी।

आजाद – भई, अगर सच पूछते हो, तो तुम्हारी सूरत से एक तरह का पाजीपन बरसता है। खुदा चाहे पाजी बनाए, मगर पाजी की सूरत न बनाए। पर अब उसका इलाज ही क्या?

खोजी – वाह, इसका कुछ इलाज ही नहीं? डाक्टरों ने मुरदे तक के जिला लेने का तो बंदोबस्त कर लिया है; आप फरमाते हैं, इलाज ही नहीं। अब पाजी न बनेगे, पाजी बनके जिए तो क्या।

आजाद – कल हम रूम जानेवाले हैं, चलते हो साथ?

खोजी – न चले, उस पर भी लानत, न ले चले, उस पर भी लानत!

आजाद – मगर वहाँ चंडू न मिलेगा, इतना याद रखिए।

खोजी – अजी अफीम मिलेगी कि वह भी न मिलेगी? बस, तो फिर हम अपना चंडू बना लेंगे। हमें जरूर ले चलिए।

आजाद अंदर जा कर बोले – हुस्नआरा, अब रुखसत का वक्त करीब आता जाता है; हँसी-खुशी रुखसत करो; खुदा ने चाहा तो फिर मिलेंगे।

हुस्नआरा की आँखों से टप-टप आँसू गिरने लगे। बोली – हाय, अंदरवाला नहीं मानता। उसको भी तो समझाते जाओ। यह किसका होकर रहेगा?

आजाद – तुम्हारी यह हालत देख कर मेरे कदम रुके जाते हैं। अब हमें जाने दो। जिंदगी शर्त है, हम फिर मिलेंगे और जश्न करेंगे। यह कह कर आजाद बाहर चले आए और खोजी के साथ चले। खोजी ने समझा था, रूम कहीं लखनऊ के आस-पास होगा। अब जो सुना कि सात समुंदर पार जाना पड़ेगा, तो हक्का-बक्का हो गए। हाथ-पाँव काँपने लगे। भई, हम समझते थे, दिल्लगी करते हो। यह क्या मालूम था कि सचमुच तंग-तोबड़ा चढ़ा कर भागा ही चाहते हो। मियाँ तुम लाख आलिम-फाजिल सही, फिर भी लड़के ही हो। यह खयाल दिल से निकाल डालो। एक जरा सी चने के बराबर गोली पड़ेगी, तो टाँय से रह जाओगे। आपको कभी मोरचे पर जाने का शायद इत्तिफाक नहीं हुआ। खुदा भलेमानस को न ले जाय। गजब का सामना होता है। वह गोली पड़ी, वह मर गया। दाँय-दाँय की आवाज से कान के परदे फट जाते हैं। तोप का गोला आया और अठारह आदमियों को गिरा दिया। गोल फटा और बहत्तर टुकड़े हुए, और एक-एक टुकड़े ने दस-दस आदमियों का उड़ा दिया। जो कहीं तलवार चलने लगी, तो मौत सामने नजर आती है, बेमौत जान जाती है। खटाखट तलवार चल रही है और हजारों आदमी गिरते जाते हैं। सो भई, वहाँ जाना कुछ खाला जी का घर थोड़े ही है। खुदा के लिए उधर रुख न करना। और बंदा तो अपने हिसाब, जानेवाले को कुछ कहता है। हम एक तरकीब बताएँ, वह काम क्यों न कीजिए कि हुस्नआरा आपको खुद रोकें और लाखों कसमें दें। आप अंदर जा कर बैठिए और हमको चिक के पास बिठाइए। फिर देखिए, मैं कैसी तकरीर करता हूँ कि दोनों बहने काँप उठे, उनको यकीन हो जाय कि मियाँ आजाद गए और अंटागफील हुए। मैं साफ-साफ कह दूँगा कि भई आजाद जरा अपनी तसवीर तो खिंचवा लो। आखिर अब तो जाते ही हो। वल्लाह, जो कहीं यह तकरीर सुन पाएँ, तो हश्र तक तुम्हें न जाने दें और झप से शादी हो जाय।

आजाद – बस, अब और कुछ न फरमाइएगा। मरना-जीना किसी के अख्तियार की बात तो हे नहीं; लाखों आदमी कोरे आते हैं और हजारों राह चलते लोट जाते हैं। हुस्नआरा हमसे कहे कि टर्की जाओ और हम बातें बनाएँ, उसको धोखा दें! जिससे मुहब्बत की उससे फरेब! यह मुझसे हरगिज न होगा। चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाय। आप मियाँ हँसोड़ के यहाँ जाइए और उनसे कहिए कि हम अभी आते हैं। हम पहुँचे और खाना खा कर लंबे हुए। खोजी तो गिरते-पड़ते चले, मगर दो कदम जा कर फिर पलटे। भई, एक बात तो सुनो। क्या-क्या पकवा रखूँ? आजाद बहुत ही झल्लाए। अजब नासमझ आदमी हो! यह भी कोई पूछने की बात है भला! उनके यहाँ जो कुछ मुमकिन होगा, तैयार करेंगे। यह कहकर आजाद तो अपने दो-चार दोस्तों से मिलने चले, उधर मियाँ खोजी हँसोड़ के घर पहुँचे। जा कर गुल मचाना शुरू किया कि जल्द खाना तैयार करो, मियाँ आजाद अभी-अभी जानेवाले हैं। उन्होंने कहा कि पाँच सेर मीठे टुकड़े, सात सेर पुलाव, दस सेर फीरनी, दस ही सेर खीर, कोई चौदह सेर जरदा, कोई पाँच सेर मुरब्बा और मीठे अचार की अचारियाँ जल्द तैयार हों। मियाँ हँसोड़ की बीवी खाना पकाने में बर्क थीं। हाथों हाथ सब सामान तैयार कर दिया। मियाँ आजाद शाम को पहुँचे।

हँसोड़ – कहिए, आज तो सफर का इरादा है। खाना तैयार है; कहिए, तो निकलवाया जाय। बर्फ भी मँगवा रखी है।

आजाद – खाना तो हम इस वक्त न खाएँगे, जरा भी भूख नहीं है।

हँसोड़ – खैर, आप न खाइएगा, न सही। आपके और दोस्त कहाँ हैं? उनके साथ दो निवाले तुम भी खा लेना।

आजाद – दोस्त कैसे! मैंने तो किसी दोस्त के लिए खाना पकाने को नहीं कहा था!

हँसोड़ – और सुनिएगा! क्या आपने अपने ही लिए दस सेर खीर, अठारह सेर मीठे टुकड़े और खुदा जाने क्या-क्या अल्लम-गल्लम पकवाया है।

आजाद – आपसे यह कहा किस नामाकूल ने?

हँसोड़ – खोजी ने, और किसने? बैठे तो हैं, पूछिए न।

आजाद – खोजी तुम मरभुखे ही रहे। यह इतनी चीजें क्या सिर पर लाद कर ले जाओगे? लाहौल बिला कुबत।

खोजी – लाहौल काहे की? आप न खाइए, मैं तो डट कर चख चुका। रास्ते के लिए भी बाँध रखा है।

आजाद – अच्छा, तो अब बोरिया-बाँधना उठाइए, लादिए-फाँदिए।

खोजी – जनाब, इस वक्त तो यह हाल है, जैसे चूहे को कोई पारा पिला दे। अब बंदा लोट मारेगा। और यह तो बताओ, सवारी क्या है?

आजाद – इक्का।

खोजी – गजग खुदा का! तब तो मैं जा चुका। इक्के पर तो यहाँ कभी सवार ही नहीं हुए। और फिर खाना खा कर तो मर ही जाऊँगा।

खैर, मियाँ आजाद ने झटपट खाना खाया और असबाब कस कर तैयार हो गए। खोजी पड़े खर्राटे ले रहे थे; रोते-गाते उठे। बाहर जा कर देखते हैं, तो एक समंद थोड़ी पूरी, दूसरा मरियल टट्टू। आजाद घोड़ी पर सवार हुए और मियाँ हँसोड़ की बीवी से बोले – भाभी, भूल न जाइएगा। भाई साहब तो भुलक्कड़ आदमी हैं, आप याद रखिएगा। आपके हाथ का खाना उम्र भर न भूलूँगा। उन्होंने रुखसत करते हुए कहा – जिस तरह पीठ दिखाते हो, खुदा करे, उसी तरह मुँह भी दिखाओ। इमाम जामिन को सौंपा।

अब सुनिए कि मियाँ खोजी ने अपने मरियल टट्टू को जो देखा, तो घबराए। घोड़े पर कभी जिंदगी भर सवार न हुए थे। लाख चाहते हैं कि सवार हो जायँ, मगर हिम्मत नहीं पड़ती। यार लोग लराते हैं – देखो, देखो, वह पुस्त उछाली, वह दुलत्ती झाड़ी, वह मुँह खोल कर लपका; मगर टट्टू खड़ा है, कान तक नहीं हिलाता। एक दफे आँख बंद करके हजरत ने चाहा कि लद लें, मगर यारों ने तालियाँ जो बजाईं, तो टट्टू भागा और मियाँ खोजी भद से जमीन पर। देखा, कहते न थे कि हम इस टट्टू पर न सवार होंगे। मगर आजाद ने घड़ी दिल्लगी देखने के लिए हमको उल्लू बनाया। वह तो कहो, हड्डी-पसली बच गई, नहीं तो चुरमुर हो ही जाती। खैर, दो आदमियों ने उनको उठाया और लाद कर घोड़ी की पीठ पर रख दिया। उन्होंने लगाम हाथ में ली ही थी कि एक बिगड़े-दिल ने चाबुक जमा दिया। टट्टू, दुम दबा कर भागा और मियाँ खोजी लुढ़क गए। बारे आजाद ने आ कर उनको उठाया।

खोजी – अब क्या रूम तक बराबर इस टट्टू ही पर जाना होगा?

आजाद – और नहीं क्या आपके वास्ते उड़नखटोला आएगा?

खोजी – भला इस टट्टू, पर कौन जाएगा?

आजाद – टट्टू, आप तो इसे टाँघन कहते थे?

खोजी – भई, हमें आजाद कर दो। हम बाज आए इस सफर से?

आजाद – अरे बेवकूफ, रेल तक इसी पर चलना होगा। वहाँ से बंबई तक रेल पर जाएँगे।

मियाँ आजाद और खोजी आगे बढ़े। थोड़ी देर में खोजी का टट्टू भी गरमाया और आजाद की घोड़ी के पीछे कदम बढ़ाकर चलने लगा। चलते-चलते टट्टू ने शरारत की। बूट के हरे-भरे खेत देखे, तो उधर लपका। किसान ने जो देखा, तो लट्ठ ले कर दौड़ा और लगा बुरा-भला कहने। उसकी जोरू भी चमक कर लपकी और कोसने लगी कि पलवइया मर जाय, कीड़े पड़ें, अभी-अभी पेट फटै, दाढ़ीजार की लहास निकले। और किसान भी गालियाँ देने लगा – अरे यो टट्टू कौन सार केर आय? ससुर हमरे खेत में पैठाय दिहिस। मियाँ खोजी गालियाँ खा कर बिगड़ गए। उनमें एक सिफत यह थी कि बे-सोचे-समझे लड़ पड़ते थे; चाहे अपने से दुगुना-चौगुना हो, वह चिमट ही जाते थे। गुस्से की यह खासियत है कि जब आता है, कमजोर पर। मगर मियाँ खोजी का गुस्सा भी निराला था, वह जब आता था, शहजोर पर। किसान ने उनके टट्टू को कई लट्ठ जमाए, तो मियाँ खोजी तड़ से उतर कर किसान से गुँथ गए। वह गँवार आदमी, बदन का करारा और यह दुबले-पतले, महीन आदमी, हवा के झोंके में उड़ जायँ। उसने इनकी गरदन दबोची और गद से जमीन पर फेका। फिर उठे, तो उसकी जोरू इनसे चिमट गई और लगी हाथापाई होने। उसने घूँसा जमाया और इनके पट्टे पकड़ कर फेंका, तो चारों खाने चित। दो थप्पड़ भी रसीद किए – एक इधर, एक उधर। किसान खड़ा हँस रहा है कि मेहरारू से जीत नाहीं पावत, यह मुसंडन से का लड़ि हें भला! किसान की जोरू तो ठोंक-ठाँक कर चल दी, और आपने पुकारना शुरू किया – कसम अब्बाजान की, जो कहीं छुरा पास होता, तो इन दोनों की लाश इस वक्त फड़कती होती। वह तो कहिए, खुदा को अच्छा करना मंजूर था कि मेरे पास छुरा न था, नहीं तो इतनी करौलियाँ भोंकता कि उमर भर याद करते। खड़ा तो रह ओ गीदी! इस पर गाँववालों ने खूब कहकहा उड़ाया। एक ने पूछा – क्यों मियाँ साहब, छुरी होती, तो क्या भोंक कर मर जाते? इस पर मियाँ खोजी और भी आग हो गए।

मियाँ आजाद कोई दो गोली के टप्पे पर निकल गए थे। जब खोजी को पीछे न देखा, तो चकराए कि माजरा क्या है? घ़़ोडी फेरी और आ कर खोजी से बोले – यहाँ खेत में कब तक पड़े रहोगे? उठो, गर्द झाड़ो।

खोजी – करौली न हुई पास, नहीं तो इस वक्त दो लाशें यहाँ फड़कती हुई देखते।

आजाद – अजी, वह तो जब देखते तब देखते, इस वक्त तो तुम्हारी लोथ देख रहे हैं।

उन्होंने फिर खोजी को उठाया और टट्टू पर सवार कराया। थोड़ी देर में फिर दोनों आदमियों में एक खेत का फासला हो गया। खोजी से एक पठान ने पूछा कि शेख जी, आप कहाँ रहते हैं? हजरत ने झट से एक कोड़ा जमाया और कहा – अबे, हम शेख नहीं, ख्वाजा हैं। वह आदमी गुस्से से आग हो गया और टाँग पकड़ कर घसीटा, तो खोजी खट से जमीन पर। अब चारों खाने चित पड़े हैं, उठने का नाम नहीं लेते। आजाद ने जो पीछे फिर कर देखा, तो टट्टू आ रहा है, मगर खोजी नदारद। पलटे, देखें, अब क्या हुआ। इनके पास पहुँचे, तो देखा, फिर उसी तरह जमीन पर पड़े करौली की हाँक लगा रहे हैं।

आजाद – तुम्हें शर्म नहीं आती! कमजोरी मार खाने की निशानी। दम नहीं है, तो कटे क्यों मरते हो? मुफ्त में जूतियाँ खाना कौन जवाँमरदी है?

खोजी – वल्लाह, जो करौली कहीं पास हो, तो चलनी ही कर डालूँ। वह तो कहिए, खैरियत हुई कि करौली न थी, नहीं तो इस वक्त कब्र खोदनी पड़ती।

आजाद – अब उठोगे भी, या परसों तक यों ही पड़े रहोगे। तुमने तो अच्छा नाक में दम कर दिया।

खोजी – अजी, अब न उठेंगे, जब तक करौली न ला दोगे, बस अब बिना करौली के न बनेगी।

आजाद – बस, अब बेहूदा न बको; नहीं तो मैं अबकी एक लात जमाऊँगा।

खैर, दोनों आदमी यहाँ से चले तो खोजी बोले – यहाँ जोड़-जोड़ में दर्द हो रहा है। उस किसान की मुसढ़ी औरत ने तो कचूमर ही निकाल डाला। मगर कसम है खुदा की, जो कहीं करौली पास होती, तो गजब ही हो जाता। एक को तो जीता छोड़ता ही नहीं।

आजाद – खुदा गंजे को पंजे नहीं देता। करौली की आपको हमेशा तलाश रही, मगर जब आए, पिट ही के आए, जूतियाँ ही खाईं। खैर, यह दुखड़ा कोई कहाँ तक रोए, अब यह बताओ कि हम क्या करें? जी मतला रहा है, बंद-बंद टूट रहा है, आँखे भी जलती हैं।

खोजी – लैनडोरी आ गई। अब हजरत भी आते होंगे।

आजाद – यह लैनडोरी कैसी? हजरत कौन? मैं कुछ नहीं समझा। जरा बताओ तो?

खोजी – अभी लड़के न हो, बुखार की आमद है। आँखों की जलन, जी का मतलाना, बदन का टूटना, सब उसी की अलामतें हैं। इस वक्त घोड़े पर सवार हो कर चलना बुरा है। अब आप घोड़े से उतर पड़िए और चल कर कहीं लेट रहिए, कहना मानिए।

आजाद – यहाँ कोई अपना घर है, जो उतर पडूँ? किसी से पूछो तो कि गाँव कितने दूर है। खुदा करे, पास ही हो, नहीं तो मैं यहीं गिर पड़ूँगा और कब्र भी यहीं बनेगी।

खोजी – अजी, जरा दिल को सँभालो। कोई इतना घबराता है? कब्र कैसी? जरा दिल को ढारस दीजिए।

आजाद – वल्लाह, फुँका जाता हूँ, बदन से आग निकल रही है।

खोजी – वह गाँव सामने ही है, जरा घोड़ी को तेज कर दो।

आजाद ने घोड़ी को जरा तेज किया, तो वह उड़ गई। खोजी ने भी कोड़े पर कोड़ा जमाना शुरू किया। मगर लद्दू, टट्टू पर बिगड़ रहे हैं कि न हुई करौली इस वक्त, नहीं तो इतनी भोंकता कि बिलबिलाने लगता। खैर, किसी तरह उठे, टट्टू को पकड़ा और लद कर चले। दो-चार दिल्लगीबाज आदमियों ने तालियाँ बजाईं और कहना शुरू किया – लदा है, लदा है, लेना, जाने न पाए। खोजी बिगड़ खड़े हुए। हटो सामने से, नहीं तो हंटर जमाता हूँ। मुझे भी कोई ऐसा-वैसा समझे हो! मैं सिपाही आदमी हूँ। नवाबी मैं दो-दो तलवारें कमर से लगी रहती थीं। अब लाख कमजोर हो गया हूँ, लेकिन अब भी तुम जैसे पचास पर भारी हूँ। लोगों ने खूब हँसी उड़ाई। जी हाँ, आप ऐसे ही जवाँमर्द हैं। ऐसे सूरमा होते कहाँ हैं।

खोजी – उतरूँ घोड़े से, आऊँ?

यारों ने कहा – नहीं साहब, ऐसा गजब भी न कीजिएगा! आप ठहरे पहलवान और सिपाही आदमी, कहीं मार डालिए आ कर तो कोई क्या करेगा।

इस तरह गिरते-पड़ते एक सराय में पहुँचे और अंदर जा कर कोठरियाँ देखने लगे। सराय भर में चक्कर लगाए, लेकिन कोई कोठरी पसंद न आई। भठियारियाँ पुकार रहीं हैं कि मियाँ मुसाफिर इधर आओ, इधर देखो, खासी साफ-सुथरी कोठरी है। टट्टू बाँधने की जगह अलग। इतना कहना था कि मियाँ खोजी आग हो गए। क्या कहा, टट्टू है, यह पीगू का टाँघन है। एक भठियारी ने चमक कर कहा – टाँघन है या गधा? तब तो खोजी झल्लाए और छुरी और करौली की तलाश करने लगे। इस पर सराय भर की भठियारियों ने उन्हें बनाना शुरू किया। आखिर आप इतने दिक हुए कि सराय के बाहर निकल आए और बोले – भई, चलो, आगे के गाँव में रहेंगे। यहाँ सब के सब शरीर हैं। मगर आजाद में इतना दम कहाँ कि आगे जा सकें। सराय में गए और एक कोठरी में उतर पड़े। खोजी ने भी वहीं बिस्तर जमाया। साईस तो कोई साथ था नहीं, खोजी को अपने ही हाथ से दोनों जानवरों के खरेरा करना पड़ा। भठियारी ने समझा, यह साईस है।

भठियारी – ओ साईस भैया, जरा घोड़ी को उधर बाँधो।

खोजी – किसे कहती है री, साईस कौन है?

भठियारी – ऐ तो बिगड़ते क्यों हो मियाँ, साईस नहीं चरकते सही।

आजाद – चुप रहो, यह हमारे दोस्त हैं।

भठियारी – दोस्त हैं, सूरत तो भलेमानसें की सी नहीं है।

खोजी – भई आजाद जरा आईना तो निकाल देना। कई आदमी कह चुके। आज मैं अपना चेहरा जरूर देखूँगा। आखिर सबब क्या कि जिसे देखो, यही कहता है।

आजाद – चलो, वाहियात न बको, मेरा तो बुरा हाल है।

भठियारी ने चारपाई बिछा दी और आजाद लेटे।

खोजी ने कहा – अब तबीयत कैसी है?

आजाद – बुरी गत है; जी चाहता है, इस वक्त जहर खा लूँ।

खोजी – जरूर, और उसमें थोड़ी संखिया भी मिला लेना।

आजाद – मर कमब्ख्त, दिल्लगी का यह मौका है?

खोजी – अब बूढ़ा हुआ, मरूँ किस पर। मरने के दिन तो आ गए। अब तुम जरा सोने का खयाल करो। दो-चार घड़ी नींद आ जाय, तो जी हलका हो जाय।

इतने में भठियारी ने आ कर पूछा – मियाँ कैसे हो?

आजाद – क्या बताऊँ, मर रहा हूँ।

भठियारी – किस पर?

आजाद – तुम पर?

भठियारी – खुदा की सँवार।

आजाद – किस पर?

भठियारी ने खोजी की तरफ इशारा करके कहा – इन पर

खोजी – अफसोस, न हुई करौली!

आजाद – होती, तो क्या करते?

खोजी – भोंक लेते अपने पेट में।

आजाद – भई, अब कुछ इलाज करो, नहीं तो मुफ्त में दम निकल जाएगा।

भठियारी – एक हकीम यहाँ रहते हें। मैं बुलाए लाती हूँ।

यह कह कर बी भठियारी जा कर हकीम जी को बुला लाई। मियाँ आजाद देखते हैं, तो अजब ढंग से आदमी-धोती बाँधे, गाढ़े की मिरजई पहने, चेहरे से देहातीपन बरस रहा है, आदमियत छू ही नहीं गई।

आजाद – हकीम साहब, आदाब।

हकीम – नाहीं दबवाव नाहीं। बुखार में दाबे नुकसान होत है।

आजाद – आपका नाम?

हकीम – हमारा नाम दाँगलू।

आजाद – दाँगलू या जाँगलू?

हकीम – नुस्खा लिखूँ?

आजाद – जी नहीं, माफ कीजिए। बस, यहाँ से तशरीफ ले जाइए।

हकीम – बुखार में अक-बक करत हैं, चाँद के पट्टे करतवा डालो।

खोजी – कुछ बेधा तो नहीं हुआ! न हुई करौली, नहीं तो तोंद पर रख देता।

हकीम – भाई, हमसे इनका इलाज न हो सकिहै। अब एक होय, तो इलाज करें। यो पागल को है हो? हमका इलई का पलवा बकत है ससुर।

आखिर खोजी ने झल्ला कर उनको उठा दिया और यह नुस्खा लिखा – आलूबुखारा दो दाना, तमरहिंदी छह माशा, अर्क गावजबाँ दो तोला।

आजाद – यह नुस्खा तो आप कल पिलाएँगे, यहाँ तो रात-भर में काम ही तमाम हो जाएगा।

खोजी – इस वक्त बंदा कुछ नहीं देने का। हाँ, आलू का पानी पीजिए, पाँच दाने भिगाए देता हूँ। खाना इस वक्त कुछ न खाना।

आजाद – वाह, खाना न मिला, तो मैं आप ही को चट कर जाऊँगा। इस भरोसे न रहिएगा।

खोजी – वल्लाह, एक दाना भी आपके पेट में गया और आप बरस भर तक यों ही पड़े रहे। आलू का पानी भी घूँट-घूँट करके पीना। यह नहीं कि प्याला मुँह से लगाया और गट-गट पी गए।

यह कह कर खोजी ने चंदन घिस कर आजाद की छाती पर रखा। पालक के पत्ते चारपाई पर बिछा दिए। खीरा काट कर माथे पर रखा और जरा सा नमक बारीक पीस कर पाँव में मला। तलवे सहलाए।

आजाद – यहाँ तो कोई हकीम भी नहीं।

खोजी – अजी, हम खुद इलाज करेंगे। हकीम न सही, हकीमों की आँखें तो देखी हैं।

आजाद – इलाज तक मुजायका नहीं, मगर मार न डालना भाई! हाँ, जरा इतना एहसान करना।

आजाद की बेचैनी कुछ कम हुई तो आँख लग गई। एकाएक पड़ोस की कोठरी से शोर गुल की आवाज आई। आजाद चौंक पड़े और पूछा – यह कैसा शोर है? भठियारी, तुम जरा जा कर उनको ललकारो।

खोजी – कहो कि एक शरीफ आदमी बुखार में पड़ा हुआ है। खुदा के वास्ते जरा खामोश हो जाओ।

भठियारी – मियाँ, मैं ठहरी औरतजात और वे मरदुए। और फिर अपने आपे में नहीं। जो मुझी पर पिल पड़े, तो क्या करूँगी? हाँ, भठियारे को भेजे देती हूँ।

भठियारे ने जा कर जो उन शराबियों को डाँटा, तो सब के सब उस पर टूट पड़े और चपतें मार-मार कर भगा दिया। इस पर भठियार तैश में आ कर उठी और उँगलियाँ मटका कर इतनी गालियाँ सुनाईं कि शराबियों का नशा हिरन हो गया। वे इतना डरे कि कोठरी का दरवाजा बंद कर लिया।

लेकिन थोड़ी देर में फिर शोर हुआ और आजाद की नींद उचट गई। खोजी को जो शामत आई, तो शराबियों की कोठरी के दरवाजे को इस जोर से घुमाया कि चूल निकल आई? सब शराबी झल्लाकर बाहर निकल आए और खोजी पर बेभाव की पड़ने लगी। उन्होंने इधर-उधर छुरी और करौली की बहुत कुछ तलाश की, मगर खूब पिटे। इसके बाद वे सब सो गए, रात भर कोई न मिनका। सुबह को उस कोठरी से रोने की आवाज आई। खोजी ने जा कर देखा, तो एक आदमी मरा पड़ा है और बाकी सब खड़े रो रहे हैं। पूछा, तो एक शराबी ने कहा – भाई, हम सब रोज शराब पिया करते हैं। कल की शराब बहुत तेज थी। हमने बहुत मना किया; पर बोतल की बोल खाली कर दी। रात को हम लोग सोए, तो इतना अलबत्ता कहा कि कलेजा फूँका जा रहा है। अब जो देखते हैं, तो मरा हुआ है। आप तो जान से गया और हमको भी कत्ल कर गया।

खोजी – गजब हो गया! अब तुम धरे जाओगे और सजा पाओगे!

शराबी – हम कहेंगे कि साँप ने काटा था।

खोजी – कहीं ऐसी भूल भी न करना।

शराबी – अच्छा, भाग जायँगे।

खोजी – तब तो जरूर ही पकड़े जाओगे। लोग ताड़ जायँगे कि कुछ दाल में काला है।

शराबी – अच्छा, हम कहेंगे कि छुरी मार कर मर गया और गले में छुरी भी भोंक देंगे।

खोजी – यह बात हिमाकत है, मैं जैसे कहूँ, वैसे करो। तुम सब के सब रोओ और सिर पीटो। एक कहे कि मेरा सगा भाई था। दूसरा कहे कि मेरा बहनोई था; तीसरा उसे मामूँ बताए। जो कोई पूछे कि क्या हुआ था, तो गुर्दे का दर्द बताना। खूब चिल्ला-चिल्ला कर रोना। जो यों आँसू न आवें तो मिरचे लगा लो। आँखों में धूल झोंक लो। ऐसा न हो कि गड़बड़ा जाओ और जेलखाने जाओ।

इधर तो शराबियों ने रोना-पीटना शुरू किया, उधर किसी ने जा कर थाने में जड़ दी कि सराय में कई आदमियों ने मिल कर एक महाजन को मार डाला। थानेदार और दस चौकीदार रप-रप करते आ पहुँचे। अरे ओ भठियारी, बता, वह महाजन कहाँ टिका हुआ था?

भठिायारिन – कौन महजान? किसी का नाम तो लीजिए।

थानेदार – तेरा बाप, और कौन!

भठियारिन – मेरा बाप? उसकी तलाश है, तो कब्रिस्तान जाइए।

थानेदार – खून कहाँ हुआ?

भठियारिन – खून! अरे तोबा कर बंदे! खून हुआ होगा थाने पर।

थानेदार – अरे इस सराय में कोई मरा है रात को?

भठियारिन – हाँ तो यों कहिए। वह देखिए, बेचारे खड़े रो रहे हैं। उनके भाई थे। कल दर्द हुआ। रात को मर गए।

थानेदार – लाश कहाँ है?

शराबी – हुजूर, यह रखी है। हाय, हम तो मर मिटे। घर में जा कर क्या मुँह दिखाएँगे, किस मुँह से अब घर जायँगे। किसी डाक्टर को बुलवाइए, जरा नब्ज तो देख लें।

थानेदार – अजी, अब नब्ज में क्या रखा है। बेचारा बुरी मौत मरा। अब इसके दफन-कफन की फिक्र करो।

थानेदार चला गया, तो मियाँ खोजी खूब खिल-खिला कर हँसे कि वल्लाह, क्या बात बनाई है। शराबियों ने उनकी खूब आवभगत की कि वाह उस्ताद, क्या झाँसा दिया। आपकी बदौलत जान बची; नहीं तो न जाने किस मुसीबत में फँस जाते।

थोड़ी ही देर बाद किसी कोठरी से फिर शोर-गुल सुनाई दिया।

आजाद – अब यह कैसा गुल है भाई? क्या यह भी कोई शराबी है।

भठियारिन – नहीं, एक रईस की लड़की है। उस पर एक परेत आया है। जरा सी लड़की, लेकिन इतनी दिलेर हो गई है कि किसी के सँभाले नहीं सँभलती।

आजाद – यह सब ढकोसला है!

भठियारिन – ऐ वाह, ढकोसला है। इस लड़की का भाई आगरे में था और वहाँ से पाँच सौ रुपए अपने बाप की थैली से चुरा लाया। यहाँ जो आया, तो लड़की ने कहा कि तू चोर है, चोरी करके आया है।

आजाद – अजी, उस लड़के ने अपनी बहन से कह दिया होगा; नहीं तो भला उसे क्या खबर होती?

भठियारी – भला गजलें उसे कहाँ से याद हैं?

आजाद – इसमें अचरज की कौन सी बात है? तुम्हें भी दो-चार गजलें याद ही होंगी!

भठियारी – मैं यह न मानूँगी। अपनी आँखों देख आई हूँ।

आजाद तो खिचड़ी पकवा कर खाने लगे और मियाँ खोजी घास लाने चले। जब घसियारी ने बारह आने माँगे, तो आपने करौली दिखाई। इस पर घसियारी ने गट्ठा इन पर फेंक दिया। बेचारे गट्ठे के बोझ से जमीन पर आ रहे। निकलना मुश्किल हो गया। लगे चीखने – न हुई करौली, नहीं तो बता देता। अच्छे अच्छे डाकू मेरा लोहा मानते हैं। एक नहीं, पचासों को मैंने चपरगट्टू किया है। यह घसियारिन मुझसे लड़े। अब उठाती है गट्ठा या आ कर करौली भोंक दूँ?

लोगों ने गट्ठा उठाया, तो मियाँ खोजी बाहर निकले। दाढ़ी-मूँछ पर मिट्टी जम गई थी, लत-पत हो गए थे। उधर आजाद खिचड़ी खा कर लेटे ही थे कि कै हुई और फिर बुखार हो आया। तड़पने लगे। तब तो खोजी भी घबराए। सोचे, अब बिना हकीम के काम न चलेगा? भठियारी से पूछ कर हकीम के यहाँ पहुँचे।

हकीम साहब पालकी पर सवार हो कर आ पहुँचे।

आजाद – आदाब बजा लाता हूँ।

खोजी – बेहद कमजोरी है। बात करने की ताकत नहीं।

हकीम – यह आपके कौन हैं?

खोजी – जी हुजूर, यह गुलाम का लड़का है।

हकीम – आप मुझे मसखरे मालूम होते हैं।

खोजी – जी हाँ, मसखरा न होता, तो लड़के का बाप ही क्यों होता!

आजाद – जनाब, वह बेहया-बेशर्म आदमी है। न इसको जूतियाँ खाने का डर, न चपातियाए जाने का खौफ। इसकी बातों का तो खयाल ही न कीजिए।

खोजी – हकीम साहब, मुझे तो कुछ दिनों से बवासीर की शिकायत हो गई है।

हकीम – अजी, मैं खुद इस शिकायत में गिरफ्तार हूँ। मेरे पास इसका आजमाया हुआ नुस्खा मौजूद है।

खोजी – तो आपने अपने बवासीर का इलाज क्यों न किया?

आजाद – खोजी, तुम्हारी शामत आई है। आज पिटोगे।

खैर, हकीम साहब ने नुस्खा लिखा और रुखसत हुए। अब सुनिए कि नुस्खे में लिखा था – रोगन-गुल। आपने पढ़ा रोगनगिल, यानी मिट्टी का तेल। आप नुस्खा बँधवा कर लाए और मिट्टी के तेल में पका कर आजाद को पिलाया, तो मिट्टी के तेल की बदबू आई। आजाद ने कहा – यह बदबू कैसी है? इस पर मियाँ खोजी ने उन्हें खूब ही ललकारा। वाह, बड़े नाजुक-मिजाज हैं, अब कोई इत्र पिलाए आपको, या केसर का खेत चराए, तब आप खुश हों। आजाद चुप हो रहे, लेकिन थोड़ी ही देर बाद इतने जोर का बुखार चढ़ा कि खोजी दौड़े हुए हकीम साहब के पास गए और बोले – जनाब मरीज बेचैन है। और क्यों न हो, आपने भी तो मिट्टी का तेल नुस्खे में लिख दिया।

हकीम – मिट्टी का तेल कैसा? मैं कुछ समझा नहीं।

खोजी – जी हाँ, आप काहे को समझने लगे। आप ही तो रोगन-गिल लिख आए थे।

हकीम – अरे भले आदमी, क्या गजब किया! कैसे जाँगलुओं से पाला पड़ा है! हमने लिखा रोगन गुल और आप मिट्टी का तेल दे आए! वल्लाह, इस वक्त अगर आप मेरे मकान पर न आए होते, खड़े-खड़े निकलवा देता।

खोजी – आपके हवास तो खुद ही ठिकाने नहीं। आपके मकान पर न आया होता, तो आप निकलवा कहाँ से देते? जनाब, पहले फस्द खुलवाइए।

यह कह कर मियाँ खोजी लौट आए। आजाद ने कहा – भाई, हकीम को तो देख चुके, अब कोई डॉक्टर लाओ।

खोजी – डॉक्टरों की दवा गरम होती है। बुखार का इलाज इन लोगों को मालूम ही नहीं।

आजाद – आप है अहमक! जा कर चुपके से किसी डॉक्टर को बुला लाइए।

खोजी पता पूछते हुए अस्पताल चले और डॉक्टर को बुला लाए?

डॉक्टर – जबान दिखाओ, जबान!

आजाद – बहुत खूब!

डॉक्टर – आँखें दिखाओ?

आजाद – आँखें दिखाऊँ, तो घबरा कर भागो।

डॉक्टर – क्या बक-बक करता है, आँख दिखा।

खैर डॉक्टर साहब ने नुस्खा लिखा और फीस लेकर चंपत हुए। आजाद ने चार घंटे उनकी दवा की, मगर प्यास और बेचैनी बढ़ती गई। सेरों बर्फ पी गए, मगर तसकीन न हुई। उल्टे पेचिश ने नाक में दम कर दिया। सुबह होते मियाँ खोजी एक वैद्यराज को बुला लाए। उन्होंने एक गोली दी और शहद के साथ चटा दी। थोड़ी देर में आजाद के हाथ-पाँव अकड़ने लगे। खोजी बहुत घबराए और दौड़े वैद्य को बुलाने। राह में एक होम्योपैथिक डॉक्टर मिल गए। यह उन्हें घेर-घार कर लाए। उन्होंने एक छोटी सी शीशी से दवा की दो बूँदे पानी में डाल दीं। उसके पीते ही आजाद की तबीयत और भी बेचैन हो गई।

मियाँ आजाद ने दो-तीन दिन में इतने हकीम, डॉक्टर और वैद्य बदले कि अपनी ही मिट्टी पलीद कर ली। इस कदर ताकत भी न रही कि खटिया से उठ सकें। खोजी ने अब उन्हें डाँटना शुरू किया – और सोइए ओस में! जरा सी लुंगी बाँध ली और तर बिछौने पर सो रहे। फिर आप बीमार न हों, तो क्या हम हों। रोज कहता था कि ओस में सोना बुरा है; मगर आप सुनते किसकी हैं। आप अपने को तो जाली मूस समझते हैं और बाकी सबको गधा। दुनिया में बस, एक आप ही तो सुकरात हैं।

भठियारी – ऐ, तुम भी अजीब आदमी हो! भला कोई बीमार को ऐसे डाँटता है? जब अच्छे हो जायँ, तो खूब कोस लेना। और जो ओस की कहते हो, तो मियाँ, यह तो आदत पर है। हम तो दस बरस से ओस ही में सोते हैं। आज तक जुकाम भी जो हुआ हो, तो कसम ले लो।

आजाद – कोसने दो। अब यहाँ घड़ी दो घड़ी के और मेहमान हैं। अब मरे। न जाने किस बुरी साइत घर से चले थे। हुस्नआरा के पास खत भेज दो कि हमको आ कर देख जायँ। आज इस वक्त सराय में लेटे हुए बातें कर रहे हैं, कल परसों तक कब्र में होंगे –

आगोश-लहद में जब कि सोना होगा;

जुज खाक, न तकिया, न बिछौना होगा।

तनहाई में आह कौन होबेगा अनीस;

हम होवेंगे और कब्र का कोना होगा।

खोजी – मैं डरता हूँ कि कहीं तुम्हें सरसाम न हो जाय।

भठियारी – चुप भी रहो, आखिर कुछ अक्ल भी है?

आजाद – मेरे दिन ही बुरे आए हैं। इनका कोई कसूर नहीं।

भठियारी – आपने भी तो हकीम की दवा की। हकीम लटकाए रहते हैं।

आजाद – खुदा हकीमों से बचाए। मूँग की खिचड़ी दे-दे कर मरीज को अधमरा कर डालते हैं। उस पर प्याले भर-भर दवा। अगर दो महीने में भी खटिया छोड़ी, तो समझिए कि बड़ा खुशनसीब था।

खोजी – जी हाँ, जब डॉक्टर न थे, तब तो सब मर ही जाते थे।

आजाद – खैर, चुप रहो, सिर मत खाओ। अब हमें सोने दो।

मियाँ आजाद की आँख लग गई। खोजी भी ऊँघने लगे। एक आदमी ने आ कर उनको जगाया और कहा – मेरे साथ आइए, आपसे कुछ कहना है। खोजी ने देखा, तो इनकी खासी जोड़ थी। उनसे अंगुल दो अंगुल दबते ही थे।

खोजी – तो आप पिले क्यों पड़ते हैं? दूर ही से कहिए, जो कुछ कहना हो।

मुसाफिर – मियाँ आजाद कहाँ हैं?

खोजी – आप अपना मतलब कहिए। यहाँ तो आजाद-वाजाद कोई नहीं है। आप अपना खास मतलब कहिए।

मुसाफिर – अजी, आजाद हमारे बहनोई है। हमारी बहन ने भेजा है कि देखो कहाँ हैं।

खोजी – उनकी शादी तो हुई नहीं, बहनोई क्योंकर बन गए?

मुसाफिर – कितने अक्ल के दुश्मन हो! भला कोई बेवजह किसी को अपना बहनोई बनावेगा?

खोजी – भला आजाद की बीवी कहा हैं? हमको तो दिखा दीजिए।

मुसाफिर – अजी, इसी सराय के उस कोने में। चलो, दिखा दें। तुमसे क्या चोरी है।

मियाँ खोजी कोठरी के अंदर गए। बालों में तेल डाला। सफेद कपड़े पहने। लाल फुँदनेदार टोपी दी। मियाँ आजाद का एक खाकी कोट डाटा और जब खूब बन-ठन चुके, तो आईना ले कर सूरत देखने लगे। बस, गजब ही तो हो गया। दाढ़ी के बाल ऊँचे-नीचे पाए, मूँछें गिरी पड़ीं। आपने कैंची ले कर बाल बराबर करना शुरू किया। कैंची तेज थी, एक तरफ की मूँछ बिलकुल उड़ गई। अब क्या करते, अपने पाँव में कुल्हाड़ी मारी। मजबूर होकर बाहर आए, तो मुसाफिर उन्हें देख कर हँस पड़ा। मगर आदमी था चालाक, जब्त किए रहा और खोजी को साथ ले चला। जा कर क्या देखते हैं कि एक औरत, इत्र में बसी हुई, रंगीन कपड़े पहने चारपाई पर सो रही है। जुल्फें काली नागिन की तरह लहराती हुई गरदन के इर्द-गिर्द पड़ी हुई हैं। खोजी लगे आँखें सेकने। इतने में उस औरत ने आँखें खोल दीं और खोजी को देख कर ललकारा – तुम कौन हो? यहाँ क्या काम?

खोजी – आपके भाई पकड़ लाए।

औरत – अच्छा, पंखा झलो, मगर आँखें बंद करके। खबरदार मुझे न देखना।

खोजी – पंखा झलने लगे और उस औरत ने झूठ-मूठ आँखें बंद कर लीं। जरा देर में आँख जो खोली, तो देखा कि खोजी आँखें फाड़-फाड़ कर देख रहे हैं। उसका आँखें खोलना था कि मियाँ खोजी ने आँखें खूब जोर से बंद कर लीं।

औरत – क्यों जी, घूरते क्यों हो! बताओ, क्या सजा दूँ?

खोजी – इत्तिफाक से आँख खुल गई।

औरत – अच्छा बताओ, मियाँ आजाद कहाँ हैं?

उधर मियाँ आजाद की आँख जो खुली, तो खोजी नदारद! जब घंटों हो गए और खोजी न आए, तो उनका माथा ठनका कि कमजोर आदमी हैं ही, किसी से टकराए होंगे, उसने गदरन नापी होगी। भठियारे को भेजा कि जा कर जरा देखो तो। उसने हँस कर कहा – जरी से तो आदमी है, भेड़िया उठा ले गया होगा। दूसरा बोला – आज हवा सन्नाटे की चलती है, कहीं उड़ गए होंगे। आखिर भठियारी ने कहा कि उन्हें तो एक आदमी बुला कर ले गया है। खोजी खूब बन-ठन कर गए हैं।

आजाद के पेट में चूहे दौड़ने लगे कि खोजी को कौन पकड़ ले गया। गिड़गिड़ा कर भठियारी से कहा – चाहे जो हो, खोजी को लाओ। किसी से पूछो-पाछो। आखिर गए कहाँ?

इधर मियाँ खोजी उस औरत के साथ बैठे दस्तरख्वान पर हत्थे लगा रहे थे खाते जाते थे और तारीफें करते जाते थे। एक लुकमा खाया और कई मिनट तक तारीफ की। यह तो तारीफ ही करते रहे, उधर मियाँ मुसाफिर ने दस्तरख्वान साफ कर दिया। खोजी दिल में पछताए कि हमसे क्या हिमाकत हुई। पहले खूब पेट-भर खा लेते, फिर चाहे दिन भर बैठे तारीफ करते। उस औरत ने पूछा कि कुछ और लाऊँ? शर्माइएगा नहीं। यह आपका घर है। खोजी कुछ माँगनेवाले ही थे कि मियाँ मुसाफिर ने कहा – नहीं, जी, अब क्या हैजा कराओगी? यह कह कर उसने दस्तरख्वान हटा दिया और खोजी मुँह ताकते रह गए। खाना खाने के बाद पान की बारी आई। दो ही गिलौरियाँ थीं। मुसाफिर ने एक तो उस औरत को दी और दूसरी अपने मुँह में रख ली। खोजी फिर मुँह देख कर रह गए। इसके बाद मुसाफिर ने उनसे कहा – मियाँ होत, अरे भाई, तुमसे कहते हैं।

खोजी – किससे कहते हो जी? क्या कहते हो?

मुसाफि र- यही कहते हैं कि जरा पलंग से उतर कर बैठो। क्या मजे से बराबर जा कर डट गए! उतरे कि मैं पहुँचूँ? और देखिएगा, आप पलंग पर चढ़ कर बैठे हैं। अपनी हैसियत को नहीं देखता।

खोजी – चुप गीदी, न हुई करौली, नहीं तो भोंक देता।

औरत – करौली पीछे ढूँढ़िएगा, पहले जरा यहाँ से खिसक कर नीचे बैठिए।

खोजी – बहुत अच्छा, अब बैठूँ तो तोप पर उड़ा देना।

मुसाफिर – ले चलो, उठो। यह लो, झाड़ू। अभी झाड़ू दे डालो।

खोजी – झाड़ू तुम दो। हमको भी कोई भड़भूजा समझा है? हम खानदानी आदमी हैं। रईसों से इस तरह बातें कहता है गीदी!

मुसाफिर – हमें तो नानबाई सा मालूम होता है। चलिए, उठिए, झाड़ू दीजिए। बड़े रईसजादे बन कर बैठे हैं। रईसों की ऐसी ही सूरत हुआ करती है?

खोजी ने दिल में सोचा कि जिससे मिलता हूँ, वह यही कहता है कि भले-मानस की ऐसी सूरत नहीं होती। और, इस वक्त तो एक तरफ की मूँछ ही उड़ गई हैं, भलामानस कौन कहेगा। कुछ नहीं, अब हम पहले मुँह बनवाएँगे! बोले – अच्छा, रुखसत।

मुसाफिर – वाह, क्या दिल्लगी है। बैठिए, चिलम भरके जाइएगा।

मियाँ खोजी ऐसे झल्लाए कि चिमट ही तो गए। दोनों में चपतबाजी होने लगी। दोनों का कद कोई छह छह बालिश्त का, दोनों मरियल, दोनों चंडूबाज। यह आहिस्ता से उनको चपत लगाते हैं। वह धीरे से इन पर धप जमाते हैं। उन्होंने इनके कान पकड़े इन्होंने उनकी नाक पकड़ी। उन्होंने इनको काट खाया, इन्होंने उनको नोच लिया। और मजा यह कि दोनों रो रहे हैं। मियाँ खोजी करौली की धुन बाँधे हुए हैं। आखिर दोनों हाँफ गए। न यह जीते, न वह। खोजी लड़खड़ा कर गिरे, को चारों खाने चित। उस हसीना ने दो-तीन धौल ऊपर से जमा दिए। इनका तो यह हाल हुआ, उधर मियाँ मुसाफिर ने चक्कर खाया और धम से जमीन पर। आखिर हसीना ने दोनों को उठाया और कहा – बस, लड़ाई हो चुकी। अब क्या कट ही मरोगे? चलो, बैठो।

खोजी – न हुई करौली, नहीं तो भोंक देता। हत तेरे की!

मुसाफिर – वह तो मैं हाँफ गया, नहीं तो दिखा देता आपको मजा। कुछ ऐसा-वैसा समझ लिया है। सैकड़ों पेच याद हैं।

हसीना – खबरदार, जो अब किसी की जबान खुली! चलो, अब चलें मियाँ आजाद के पास। उनकी भी तो खबर लें, जिस काम के लिए यहाँ तक आए हैं।

शाम हो गई थी। हसीना दोनों आदमियों के साथ आजाद की कोठरी में पहुँची, तो क्या देखती है कि आजाद सोए हैं और भठियारी बैठी पंखा झल रही है। उसने चट आजाद का कंधा पकड़ कर हिलाया। आजाद की आँखें खुल गईं। आँख का खुलना था कि देखा, अलारक्खी सिरहाने खड़ी हैं और मियाँ चंडूबाज सामने खड़े पाँव दबा रहे हैं। आजाद की जान सी निकल गई। कलेजा धड़-धड़ करने लगा, होश पैतरे हो गए। या खुदा, यहाँ यह कैसे पहुँची? किसने पता बताया? जरा बीमारी हलकी हुई, तो इस बला ने आ दबोचा –

एक आफत से तो मर-मरके हुआ था जीना;

पड़ गई और यह कैसी, मेरे अल्लाह, नई।

खोजी – हजरत, उठिए, देखिए, सिरहाने कौन खड़ा है। वल्लाह, फड़क जाओ तो सही।

आजाद – (अलारक्खी) बैठिए-बैठिए, खूब मिलीं?

खोजी – अजी, अभी हमसे और आपके साले से बड़ी ठाँय-ठाँय हो गई। वह तो कहिए, करौली न थी, नहीं सालारजंग के पलस्तर बिगाड़ दिए होते।

आजाद ने खोजी, चंडूबाज और भठियारी को कमरे के बाहर जाने को कहा जब दोनों अकेले रह गए, तो आजाद ने अलारक्खी से कहा – कहिए, आप कैसे तशरीफ लाई हैं? हम तो वह आजाद ही नहीं रहे। वह दिल ही नहीं, वह उमंग ही नहीं। अब तो रूम ही जाने की धुन है।

अलारक्खी – प्यारे आजाद, तुम तो चले रूम को, हमें किसके सुपुर्द किए जाते हो? न हो, जमीन ही को सौंप दो। अब हम किसके हो कर रहें?

आजाद – अब हमारी इज्जत और आबरू आप ही के हाथ है। अगर रूम से जीते वापस आए, तो तुमको न भूलेंगे। अल्लाह पर भरोसा रखो, वही बेड़ा पार करेगा। मेरी तबीयत दो तीन दिन से अच्छी नहीं है। कल तो नहीं, परसों जरूर रवाना हूँगा।

खोजी – (भीतर आ कर) बी अलारक्खी अभी पूछ रही थीं कि मुझको किसके सुपुर्द किए जाते हो; आपने इसका कुछ जवाब न दिया। जो कोई और न मिले, तो हमीं यह मुसीबत सहें। हमारे ही सुपुर्द कर दीजिए। आप जाइए, हम और यह यहाँ रहेंगे।

आजाद – तुम यहाँ क्यों चले आए? निकलो यहाँ से।

अलारक्खी बड़ी देर तक आजाद को समझाती रही – हमारा कुछ खयाल न करो, हमारा अल्लाह मालिक है। तुम हुस्नआरा से कौल हारे हो, तो रूम जाओ और जरूर जाओ, खुदा ने चाहा तो सुर्खरू हो कर आओगे। मैं भी जा कर हुस्नआरा ही के पास रहूँगी। उन्हें तसल्ली देती रहूँगी। जरा जो किसी पर खुलने पावे कि मुझसे-तुमसे क्या ताल्लुक है। इतना खयाल रहे कि जहाँ-जहाँ डाक जाती हो, वहाँ-वहाँ से खत बराबर भेजने जाना। ऐसा न हो कि भूल जाओ। नहीं तो वह कुढ़-कुढ़ कर मर ही जायँगी। और, मेरा तो जो हाल हैं, उसको खुदा ही जानता है। अपना दुःख किससे कहूँ?

आजाद – अलारक्खी, खुदा की कसम, हम तुमको अपना इतना सच्चा दोस्त नहीं जानते थे। तुमको मेरा इतना खयाल और मेरी इतनी मुहब्बत है; यह तो आज मालूम हुआ।

इस तरह दो-तीन घंटे तक दोनों ने बातें की। जब अलारक्खी रवाना हुई, तो दोनों गले मिल कर खूब रोए।

facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedinmail


ये भी पढ़ें :-