अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 21 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

· June 7, 2012

Premchand_4_aमियाँ आजाद रेल पर बैठ कर नाविल पढ़ रहे थे कि एक साहब ने पूछा – जनाब, दो-एक दम लगाइए, तो पेचवान हाजिर है। वल्लाह, वह धुआँधार पिलाऊँ कि दिल फड़क उठे। मगर याद रखिए, दो दम से ज्यादा की सनद नहीं। ऐसा न हो, आप भैंसिया-जोंक हो जायँ।

आजाद ने पीछे फिर कर देखा, तो एक बिगड़े-दिल मजे से बैठे हुक्का पी रहे हैं। बोले, यह क्या अंधेर है भाई? आप रेल ही पर गुड़गुड़ाने लगे; और हुक्का भी नहीं, पेचबान। जो कहीं आग लग जाय, तो?

बिगड़े दिल – और जो रेल ही टकरा जाय, तो? आसमान ही फट पड़े, तो? इस ‘तो’ का तो जवाब ही नहीं है। ले, पीजिएगा, या बातें बनाइएगा?

आजाद – जी, मुझे इसका शौक नहीं है।

यह कह कर फिर नाविल पढ़ने लगे। थोड़ी देर के बाद एक स्टेशन पर रेल ठहरी, तो खरबूजे और आम पटे हुए थे। खैंचियाँ की खैंचियाँ भरी रखी थीं। बोले – क्यों भई, स्टेशन है या आम की दुकान? या खरबूजे की खान? आमपुर है या खरबूजानगर?

एक मुसाफिर बोले – अजी हजरत, नजर न लगाइए। अब की फसल तो खा लेने दीजिए। इसी पर तो जिंदगी का दार-मदार है। खेत में बेल बढ़ी और यहाँ कच्चे घड़े के चढ़ी। आम बाजार में आए और ई जानिब बौराए। आम और खरबूजे पर उधार खाए बैठे हैं। कपड़े बेच खायँ, बरतन नखास मे पटील जाएँ, बदन पर लत्ता न रहे, चूल्हे पर तवा न रहे, उधार लें, सुथना तक गिरवी रखें, बगड़ा करें, झगड़ा करें, मगर खरबूजे पर जरूर चले। तड़का हुआ, चाकू हाथ में लिया और खरबूजे की टोह में मचला। छुरी बाजार है कि महक रहा है, खरीदार हैं कि टूटे पड़ते हैं। रसीली खटकिन जवानी की उमंग में अच्छे-अच्छों को डाँट बताती है। मियाँ, अलग रहो, खैंची पर न गिरे पड़ो। बस, दूर ही से भाव-ताव करो। लेना एक न देना दो, मुफ्त का झंझट। ई जानिब ने एक तराशा, दूसरा तराशा, तीसरा तराशा, खूब चखे। आँख चूकी, तो दो-चार फाँके मुँह में दबाईं और चलते-फिरते नजर आए। आदमी क्या, बंदर हो गए। उधर खरबूजे गए और आम की फसल आई, मुँह-माँगी मुराद पाई। जिधर देखिए, ढेर के ढेर चुने हैं। यहाँ सनक सवार हो गई। देखा और झप से उठाया; तराशा और खाया। माल-असबाब के कूड़े किए और बेगिनती लिए। खाने बैठे, तो दो दाढ़ी खा गए चार दाढ़ी खा गए।

आजाद – यह दाढ़ी खाने के क्या माने?

मुसाफिर – अजी हजरत, आम इतने खाए कि गुठली और छिलके दाढ़ी तक पहुँचे।

मुसाफिर वह डींग हाँक ही रहे थे कि रेल ठहरी और एक चपरासी ने आकर पूछा – फलाँ आदमी कहाँ है?

आजाद – इस कमरे में इस नाम का कोई आदमी नहीं है।

मुसाफिर ने चपरासी की सूरत देखी; तो चादर से मुँह लपेट कर खिड़की की दूसरी तरफ झाँकने लगे। चपरासी दूसरे दर्जे में चला गया।

आजाद – उस्ताद, तुमने मुँह जो छिपाया, तो मुझे शक होता है कि कुछ दाल में काला जरूर है। भई, और किसी से न कहो, यारों से तो न छिपाओ।

मुसाफिर – मुँह क्यों छिपाऊँ जनाब, क्या किसी का कर्ज खाया है, या माल मारा है, या कहीं खून करके आए हैं?

आजाद – आप बहुत तीखे हुजिएगा, तो धरवा ही दूँगा। ले बस, कच्चा चिट्ठा कह सुनाओ, वरना मैं पुकारता हूँ फिर।

मुसाफिर – अरे नहीं-नहीं ऐसा गजब भी न करना। साफ-साफ बता दें? हमने अबकी फसल में खरबूजे और आम खूब छक कर चखे, मगर टका कसम को पास नहीं। पूछो, लाएँ जिसके घर से? यहाँ पहले तो कर्ज लिया, फिर एक दोस्त का मकान अपने नाम से पटील डाला। अब नालिश हुई है, सो हम भागे जाते हैं।

आजाद – ऐसे आम खाने पर लानत! कैसे नादान हो?

मुसाफिर – देखिए, नादान-वादान न बनाइएगा। वरना बुरी ठहरेगी!

आजाद – अच्छा बुलाऊँ चपरासी को?

मुसाफिर – जनाब, दस गालियाँ दे लीजिए, मगर जान तो छोड़ दीजिए।

इतने में एक मुसाफिर ने कई दर्जे फाँदे, यह उचका, यह आया यह झपटा और धम से मियाँ आजाद के पास हो रहा।

मुसाफिर – गरीबपरवर!

आजाद – किससे कहते हो? हम गरीबपरवर नहीं अमीरपरवर हैं; गरीब परवर हमारे दुश्मन हों।

मुसाफिर – अच्छा साहब, आप अमीर के बाप-परवर, दादा-परवर सही। हमारा आपसे एक सवाल है।

आजाद – सवाल स्कूल के लड़कों से कीजिए, या वकालत के उम्मेदवारों से।

मुसाफिर – दाता, जरा सुनो तो।

आजाद – दाता भंडारी को कहते हैं। दाता कहीं और रहते होंगे।

मुसाफिर – एक रुपया दिलवाओ, तो हजार दुआएँ दूँ।

आजाद – दुआ के तो हम कायल ही नहीं।

मुसाफिर – तो फिर गालियाँ सुनाऊँ?

आजाद – गालियाँ दो, तो बत्तीसी पेट में हो।

मुसाफिर – अरे गजब, लो स्टेशन करीब आ गया। अब बेइज्जत होंगे।

आजाद – यह क्यों!

मुसाफिर – क्यों क्या, टिकट पास नहीं, घर से दो रुपए ले कर चले थे, रास्ते में लँगड़े आम दिखाई दिए। राल टपक पड़ी। आव देखा न ताव, दो रुपए टेंट से निकाले और आम पर छुरी तेज की। अब गिरह में कौड़ी नहीं, ‘पास न लत्ता, पान खायँ अलबत्ता।’

आजाद – वाह रे पेटू! भला यहाँ तक आए क्योंकर?

मुसाफिर – इनकी न पूछिए। यहाँ सैकड़ों ही अलसेटें याद हैं।

इतने में रेल स्टेशन पर आ पहुँची। टिकट-बाबू की काली-काली टोपी और सफेद चमकती हुई खोपड़ी नजर आई। टिकट! टिकट! टिकट निकालो। मियाँ आजाद तो टिकट देकर लंबे हुए; बाबू ने इनसे टिकट माँगा, ते लगे बगलें झाँकने। वेल, तुम्हारा टिकट कहाँ?

मुसाफिर – बाबू जी, हम पर तो अब की साल टिकस-विकस नहीं बँधा।

बाबू – यू फूल! तुम बेटिकट के चलता है उल्लू!

मुसाफिर – क्या आदमी भी उल्लू होते हैं? इधर तो देखने में नहीं आया, शायद आपके बंगाल में होता हो।

टिकट-बाबू ने कानिस्टिबिल को बुला कर इनको हवालात भिजवाया। आम खाने का मजा मिला, मार और गालियाँ खाईं, सो घाते में।

घटाटोप अँधेरा छाया है, काला मतवाला बादल झूम-झूम कर पूरब की तरफ से आया है। वह घनेरी घटा कि हाथ मारा न सूझे। अँधेरे ने कुछ ऐसी हवा बाँधी कि चाँद का चिराग गुल हो गया। यह रात है कि सियहकारों का दिल? हर एक आदमी जरीब टेकता चल रहा है, मगर कलेजा दहल रहा है कि कहीं ठोकर न खायँ, कहीं मुँह के बल जमीन पर न लुढ़क जायँ। मियाँ आजाद स्टेशन से चले, तो सराय का पता पूछने लगे। एकाएक किसी आदमी से सिर टकरा गया। वह बोला – अंधा हुआ है क्या? रास्ता बचा के चल, पतंग रखे हुए हैं, कहीं फट न जायँ।

आजाद – ऐं, रास्ते में पतंग कैसे? अच्छी बेपर की उड़ाई।

पतंगबाज – भई वल्लाह, क्या-क्या बिगड़े-दिलों से पाला पड़ जाता है! हम तो नरमी से कहते हैं कि मियाँ जरी दबा कर जाओ, और आप तीखे हुए जाते हैं।

आजाद – अरे नादान, यहाँ हाथ-मारा सूझता ही नहीं, पतंग किस भकुए को सूझेंगे।

पतंगबाज – क्या रतौंधी आती है?

आजाद – क्या पतंग बेचने जा रहे हो?

पतंगबाज – अजी, पतंग बेचें हमारे दुश्मन। हम खुद घर के अमीर हैं। यहाँ से चार कोस पर एक कस्बा है, वहाँ के रईस हमारे लँगोटिये यार हैं! उनसे हमने पतंगों का मैदान बदा था। हम अपने यारों के साथ बारहदरी के कोठे पर थे और वह अपने दीवानखाने की छत पर। कोई सात बजे से इधर भी कनकव्वे छपके, उधर भी बढ़े। खूब लमडोरे लड़े। पाँच रुपए जी पेच बदा था। यार, एक पतंग खूब लड़ा। हमारा माँगदार बढ़ा था और उधर का गोल दुपन्ना। दस-बारह मिनट दाँव घात के बाद पेच पड़ गए। पहले तो हमारे कन्ने नथ गए, हाथें के तोते उड़ गए; समझे, अब कटे और अब कटे; मगर वाह रे उस्ताद, ऐसे कन्ने छुड़ाए कि वाह जी वाह! फिर पेच लड़ गए। पंसेरियों डोर पिला दी, कनकव्वा आसमान से जा लगा। जो कोई दम और ठहराता तो वहीं जल-भुन कर खाक हो जाता। उतने में हमने गोता देकर एक भबका जो दिया, तो वह काटा। अब कोई कहता है कि हत्थे पर से उखड़ गयाः कोई कहता है, डोर उलझ गई थी। एक कनकव्वे से हमने कोई नौ दस काटे। मगर उनकी तरफ कोई उस्ताद आ गया – उसने खींचके वह हाथ दिखाए कि खुदा की पनाह! हाथ ही टूटें मरदूद के! छक्के छुड़ा दिए। कभी सड़-सड़ करता हुआ नीचे से खींच गया! कभी ऊपर से पतंग पर छाप बैठा। आखिर मैंने हिसाब जो लगाया, तो पचास रुपए के पेटे में आ गया। मगर यहाँ टका पास नहीं। हमने भी एक माल तक लिया है, घर के सोने के कड़े किसी के हाथ पटीलेंगे, कोई दस तोले के होंगे, चुपके से उड़ा दूँगा, किसी को कानों-कान खबर भी न होगी।

आजाद – आपके वालिद क्या पेशा करते हैं?

पतंगबाज – जमींदार हैं। मगर मुझे जमींदारी से नफरत है। जमींदार की सूरत से नफरत है, इस पेशे के नाम से नफरत है! शरीफ आदमी और लट्ठ लिए हुए मेड़-मेड़ घूम रहे हैं। हमसे यह न होगा। हम कोई मजदूर तो हैं नहीं। यह गँवारों ही को मुबारक रहे।

आजाद – हुजूर ने तालीम कहाँ तक पाई है? आप तो लंदन के अजायबखाने में रखने लायक हैं।

पतंगबाज – यहीं से तहसीली स्कूल में कुछ दिन तक घास छीली है।

आजाद – क्या घसियारा बनने का शौक चर्राया था?

पतंगबाज – जनाब, कोई छह-सात बरस पढ़े; मगर गंडेदार पढ़ाई, एक दिन हाजिर तो दस दिन नागा। पहले दर्जे का इम्तिहान दिया, मगर लुढ़क गए। अब्बाजान ने कहा, अब हम तुम्हें नहीं पढ़ाएँगे। खैर, इस झंझट से छुट्टी पाई तो पेशेकार सहब के लड़के से दोस्ती बढ़ाई। तब तक हम निरे जंगली ही थे। हद यह कि हुक्का पीना तक नहीं जानते थे। तो वजह क्या? अच्छी सोहबत में कभी बैठे ही न थे। छोटे मिर्जा बेचारे ने हमें हुक्का पीना सिखाया। फिर तो उनके साथ चंडू के छींटे उड़ने लगे। पहले आप मुझे देखते तो कहते, कब्र में एक पाँव लटकाए बैठा है। बदन में गोश्त का नाम नहीं, हड्डी हड्डी गिन लीजिए। जब से छोटे मिर्जा की सोहबत में ताड़ी पीने लगा, तब से जरा हरा हूँ। पहले हम निरे गावदी ही थे। यह पतंग लड़ाना तो अब आया है। मगर अबकी पचास के पेटे में आ गए। छोटे मिर्जा से हमने तदबीर पूछी, तो वल्लाह, तड़ से बतलाया कि जब बहन या भावज या बीवी की आँख चूके, तो कोई सोने क अदद साफ उड़ा दो। भई, जिला-स्कूल में पढ़ता, तो ऐसी अच्छी सोहबत न मिलती।

आजाद – वल्लाह, आप तो खराद पर चढ़ गए, ‘सब गुन, पूरे, तुम्हें कौन कहे लँडूरे।’

पतंगबाज – आप यहाँ कहाँ ठहरेंगे? चलिए, इस वक्त गरीबखाने ही पर खाना खाइए; सराय में तो तकलीफ होगी। हाँ, जो कोई और बात हो, तो क्या मजायका, (मुसकिरा कर) सच कहना उस्ताद, कुछ लसरका है?

आजाद – मियाँ, यहाँ दिल ही नहीं है पास, मुहब्बत करेंगे क्या! चलिए, आप ही के यहाँ मेहमान हों – यहाँ तो बेफिक्री के हाथ बिक गए हैं। मगर उस्ताद, इतना याद रहे कि बहुत तकलीफ न कीजिएगा।

पतंगबाज – वल्लाह, यह तो वही मसल हुई कि बस, एक दस सेर का पुलाव तो बनवाइएगा, मगर तकल्लुफ न कीजिएगा। मानता हूँ आपको।

आजाद और पतंगबाज इक्के पर बैठेद्य इक्का हवा से बातें करता चला, तो खट से मकान पर दाखिल। अंदर से बाहर तक खबर हो गई कि मँझले मियाँ आ गए। मियाँ आजाद और वह दोनों उतरे। इतने में एक लौंडी अंदर से आकर बोली। चलिए, बड़े साहब ने आपको याद किया है।

पतंगबाज – ऐ है, नाक में दम कर दिया, आते देर नहीं हुई और बुलाने लगे। चलो, आते हैं। आपके लिए हुक्का भर लाओ। हजरत, कहिए तो जरी वालिद से मिल आऊँ? गाना-वाना सुनिए, तो बुलाऊँ किसी को? इधर लौंडी अंदर पहुँची, तो बड़े मियाँ से बोली – उनके पास तो उनके कोई दोस्त मसनद तकिया लगाए बेठे हैं।

मियाँ। उनके दोस्तों को न कहो। शहर भर के बदमाश, चोर-मक्कार, झूठों के सरदार उनके लँगोटिये यार हैं। भलेमानस से मिलते-जुलते तो उन्हें देखा ही नहीं।

लौंड़ी – नहीं मियाँ, सकल सूरत से तो शरीफ भलेमानुस मालूम होते हैं।

खैर, रात को आजाद और मँझले मियाँ ने मीठी नींद के मजे उठाए, सुबह को हवाली-मवाली जमा हुए।

एक – हुजूर, कल तो खूब-खूब पेंच लड़े, और हवा भी अच्छी थी।

पतंगबाज – पेंच क्या लड़े, पचास के माथे गई। खैर, इसका तो यहाँ गम नहीं, मगर किरकिरी बड़ी हुई।

दूसरा – वाह हुजूर, किरकिरी की एक ही कही। कसम खुदा की, वह लम डोरा पेंच निकाला कि देखनेवाले दंग रह गए। जमाना भर यही कहता था कि भई, पेंच क्या काटा, कमाल किया। कुछ इनाम दिलवाइए, खुदाबंद! आपके कदमों की कसम, आज शहर भर में उस पेंच की धूम है। चालीस-पचास रुपयों की भी कोई हकीकत है!

शाम के वक्त आजाद और मियाँ पतंगबाज बैठे गप-शप कर रहे थे कि एक मौलवी साहब लटपटी दस्तार खोपड़ी पर जमाए, कानी आँख को उसके नीचे छिपाए, दूसरी में बरेली का सुरमा लगाए कमरे में आए। उन्होंने अकेलसलेम के बाद जेब से एक इश्तिहार निकाल कर आजाद के हाथ में दिया। आजाद ने इश्तिहार पढ़ा, तो फड़क गए। एक मुशायरा होने वाला था। दूर-दूर से शायर बुलाए गए थे। तरह का मिसरा था –

‘हमसे उस शोख ने ऐयारी की’।

मौलवी साहब तो उलटे पाँव लंबे हुए, यहाँ मुशायरे की तारीख जो देखते हैं, तो इकतीस फरवरी लिखी हुई है। हैरत हुई कि फरवरी तो अट्ठाइस और कभी उनतीस ही दिन का महीना होता है, यह इकतीस फरवरी कौन सी तारीख है! बारे मालूम हुआ कि इसी वक्त मुशायरा था। खैर दोनों आदमी बड़े शौक से पता पूछते हुए गुलाबी बारहदरी में दाखिल हुए। वहाँ बड़ी रौनक थी। नई-नई वजा, नए-नए फैशन के लोग जमा हैं। किसी का दिमाग ही नहीं मिलता; जिसे देखो, तानाशाह बना बैठा है, दुनिया की बादशाहत को जूती की नोक पर मारता है। शायरी के शौकीन उमड़े चले आते हैं। कहीं तिल रखने की जगह नहीं। जब रात भीगी और चाँदनी खूब निखरी, तो मुशायरा शुरू हुआ। शायरों ने चहकना शुरू किया। मजलिस के लोग एक-एक शेर पर इतना चीखे-चिल्लाए कि होंठ और गले सूख कर काँटा हो गए। ओहो हो-हो, आहा हा-हा, वाह-वाहन सुभान अल्लाह के दौंगरे बरस रहे थे। शायर ने पूरा शेर पढ़ा भी नहीं कि यार लोग ले उड़े! वाह हजरत, क्यों न हो! कसम खुदा की! कलम तोड़ दिया! वल्लाह, आज इस लखनऊ में आपका कोई सानी नहीं! एक शायर ने यह गजल पढ़ी –

हमको देखा, तो वह हँस देते हैं;

आँख छिपती ही नहीं यारी की।

महफिल के लोगों ने पूरा शेर तो सुना नहीं, यारी को गाड़ी सुन लिया। गाड़ी की, वाह-वाह, क्या शेर फरमाया, गाड़ी की! अब जिसे देखिए, गुल मचा रहा है – गाड़ी की, गाड़ी की। मगर गुलगपाड़े में सुनता कौन है। शायर बेचारा चीखता है कि हजरत, गाड़ी की नहीं, यारी की; पर यार लोग अपना ही राग अलापे जाते हैं। तब तो मियाँ आजाद ने झल्ला कर कहा – साहबो, अगाड़ी न पिछाड़ी, चौपहिया न पालकी-गाड़ी, खुदा के वास्ते पहले शेर तो सुन लो, फिर तारीफ के पुल बाँधो। गाड़ी की नहीं, यारी की। आँख छिपती ही नहीं यारी की।

दूसरे शायर ने यह शेर पढ़ा –

उम्मीद रोजे-वस्ल थी किस बदनसीब को;

किस्मत उलट गई मेरे रोजे-सियाह की।

हाजिरीन – निगाह की, सुभान-अल्लाह। निगाह की, हजरत, यह आप ही का हिस्सा है।

शायर – निगाह नहीं, रोजे-सियाह। निगाह से तो यहाँ कुछ माने ही न निकलेंगे।

यह कह कर उन्होंने फिर उसी शेर को पढ़ा और सियाह के लफ्ज पर खूब जोर दिया कि कोई साहब फिर निगाह न कह उठें।

आधी रात तक हू-हक मचता रहा। कान-पड़ी आवाज न सुनाई देती थी। पड़ोसियों की नींद हराम हो गई। एक-एक शेर पढ़ने की चार-चार दफे फरमाइश हो रही है और बीस मरतबा उठा-बैठी, सलाम पर सलाम और आदाब पर आदाब; अच्छी कवायद हुई। लाला खुशवक्तराय और मुंशी खुर्सेदराय तीन-तीन सौ शेरों की गजलें कह लाए थे, जिनका एक शेर भी दुरुस्त नहीं। एक बजे से पढ़ने बैठे, तो तीन बजा दिए। लोग कानों में ऊँगलियाँ दे रहे हैं, मगर वे किसी की नहीं सुनते।

वहाँ से मियाँ आजाद और उनके दोस्त घर आए। तड़का हो गया था। आजाद तो थोड़ी देर सो कर उठ गए, मगर मियाँ पतंगबाज ने दस बजे तक की खबर ली।

आजाद – आज तो बड़े सवेरे उठे। अभी तो दस ही बजे हैं। भई, बड़े सोनेवाले हो!

पतंगबाज – जनाब, तड़का तो मुशायरे ही में हो गया था। जब आदमी सुबह को सोएगा, तो दस बजे से पहले क्या उठेगा। और, सच तो यों है कि अभी और सोने को जी चाहता है। कुछ मुशायरे के झगड़े का भी हाल सुना? आप तो कोई चार बजे सो रहे थे। हमने सारी दास्तान सुनी। बड़ी चख चल गई। मौलवी बदर और मुंशी फिशार में तो लकड़ी चलते-चलते रह गई। जो मियाँ रंगीन न हों, तो दोनों में जूती चल जाय।

आजाद – यह क्यों, किस बात पर?

पतंगबाज – कुछ नहीं, यों ही। मैं तो समझा, अब लकड़ी चली।

आजाद – तो मुशायरा क्या पाली थी? पूछिए, शायरी को लकड़ी और बाँक से क्या वास्ता? कलम का जोर दिखाना चाहिए कि हाथ का। किसी तरह बदर और फिशार में मिलाप करा दीजिए।

पतंगबाज – ऐ तौबा। मिलाप, मिलाप हो चुका। बदर का यह हाल है कि बात की और गुस्सा आ गया। और मियाँ फिशार उनके भी चचा हैं। बात पीछे करते हैं, चाँटा पहले ही जमाते हैं।

आजाद – आखिर बखेड़े का सबब क्या?

पतंगबाज – सिवा हसद के और क्या कहूँ। हुआ यह कि फिशार ने पहले पढ़ा। हस पर मौलवी बदर बिगड़ खड़े हुए कि हमसे पहले इन्हें क्यों पढ़ने दिया गया। इनमें क्या बात है। हम भी तो उस्ताद के लड़के हैं। इस पर फिशार बोले – अभी बच्चे हो, हिज्जे करना तो जानते नहीं। शायरी क्या जानो। कुछ दिन उस्ताद की जूतियाँ सीधी करो, तो आदमी बनो। बदर ने आस्तीनें उलट लीं और चढ़ दौड़े। फिशार के शागिर्दों ने भी डंडा सीधा किया। इस पर लोगों ने दौड़ कर बीच-बचाव कर दिया।

शाम के वक्त मियाँ आजाद ने कहा – भई, अब तो बैठे-बैठे जी घबराता हैं। चलिए, जरा चार-पाँच कोस सैर तो कर आएँ। पतंगबाज ने चार-पाँच कोस का नाम सुना, तो घबराए। यह बेचारे महीन आदमी, आध-कोस भी चलना कठिन था, दस कदम चले और हाँफने लगे। कहीं गए भी तो टाँघन पर। भला दस मील कौन जाता? बोले – हजरत, मैं इस सैर से बाज आया। आपको तो डाक के हरकारों में नौकरी करनी चाहिए। मुझे क्या कुत्ते ने काटा है कि बेससब पँचकोसी चक्कर लगाऊँ और आदमी से ऊँट बन जाऊँ? आप जाते हैं, तो जाइए, मगर जल्द आइएगा। सच कहते हैं, लंबा आदमी अक्ल का दुश्मन होता है। यह गप उड़ाने का वक्त है, या जंगल में घूमने का?

एक मुसाहिब – आप बजा फरमाते हैं, भले मानसों को कभी जंगल की धुन समाई ही नहीं। और, हुजूर के यहाँ घोड़ा-बग्घी सब सवारियाँ मौजूद हैं। जूतियाँ चटखाते हुए आपके दुश्मन चलें।

आजाद – जनाब, यह नजाकत नहीं है, इसको तपेदिक कहते हैं। आप पाँच कोस न चलिए, दो ही कोस चलिए, आध ही कोस चलिए।

पतंगबाज – नहीं जनाब, माफ फरमाइए।

आजाद लंबे-लंबे डग बढ़ाते पश्चिम की तरफ रवाना हुए।

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