अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 2 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

· June 27, 2012

Premchand_4_aआजाद की धाक ऐसी बँधी कि नवाबों और रईसों में भी उनका जिक्र होने लगा। रईसों को मरज होता है कि पहलवान, फिकैत, बिनवटिए को साथ रखें, बग्घी पर ले कर हवा खाने निकलें। एक नवाब साहब ने इनको भी बुलवाया। यह छैला बने हुए, दोहरी तलवार कमर से लगाए जा पहुँचे। देखा, नवाब साहब, अपनी माँ के लाड़ले, भोले-भाले, अँधेरे घर के उजाले, मसनद पर बैठे पेचवान गुड़गुड़ा रहे हैं। सारी उम्र महल के अंदर ही गुजरी थी, कभी घर के बाहर जाने तक की भी नौबत न आई थी, गोया बाहर कदम रखने की कसम खाई थी। दिनभर कमरे में बैठना, यारों-दोस्तों से गप्पें उड़ाना, कभी चौसर रंग जमाया, कभी बाजी लड़ी, कभी पौ पर गोट पड़ी, फिर शतरंज बिछी, मुहरे खट-खट पिटने लगे। किश्त! वह घोड़ा पीट लिया, वह प्यादा मार लिया। जब दिल घबराया, तब मदक का दम लगाया, चंडू के छींटे उड़ाए, अफीम की चुसकी ली। आजाद ने झुक कर सलाम किया। नवाब साहब खुश हो कर गले मिले, अपने करीब बिठाया और बोले – मैंने सुना है, आपने सारे शहर के बाँकों के छक्के छुड़ा दिए।

आजाद – यह हुजूर का इकबाल है, वरना मैं क्या हूँ।

नवाब – मेरे मुसाहबों में आप ही जैसे आदमी की कमी थी, वह पूरी हो गई, अब खूब छनेगी।

इतने में मीर आगा बटेर को मूठ करते हुए आए और सलाम करके बैठ गए। जरा देर के बाद अच्छे मिर्जा गन्ना छीलते हुए आए और एक कोने में जा डटे। मियाँ झम्मन अँगरखे के बंद खोले, गुद्दी पर टोपी रखे खट से मौजूद। फिर क्या था, तू आ, मैं आ। दस-पंद्रह आदमी जमा हो गए, मगर सब झंडे-तले के शोहदे, छँटे हुए गुरगे थे। कोई चीनी के प्याले में अफीम घोल रहा है, कोई चंडू का किवाम बना रहा है, किसी ने गँडेरियाँ बनाईं, किसी ने अमीर-हमजा का किस्सा छेड़ा, सब अपने-अपने धंधे में लगे। नवाब साहब ने मीर आगा से पूछा – मीर साहब, आपने खुश्के का दरख्त भी देखा है?

मीर आगा – हुजूर, कसम है जनाब अमीर की, सत्तर और दो बहत्तर बरस की उम्र होने की आई, गुलाम ने आज तक आँखों से नहीं देखा, लेकिन होगा बड़ा दरख्त। सारी दुनिया की उससे परवरिश होती है, जिसे देखो, खुश्के पर हत्थे लगाता है।

अच्छे मिर्जा – कुरबान जाऊँ, दरख्त के बड़े होने में क्या शक है। कश्मीर से ले कर, कुरबान जाऊँ, बड़े गाँव तक और लंदन से ले कर विलायत तक, सबका इसी पर दारमदार है।

नवाब – मेरा भी खयाल यही है कि दरख्त होगा बहुत बड़ा; लेकिन देखने की बात यह है कि आखिर किस दरख्त से ज्यादा मिलता है। अगर यह बात मालूम हो जाय, तो फिर जानिए कि एक नई बात मालूम हुई। और भाई, सच पूछो, तो छान-बीन करने में जिंदगी का मजा है।

अच्छे मिर्जा – सुना बरगद का दरख्त बहुत बड़ा होता है। झूठ-सच का हाल खुदा जाने; नीम का पेड़ तो हमने भी देखा है, लेकिन किसी शायर ने नीम के दरख्त की बड़ाई की तारीफ नहीं की।

छुट्टन – हमने केले का पेड़, अमरूद का पेड़, खरबूजे का पेड़ सब इन्हीं आँखो देख डाले।

आजाद – भला, यहाँ किसी ने वाहवाह की फलियों का पेड़ भी देखा है?

छुट्टन – जी हाँ, एक दफे नैपाल की तराई में देखा था, मगर शेर जो डकारा, तो मैं झप से गेंदे के दरख्त पर चढ़ गया। कुछ याद नहीं कि पत्ती कैसी होती है।

नवाब – खुश्के के दरख्त का कुछ हाल दरियाफ्त करना चाहिए।

अच्छे मिर्जा – कुरबान जाऊँ, इन लोगों का एतबार क्या? सब सुनी-सुनाई कहते हैं! कुरबान जाऊँ, गुलाम ने वह बात सोची है कि सुनते ही फड़क जाइए।

नवाब – कहिए, कहिए! जरूर कहिए! आपको कसम है। मुझे यकीन हो गया कि आप दूर की कौड़ी लाए होंगे।

अच्छे मिर्जा – (कतारे को खड़ा करके) कुरबान जाऊँ, अगर खुश्के का दरख्त होगा, तो इस कतारे के बराबर ही होगा, न जौ भर बड़ा, न तिल भर छोटा।

नवाब – वाह मीर साहब, वाह, क्या बात निकाली!

मुसाहब – सुभान अल्लाह मीर साहब, क्या सूझ-बूझ है!

आजाद – आप तो अपने वक्त के लाल बुझक्कड़ निकले! मालूम होता है, सफर बहुत किया है।

अच्छे मिर्जा – कौन, मैंने सफर! कसम लो, जो नखास से बाहर गया हूँ। मगर, कुरबान जाऊँ, लड़कपन ही से जहीन था। अब्बाजान तो बिलकुल बेवकूफ थे, मगर अम्माँजान तो बला की औरत थीं, बात में बात पैदा करती थीं।

इतने में गुल-गपाड़े की आवाज आई। अंदर से मुबारककदम लौंडी सिर पीटती हुई आई – हुजूर, मैं सदके, जल्दी चलिए, यह हंगामा कहाँ हो रहा है? बड़ी बेगम साहबा खड़ी रो रही हैं कि मेरे बच्चे पर आँच न आ जाय।

नवाब साहब जूतियाँ छोड़कर अंदर भागे। दरवाजे सब बंद! अब किसी को हुक्म नहीं कि जोर से बोले। इतने में एक मुसाहब ने ड्योढ़ी पर से पुकारा – हुजूर, फिर आखिर मियाँ आजाद किस मरज की दवा हैं? गँड़ेरी छीलने के काम में नहीं, किवाम बनाना नहीं जानते, बटेर मुठियाना नहीं आता, इनको भेज कर दरियाफ्त न कराइए कि दंगा कहाँ हो रहा है।

मुबारककदम – हाँ, हाँ भेज दीजिए; कहिए, कुत्ते की चाल जाएँ और बिल्ली की चाल आएँ।

मियाँ आजाद ने कटार सँभाली और बाहर निकले। राह में लोगों से पूछते जाते हैं कि भाई, यह फिसाद क्या है? एक ने कहा, अजी चिकमंडी में छुरी चली। पाँच-चार कदम आगे बढ़े, तो दो आदमी बातें करते जाते थे कि पंसारी ने पुड़िया में कद्दू के बीजों की जगह जमाल-गोटा बाँध दिया। गाहक ने बिगड़ कर पंसारी की गर्दन नापी। और दस कदम चले तो एक आदमी ने कहा, वह तो कहिए खैरियत गुजरी कि जाग हो गई नहीं तो भेड़िया घर भर को उठा ले जाता। यह भेड़िया कैसा जी? हुजूर, एक मनिहार के घर से भेड़िया तीन बकरियाँ, दो मेंढ़े, एक खरहा और एक खाली पिंजड़ा उड़ा ले गया। उसकी औरत को भी पीठ पर लाद चुका था कि मनिहार जाग उठा अब आजाद चकराए कि भाई अजब बात है, जो है नई सुनाता है। करीब पहुँचे तो देखा, पंद्रह-बीस आदमी मिल कर छप्पर उठाते हैं और गुल मचा रहे हैं। जितने मुँह उतनी बातें। और हँसी तो यह आती है कि नवाब साहब बदहवास हो कर घर के अंदर हो रहे। वहाँ से लौट कर यह किस्सा बयान किया, तो लोगों की जान में जान आई, दरवाजे खुले, फिर नवाब साहब बाहर आए।

नवाब – मियाँ आजाद, तुम्हारी दिलेरी से आज जी खुश हो गया। आज मेरे यहाँ खाना खाना। आप ढाल नहीं बाँधते।

आजाद – हुजूर, ढाल तो जनानों के लिए है, हम उम्र भर एक-अंग लड़ा किए, तलवार ही से चोट लगाई और उसी पर रोकी, या खाली दी या काट गए। एक दिन आपको तलवार का कुछ हुनर दिखाऊँगा, आपकी आँखों में तलवार की बाढ़ से सुरमा लगाऊँगा।

नवाब – ना साहब, यह खेल उजड्डपन के हैं, मेरी रूह काँपती है, तलवार की सूरत देखते ही जूड़ी चढ़ आती है। हाँ, मिर्जा साहब जीवट के आदमी हैं। इनकी आँखों में सुरमा लगाइए, यह उफ करनेवाले नहीं।

अच्छे मिर्जा – कुरबान जाऊँ हुजूर, अब तो बाल पक गए, दाँत चूहों की नजर हुए, कमर टेढ़ी हुई, आँखों ने टका सा जवाब दिया, होश-हवास चंपत हुए। क्या कहूँ हुजूर, जब लोगों को गँड़ेरियाँ चूसते देखता हूँ, तो मुँह देख कर रह जाता हूँ।

इतने में मियाँ कमाली, मियाँ झम्मन और मियाँ दुन्नी भी आ पहुँचे।

कमाली – खुदाबंद, आज तो अजीब खबर सुनी, हवास जाते रहे। शहर भर में खलबली मची है, अल्लाह बचाए, अबकी गरमी की फसल खैरियत से गुजरती नहीं नजर आती, आसार बुरे हैं।

नवाब – क्यों? क्यों? खैर तो है! क्या कयामत आनेवाली है या आफताब सवा नेजे पर हो रहा? आखिर माजरा क्या है, कुछ बताओ तो सही।

अच्छे मिर्जा – ऐ हुजूर, यह जब आते हैं, एक नया शिगोफा छोड़ते हैं। खुदा जाने, कौन इनके कान में फूँक जाता है। ऐसी सुनाई की नशा हिरण हो गया, जम्हाइयाँ आने लगीं।

कमाली – अजी, आप किस खेत की मूली हैं, हमसे तो बड़े-बड़ों के नशे हिरण हुए हैं। जब पहली तारीख आएगी, तो आँखें खुल जाएँगीं, आटे-दाल का भाव मालूम हो जाएगा। और दो-चार दिन मीठे टुकड़े उड़ा लो। वाह साहब, हम तो ढूँढ़-ढूँढ़ कर खबरें लाएँ, आप दिनभर पिनक में ऊँघा करें, और हमी को उल्लू बनाएँ। पहली को कलई खुल जाएगी, बचा, सूरत बिगड़ जाए तो सही।

नवाब – क्या! क्या! पहली तारीख कैसी? अरे मियाँ, तुम तो पहेलियाँ बुझवाते हो, आखिर पहली को क्या होनेवाला है?

कमाली – ऐ हुजूर, यह न पूछिए, बस, कुछ कहा नहीं जाता। एक हलवाइन अभी जवान-जहान है। मारे हौके के औटा हुआ दूध जो पी गई तो पेट फूल कर कुप्पा हो गया। किसी ने कुछ बताया, किसी ने कुछ नुस्खा पिलाया; मगर वह अंटा-गाफिल हो गई। अब सुनिए कि जब चिता पर जाने लगी; कुलबुला कर उठ बैठी। अरे राम! अरे बाप-रे बाप! यू का भवा? हलवाइयों ने वह बम-चख मचाई कि कुछ न पूछिए। ‘यू देखो, लहास हिलत है! अरे यू का अंधेर भवा?’ आखिरकार दो-चार हलवाइयों ने जी कड़ा करके लाश को घसीट लिया और झटपट कफन फाड़ कर उसे निकाला, तो टैयाँ सी उठ बैठी। हुजूर, कसम है खुदा की, उसने वह वह बातें बयान कीं कि कहीं नहीं जातीं। जब मरी तो जमराज के दूतों ने मुझे उठा कर भगवान के पास पहुँचाया, सीता जी बैठी पूरी बेलत रहैं, हमका देखके भगवान बोले कि इसको ले जाओ। मुझे उसकी बोली तो याद नहीं, मगर मतलब यह था कि पहली को बड़ा अँधेरा घुप छा जाएगा और तूफान आएगा, जितने गुनहगार बंदे है सब जलाए जाएँगे, और अफीमची जिस घर में होंगे उसको फरिश्ते जला कर खाक-सियाह कर देंगे।

नवाब – मिर्जा साहब, ये बोरिया-बँधना उठाइए, आपका यहाँ ठिकाना नहीं। नाहक कहीं फरिश्ते मेरी कोठी फूँक दें तो कहीं का न रहूँ। बस, बकचा सँभालिए, कहीं और बिस्तर जमाइए।

अच्छे मिर्जा – कुरबान जाऊँ हुजूर, यह बड़ा बेईमान आदमी है। हुजूर तो भोलेभाले रईस हैं, जिसने जो कहा मान लिया। भला कहीं फरिश्ते घर फूँका करते हैं? मुझ बुड्ढे को न निकालिए, कई पुश्तें इसी दरबार में गुजर गईं, अब किसका दामन पकड़ूँ? अरे वाह से झूठे, अच्छी बेपर की उड़ाई, हलवाइन मरी भी और जी भी उठी, बेसिरपैर की बात।

नवाब – खैर, कुछ भी हो, आप अपना सुबीता करें। मेरे बाप-दादा की मिलकियत कहीं फरिश्ते फूँक दें तो बस! आप हैं किस मरज की दवा? चारपाइयाँ तोड़ा करते हैं।

अच्छे मिर्जा – वाह री किस्मत? यहाँ जान लड़ा दी, बकरे की जान गई, खानेवाले को मजा न आया। इस शैतान से खुदा समझे, जिसने मेरे हक में काँटे बोए। खुदा करे, इसका आज के सातवें ही दिन जनाजा निकले। जैसे ही आ कर बैठा, मेरी बाईं आँख फड़कने लगी, तो यह गुल खिला।

नवाब साहब मुसाहबों को यह नादिरी हुक्म दे कर जनानखाने में चले गए कि मिर्जा को निकलवा दो। उनके जाते ही मिर्जा की ले-दे शुरू हो गई।

कमाली – मिर्जा साहब, अफीम का डब्बा बगल में दबाइए और चलते फिरते नजर आइए। सरकार का नादिरी हुक्म है और छोटी बेगम साहिबा महनामथ मचा रही हैं कि इस बुड्ढे को खड़े-खड़े निकाल दो। सो अब खिसकिए, नहीं बुरी होगी।

झम्मन – वाजिबी बात है, सरकार चलते-चलते हुक्म दे गए थे। हम लोग मजबूर हैं, अब आप अपना सुबीता कीजिए, अभी सबेरा है, नहीं हम पर पिट्टस पड़ेगी। और भाई, जब फरिश्तों के आने का डर है तो कोई तुमको क्यों कर अपने घर में रहने दे? कहीं एक जरा सी चिनगारी रख दें, तो कहिए मकान जल कर खाकसियाह हो गया कि नहीं, फिर कैसी होगी?

अच्छे मिर्जा – अबे, तो फरिश्ते कहीं गाँव जलाया करते हैं। वह ऊटपटाँग बातें बकता है। लो साहब, हमारे रहने में जोखिम है, जो आठों पहर ड्योढ़ी पर बने रहते हैं। अच्छा अड़ंगा दिया।

झम्मन – अड़ंगा-बड़ंगा मैं नहीं जानता, अब आप खसकंत की ठहराइए, बहुत दिन मीठे टुकड़े उड़ाए, चुगलियाँ खा-खा कर रईस का मिजाज बिगाड़ दिया, किसी से जरा सी खता हुई और आपने जड़ दी। ‘भूस में चिनगी डाल जमालो अलग खड़ी।’ पचासों भलेमानसों की रोटी लो। इनसान से गलती हो ही जाती है, यह चुगली खाना क्या माने। ओ गफूर मिर्जा ने तुम्हें भी तो उखाड़ना चाहा था?

गफूर – अरे, यह तो अपने बाप की जड़ खोदनेवाले आदमी हैं, भीतर से बाहर तक कोई तो इनसे खुश नहीं।

दुन्नी – मिर्जा, अगर कुछ हया है तो इस मुसाहबी पर लात मरो; जिस अल्लाह ने मुँह चीरा है वह रोजी भी देगा।

मुबारककदम – गफूर। गफूर! छोटी बेगम साहबा का हुक्म है कि इस मुए अफीमची को शहर से निकाल दो। कहती हैं, जब तक यह न टलेगा दाहने हाथ का खाना हराम है।

अच्छे मिर्जा – शहर से निकाल दो। तमाम शहर पर बेगम साहब का क्या इजारा है? वह अभी कल आईं, यहाँ इस घर में उम्र बीत गई।

कमाली – अबे ओ नमकहराम, छोटा मुँह बड़ी बात! बेगम साहबा के कहने को दुलखता है। इतनी पड़ेंगी बेभाव की कि याद करोगे, चाँद गंजी कर दी जाएगी।

अच्छे मिर्जा – अब जो यहाँ पानी पिए उस पर लानत! यह कह कर मिर्जा ने अफीम की डिबिया उठाई और चले। मुसाहबों ने उनके जलाने के लिए कहना शुरू किया -मिर्जा जी, कभी-कभी आ जाया कीजिएगा। एक बोला – लाइए डिबिया, मैं पहुँचा दूँ। दूसरा बोला – कहिए तो घोड़ा कसवा दूँ। मिर्जा ने किसी को कुछ जवाब न दिया, चुपके से चले ही गए।

इधर पहली तारीख आई तो मियाँ कमाली चकराए कि अब मैं झूठा बना, और साख गई। लोगों ने नवाब को चंग पर चढ़ाया कि हुजूर, जो हम कहें वह कीजिए, तो आज की बला टल जाय। नवाब ने मुसाहबों को सारा अख्तियार दे दिया। फिर क्या था, एक तरफ ब्राह्मण देवता बैठे मंत्रों का जप कर रहे हैं, हवन हो रहा है, और स्वाहा-स्वाहा की आवाज आ रही है, दूसरी तरफ हाफिज जी कुरान पढ़ रहे हैं, और दीवानखाने में महफिल जमी हुई है कि फरिश्तों को झँझोटी को धुना सुना कर खुश कर लिया जाय।

झम्मन – मिर्जाजी न सिधारते तो खुदा जाने इस वक्त क्या कुछ हो गया होता।

नवाब – होता क्या, कोठी की कोठी भक से उड़ जाती। अब किसी अफीमची को आने तक न दूँगा।

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