अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 24 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

· June 3, 2012

Premchand_4_aबड़ी बेगम साहबा पुराने जमाने की रईसजादी थीं, टोने टोटके में उन्हें पूरा विश्वास था। बिल्ली अगर घर में किसी दिन आ जाय, तो आफत हो जाय। उल्लू बोला और उनकी जान निकली। जूते पर जूता देखा और आग हो गईं। किसी ने सीटी बजाई और उन्होंने कोसना शुरू किया। कोई पाँव पर पाँव रख कर सोया और आपने ललकारा। कुत्ता गली में रोया और उनका दम निकल गया। रास्ते में काना मिला ओर उन्होंने पालकी फेर दी। तेली की सूरत देखी और खून सूख गया। किसी ने जमीन पर लकीर बनाई और उसकी शामत आई। रास्ते में कोई टोक दे, तो उसके सिर हो जाती थीं। सावन के महीने में चारपाई बनवाने की कसम खाई थी। जब देखा कि लड़कियाँ सयानी हो गईं तो शादी की फिक्र हुई। ऊँचे-ऊँचे घरों से पैगाम आने लगे। बड़ी लड़की हुस्नआरा की शादी एक रईस के लड़के से तय हो गई। हुस्नआरा पढ़ी-लिखी औरत थी। उसे यह कब मंजूर हो सकता था कि बिना देखे-भाले शादी हो जाय। जिसकी सूरत ख्वाब में भी नहीं देखी, जिसकी लियाकत और आदत की जरा भी खबर नहीं, उसके साथ हमेशा के लिए बाँध दी जाऊँगी। सहेलियाँ तो उसे मुबारकबाद देती थीं और उसकी जान पर बनी हुई थी। या खुदा, किससे अपने दिल का दर्द कहूँ? बोलूँ; तो अड़ोस-पड़ोस की औरतें ताने दें कि यह लड़की तो सवार को खड़े-खड़े घोड़े पर से उतार ले। दिल ही दिल में बेचारी कुढ़ने लगी। अपनी छोटी बहन सिपहआरा से अपना दुःख कहती थी और दोनों बहनें गले मिल कर रोती थीं।

एक दिन दोनों बहनें बैठी हुई अखबार पढ़ रही थीं। उसमें एक शरीफ लड़के की दास्तान छपी हुई थी। पढ़ने लगीं –

‘यह हजरत दो बार कैद भी रह चुके हैं, और अफसोस तो यह है कि एक रईस के साहबजादे हैं। परसों रात को आपने यह शरारत की कि एक रईस के यहाँ कूदे और कोठरी का ताला तोड़ कर अंदर घुसने लगे। महाजन की लड़की ने जो आहट पाई तो कुलबुला कर उठ खड़ी हुई और अपनी माँ को जगाया। जरी जागे तो, बिल्ली ने तेल का घड़ा गिरा दिया; बिल-बिल! उसकी माँ गड़बड़ा कर जो उठी तो आप कोठरी के बाहर एक चारपाई के नीचे दबक रहे। उसने अपने लड़के को जगाया। वह जवान ताल ठोक कर चारपाई पर से कूदा, चोर का कलेजा कितना? आप चारपाई के नीचे से घबरा कर निकले। महाजन का लड़का भी उनकी तरफ झपट पड़ा और उन्हें उठा कर दे मारा। तब उस बदमाश ने कमर से छुरी निकाली और उस महाजन के पेट में भोंक दी। आनन-फानन जान निकल गई। पड़ोसी और चौकीदार दौड़ पड़े और उस शरीफजादे को गिरफ्तार कर लिया। अब वह हवालात में है। अफसोस की बात तो यह है कि उसकी शादी नवाब फरेदूँजंग की लड़की से करार पाई थी जिसका नाम हुस्नआरा है।’

यह लेख पढ़ कर हुस्नआरा आठ-आठ आँसू रोने लगी। उसकी छोटी बहन उसके गले से चिमट गई और उसको बहुत कुछ समझा-बुझा कर अपनी बूढ़ी माँ के पास गई। अखबार दिखा कर बोली – देखिए, क्या गजब हो गया था, आपने बेदेखे-भाले शादी मंजूर कर ली थी। बूढ़ी बेगम ने यह हाल सुना, तो सिर पीट कर बोलीं – बेटी, आज तड़के जब मैं पलंग से उठी, तो पट से किसी ने छींका और मेरी बाईं आँख भी फड़कने लगी। उसी दम पाँव-तले मिट्टी निकल गई। मैं तो समझती ही थी कि आज कुछ असगुन होगा। चलो, अल्लाह ने बड़ी खैर की। हुस्नआरा को मेरी तरफ से छाती से लगाओ और कह दो कि जिसे तुम पसंद करोगी, उसी के साथ निकाह कर दूँगी।

सिपहआरा अपनी बहन के पास आई, तो बाँछें, खिली हुई थीं। आते ही बोली – लो बहन, अब तो मुँह-माँगी मुराद पाई? अब उदास क्यों बैठी हो? खुदा-कसम, वह खुश-खबरी सुनाऊँ कि जी खुश हो जाय।

हुस्नआरा – ऐ है, तो कुछ कहोगी भी। यहाँ क्या जाने, इस वक्त किस गम में बैठे हैं, यह खुशी का कौन मौका है?

सिपहआरा – ऐ वाह, हम यों बता चुके। बिना मिठाई लिए न बतावेंगे। अम्माँजान ने कह दिया कि आप जिसके साथ जी चाहे, शादी कर लें। वह अब दखल न देंगी। हाँ, शरीफजादा और कल्ले-ठल्ले का जवान हो।

हुस्नआरा – खूबसूरती औरतों में देखी जाती है, मरदों को इससे क्या काम? हाँ, काला-कलूटा न हो, बस।

सिपहआरा – यह आप क्या कहनी हैं। ‘आदमी-आदमी अंतर, कोई हीरा कोई कंकर।’ क्या चाँद में गरहन लगाओगी?

हुस्नआरा – ऐ, तो सूत न कपास, कोरी से लठम-लठा!

इतने में बूढ़े मियाँ परीबख्श ने आवाज दी – बेटी, कहाँ हो, मैं भी आऊँ?

सिपहआरा – आओ, आओ, तुम्हारी ही तो कसर थी। आज सबेरे-सबेरे कहाँ थे? कल तो बजरा ऐसा डाँवाडोल होता था, जैसे तिनका बहा चला जाता है। कलेजा धक-धक करता था।

पीरबख्श – तुमसे कुछ कहना है बेटी! देखो, तुम हमारी पोतियों से भी छोटी हो। तुम दोनों को मैंने गोदियों खिलाया है, और तुम्हारी माँ हमारे सामने ब्याह आई हैं। तुम दोनों को मैं अपने बेटे से ज्यादा चाहता हूँ मैं जो कहूँ, उसे कान लगा कर सुनना। तुम अब सयानी हुई। अब मुझे तुम्हारी शादी की फिक्र है। पहले तुमसे सलाह ले लूँ, तो बेगम साहब से अर्ज करूँ। यों तो कोई लड़की आज तक बिन ब्याही नहीं रही; लेकिन वर उन्हीं लड़कियों को अच्छा मिलता है, जो खुश-नसीब हैं। तुम्हारी माँ हैं तो पुरानी लकीर की फकीर, मगर यह मेरा जिम्मा कि जिसे तुम पसंद करो, उसे वह भी मंजूर कर लेंगी। आजकल यहँ एक शरीफ नौजवान आकर ठहरे हैं। सूरत शाहजादों की सी आदत फरिश्तों की सी, चलन भलेमानसों का सा, बदन छरहरा, दाढ़ी-मूँछ का नाम नहीं। अभी उठती जवानी है। शेर कहने में, बोलचाल में, इल्म व कमाल में अपना सानी नहीं रखते। तसवीर ऐसी खींचें कि बोल उठे। बाँक-पटे में अच्छे-अच्छे बाँकों के दाँत खट्टे कर दिए। उनकी नस-नस में खूबियाँ कूट-कूट कर भरी हैं। अगर हुस्नआरा के साथ उनका निकाह हो जाय, तो खूब हो। पहले तुम देख लो। अगर पसंद आए, तो तुम्हारी माँ से जिक्र करूँ। हाँ, यह वही जवान हैं, जो बजरे के साथ तुमको देखते हुए बाग में जा रहे थे। याद आया?

हुस्नआरा – वहाँ तो बहुत से आदमी थी, क्या जाने, किसको कहते हो। बेदेखे-भाले कोई क्या कहे।

सिपहआरा – मतलब यह कि दिखा दो। भला देखें तो, हैं कैसे!

पीरबख्श – ऐसे जवान तो हमनेाज तक कभी देखे न थे। वह नूर है कि निगाह नहीं ठहरती। कसम खुदा की, जो बात करे, रीझ जाय।

हुस्नआरा – हम बतावें, जब हम बजरों पर हवा खाने चलें तो उन्हें भी वहाँ लाओ? हम उनको देख लें, तब तुम अम्माँ से कहो।

यहाँ ये बातें हो रही थीं, उधर मियाँ आजाद अपने हँसोड़ दोस्त के साथ इसी कोठी की तरफ टहलते चले आ रहे थे। रास्ते में आठ-दस गधे मिले। गधे वाला उन सबों पर कोड़े फटकार रहा था। आजाद ने कहा – क्यों भई, आखिर इन गधों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, जो पीटते जाते हो? कुछ खुदा का भी खौफ है, या नहीं? गधेवाले ने इसका तो कुछ जवाब न दिया, गद से एक और जमाई। तब तो मियाँ आजाद आग हो गए। बढ़ कर गधेवाले के कई चाँटे लगाए, अबे आखिर इनमें जान है या नहीं? अगर न चलते, तो हम कहते – खैर यों ही सही; खासे जा रहे हैं खटाखट, और आप पीट रहे हैं।

हँसोड़ – आप कौन होते हैं बोलनेवाले? उसके गधे हैं, जो चाहता है, करता है।

आजाद – भई, हमसे तो यह नहीं देखा जाता कि किसी बेजबान पर कोई आदमी जुल्म करे और हम बैठे देखा करें।

कोई दस ही कदम आगे बढ़े होंगे कि देखा, एक चिड़ीमार कंपे में लासा लगाए, टट्टी पर पत्ते जमाए चिड़ियों को पकड़ता फिरता हे। मियाँ आजाद आग भभूका हो गए। इतने में एक तोता जाल में आ फँसा। तब तो मियाँ आजाद बौखला गए। गुल मचा कर कहा -ओ चिड़ीमार, छोड़ दे इस तोते को, अभी-अभी छोड़। छोड़ता है या आऊँ? चिड़ीमार हक्का-बक्का हो गया। बोला – साहब, यह तो हमारा पेशा है। आखिर इसको छोड़ दें, तो करें फिर क्या? आजाद बोले – भीख माँग, मजदूरी कर, मगर यह पेशा छोड़ दे। यह कह कर आपने झोला, कंपा, जाल, सब छीन-छान लिया। झोले को जो खोला तो, सब जानवर फुर से उड़ गए। इतना ही नहीं, कंपे को काट-कूट कर फेका, जाल को नोच-नाच कर बराबर किया। तब जेब से निकाल कर दस रुपए चिड़ीमार को दिए और बड़ी देर तक समझाया।

हँसोड़ – यार, तुम बड़े बेढब आदमी हो। मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि तुम सनक गए हो।

आजाद – भई, तुम समझते ही नहीं कि मेरा असल मतलब क्या है?

हँसोड़ – आप अपना मतलब रहने दीजिए। मेरा-आपका साथ न होगा। कहीं आप किसी बिगड़े-दिल से भिड़ पड़े, तो आपके साथ मेरी भी शामत आ जायगी।

आजाद – अच्छा, गुस्से को थूक दीजिए। चलिए हमारे साथ।

हँसोड़ – अब तो रास्ते में न लड़ पड़िएगा?

आजाद – कह तो दिया कि नहीं।

दोनों आदमी आगे चले, तो क्या देखते हैं, राह में एक गाड़ीवान बैल की दुम ऐंठ रहा है। आजाद ने ललकारा। अबे ओ गाड़ीवान, खबरदार, जो आज से बैल को दुम ऐंठी।

हँसोड़ – फिर वही बात! इतनी जल्दी भूल गए?

आजाद चुप हो गए। दोनों आदमी चुपचाप चलने लगे। थोड़ी देर में कोठी के करीब जा पहुँचे। एकाएक बूढ़े मियाँ परीबख्श आते दिखाई दिए। अलेक-सलेम के बाद बातें होने लगीं।

आजाद – कहिए, उधर भी गए थे?

पीरबख्श – हाँ साहब, गया क्यों न था। सबेरे-सबेरे जा पहुँचा और आपकी इतनी तारीफ की कि पुल बाँध दिए। और फिर आप जानिए, गोकि बंदा आलिम नहीं, फाजिल नहीं, मुंशी नहीं, लेकिन बड़े-बड़े आलिमों की आँखें तो देखी हैं, ऐसी लच्छेदार बातें की कि आपका रंग जम गया। अब आपको देखने को बेकरार हैं। हाँ, एक बुरी पख यह हैं कि आपका इम्तिहान लेंगी। ऐसा न हो कि वह कुछ पूछ बैठें और आप बगलें झाँकने लगें।

हँसोड़ – भई, इम्तिहान का तो नाम बुरा। शायद रह गए,तो फिर?

आजाद – फिर आपका सिर! रह जाने की एक ही कही। इम्तिहान के नाम से आप जैसे गौखों की जान निकलती है या मेरी?

पीरबख्श – तो मैं जा कर कह दूँ कि वह आए हैं।

यह कह कर पीरबख्श घर में गए और कहा – वह आए हैं, कहो, तो बुला लाऊँ।

सिपहआरा ने कहा – अजनबी का खट से घर में चला आना बुरा। पहले उनसे कहिए, चल कर बाग की सैर करें।

पीरबख्श बाहर गए और मियाँ आजाद को ले कर बाग में टहलने लगे। दोनों बहनें झरोखों से देखने लगीं। सिपहआरा बोली – बहन, सचमुच यह तो तुम्हारे लायक हैं। अल्लाह ने यह जोड़ी अपने हाथों से बनाई है।

हुस्नआरा – ऐ वाह, कैसी नादान हो! भला शादी-ब्याह भी यों हुआ करते हैं?

सिपहआरा – मैं एक न मानूँगी।

हुस्नआरा – मुझसे क्यों झगड़ती हो, अम्माँजान से कहो।

सिपहआरा – अच्छा, तो मैं अम्माँजान के यहाँ जाती हूँ, मगर देखिए, मुकर न जाइएगा।

यह कहकर सिपहआरा बड़ी बेगम के पास पहुँची और आजाद का जिक्र छेड़ कर बोली। अम्माँजान, मैंने तो आज तक ऐसा खूबसूरत आदमी देखा ही नहीं। शरीफ, हँसमुख और पढ़े-लिखे। आप भी एक दफे देख लें।

बड़ी बेगम ने सिपहआरा को छाती से लगाया और हँस कर कहा – तू मुझसे उड़ती है? यह क्यों नहीं कहती कि सिखाई पढ़ाई आई हूँ।

सिपहआरा – नहीं अम्माँजान, आप उन्हें जरूर बुलाएँ।

बेगम – हुस्नआरा से भी पूछा? वह क्या कहती हैं?

सिपहआरा – वह तो कहती हैं, अम्माँजान जिससे चाहें, उससे करें। मगर दिल उनका आया हुआ है।

बेगम – अच्छा, बुलवा लो।

सिपहआरा वहाँ से लौटी, तो मारे खुशी के उछली पड़ती थी। फौरन पीरबख्श को बुला कर कहा – आप मियाँ आजाद को अंदर लाइए। अम्माँ-जान उन्हें देखना चाहती हैं।

जरा देर में पीरबख्श मियाँ आजाद को लिए हुए बेगम के पास पहुँचे। आजाद – आदाब बजा लाता हूँ।

बेगम – जीते रहो बेटा! आओ, इधर आकर बैठो। मिजाज तो अच्छे हैं? सिपहआरा तुम्हारी बड़ी तारीफ करती थी, और बेशक तुम हो इस लायक। तुमको देख कर तबीयत बहुत खुश हुई।

आजाद – आपकी जियारत का बहुत दिनों से शौक था। सच है, बड़े-बूढ़ों की क्या बात है!

बेगम – क्यों बेटा, हाथी को ख्वाब में देखे, तो कैसा?

आजाद – बहुत बुरा। मगर हाँ, अगर हाथी किसी पर अपनी सूँड़ फेर रहा हो, तो समझना चाहिए कि आई हुई बला टल गई।

बेगम – शाबाश, तुम बड़े लायक हो।

बेगम साहब ने मियाँ आजाद को बड़ी देर तक बिठाया और साथ ही खाना खिलाया। आजाद हाँ में हाँ मिलाते जाते थे और दिल ही दिल में खिलखिलाते थे। जब शाम हुई, तो आजाद रुखसत हुए।

आसमान पर बादल छाये हुए थे, तेज हवा चल रही थी, मगर दोनों बहनों को बजरे पर सैर करने की धुन समाई। दरिया के किनारे आ पहुँचीं। पीरबख्श ने बजरा खोला और दोनों बहनों को बिठा कर सैर कराने लगे। बजरा बहाव पर फर्राटे से बहा जाता था। ठंडी-ठंडी हवाएँ, काली-काली घटाएँ, सिपहआरा की प्यारी-प्यारी बातें, बूँदों का गिरना, लहरों का थिरकना अजब बहार दिखाता था। इतने में हवा ने वह जोर बाँधा कि मेढ़ा उछलने लगा। अब बजरे कि यह हालत है कि डाँवाडोल हो रहा है। यह डूबा, वह डूबा। पीरबख्श था तो खुर्राट, लेकिन उसके भी हाथ-पाँव फूल गए, सर-दरिया की कहानियाँ सब भूल गए। दोनों बहनें काँपने लगीं। एक-दूसरे को हसरत की निगाह से देखने लगीं। दोनो की दोनों रो रही थीं। मियाँ आजाद अभी तक दरिया के किनारे टहल रहे थे। बजरे को पानी में चक्कर खाते देखा, तो होश उड़ गए। इतने में एक दफे बिजली चमकी। सिपहआरा डर कर दौड़ी, मगर मारे घबराहट के नदी में गिर पड़ी। डूबते ही पहले गोता खाया और लगी हाथ-पाँव फटफटाने। जरा देर के बाद फिर उभरी और फिर गोता खाया। आजाद ने यह कैफियत देखी, तो झटपट कपड़े उतार कर धम से कूद ही तो पड़े। पहली डुबकी मारी, तो सिपहआरा के बाल हाथ में आए उन्होंने झप से जुल्फ को पकड़कर खींचा, तो वह उभरी। यह वही सिपहआरा है, जो किसी अनजान आदमी को देख कर मुँह छिपा लेती और फुर्ती से भाग जाती थी। मियाँ आजाद उसे साथ लिए, मल्लाही चीरते और खड़ी लगाते बजरे की तरफ चले। लेकिन बजरा हवा से बातें करता चला जाता था। पानी बल्लियों उछलता था। आजाद ने जोर से पुकारा – ओ मियाँ परीबख्श, बजरा रोको, खुदा के वास्ते रोको, पीरबख्श के होश-हवास उड़े हुए थे। बजरा खुदा की राह पर जिधर चाहता था, जाता था। मियाँ आजाद बहुत अच्छे तैराक थे; लेकिन बरसों से आदत छुटी हुई थी। दम फूल गया। इत्तिफाक से एक भँवर में पड़ गए। बहुत जोर मारा, मगर एक न चल सकी। उस पर एक मुसीबत यह और हुई कि सिपहआरा छूट गई। आजाद की आँखों से आँसू निकल पड़े। फिर बड़ी फुर्ती से झपटे, लाश को उभारा और लादकर चले। मगर अब देखते हैं, तो बजरे का कहीं पता ही नहीं। दिल में सोचे, बजरा डूब गया और हुस्नआरा लहरों का लुकमा बन गई। अब मैं सिपहआरा को लादे-लादे कहाँ तक जाऊँ, लेकिन दिल में ठान ली कि चाहे बचूँ, चाहे डूबूँ, सिपहआरा को न छोड़ूँगा। फिर चिल्लाए – यारो, कोई मदद को आओ। एक बुड्ढा आदमी किनारे पर खड़ा यह नजारा देख रहा था। आजाद को इस हालत में देखकर आवाज दी। शाबाश बेटा, शाबाश! में अभी आता हूँ। यह कह कर उसने कपड़े उतारे और लँगोट बाँध कर धम से कूद ही तो पड़ा। उसकी आवाज का सुनना था कि मियाँ आजाद को ढारस हुआ, वह तेजी के साथ चलने लगे। बुड्ढे आदमी ने दो ही हाथ खड़ी के लगाए थे कि साँस फूल गई और पानी ने इस जोर से थपेड़ा दिया कि पचास गज के फासले पर हो रहा। अब न आजाद को वह सूझता है और न उसको आजाद नजर आते हैं। मल्लाह ने बजरे पर से बुड्ढे को देख लिया। समझा कि मियाँ आजाद हैं। पुकारा – अरे भई आजाद, जोर करके इधर आओ। बुड्ढे ने बहुत हाथ-पैर मारे, मगर न जा सका। तब पीरबख्श ने डाँड़ सँभाले और बुड्ढे की तरफ चले मगर अफसोस, दो-चार ही हाथ रह गया था कि एक मगर ने भाड़ सा मुँह खोल कर बुड्ढे को निगल लिया। मल्लाह ने सिर पीटकर रोना शुरू किया – हाय आजाद, तुम भी जुदा हुए, बेचारी सिपहआरा का साथ दिया, वह आवाज मियाँ आजाद के कानों में भी पड़ी। समझे, वही बुड्ढा जो टीले पर से कूदा था, चिल्ला रहा है। इतने में बजरा नजर आया तो बाग-बाग हो गए। अब यह बिलकुल बेदम हो चुके थे; लेकिन बजरे को देखते ही हिम्मत बँध गई। जोर से खड़ी लगानी शुरू की। बजरे के करीब आए, तो पीरबख्श ने पहचाना। मारे खुशी के तालियाँ बजाने लगे। आजाद ने सिपहआरा को बजरे में लिटा दिया और दोनों ने मिल कर उसके पेट से पानी निकाला। फिर लिटा कर अपने बैग में से कोई दवा निकाली और उसे पिला दी। अब हुस्नआरा की फिक्र हुई। वह बेचारी बेहोश पड़ी हुई थी। आजाद ने उसके मुँह पर पानी के छींटे दिए, तो जरा होश आया। मगर आँखें बंद। होश आते ही पूछा – प्यारी सिपहआरा कहाँ है? आजाद जीते बचे? पीरबख्श ने पुकार कर कहा – आजाद तुम्हारे सिरहाने बैठे हैं और सिपहआरा तुम्हारे पास लेटी हैं। इतना सुनना था कि हुस्नआरा ने आँख खोली और आजाद को देख कर बोली – आजाद, मेरी जान अगर तुम पर से फिदा हो जाय, तो इस वक्त मुझे उससे ज्यादा खुशी हो, जितनी सिपहआरा के बच जाने से हुई। मैं सच्चे दिल से कहती हूँ, मुझे तुमसे सच्ची मुहब्बत है।

इतने में दवा का असर जो पहुँचा, तो सिपहआरा भी आहिस्ता से उठ बैठी। दोनों बहनें गले मिल कर रोने लगीं। हुस्नआरा बार-बार आजाद की बलाएँ लेती थी। मैं तुम पर वारी हो जाऊँ, तुमने आज वह किया, जो दूसरा कभी न करता। हवा बँध गई थी, बजरा आहिस्ता-आहिस्ता किनारे पर आ लगा। आजाद ने घास पर लेट कर कहा। उफ, मर मिटे?

हुस्नआरा – बेशक सिपहआरा की जान बचाई, मेरी जान बचाई, इस बेचारे बुड्ढे की जान बचाई। इससे बढ़ कर अब और क्या होगा!

पीरबख्श – मियाँ आजाद, खुदा तुमको ऐसा बुड्ढा करे कि तुम्हारे परपोते मुझसे बड़े हो-होकर तुम्हारे सामने खेलें। मैंने कुछ और ही समझा था। एक आदमी तैरता हुआ जाता था। मैंने समझा, तुम हो।

आजाद – हाँ, हाँ, मैं तो उसे भूल ही गया था। फिर वह कहाँ गया?

पीरबख्श – क्या कहूँ, उसको तो एक मगर निगल गया।

आजाद – अफसोस! कितना दिलेर आदमी था। मुझे मुसीबत में देख कर धम से कूद पड़ा।

सिपहआरा – मुझ नसीबों-जली के कारण उस बेचारे की जान मुफ्त में गई। मेरी आँखों में अँधेरा सा छाया हुआ है। इस दरिया का सत्यानाश हो जाय! जिस वक्त मैं अपना गिरना और गोते लगाना याद करती हूँ, तो रोएँ खड़े हो जाते हैं। पहले तो मैंने खूब हाथ-पाँव मारे, मगर जब नीचे बैठ गई तो मुँह में पानी जाने लगा। मैंने दोनों हाथों से मुँह बंद कर लिया। फिर मुझसे कुछ याद नहीं।

हुस्नआरा – बड़े गाढ़े वक्त काम आए।

पीरबख्श – अब आप जरा सो रहिएगा, तो थकावट कम हो जाएगी।

तीनों आदमी थक कर चूर हो गए थे। वहीं हरी-हरी घास पर लेटे, तो तीनों की आँख लग गई। चार घंटे तक सोते रहे। जब नींद खुली, तो घर चलने की ठहरी। पीरबख्श ने कहा – इस वक्त तो बजरे पर सवार होना हिमाकत है। सड़क-सड़क चलें।

आजाद – अजी, तो क्या हर दम तूफान आया करता है!

दोनों बहनों ने कहा – हम तो इस वक्त बजरे पर न चढ़ेंगे, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाय।

आजाद ने कहा – जो इस वक्त झिझक गईं, तो उम्र भर खौफ लगता रहेगा।

हुस्नआरा – चलिए, रहने दीजिए, अब तो मारे थकावट के आपके बदन में इतनी ताकत भी नहीं रही होगी कि किसी की लाश को दो कदम भी ले चलिए। ना साहब, बंदी नहीं जाने की। बजरे की सूरत देखने से बदन काँपता है। हम तुम्हें भी न जाने देंगे।

सिपहआरा – आप बजरे पर बैठे, और हम इधर दरिया में फाँद पड़े!

आखिर यह तय हुआ कि पीरबख्श बजरा लाएँ और तीनों आदमी ऊपर-ऊपर घर की तरफ चलें।

आजाद ने मौका पाया, तो बोले – अब तो हमसे कभी परदा न होगा? हम आपको अपना दिल दे चुके। हुस्नआरा ने कुछ जवाब न दिया, शरमा कर सिर झुका लिया।

रात बहुत ज्यादा बीत गई थी। आजाद पीरबख्श के साथ सोए। सुबह को उठे, तो क्या देखते हैं, हुस्नआरा के साथ उनकी दो फुफेरी बहनें छमाछम करती चली आती हैं। एक का नाम जहानआरा था, दूसरी का गेतीआरा। दोनों बहनों ने आजाद को झरोखे से देखा। तब जहानआरा हुस्नआरा से बोली – बहन, तुम्हारी पसंद को मैं कायल हो गई। ऐसा बाँका जवान हमारी नजर से नहीं गुजरा।

सिपहआरा – हम कहते न थे कि मियाँ आजाद सा तरहदार जवान कम होगा। फिर, मेरी तो उन्होंने जान ही बचाई है। जब तक जिऊँगी, तब तक उनका दम भरूँगी।

इतने में पीरबख्श भी आ पहुँचे। जहानआरा ने उनसे कहा – क्यों जी, इन सन से सफेद बालों में खिजाब क्यों नहीं लगाते? अब तो आप कोई दो सौ से ऊपर होंगे। क्या मरना बिलकुल भूल बैठे? तुम्हें तो मौत ने भी साँड़ की तरह छोड़ दिया।

पीरबख्श – बेटी, बहुत कट गई, थोड़ी बाकी है! यह भी कट जायगी। खिजाब लगा कर रूसियाह कौन हो!

सिपहआरा – आजाद से तो अब कोई परदा है नहीं। उन्हें भी न बुला लें?

गेतीआरा – कभी की जान-पहचान होती, तो मुजायका न था।

आजाद ने सामने से आकर कहा – फकीरों से भी जान-पहचान की जरूरत? फकीरों से कैसा परदा?

गेतीआरा – यह फकीर आप कब से हुए?

आजाद – जब से हसीनों की सोहबत हुई।

गेतीआरा – आप शायर भी तो हैं! अगर तबीयत हाजिर हो, तो इस मिसरे पर एक गजल कहिए –

मरजे-इश्क लादवा देखा।

आजाद – तबीयत की तो न पूछिए, हर वक्त हाजिर रहती है; रहा दिमाग, वह अपने में नहीं। फिर भी आपका हुक्म कैसे टालूँ। सुनिए –

शेख, काबे में तूने क्या देखा;

हम बुतों से मिले; खुदा देखा।

सोज-नाला ने कुछ असर न किया;

हमने यह साज भी बजा देखा।

आह ने मेरी कुछ न काम किया;

हमने यह तीर भी लगा देखा।

हर मरज की दवा मुकर्रर है;

मरजे इश्क लादवा देखा।

शक्ले नाखुन है गरचे अबरुए-यार;

पर न इसको गिरहकुशा देखा।

हमने देखा न आशिके आजाद;

और जो देखा तो मुब्तिला देखा!

गेतीआरा – माशा-अल्लाह, कैसी हजिर तबीयत।

आजाद – इन्साफ के तो यह माने हैं कि मैंने आपको खुश किया, अब आप मुझको खुश करें।

गेतीआरा – आप कुछ फर्माएँ, मैं कोशिश करूँगी।

आजाद – यह तो मेरी सूरत ही से जाहिर है कि अपना दिल हुस्नआरा को दे चुका हूँ।

गेतीआरा – क्यों हुस्नआरा, मान क्यों नहीं जातीं? यह बेचारे तुम्हें अपना दिल दे चुके।

हुस्नआरा – वाह, क्या सिफारिश है! क्यों मान लें, शादी भी कोई दिल्लगी है? मैं बेसमझे-बूझे हाँ न करूँगी। सुनिए साहब, मैं आप की अदा, आपकी वफा, आपकी चाल-ढाल, आपकी लियाकत और शराफत पर दिल ओर जान से आशिक हूँ; मगर यह याद रखिए, मैं ऐसा काम नहीं करना चाहती, जिससे पढ़ी लिखी औरत बदनाम हों। हमें ऐसा चाल-चलन रखना चाहिए, जो औरों के लिए नमूना हो। इस शहर की सब औरतें मुझे देखती रहती हैं कि यह किस तरफ को जाती है। आपको कोई यहाँ जानता नहीं। आप पहले यहाँ शरीफों में इज्जत पैदा कीजिए, आपके यहाँ पंद्रहवें दिन मुशायरा हो और लोग आपको जानें। कोई कोठी किराए पर लीजिए और उसे खूब सजाइए, ताकि लोग समझें कि सलीके का आदमी है और रोटियों को मुहताज नहीं। शरीफजादों के सिवा ऐरों-गैरों से सोहबत न रखिए और हर रोज जुमा की नमाज पढ़ने के लिए मसजिद जाया कीजिए! लेकिन दिखावा भी जरूरी है। एक सवारी भी रखिए और सुबह-शाम हवा खाने जाइए, अगर इन बातों को आप मानें, तो मुझे शादी करने में कुछ उज्र नहीं। यों तो मैं आपके एहसान से दबी हुई हूँ, लेकिन आप समझदार आदमी हैं, इसलिए मैंने साफ-साफ समझा दिया।

आजाद – ऐसे समझदार होने से बाज आए! हम गँवार ही सही। आपने जो कुछ कहा, सब हमें मंजूर है; लेकिन आप भी मुझे कभी-कभी यहाँ तक आने की इजाजत दीजिए और आपकी ये बहनें मुझसे मिला करें।

गेतीआरा – जरी फिर तो कहिएगा! आपको अपनी हुस्नआरा से काम है, या उनकी बहनों से? हुस्नआरा ने आपसे जो कुछ कहा, उसको गौर कीजिए। अभी जल्दी न कीजिए। आप शराब तो नहीं पीते?

आजाद – शराब की सूरत और नाम से नफरत है।

हुस्नआरा – फिर आपके पास बजरे पर कहाँ से आई, जो आपने सिपहआरा को पिलाई।

आजाद – वाह, वह तो दवा थी।

जहानआरा – ऐ बाजी, भैया कब से सो रहा है। जरा जगा दो। दो घड़ी खेलने को जी चाहता है।

गेतीआरा – ना, कही ऐसा गजब भी न करना। बच्चे जब सोते हों, तो उनको जगाना न चाहिए। उनको जगाना उनकी बाढ़ को रोकना है।

हुस्नआरा – इस वक्त हवा बड़े जोर से चल रही है और तुमने भैया को बारीक शरबती पहना दी है। ऐ दिलबहार, फलालेन का कुर्त्ता नीचे पहना दो। यह रुपया कौन भैया के हाथ में दे गया? और जो खेलते-खेलते मुँह में ले जाय तो?

दिलबहार – ऐ हुजूर, छीन तो लूँ, जब वह दे भी। वह तो रोने लगता है।

हुस्नआरा – देखो, हम किस तरकीब से ले लेते हैं, भला रोवे तो, (चुमकार कर) भैया, (तालियाँ बजा कर) भैया, ला, तुझे चीज मँगा दूँ।

यह कह कर हुस्नआरा ने लड़के को गुदगुदाया। लड़का हँस पड़ा और रुपया हाथ से अलग।

दिलबहार – मौसी को कैसे चुपचुपाते रुपया दे दिया और हमने हाथ ही लगाया था कि गुल मचाने लगा।

गेतीआरा – उम्र भर तुमने लड़के पाले, मगर पालना न आया। बच्चों को पालना कुछ हँसी-खेल थोड़े ही है।

दिलबहार – अभी मेरा सिन ही क्या है कि ये बातें जानूँ।

गेतीआरा – देखो, रात को दरख्त के तले बच्चे को न सुलाया करो। बच्चा बीमार हो जाता है।

दिलबहार – हाँ, सुना है, लड़के भूत-प्रेत के झपेट में आ जाते हैं।

हुस्नआरा – झपेट और भूत-प्रेत सब ढकोसला है। रात को दरख्त के नीचे सोना इसलिए बुरा है कि रात को दरख्त से जहरीली हवा निकलती है।

इधर तो ये बातें हो रही थीं, औरतों की तालीम का जिक्र छिड़ा हुआ था, हुस्नआरा औरतों की तालीम पर जोर दे रही थी, उधर मियाँ पीरबख्श को बाल बनवाने का शौक जो चर्राया, तो हज्जाम को बुलवाया। हज्जाम बाल बनाते-बनाते कहने लगा – हुजूर, एक दिन मैं सराय में गया था, तो वहाँ यह भी टिके हुए थे – यही जो जवान से हैं, गोरे-गोरे, बजरे पर सैर करने गए थे – हाँ, याद आ गया, मियाँ आजाद, वह भी वहाँ मिले। वह साहब तुम्हारे, उस सराय की भठियारी से शादी करने को थे, मुल फिर निकल गए। उसने इन पर नालिश जड़ दी, तो वहाँ से भागे। उस भठियारी को ऊँट पर सवार करके रात को लिए फिरते थे। पीरबख्श ने यह किस्सा सुना, तो सन्नाटे में आ गए। बोले – खबरदार, और किसी से न कहना।

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