अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 23 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

· June 4, 2012

Premchand_4_aमियाँ आजाद शिकरम पर से उतरे, तो शहर को देख कर बाग-बाग हो गए। लखनऊ में घूमे तो बहुत थे, पर इस हिस्से की तरफ आने का कभी इत्तिफाक न हुआ था। सड़कें साफ, कूड़े-करकट से काम नहीं, गंदगी का नाम नहीं, वहाँ एक रंगीन कोठी नजर आई, तो आँखों ने वह तरावट पाई कि वाह जी, वाह! उसकी बनावट और सजावट ऐसी भायी कि सुभान-अल्लाह। बस, दिल में खुब ही तो गई। रविशें दुनिया से निराली, पौदों पर वह जोबन कि आदमी बरसों घूरा करे।

मियाँ आजाद ने एक हरे-भरे दरख्त के साये में आसन जमाया। टहनियाँ हवा के झोंकों से झूमती थी, मेवे के बोझ से जमीन को बार-बार चूमती थीं। आजाद ठंडे-ठंडे हवा के झोंकों का मजा ले रहे थे कि एक मुसाफिर उधर से गुजरा। आजाद ने पूछा – क्यों साहब, इस कोठी में कौन रईस रहता है?

मुसाफिर – रईस नहीं, एक रईसा रहती हैं! बड़ी मालदार हैं। रात को रोज बजरे पर दरिया की सैर को निकलती हैं। उनकी दोनों लड़कियाँ भी साथ होती हैं।

आजाद – क्यों साहब लड़कियों की उम्र क्या होगी?

मुसाफिर – अब उमर का हाल मुझे क्या मालूम। मगर सयानी हैं, बड़ी तमीजदार हैं और, बुढ़िया तो आफत की पुड़िया।

आजाद – शादी अभी नहीं हुई?

मुसाफिर – अभी शादी नहीं हुई; न कहीं बातचीत है। दोनों बहनों को पढ़ने लिखने और सैर करने के सिवा कोई काम नहीं। सफाई का दोनों को ख्याल है। खुदा करे, उनकी शादी अच्छे घरों में हो।

आजाद – आपने तो वह खबर सुनाई कि मुझे उन लड़कियों को सैर करते हुए देखने का शौक हो गया।

मुसाफिर – तो फिर इसी जगह बिस्तर जमा रखिए।

आजाद – आप भी आ जायँ, तो मजा आए।

मुसाफिर – आ जाऊँगा।

आजाद – ऐसा न हो कि आप न आए और मुझे भेड़िया उठा ले जाय।

मुसाफिर – आप बड़े दिल्लगीबाज मालूम होते हैं। यहाँ अपने वादे के सच्चे हैं। बस, शाम हुई और बंदा यहाँ पहुँचा।

यह कह कर वह हजरत तो चलते हुए और आजाद दरख्तों से मेवे तोड़-तोड़ कर खाने लगे। फिर चिड़ियों का गाना सुना। फिर दरिया की लहरें देखीं। कुछ देर तक गाते रहे। यहाँ तक कि शाम हो गई और वह मुसाफिर न आया। आजाद दिल में सोचने लगे, शायद हजरत झाँसा दे गए। अब शाम में क्या बाकी है। आना होता, तो आ न जाते। शायद आज बेगम साहबा बजरे पर सैर भी न करेंगी। सैर करने का यही तो वक्त है। इतने में मियाँ मुसाफिर ने आ कर पुकारा।

आजाद – खैर, आप आए तो! मैं तो आपके नाम को रो चुका था।

मुसाफिर – खैर, अब हँसिए। देखिए, वह हाथी आ रहा है। दोनों पालकियाँ भी साथ हैं।

मुसाफिर – ईंट की ऐनक लगाओ! इतनी बड़ी पालकी नहीं देख सकते! हाथी भी नहीं दिखाई देता! क्या रतौंधी आती है?

आजाद – आहा हा! वह देखिए। ऐं, वह तो दरख्त के साये में रुक रहा।

मुसाफिर – घबराइए नहीं, यहीं आ रही हैं। अब कोई और जिक्र छेड़िए, जिसमें मालूम हो कि दो मुसाफिर थक कर खड़े बातें कर रहे हैं!

आजाद – यह आपको खूब सूझी! हाँ साहब, अबकी आम की फसल खूब हुई। जिधर देखो, पटे पड़े हें; मंडी जाइए, खाँचियों की खाँचियाँ। तरबूज को देख आइए, कोई टके को नहीं पूछता। और आम के सामने तरबूज को कौन हाथ लगाए!

ये बातें हो ही रही थीं कि बजरा तैयार हुआ। दोनों बहनें और बेगम साहब उसमें बैठी। एकाएक पूरब की तरफ से काली मतवाली घटा झूमती हुई उठी और बिजली ने चमकना शुरू किया। मल्लाह ने बजरे को खूँटे से बाँध दिया। दोनों लड़कियाँ हाथी पर बैठी और घर की तरफ चलीं। आजाद ने कहा – यह बुरा हुआ! तूफान ने हत्थे ही पर टोंक दिया, नहीं तो इस वक्त बजरे की सैर देख कर दिल की कली खिल जाती। आखिर दोनों आदमी घूमते-घामते एक बाग में पहुँचे, तो मियाँ मुसाफिर बोले – हजरत, अब की आम इतनी कसरत से पैदा हुआ कि जहाँ किसी भलेमानस ने राह चलते कोई आम उठा लिया और बस, चिमट पड़ा। अभी परसों ही की तो बात है। यहाँ से कोई चार कोस पर एक मुसाफिर मैदान में चला जाता था। एक काना खुतरा आम टप से जमीन पर टपक पड़ा। मुसाफिर को क्या मालूम की कौन इधर-उधर ताक रहा है, चुपके से आम उठा लिया। उठाना था कि दो गँवारदल लठ कंधे पर रखे, मार सारे का; मार सारे का करते निकल आए। मुसाफिर ने आम झट जमीन पर पटक दिया। लेकिन एक गँवार ने आते ही गालियाँ देनी शुरू कीं तो दूसरे ने घूँसा ताना! मुसाफिर भी क्षत्रिय आदमी था, आग हो गया। मारे गुस्से के उसका बदन थर-थर काँपने लगा। बढ़के जो एक चाँटा देता है, तो एक गँवार लड़खड़ा के धम से जमीन पर। दूसर ने ने जो यह हाल देखा, तो लठ ताना। राजपूत बगली डूब कर जा पहुँचा, एक आँटी जो देता है, तो चारों खाने चित। हम भी कल एक बाग में फँस गए थे। शामत जो आई, तो एक दरख्त के साये में दोपहरिया मनाने बैठ गए। बैठना था कि एक ने तड़ से गाली दी। अब सुनिए कि गाली तो दी हमको, लेकिन एक पहलवान भी करीब ही बैठा था। सुनते ही चिमट गया और चिमटते ही कूले पर लादा। गिरे मुँह के बल। पहलवान छाप बैठा, हफ़्ते गाँठ लिए, हलसींगड़ा बाँध कर आसमान दिखा दिया और अपने शागिर्दों से कहा – चढ़ जाओ पेड़ पर, और आम, पत्ते, बौर, टहनी जो पाओ, तोड़-तोड़ कर फेंक दो, पेड़ नीचे डालो। लेकिन लोगों ने समझाया कि उस्ताद, जाने दो, गाली देना तो इनका काम है। यह तो इनके सामने कोई बात ही नहीं, ये इसी लायक हैं कि खूब धुने जायँ।

आजाद – क्यों साहब, धुने क्यों जायँ? ऐसा न करें, तो सारा बाग मुसाफिरों ही के लिए हो जाय। लोग पेड़ का पेड़, जड़ और फुनगी तक चट कर जायँ। आप तो समझे कि यह एक आम के लिए कट मरा, मगर इतना नहीं सोचते कि एक ही एक करके हजार होते हैं। इस ताकीद पर तो यह हाल हे कि लोग बाग के बाग लूट खाते हैं; और जो कहीं इत्ती तू-तू मैं-मैं न हो तो न जाने क्या हो जाय।

मियाँ मुसाफिर कल आने का वादा करके चले गए। आजाद आगे बढ़े, तो क्या देखते हैं कि एक आदमी अपने लड़के को गोदी में लिए थपकी दे दे कर सुला रहा है। – ‘आ जा री निंदिया, तू आ क्यों न जा; मेरे बाले को गोद सुला क्यों न जा।’ आजाद एक दिल्लगीबाज आदमी, जा कर उससे पूछते क्या हैं – किसका पिल्ला है? वह भी एक ही काइयाँ था, बोला ‘दूर रह, क्यों पिला पड़ता है? आजाद यह जवाब सुन कर खुश हो गए। बोले – उस्ताद, हम तो आज तुम्हारे मेहमान होंगे। तुम्हारी हाजिरजवाबी से जी खुश हो गया। अब रात हो गई है, कहाँ जायँ? उस हँसोड़ आदमी ने इतनी बड़ी खातिर की, खाना खिलाया और दोनों ने दरवाजे पर ही लंबी तानी। तड़के मियाँ आजाद की नींद खुली। हँसोड़ को जगाने लगे। क्यों हजरत, पड़े सोया ही कीजिएगा या उठिएगा भी; वाह रे माचा-तोड़! बारे बहुत हिलाने-डुलाने पर मियाँ हँसोड़ उठे और फिर लेट गए; मगर पैताने की तरफ सिर करके। इतने में दो-चार दोस्त और आ गए। वाह भई वाह, हम दो कोस से आए और यहाँ अभी खाट ही नहीं छोड़ी? भई, बड़ा सोनेवाला है। हमने मुँह-हाथ धोया, हुक्का पिया, बालों में तेल डाला चपातियाँ खाईं, कपड़े पहने और टहलते हुए यहाँ तक आए; मगर यह अभी तक पड़े ही हुए हैं। आखिर एक आदमी ने उनके कान में पानी डाल दिया। तब तो आप कुलबुलाए। देखो, देखो, हैं-हैं नहीं मानते! वाह, अच्छी दिल्लगी निकाली है।

एक दोस्त – जरा आँखे तो खोलिए।

हँसोड़ – नहीं खोलते। आपका कुछ इजारा है?

दोस्त – देखिए, यह मियाँ आजाद तशरीफ लाए हैं, इधर मौलवी साहब खड़े हैं। इनसे तो मिलिए, सो-सो कर नहूसत फैला रखी है।

मौलवी – अजी हजरत!

हँसोड़ – भई, दिक न करो, हमें सोने दो। यहाँ मारे नींद के बुरा हाल है, आपको दिल्लगी सूझती है।

आजाद – भाई साहब!

हँसोड़ – और सुनिए। आप भी आए वहाँ से जान खाने। सवेरे-सवेरे आपको बुलाया किस गधे ने था? भलेमानस के मकान पर जाने का यह कौन वक्त है भला? कुछ आपका कर्ज तो नहीं चाहता? चलिए, बोरिया-बाँधना उठाइए।(आँखें खोल कर अख्खा, आप, हैं? माफ कीजिएगा। मैंने आपकी आवाज नहीं पहचानी।

मौलवी – कहिए, खाकसार की आवाज तो पहचानी? या कुछ मीन-मेख है?

हँसोड़ – अख्खा, आप हैं। माफ कीजिएगा, मैं अपने आपे में न था।

मौलवी – हजरत, इतना भी नींद के हाथ बिक जाना भला कुछ बात है! आठ बजा चाहते हैं और आप पड़े सो रहे हैं। क्या कल रतजगा था? खैर, मैं तो रुखसत होता हूँ; आप हकीम साहब के नाम खत लिख भेजिएगा। ऐसा न हो कि देर हो जाय। कहीं फिर न लुढ़क रहिएगा। आपकी नींद से हम हारे।

हँसोड़ – अच्छा मियाँ आजाद, और बातें तो पीछे होंगी, पहले यह बतलाइए कि खाना क्या खाइएगा? आज मामा बीमार हो गए हैं और घर में भी तबीयत अच्छी नहीं है। मैंने रोजे की नीयत की है। आप भी रोजा रख लें। फायदे का फायदा और सवाब का सवाब।

आजाद – रोजा आपको मुबारक रहे। अल्ला मियाँ हमें यों ही बख्श देंगे। यह दिल्लगी किसी और से कीजिएगा।

हँसोड़ – दिल्लगी के भरोसे न रहिएगा। मैं खरा आदमी हूँ। हाँ, खूब याद आया। मौलवी साहब खत लिखने को कह गए हें। दो पैसे का खून और हुआ। कल भी रोजा रखना पड़ा।

आजाद – दो पैसे क्यों खर्च कीजिएगा? अब तो एक पैसे के पोस्टकार्ड चले हैं।

हँसोड़ – सच? एक डबल में! भई अंगरेज बड़े हिकमती हैं। क्यों साहब, वह पोस्टकार्ड कहाँ बिकते हैं?

आजाद – इतना भी नहीं जानते? डाकखाने में आदमी भेजिए।

हँसोड़ – रोशनअली, डाकखाने से जा कर एक आने के पोस्टकार्ड ले आओ।

रोशन – मियाँ, मैं देहाती आदमी हूँ। अंगरेजी नहीं पढ़ा।

हँसोड़ – अरे भई, तुम कहना कि वह लिफाफे दीजिए, जो पैसे-पैसे में बिकते हैं। जा झट से, कुत्ते की चाल जाना और बिल्ली की चाल आना।

रोशन – अजी, मुझसे कहिए, तो मैं गधे की चाल जाऊँ और बिसखोपड़े की चाल जाऊँ। मुल डाकवाले मुझे पागल बनाएँगे। भला आज तक कहीं पैसे में लिफाफा बिका है?

हँसोड़ – अबे, तुझे इस हुज्जत से क्या वास्ता? डाकखाने तक जायगा भी, या यही बैठे-बैठे दलीलें करेगा?

रोशन डाकखाने गया और पोस्टकार्ड ले आया। मियाँ हँसोड़ झपट कर कलम-दवात ले आए और खत लिखने बैठे। मगर पुराने जमाने के आदमी थे, तारीफ के इतने लंबे-लंबे जुमले लिखने शुरू किए कि पोस्टकार्ड भर गया और मतलब खाक न निकला। बोले – अब कहाँ लिखें।

आजाद – दो टप्पी बातें लिखिए। आप तो लगे अपनी लियाकत बघारने! दूसरा लीजिए।

हँसोड़ ने दूसरा पोस्टकार्ड लिखना शुरू किया – ‘जनाव, अब हम थोड़े में बहुत सा हाल लिखेंगे। देखिए, बुरा न मानिएगा। अब वह जमाना नहीं रहा कि वह बीघे भर के आदाब लिखे जायँ। वह लंबी चौड़ी दुआएँ दी जायँ। वह घर का कच्चा, चिट्ठा कह सुनाना अब रिवाज के खिलाफ है। अब तो हमने कसम खाई है कि जब कलम उठाएँगे, दस सतरों से ज्यादा न लिखेंगे इसमें चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाय। अब आप भी इस फैशन को छोड़ दीजिए।’ अरे, यह खत भी गया। अब तो तिल रखने की भी जगह नहीं। लीजिए, बात करते-करते दो पैसे का खून हो गया। इसको दो पैसे का टिकट लाते, तो खर्रे का खर्रा लिख डालते।

आजाद – अरे देखूँ तो; आपने क्या लिखा है। वाह-वाह इस पँवाड़े का कुछ ठिकाना है। अरे साहब, मतलब से मतलब रखिए। बहुत बेहुदा न बकिए। खैर, अब तीसरा कार्ड लीजिए। मगर कलम को रोके हुए। ऐसा न हो कि आप फिर बाही-तबाही लिखने लगें।

हँसोड़ – अच्छा साहब, यों ही सही। बस, खास-खास बातें ही लिखूँगा।

यह कह कर उन्होंने यह खत लिखा – ‘जनाब फजीलतमआब मौलाना साहब, आप यह पैसलूचा लिफाफा देख कर घबरायँगे कि यह क्या बला है। डाकखानेवालों ने यह नई फुलझड़ी छोड़ी है। आप देखते हैं, इसमें कितनी जगह है। अगर मुख्तसर न लिखूँ तो क्या करूँ। लिखनी तो बहुत सी बातें हैं, पर इस लिफाफे को देख कर सब आरजूएँ दिल में रही जाती हैं। देखिए, अभी लिखा कुछ भी नहीं, मगर कागज को देखता हूँ, तो एक तरफ सब का सब लिप गया। दूसरी तरफ लिखूँ, तो पकड़ा जाऊँ।’ लो साहब, यह पोस्टकार्ड भी खतम हुआ! मियाँ आजाद, ये तीनों पैसे आपके नाम लिखे गए। आप चाहे दें टका नहीं, लेकिन सलाह आप ही ने दी थी।

आजाद – मैंने यह कब कहा था कि आप खत में अपनी जिंदगी की दास्तान लिख भेजें? यह खत है या राँड़ का चर्खा? इतने बड़े हुए, खत लिखने की लियाकत नहीं। समझा दिया, सिखला दिया कि बस, मतलब से मतलब रखो। मगर तुम कब मानने लगे। खुदा की कसम, तुम्हारी सूरत से नफरत हो गई। बस, बेतुकेपन की हद हो गई।

हँसोड़ – वाह री किस्मत! तीन पैसे गिरह से आए और उल्लू के उल्लू बने। भला आप ही लिखिए, तो जानें। देखें तो सही, आप इस जरा से कागज पर कुल मतलब क्योंकर लिखते हैं। इसके लिए तो बड़ा भारी उस्ताद चाहिए, जो पिस्ते पर हाथी की तस्वीर बना दे।

आजाद – आप अपना मतलब मुझसे कहिए, तो अभी लिख दूँ।

हँसोड़ – अच्छा सुनिए-मौलवी जामिनअली आपकी खिदमत में पहुँचे होंगे। उनको वह तीन रुपएवाली जगह दिला दीजिएगा। आपका उम्र भर एहसान होगा। बस, इसी को खूब बढ़ा दीजिए।

आजाद – फिर वही झक! बढ़ा क्यों दूँ? यह न कहा कि बस, यही मेरा मतलब है; इसको बढ़ा दीजिए। लाओ पोस्टकार्ड, देखो, यों लिखते हैं –

‘हजरत सलामत, मौलवी जामिनअली पहुँचे होंगे। वह तीस रुपएवाला ओहदा उनको दिलवा दीजिए, तो एहसान होगा। उम्मीद है कि आप खैरियत से होंगे।’

लो, देखो, इतनी सी बात को इतना बढ़ाया कि तीन-तीन खत लिखे और फाड़े।

हँसोड़ – खूब, यह तो अच्छा दुम-कटा खत है। अच्छा, अब पता भी तो लिखिए।

आजाद ने सीधा-सादा पता लिख कर हँसोड़ को दिखलाया, तो आप पूछने लगे – क्यों साहब, यह तो शायद वहाँ तक पहुँचे ही नहीं। कहीं इतना जरा सा पता लिखा जाता हैं? इसमें मेरा नाम कहाँ है, तारीख कहाँ है?

आजाद – आपका नाम बेवकूफों की फिहरिस्त में है और तारीख डाकखाने में।

हँसोड़ – अच्छा लाइए, दो-चार सतरें मैं भी बढ़ा दूँ।

हजरत ने जो लिखना शुरू किया, तो पते की तरफ भी लिख डाला। – थोड़े लिखने को बहुत समझिएगा। आपका पुराना गुलाम हूँ। अब कुछ करते धरते नहीं बन पड़ती।

आजाद – हैं-हैं। गारत किया न इसको भी?

हँसोड़ – क्यों, जगह बाकी है, पूरा पैसा तो वसूल करने दो।

आजाद – जी, पैसा नहीं, एक आना वसूल हो गया! एक ही तरफ मतलब लिखा जाता है, दूसरी तरफ सिर्फ पता। आपसे तो हमने पहले ही कह दिया था।

यह बातें हो ही रही थी कि कई लड़के स्कूल से निकले उनमें एक बड़ा शरीर था। किसी पर धप जमाई, किसी के चपत लगाई, किसी के कान गरमा दिए। अपने से ढयोढ़े-दूने तक को चपतियाता था। आजाद ने कहा – देखो, यह लौंडा कितना बदमाश है! अपने दूने तक की खबर लेता है।

हँसोड़ – भई, खुदा के लिए इसके मुँह न लगना। इसके काटे का मंतर ही नहीं। यह स्कूल भर में मशहूर है। हजरत दो दफे चारी की इल्लत में धरे गए। इनके मारे महल्ले भर का नाकों दम है। एक किस्सा सुनिए। एक दफे हजरत को शरारत का शौक चर्राया, फिर सोचने की जरूरत न थी। फौरन सूझती है। शरारत तो इसकी खमीर में दाखिल है। एक पाँव का जूता निकाल कर हजरत ने एक आलमारी पर रख दिया। जूते के नीचे एक किताब रख दी। थोड़ी देर बाद एक लड़के से बोले – यार, जरा वह किताब, उतारो, तो कुछ देख-दाख लूँ; नहीं तो मास्टर साहब बेतरह ठोकेंगे। सीधा-सादा लड़का चुपके से वह किताब उठाने लगा। जैसे किताब उठाई, वैसे ही जूती मुँह पर आई। सब लड़के खिलखिला कर हँस पड़े। मास्टर साहब अंगरेज थे। बहुत ही झल्ला कर पूछा – यह किसकी जूती का पाँव है? अब आप बैठे चुपचाप पढ़ रहे हैं। गोया इनसे कुछ वास्ता ही न था। मगर इनका तो दर्जा भर दुश्मन था। किसी लड़के ने इशारे से जड़ दी। मास्टर ने आपको बुलाया और पूछा – वेल, दूसरा पाँव कहाँ तुम्हारा? दूसरा पाँव किडर?

लड़का – पाँव दोनों ये हैं।

मास्टर – वेल, जूती, जूती?

लड़का – जूती को खावे तूती।

मास्टर – बेंच पर खड़ा हो।

लड़का – यह सजा मंजूर नहीं; कोई और सजा दीजिए।

मास्टर – अच्छा, कल के सबक को सौ बार लिख लाना।

लड़का – वाह-वाह, और सबक याद कब करूँगा।

मास्टर – अच्छा, आठ आना जुर्माना।

दूसरे दिन आप आठ आने लाए, तो मोटे पैसे खट-खट करके मेज पर डाल दिए। मास्टर ने पूछा – अठन्नी क्यों नहीं लाया? बोले – यह शर्त नहीं थी।

इसी तरह एक बार एक भलेमानस के यहाँ कह आए कि तुम्हारे लड़के को स्कूल में हैजा हुआ है। उनके घर में रोना-पीटना मच गया। लड़के का बाप, चचा, भाई, मामू, सब दौड़ते हुए स्कूल पहुँचे। औरतों ने आठ-आठ आँसू रोना शुरू किया। वे लोग जो स्कूल गए, तो क्या देखते है; लड़का मजे से गेंद खेलता है। अजी, और क्या कहें, इसने अपने बाप को एक बार नमक के धोखे में फिटकरी खिला दी, और उस पर तुर्रा यह कि कहा, क्यों अब्बाजान, कैसा गहरा चकमा दिया?

शाम के वक्त बूढ़े मियाँ आजाद के पास आ कर बोले – चलिए, उधर बजरा तैयार है! आजाद तो उनकी ताक में बैठे ही थे, हँसोड़ को लेकर उनके साथ चल खड़े हुए। नदी के किनारे पहुँचे, तो देखा, बजरे लहरों पर फर्राटे से दौड़ रहे हैं। एक दरख्त के साये में छिपकर यह बहार देखने लगे। उधर उन दोनों हसीनों ने बजरे पर से किनारे की तरफ देखा, तो आजाद नजर पड़े। शरम से दोनों ने मुँह फेर लिए। लेकिन कनखियों से ताक रही थीं। यहाँ तक कि बजरा निगाहों से ओझल हो गया।

थोड़ी देर के बाद आजाद उन्हीं बूढ़े मियाँ के साथ उस कोठी की तरफ चले, जिसमें दोनों लड़कियाँ रहती थीं। कदम-कदम पर शेर पढ़ते थे, ठंडी साँसे भरते थे और सिर धुनते थे। हालत ऐसी खराब थी कि कदम-कदम पर उनके गिर पड़ने का खौफ था। हँसोड़ ने जो यह कैफियत देखी, तो झपट कर मियाँ आजाद का हाथ पकड़ लिया और समझाने लगे। इस रोने-धोने से क्या फायदा? आखिर यह तो सोचो कि कहाँ जा रहे हो? वहाँ तुम्हें कोई पहचानता भी है? मुफ्त में शरमिंदा होने की क्या जरूरत?

आजाद – भई, अब तो यह सिर है और वह दर। बस, आजाद है और उन बुतों का कूचा।

हँसोड़ – यह महज नादानी है; यही हिमाकत की निशानी है। मेरी बात मानो, बूढ़े मियाँ को फँसाओ, कुछ चटाओ, फिर उनकी सलाह के मुताबिक काम करो, बेसमझे-बूझे जाना और अपना सा मुँह लेकर वापस आना हिमाकत है।

ये बातें करते हुए दोनों आदमी कोठी के करीब पहुँचे। देखा, बूढ़े मियाँ इनके इंतजार में खड़े हैं। आजाद ने कहा – हजरत, अब तो आप ही रास्ता दिखाएँ, तो मंजिल पर पहुँच सकते हैं; वर्ना अपना तो हाल खराब है।

बूढ़े मियाँ – भई, हम तुम्हारे सच्चे मददगार और पक्के तरफदार हैं। अपनी तरफ से तुम्हारे लिए कोई बात उठा न रखेंगे। लेकिन यहाँ का बाबा आलम ही निराला है। यहाँ परिंदों के पर जलते हैं। हवा का भी गुजर होना मुश्किल है। मगर दोनों मेरी गोद की खिलाई हुई हैं, मौके पर आपका जिक्र जरूर करूँगा। मुश्किल यही है कि एक ऊँचे घर से पैगाम आया है, उनकी माँ को शौक चर्राया है कि वहीं ब्याही हो।

आजाद – यह तो आपने बुरी खबर सुनाई! कसम खुदा की, मेरी जान पर बन जायगी।

बूढ़े मियाँ – सब्र कीजिए, सब्र। दिल को ढारस दीजिए। अब इस वक्त जाइए, सुबह आइएगा।

आजाद रुखसत होने ही वाले थे, तो क्या देखते हैं, दोनों बहनें झरोखों से झाँक रही हैं। आजाद ने यह शेर पढ़ा –

हम यही पूछते फिरते हैं जमाने भर से;

जिनकी तकदीर बिगड़ जाती है, क्या करते हैं?

झरोखे में से आवाज आई –

जीना भी आ गया मुझे, मरना भी आ गया;

पहचानने लगा हूँ तुम्हारी नजर को मैं।

इतना सुनना था कि मियाँ आजाद की आँखें मारे खुशी के डबडबा आईं। झरोखे की तरफ फिर जो ताका, तो वहाँ कोई न था। चकराए कि किसने यह शेर पढ़ा। छलावा था टोना था, जादू था, आखिर था क्या? इतने में बूढ़े मियाँ ने इशारे से कहा कि बस, अब जाओ और तड़के आओ।

दोनों दोस्त घर की तरफ चले, तो मियाँ हँसोड़ ने कहा – हजरत, खुदा के वास्ते मेरे घर पर कूद-फाँद न कीजिएगा, बहुत शेर न पढ़िएगा, कहीं मेरी बीवी को खबर हो गई, तो जीना मुश्किल हो जाएगा।

आजाद – क्या बीवी से आप इतना डरते हैं! आखिर खौफ काहे का?

हँसोड़ – आपको इस झगड़े से क्या मतलब? वहाँ जरा भले आदमी की तरह बैठिएगा, यह नहीं कि गुल मचाने लगे। जो सुनेगा, वह समझेगा कि कहाँ के शोहदे जमा हो गए हैं।

आजाद – समझ गया, आप बीवी के गुलाम है। मगर हमें इससे क्या वास्ता। आम खाने से मतलब कि पेड़ गिनने से?

दोनों आदमी घर पहुँचे, तो लौंडी ने अंदर से आ कर कहा – बेगम साहबा आपको कोई बीस बेर पूछ चुकी हैं। चलिए, बुलाती है। मियाँ हँसोड़ ने ड्योढ़ी पर कदम रखा ही था कि उनकी बीबी ने आड़े हाथों ही लिया। यह दिन-दिन भर आप कहाँ गायब रहने लगे? अब तो आप बड़े सैलानी हो गए। सुबह के निकले-निकले शाम को खबर ली। चलो, मेरे सामने से जाओ। आज खाना-वाना खैर-सल्लाह हैं। हलवाई की दुकान पर दादा जी का फातिहा पढ़ो, तंदूरी रोटियाँ उड़ाओ। यहाँ किसी को कुत्ते ने नहीं काटा कि वक्त-बे-वक्त चूल्हे का मुँह काला किया जाए। भले आदमी दो-एक घड़ी के लिए कहीं गए तो गए; यह नहीं कि दिन-दिन भर पता ही नहीं। अच्छे हथकंडे सीखे हैं।

हँसोड़ ने चुपके से कहा – जरा आहिस्ता-आहिस्ता बातें करो। बाहर एक भलामानस टिका हुआ है। इतनी भी क्या बेहयाई?

इस पर वह चमक कर बोली – बस, बस जबान न खुलवाओ बहुत। तुम्हें जो दोस्त मिलता है, वही ग….सवार, जिसके घर न द्वार, जाने कहाँ से उल्फती इनको मिल जाते हैं, कभी किसी शरीफ आदमी से दोस्ती करते नहीं देखा। चलिए, अब दूर हूजिए, नहीं हम बुरी तरह पेश आएँगे। मुझसे बुरा कोई नहीं।

मियाँ हँसोड़ बेचारे की जान अजाब में कि घर में बीवी कोसने सुना रही है, बाहर मियाँ आजाद आड़े हाथों लेंगे कि आपकी बीवी ने आपको तो खैर जो कुछ कहा, यह कहा ही मुझे क्यों ले डाला? मैंने उनका क्या बिगाड़ा था? अपना सा मुँह ले कर बाहर चले आए और आजाद से कहा – यार आज रोजे की नीयत कर लो। बीवी-जान फौजदारी पर आमदा है। बात हुई और तिनक गईं। महीनों ही रूठी रहती हैं। मगर क्या करूँ, अमीर की लड़की हैं, नहीं तो मैं एक झल्ला हूँ। मुझे यह मिजाज कहाँ पसंद। इसलिए भई, आज फाका है।

आजाद – फाका करें आपके दुश्मन। चलिए, किसी नानबाई हलवाई की दुकान पर। मजे से खाना खायँ!

हँसोड़ – अरे यार, इतने ही होते तो बीवी की क्यों सुनते! टका पास नहीं, हलवाई क्या हमारा मामू है?

आजाद – इसकी फिक्र न कीजिए। आप हमारे साथ चलिए और मजे से मिठाई चखिए। वह तदबीर सूझी है कि कभी पट ही न पड़े।

दोनों आदमी बाजार पहुँचे। आजाद ने रास्ते में हँसोड़ को समझा-बुझा दिया। हँसोड़ तो हलवाई की दुकान पर गए और आजाद जरा पीछे रह गए। हँसोड़ ने जाते ही जाते हलवाई से कहा – मियाँ आठ आने के पैसे दो और आठ आने की पँचमेल मिठाई। हलवाई ने ताजी-ताजी मिठाई तौल दी और आठ आने पैसे भी गिन दिए। हँसोड़ ने पैसे तो गाँठ में बाँधे और मिठाई उसी की दुकान पर चखने लगे। इतने में मियाँ आजाद भी पहुँचे और बोले – भई लाला, जरा हमें बेसन के लड्डू तो एक रुपए का तौल देना। उसने एक रुपए के बेसन के लड्डू चंगेर उनके हाथ में दी। इतने में मियाँ हँसोड़ ने लकड़ी उठाई और अपनी राह चले। हलवाई ने ललकारा – मियाँ, चले कहाँ? पहले रुपया तो देते जाओ।

हँसोड़ – रुपया! अच्छा मजाक है! अबे, क्या तूने रुपया नहीं पाया। यहाँ पहले रुपया देते हैं, पीछे सौदा लेते हैं। अच्छे मिले! क्या दो-दो दफे रुपया लोगे? कहीं मैं थाने में रपट न लिखवा दूँ! मुझे भी कोई गँवार समझे हो! अभी चेहरेशाही दे चुका हूँ। अब क्या किसी का घर लेगा?

अब हलवाई और हँसोड़ में तकरार होने लगी। बहुत से आदमी जमा हो गए। कोई कहता है, लाला घास तो नहीं खा गए हो; कोई कहता है, मियाँ एक रुपए के लिए नियत डामाडोल न करो; ईमान सलामत रहेगा, तो बहुत रुपए मिलेंगे।

आजाद – लाला, कहीं इसी तरह मेरा भी रुपया न भूल जाना।

हलवाई – क्या आपका रुपया? आपने रुपया किसको दिया?

अब जो सुनता है, वही हलवाई को उल्लू बनाता है। लोगों ने बहुत कुछ लानत-मलानत की कि शरीफ आदमी को बेइज्जत करते हो। इतने में उस हलवाई का बुड़्ढा बाप आया, तो देखता क्या है कि दुकान पर भीड़ लगी हुई है। पूछा, क्या माजरा है? क्या दुकान लुट गई? एक बिगड़े-दिल ने कहा – अजी, लुट तो नहीं गई मगर अब तुम्हारी दुकान की साख जाती रही! अभी एक भलेमानस ने खन से रुपया फेका। अब कहता है कि हमने रुपया पाया ही नहीं। उसको छोड़ा, तो दूसरे शरीफ का दामन पकड़ लिया कि तुमने रुपया नहीं दिया; हालाँकि वह बेचारे सैकड़ों कसमें खाते हैं कि मैं दे चुका हूँ। हलवाई बड़ा तीखा बुड्ढा था, सुनते ही आग हो गया। झल्ला कर अपने लड़के की खोपड़ी पर तान के एक चपत लगाई और बोला – कहता हूँ कि भंग न खाया कर, मानता ही नहीं। जा कर बैठ दुकान पर।

मियाँ आजाद और हँसोड़ ने मजे से डेढ़ रुपए की मिठाई बाँध ली, और आठ आने के पैसे घाते में। जब घर पहुँचे, तो खूब मिठाई चखी। बची बचाई अंदर भेज दी। हँसोड़ ने कहा – यार इसी तरह कहीं से रुपया दिलवाओ, तो जानें। आजाद ने कहा – यह कितनी बड़ी बात है? अभी चलो। मगर किसी से माँग-मूँग कर कुछ अशर्फियाँ बाँध लो। मियाँ हँसोड़ ने अपने एक दोस्त से शाम को लौटा देने के वादे पर कुछ अशर्फियाँ लीं! दोनों ने रोशनअली को साथ लिया और बाजार चले। पहले एक महाजन को अशर्फियाँ दिखाईं और परखवाईं। बेचते हैं, खरी-खोटी देख लीजिए। महाजन ने उनको खूब कसौटी पर कसा और कहा – उन्नीस के हिसाब से लेंगे। इसके बाद आजाद ने तो अशर्फियाँ ले कर घर की राह ली और मियाँ हँसोड़ एक कोठी में पहुँचे। वहाँ कहा कि हमको दो सौ अशर्फियाँ खरीदनी हैं। महाजन ने देखा, आदमी शरीफ है, फौरन दो सौ अशर्फियाँ उनके समने ढेर कर दीं। बीस रुपए की दर बताई। हँसोड़ ने महाजन के मुनीम से एक पर्चे पर हिसाब लिखवाया और अशर्फियाँ बाँध कर कोठी के बाहर पहुँचे। गुल मचा – हाँय-हाँय, लेना-लेना, कहाँ-कहाँ! मियाँ हँसोड़ पैंतरा बदल सामने खड़े हो गए। बस, दूर ही से बातचीत हो। सामने आए और मैंने तुला हाथ दिया।

महाजन – ऐ साहब, रुपए तो दीजिए?

हँसोड़ – कैसे रुपए? हम नहीं बेचते।

महाजन – क्या कहा, नहीं बेचते? क्या अशर्फियाँ आपकी हैं?

हँसोड़ – जी, और नहीं तो क्या आपके बाप की हैं? हम नहीं बेचते, आपका इजारा है कुछ? आप हैं कौन जबर्दस्ती करनेवाले?

इतने में आजाद भी वहाँ आ पहुँचे। देखा, तो महाजन और उनके मुनीम जी गुल मचा रहे हैं – तुम अशर्फियाँ लाए कब थे? और हँसोड़ कह रहे हैं, हम नहीं बेचते। सैकड़ों आदमी जमा थे। पुलिस का एक जमादार भी आ मौजूद हुआ।

जमादार – यह क्या झगड़ा है लाला चुन्नामल? वह नहीं बेचते, तो जबर्दस्ती क्यों करते हो? अपने माल पर सबको अख्तियार है।

महाजन – अच्छी पंचायत करते हो जमादार! यहाँ चार हजार रुपए पर पानी फिरा जाता है, आप कहते हैं, जाने भी दो। ये अशर्फियाँ तो हमारी हैं। यह मियाँ खरीदने आए थे, हमने गिन दीं। बस, बाँध बूँध कर चल खड़े हुए।

एक आदमी – वाह, भला कोई बात भी है! यह अकेले, आप दस। जो ऐसा होता, तो यह कोठी के बाहर भी आने पाते? आप सब मिल कर इनका अचार न निकाल लेते? इतने बड़े महाजन, और दो सौ अशर्फियों के लिए ईमान छोड़े देते हो!

जमादार – बुरी बात!

हँसोड़ – देखिए, आप बाजार भर में दरियाफ्त कर लें कि हमने कितनी दूकानों में अशर्फियाँ दिखलाई और परखवाई हैं? बाजार भर गवाह है, कुछ एक-दो आदमी वहाँ थोड़े थे? इसको भी जाने दीजिए। यह पर्चा पढ़िए। अगर यह बेचते होते, तो बीस की दर से हिसाब लगाते, या साढ़े उन्नीस से? मुफ्त में एक शरीफ के पीछे पड़े हैं, लेना एक ना देना दो।

आखिर यह तय हुआ कि बाजार में चल कर तहकीकात की जाय। मियाँ हँसोड़ साहूकार, उनके मुनीम, जमादार और तमाशाई, सब मिलकर बाजार चले। वहाँ तहकीकात की, तो दलालों और दुकानदारों ने गवाही दी कि बेशक इनके पास अशर्फियाँ थीं और इन्होंने परखवाई भी थीं। अभी-अभी यहाँ से गए थे।

जमादार – लाला साहब, अब खैर इसी में है कि चुपके रहिए; नहीं तो बेढब ठहरेगी। आपकी साख जायगी और मुनीम की शामत आ जायगी।

महाजन – क्या अंधेर है! चार हजार रुपयों पर पानी पड़ गया, इतने रुपए कभी उम्र भर में नहीं जमा किए थे, और जो है, हमी को उल्लू बनाता है। खैर साहब, लीजिए, हाथ धोये!

तीनों आदमी घर पहुँचे, तो बाँछें खिली जाती थीं। जाते ही दो सौ अशर्फियाँ खन-खन करके डाल दीं।

आजाद – देखा, यों लाते हैं। अब ये अशर्फियाँ हमारी भाभीजान के पास रखो।

हँसोड़ – भाई, तुम एक ही उस्ताद हो। आज से मैं तुम्हारा शागिर्द हो गया।

आजाद – ले, भाभी से तो खुश-खबरी कह दो। बहुत मुँह फुलाए बैठी थीं।

मियाँ हँसोड़ ने घर में जा कर कहा – कहाँ हो! क्या सो रहीं?

बीवी – क्या कमाई करके लाए हो, डपट रहे हो?

हँसोड़ – (अशर्फियाँ खनका कर) लो, इधर आओ, बहुत मिजाज न करो। ये लो, दस हजार रुपए की अशर्फियाँ।

बीवी – ये बुत्ते किसी और को दीजिएगा! ये तो वही हैं, जो अभी मिर्जा के यहाँ से मँगवाई थीं।

हँसोड़ – वह यह हैं, इधर।

बीवी – देखूँ, (खिलखिला कर) किसी के यहाँ फाँदे थे क्या? आखिर लाए किसके घर से? बस, चुपके से हमारे संदूकचे में रख दो।

हँसोड़ – क्यों न हो, मार खायँ गाजी मियाँ, माल खायँ मुजाविर।

बीवी – सच बताओ, कहाँ मिल गई? तुम्हें हमारी कसम!

हँसोड़ – यह उन्हीं की करामात है, जिन्हें तुम शोहदा और लुच्चा बनाती थीं।

बीवी – मियाँ, हमारा कुसूर माफ करो। आदमी की तबीयत हमेशा एक सी थोड़े ही रहती हैं। मैं तो तुम्हारी लौंडी हूँ।

आजाद – (बाहर से) हम भी सुन रहे हैं भाभी साहब! अभी तो आपने हमारे भाई बेचारे को डपट लिया था, घर से बाहर कर दिया था; हमको जो गालियाँ दीं, सो घाते में। अब जो अशर्फियाँ देखीं, तो प्यारी बीवी बन गईं। अब इनके कान न गरमाइएगा; यह बेचारे बेबाप के हैं।

बीबी ने अंदर से कहा – आप हमारे मेहमान हैं। आपको क्या कहूँ, आपकी हँसी सिर आँखों पर।

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