अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 22 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

· June 5, 2012

Premchand_4_aमियाँ आजाद के पाँव में तो सनीचर था। दो दिन कहीं टिक जायँ तो तलवे खुजलाने लगें। पतंगबाज के यहाँ चार-पाँच दिन जो जम गए, तो तबीयत घबराने लगी लखनऊ की याद आई। सोचे, अब वहाँ सब मामला ठंडा हो गया होगा। बोरिया-बँधना उठाया और शिकरम-गाड़ी की तरफ चले। रेल पर बहुत चढ़ चुके थे, अब की शिकरम पर चढ़ने का शौक हुआ। पूछते-पूछते वहाँ पहुँचे। डेढ़ रुपए किराया तय हुआ, एक रुपया बयाना दिया। मालूम हुआ, सात बजे गाड़ी छूट जायगी, आप साढ़े-छह बजे आ जाइए। आजाद ने असबाब तो वहाँ रखा, अभी तीन ही बजे थे, पतंगबाज के यहाँ आ कर गप-शप करने लगे। बातों-बातों में पौंने सात बज गए। शिकरम की याद आई, बचा-खुचा असबाब मजदूर के सिर पर लाद कर लदे-फँदे घर से चल खड़े हुए। राह में लंबे-लंबे डग धरते, मजदूरों को ललकारते चले आते हैं कि तेज चलो, कदम जल्द उठाओ। जहाँ सन्नाटा देखा, वहाँ थोड़ी दूर दौड़ने भी लगे कि वक्त पर पहुँचे; ऐसा न हो कि गाड़ी छूट जाय। वहाँ ठीक सात बजे पहुँचे, तो सन्नाटा पड़ा हुआ। आदमी न आदमजाद। पुकारने लगे, अरे मियाँ चपरासी, मुंशी जी, अजी मुंशी जी! क्या साँप सूँघ गया? बड़ी देर के बाद एक चपरासी निकला। कहिए, क्या डाक कीजिएगा?

आजाद – और सुनिए। डाक कीजिएगा की एक ही कही। मियाँ, बयाने का रुपया भी दे चुके।

चपरासी – अच्छा, तो इस घास पर बिस्तर जमाइए, ठंडी-ठंडी हवा खाइए, या जरा बाजार की सैर कर आइए।

आजाद – ऐं, सैर कैसी ? डाक छूटेगी आखिर किस वक्त?

चपरासी – क्या मालूम, देखिए, मुंशी जी से पूछूँ।

आजाद ने मुंशी जी के पास जा कर कहा – अरे साहब, सात बजे बुलाया था, जिसके साढ़े सात हो गए? अब और कब तक बैठा रहूँ?

मुंशी जी – जनाब, आज तो आप ही आप हैं, और कोई मुसाफिर ही नहीं। एक आदमी के लिए चालान थोड़े छोड़ेंगे।

आजाद – कहीं इस भरोसे न रहिएगा। बयाना दे चुका हूँ।

मुंशी – अच्छा, तो ठहरिए।

आठ बज गए, नौ बज गए, दस बज गए, कोई ग्यारह बजे तीन मुसाफिर आए। तब जाकर शिकरम चली। कोई आध कोस तक तो दोनों घोड़े तेजी के साथ गए, फिर सुरंग बोल गया। यह गिरा, वह गिरा। कोचवान ने कोड़े पर कोड़े जमाना शुरू किया; पर घोड़े ने भी ठान ली कि टलूँगा ही नहीं। कोचमैन, घसियारा, बारगीर, सब के सब ठोक रहे थे; मगर वह खड़ा हाँफता है। बारे बड़ी मुश्किल से फूँक-फूँक कर कदम रखता हुआ दूसरी चौकी तक आया।

दूसरी चौकी में एक टट्टू दुबला-पतला, दूसरा घोड़ा मरा हुआ सा था; हड्डियाँ-हड्डियाँ गिन लीजिए। यह पहले ही से रंग लाए। कोचमैन ने खूब कोड़े जमाए, तब कहीं चले। मगर दस कदम चले थे कि फिर दम लिया। साईस ने आँखें बंद करके रस्सी फटकारनी शुरू की। फिर दस-बीस कदम आहिस्ता-आहिस्ता बढ़े; फिर ठहर गए। खुदा-खुदा करके तीसरी चौकी आई।

तीसरी चौकी में एक दुबला-पतला मुश्की रंग का घोड़ा और दूसरा नुकरा था। पहले जरा चीं-चप्पड़, फिर चले। एक-आध कोस गए थे कि कीचड़ मिली, फिर तो कयामत का सामना था। घोड़े थान की तरफ भागते थे, कोचमैन रास थामे टिक-टिक करता जाता था, बारगीर पहियों पर जोर लगाते थे। मुसाफिरों को हुक्म हुआ कि उतर आइए; जरा हवा खाइए। बेचारे उतरे। आध कोस तक पैदल चले। घोड़े कदम-कदम पर मुँह मोड़ देते थे। वह चिल्ल-पों मची हुई थी कि खुदा पनाह। आध कोस के बाद हुक्म हुआ कि अपना-अपना बोझ उठाओ, गाड़ी भारी है। चलिए साहब, सबने गठरियाँ सँभाली! सिर पर असबाब लादे चले आते हैं। तीन घंटे में कहीं चौकी तय हुई, मुसाफिरों का दम टूट गया, कोचमैन और साईस के हाथ कोड़े मारते-मारते और पहियों पर जोर लगाते-लगाते बेदम हो गए।

चौथी चौकी की जोड़ी देखने में अच्छी थी। लोगों ने समझा था, तेज जायगी, मगर जमाली खरबूजों की तरह देखने ही भर की थी। कोचवान और बारगीरों ने लाख-लाख जोर लगाया, मगर उन्होंने जरा कान तक न हिलाए, कनौती तक न बदली। बुत बने खड़े हैं, मैदान में अड़े हें। कोई तो घास का मुट्ठा लाता है, कोई दूर से तोबड़ा दिखाता है, कोई पहिये पर जोर लगाता है, कोई ऊपर से कोड़े जमाता है। आखिर घोड़ों के एवज बैल जोते गए।

पाँचवीं चौकी में बाबा आदम के वक्त का एक घोड़ा आया। घोड़ा क्या, खच्चर था। आँखें माँग रहा था। मक्खियाँ भिन्न-भिन्न करती थीं। रात को भी मक्खियों ने इसका पीछा न छोड़ा।

आजाद – अरे भई, अब चलो न! आखिर यहाँ क्या हो रहा है? रास्ता चलने ही से कटता है।

कोचमैन – ऐ लो साहब, घोड़े का तो बंदोबस्त कर लें। एक ही घोड़ा तो इस चौकी पर है।

आजाद – अजी, दूसरी तरफ भैंस जोत देना।

एक मुसाफिर – या हम एक सहल तदबीर बताएँ। मुसाफिरों से कहिए, उतर पड़ें, बोझ अपना-अपना सिर पर लादें और जोर लगा कर बग्घी को एक चौकी तक ढकेल ले जायँ।

इतने में एक भठियारा अपने टट्टू को टिक-टिक करता चला आता था। कोचवान ने पूछा – कहो भाई, भाड़ा करते हो? जो चाहे सो माँगो, देंगे। नकद दाम लो और बग्घी पर बैठ जाओ। एक चौकी तक तुम्हारे टट्टू को बग्घी में जोतेंगे।

भठियारा – वाह, अच्छे आए! टटुआ कभी गाड़ी में जोता भी गया है? मुर्गी के बराबर टट्टू, और जोतने चले हैं शिकरम में। यों चाहे पीठ पर सवार हो लो, मुदा डाकगाड़ी में कैसे चल सकता है?

कोचमैन – अरे भई, तुमको भाड़े से मतलब है, या तकरीर करोगे? हम तो अपनी तरकीब से जोत लेंगे।

आजाद ने भठियारे से कहा – रुपया टेंट में रखो और कहो, अच्छा जोतो। कुछ थक-थका कर आप ही हार जायँगे। रुपया तुम्हारे बाप का हो जायगा। वह भी राजी हो गया। अब कोचमैन ने टट्टू को जोतना चाहा, मगर उसने सैकड़ों ही बार पुश्त उछाली, दुलत्तियाँ झाड़ी और गाड़ी के पास न फटका। इस पर कोचवान ने टट्टू को एक कोड़ा मारा। तब तो भठियारा आग हो गया। ऐ वाह मियाँ, अच्छे मिले, हमने पहले ही कह दिया था कि हमारा जानवर बग्घी में न चलेगा। आपने जबरदस्ती की। अब गधे की तरह गद-गद पीटने लगे।

वह तो टट्टू को बगल में दाब लंबा हुआ, यहाँ शिकरम मैदान में पड़ी हुई है। मुसाफिर जम्हाइयाँ ले रहे हैं। साईस चिलम पर चिलम उड़ाते हैं। सब मुसाफिरों ने मिल कर कसम खाई कि अब शिकरम पर न बैठेंगे। खुदा जाने, क्या गुनाह किया था कि यह मुसीबत सही। पैदल आना इससे कहीं अच्छा।

पाँचवीं चौकी के आगे पहुँचे, तो एक मुसाफिर ने, जिसका नाम लाला पलटू था, ठर्रे की बोतल निकाली और लगा कुज्जी पर कुज्जी उड़ाने। मियाँ आजाद का दिमाग मारे बदबू के परेशान हो गया। मजहब से तो उन्हें कोई वास्ता न था, क्योंकि खुदा के सिवा और किसी को मानते ही न थे, लेकिन बदबू ने उन्हें बेचैन कर दिया। एक दूसरे मुसाफिर रिसालदार थे। उनकी जान भी आजाब में थी। वह शराब के नाम प लाहौल पढ़ते और उसकी बू से कोसों भागते थे। जब बहुत दिक हो गए, तो मियाँ आजाद से बोले – हजरत, यह तो बेढब हुई। अब तो इनसे साफ-साफ कह देना चाहिए कि खुदा के वास्ते इस वक्त न पीजिए। थोड़ी देर में हमको और आपको गालियाँ न देने लगें, तो कुछ हारता हूँ। जरा आँख दिखा दीजिए जिसमें बहुत बढ़ने न पाएँ।

आजाद – खुदा की कसम, दिमाग फटा जाता है। आप डपट कर ललकार दीजिए। न माने तो मैं कान गरमा दूँगा।

रिसालदार – कहीं ऐसा गजब न कीजिएगा! पंजे झाड़ कर लड़ने को तैयार हो जायगा। शराबी के मुँह लगना कोई अच्छी बात थोड़े हैं।

दोनों में यही बातें हो रही थीं कि लाला पलटू ने हाँक लगाई – हरे-हरे बाग में गोला बोला, पग आगे, पग पीछे। यह बेतुकी कह कर हाथ जो छिड़का, तो रिसालदार की दोनों टाँगों पर शराब के छींटे पड़ गए। हाँय-हाँय, बदमाश, अलग हट! उठ जा यहाँ से। नहीं तो दूँगा एक लप्पड़।

पलटू – बरसो राम झड़ाके से; रिसालदार की बुढ़िया मर गई फाके से। हमारा बाप गधा था।

रिसालदार – चुप, खोस दूँ बाँस मुँह में?

पलटू – अजी, तो हँसी-हँसी में रोए क्यों देते हो? वाह, हम तो अपने बाप को बुरा कहते हैं।

आजाद – क्या तुम्हारे बाप गधे थे?

पलटू – और कौन थे? आप ही बताइए। उमर भर डोली उठाई, मगर मरते दम तक न उठानी आई।

रिसालदार – क्या कहार था?

पलटू – और नहीं तो क्या चमार था, या बेलदार था? या आपकी तरह रिसालदार था?

आजाद – है नशे में तो क्या, बात पक्की कहता है।

पलटू – अजी, इसमें चोरी क्या है? हम कहार, हमारा बाप कहार।

आजाद – कहिए! आपकी महरी तो खैरियत से है।

पलटू – चल शिकरम, चल घोड़े, बिगुल बजे भोंपू-भोंपू। सामने काँटा, दुकान में आटा, कबड़िये के यहाँ भाँटा, रिसालदार के लगाऊँ चाँटा।

रिसालदार – ऐसा न हो कि मैं नशा-वशा सब हिरन कर दूँ। जबान को लगाम दे।

पलटू – अच्छा सईस है।

आजाद – अबे, साईसी इल्म दरियाव है।

पलटू – तेरा सिर नाव है, तू बनबिलाव है।

रिसालदार – कोचमैन, बग्घी ठहराओ।

पलटू – कोचमैन, बग्घी चलाओ।

मियाँ आजाद ने देखा, रिसालदार का चेहरा मारे गुस्से के लाल हो गया, तो उन्होंने बात टाल दी और पूछा – क्यों पलटू महाराज, सच कहना तुमने तो कभी डोली नहीं उठाई? पलटू बोले – नहीं, कभी नहीं। हाँ, बरतन माँजे हें। मगर होश सँभालते ही मदरसे में पढ़ने लगे और अब तार-घर में नौकर हैं। रिसालदार जी, लो पीते हो? रिसालदार के मुँह के पास कुज्जी ले जा कर कहा – पियो,पियो। इतना कहना था कि रिसालदार जल भुनके खाक हो गए, तड़ से एक चाँटा रसीद किया, दूसरा और दिया, फिर तीन-चार और लगाए। पलटू मजे से बैठे चपते खाया किए। फिर एक कहकहा लगा कर बोले – अबे जा, बड़ा रिसालदार बना है। नाम बड़ा, दरसन थोड़े। एक जूँ भी न मरी। रिसालदारी क्या खाक करते हो? चलो, अब तो एक कुज्जी पियो। दूँ फिर?

रिसालदार – भई, इसने तो नाक में दम कर दिया। पीटते-पीटते हाथ थक गए।

कोचमैन – रिसालदार साहब, यह क्या गुल मच रहा है?

आजाद – बड़ी बात कि तुम जीते तो बचे! हम समझते थे कि साँप सूँघ गया। यहाँ मार धाड़ भी हो गई, तुम्हें खबर ही नहीं।

कोचमैन – मार-धाड़! यह मार-धाड़ कैसी?

रिसालदार – देखो यह सुअर, शराब पी रहा है और सबको गालियाँ देता है! मैंने खूब पीटा, फिर भी नहीं मानता।

पलटू – झूठे हो! किसने पीटा? कब पीटा? यहाँ तो एक जूँ भी न मरी।

कोचमैन – लाला, थोड़ी सी हमको भी पिलाओ।

पलटू और कोचमैन, दोनों कोच-बक्स पर जा बैठे और कुज्जियों का दौर चलने लगा। जब दोनों बदमस्त हुए, तो आपस में धौल धप्पा होने लगा। इसने उसके लप्पड़ लगाया, उसने इसके एक टीप जड़ी। कोचमैन ने पलटू को ढकेल दिया। पलटू ने गिरते ही पाँव पकड़ कर घसीटा, तो कोचमैन भी धम से गिरे। दोनों चिपट गए। एक ने कूले पर लादा, दूसरा बगली डूबा। मुक्का चलने लगा। कोचमैन ने झपट के पलटू को टँगड़ी ली, पलटू ने उसके पट्टे पकड़े। रिसालदार को गुस्सा आया, तो पलटू के बेभाव की चपतें लगाईं। एक, दो, तीन करके कोई पचास तक गिन गए आजाद ने देखा कि मैं खाली हूँ। उन्होंने कोचमैन को चपतियाना शुरू किया।

आजाद – क्यों बचा, पियोगे शराब? सुअर, गाड़ी चलाता है कि शराब पीता है?

रिसालदार – तोड़ दूँ सिर, पटक दूँ बोतल सिर पर!

पलटू – तो आप क्या अकड़ रहे हैं? आपकी रिसालदारी को तो हमने देख लिया! देखो, कोचमैन के सिर पर आधे बाल रह गए, यहाँ बाल भी न बाँका हुआ।

रिसालदार – बस भई अब हम हार गए।

इस झंझट में तड़का हो गया। मुसाफिर रात भर के जगे हुए थे, झपकियाँ लेने लगे। मालूम नहीं, कितनी चौकियाँ आईं और गईं। जब लखनऊ पहुँचे, तो दोपहर ढल चुकी थी।

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